| (शलिनी माथुर : 04 जनवरी 1959- 16 जून 1994 ) |
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| (शलिनी माथुर : 04 जनवरी 1959- 16 जून 1994 ) |
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| जन्म:24-10-1919,दरियाबाद (बाराबंकी );मृत्यु:13-06-1995;आगरा |
हमारे बाबूजी ताज राजबली माथुर साहब ने अपनी पूरी ज़िंदगी 'ईमान ' व 'स्वाभिमान ' के साथ आभावों में गुज़ार दी लेकिन कभी उफ तक न की न ही कोई उलाहना कभी किसी को दिया। आज जब लोग अपने हक हुकूक के लिए किसी भी हद तक गिर जाते हैं हमारे बाबूजी ने अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपने हक को भी ठुकरा दिया था। मैंने भी पूरी कोशिश करके 'ईमान ' व 'स्वाभिमान ' की भरसक रक्षा की है भले ही अपने ही भाई - बहन की निगाहों में मूर्ख सिद्ध हुआ हूँ। उत्तर प्रदेश के माथुर कायस्थ परिवारों में हमारे बली खानदान से सभी परिचित हैं।
बाबूजी ने फूफा जी के साथ साथ डालीगंज ,लखनऊ में जमीन खरीदी थी लेकिन न तो फूफा जी और न ही बाबूजी मकान बनवा सके दोनों को अपनी - अपनी ज़मीनें बेचनी पड़ीं। बाबूजी ने पुश्तैनी खेती में भी हिस्सा नहीं लिया था। १९७५ में जब मैं मेरठ में बेरोजगार होकर आगरा पहुंचा तो बउआ ने मुझसे आगरा में मकान लेने को कहा, कार्यस्थल पर एक साथी ने बताया कि हाउसिंग बोर्ड में कुछ मकान बिकाऊ हैं। मेरठ में रोजगार की बचत के रु ३०००/- जमा थे उनको आगरा मँगवाकर २७ मार्च १९७७ को ड्राफ्ट बनवाकर लखनऊ भेज दिया। उस समय वेतन रु २७५ /-मासिक था और मकान की मासिक किश्त रु २९०/- प्रतिमाह जमा करना था। ०३ अप्रैल १९७८ को जब मकान एलाट हुआ तब वेतन रु ५००/- हो चुका था अतः किश्त आसानी से देते रहे। सितंबर १९७८ में बाबूजी के रिटायरमेंट के बाद १२ नवंबर १९७८ को कमलानागर स्थित उस मकान में शिफ्ट हो गए तब से अपनी मृत्यु तक बाबूजी और बउआ वहीं मेरे साथ ही रहे। बीच में शायद पाँच माह के लिए फरीदाबाद भतीजी के जन्म के समय गए थे।
२५ मार्च १९८१ को शालिनी से शादी तय होने के बाद उनका भाई शरद मोहन ने आकार बउआ से वहाँ रहने की इच्छा जाहिर की उन्होंने आस - पास किराये पर दिलवाने को कहा लेकिन नहीं लिया क्योंकि बहन के आने से पहले ही घर में घुसना उद्देश्य था। फिर उसे शहर में जाब करते हुए भी कभी बहन से मिलने भी नहीं आया। उनकी मा का कहना था कि वह खुशखबरी लेकर आएगा। फिर२४ नवंबर १९८२ को आया तो यह समाचार लेकर कि, बच्चे की डेथ हो गई है ।
१९८४ की अक्षय तृतीया पर जब यशवंत सवा साल का था बउआ की इच्छा पर उसको लेकर वृंदावन , बाँके बिहारी जी के दर्शन हेतु गए वहाँ से आने के बाद मिथ्या आरोपों पर मुझे सस्पेंड कर दिया गया । १९६२ मेंभी जब बउआ की इच्छा पर वृंदावन , बाँके बिहारी जी के दर्शन हेतु गए वहाँ से आने के बाद बाबूजी का ट्रांसफर नान फेमिली स्टेशन सिलीगुड़ी हो गया था और हम सब भई- बहन की पढ़ाई गड़बड़ा गई थी।
बाबूजी प्रति वर्ष कुछ रु बद्रीनाथ भेजते थे और डाक से वहाँ से प्रसाद प्राप्त करते थे। आजीवन कष्ट में उन दोनों का जीवन व्यतीत हुआ। जब मैंने ज्योतिष का ज्ञान अर्जित किया और अध्ययन किया तो पाया कि, बाबूजी की जन्म -कुंडली में ब्रहस्पति ' उच्च ' का था । जिनका ब्रहस्पति ' उच्च ' का अथवा ' स्व - राशि ' का होता है उन लोगों को न तो मंदिर में दान देना चाहिए न मंदिर के पुजारी को दक्षिणा देनी चाहिए अन्यथा उनको कष्ट ही होता है। इसी प्रकार सभी ग्रहों के अनुसार उनके उच्च अथवा स्व- राशिस्थ होने पर उनके दान करने पर कूफल ही मिलता है।
पुत्र के विवाह के बाद आज बाबूजी की पुण्यतिथि पहली बार थी यदि पुत्र और पुत्र- वधू तीर्थ -यात्रा पर न जाते तो जैसे हम छह विशेष आहुतियों के साथ पुण्यतिथि पर आत्मा की शांति हेतु हवन करते थे वे लोग कर सकते थे। पूनम की आँखों में ग्लूकोमा और मोतियाबिंद होने के बाद से यह प्रक्रिया रुक गई थी जिसे बाबूजी के पौत्र और पौत्र- वधू कर सकते थे। किन्तु पुत्र अपने जिन सुसरालियों के साथ तीर्थाटन पर है वे आर्यसमाज पद्धति के विरोधी हैं।
शालिनी के निधन के बाद बाबूजी ने आर्यसमाज पद्धति से ही ५ दिन बाद हवन करवाया था। तब गोविंद बिहारी मौसाजी ने हमारे बाबूजी की खिली उड़ाई थी जबकि उनके श्वसुर साहब ने भी उनकी सास साहिबा के निधन पर ३ दिन बाद हवन करवाया था। खुद बाबूजी और फिर ब उआ के निधन के बाद भी हमने आर्यसमाज पद्धति से ही हवन करवाए थे। आर्यसमाज कमला नगर - बलकेश्वर, आगरा में मैं सक्रिय सदस्य भी बन गया था। कार्यक्रमों में भाग भी लेता था। कई बार मुझको भी अपने विचार रखने का मौका दिया गया था। २००९ में आगरा से लखनऊ आ जाने पर यह सिलसिला टूट गया था। इस वर्ष १५ फरवरी २०२६ को आर्यसमाज सदर, लखनऊ में मंत्री महोदय ने शिव -रात्रि के अवसर पर मुझे बोलने का अवसर प्रदान किया था।
