गुरुवार, 25 जुलाई 2013

जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला सिद्धान्त ही चल रहा है ---विजय राजबली माथुर

सुप्रसिद्ध आलोचक/साहित्यकार वीरेंद्र यादव जी को किसी के द्वारा एस एम एस से धमकी दिये जाने पर धमकीदाता के विरुद्ध FIR कराने का सुझाव जिन राजनेता द्वारा दिया गया है और इसे 'जुर्म' की संज्ञा दी गई है उनके भी संग्यान में यह बात है कि पी टी सीतापुरिया किस प्रकार मुझे न केवल धमकाता रहता है वरन उसने हमारे सम्पूर्ण परिवार को त्रस्त कर रखा है। बड़े लोगों की बड़ी बातें मुझे सीतापुरिया के प्रति शक न रखने की सलाह उनके द्वारा दी गई है। ये दो प्रकार की भूमिकाएँ सिद्ध करती हैं कि आज भी बलशाली का ही प्रभुत्व है एवं न्याय व समानता की बातें केवल कागजी हैं और बेमानी हैं। 

कारपोरेट मेनेजमेंट एवं कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में निर्णय लेने के सूत्र एक ही हैं अपने सदृश्य का बचाव करना। 1984 और 2013 में कोई फर्क नहीं है मानसिकता वही है। 

जब मुझे कार्यकारी संपादक को सहयोग करने को कहा गया था तो पार्टी-हित में काम करने की बात कही गई थी जिसे ही मैंने स्वीकारा था। किन्तु 30 मई को पहले दिन ही कार्यकारी संपादक ने यह कह कर कि,उनके साथ अनेकों लोग आए और उखड़ गए देखना है कि मैं कब तक टिक पाता हूँ यह संकेत दे दिया था कि वह मुझे उखाड़ने का हर संभव प्रयास करेंगे जिसका ज़िक्र मैं पूर्व में ही कर चुका हूँhttp://vidrohiswar.blogspot.in/2013/07/blog-post.html
"एक पी टी सीतापुरिया हैं जो बड़े कम्युनिस्ट के रूप में स्थापित होने के बाद भी क्षुद्र ब्लागर्स के हितों के संरक्षणार्थ तांत्रिक प्रक्रियाओं का सहारा लेकर खुद को सहायता देने वाले को ही तहस-नहस कर देना चाहते हैं। यह खुद भी एक जन्मपत्री का वैवाहिक विश्लेषण मुझसे प्राप्त कर चुके हैं"

13 जूलाई 2013 को पी टी सीतापुरिया ने अपने निष्क्रिय मित्र के बचाव में मुझे उसका सहायक बनाने का प्रस्ताव रखा जिसे मैंने अस्वीकार कर दिया। अतः पी टी सीतापुरिया ने अपने तांत्रिक प्रयोगों से मेरे पुत्र को अस्वस्थ कर दिया। लगभग 18 वर्ष बाद किसी बाहरी चिकित्सक का हमें परामर्श लेने पर बाध्य होना पड़ा और अपार धन भी व्यय करना पड़ा। उसके बाद मुझे व पत्नी को भी बुखार का सामना करना पड़ा। क्योंकि पी टी सीतापुरिया नहीं चाहता था कि मैं कार्यालय तक पहुंचूँ अतः उसने हमें घर में अस्वस्थता की जकड़ में डाल दिया। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि उसकी जकड़ में वरिष्ठ नेतृत्व होने के कारण उसके विरुद्ध कोई भी बात सुने जाने की कहीं भी कोई भी संभावना नहीं है। अतएव मैं भी वीरेंद्र यादव जी की भांति ही उसका असली नाम,पद,पता उजागर कर देने पर बाध्य हौंउगा।   

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रविवार, 14 जुलाई 2013

एच के मेरठिया और पी टी सीतापुरिया में क्या अंतर है?

1972 में सारू स्मेल्टिंग,मेरठ में मुझे एकाउंट्स विभाग में जाब तो मिल गया था लेकिन न मेरे पास अनुभव था न ही मैं कामर्स पढ़ा था।  क्योंकि तब एकाउंट्स में हंस कुमार जैन साहब  क्लर्क और रिटायर्ड बैंक मैनेजर लेखराज प्रूथी साहब मैनेजर एकाउंट्स के पद पर कार्यरत थे और उन दोनों में बनती नहीं थी। जैनियों की फर्म होने के कारण क्लर्क साहब  मैनेजर साहब पर हावी थे। हंस कुमार जी खलल पड़ने से तिकड़म चलने लगे। वह मेरे द्वारा पेंसिल से किए गए लेजर के  टोटल्स में हेरा-फेरी करके मैनेजर साहब को कहते थे इनको टोटल लगाना ही नहीं आता है यह क्या काम करेंगे?मैनेजर साहब ने मुझे खाली बैठे रहने को कहा,मैंने उनसे पुरानी फाइलें अध्यन हेतु मांग लीं उन्होने पढ़ने को दे दीं;दो दिन बाद मैंने उनसे निवेदन किया कि कुछ वाउचर बनाने को मुझे भी दे दिया करें। उन्होने मुझसे वाउचर बनवाए और दो दिन सफलता पूर्वक मेरे किए काम को देख कर हंस कुमार जी बोले अब सारे वाउचर यही बनाएँगे और वह चेक करेंगे फिर उसके बाद ही मैनेजर साहब पास करें। प्रूथी  साहब ने स्वीकार कर लिया  और मुझ पर काम का काफी बोझ आ गया। हंस कुमार जैन ने चतुरतापूर्वक मेरे प्रति मृदु व्यवहार अपना लिया।

