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रविवार, 15 फ़रवरी 2026

शिव : ज्ञान -विज्ञान का प्रदाता : : ------ विजय राजबली माथुर

 "ॐ नमः शिवाय च का अर्थ है-Salutation To That Lord The Benefactor of all "यह कथन है संत श्याम जी पाराशर का.अर्थात हम अपनी मातृ -भूमि भारत को नमन करते हैं.वस्तुतः यदि हम भारत का मान-चित्र और शंकर जी का चित्र एक साथ रख कर तुलना करें तो उन महान संत क़े विचारों को ठीक से समझ सकते हैं.शंकर या शिव जी क़े माथे पर अर्ध-चंद्राकार हिमाच्छादित हिमालय पर्वत ही तो है.जटा से निकलती हुई गंगा -तिब्बत स्थित (अब चीन क़े कब्जे में)मानसरोवर झील से गंगा जी क़े उदगम की ही निशानी बता रही है.नंदी(बैल)की सवारी इस बात की ओर इशारा है कि,हमारा भारत एक कृषि -प्रधान देश है.क्योंकि ,आज ट्रेक्टर-युग में भी बैल ही सर्वत्र हल जोतने का मुख्य आधार है.शिव द्वारा सिंह-चर्म को धारण करना संकेत करता है कि,भारत वीर-बांकुरों का देश है.शिव क़े आभूषण(परस्पर विरोधी जीव)यह दर्शाते हैंकि,भारत "विविधताओं में एकता वाला देश है."यहाँ संसार में सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र चेरापूंजी है तो संसार का सर्वाधिक रेगिस्तानी इलाका थार का मरुस्थल भी है.विभिन्न भाषाएं बोली जाती हैं तो पोशाकों में भी विविधता है.बंगाल में धोती-कुर्ता व धोती ब्लाउज का चलन है तो पंजाब में सलवार -कुर्ता व कुर्ता-पायजामा पहना जाता है.तमिलनाडु व केरल में तहमद प्रचलित है तो आदिवासी क्षेत्रों में पुरुष व महिला मात्र गोपनीय अंगों को ही ढकते हैं.पश्चिम और उत्तर भारत में गेहूं अधिक पाया जाता है तो पूर्व व दक्षिण भारत में चावल का भात खाया जाता है.विभिन्न प्रकार क़े शिव जी क़े गण इस बात का द्योतक हैं कि, यहाँ विभिन्न मत-मतान्तर क़े अनुयायी सुगमता पूर्वक रहते हैं.शिव जी की अर्धांगिनी -पार्वती जी हमारे देश भारत की संस्कृति (Culture )ही तो है.भारतीय संस्कृति में विविधता व अनेकता तो है परन्तु साथ ही साथ वह कुछ  मौलिक सूत्रों द्वारा एकता में भी आबद्ध हैं.हमारे यहाँ धर्म की अवधारणा-धारण करने योग्य से है.हमारे देश में धर्म का प्रवर्तन किसी महापुरुष विशेष द्वारा नहीं हुआ है जिस प्रकार इस्लाम क़े प्रवर्तक हजरत मोहम्मद व ईसाईयत क़े प्रवर्तक ईसा मसीह थे.हमारे यहाँ राम अथवा कृष्ण धर्म क़े प्रवर्तक नहीं बल्कि धर्म की ही उपज थे.राम और कृष्ण क़े रूप में मोक्ष -प्राप्त आत्माओं का अवतरण धर्म की रक्षा हेतु ही,बुराइयों पर प्रहार करने क़े लिये हुआ था.उन्होंने कोई व्यक्तिगत धर्म नहीं प्रतिपादित किया था.आज जिन मतों को विभिन्न धर्म क़े नाम से पुकारा जा रहा है ;वास्तव में वे भिन्न-भिन्न उपासना-पद्धतियाँ हैं न कि,कोई धर्म अलग से हैं.लेकिन आप देखते हैं कि,लोग धर्म क़े नाम पर भी विद्वेष फैलाने में कामयाब हो जाते हैं.ऐसे लोग अपने महापुरुषों क़े आदर्शों को सहज ही भुला देते हैं. 