मैं चाहता तो था कि,पुत्र और पुत्र - वधू हम लोगों के कार्य जो छूट गया था अपने हाथ में ले लेते लेकिन मैंने उन लोगों की इच्छा में रोड़ा बनना उचित नहीं समझा। बाबूजी जैसा ब्रहस्पति पुत्र - वधू का होने के कारण उन लोगों को दान करने का निषेध जरूर कर दिया है।
मैंने तो बाबूजी की इज्जत की खातिर आर्यसमाज को अपना लिया था लेकिन उनके पौत्र और पौत्र - वधू आगे इसे जारी रखेंगे इसमें घोर संदेह है। जून का माह शालिनी, बाबूजी और ब उआ के निधन का माह है , १६ और १३ तथा २५ जून उनकी पुण्यतिथियाँ है।
पूनम भी बाबूजी को अपने श्रद्धा - सुमन अर्पित कर रही हैं ।
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"ॐ नमः शिवाय च का अर्थ है-Salutation To That Lord The Benefactor of all "यह कथन है संत श्याम जी पाराशर का.अर्थात हम अपनी मातृ -भूमि भारत को नमन करते हैं.वस्तुतः यदि हम भारत का मान-चित्र और शंकर जी का चित्र एक साथ रख कर तुलना करें तो उन महान संत क़े विचारों को ठीक से समझ सकते हैं.शंकर या शिव जी क़े माथे पर अर्ध-चंद्राकार हिमाच्छादित हिमालय पर्वत ही तो है.जटा से निकलती हुई गंगा -तिब्बत स्थित (अब चीन क़े कब्जे में)मानसरोवर झील से गंगा जी क़े उदगम की ही निशानी बता रही है.नंदी(बैल)की सवारी इस बात की ओर इशारा है कि,हमारा भारत एक कृषि -प्रधान देश है.क्योंकि ,आज ट्रेक्टर-युग में भी बैल ही सर्वत्र हल जोतने का मुख्य आधार है.शिव द्वारा सिंह-चर्म को धारण करना संकेत करता है कि,भारत वीर-बांकुरों का देश है.शिव क़े आभूषण(परस्पर विरोधी जीव)यह दर्शाते हैंकि,भारत "विविधताओं में एकता वाला देश है."यहाँ संसार में सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र चेरापूंजी है तो संसार का सर्वाधिक रेगिस्तानी इलाका थार का मरुस्थल भी है.विभिन्न भाषाएं बोली जाती हैं तो पोशाकों में भी विविधता है.बंगाल में धोती-कुर्ता व धोती ब्लाउज का चलन है तो पंजाब में सलवार -कुर्ता व कुर्ता-पायजामा पहना जाता है.तमिलनाडु व केरल में तहमद प्रचलित है तो आदिवासी क्षेत्रों में पुरुष व महिला मात्र गोपनीय अंगों को ही ढकते हैं.पश्चिम और उत्तर भारत में गेहूं अधिक पाया जाता है तो पूर्व व दक्षिण भारत में चावल का भात खाया जाता है.विभिन्न प्रकार क़े शिव जी क़े गण इस बात का द्योतक हैं कि, यहाँ विभिन्न मत-मतान्तर क़े अनुयायी सुगमता पूर्वक रहते हैं.शिव जी की अर्धांगिनी -पार्वती जी हमारे देश भारत की संस्कृति (Culture )ही तो है.भारतीय संस्कृति में विविधता व अनेकता तो है परन्तु साथ ही साथ वह कुछ मौलिक सूत्रों द्वारा एकता में भी आबद्ध हैं.हमारे यहाँ धर्म की अवधारणा-धारण करने योग्य से है.हमारे देश में धर्म का प्रवर्तन किसी महापुरुष विशेष द्वारा नहीं हुआ है जिस प्रकार इस्लाम क़े प्रवर्तक हजरत मोहम्मद व ईसाईयत क़े प्रवर्तक ईसा मसीह थे.हमारे यहाँ राम अथवा कृष्ण धर्म क़े प्रवर्तक नहीं बल्कि धर्म की ही उपज थे.राम और कृष्ण क़े रूप में मोक्ष -प्राप्त आत्माओं का अवतरण धर्म की रक्षा हेतु ही,बुराइयों पर प्रहार करने क़े लिये हुआ था.उन्होंने कोई व्यक्तिगत धर्म नहीं प्रतिपादित किया था.आज जिन मतों को विभिन्न धर्म क़े नाम से पुकारा जा रहा है ;वास्तव में वे भिन्न-भिन्न उपासना-पद्धतियाँ हैं न कि,कोई धर्म अलग से हैं.लेकिन आप देखते हैं कि,लोग धर्म क़े नाम पर भी विद्वेष फैलाने में कामयाब हो जाते हैं.ऐसे लोग अपने महापुरुषों क़े आदर्शों को सहज ही भुला देते हैं.
"भक्ति" :
आचार्य श्री राम शर्मा गायत्री परिवार क़े संस्थापक थे और उन्होंने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा था -"उन्हें मत सराहो जिनने अनीति पूर्वक सफलता पायी और संपत्ति कमाई."लेकिन हम देखते हैं कि,आज उन्हीं क़े परिवार में उनके पुत्र व दामाद इसी संपत्ति क़े कारण आमने सामने टकरा रहे हैं.गायत्री परिवार में दो प्रबंध समितियां बन गई हैं.अनुयायी भी उन दोनों क़े मध्य बंट गये हैं.कहाँ गई भक्ति?"भक्ति"शब्द ढाई अक्षरों क़े मेल से बना है."भ "अर्थात भजन .कर्म दो प्रकार क़े होते हैं -सकाम और निष्काम,इनमे से निष्काम कर्म का (आधा क) और त्याग हेतु "ति" लेकर "भक्ति"होती है.आज भक्ति है कहाँ?
विकृति :
महर्षि दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना धर्म में प्रविष्ट कुरीतियों को समाप्त करने हेतु ही एक आन्दोलन क़े रूप में की थी.नारी शिक्षा,विधवा-पुनर्विवाह ,जातीय विषमता की समाप्ति की दिशा में महर्षि दयानंद क़े योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता.आज उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज में क्या हो रहा है-गुटबाजी -प्रतिद्वंदिता .