2013 में 23 मई को  एक सार्वजनिक पत्रिका के संपादक महोदय ने मुझे कार्यकारी संपादक को मदद करने को कहा जिसे मैंने संपादक महोदय के प्रति सम्मान एवं आदर भाव के कारण सहर्ष स्वीकार कर लिया। 30 मई को संपादक महोदय के टूर पर होने के कारण कार्यकारी संपादक अपने छात्र जीवन में दूसरे छात्र नेता को पीटने ,उनके पिता श्री द्वारा किसी को उठा कर फेंक देने के किस्से सुनाने लगे। उनका आशय मुझे धमकाना था कि वह मुझे भी फेंक देंगे। मैंने संपादक महोदय को उनके किस्से बता दिये थे।  पी टी सीतापुरिया साहब कंप्यूटर में सी डी अटका कर जाने लगे जिससे संचालन में दिक्कत आए इसकी भी प्रत्यक्ष जानकारी संपादक महोदय एवं उनके अन्य सहयोगी को दे दी थी। यहाँ तक तो उनका कृत्य एच के मेरठिया से मिलता-जुलता रहा किन्तु हंस कुमार जी द्वारा बाद में व्यवहार परिवर्तन की प्रक्रिया पी टी सीतापुरिया नहीं अपना सकते थे क्योंकि उनका उद्देश्य सिर्फ मुझे ही नहीं मेरे परिवारीजनों को भी परेशान करना था जिससे मैं कार्यालय तक पहुँच ही न सकूँ। ऐसा कई बार हुआ था लेकिन 12 जूलाई को फिर जब संपादक महोदय अपने साथी के साथ फिर टूर पर थे पी टी सीतापुरिया ने अपनी तांत्रिक प्रक्रिया से मेरे परिवार के बाकी सदस्यों को रुग्ण कर दिया जिससे मैं संपादक महोदय की अनुपस्थिति में कार्यालय न पहुँच सका। यह तो क्रमशः चल ही रहा था किन्तु इस बार पी टी सीतापुरिया ने खुद संपादक महोदय पर भी निशाना साध दिया। जीप के लखनऊ की सीमा में रहते ही अपनी तांत्रिक प्रक्रिया से पी टी सीतापुरिया ने सामने के विंड स्क्रीन में ब्लास्ट करा दिया जिसके काँच संपादक महोदय के शरीर के विभिन्न हिस्सों में प्रविष्ट कर गए। बिना सामने के शीशे की गाड़ी से वह गंतव्य तक पहुंचे क्योंकि उनको एक जनसभा की विशेष रिपोर्टिंग करनी थी।

पी टी सीतापुरिया के बहकावे में आकर एक राजनीतिक दल के प्रदेशाध्यक्ष महोदय भी मुझे सपरिवार परेशान करने के उपक्रम में शामिल रहे थे। उनको अब उनकी पार्टी ने पदच्युत कर दिया है,पी टी सीतापुरिया की बुरी सोहबत का परिणाम उनको मिल गया है। पी टी सीतापुरिया पूरी तरह आर के बाही के नक्शे कदम चल रहे हैं जिनकी कभी अपनी पार्टी में खूब तूती बोलती थी उन्होने ने भी अपने वरिष्ठ की बुद्धि तांत्रिक प्रक्रियाओं से जाम कर रखी थी। चंद्रास्वामी जैसे दिग्गज तांत्रिक जब धूल चाट सकते हैं तो आर के बाही की बिसात ही क्या थी। अंततः उनके उन वरिष्ठ नेता ने ही उनको पार्टी से निष्कासित करा दिया। आर के बाही की सारी की सारी तांत्रिक प्रक्रियाएँ धरी की धरी ही रह गईं। देखते हैं कि वक्त कब करवट लेता है और पी टी  सीतापुरिया को कब तक उसके कुकर्मों की सजा मिल पाती है?

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गुरुवार, 11 जुलाई 2013

गारबेज के खिलाड़ी-फंसा दिया कबाड़ी ---विजय राजबली माथुर

अक्सर लोग सरकारी विभागों व कर्मचारियों के भ्रष्टाचार की शिकायतें करते हुये मिलते हैं। लोगों की अवधारणा है कि निजी क्षेत्र जनता को अधिक राहत देता है। मैंने प्राईवेट लिमिटेड,पब्लिक लिमिटेड,प्रोपराईटरशिप/पार्टनरशिप सभी प्रकार की फर्मों में कार्य किया है वह भी लेखा-विभाग में। मेरा व्यक्तिगत अनुभव यह है कि सरकारी क्षेत्रों से अधिक भ्रष्टाचार इन निजी क्षेत्रों में है और इसमें ईमानदार कर्मचारियों के लिए गुंजाइश बिलकुल भी नहीं है। सरकारी क्षेत्र के कर्मचारियों को तो ट्रिब्यूनल आदि से न्याय मिल भी जाता है किन्तु निजी क्षेत्र के कर्मचारी को तो 'श्रम अदालतों/न्यायाधिकरणों से भी न्याय नहीं मिल पाता है। मैं खुद भुक्त भोगी हूँ।

सितंबर 197 से जनवरी 1985 तक मैं होटल मुगल,आगरा में कार्यरत रहा। मैं सुपरवाईजर एकाउंट्स के पद तक ही पहुँच पाया । संस्थान में 'इंटरनल आडिट' के दौरान पौने छह लाख का घोटाला मैंने पकड़ा था और उम्मीद कर रहा था कि मुझे तरक्की मिलेगी लेकिन घोटालेबाज पूर्व अधिकारियों पर पर्दा डालने हेतु तत्कालीन अधिकारियों ने मुझे छ्टनी के अंतर्गत हटा दिया। श्रम न्यायालय के पीठासीन अधिकारी ने भी 'Petitionar is no more interested' लिख कर संस्थान के पक्ष में निर्णय घोषित कर दिया।

लेकिन मैं इस संबंध में यहाँ अभी जानकारी न देकर उस तथ्य पर प्रकाश डालना चाहता हूँ जहां,जिस ओर आसानी से किसी का ध्यान भी न जा सकता है।

होटलों में तमाम झूठन बचती है जिसे गारबेज में फेंक दिया जाता है। इस गारबेज को रामचन्द्र नामक एक कबाड़ी कुछ भुगतान करके खरीद ले जाता था। कहा जाता था कि वह इस गारबेज को सूअर पालकों को बेच देता था। सूअर पालक सूअरों की चर्बी निकाल कर 'देशी घी विक्रेताओं' को बेच देते थे जो घी में वजन बढ़ाने के लिए उसका इस्तेमाल करते थे। इस प्रकार कौड़ियों के भाव खरीदा गारबेज  ऊंची कीमत पर बेच-बेच कर  कबाड़ी साहब मालदार बन गए थे और उन्होने और भी कबाड़ खरीदना शुरू कर दिया था।

इंजीनियरिंग व हाउस कीपिंग विभाग के कर्मचारी रद्दी सामान के बीच में छिपा कर कुछ अच्छा सामान भी कबाड़ में फेंक देते थे और फिर कबाड़ी से उसी भाव में लेकर जिसमें उन्होने खरीदा था बाज़ार में ऊंचे दामों पर बेच कर ऊपरी आमदनी से अपना स्टेंडर्ड ऊंचा रखते थे। ज़ाहिर सी बात है कि जिन कर्मचारियों पर सामान रद्द करने की ज़िम्मेदारी थी वे अपने-अपने अधिकारियों के प्रिय थे। सीधी सी बात है जब सामान की कमी होगी तो उसकी पुनः आपूर्ती भी होगी। क्रय(पर्चेज)विभाग में उस समय 8 प्रतिशत कमीशन लेने का प्रचलन था जैसा कि बाहर के लोगों से ज्ञात हुआ था। चूंकि मैं कमीशन नहीं लेता था अतः बीच में रोड़ा था इसी कारण मुझे फाइनेंस से हटा कर फिक्सड एसेट्स एवं इंटरनल आडिट का कार्य सौंपा गया था।

