| (स्व.कृष्णा माथुर : जन्म- 20 अप्रैल 1924 मृत्यु - 25 जून 1995 ) |
ब उआ को यह संसार छोड़े ३१ वर्ष आज पूर्ण हो गए हैं ,वह जननी, माँ और माता थीं। मैंने भरसक कोशिश की कि, उनको और बाबूजी को हमारी वजह से कोई दिक्कत न हो। ब उआ की इच्छा थी कि, बाबूजी डालीगंज, लखनऊ में जमीन खरीदने के बाद भी मकान न बना सके थे तो मैं सरकारी स्कीम में बना - बनाया मकान ले लूँ। इत्तिफ़ाक से मेरठ की सवा तीन साल की नौकरी में बचत के तीन हजार रु वहीं जमा थे जिनको निकाल कर २७ मार्च १९७७ को ड्राफ्ट बनवा कर लखनऊ भेज दिया था। कमला नगर, आगरा में मुझे मकान एलाट हो गया और बाबूजी के रिटायरमेंट के बाद १२ नवंबर १९७८ से मृत्युपर्यंत ब उआ एवं बाबूजी उसी मकान में हमारे साथ ही रहे । बीच में एक बार भतीजी के जन्म के समय और एक बार और मिलाकर कुल छह माह भाई के पास फरीदाबाद रहे।
२५ मार्च १९८१ को शालिनी से एंगेजमेंट के बाद २४ मई १९८१ को टेंपोरेरी ट्रांसफर पर मैं तो कारगिल चला गया था । मेरे गैर - हाजिरी में शालिनी का भाई शरद मोहन माथुर बउआ के पास आया और वहाँ रहने की उत्कंठा व्यक्त की , ब उआ ने उसको किराये पर मकान दिल देने की बात कही। लेकिन उसकी तो गिद्ध -दृष्टि हमारे मकान पर थी वह बहन की शादी से पूर्व ही घर में घुसपैठ बनाना चाहता था। अतः शहर में ही ड्यूटी करते हुए भी कभी अपनी बहन से मिलने भी नहीं आया । उसकी माँ का कहना था शरद खुशखबरी लेकर ही आएगा। २४ नवंबर १९८२ को यह सूचना लेकर आया कि, बच्चे की डेथ हो गई। उसकी माँ की यह खुशखबरी थी। इस कारण उस परिवार से संपर्क अवरुद्ध हो गया था। १९८४ में जब ब उआ गंभीर बीमार हुईं तब शालिनी के माता-पिता उनको देखने आए और माफी मांग कर गए तो पुनः आवागमन शुरू हो सका जो १६ जून १९९४ तक : शालिनी के निधन तक ही चल सका। १३ जून १९९५ को बाबूजी और २५ जून १९९५ को ब उआ के निधन के बाद जब पूनम यशवंत की माँ की हैसियत में आईं जिस बाबत चर्चा बाबूजी ने ब उआ के सुझाव पर चलाई थी । पूनम शालिनी की माँ को अपनी स्थानीय माँ घोषित कर आईं लेकिन उन्होंने उलटे पूनम को ही उकसाया कि, किसी को किसी के बच्चे की जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए। शरद मोहन माथुर ने यशवंत को नाले में गिरवाने और अपहरण करवाने के प्रयास भी किए जिस कारण उन लोगों के खिलाफ एफ आई आर भी करवानी पड़ी थी।
२००९ में आगरा का मकान बेच कर लखनऊ के जानकीपुरम में एक छोटे मकान में आ गए थे। उसे बेच कर और कुछ गाँव के खेत बेच कर बंथरा, लखनऊ में पूनम और यशवंत के लिए एक- एक मकान तथा यशवंत के लिए एक दुकान भी ले दी है। लेकिन शरद मोहन माथुर के रक्त - बीज हर जगह मौजूद हैं जिनकी गिद्ध -दृष्टि उनके मकानों पर गड़ी हुई है जिनका नेतृत्व गोकागु अर्थात घसियारा करता है। यशवंत विरोधी मकान का पहला गिद्ध शरद मोहन खुद और उसकी पत्नी भी टी बी से ग्रसित हो चुके हैं,उनके लिए यह परमात्मा और प्रकृति की ओर से प्रतीकात्मक दंड था। मैंने खुद और यशवंत तथा पूनम ने भी किसी का बुरा किया नहीं बल्कि यथा -संभव लोगों का भला ही किया है। अतः जो लोग भी उनके मकानों पर गिद्ध -दृष्टि डालेंगे निश्चय ही परमात्मा और प्रकृति की ओर से दंडित ही होंगे। ये मकान ब उआ की इच्छा और आशीर्वाद से हैं जिनको कोई भी गिद्ध हड़पना चाहेगा तो अपना ही नुकसान करेगा।
ब उआ की आत्मा जहां भी हो हम उनके लिए शांति की प्रार्थना करते हैं।
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