काफी अरसा पूर्व आगरा में आर्य समाज क़े वार्षिक निर्वाचन में गोलियां खुल कर चलीं थीं.यह कौन सी अहिंसा है?जिस पर स्वामी जी ने सर्वाधिक बल दिया था. स्वभाविक है कि, यह सब नीति-नियमों की अवहेलना का ही परिणाम है,जबकि आर्य समाज में प्रत्येक कार्यक्रम क़े समापन पर शांति-पाठ का विधान है.यह शांति-पाठ यह प्रेरणा देता है कि, जिस प्रकार ब्रह्माण्ड में विभिन्न तारागण एक नियम क़े तहत अपनी अपनी कक्षा (Orbits ) में चलते हैं उसी प्रकार यह संसार भी जियो और जीने दो क़े सिद्धांत पर चले.परन्तु एरवा कटरा में गुरुकुल चलाने वाले एक शास्त्री जी ने रेलवे क़े भ्रष्टतम व्यक्ति जो एक शाखा क़े आर्य समाज का प्रधान भी रह चुका था क़े भ्रष्टतम सहयोगी क़े धन क़े बल पर एक ईमानदार कार्यकर्ता पर प्रहार किया एवं सहयोग दिया पुजारी व पदाधिकारियों ने तो क्या कहा जाये कि, आज सत्यार्थ-प्रकाश क़े अनुयायी ही सत्य का गला घोंट कर ईमानदारी का दण्ड देने लगे हैं.यह सब धर्म नहीं है.परन्तु जन-समाज ऐसे लोगों को बड़ा धार्मिक मान कर उनका जय-जयकारा करता है.आज जो लोगों को उलटे उस्तरे से मूढ़ ले जाये उसे ही मान-सम्मान मिलता है.ऐसे ही लोग धर्म व राजनीति क़े अगुआ बन जाते हैं.ग्रेषम का अर्थशास्त्र में एक सिद्धांत है कि,ख़राब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है.ठीक यही हाल समाज,धर्म व राजनीति क़े क्षेत्र में चल रहा है.जबसे आर्यसमाज में संघ अनुयायी छा गए हैं आर्यसमाज दयानन्द सरस्वती के मार्ग से भटक गया है और इसी लिए उसमें उपरोक्त विकृति पनप सकीं .
दुनिया लूटो,मक्कर से.
रोटी खाओ,घी-शक्कर से.
एवं
अब सच्चे साधक धक्के खाते हैं .
फरेबी आज मजे-मौज उड़ाते हैं.
शिव : ज्ञान -विज्ञान का प्रदाता : :
आज बड़े विद्वान,ज्ञानी और मान्यजन लोगों को जागरूक होने नहीं देना चाहते,स्वजाति बंधुओं की उदर-पूर्ती की खातिर नियमों की गलत व्याख्या प्रस्तुत कर देते हैं.राम द्वारा शिव -लिंग की पूजा किया जाना बता कर मिथ्या सिद्ध करना चाहते हैं कि, राम क़े युग में मूर्ती-पूजा थी और राम खुद मूर्ती-पूजक थे. वे यह नहीं बताना चाहते कि राम की शिव पूजा का तात्पर्य भारत -भू की पूजा था. वे यह भी नहीं बताना चाहते कि, शिव परमात्मा क़े उस स्वरूप को कहते हैं कि, जो ज्ञान -विज्ञान का दाता और शीघ्र प्रसन्न होने वाला है. ब्रह्माण्ड में चल रहे अगणित तारा-मंडलों को यदि मानव शरीर क़े रूप में कल्पित करें तो हमारी पृथ्वी का स्थान वहां आता है जहाँ मानव शरीर में लिंग होता है.यही कारण है कि, हम पृथ्वी -वासी शिव का स्मरण लिंग रूप में करते हैं और यही राम ने समझाया भी होगा न कि, स्वंय ही लिंग बना कर पूजा की होगी. स्मरण करने को कंठस्थ करना कहते हैं न कि, उदरस्थ करना.परन्तु ऐसा ही समझाया जा रहा है और दूसरे विद्वजनों से अपार प्रशंसा भी प्राप्त की जा रही है. यही कारण है भारत क़े गारत होने का.
जैसे सरबाईना और सेरिडोन क़े विज्ञापनों में अमीन सायानी और हरीश भीमानी जोर लगते है अपने-अपने उत्पाद की बिक्री का वैसे ही उस समय जब इस्लाम क़े प्रचार में कहा गया कि हजरत सा: ने चाँद क़े दो टुकड़े कर दिए तो जवाब आया कि, हमारे भी हनुमान ने मात्र ५ वर्ष की अवस्था में सूर्य को निगल लिया था अतः हमारा दृष्टिकोण श्रेष्ठ है. परन्तु दुःख और अफ़सोस की बात है कि, सच्चाई साफ़ करने क़े बजाये ढोंग को वैज्ञानिकता का जामा ओढाया जा रहा है.
यदि हम अपने देश व समाज को पिछड़ेपन से निकाल कर ,अपने खोये हुए गौरव को पुनः पाना चाहते हैं,सोने की चिड़िया क़े नाम से पुकारे जाने वाले देश से गरीबी को मिटाना चाहते हैं,भूख और अशिक्षा को हटाना चाहते हैं तो हमें "ॐ नमः शिवाय च "क़े अर्थ को ठीक से समझना ,मानना और उस पर चलना होगा तभी हम अपने देश को "सत्यम,शिवम्,सुन्दरम"बना सकते हैं.आज की युवा पीढी ही इस कार्य को करने में सक्षम हो सकती है.अतः युवा -वर्ग का आह्वान है कि, वह सत्य-न्याय-नियम और नीति पर चलने का संकल्प ले और इसके विपरीत आचरण करने वालों को सामजिक उपेक्षा का सामना करने पर बाध्य कर दे तभी हम अपने भारत का भविष्य उज्जवल बना सकते हैं.काश ऐसा हो सकेगा?हम ऐसी आशा तो संजो ही सकते हैं.
