शनिवार, 13 जून 2026

बाबूजी की ३२ वीं पुण्यतिथि पर श्रद्धावत स्मरण ------ विजय राजबली माथुर

 


जन्म:24-10-1919,दरियाबाद (बाराबंकी );मृत्यु:13-06-1995;आगरा  

हमारे बाबूजी ताज राजबली माथुर साहब ने अपनी पूरी ज़िंदगी 'ईमान ' व 'स्वाभिमान ' के साथ आभावों में गुज़ार दी लेकिन कभी उफ तक न की न ही कोई उलाहना कभी किसी को दिया। आज जब लोग अपने हक हुकूक के लिए किसी भी हद तक गिर जाते हैं हमारे बाबूजी ने अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपने हक को भी ठुकरा दिया था। मैंने भी पूरी कोशिश करके 'ईमान ' व 'स्वाभिमान ' की भरसक रक्षा की है भले ही अपने ही भाई - बहन की निगाहों में मूर्ख सिद्ध हुआ हूँ। उत्तर प्रदेश के माथुर कायस्थ परिवारों में हमारे  बली  खानदान  से सभी परिचित हैं।

बाबूजी ने फूफा जी के साथ साथ डालीगंज ,लखनऊ में जमीन खरीदी थी लेकिन न तो फूफा जी और न ही बाबूजी मकान बनवा सके दोनों को अपनी - अपनी ज़मीनें बेचनी पड़ीं। बाबूजी ने पुश्तैनी खेती में भी हिस्सा नहीं लिया था। १९७५ में जब मैं मेरठ में बेरोजगार होकर आगरा पहुंचा तो बउआ ने मुझसे आगरा में मकान लेने को कहा, कार्यस्थल पर एक साथी ने बताया कि हाउसिंग बोर्ड में कुछ मकान बिकाऊ हैं। मेरठ में रोजगार की बचत के रु ३०००/- जमा थे उनको आगरा मँगवाकर २७ मार्च १९७७ को ड्राफ्ट बनवाकर लखनऊ भेज दिया। उस समय वेतन रु २७५ /-मासिक था और मकान की मासिक किश्त रु २९०/- प्रतिमाह जमा करना था। ०३ अप्रैल १९७८ को जब मकान एलाट  हुआ  तब वेतन रु ५००/- हो चुका था अतः किश्त आसानी से देते रहे। सितंबर १९७८ में बाबूजी के रिटायरमेंट के बाद १२ नवंबर १९७८ को कमलानागर स्थित उस मकान में शिफ्ट हो गए तब से अपनी मृत्यु तक बाबूजी और बउआ वहीं मेरे साथ ही रहे। बीच में शायद पाँच माह के लिए फरीदाबाद भतीजी के जन्म  के समय  गए थे।

२५ मार्च १९८१ को शालिनी से शादी तय  होने के बाद  उनका भाई शरद मोहन ने आकार बउआ से वहाँ रहने की इच्छा जाहिर की उन्होंने आस - पास किराये पर दिलवाने को कहा लेकिन नहीं लिया क्योंकि बहन के आने से पहले ही घर में घुसना उद्देश्य था। फिर उसे शहर में जाब करते हुए भी कभी बहन से मिलने भी नहीं आया। उनकी मा का कहना था कि वह खुशखबरी लेकर आएगा। फिर२४ नवंबर १९८२ को  आया तो यह समाचार लेकर कि, बच्चे की डेथ हो गई है । 

१९८४ की अक्षय तृतीया पर जब यशवंत सवा  साल का था बउआ की इच्छा पर उसको लेकर वृंदावन , बाँके बिहारी जी के दर्शन हेतु गए वहाँ से आने के बाद मिथ्या आरोपों पर मुझे सस्पेंड कर दिया गया । १९६२  मेंभी जब  बउआ की इच्छा पर वृंदावन , बाँके बिहारी जी के दर्शन हेतु गए वहाँ से आने के बाद बाबूजी का ट्रांसफर नान  फेमिली स्टेशन सिलीगुड़ी हो गया था और हम सब भई- बहन की पढ़ाई गड़बड़ा गई थी। 