"भक्ति"  : 

आचार्य श्री राम शर्मा गायत्री परिवार क़े संस्थापक थे और उन्होंने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा था -"उन्हें मत सराहो जिनने अनीति पूर्वक सफलता पायी और संपत्ति कमाई."लेकिन हम देखते हैं कि,आज उन्हीं क़े परिवार में उनके पुत्र व दामाद इसी संपत्ति क़े कारण आमने सामने टकरा रहे हैं.गायत्री परिवार में दो प्रबंध समितियां बन गई हैं.अनुयायी भी उन दोनों क़े मध्य बंट गये हैं.कहाँ गई भक्ति?"भक्ति"शब्द ढाई अक्षरों क़े मेल से बना है."भ "अर्थात भजन .कर्म दो प्रकार क़े होते हैं -सकाम और निष्काम,इनमे से निष्काम कर्म का (आधा क) और त्याग हेतु "ति" लेकर "भक्ति"होती है.आज भक्ति है कहाँ? 


विकृति  : 


महर्षि दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना धर्म में प्रविष्ट कुरीतियों को समाप्त करने हेतु ही एक आन्दोलन क़े रूप में की थी.नारी शिक्षा,विधवा-पुनर्विवाह ,जातीय विषमता की समाप्ति की दिशा में महर्षि दयानंद क़े योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता.आज उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज में क्या हो रहा है-गुटबाजी -प्रतिद्वंदिता .

काफी अरसा पूर्व आगरा में आर्य समाज क़े वार्षिक निर्वाचन में गोलियां खुल कर चलीं थीं.यह कौन सी अहिंसा है?जिस पर स्वामी जी ने सर्वाधिक बल दिया था. स्वभाविक है कि, यह सब नीति-नियमों की अवहेलना का ही परिणाम है,जबकि आर्य समाज में प्रत्येक कार्यक्रम क़े समापन पर शांति-पाठ का विधान है.यह शांति-पाठ यह प्रेरणा देता है कि, जिस प्रकार ब्रह्माण्ड में विभिन्न तारागण एक नियम क़े तहत अपनी अपनी कक्षा (Orbits ) में चलते हैं उसी प्रकार यह संसार भी जियो और जीने दो क़े सिद्धांत पर चले.परन्तु एरवा कटरा में गुरुकुल चलाने  वाले एक शास्त्री जी ने रेलवे क़े भ्रष्टतम व्यक्ति जो एक शाखा क़े आर्य समाज का प्रधान भी रह चुका था क़े भ्रष्टतम सहयोगी क़े धन क़े बल पर एक ईमानदार कार्यकर्ता पर प्रहार किया एवं सहयोग दिया पुजारी व पदाधिकारियों ने तो क्या कहा जाये कि, आज सत्यार्थ-प्रकाश क़े अनुयायी ही सत्य का गला घोंट कर ईमानदारी का दण्ड देने लगे हैं.यह सब धर्म नहीं है.परन्तु जन-समाज ऐसे लोगों को बड़ा धार्मिक मान कर उनका जय-जयकारा करता है.आज जो लोगों को उलटे उस्तरे से मूढ़ ले जाये उसे ही मान-सम्मान मिलता है.ऐसे ही लोग धर्म व राजनीति क़े अगुआ बन जाते हैं.ग्रेषम का अर्थशास्त्र में एक सिद्धांत है कि,ख़राब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है.ठीक यही हाल समाज,धर्म व राजनीति क़े क्षेत्र में चल रहा है.जबसे आर्यसमाज में संघ अनुयायी छा गए हैं आर्यसमाज दयानन्द सरस्वती के मार्ग से भटक गया है और इसी लिए उसमें उपरोक्त विकृति पनप सकीं .


दुनिया लूटो,मक्कर से.

रोटी खाओ,घी-शक्कर से.

   एवं

अब सच्चे साधक धक्के खाते हैं .

फरेबी आज मजे-मौज  उड़ाते हैं.