" ओ ३ म *नमः शिवाय च" कहने पर उसका मतलब यह होता है.:-
*अ +उ +म अर्थात आत्मा +परमात्मा +प्रकृति
च अर्थात तथा/ एवं / और
शिवाय -हितकारी,दुःख हारी ,सुख-स्वरूप
नमः नमस्ते या प्रणाम या वंदना या नमन ******
'शैव' व 'वैष्णव' दृष्टिकोण की बात कुछ विद्वान उठाते हैं तो कुछ प्रत्यक्ष पोंगापंथ का समर्थन करते हैं तो कुछ 'नास्तिक' अप्रत्यक्ष रूप से पोंगापंथ को ही पुष्ट करते हैं। सार यह कि 'सत्य ' को साधारण जन के सामने न आने देना ही इनका लक्ष्य होता है। सावन या श्रावण मास में सोमवार के दिन 'शिव' पर जल चढ़ाने के नाम पर, शिव रात्रि पर भी तांडव करना और साधारण जनता का उत्पीड़न करना इन पोंगापंथियों का गोरख धंधा है।
'परिक्रमा' क्या थी ?:
वस्तुतः प्राचीन काल में जब छोटे छोटे नगर राज्य (CITY STATES) थे और वर्षा काल में साधारण जन 'कृषि कार्य' में व्यस्त होता था तब शासक की ओर से राज्य की सेना नगर राज्य के चारों ओर परिक्रमा (गश्त) किया करती थी और यह सम्पूर्ण वर्षा काल में चलने वाली निरंतर प्रक्रिया थी जिसका उद्देश्य दूसरे राज्य द्वारा अपने राज्य की व अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था। कालांतर में जब छोटे राज्य समाप्त हो गए तब इस प्रक्रिया का औचित्य भी समाप्त हो गया। किन्तु ब्राह्मणवादी पोंगापंथियों ने अपने व अपने पोषक व्यापारियों के हितों की रक्षार्थ धर्म की संज्ञा से सजा कर शिव के जलाभिषेक के नाम पर 'कांवड़िया' प्रथा का सूत्रपात किया जो आज भी अपना तांडव जारी रखे हुये है। अफसोस की बात यह है कि पोंगापंथ का पर्दाफाश करने के बजाए 'नास्तिकवादी' विद्वान भी पोंगापंथ को ही बढ़ावा दे रहे हैं और सच्चाई का विरोध कर रहे हैं।ऐसे ही लोग विविधता और मत- वैभिन्यता का विरोध करते हैं .
~विजय राजबली माथुर ©
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मूल नक्षत्र ( १२ फरवरी १८२४ )में जन्में मूल शंकर तिवारी को नौ वर्ष की अवस्था में जब यह भान हुआ कि, जिस शिव लिंग को ईश्वर बताया जा रहा था उस पर चढ़े फल-फूल, मिष्ठान्न को बड़े आराम से चूहा जैसा छोटा जीव उस पर चढ़ कर खा सकता है तो वह भ्रम है-ईश्वर नहीं और वह गृह त्याग कर 'गुरु' की खोज में निकल पड़े थे। 'गुरु' अर्थात 'गु' अंधकार से 'रू' प्रकाश की ओर ले जाने वाला। भटकते हुये वह जब वृन्दावन (मथुरा ) के स्वामी विरजानन्द जी के यहाँ पहुंचे तो उनकी खोज सम्पन्न हुई। नया जमाना ब्लाग के लेखक ने एक अन्य लेख द्वारा स्वामी विरजानन्द जी को हिन्दू-मुस्लिम एकता का पक्षधर घोषित किया है।
वस्तुतः स्वामी विरजानन्द जी ने स्वामी दयानन्द सरस्वती जी को जो शिक्षा दी वह सम्पूर्ण मानवता को श्रेष्ठ =आर्ष=आर्य बनाने की थी और उसी पर दयानन्द जी चले भी। यह आर्य न कोई जाति है न धर्म न ही नस्ल न ही किसी मजहब की शाखा या प्रशाखा। न ही किसी क्षेत्र विशेष से संबन्धित। विश्व का कोई भी वह मनुष्य जो श्रेष्ठ कर्म करे वह आर्य है। अश्रेष्ठ या निकृष्ट कर्म करने वाला अनार्य ।
स्वामी दयानन्द जी का जन्म मूल शंकर तिवारी के रूप में हुआ था अर्थात प्रचलित ब्राह्मण जाति में लेकिन उन्होने घर-परिवार और दुनिया में जो देखा व अपने गुरु विरजानन्द जी से जो समझा-सीखा उससे वह जिस निष्कर्ष पर पहुंचे थे उनके ही शब्दों में प्रस्तुत है। ('सत्यार्थप्रकाश' : सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा , नई दिल्ली- 2 से प्रकाशित के पृष्ठ- 262 व 263 पर ) :
"जब ब्राह्मण लोग विद्द्याहीन हुए तब क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के अविद्वान होने में तो कथा ही क्या कहनी? जो परंपरा से वेदादि शास्त्रों का अर्थसहित पढ़ने का प्रचार था वह भी छूट गया। केवल जीविकार्थ पाठमात्र ब्राह्मण लोग पढ़ते रहे, सो पाठ्मात्र भी क्षत्रिय आदि को न पढ़ाया। क्योंकि जब अविद्वान हुये गुरु बन गए तब छल, कपट, अधर्म भी उनमें बढ़ता चला । ब्राह्मणों ने विचारा कि अपनी जीविका का प्रबंध बांधना चाहिए। सम्मति करके यही निश्चय कर क्षत्रिय आदि को उपदेश करने लगे कि हम हीं तुम्हारे पूज्यदेव हैं। बिना हमारी सेवा किए तुमको स्वर्ग या मुक्ति न मिलेगी। किन्तु जो तुम हमारी सेवा न करोगे तो घोर नरक में पड़ोगे। जो-जो पूर्ण विद्या वाले धार्मिकों का नाम ब्राह्मण और पूजनीय वेद और ऋषि-मुनियों के शास्त्र में लिखा था, उसको अपने मूर्ख, विषयी, कपटी, लमपट,अधर्मियों पर घटा बैठे। भला वे आप्त विद्वानों के लक्षण इन मूरखों में कब घट सकते हैं? परंतु जब क्षत्रियादी यजमान संस्कृत विद्या से अत्यंत रहित हुये तब उनके सामने जो-जो गप्प मारी, सो-सो बिचारों सब मान ली। जब मान ली तब इन नाम मात्र ब्राह्मणों की बन पड़ी। सबको अपने वचन जाल में बांध कर वशीभूत कर लिया और कहने लगे कि :---
ब्रह्मवाक्यं जनार्दन: :। ।
अर्थात जो कुछ ब्राह्मणों के मुख से वचन निकलता है, वह जानों साक्षात भगवान के मुख से निकला। जब क्षत्रियादी वर्ण 'आँख के अंधे और गांठ के पूरे' अर्थात भीतर विद्या की आँख फूटी हुई और जिनके पास धन पुष्कल है, ऐसे-ऐसे चेले मिले, फिर इन व्यर्थ ब्राह्मण नामवालों को विषयानंद का उपवन मिल गया। यह भी उन लोगों ने प्रसिद्ध किया कि जो कुछ पृथिवी में उत्तम पदार्थ हैं, वे सब ब्राह्मणों के लिए हैं। अर्थात जो गुण,कर्म,स्वभाव से ब्राहमणादि वर्णव्यवस्था थी, उसको नष्ट कर जन्म पर रखी और मृतक पर्यंत का भी दान यजमानों से लेने लगे। जैसी अपनी इच्छा हुई वैसा करते चले "
स्वामी दयानन्द जी ने महाभारत काल के बाद से वैदिक व्यवस्था का पतन माना है जो ऐतिहासिक रूप से भी सत्य है। राम और कृष्ण के समय में उनके लिए 'आर्यपुत्र' शब्द प्रयुक्त होता था। बाद में बौद्धों के विहार व मठ उजाड़ने वालों को ( हिंसा देने वालों को बौद्धों द्वारा )हिन्दू कहा गया। जब ईरानी यहाँ आए तो अपनी फारसी भाषा की एक गंदी और भद्दी गाली के रूप में यहाँ के निवासियों को 'हिन्दू' कह कर पुकारा तब से ही यह शब्द प्रचलन में आया है जिसको ब्रिटिश शासकों ने एक राजनीतिक विचारधारा के रूप में पोषित किया था।
स्वामी दयानन्द जी ने भी सन 1857 ई ॰ की क्रान्ति में सक्रिय भाग लिया था और क्रांति के विफल होने पर 1875 में उन्होने 'आर्यसमाज' की स्थापना पूर्ण स्वराज्य प्राप्ति के हेतु की थी और उसकी प्रारम्भिक शाखाएँ ब्रिटिश छावनी वाले शहरों में स्थापित की थीं।
एम एम अहलूवालिया साहब ने अपनी पुस्तक :FREEDOM STRUGGLE IN INDIA के पृष्ठ 222 पर लिखा है-
"The Government was never quite happy about the Arya Samaj. They disliked it for its propaganda of self-confidence,self-help and self-reliance.The authorities,sometimes endowed it with fictitious power by persecuting to members whose Puritanism became political under intolerable conditions."
