गुरुवार, 25 जून 2026

ब उआ की ३२ वीं पुण्यतिथि पर स्मरण ------ विजय राजबली माथुर

 



(स्व.कृष्णा माथुर : जन्म- 20 अप्रैल 1924 मृत्यु - 25 जून 1995 )


ब उआ को यह संसार छोड़े ३१ वर्ष आज पूर्ण हो गए हैं ,वह जननी,  माँ  और माता थीं। मैंने भरसक कोशिश की कि, उनको और बाबूजी को हमारी वजह से कोई दिक्कत न हो। ब उआ की इच्छा थी कि, बाबूजी डालीगंज, लखनऊ में जमीन खरीदने के बाद भी मकान न बना सके थे तो मैं सरकारी स्कीम में बना - बनाया मकान ले लूँ। इत्तिफ़ाक से मेरठ की सवा तीन साल की नौकरी में बचत के तीन हजार रु वहीं जमा थे जिनको निकाल कर २७ मार्च १९७७ को ड्राफ्ट बनवा  कर लखनऊ भेज दिया था। कमला नगर, आगरा में मुझे मकान एलाट  हो गया और बाबूजी के रिटायरमेंट के बाद १२ नवंबर १९७८ से मृत्युपर्यंत ब उआ एवं बाबूजी उसी  मकान में हमारे साथ ही रहे । बीच में एक बार भतीजी के जन्म के समय और एक बार और मिलाकर कुल छह माह भाई के पास फरीदाबाद रहे।  

२५ मार्च १९८१ को शालिनी से एंगेजमेंट के बाद २४ मई १९८१ को टेंपोरेरी ट्रांसफर पर मैं तो कारगिल चला गया था । मेरे गैर - हाजिरी में शालिनी का भाई शरद मोहन माथुर बउआ के पास आया और वहाँ रहने की उत्कंठा व्यक्त की , ब उआ ने उसको किराये पर मकान दिल देने की बात कही। लेकिन उसकी तो गिद्ध -दृष्टि हमारे मकान पर थी वह बहन की शादी से पूर्व ही घर में घुसपैठ बनाना चाहता था। अतः शहर में ही ड्यूटी करते हुए भी कभी अपनी बहन से मिलने भी नहीं आया । उसकी माँ का कहना था शरद खुशखबरी लेकर ही आएगा। २४ नवंबर १९८२ को यह सूचना लेकर आया कि, बच्चे की डेथ हो गई। उसकी माँ की यह खुशखबरी थी। इस कारण उस परिवार से संपर्क अवरुद्ध हो गया था। १९८४ में जब ब उआ गंभीर बीमार हुईं तब शालिनी के माता-पिता उनको देखने आए और माफी मांग कर गए तो पुनः आवागमन शुरू हो सका जो १६ जून १९९४ तक : शालिनी के निधन तक ही चल सका। १३ जून १९९५ को बाबूजी और २५ जून १९९५ को ब उआ के निधन के बाद जब पूनम यशवंत की माँ की हैसियत में आईं जिस बाबत चर्चा बाबूजी ने ब उआ के सुझाव पर चलाई थी । पूनम शालिनी की माँ को अपनी स्थानीय माँ घोषित कर आईं लेकिन उन्होंने उलटे पूनम को ही उकसाया कि, किसी को किसी के बच्चे की जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए। शरद मोहन माथुर ने यशवंत को नाले में गिरवाने और अपहरण करवाने के प्रयास भी किए जिस कारण उन लोगों के खिलाफ एफ आई आर भी करवानी पड़ी थी। 