शिव : ज्ञान -विज्ञान का प्रदाता  : :


आज बड़े विद्वान,ज्ञानी और मान्यजन लोगों को जागरूक होने नहीं देना चाहते,स्वजाति बंधुओं की उदर-पूर्ती की खातिर नियमों की गलत व्याख्या प्रस्तुत कर देते हैं.राम द्वारा शिव -लिंग की पूजा किया जाना बता कर मिथ्या सिद्ध करना चाहते हैं कि, राम क़े युग में मूर्ती-पूजा थी और राम खुद मूर्ती-पूजक थे. वे यह नहीं बताना चाहते कि राम की शिव पूजा का तात्पर्य भारत -भू की पूजा था. वे यह भी नहीं बताना चाहते कि, शिव परमात्मा क़े उस स्वरूप को कहते हैं कि, जो ज्ञान -विज्ञान का दाता और शीघ्र प्रसन्न होने वाला है. ब्रह्माण्ड में चल रहे अगणित तारा-मंडलों को यदि मानव शरीर क़े रूप में कल्पित करें तो हमारी पृथ्वी का स्थान वहां आता है जहाँ मानव शरीर में लिंग होता है.यही कारण है कि, हम पृथ्वी -वासी शिव का स्मरण लिंग रूप में करते हैं और यही राम ने समझाया भी होगा न कि, स्वंय ही  लिंग बना कर पूजा की होगी. स्मरण करने को कंठस्थ करना कहते हैं न कि, उदरस्थ करना.परन्तु ऐसा ही समझाया जा रहा है और दूसरे विद्वजनों से अपार प्रशंसा भी प्राप्त की जा रही है. यही कारण है भारत क़े गारत होने का.



जैसे सरबाईना और सेरिडोन क़े विज्ञापनों में अमीन सायानी और हरीश भीमानी जोर लगते है अपने-अपने उत्पाद की बिक्री का वैसे ही उस समय जब इस्लाम क़े प्रचार में कहा गया कि हजरत सा: ने चाँद क़े दो टुकड़े  कर दिए तो जवाब आया कि, हमारे भी हनुमान ने मात्र ५ वर्ष की अवस्था में सूर्य को निगल लिया था अतः हमारा दृष्टिकोण श्रेष्ठ है. परन्तु दुःख और अफ़सोस की बात है कि, सच्चाई साफ़ करने क़े बजाये ढोंग को वैज्ञानिकता का जामा ओढाया जा रहा है.


यदि हम अपने देश  व समाज को पिछड़ेपन से निकाल कर ,अपने खोये हुए गौरव को पुनः पाना चाहते हैं,सोने की चिड़िया क़े नाम से पुकारे जाने वाले देश से गरीबी को मिटाना चाहते हैं,भूख और अशिक्षा को हटाना चाहते हैं तो हमें "ॐ नमः शिवाय च "क़े अर्थ को ठीक से समझना ,मानना और उस पर चलना होगा तभी हम अपने देश को "सत्यम,शिवम्,सुन्दरम"बना सकते हैं.आज की युवा पीढी ही इस कार्य को करने में सक्षम हो सकती है.अतः युवा -वर्ग का आह्वान है कि, वह सत्य-न्याय-नियम और नीति पर चलने का संकल्प ले और इसके विपरीत आचरण करने वालों को सामजिक उपेक्षा का सामना करने पर बाध्य कर दे तभी हम अपने भारत का भविष्य उज्जवल बना सकते हैं.काश ऐसा हो सकेगा?हम ऐसी आशा तो संजो ही सकते हैं.