बाबूजी प्रति वर्ष कुछ रु बद्रीनाथ भेजते थे और डाक से वहाँ से प्रसाद प्राप्त करते थे। आजीवन कष्ट में उन दोनों का जीवन व्यतीत हुआ। जब मैंने ज्योतिष का ज्ञान अर्जित किया और  अध्ययन किया तो पाया कि, बाबूजी की जन्म -कुंडली में ब्रहस्पति  ' उच्च ' का था । जिनका ब्रहस्पति  ' उच्च ' का अथवा ' स्व - राशि ' का होता है उन लोगों को न तो मंदिर में दान देना चाहिए न मंदिर  के पुजारी को दक्षिणा देनी चाहिए अन्यथा उनको कष्ट ही होता है। इसी प्रकार सभी ग्रहों के अनुसार उनके उच्च  अथवा स्व- राशिस्थ होने पर उनके दान करने पर कूफल ही मिलता है। 

पुत्र के विवाह के बाद आज बाबूजी की पुण्यतिथि पहली बार थी यदि पुत्र और पुत्र- वधू तीर्थ -यात्रा पर न जाते तो जैसे हम छह विशेष आहुतियों के साथ पुण्यतिथि पर आत्मा की शांति हेतु हवन करते थे वे लोग कर सकते थे। पूनम की आँखों में ग्लूकोमा  और मोतियाबिंद होने के बाद से यह प्रक्रिया रुक गई थी जिसे बाबूजी के पौत्र और पौत्र- वधू कर सकते थे। किन्तु पुत्र अपने जिन सुसरालियों के साथ तीर्थाटन पर है वे आर्यसमाज पद्धति के विरोधी हैं। 

शालिनी के निधन के बाद बाबूजी ने आर्यसमाज पद्धति से ही ५ दिन बाद  हवन करवाया था। तब गोविंद बिहारी मौसाजी ने हमारे बाबूजी की खिली उड़ाई थी जबकि उनके श्वसुर साहब ने भी उनकी सास साहिबा के निधन पर ३ दिन बाद हवन करवाया था। खुद बाबूजी और फिर ब उआ के निधन के बाद भी हमने  आर्यसमाज पद्धति से ही हवन करवाए थे। आर्यसमाज कमला नगर - बलकेश्वर, आगरा में मैं सक्रिय सदस्य भी बन गया था। कार्यक्रमों में भाग भी लेता था। कई बार मुझको भी अपने विचार रखने का मौका दिया गया था। २००९ में आगरा से लखनऊ आ जाने पर यह सिलसिला टूट गया था। इस वर्ष १५ फरवरी २०२६ को आर्यसमाज सदर, लखनऊ में मंत्री महोदय ने शिव -रात्रि के अवसर पर मुझे बोलने का अवसर प्रदान किया था। 

मैं चाहता तो था कि,पुत्र और पुत्र - वधू हम लोगों के कार्य जो छूट  गया था अपने हाथ में ले लेते लेकिन मैंने उन लोगों की इच्छा में रोड़ा बनना उचित नहीं समझा। बाबूजी जैसा ब्रहस्पति पुत्र - वधू का होने के कारण उन लोगों को दान करने का निषेध जरूर कर दिया है। 

मैंने तो बाबूजी की इज्जत की खातिर आर्यसमाज को अपना लिया था लेकिन उनके पौत्र और पौत्र - वधू आगे इसे जारी रखेंगे इसमें घोर संदेह है। जून का माह शालिनी, बाबूजी और ब उआ के निधन का माह है , १६ और १३ तथा  २५ जून  उनकी पुण्यतिथियाँ है। 

पूनम  भी बाबूजी को अपने श्रद्धा - सुमन अर्पित कर रही हैं । 



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