अर्थात-"आर्यसमाज से सरकार को कभी भी खुशी नहीं हुई। शासकों ने आर्यसमाज को इसलिए नहीं चाहा कि यह आत्मविश्वास,स्व-सहाय और आत्म-निर्भरता का प्रचार करता था। कभी-कभी तो अधिकारियों ने इसकी शक्ति को इतना अधिक महत्व दिया कि उसके सदस्यों को दंडित किया और असहनीय दशाओं में उनके सुधारवादी आंदोलन ने राजनीतिक रूप ले लिया। "
ब्रिटिश शासकों ने महर्षि दयानन्द को 'क्रांतिकारी सन्यासी' (REVOLUTIONARY SAINT) की संज्ञा दी थी। आर्यसमाज के 'स्व-राज्य'आंदोलन से भयभीत होकर वाईस राय लार्ड डफरिन ने अपने चहेते अवकाश प्राप्त ICS एलेन आकटावियन (A. O.)हयूम के सहयोग से वोमेश चंद्र (W.C.)बेनर्जी जो परिवर्तित क्रिश्चियन थे की अध्यक्षता में 1885 ई .में इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश साम्राज्य के 'सेफ़्टी वाल्व'के रूप मे करवाई थी। किन्तु महर्षि दयानन्द की प्रेरणा पर आर्यसमाजियों ने कांग्रेस में प्रवेश कर उसे स्वाधीनता आंदोलन चलाने पर विवश कर दिया। 'कांग्रेस का इतिहास' नामक पुस्तक में लेखक -डॉ पट्टाभि सीता रमईय्या ने स्वीकार किया है कि देश की आज़ादी के आंदोलन में जेल जाने वाले 'सत्याग्रहियों'में 85 प्रतिशत आर्यसमाजी थे।
यही वजह है कि आज भी 'साम्राज्यवाद' के हितैषी लोग समय-समय पर महर्षि स्वामी दयानन्द पर हमले करते रहते हैं। दयानंद जी को 'महान हिन्दू' घोषित करना ब्राह्मणवादी षड्यंत्र के सिवा और कुछ नहीं है । आर्यसमाज प्रभावित गांधी जी के असहयोग आंदोलन को छिन्न -भिन्न करने हेतु प्रयासों में (मुस्लिम लीग : स्थापित 1906 , हिंदूमहासभा : स्थापित 1920 ) विफल रहने के उपरांत 1925 में आर एस एस की स्थापना ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा हेतु करवाई गई थी जो तब 'दंगों की भट्टी' में देश को झोंक कर 1947 में साम्राज्यवादी विभाजन कराने में सफल रहा था और आज यू एस ए के साम्राज्यवादी हितों की रक्षा में अग्रणी और पुनः देश के कई विभाजन कराने की ओर अग्रसर है। ऐसे संगठन की हौसला अफजाई का ही काम करेगा दयानन्द जी को हिन्दू घोषित करने का घृणित अभियान । आज आर्यसमाज पर भी वह आर एस एस जो उसके विरोध में गठित हुआ था हावी है इसलिए उस ओर से प्रतिरोध की आवाज़ उठने की संभावना क्षीण है जिससे दयानन्द के निंदकों व विरोधियों के हौसले बुलंद हैं जो उनको हिन्दू का खिताब दे डाला।
1925 में आर्यसमाज प्रभावित क्रांतिकारी कांग्रेसियों ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन आज़ादी के आंदोलन को तीव्र करने के लिए किया था। इस साम्यवादी आंदोलन में उत्तर-प्रदेश से गेंदालाल दीक्षित, बिहार से स्वामी सहजानन्द और राहुल सांस्कृत्यायन व पंजाब से सरदार भगत सिंह जैसे प्रबुद्ध आर्यसमाजियों ने अपना प्रबल योगदान दिया है। लेकिन एथीज़्म के नाम पर उनकी ओर से भी दयानन्द जी के प्रति हो रहे अन्याय के प्रति प्रतिरोध की संभावना क्षीण ही है। फिर भी अपना फर्ज़ पूरा करना मेरा ध्येय था ही।
विजय राजबली माथुर
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जैसा कि, बचपन वाले चित्र से स्पष्ट है स्वभाविक रूप से मैं एकांत प्रिय रहा हूँ। यह चित्र हमारे मामाजी द्वारा मथुरानागर,दरियाबाद में लिया गया था वहाँ आने पर उन्होंने मेरी माँ से पूछा और मुझे लेने वहाँ पहुँच गए जहां हमारी सबसे बड़ी जीजी मुझे खेलने के लिए ले गईं थीं , मुझे बेर के पत्ते से अकेला खेलते देख कर पहले यह चित्र खींच कर फिर मुझे ले आए।
पढ़ाई के दौरान भी मैं सामूहिक अंताक्षरी आदि जो शिक्षक करवाते थे उसमें तो भाग लेता था लेकिन सहपाठियों के साथ न खेल कर अकेले ही रहता था। वाद - विवाद प्रतियोताओं में जरूर भाग लेता था। ७ वीं कक्षा में प्रथम पुरुस्कार और स्नातक में भाषण गोष्ठी में द्वितीय पुरुस्कार भी प्राप्त किए।
नौकरी के दौरान ट्रेड यूनियन्स के जरिए राजनीति से भी सम्बद्ध रहा ( कम्युनिस्ट पार्टी - समाजवादी पार्टी - कम्युनिस्ट पार्टी )। आई टी सी के होटल मुगल , आगरा में कार्यरत रहने के दौरान बार्डर सिक्युरिटी फोर्स के रिटायर्ड सब इंस्पेक्टर अमर सिंह जी के सान्निध्य से ज्योतिष के प्रति रुझान हुआ जबकि पहले ज्योतिष - विरोधी था। ज्योतिष के क्षेत्र में पोंगा - पंडित वाद का विरोधी हूँ। आगरा कालेज जूलाजी विभाध्यक्ष डाक्टर विजय कृष्ण तिवारी, भारत पेट्रोलियम लिमिटेड के उच्चाधिकारी डाक्टर ब्रिज मोहन उपाध्याय, सपा नेता और मर्चेन्ट नेवी के पूर्व उच्चाधिकारी पंडित सुरेश पालीवाल, कांग्रेस नेता और अध्यापक- स्कूल प्रबंधक मुन्ना लाल द्विवेदी , यू पी के क्राफ्ट एंड फुटवियर इंस्टिचयूट के डिप्टी डायरेक्टर राहुल पूरी आदि ब्राह्मण लोगों ने पोंगा - पंडितों से न पूछ कर मुझसे ज्योतिषीय परामर्श लिया और मुझसे अपने - अपने निवास - स्थानों पर हवंन - यज्ञ सम्पन्न करवाए। लेकिन अपने निकटतम रिश्तेदारों ने मुझसे परामर्श लेने के बावजूद पोंगा -पंडितों के बताए उपाय ही अपनाए।