" ओ ३ म *नमः शिवाय च" कहने पर उसका मतलब यह होता है.:-

*अ +उ +म अर्थात आत्मा +परमात्मा +प्रकृति 

च अर्थात तथा/ एवं / और 

शिवाय -हितकारी,दुःख हारी ,सुख-स्वरूप 


नमः नमस्ते या प्रणाम या वंदना या नमन ******


'शैव' व 'वैष्णव' दृष्टिकोण की बात कुछ विद्वान उठाते हैं तो कुछ प्रत्यक्ष पोंगापंथ का समर्थन करते हैं तो कुछ 'नास्तिक' अप्रत्यक्ष रूप से पोंगापंथ को ही पुष्ट करते हैं। सार यह कि 'सत्य ' को साधारण जन के सामने न आने देना ही इनका लक्ष्य होता है। सावन या श्रावण मास में सोमवार के दिन 'शिव' पर जल चढ़ाने के नाम पर, शिव रात्रि पर भी तांडव करना और साधारण जनता का उत्पीड़न करना इन पोंगापंथियों का गोरख धंधा है। 


'परिक्रमा' क्या थी ?: 



वस्तुतः प्राचीन काल में जब छोटे छोटे नगर राज्य (CITY STATES) थे और वर्षा काल में साधारण जन 'कृषि कार्य' में व्यस्त होता था तब शासक की ओर से राज्य की सेना नगर राज्य के चारों ओर परिक्रमा (गश्त) किया करती थी और यह सम्पूर्ण वर्षा काल में चलने वाली निरंतर प्रक्रिया थी जिसका उद्देश्य दूसरे राज्य द्वारा अपने राज्य की व अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था। कालांतर में जब छोटे राज्य समाप्त हो गए तब इस प्रक्रिया का औचित्य भी समाप्त हो गया। किन्तु ब्राह्मणवादी पोंगापंथियों ने अपने व अपने पोषक व्यापारियों के हितों की रक्षार्थ धर्म की संज्ञा से सजा कर शिव के जलाभिषेक के नाम पर 'कांवड़िया' प्रथा का सूत्रपात किया जो आज भी अपना तांडव जारी रखे हुये है। अफसोस की बात यह है कि पोंगापंथ का पर्दाफाश करने के बजाए 'नास्तिकवादी' विद्वान भी पोंगापंथ को ही बढ़ावा दे रहे हैं और सच्चाई का विरोध कर रहे हैं।ऐसे ही लोग विविधता और मत- वैभिन्यता का विरोध करते हैं .


 ~विजय राजबली माथुर ©

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सोमवार, 14 मई 2018

पाखंड एवं ढोंग द्वारा भारत देश और इसकी प्रकृति का अपमान ------ विजय राजबली माथुर

* ब्राह्मण - व्यापारी गठजोड़ ने उसी स्वरूप की पूजा में गण - जनता को उलझा दिया। 
 * * शिव, पार्वती, लिंग, गणेश  की पाखंड युक्त ढोंगवादी / ब्राह्मणवादी व्याख्याओं का ही दुष्परिणाम है कि, एक राजनेता को शिव जो  वस्तुतः भारत देश है और उसकी पत्नी को पार्वती जो यथार्थता इस देश की प्रकृति है के रूप में चित्रित करके अपने देश व इसकी प्रकृति का घोर अपमान कर दिया गया है। 