इंजीनियरिंग व हाउस कीपिंग विभागों के कर्मचारी तो दूसरे सामानों के साथ अच्छा सामान बाहर कबाड़ी के माध्यम से निकलवा लेते थे तो फिर किचन स्टीवर्डिंग विभाग के कर्मचारी जिन पर झूठे बर्तन साफ करने का दायित्व था क्यों पीछे रहते?चांदी (सिल्वर)के छोटे-छोटे आइटम जैसे चम्मच आदि बड़ी आसानी से गरबेज में फेंक कर बाहर कर दी जाती थीं। लेकिन कबाड़ी साहब ऐसे सामान को साफ करके निकाल कर ही गरबेज पिग फार्म्स तक ले जाते थे अतः वह इसकी अधिक कीमत उन कर्मचारियों से वसूलते थे परंतु फिर भी उनको लाभ ही मिल जाता था।

एक बार किसी ऐसे कर्मचारी का कबाड़ी साहब से लेन -देन पर विवाद हो गया होगा तब उसने अपने अधिकारी से शिकायत कर दी। नतीजतन तौल कर भुगतान करने के बाद जब गारबेज सिक्योरिटी गेट पर पहुंचा तो वहाँ उसे पलटवा कर चेकिंग की गई जिसमें चांदी की तमाम छोटी-छोटी चम्मचें,तथा दूसरे आइटम्स पकड़े गए। कबाड़ी साहब का कंटरेक्ट रद्द कर दिया गया। लेकिन संबन्धित कर्मचारियों की पहचान नहीं की गई और वे बच गए उनका दूसरे नए कबाड़ी से ताल-मेल हो गया होगा।

अभी हाल ही में बिजली की निजी क्षेत्र की कंपनी 'टोरंट' के भ्रष्टाचार के विरुद्ध लंबा आंदोलन चलाया है। लेकिन दो वर्ष पूर्व इन निजी क्षेत्रों/कारपोरेट घरानों/IAS आफ़ीसर्स की पत्नियों केNGO's ने सरकारी क्षेत्र के कर्मचारियों के भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन चलाया था लेकिन निजी क्षेत्रों के भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनता में आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं है क्योंकि वह क्रूर और हिंसक भी है। इस लिहाज से 'टोरंट'के विरुद्ध आवाज़ उठाने के लिए आगरा की जनता साधूवाद की पात्र है।

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बुधवार, 3 जुलाई 2013

निस्वार्थ,निशुल्क सेवा देना - है मुसीबतों को दावत देना!---विजय राजबली माथुर

एक समय की बात है कि मुसीबत के मारे की मदद करना एक परोपकार माना जाता था और मदद लेने वाला इसका एहसान मानता था। एहसान न भी माने तो कम से कम मदद करने वाले का नुकसान करने की तो बात भी नहीं सोच सकता था। लेकिन आज उदारीकृत अर्थव्यवस्था सामाजिक सरोकारों को नए तरीके से परिभाषित कर चुकी है। आज मदद करने वाले को बेवकूफ  समझा और कहा जाता है। 'नेकी कर और दरिया में बहा' सूत्र के अनुसार हमने किसी से किसी भी मदद के विनिमय में किसी  भी प्रकार की अपेक्षा कभी भी रखी ही नहीं। किन्तु आश्चर्य तो तब हुआ जब मदद लेने वालों ने हमारे ज्ञान और प्रोफेशन पर हमले-दर-हमले करने शुरू किए। 

सर्वप्रथम पटना के मूल निवासी और पूना प्रवासी ब्लागर ने हमसे चार जन्मपत्रियों का विश्लेषण निशुल्क प्राप्त किया फिर उसकी पटना प्रवासी और कानपुर की मूल निवासी शिष्या  ब्लागर ने भी चार जन्मपत्रियों का निशुल्क विश्लेषण प्राप्त किया।इसके अतिरिक्त  कानपुर के मूल निवासी और विदेश प्रवासी एक फेसबुकिए स्वयंभू मार्क्स वादी विद्वान ने भी निशुल्क जन्मपत्री विश्लेषण प्राप्त किया और क्रांति नगर मेरठ के एक सी पी एम/जलेस नेता ने दो जन्मपत्रियों का निशुल्क विश्लेषण प्राप्त किया। और इन सब लोगों ने क्या किया?

मेरठ के सी पी एम/जलेस नेता ने भ्रष्ट हज़ारे-आंदोलन का मेरे द्वारा समर्थन न करने पर मुझे अज्ञानी और अदूरदर्शी की उपाधि प्रदान की। 

विदेश प्रवासी स्वयंभू मार्क्स वादी विद्वान ने  'स्टालिन' व 'नेताजी सुभाष चंद्र बोस' की तारीफ करने पर  अनेकों फेसबुक नोट्स मेरे विरुद्ध लिखने के बाद फेसबुक ग्रुप 'लाल झण्डा' से मुझे ब्लाक किया । 

पटना प्रवासी ब्लागर ने अपने पति के कार्यालय में मेरे पुत्र को नौकरी का आफ़र दिया था जिसे ठुकराने पर मेरे विरुद्ध ब्लाग जगत में निराधार-अनर्गल लेखन किया। 

पूना प्रवासी भृष्ट-धृष्ट-निकृष्ट ब्लागर ने IBN7 के कारिंदा अपने रिश्तेदार ब्लागर से 'ज्योतिष एक मीठा जहर' लेख लिखवाया और साथ ही साथ मेरे विरुद्ध घृणित प्रचार अभियान चलाया। अपने संपर्कों के आधार पर हमारी पार्टी के दो नेताओं एवं सहयोगी वामपंथी पार्टी के एक नेता को मेरे विरुद्ध सक्रिय किया। इनमें से एक पी टी सीतापुरिया तो मेरे विरुद्ध तांत्रिक प्रक्रियाओं का भी सहारा ले रहे हैं जो कि वस्तुतः पूर्व में आर के नामक सो काल्ड कम्युनिस्ट नेता के कदमों का ही अनुसरण कर रहे हैं। 