जहां विभिन्न ज्योतिषी भी ग्रहों के निदान हेतु दान - पुण्य पर जोर देते हैं वहीं मैं ' दान का निषेद्ध करता हूँ और लोगों को दान उन वस्तुओं का करने को मना करता हूँ जो - जो ग्रह उनकी जन्म - कुंडली में उच्च के या स्व -ग्रही होते हैं। सिर्फ दो उदाहरण दान देने के बाद नुकसान उठाने वालों के देना बेहद जरूरी समझता हूँ।
१) ------ हमारी अपनी छोटी बहन ने अपनी कालोनी के मंदिर हेतु रु ११०० /- दान दिया और दाताओं की सूची में उनका नाम भी अंकित हुआ उनको एक अनावश्यक मुकदमे का लगभग नौ वर्षों तक सामना करना पडा जबकि, उनकी कुंडली में ब्रहस्पति उच्च का होने के कारण किसी भी मंदिर या मंदिर के पुजारी आदि को दान नहीं देना चाहिए था लेकिन पोंगा - पंडित तो दान - पुण्य करवाते है सो कर दिया और परेशानी का सामना किया।
२ ) ------ upsidc के एक एक्ज़ीक्यूटिव इंजीनियर साहब वृंदावन में दो भूखों को भोजन कराकर तथा पुजारी को दान देकर लौटे और आगरा प्रवेश करते ही सिकंदरा के पास लूट का शिकार हो गए। उनकी घड़ी की सोने की चेन , उनकी श्रीमती जी के कानों के कुंडल,हाथों के कडे ,गले का हार सब जबरिया उतरवा लिए गए क्योंकि उनको न तो मंदिर में दान करना था न ही अन्न का लेकिन उनको तो पोंगा - पंडितों की सलाह पर दान - पुण्य करना था ,किए और लूटे गए।
मुझसे ईर्ष्या करने वाले चाहे वे रिश्तेदार हो या अन्य परिचित मुझे असफल सिद्ध करने को सदैव प्रयासरत रहते हैं उनको परमात्मा और प्रकृति की दया पर छोड़ कर उनसे दूर रहता हूँ।
मैंने अपने लिए कुछ सूत्र तय कर लिए हैं उनका ही अनुसरण करता हूँ ------
1) ------ Healthy Mind Keeps the Body Healthy.
2 ) ------ Quick & Fast Decision but Slow & Steady Actio.
3 ) ------ Decided at Once Decided for Ever & Ever.
७५ वें वर्ष में प्रवेश पर सभी शुभकामनाएं प्रेषित करने वालों और उनके परिवारीजनों के लिए असीम मंगलकांनाएं.।
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(अक्टूबर 2019 में पिताजी स्व ताज राज बली के शताब्दी वर्ष पर प्रकाशित पुस्तक )
पूजा और धर्म मानव जीवन को सुंदर,सुखद और समृद्ध बनाने के लिए थे लेकिन आज पूंजी -वाद के युग में इनको विकृत करके विभेद व विभ्रम का सृजक बना दिया गया है। क्या पढे-लिखे और क्या अनपढ़ सभी विभ्रम का शिकार हैं ; कुछ अनजाने में तो कुछ जान-बूझ कर भी।
संत ------ जिसने अपने जीवन को संयमित एवं संतुलित कर लिया हो।
साधू ------ जिसने अपने जीवन का उद्देश्य साध लिया हो।
धर्म शब्द की उत्पत्ति धृति धातु से हुई है जिसका अर्थ है धारण करना अर्थात मानव जीवन व समाज को धारण करने हेतु आवश्यक तत्व ही धर्म हैं अन्य कुछ नहीं, यथा----
सत्य, अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ), अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।
आज इन तत्वों/लक्षणों का पालन न करने वाले ही खुद को धर्म का ठेकेदार घोषित किए हुये हैं।
पूजा भगवान की करनी थी जड़ पदार्थों की नहीं, लेकिन आज जड़-पूजक ही खुद को भगवान-भक्त घोषित करके मानवता को कुचलने पर आमादा हैं।
भगवान/खुदा/गाड को समझते नहीं और इनके नाम पर झगड़ा खड़ा करने को तैयार रहते हैं।
राम और कृष्ण को 'भगवान' या भगवान का अवतार बताने वाले इस वैज्ञानिक 'सत्य ' को स्वीकार नहीं करते कि 'भगवान' न कभी जन्म लेता है न उसकी मृत्यु होती है। अर्थात भगवान कभी भी 'नस' और 'नाड़ी' के बंधन मे नहीं बंधता है क्योंकि,-
भ=भूमि अर्थात पृथ्वी।
ग=गगन अर्थात आकाश।
व=वायु।
I=अनल अर्थात अग्नि (ऊर्जा )।
न=नीर अर्थात जल।
प्रकृति के ये पाँच तत्व ही 'भगवान' हैं और चूंकि इन्हें किसी ने बनाया नहीं है ये खुद ही बने हैं इसी लिए ये 'खुदा' हैं। ये पांचों तत्व ही प्राणियों और वनस्पतियों तथा दूसरे पदार्थों की 'उत्पत्ति'(GENERATE),'स्थिति'(OPERATE),'संहार'(DESTROY) के लिए उत्तरदाई हैं इसलिए ये ही GOD हैं। पुरोहितों ने अपनी-अपनी दुकान चमकाने के लिए इन को तीन अलग-अलग नाम से गढ़ लिया है और जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ रहे हैं। इनकी पूजा का एकमात्र उपाय 'हवन' अर्थात 'यज्ञ' ही है और कुछ भी कोरा पाखंड एवं ढोंग।