"ॐ नमः शिवाय च का अर्थ है - Salutation To That Lord The Benefactor of all "यह कथन है संत श्याम जी पाराशर का। अर्थात हम अपनी मातृ - भूमि भारत को नमन करते हैं। वस्तुतः यदि हम भारत का मान-चित्र और शंकर जी का चित्र एक साथ रख कर तुलना करें तो उन महान संत क़े विचारों को ठीक से समझ सकते हैं। शंकर या शिव जी क़े माथे पर अर्ध-चंद्राकार हिमाच्छादित हिमालय पर्वत ही तो है। जटा से निकलती हुई गंगा -तिब्बत स्थित (अब चीन क़े कब्जे में)मानसरोवर झील से गंगा जी क़े उदगम की ही निशानी बता रही है। नंदी (बैल)की सवारी इस बात की ओर इशारा है कि, हमारा भारत एक कृषि -प्रधान देश है। क्योंकि आज ट्रेक्टर-युग में भी बैल ही सर्वत्र हल जोतने का मुख्य आधार है। शिव द्वारा सिंह -चर्म को धारण करना संकेत करता है कि, भारत वीर-बांकुरों का देश है। शिव क़े आभूषण (परस्पर विरोधी जीव)यह दर्शाते हैंकि, भारत "विविधताओं में एकता वाला देश है। " यहाँ संसार में सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र चेरापूंजी है तो संसार का सर्वाधिक रेगिस्तानी इलाका थार का मरुस्थल भी है। विभिन्न भाषाएं बोली जाती हैं तो पोशाकों में भी विविधता है। बंगाल में धोती - कुर्ता व धोती  - ब्लाउज का चलन है तो पंजाब में सलवार - कुर्ता व कुर्ता -पायजामा पहना जाता है। तमिलनाडु व केरल में तहमद प्रचलित है तो आदिवासी क्षेत्रों में पुरुष व महिला मात्र गोपनीय अंगों को ही ढकते हैं। पश्चिम और उत्तर भारत में गेहूं अधिक पाया जाता है तो पूर्व व दक्षिण भारत में चावल का भात खाया जाता है। विभिन्न प्रकार क़े शिव जी क़े गण इस बात का द्योतक हैं कि, यहाँ विभिन्न मत - मतान्तर क़े अनुयायी सुगमता पूर्वक रहते हैं। शिव जी की अर्धांगिनी -पार्वती जी हमारे देश भारत की संस्कृति (Culture )ही तो है। भारतीय संस्कृति में विविधता व अनेकता तो है परन्तु साथ ही साथ वह कुछ  मौलिक सूत्रों द्वारा एकता में भी आबद्ध हैं। हमारे यहाँ धर्म की अवधारणा - धारण करने योग्य से है। हमारे देश में धर्म का प्रवर्तन किसी महापुरुष विशेष द्वारा नहीं हुआ है जिस प्रकार इस्लाम क़े प्रवर्तक हजरत मोहम्मद व ईसाईयत क़े प्रवर्तक ईसा मसीह थे। हमारे यहाँ राम अथवा कृष्ण धर्म क़े प्रवर्तक नहीं बल्कि धर्म की ही उपज थे। राम और कृष्ण क़े रूप में मोक्ष -प्राप्त आत्माओं का अवतरण धर्म की रक्षा हेतु ही, बुराइयों पर प्रहार करने क़े लिये हुआ था। उन्होंने कोई व्यक्तिगत धर्म नहीं प्रतिपादित किया था। आज जिन मतों को विभिन्न धर्म क़े नाम से पुकारा जा रहा है ; वास्तव में वे भिन्न -भिन्न उपासना -पद्धतियाँ हैं न कि, कोई धर्म अलग से हैं। लेकिन आप देखते हैं कि, लोग धर्म क़े नाम पर भी विद्वेष फैलाने में कामयाब हो जाते हैं। ऐसे लोग अपने महापुरुषों क़े आदर्शों को सहज ही भुला देते हैं। 
 शिव - पार्वती के पुत्र गणेश से अभिप्राय इस देश के राष्ट्रपति से है। 
गणेश = गण + ईश = गण अर्थात जनता का नायक अर्थात राष्ट्रपति। 
' लिंग ' स्वरूप का अभिप्राय यह है कि , यदि हम अखिल ब्रह्मांड को एक मानव आकृति के रूप में लें तो हमारी  ' पृथ्वी ' का स्थान ब्रह्मांड में वही है जो मानव शरीर में लिंग / योनि का होता है। सृजन या सृष्टि का हेतु होने के कारण मानव शरीर में लिंग / योनि एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। देश के निवासियों से यह अपेक्षा है कि वे अपने इस देश की रक्षा उसी प्रकार करें जिस प्रकार शरीर में लिंग / योनि की करते हैं। 
परंतु बुद्धि, ज्ञान , विवेक को प्रयोग न करके लोग लिंग की स्थापना करके उसे शिव मानते हुये पूजते हैं बजाए संरक्षण करने के , यह मात्र ढोंग है और पूजा नहीं है। 
बेलपत्र को सामग्री में मिला कर आहुती देने से उदर - विकार दूर होते हैं किन्तु ढोंगवाद में बजाए हवन में आहुती देने के बेल - पत्र को व्यर्थ नष्ट कर दिया जाता है। वात - पित्त - कफ आदि जब तक शरीर को धारण करते हैं तब तक ' धातु 'और जब मलिन करने लगते हैं तब ' मल ' एवं जब दूषित करने लगते हैं तब ' दोष ' कहलाते हैं। ये त्रिदोष शरीर को शूल करते हैं। इनसे बचने के लिए अर्थात ' त्रिशूल ' निवारण के लिए तीन फ़लक वाले बेलपत्र से आहुती का विधान रखा गया था लेकिन चित्रकारों ने ' त्रिशूल ' हथियार बना कर शिव, पार्वती और गणेश का मानवीकरण करके प्रस्तुत कर दिया और ब्राह्मण - व्यापारी गठजोड़ ने उसी स्वरूप की पूजा में गण - जनता को उलझा दिया। 
शिव, पार्वती, लिंग, गणेश  की पाखंड युक्त ढोंगवादी / ब्राह्मणवादी व्याख्याओं का ही दुष्परिणाम है कि, एक राजनेता को शिव जो  वस्तुतः भारत देश है और उसकी पत्नी को पार्वती जो यथार्थता इस देश की प्रकृति है के रूप में चित्रित करके अपने देश व इसकी प्रकृति का घोर अपमान कर दिया गया है। 