पी टी एस के मुझसे खफा होने का कारण मात्र इतना सा है कि उनके बड़े नेता जी  ने मुझे उनकी सहायता करने को कहा है जिसे मैंने सहर्ष निस्वार्थ भाव से स्वीकार कर लिया है। पहले उन्होने इर-रिलीवेंट कहानियाँ सुना -सुना कर मुझे भयभीत करने का प्रयास किया जिसमें असफल रहने पर  फिर तांत्रिक  प्रक्रियाओं के सहारे से मुझे ही नहीं परिवारी जनों को भी त्रस्त करने लगे। एक रोज़ मार्ग में साईकिल में पीछे से 'उ.प्र.सचिवालय' की तख्ती लगाए कार ने  टक्कर मारी तो अगले दिन एक स्कूटर ने सामने से हैंडिल में टक्कर मारी।फिर उन्होने सार्वजनिक ब्लाग में लेखन अधिकार देने के साथ-साथ एडमिन राईट्स भी दे दिये जिसके आधार पर उनके सामने मुझे अपनी आई डी से ब्लाग पोस्ट निकालने को कहा। स्व्भाविक रूप से उन्होने आई डी पासवर्ड हासिल किया होगा जिसे मैंने घर पहुँचने से पूर्व ही पुत्र के माध्यम से बदलवा लिया और वह अपने मिशन में असफल रह गए। लेकिन अब मैंने सार्वजनिक लेखन हेतु एक नई आई डी ही बना ली अतः पुनः अपने सामने उनके द्वारा पोस्ट डलवाने पर मुझे कोई दिक्कत नहीं रही किन्तु उन्होने इसके पासवर्ड से खिलवाड़ करने का प्रयास किया जिससे यह आभास हुआ कि वह मूलतः मेरी निजी आई डी का पासवर्ड हस्तगत करके मेरे ब्लाग में पूना प्रवासी ब्लागर और उसके समर्थकों के संबंध में लिखे विषय में हेरा-फेरी करके उन लोगों को साफ-साफ बचाना चाहते थे। डायचेवेले के पूर्व कारिंदे समेत कुछ लोगों की मदद से फेसबुक पर भी मेरे विरुद्ध उन्होने अभियान चलवा रखा है।  उनकी हरकतों के मद्दे नज़र मैंने घर से बाहर चाय पीना बंद कर दिया था फिर भी गत बुधवार -26 जून 2013 को उन्होने चाय पीने को मजबूर किया जिसके बाद से वहाँ अभी तक नहीं पहुँच पाया हूँ और यही तो वह चाहते भी थे।

सो काल्ड कम्युनिस्ट आर के : 

आर के साहब एक प्राइमरी शिक्षक यूनियन के नेता की हैसियत से कम्युनिस्ट पार्टी में कार्यरत थे। एक ज़िले के पार्टी जिलमंत्री के निजी कारखाने पर उनकी निगाह गड़ गई थी और इसके लिए उन्होने अपने बेटे को मोहरा बना कर उनकी एक लड़की से विवाह करने का प्रस्ताव रखा। वह जिलामंत्री महोदय कई पार्टी कामरेड्स की निजी तौर पर भारी सहायता कर चुके थे। सभी कामरेड्स उन जिलामंत्री महोदय को आर के से दूर हटा कर उनके परिवार को बचाना चाहते थे। लेकिन आर के ने तांत्रिक प्रक्रियाओं के जरिये उनके बड़े बेटे को रुग्ण एवं उनके मस्तिष्क को जाम कर दिया था। उनकी शाखा के मंत्री कामरेड जो उनके छोटे भाई के रूप में विख्यात थे खिन्न होकर पार्टी छोड़ गए और जाते-जाते मुझसे घर पर कह गए थे कि जैसे भी हो जिलामंत्री महोदय के परिवार को बचाने के लिए कोई उपाय ज़रूर करना। उनके व्यापार में कुछ समय पार्टनर रहे एक एवं दूसरे व्यवसाय के साथी दूसरे कामरेड ने भी मुझसे कहा कि पार्टी टूटेगी तो फिरसे खड़ी हो जाएगी लेकिन उनका परिवार एक बार टूट गया तो बुरी तरह से बिखर जाएगा। कुछ न कुछ उपाय करके उनके परिवार को बचाना है। आर के मय जिलमंत्री महोदय को समझाने के बावजूद उनके टस से मस  न होने के कारण पार्टी मे उनके विरोध का निश्चय किया गया। 1992 के ज़िला सम्मेलन में जो राज्य सम्मेलन के बाद हुआ था आर के के समर्थन के कारण जिलमंत्री महोदय को पुनः निर्वाचित न होने देने का पूरा बंदोबस्त कर लिया गया था लेकिन कोई भी उनके मुक़ाबले में उतरने का साहस नहीं जुटा पा रहा था। आदतन उन्होने कहा कि इस बार दूसरा जिलमंत्री चुन लिया जाये और उनको मुक्त कर दिया जाये। हर बार सब लोग पुनः उनको सर्व-सम्मति से निर्वाचित कर देते थे। इस बार उनके फ़ार्मेलिटी के लिए कहे गए शब्दों को स्वीकार करके उनके ही विश्वस्त और निकटस्थ कामरेड का नाम उनके विकल्प में ले दिया गया जिसका विरोध भी वह न कर सके। प्रस्तावक को उन्होने नए जिलामंत्री का  सहायक सचिव बनाने का प्रस्ताव कर दिया उसे  भी सर्व-सम्मति से स्वीकार कर लिया गया।

सम्मेलन स्थल के लिए रवाना होने से  एक दिन पूर्व उन जिलामंत्री महोदय ने मुझे अपने घर बुलवाया था और मुझसे आर के का विरोध न करने को कहा था। मैंने उनको साफ कह दिया था कि आप लोग दीवार तक देख रहे हैं लेकिन मैं तो दीवार के उस पार भी देखता हूँ और मुझे दीख रहा है कि आर के आपका सबसे बड़ा शत्रु है अतः आर के का विरोध करना परमावश्यक है जिससे आपकी भावी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। वह ठठा कर हंस दिये थे और बोले थे कल सम्मेलन में आपकी हार होने जा रही है। मैंने कहा निश्चय ही मुझे अपने हारने की बेहद खुशी होगी। बोले वह क्यों?मैंने साफ कहा आपकी एक प्रतिष्ठा है जो आपके हारने से धूमिल होगी लेकिन मुझे जानता ही कौन है ?जो हारने पर मुझे अपमानित होना पड़े। वह बोले 'तो आप हमारे खैरख्वाह हैं' मैंने स्पष्ट कहा कि निश्चय ही। 

सम्मेलन के बाद उन्होने खीझ उतारने के लिए मुझे निकालने का असंवैधानिक प्रयास किया था जिस कारण मैं बाद में निष्क्रिय हो गया था। 9 वर्ष पदारूढ़ रह कर 9 वर्ष उनको अपदस्थ रहना पड़ा था लेकिन आर के का पर्दाफाश हो चुका था अतः उन्होने खुद ही आर के को पार्टी से निकलवा दिया। पुनः पदारूढ़ होने पर वह मेरे घर आकर मुझे कार्यक्रमों में शामिल करने लगे और जिन नेता जी ने मुझे पी टी सीतापुरिया की सहायता  करने के लिए कहा है उनकी ही उपस्थिती में पुनः पार्टी में शामिल कर लिया था। 