२००९ में आगरा का मकान बेच कर लखनऊ के जानकीपुरम में एक छोटे मकान में आ गए थे। उसे बेच कर और कुछ गाँव के खेत बेच कर बंथरा, लखनऊ में पूनम और यशवंत के लिए एक- एक मकान तथा यशवंत के लिए एक दुकान भी ले दी है। लेकिन शरद मोहन माथुर के रक्त - बीज हर जगह मौजूद हैं जिनकी गिद्ध -दृष्टि उनके मकानों पर गड़ी हुई है जिनका नेतृत्व गोकागु अर्थात घसियारा करता है। यशवंत विरोधी मकान का पहला गिद्ध शरद मोहन खुद और उसकी पत्नी भी टी बी से ग्रसित हो चुके हैं,उनके लिए यह परमात्मा और प्रकृति की ओर से प्रतीकात्मक दंड था। मैंने खुद और यशवंत तथा पूनम ने भी किसी का बुरा किया नहीं बल्कि यथा -संभव लोगों का भला ही किया है। अतः जो लोग भी उनके मकानों पर गिद्ध -दृष्टि डालेंगे निश्चय ही परमात्मा और प्रकृति की ओर से दंडित ही होंगे। ये मकान ब उआ की इच्छा और आशीर्वाद से हैं जिनको कोई भी गिद्ध हड़पना चाहेगा तो अपना ही नुकसान करेगा। 
ब उआ की आत्मा जहां भी हो हम उनके लिए शांति की प्रार्थना करते हैं। 


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मंगलवार, 16 जून 2026

३३ वीं पुण्यतिथि पर स्मरण ------ विजय राजबली माथुर

 



(शलिनी माथुर : 04 जनवरी 1959- 16 जून 1994 )

कुल साढ़े बारह वर्ष का ही साथ रहा और 25 मार्च 1981 को एंगेजमेंट के तुरंत बाद जब उन लोगों ने शालिनी के हाथ का अध्यन करने को कहा था और आयु रेखा 35 वर्ष पर ही समाप्त दीखी थी तब माथा तो ठनका था कि क्या महज़ 13 वर्ष का ही साथ होगा। उस वक्त कुछ किसी को बताया नहीं जा सका , बताना उचित भी नहीं था फिर दिमाग से बात ऐसे गायब हो गई जैसे गधे के सिर से सींग। फिर जब मथुरा में शालिनी के ममेरे भाई राम अवध नारायण माथुर साहब की पुत्री लवलीन ने उनका हाथ देख कर कहा था  कि " भुआ आपकी आयु तो 36 वर्ष ही है। " तो उनका जवाब था कि अब हम मरने वाले हैं। उनके बड़े भाई कुक्कू के दोस्त वीर बहादुर सिंह टामटा ने टूंडला से इटावा पहुँच कर हाथ देख कर पहले ही बता दिया था कि कुल आयु 36 तक है अतः उन सबको पहले से ही मालुम था। 16 जून 1994 को मृत्यु के समय 36 वां वर्ष ही चल रहा था। 

चूंकि अजय को शीघ्र ही वापिस फरीदाबाद लौटना था अतः बाबूजी ने परंपरागत तेरहवीं के चक्कर में न पड़ कर 'आर्यसमाज' के पुरोहित से पाँच दिन पर 'हवन' करवा लिया था। दकियानूस पोंगापंडितों के चक्कर में फंसे रिशतेदारों व अन्य लोगों ने इसकी आलोचना की कि तेरहवीं क्यों नहीं की। गोविंद बिहारी मौसाजी सबसे ज़्यादा बाबूजी के विरुद्ध मुखर थे। तब माँ ने बताया कि उन मौसाजी के श्वसुर अर्थात माँ के फूफाजी ने तो उनकी भुआ के निधन पर सिर्फ तीन दिन बाद ही हवन करवा लिया था। मैंने इस प्रश्न को उनके समक्ष रखा और पूछा कि वह अपने  साढ़ू अर्थात हमारे बाबूजी की तो निंदा कर रहे हैं अपने श्वसुर साहब के बारे में उनकी क्या राय है। तब से मुझको सद्दाम हुसैन कहने व प्रचारित करने लगे थे। 