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बुधवार, 19 अक्टूबर 2016

हम और हमारे पर्व ------ विजय राजबली माथुर

*जब पृथ्वी पर मानव सभ्यता का विकास हुआ तब मानव जीवन को सुखी,सम्पन्न,समृद्ध व दीर्घायुष्य बनाने के लिए प्रकृतिक नियमों के अनुसार चलने के सिद्धान्त खोजे और बताए गए थे। कालांतर में निहित स्वार्थी किन्तु चालाक मनुष्यों ने अपने निजी स्वार्थ के चलते उन नियमों को विकृत करके मानवता प्रतिगामी बना दिया और बड़ी ही धूर्तता से उसे धर्म के आवरण में ढक कर पेश किया जबकि वह कुतर्क पूरी तरह से अधार्मिक व थोथा पाखंड-ढोंग -आडंबर ही था। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि, खुद को एथीस्ट और प्रगतिशील कहलाने वाला तबका भी उसे ही धर्म की संज्ञा देकर अज्ञान-अंधकार को बढ़ाने में पोंगापंथियों की अप्रत्यक्ष सहाता ही करता है। 
अर्थशास्त्र के 'ग्रेशम ' सिद्धान्त के अनुसार खराब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है उसी प्रकार समाज में भी खराब बातें अच्छी बातों को बेदखल कर देती हैं। बदलते मौसम के अनुसार कुछ पर्व और उनके नियम मनुष्य के फायदे के लिए बनाए गए थे जिनको आज न कोई जानता है न ही जानना चाहता है। आज हर पर्व - त्योहार व्यापार/उद्योग जगत के मुनाफे का साधन बन कर रह गया है। अब ये पर्व स्वास्थ्य वर्द्धक जीवनोपयोगी नहीं रह गए हैं। 
पाँच वर्ष पूर्व से मेरी पत्नी ने मेरी बात मान कर 'करवा चौथ' , 'बरमावस ' जैसे हीन पर्वों का परित्याग कर दिया है। अतः हमारे घर से ढोंग-पाखंड विदा हो चुका है। हम अब सुविधानुसार मेटेरियल साईन्स : पदार्थ विज्ञान पर आधारित हवन ही करते हैं जो पर्यावरण शुद्धि का भी साधन है।