एक आर के थे जो निहित स्वार्थ के कारण कम्युनिस्ट बन कर तांत्रिक प्रक्रियाओं से अपना कद बढ़ाना चाहते थे। एक पी टी सीतापुरिया हैं जो बड़े कम्युनिस्ट के रूप में स्थापित होने के बाद भी क्षुद्र ब्लागर्स के हितों के संरक्षणार्थ तांत्रिक प्रक्रियाओं का सहारा लेकर खुद को सहायता देने वाले को ही तहस-नहस कर देना चाहते हैं। यह खुद भी एक जन्मपत्री का वैवाहिक विश्लेषण मुझसे प्राप्त कर चुके हैं। लेकिन जैसा कि प्रारम्भ में लिखा है 'उदारीकृत अर्थ व्यवस्था वाले समाज' में निस्वार्थ,निशुल्क सेवा प्रदाता को बेवकूफ समझा जाता है। पी टी सीतापुरिया आदि-आदि मुझे बेवकूफ समझते व कहते हैं। मैं भी खुद को बेवकूफ ही समझता हूँ वरना क्यों कर  मुसीबतों को दावत देता!


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मंगलवार, 25 जून 2013

माँ की सीख मेरा संबल व पूंजी हैं ---विजय राजबली माथुर

25 जून- माँ की 19वीं पुण्य तिथि पर विशेष : 
तो फिर वे क्यों ऐसा करते हैं?(भाग-3)-

गत अंकों में खुद को 'खुदा'समझने वाले अहंकारी लोगों की इस ज़िद्द का वर्णन किया है कि वे बिना किसी लाभ की प्राप्ति के सिर्फ मुझको परेशान रखने में ही आनंदित होते रहते हैं। उसी कड़ी में आज फिर माँ की पुण्य तिथि के अवसर पर कुछ और वारदातों का ज़िक्र करना अब उचित प्रतीत हो रहा है।

14 जून 1995 को बाबूजी को अंतिम संस्कार हेतु घाट ले जाने के बाद से माँ जो अचेत हुईं तो 25 जून की रात्रि पौने आठ बजे कंपाउंडर के सामने ही मृत्यु को प्राप्त हुईं। कंपाउंडर साहब तो रोजाना की तरह ग्लूकोज,दवा आदि देखने आए थे फिर उन्होने उस दिन का अपना शुल्क भी नहीं लिया और शरीर में लगी नलियाँ आदि निकाल गए। मैं और यशवन्त ही घर पर थे। अजय तो 23 जून को मेरे बहुत मना करने के बावजूद फरीदाबाद चले गए थे । जिस प्रकार 13 जून की रात्रि दो बजे बाबूजी को धरती पर लेटाने में मुझे  पड़ौसी सतीश शर्मा जी के पुत्र शलभ  ने मदद की थी उसी प्रकार 25 जून की रात्रि  नौ बजे भी उसी शलभ ने मेरी मदद इस बार भी की। यशवन्त तो साढ़े बारह वर्ष का ही तब था लेकिन शलभ भी 21-22 वर्ष का ही रहा होगा। सतीश जी ने शायद कुछ पूर्वाभास के आधार पर अपने पुत्र को रिहर्सल हेतु हमारी मदद को भेजा होगा क्योंकि अक्तूबर 1996 में वह भी दिवंगत हो गए थे।


शलभ शर्मा और सतीश जी ने ही बाबूजी के समय की तरह ही इस बार भी बर्फ घर पर पहुंचवाई । शलभ ने ही रात्रि में डॉ शोभा व अजय को 'टेलीग्राम' मेरी तरफ से भेज दिये,अर्जुन नगर अशोक-नवीन को फोन द्वारा सूचना भी दे दी। खर्च का भुगतान भी मैंने बाद में ही किया था उस वक्त उन्होने ही कर दिया था और तुरंत लेने से इंकार कर दिया था। अगले दिन 26 जून को भयंकर गर्मी थी जबकि 25 की रात्रि बारिश भी हो गई थी। झांसी से शोभा और फरीदाबाद से अजय नहीं पहुँच पाये थे । किसी ने संभवतः सतीश शर्मा जी को नशे में लाकर भड़का दिया था( उनका पुत्र और पत्नी जो रात्रि मथुरा जाते-जाते रुक गए थे सुबह ही मथुरा चले जा चुके थे) वह दबाव बना रहे थे कि गर्मी बढ़ रही है अतः भाई -बहन का इंतज़ार किए बगैर माँ को घाट ले चलो। उनकी यह बात स्वीकार नहीं की जा सकती थी चाहे जितने भी उनके एहसान थे।इसलिए भड़क कर उन्होने पास-पड़ौस के लोगों को घाट पर  साथ जाने की मनाही कर दी। स्थिति का आंकलन करते हुये  मैंने समझा कर यशवन्त को माँ के पार्थिव शरीर के पास अकेला छोड़ा और  मोपेड से  जाकर कामरेड एस कुमार को सूचित कर दिया था अतः वह कामरेड अनंत राम  को लेकर आ गए थे। शोभा के आने के बाद फिर सतीश शर्मा जी दबाव बनाने लगे कि अब बहन आ गई ,बेटी को तो माँ की चिंता होती है  बेटे को कोई परवाह नहीं वह माँ को छोड़ कर चला गया था अब भाई का इंतज़ार न करो और जल्दी घाट ले जाओ। पुनः उनके दबाव को रद्द कर दिया था।

अजय के आने बाद जब घाट ले जाने लगे तो यशवन्त जो 17 जून 1994 को शालिनी,14 जून 1995 को बाबूजी को घाट ले जाते समय साथ रहा था इस बार भी चल रहा था। अतः अजय की 6 वर्षीय पुत्री भी अड़ गई कि वह भी भैया के साथ अम्मा को घाट पहुँचाने चलेगी। बच्ची की ज़िद्द को देखते हुये अजय ने साथ ले लिया। घाट पर जब टाल से लकड़ी ले जाने में ये छोटे बच्चे भी मदद कर रहे थे तो इसे देख कर  दूसरे लोग जो  अपने परिजन का अंतिम संस्कार करके लौट रहे थे उनके एक  बुजुर्ग ने हम लोगों की सहायता करने को कहा और इस प्रकार घाट पर माँ के अंतिम संस्कार के समय काफी भीड़ हो गई भले ही शर्मा जी ने पड़ौस के लोगों को रोक लिया था । http://vidrohiswar.blogspot.in/2012/04/1994-95-11.html