इनकी पूजा का अर्थ है इन तत्वों का संरक्षण व संवर्धन अर्थात प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह भगवान/खुदा/गाड तत्वों की रक्षा करे व उन्हें नष्ट होने से बचाए। लेकिन आज हो क्या रहा है? अलग-अलग नाम पर इनको नष्ट करने का मानवीय दुष्चक्र चल रहा है वह भी धर्म के नाम पर।
ज्योतिष वह विज्ञान है जो मानव जीवन को सुंदर, सुखद व समृद्ध बनाने हेतु चेतावनी व उपाय बताता है। लेकिन आज इस विज्ञान को स्वार्थी व धूर्त लोगों ने पेट-पूजा का औज़ार बना कर इसकी उपादेयता को गौड़ कर दिया व इसे आलोचना का शिकार बना दिया है।
यह संसार एक परीक्षालय(Examination Hall) है और यहाँ सतत परीक्षा चलती रहती है। परमात्मा ही पर्यवेक्षक(Invegilator) और परीक्षक (Examiner) है। जीवात्मा कार्य क्षेत्र में स्वतंत्र है और जैसा कर्म करेगा परमात्मा उसे उसी प्रकार का फल देगा। आप अवश्य ही जानना चाहेंगे कि तब ग्रहों की शांति से क्या तात्पर्य और लाभ हैं?मनुष्य पूर्व जन्म के संचित प्रारब्ध के आधार पर विशेष ग्रह-नक्षत्रों की परिस्थिति में जन्मा है और अपने बुद्धि -विवेक से ग्रहों के अनिष्ट से बच सकता है। यदि वह सम्यक उपाय करे अन्यथा कष्ट भोगना ही होगा। जिस प्रकार जिस नंबर पर आप फोन मिलायेंगे बात भी उसी के धारक से ही होगी,अन्य से नहीं। इसी प्रकार जिस ग्रह की शांति हेतु आप मंत्रोच्चारण करेंगे वह प्रार्थना भी उसी ग्रह तक हवन में दी गयी आपकी आहुति के माध्यम से अवश्य ही पहुंचेगा । .अग्नि का गुण है उसमे डाले गए पदार्थों को परमाणुओं (Atoms) में विभक्त करना और वायु उन परमाणुओं को मन्त्र के आधार पर प्रवाहित कर देता है जिससे ग्रहों की शांति द्वारा उनके प्रकोप से बचा जा सकता है। प्रचलन में लोग अन्य उपाय भी बताते हैं परन्तु उन से ग्रहों की शांति होने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं मिलता,हाँ मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ सकता है।
ज्योतिष पूर्णतः एक विज्ञान है। वस्तुतः विज्ञान किसी भी विषय के नियम बद्ध एवं क्रम बद्ध अध्ययन को कहा जाता है। ज्योतिष के नियम खगोलीय गणना पर आधारित हैं और वे पूर्णतः वैज्ञानिक हैं वस्तुतः ज्योतिष में ढोंग पाखण्ड का कोंई स्थान नहीं है। परन्तु फिर भी हम देखते हैं कि कुछ लोग अपने निजी स्वार्थों की खातिर जनता को दिग्भ्रमित कर के ठगते हैं और उन्हीं के कारण सम्पूर्ण ज्योतिष विज्ञान पर कटाक्ष किया जाता है। यह एक गलत क्रिया की गलत प्रतिक्रिया है। जहाँ तक विज्ञान के अन्य विषयों का सवाल है वे What & How का तो जवाब देते हैं परन्तु उनके पास Why का उत्तर नहीं है.ज्योतिष विज्ञान में इस Why का भी उत्तर मिल जाता है।
जन्म लेने वाला कोई भी बच्चा अपने साथ भाग्य (प्रारब्ध) लेकर आता है। यह प्रारब्ध क्या है इसे इस प्रकार समझें कि हम जितने भी कार्य करते हैं,वे तीन प्रकार के होते हैं-सद्कर्म,दुष्कर्म और अकर्म।
यह तो सभी जानते हैं की सद्कर्म का परिणाम शुभ तथा दुष्कर्म का अशुभ होता है,परन्तु जो कर्म किया जाना चाहिए और नहीं किया गया अथार्त फ़र्ज़ (duity) पूरा नहीं हुआ वह अकर्म है और इसका भी परमात्मा से दण्ड मिलता है। अतएव सद्कर्म,दुष्कर्म,और अकर्म के जो फल इस जन्म में प्राप्त नहीं हो पाते वह आगामी जन्म के लिए संचित हो जाते हैं। अब नए जन्मे बच्चे के ये संचित कर्म जो तीव्रगामी होते हैं वे प्रारब्ध कहलाते हैं और जो मंदगामी होते हैं वे अनारब्ध कहलाते हैं। मनुष्य अपनी बुद्धि व् विवेक के बल पर इस जन्म में सद्कर्म ही अपना कर ज्ञान के द्वारा अनारब्ध कर्मों के दुष्फल को नष्ट करने में सफल हो सकता है और मोक्ष भी प्राप्त कर सकता है। मोक्ष वह अवस्था है जब आत्मा को कारण और सूक्ष्म शरीर से भी मुक्ति मिल जाती है.और वह कुछ काल ब्रह्मांड में ही स्थित रह जाता है.ऐसी मोक्ष प्राप्त आत्माओं को संकटकाल में परमात्मा पुनः शरीर देकर जन-कल्याण हेतु पृथ्वी पर भेज देता है। भगवान् महावीर,गौतम बुद्ध,महात्मा गांधी,स्वामी दयानंद ,स्वामी विवेकानंद,आदि तथा और भी बहुत पहले मर्यादा पुरषोत्तम श्री राम एवं योगी राज श्री कृष्ण तब अवतरित हुए जब पृथ्वी पर अत्याचार अपने चरम पर पहुँच गया था।