*जब तुलसीदास ने तत्कालीन शासन - व्यवस्था के विरुद्ध जनता का आह्वान करने हेतु 'रामचरितमानस ' को प्रारम्भ में 'संस्कृत ' में लिखना शुरू किया था तब काशी के ब्राह्मणों ने उनकी पांडु लिपियों को जला जला दिया जिस कारण उनको अयोध्या आकर 'अवधी ' में रचना करनी पड़ी। कालांतर में ब्राह्मणों ने दो चालें चलीं एक तो 'रामचरितमानस ' में 'ढ़ोल,गंवार,शूद्र,नारी ... ' जैसे प्रक्षेपक ठूंस कर तुलसीदास को और प्रकारांतर से राम को बदनाम कर दिया। दूसरी चाल काफी गंभीर थी जिसके जरिये एक जन - नायक राम को 'अवतार ' या 'भगवान ' घोषित करके उनका अनुसरण करने से रोक दिया गया।
वस्तुतः रावण प्रकांड विद्वान  और वास्तु शास्त्र विशेषज्ञ तो था किन्तु था विसतारवादी/साम्राज्यवादी उसने लगभग सम्पूर्ण विश्व की अपने अनुकूल घेराबंदी कर ली थी और भारत पर भी कब्जा करना चाहता था। उसे 'दशानन ' दसों दिशाओं ( पूर्व,पश्चिम,उत्तर,दक्षिण,ईशान - उत्तर पूर्व,आग्नेय - दक्षिण पूर्व,नेऋत्य - दक्षिण पश्चिम,वावव्य - उत्तर पश्चिम,अन्तरिक्ष,भू गर्भ ) का ज्ञाता होने के कारण कहा जाता था । ...रावण ने सीता का अपहरण नहीं किया था राम व सीता की यह कूटनीति थी कि, सीता ने लंका पहुँच कर वहाँ की सामरिक व आर्थिक सूचनाओं को राम तक पहुंचाया था। सीता से सूचना पाकर ही राम की वायु सेना के प्रधान ' हनुमान ' ने 'राडार ' (सुरसा ) को नष्ट कर लंका में प्रवेश किया और कोशागार तथा आयुद्ध भंडारों को नष्ट करने के अलावा ' विभीषण ' को राम के साथ आने को राज़ी किया था।  भारत की जनता की ओर से राम ने कूटनीतिक व सामरिक युद्ध में रावण को परास्त कर भारत को साम्राज्यवाद की जकड़ से बचा लिया था। लेकिन दुर्भाग्य से आज वही राम साम्राज्यवादियों, व्यापारियों एवं ब्राह्मणों द्वारा जनता की लूट व शोषण हेतु तथा बाज़ार/कारपोरेट घरानों  की मजबूती के लिए प्रयोग किए जा रहे हैं।

*'ॐ नमः शिवाय च ' का अभिप्राय है भारत देश को नमन। इसे समझने के लिए भारत वर्ष का मानचित्र लेकर 'शिव ' के रूप मे की गई कल्पना को मिला कर विश्लेषण करना होगा। उत्तर में  हिम - आच्छादित हिमालय ही तो शिव के मस्तक का अर्द्ध चंद्र है। शिव के मस्तक में 'गंगा ' का प्रवेश इस बात का सूचक है कि, भारत भाल के ऊपर 'त्रिवृष्टि ' - तिब्बत स्थित 'मानसरोवर झील ' से गंगा का उद्गम है। शिव के साथ सर्प, बैल (नंदी ), मनुष्य आदि विविध जीवों का दिखाया जाना ' भारत की  विविधता में एकता ' का संदेश है। 'शिव ' का अर्थ ज्ञान - विज्ञान से है अर्थात शिव का आराधक व्यापक दृष्टिकोण वाला ही हो सकता है जो सम्पूर्ण देश के सभी प्राणियों के साथ सह - अस्तित्व की भावना रखता हो। इसका यह भी अर्थ है कि, जो देश के सभी प्राणियों से एक समान व्यवहार नहीं रखता है वह 'शिव - द्रोही ' अर्थात 'भारत देश का द्रोही ' है। तुलसीदास ने राम द्वारा यही कहलाया है 'जो सिव द्रोही सो मम द्रोही '। जो राम भक्त होने का दावा करे और राम के देश अर्थात शिव भारत के सभी लोगों में समान भाव न रखे वह न तो देश भक्त है न ही राम भक्त। 

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