गोविंद बिहारी मौसाजी जिनको अलीगढ़ के रिश्ते में कमलेश बाबू चाचा मानते रहे ने बाबू जी के वक्त रानी मौसी को माँ के पास नहीं आने दिया था और उनको कह दिया था कि विजय के घर जाओगी तो टांग तोड़ दी जाएगी। हालांकि उनका पुत्र असित सीधे घाट पर पहुँच गया था। इस बार उन लोगों ने पूरा बहिष्कार किया था। लेकिन अज्ञात लोगों ने घाट पर जो सहायता की वह अविस्मरणीय है।

माँ के बाद यशवन्त और मैं घर पर अकेले रह गए थे अतः ड्यूटी जाने पर मैं उसे भी अपने साथ ले जाता था। सुबह 7-15 पर वह स्कूल जाता 12-30  बजे घर आता ड्रेस बदल कर खाना खा कर मेरे साथ  एक बजे बाज़ार चलता लौट कर रात्रि 7-30 पर आने के बाद जब रोटी सेंकते तो 8 बजते-बजते वह ऊँघते हुये खाना खाता। नवंबर में पूनम के आने तक यही सिलसिला चलता रहा।

आज जब डॉ शोभा/कमलेश बाबू और कमलेश बाबू के सखा व भतीज दामाद कुक्कू और उसका भाई शरद मोहन माथुर,पार्सल बाबू मिल कर यशवन्त का भविष्य तबाह करने के मिशन में लगे हुये हैं तब सोचता हूँ कि क्या यशवन्त उतना ही मूर्ख है जितना वे सोचते हैं? यशवन्त को गुमराह करने हेतु  वीणा श्रीवास्तव/रश्मि प्रभा/सोनिया बहुखंडी गौड़ सरीखे खुदगर्ज  लुटेरे ब्लागर्स की भी मदद ली गई थी। इन लोगों की मार्फत हमारी पार्टी के भी कुछ राजनेताओं तथा सहयोगी एक पार्टी के एक राजनेता को भी हमारे विरुद्ध लामबंद किया गया है। जिस प्रकार जय शंकर लाल और उनके बेटे कुक्कू  व शरद मोहन माथुर  अपने-अपने विभागों को लूटते रहे उसे व अन्य लोगों को देखते हुये लखनऊ यूनिवर्सिटी के एक गार्ड यादव जी का कथन याद आता है जो बिलकुल खरा सच ही है कि-'सीतापुर' के लोग 'ठग' व 'चोर' होते हैं उनसे हमेशा सावधान रहिएगा। अतीत में डॉ शोभा ने माँ को बताया था कि जय शंकर लाल माथुर 2 बोरा छोटी इलाईची गायब/चोरी  होने के मामले में फंसे थे तब कमलेश बाबू के पिताजी -सरदार बिहारी माथुर,क्लेंम्स इंस्पेक्टर-रेलवे ने उनको बचाया था। इसके बाद टूंडला जंक्शन पर जय शंकर लाल को 'बुकिंग' व 'पार्सल' का हेड एवं सरदारी बिहारी साहब को 'विजिलेन्स आफ़ीसर',अलीगढ़  के रूप में प्रमोशन मिल गया था। सीतापुरी आदत सभी सीतापुरियों में समान होती होगी तभी  तो कोई सीतापुरिया कुछ न मिलने पर आई डी-पासवर्ड ही चुरा लेता है जिसके सहारे उपयुर्क्त ब्लागर्स से संबन्धित पोस्ट्स व टिप्पणियों में हेरा-फेरी करके उनको निर्दोष सिद्ध किया जा सके। 

मेरी माँ अक्सर कहावतें दोहराया  करती थीं-"साँच को आंच नहीं" तथा "एक चुप सौ को हरावे" इन पर अब तक विश्वास करते हुये मैं तमाम झंझावातों पर पार पा चुका हूँ। माँ को नाना जी ने 4थे क्लास के बाद स्कूल नहीं भेजा था किन्तु उनका ज्ञान आज के एम.ए.,पी.एच डी से अधिक ही था उनके आंकलन हमेशा सही निकलते थे। हो सकता है आनुवंशिक तौर पर उनके ये गुण कुछ हद तक मुझे भी मिले हों तभी मेरे भी पूर्वानुमान अक्सर सही ही निकलते हैं। यशवन्त के बड़े भाई के जीवित न रहने का भान होने पर मैंने माँ को बता दिया था और वह सही निकला जब 24 नवंबर 1982 को प्रातः 4 बजे जन्म लेकर उसी दिन साँय 4 बजे वह दिवंगत भी हो गया था। जब अलीगढ़ के ज्योतिषी और बाल रोग विशेज्ञ डॉ शोभा की बड़ी बेटी के लिए  जन्म से आठ माह खतरनाक   बता रहे थे तब मैंने माँ को आश्वस्त कर दिया था कि वह निश्चय ही जीवित रहेगी। 30अप्रैल 2011 को यह भांजी/भांजा दामाद अपनी बिटिया के साथ यहाँ लखनऊ भी आए थे।

 " अभी कुछ दिन पहले यह भांजी ,उसकी बेटी और भांजा दामाद कुछ घंटों के लिए हमारे घर भी लखनऊ आने पर आये थे."-http://vidrohiswar.blogspot.in/2011/06/blog-post.html

माँ का आशीर्वाद मेरे साथ है इस बात को उनकी ही पुत्री डॉ शोभा  क्यों नहीं समझ पा  रही है? अन्यथा पूना निवासी  अपनी छोटी पुत्री के सहयोग से 'पूना प्रवासी' ब्लागर को हमारे विरुद्ध  खड़ा नहीं करवातीं जिसने ब्लाग जगत में हमारे विरुद्ध लामबंदी कर रखी है और यशवन्त को हर-संभव नुकसान पहुंचाने को प्रयासरत है।  सीतापुरिए कुक्कू/शरद व अन्य राजनेता को हमारे विरुद्ध नहीं लगाया जाता।जिनकी बुद्धि पैर के तलवों में बसती है मैं उनसे किसी बुद्धिमानी की अपेक्षा बिलकुल भी नहीं करता हूँ। निजी आत्म-विश्वास व माँ की सीख मेरा संबल व पूंजी  हैं।  