बहरहाल शालिनी के बाद से जो आर्यसमाज से संपर्क हुआ वह अगले वर्ष जून 1995 में बाबूजी व माँ के निधन के बाद से और गहरा हो गया व बाद में कमलानगर-बल्केशवर  आर्यसमाज, आगरा की कार्यकारिणी में भी मैं शामिल रहा किन्तु आर्यसमाज के आर एस एस प्रभुत्व के लोगों के नियंत्रण के बाद संगठन छोड़ दिया। जबकि नीति और सिद्धांतों का अनुसरण अब भी करता हूँ। आर्यसमाज 'हिंदूवाद' के विरुद्ध है अतः मौलिक आर्यसमाजी सदैव आर एस एस जिसका गठन ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा के लिए हुआ था का विरोधी होता है  जबकि आर्यसमाज का गठन ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ने हेतु किया गया था।
बहरहाल हम लोग आर्यसमाज के निकट शालिनी के निधन के बाद आए थे , आर्यसमज,कमला नगर -बलकेश्वर,आगरा से शालिनी के पुत्र यशवंत उर्फ बाँके को पुरस्कृत  भी किया जा चुका है। शालिनी अक्सर कहा करती थीं कि, वह बाँके की शादी नहीं करेंगी , चाहे उनके भई कुक्कू के दोस्त के बताए अनुसार या उनकी एक भतीजी के बताए अनुसार। जब आगे जीवित ही नहीं रहीं तो पुत्र की शादी करतीं कैसे ?

बाँके के आग्रह पर ही बाबूजी ने पूनम के पिताजी को पोस्ट कार्ड भेज दिया था जिसके उत्तर में आए उनके एक पत्र का पुनः उत्तर भी भेज चुके थे परंतु १३ जून १९९५ की रात्रि  उनका निधन हो गया और १२ दिन बाद २५ जून १९९५ को ब उआ का भी निधन हो गया। 

वैसे बाबाजी और नानाजी की भांति ही मैं भी पुनर्विवाह नहीं करना चाहता था किन्तु बाबूजी और ब उआ के इरादे और चुनाव का सम्मान करते हुए पूनम से पुनर्विवाह कर लिया था। माता - पिता का निधन होने के कारण  मुझे खुद पत्रचार और बात- चीत करना पड़ा क्योंकि भाई- बहन दोनों मुझसे छोटे हैं। पूनम ने माता का फर्ज पूरी तरह निभाया । 

लेकिन जब यशवंत की इच्छानुसार विवाह की अनुमति हमने दे  दी तो उसके सुसरालियों ( पुत्र - वधू के माता - पिता दोनों ही पहले ही दिवंगत हो चुके थे ) ने सीधे ही यशवंत से संपर्क रखा हम लोगों से नहीं। हम लोग विवाह में अपने फर्ज के लिए शामिल थे अवांछित के रूप में। 

जब इस बार विवाह के बाद पहली बार शालिनी तथा बाबूजी की पुण्यतिथियों पर पुत्र और पुत्र - वधू विशेष छह वैदिक आहूतियों से हवन कर सकते थे ( जो पूनम को ग्लूकोमा एवं मोतियाबिंद  होने के बाद से रुक गया था ) लेकिन सुसरालियों के साथ वे लोग इन तारीखों में ही तीर्थाटन पर चले गए। 

पुत्र - पुत्रवधू अपने दायित्वों का निर्वहन करें या न करें जैसा उनका बुद्धि- विवेक कहे लेकिन हम तो उनके प्रति अपने दायित्व का निर्वहन करेंगे ही। शालिनी के हक के अनुसार मकान के दो  भाग में से एक भाग की वसीयत पुत्र के नाम रेजिस्टर करा दी है। उस  भाग में वे लोग निवास भी कर रहे हैं। 

शालिनी के एक भाई शरद मोहन ने आगरा में यशवंत को नाले में गिरवाने और अपहरण करवाने का भी प्रयास किया था इसलिए आगरा छोड़ कर लखनऊ आ गए थे। शरद मोहन की भाभी ने मुजफ्फर नगर में बताया था कि,शरद मोहन ने उनका सारा जेवर रेल यात्रा में गायब करा लिया था। अतः हम शालिनी को इस श्रद्धांजली के माध्यम से पुत्र और पुत्र- वधू को सचेत करना चाहते हैं कि वे यशवंत   के ननसालियों से पक्के तौर पर दूर रहें और इतना साहस सुसरालियों से कहने का रखें कि परिवार के प्रति भी उनको अपना फर्ज निभाने दें। 


