मंगलवार, 16 जून 2026

३३ वीं पुण्यतिथि पर स्मरण ------ विजय राजबली माथुर

 



(शलिनी माथुर : 04 जनवरी 1959- 16 जून 1994 )

कुल साढ़े बारह वर्ष का ही साथ रहा और 25 मार्च 1981 को एंगेजमेंट के तुरंत बाद जब उन लोगों ने शालिनी के हाथ का अध्यन करने को कहा था और आयु रेखा 35 वर्ष पर ही समाप्त दीखी थी तब माथा तो ठनका था कि क्या महज़ 13 वर्ष का ही साथ होगा। उस वक्त कुछ किसी को बताया नहीं जा सका , बताना उचित भी नहीं था फिर दिमाग से बात ऐसे गायब हो गई जैसे गधे के सिर से सींग। फिर जब मथुरा में शालिनी के ममेरे भाई राम अवध नारायण माथुर साहब की पुत्री लवलीन ने उनका हाथ देख कर कहा था  कि " भुआ आपकी आयु तो 36 वर्ष ही है। " तो उनका जवाब था कि अब हम मरने वाले हैं। उनके बड़े भाई कुक्कू के दोस्त वीर बहादुर सिंह टामटा ने टूंडला से इटावा पहुँच कर हाथ देख कर पहले ही बता दिया था कि कुल आयु 36 तक है अतः उन सबको पहले से ही मालुम था। 16 जून 1994 को मृत्यु के समय 36 वां वर्ष ही चल रहा था। 

चूंकि अजय को शीघ्र ही वापिस फरीदाबाद लौटना था अतः बाबूजी ने परंपरागत तेरहवीं के चक्कर में न पड़ कर 'आर्यसमाज' के पुरोहित से पाँच दिन पर 'हवन' करवा लिया था। दकियानूस पोंगापंडितों के चक्कर में फंसे रिशतेदारों व अन्य लोगों ने इसकी आलोचना की कि तेरहवीं क्यों नहीं की। गोविंद बिहारी मौसाजी सबसे ज़्यादा बाबूजी के विरुद्ध मुखर थे। तब माँ ने बताया कि उन मौसाजी के श्वसुर अर्थात माँ के फूफाजी ने तो उनकी भुआ के निधन पर सिर्फ तीन दिन बाद ही हवन करवा लिया था। मैंने इस प्रश्न को उनके समक्ष रखा और पूछा कि वह अपने  साढ़ू अर्थात हमारे बाबूजी की तो निंदा कर रहे हैं अपने श्वसुर साहब के बारे में उनकी क्या राय है। तब से मुझको सद्दाम हुसैन कहने व प्रचारित करने लगे थे। 

बहरहाल शालिनी के बाद से जो आर्यसमाज से संपर्क हुआ वह अगले वर्ष जून 1995 में बाबूजी व माँ के निधन के बाद से और गहरा हो गया व बाद में कमलानगर-बल्केशवर  आर्यसमाज, आगरा की कार्यकारिणी में भी मैं शामिल रहा किन्तु आर्यसमाज के आर एस एस प्रभुत्व के लोगों के नियंत्रण के बाद संगठन छोड़ दिया। जबकि नीति और सिद्धांतों का अनुसरण अब भी करता हूँ। आर्यसमाज 'हिंदूवाद' के विरुद्ध है अतः मौलिक आर्यसमाजी सदैव आर एस एस जिसका गठन ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा के लिए हुआ था का विरोधी होता है  जबकि आर्यसमाज का गठन ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ने हेतु किया गया था।
बहरहाल हम लोग आर्यसमाज के निकट शालिनी के निधन के बाद आए थे , आर्यसमज,कमला नगर -बलकेश्वर,आगरा से शालिनी के पुत्र यशवंत उर्फ बाँके को पुरस्कृत  भी किया जा चुका है। शालिनी अक्सर कहा करती थीं कि, वह बाँके की शादी नहीं करेंगी , चाहे उनके भई कुक्कू के दोस्त के बताए अनुसार या उनकी एक भतीजी के बताए अनुसार। जब आगे जीवित ही नहीं रहीं तो पुत्र की शादी करतीं कैसे ?

बाँके के आग्रह पर ही बाबूजी ने पूनम के पिताजी को पोस्ट कार्ड भेज दिया था जिसके उत्तर में आए उनके एक पत्र का पुनः उत्तर भी भेज चुके थे परंतु १३ जून १९९५ की रात्रि  उनका निधन हो गया और १२ दिन बाद २५ जून १९९५ को ब उआ का भी निधन हो गया। 

वैसे बाबाजी और नानाजी की भांति ही मैं भी पुनर्विवाह नहीं करना चाहता था किन्तु बाबूजी और ब उआ के इरादे और चुनाव का सम्मान करते हुए पूनम से पुनर्विवाह कर लिया था। माता - पिता का निधन होने के कारण  मुझे खुद पत्रचार और बात- चीत करना पड़ा क्योंकि भाई- बहन दोनों मुझसे छोटे हैं। पूनम ने माता का फर्ज पूरी तरह निभाया । 

लेकिन जब यशवंत की इच्छानुसार विवाह की अनुमति हमने दे  दी तो उसके सुसरालियों ( पुत्र - वधू के माता - पिता दोनों ही पहले ही दिवंगत हो चुके थे ) ने सीधे ही यशवंत से संपर्क रखा हम लोगों से नहीं। हम लोग विवाह में अपने फर्ज के लिए शामिल थे अवांछित के रूप में। 

जब इस बार विवाह के बाद पहली बार शालिनी तथा बाबूजी की पुण्यतिथियों पर पुत्र और पुत्र - वधू विशेष छह वैदिक आहूतियों से हवन कर सकते थे ( जो पूनम को ग्लूकोमा एवं मोतियाबिंद  होने के बाद से रुक गया था ) लेकिन सुसरालियों के साथ वे लोग इन तारीखों में ही तीर्थाटन पर चले गए। 

पुत्र - पुत्रवधू अपने दायित्वों का निर्वहन करें या न करें जैसा उनका बुद्धि- विवेक कहे लेकिन हम तो उनके प्रति अपने दायित्व का निर्वहन करेंगे ही। शालिनी के हक के अनुसार मकान के दो  भाग में से एक भाग की वसीयत पुत्र के नाम रेजिस्टर करा दी है। उस  भाग में वे लोग निवास भी कर रहे हैं। 

शालिनी के एक भाई शरद मोहन ने आगरा में यशवंत को नाले में गिरवाने और अपहरण करवाने का भी प्रयास किया था इसलिए आगरा छोड़ कर लखनऊ आ गए थे। शरद मोहन की भाभी ने मुजफ्फर नगर में बताया था कि,शरद मोहन ने उनका सारा जेवर रेल यात्रा में गायब करा लिया था। अतः हम शालिनी को इस श्रद्धांजली के माध्यम से पुत्र और पुत्र- वधू को सचेत करना चाहते हैं कि वे यशवंत   के ननसालियों से पक्के तौर पर दूर रहें और इतना साहस सुसरालियों से कहने का रखें कि परिवार के प्रति भी उनको अपना फर्ज निभाने दें। 


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