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सोमवार, 17 जून 2013

तो फिर वे क्यों ऐसा करते हैं?(भाग-2) ---विजय राजबली माथुर

आज ही के दिन उन्नीस वर्ष पूर्व जब मैं शालिनी के देहावसान की सूचना देने अर्जुन नगर रानी मौसी के घर गया था तब यशवन्त साथ नहीं गया था क्योंकि उस वक्त बाबूजी व माँ घर पर थे। रानी मौसी ने नवीन को भी बताने को कहा था और उसी के साथ वह आईं थीं। शोभा व अजय को टेलीग्राम करने जाते वक्त भी यशवन्त घर पर ही रहा था,एक दिन पूर्व जब 16 जून की साँय राजा-की-मंडी स्टेशन पर पार्सल बाबू शरद मोहन के घर सूचना देने जाते समय ज़रूर वह साथ गया था।(http://vidrohiswar.blogspot.in/2012/03/1994-95-5.html) रात्रि में पार्सल बाबू की माँ व पत्नी आए थे और उनके जाने के बाद पार्सल बाबू भी आए थे। 17 ता.की सुबह भी उनकी माँ व पत्नी एक साथ आए थे और उनके भिलाई वाले ताऊजी अलग से जबकि खुद पार्सल बाबू (कमलेश बाबू के सखा व भतीज दामाद  कुक्कू के छोटे भाई) अपने रेलवे के सहकर्मी आठ-नौ लोगों के साथ। टेलीफोन विभाग के आर सी माथुर (जिनके एक भाई झांसी में कार्यरत थे और एक बहन अलीगढ़ में कमलेश बाबू के घर के निकट रह रहीं थीं और उनकी माता जी से घनिष्ठ मेल था जिन्होने बाद में आर सी माथुर की बेटी की शादी अपने एक भांजे से करवाई थी-http://vidrohiswar.blogspot.in/2012/04/1994-95-8.html) घाट पर डॉ रामनाथ के साथ उनके स्कूटर से गए थे। घाट पर आर सी माथुर ने डॉ रामनाथ को कुछ पाठ पढ़ाया होगा जिस कारण उन्होने मुझसे कहा था कि यदि कोई समस्या हो तो हमसे मदद ज़रूर लेना। तत्काल मैं समझ गया था कि घाट पर कोई षड्यंत्र रचा गया है। अतः उसी क्षण से डॉ रामनाथ से दूरी बना ली और खुद ही 'ज्योतिष' का ज्ञान बढ़ाना शुरू कर दिया (http://krantiswar.blogspot.in/2012/06/blog-post_16.html)

जब डॉ रामनाथ ने पार्सल बाबू की पत्नी से मंत्रणा  के बाद 1993 में  कहा था उन्होने शालिनी को TB होने का शक ज़ाहिर किया है और पार्सल बाबू की पत्नी ने कहा था कि डॉ रामनाथ ने TB का शक ज़ाहिर किया है तभी से उन लोगों के बीच खिचड़ी पकने का एहसास मुझे पहले से था। इसी लिए मैंने TB स्पेशलिस्ट कामरेड डॉ विनय आहूजा को दिखाया था जिन्होने सम्पूर्ण टेस्ट व जांच के बाद TB का कोई भी लक्षण न होना बताया था। (http://vidrohiswar.blogspot.in/2012/03/1992-93-10.html)

बाद की घटनाओं से सिद्ध हुआ था कि कमलेश बाबू के इशारे पर कुक्कू ने डॉ रामनाथ को 1981 में ही खरीद लिया था और डॉ रामनाथ मेरे लिए आस्तीन का साँप बन गए थे जिन्होने 14 गुण पर शालिनी से शादी की राय 28 गुण मिलना बता कर दे दी थी। (http://vidrohiswar.blogspot.in/2012/04/1994-95-6.html)

इस षड्यंत्र के तहत यह प्रचारित किया गया कि शालिनी की मृत्यु अस्वाभाविक थी और मुझे जेल पहुंचाने का भी बंदोबस्त किया जाने लगा (बाद में  रेकसन शूज के पार्टनर सेठ नारायण दास जी ने बताया था कि उनके बड़े भाई से दूसरा अकाउंटेंट खोजने को कहा गया था क्योंकि सूचनादाता पूर्ण आश्वस्त था कि मुझे जेल में पहुंचा ही दिया जाएगा)उधर डॉ शोभा ने माँ से यशवन्त को हस्तगत करने का भी असफल प्रयास किया था । इन घटनाओं से अब विश्लेषण करने पर भान होता है कि डॉ शोभा/कमलेश बाबू ऊपर-ऊपर मिलकर चलते हुये मेरे व यशवन्त के लिए भीतर-भीतर खाई खोद रहे थे। सन 2000 ई.में जयपुर में अपनी बड़ी पुत्री की श्वसराल जयपुर से लौटते में आगरा ठहरने पर डॉ शोभा ने पूनम से कहा था कि दादा को पार्सल बाबू के घर वालों से मिल कर चलना चाहिए था। कभी मेरे राजनीति में भाग लेने पर कभी किस से मेल रखें या किस से न रखें को मुद्दा बना कर डॉ शोभा पूनम को गुमराह करने का प्रयास करती रही हैं। गलती हमारी ही रही जो हम उनको बहन-बहनोई मान कर चलते रहे। 

बहरहाल जब जून 1995 में माता-पिता की भी मृत्यु हो गई और मैं व यशवन्त अकेले रह गए तब इस घृणित प्रचार अभियान को तेज़ धार दी गई। अतः मुझे पत्रों (जिनकी प्रतियाँ उनके रिशतेदारों को भी भेजी थीं)के माध्यम से  पार्सल  बाबू की माँ से स्पष्ट पूछना पड़ा कि जैसा कि वह अफवाह उड़ा रही हैं कि किसी प्रेम के चलते रास्ता साफ किया गया है तो वह उस प्रेमिका का भी नाम बताएं कि वह किसकी बेटी अथवा किसकी पत्नी है । प्रेम काठ,लोहा,सीमेंट,रेत आदि निर्जीव पदार्थों से तो उनके आरोपों में नहीं है अतः बिना किसी का नाम बताए झूठा आरोप लगाने पर उनके विरुद्ध कानूनी कारवाई की जाएगी। तब जा कर दुष्प्रचार थम गया था। लेकिन मुझे यह भी तय करना पड़ा कि माँ-पिता द्वारा चयनित पूनम से विवाह कर लेना ही उचित रहेगा अन्यथा बाबाजी व नानाजी की भांति पुनर्विवाह न करने की स्थिति में ये दुष्ट लोग फिर कभी दोबारा सिर उठा सकते हैं। 

लेकिन आज भी कमलेश बाबू/कुक्कू गठबंधन ब्लाग जगत व राजनीतिक क्षेत्र में अपनी पिनें ( धन -लोलुप  प्यादों)को चुभो कर परेशान कर ही रहा है। वैसे हम भी अब 19 वर्षों से झेलते-झेलते पीड़ाओं के अभ्यस्त हो गए हैं।  परंतु अनुत्तरित प्रश्न यह है कि जो लोग हमें परेशान तो करते हैं लेकिन खुद लाभान्वित भी नहीं हो पाते हैं "तो फिर वे क्यों ऐसा करते हैं?"