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शनिवार, 13 जून 2026

बाबूजी की ३२ वीं पुण्यतिथि पर श्रद्धावत स्मरण ------ विजय राजबली माथुर

 


जन्म:24-10-1919,दरियाबाद (बाराबंकी );मृत्यु:13-06-1995;आगरा  

हमारे बाबूजी ताज राजबली माथुर साहब ने अपनी पूरी ज़िंदगी 'ईमान ' व 'स्वाभिमान ' के साथ आभावों में गुज़ार दी लेकिन कभी उफ तक न की न ही कोई उलाहना कभी किसी को दिया। आज जब लोग अपने हक हुकूक के लिए किसी भी हद तक गिर जाते हैं हमारे बाबूजी ने अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपने हक को भी ठुकरा दिया था। मैंने भी पूरी कोशिश करके 'ईमान ' व 'स्वाभिमान ' की भरसक रक्षा की है भले ही अपने ही भाई - बहन की निगाहों में मूर्ख सिद्ध हुआ हूँ। उत्तर प्रदेश के माथुर कायस्थ परिवारों में हमारे  बली  खानदान  से सभी परिचित हैं।

बाबूजी ने फूफा जी के साथ साथ डालीगंज ,लखनऊ में जमीन खरीदी थी लेकिन न तो फूफा जी और न ही बाबूजी मकान बनवा सके दोनों को अपनी - अपनी ज़मीनें बेचनी पड़ीं। बाबूजी ने पुश्तैनी खेती में भी हिस्सा नहीं लिया था। १९७५ में जब मैं मेरठ में बेरोजगार होकर आगरा पहुंचा तो बउआ ने मुझसे आगरा में मकान लेने को कहा, कार्यस्थल पर एक साथी ने बताया कि हाउसिंग बोर्ड में कुछ मकान बिकाऊ हैं। मेरठ में रोजगार की बचत के रु ३०००/- जमा थे उनको आगरा मँगवाकर २७ मार्च १९७७ को ड्राफ्ट बनवाकर लखनऊ भेज दिया। उस समय वेतन रु २७५ /-मासिक था और मकान की मासिक किश्त रु २९०/- प्रतिमाह जमा करना था। ०३ अप्रैल १९७८ को जब मकान एलाट  हुआ  तब वेतन रु ५००/- हो चुका था अतः किश्त आसानी से देते रहे। सितंबर १९७८ में बाबूजी के रिटायरमेंट के बाद १२ नवंबर १९७८ को कमलानागर स्थित उस मकान में शिफ्ट हो गए तब से अपनी मृत्यु तक बाबूजी और बउआ वहीं मेरे साथ ही रहे। बीच में शायद पाँच माह के लिए फरीदाबाद भतीजी के जन्म  के समय  गए थे।

२५ मार्च १९८१ को शालिनी से शादी तय  होने के बाद  उनका भाई शरद मोहन ने आकार बउआ से वहाँ रहने की इच्छा जाहिर की उन्होंने आस - पास किराये पर दिलवाने को कहा लेकिन नहीं लिया क्योंकि बहन के आने से पहले ही घर में घुसना उद्देश्य था। फिर उसे शहर में जाब करते हुए भी कभी बहन से मिलने भी नहीं आया। उनकी मा का कहना था कि वह खुशखबरी लेकर आएगा। फिर२४ नवंबर १९८२ को  आया तो यह समाचार लेकर कि, बच्चे की डेथ हो गई है । 

१९८४ की अक्षय तृतीया पर जब यशवंत सवा  साल का था बउआ की इच्छा पर उसको लेकर वृंदावन , बाँके बिहारी जी के दर्शन हेतु गए वहाँ से आने के बाद मिथ्या आरोपों पर मुझे सस्पेंड कर दिया गया । १९६२  मेंभी जब  बउआ की इच्छा पर वृंदावन , बाँके बिहारी जी के दर्शन हेतु गए वहाँ से आने के बाद बाबूजी का ट्रांसफर नान  फेमिली स्टेशन सिलीगुड़ी हो गया था और हम सब भई- बहन की पढ़ाई गड़बड़ा गई थी। 