जब किसी प्राणी की मृत्यु हो जाती है तो वायु,जल,आकाश,अग्नि और पृथ्वी इन पंचतत्वों से निर्मित यह शरीर तो नष्ट हो जाता है परन्तु आत्मा के साथ-साथ कारण शरीर और सूक्ष्म शरीर मोक्ष प्राप्ति तक चले चलते हैं और अवशिष्ट संचित कर्मफल के आधार पर आत्मा भौतिक शरीर को प्राप्त कर लेती है जो उसे अपने किये कर्मों का फल भोगने हेतु मिला है। यदि जन्म मनुष्य योनी में है तो वह अपनी बुद्धि व विवेक के प्रयोग द्वारा मोक्ष प्राप्ति का प्रयास कर सकता है।
बारह राशियों में विचरण करने के कारण आत्मा के साथ चल रहे सूक्ष्म व कारण शरीर पर ग्रहों व नक्षत्रों का प्रभाव स्पष्ट अंकित हो जाता है। जन्मकालीन समय तथा स्थान के आधार पर ज्योतिषीय गणना द्वारा बच्चे की जन्म-पत्री का निर्माण किया जाता है और यह बताया जा सकता है कि कब कब क्या क्या अच्छा या बुरा प्रभाव पड़ेगा। अच्छे प्रभाव को प्रयास करके प्राप्त किया जा सकता है और लापरवाही द्वारा छोड़ कर वंचित भी हुआ जा सकता है। इसी प्रकार बुरे प्रभाव को ज्योतिष विज्ञान सम्मत उपायों द्वारा नष्ट अथवा क्षीण किया जा सकता है और उस के प्रकोप से बचा जा सकता है। जन्मकालीन नक्षत्रों की गणना के आधार पर भविष्य फल कथन करने वाला विज्ञान ही ज्योतिष विज्ञान है।
प्रारंभ में मैं ज्योतिष समर्थक इसलिए नहीं था कि, तथाकथित ज्योतिषियों के भ्रम - जाल के कारण तमाम लोगों को नुकसान उठाते देखता रहा था। 1976 में जब आई टी सी के होटल मुगल,आगरा में कार्यरत था एक सहकर्मी द्वारा बी एस एफ के रिटायर्ड सब - इंस्पेक्टर साहब से मुलाकात करवाई गई थी जिन्होंने उन साथी के प्रश्न पर मेरे पास 26 वर्ष की उम्र में अपना मकान होने और अंततः दो मकान होने की बात कह दी तब मैंने उनका मखौल ही कर दिया क्योंकि तब मेरा वेतन मात्र रु 275/- मासिक ही था। किन्तु दो वर्ष बाद जब वेतन रु 500/- था तब आवास - विकास परिषद का मकान हायर - पर्चेज योजना में रु 290/- मासिक किश्त पर मिल गया जो 15 वर्ष बाद अपना हो गया और आज तब से 45 वर्षों बाद लखनऊ में दो मकान प्राप्त कर सका हूँ। ज्योतिषियों से संघर्ष करते - करते खुद ज्योतिष का जानकार हो गया और चाहता हूँ कि,जो जानकारियाँ मैंने हासिल की हैं उनको कोई अन्य भी हस्त-गत कर ले जिससे पोंगा - पंडित -वाद से लोगों को निजात दिला सके। पत्नी को जानकारी तो हो गई किन्तु ग्लूकोमा से ग्रस्त हो जाने के कारण उनके द्वारा प्रयोग किया जाना संभव नहीं है। पुत्र को भी जानकारी हासिल करा दी थी लेकिन वह व्यवहार में भी प्रयोग करे तभी सफल हो सकेगा। जिन बी एस एफ के रिटायर्ड सब - इंस्पेक्टर साहब द्वारा मकान की बात कही गई थी उनके द्वारा ही 68 वर्ष से 76 वर्ष तक ' रोग -शय्या ' पर होने की भी बात कही थी लेकिन खुद ज्योतिष की जानकारी हासिल होने के कारण अब तक उससे बचा रह सका हूँ ।
आश्चर्य और दुख दोनों इस बात का है कि, विद्वान ज्योतिषी भी पौराणिक कथाओं का मिश्रण ज्योतिषीय विश्लेषण में कर देते हैं। ' राहू ' और ' केतु ' की जो कहानी अमृत कलश - संघर्ष की गढ़ी जाती है उसका वैज्ञानिक आधार क्या है ?
वस्तुतः हमारी पृथिवी अपनी धुरी पर साढ़े 23 डिग्री झुकी हुई है और यह नारंगी कि भांति दोनों सिरों पर चपटी है जिस कारण सूर्य आदि ग्रहों से आने वाली किरणें पृथिवी पर परावर्तित होकर आती हैं और यहाँ के निवासियों को प्रभावित करती हैं। इसलिए पृथिवी के इन दोनों ध्रुवों को हम ज्योतिष में राहू- केतु के छाया ग्रहों के रूप में गणना करते हैं। सब ग्रहों के साथ पृथिवी भी ब्रह्मांड में परिभ्रमण कर रही है इसके दोनों ध्रुव 180 डिग्री पर स्थित होने के कारण ही विपरीत दिशाओं में परिभ्रमण करते प्रतीत होते हैं।
अपने ब्लागस के जरिए धर्म,ज्योतिष,राजनीति,सामाजिक विषयों पर लिखता रहा था उसमें से कुछ लेखों का संकलन अपने पिताजी के शताब्दी वर्ष में पुस्तकाकार प्रकाशन 2019 में करवाया था । यदि पुत्र चाहेगा और उचित समझेगा तो भविष्य में अन्य लेखों का भी संकलन प्रकाशित करवा लेगा।
शोषण,उत्पीड़न,अन्याय के विरुद्ध संघर्ष में योगदान देने के लिए 1986 में आगरा में कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुआ था, लखनऊ आकर भी सक्रिय रहा था किन्तु पत्नी की ग्लूकोमा बीमारी के कारण अब निष्क्रिय हूँ । 2014 के बाद देश और समाज में जो विभेद आए उनका प्रभाव पारिवारिक रिश्तेदारियों पर भी पड़ा है तथा ' एकला चलो ' सिद्धांत पर चल रहा हूँ और चलता रहूँगा।
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