बाबूजी प्रति वर्ष कुछ रु बद्रीनाथ भेजते थे और डाक से वहाँ से प्रसाद प्राप्त करते थे। आजीवन कष्ट में उन दोनों का जीवन व्यतीत हुआ। जब मैंने ज्योतिष का ज्ञान अर्जित किया और  अध्ययन किया तो पाया कि, बाबूजी की जन्म -कुंडली में ब्रहस्पति  ' उच्च ' का था । जिनका ब्रहस्पति  ' उच्च ' का अथवा ' स्व - राशि ' का होता है उन लोगों को न तो मंदिर में दान देना चाहिए न मंदिर  के पुजारी को दक्षिणा देनी चाहिए अन्यथा उनको कष्ट ही होता है। इसी प्रकार सभी ग्रहों के अनुसार उनके उच्च  अथवा स्व- राशिस्थ होने पर उनके दान करने पर कूफल ही मिलता है। 

पुत्र के विवाह के बाद आज बाबूजी की पुण्यतिथि पहली बार थी यदि पुत्र और पुत्र- वधू तीर्थ -यात्रा पर न जाते तो जैसे हम छह विशेष आहुतियों के साथ पुण्यतिथि पर आत्मा की शांति हेतु हवन करते थे वे लोग कर सकते थे। पूनम की आँखों में ग्लूकोमा  और मोतियाबिंद होने के बाद से यह प्रक्रिया रुक गई थी जिसे बाबूजी के पौत्र और पौत्र- वधू कर सकते थे। किन्तु पुत्र अपने जिन सुसरालियों के साथ तीर्थाटन पर है वे आर्यसमाज पद्धति के विरोधी हैं। 

शालिनी के निधन के बाद बाबूजी ने आर्यसमाज पद्धति से ही ५ दिन बाद  हवन करवाया था। तब गोविंद बिहारी मौसाजी ने हमारे बाबूजी की खिली उड़ाई थी जबकि उनके श्वसुर साहब ने भी उनकी सास साहिबा के निधन पर ३ दिन बाद हवन करवाया था। खुद बाबूजी और फिर ब उआ के निधन के बाद भी हमने  आर्यसमाज पद्धति से ही हवन करवाए थे। आर्यसमाज कमला नगर - बलकेश्वर, आगरा में मैं सक्रिय सदस्य भी बन गया था। कार्यक्रमों में भाग भी लेता था। कई बार मुझको भी अपने विचार रखने का मौका दिया गया था। २००९ में आगरा से लखनऊ आ जाने पर यह सिलसिला टूट गया था। इस वर्ष १५ फरवरी २०२६ को आर्यसमाज सदर, लखनऊ में मंत्री महोदय ने शिव -रात्रि के अवसर पर मुझे बोलने का अवसर प्रदान किया था। 

मैं चाहता तो था कि,पुत्र और पुत्र - वधू हम लोगों के कार्य जो छूट  गया था अपने हाथ में ले लेते लेकिन मैंने उन लोगों की इच्छा में रोड़ा बनना उचित नहीं समझा। बाबूजी जैसा ब्रहस्पति पुत्र - वधू का होने के कारण उन लोगों को दान करने का निषेध जरूर कर दिया है। 

मैंने तो बाबूजी की इज्जत की खातिर आर्यसमाज को अपना लिया था लेकिन उनके पौत्र और पौत्र - वधू आगे इसे जारी रखेंगे इसमें घोर संदेह है। जून का माह शालिनी, बाबूजी और ब उआ के निधन का माह है , १६ और १३ तथा  २५ जून  उनकी पुण्यतिथियाँ है। 

पूनम  भी बाबूजी को अपने श्रद्धा - सुमन अर्पित कर रही हैं । 



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