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शुक्रवार, 14 जून 2013

तो फिर वे क्यों ऐसा करते हैं? ---विजय राजबली माथुर

यों तो मुझे अतीत में विचरण करते रहने की आदत नहीं है और सिर्फ  इसलिए पीछे देखता हूँ कि कब-कब और कहाँ -कहाँ,कैसे-कैसे ठोकर लगी जिससे भविष्य में उससे बचा जा सके।लेकिन जब आज 18 वर्ष पीछे की घटना का वर्णन कर रहा हूँ तो किसी ठोकर लगने की बात नहीं है और न ही कोई भावुकता की बात है। सिर्फ यह बतलाना चाहता हूँ कि किस प्रकार निकटतम एवं घनिश्ठ्तम लोग भी मौके का किस प्रकार फायदा उठाते हैं। 

जैसा कि पिछले पोस्ट से स्पष्ट होता है कि 18 वर्ष पूर्व हमारे बाबूजी ने यह संसार छोड़ा था। यों बुखार आदि होता रहता है दो-तीन दिन से बाबूजी को बुखार था और दवा ले रहे थे बउआ की तबीयत भी ठीक नहीं थी मैंने डॉ के पास चलने को कहा तो बाबूजी ने कहा कि कल दिन में चलेंगे। लेकिन 13 जून 1995 की रात को 1-30 पर उनका प्राणान्त हो गया जबकि रात को 9 बजे तक उन्होने खुद ही हैंड पंप चलाकर पानी स्तेमाल किया था।  उस दिन उन्होने कह कर मुझसे करेले की सब्जी बनवाई थी किन्तु चखा भर था अगले दिन खाने को कह दिया था। 16 जून 1994 को शालिनी के देहांत के बाद से पहले माँ और बाबूजी ही खाना बनाते थे परंतु फिर मैंने सुबह ही दोनों वक्त की सब्जी बना कर रखना व  सुबह की रोटी सेंकना शुरू कर दिया था। शाम को बाबूजी यशवन्त को भूख लगने की बात कह कर मेरे घर पहुँचने तक पराँठे सेंक लेते थे। इधर दो दिन से मैं बाज़ार  ड्यूटी पर नहीं गया था। सुबह  पाँच बजे अर्जुन नगर रानी मौसी/अशोक,नवीन  आदि के घर मोपेड़ से सूचना देने जा रहा था यशवन्त भी साथ चलने की ज़िद्द करने लगा। माँ ने कह दिया लेते जाओ हम अकेले रह लेंगे लेकिन उन्होने अपनी अंगूठी व चूड़ियाँ उतार कर मुझे देते हुये कहा कि सोने की जेब में रख लो और वह अकेले ही बाबूजी के पार्थिव शरीर के पास बैठी रहीं।

अर्जुन नगर से लौटते में बिजली न आने की समस्या पर लोगों के जाम का सामना करना पड़ा। यह कहने पर भी कि घर में माँ अकेली पिता जी के पार्थिव शरीर के साथ हैं हमें जाने दिया जाये जामकर्ताओं ने यह कह कर इंकार किया कि सब ऐसे ही बहाना करते हैं। बड़ी मुश्किल से हम जाम से निकल सके और यही कारण है कि व्यक्तिगत रूप से मैं सड़क जाम करने के विरुद्ध रहता हूँ। वहाँ से आकर डॉ शोभा व अजय को 'तार'(TELEGRAM) जो अब( 15 जूलाई से बंद होने जा रहे हैं ) करने गए फिर यशवन्त साथ गया और माँ फिर अकेली रहीं। झांसी से शोभा/कमलेश बाबू तो 5  -30 तक पहुँच गए किन्तु अजय नहीं पहुंचे । उस दिन शोभा को सपरिवार फरीदाबाद घूमने पहुँचना था और अजय उन लोगों के इंतज़ार में रुके रहे थे। रात्रि 7 -30 पर वह पहुंचे तब बाबूजी को घाट ले जाया जा सका। वहाँ से लौटते-लौटते 9 बज चुका था। नहाने-धोने के बाद मैं गहरा कर सो गया था। 

शायद बाबूजी को घाट ले जाने के बाद माँ अनकांशस हो गईं थीं। अजय और शोभा उन पर कुछ खाने का दबाव बनाते-बनाते जब थक गए और उनका जवाब नहीं मिला तो शोभा मुझे जगा कर और यह कह कर ले गईं कि अब तुम्ही माँ को खिलाओ हम लोगों से नहीं मान रही हैं। जब वह अचेत थीं तो मेरे कहने से भी कोई फर्क नहीं पड़ना था किन्तु छोटे भाई-बहन की त्यौरिया चढ़ी हुई थीं। मैंने कहा कि आज छोड़ दो कल देखेंगे और मैं फिर सो गया। 14 जून से जो माँ अचेत हुईं तो 25 जून को प्राणान्त तक अचेत ही रहीं एलोपैथी इलाज का धेला भर भी असर नहीं हुआ। 5 दिन नर्सिंग होम में भी रहीं ,डॉ अशोक गर्ग (जिनके पास अजय इलाज के लिए ले गए थे उनका संबंध RSSसे था मैं उनसे इलाज कराने का पक्षधर नहीं था )का कहना था कि पेट पंकचर करके नलियाँ डाल देंगे उनसे लिक्विड दिया जा सकेगा किन्तु पेट पंकचर करते में यदि मृत्यु हो जाये तो उनकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। अतः मैंने इस आपरेशन को नहीं होने दिया।

बाबूजी की डेथ और माँ की बीमारी के दौरान पूनम के पिताजी का जवाबी पत्र बाबूजी के नाम आया था। उस वक्त अजय और कमलेश बाबू नर्सिंग होम में थे मैं भी किसी काम से कहीं गया हुआ था। जब लौटा तो पता चला कि शोभा और अजय की पत्नी के मध्य यह विवाद छिड़ गया था कि पत्र अजय खोल कर जवाब देंगे कि कमलेश बाबू। मैंने सीधे-सपाट दोनों से कहा कि  मुझसे छोटे होने के कारण न अजय और न ही कमलेश बाबू को कोई हक है कि वे लिफाफा खोलें और जवाब दें। माँ इस स्थिति में नहीं हैं अतः मैं खुद ही देखूंगा और जवाब जो देना होगा उसे इस वक्त टाल दूँगा सिर्फ बाबूजी के न रहने व माँ की बीमारी की सूचना भेज दूँगा। और वही मैंने किया। हालांकि शोभा/कमलेश बाबू व अजय और उनकी पत्नी चुप तो हो गए किन्तु भविष्य में कोई चाल चलने की सोच कर ही। 

अगले ही दिन शोभा/कमलेश बाबू झांसी चले गए ,उनकी बेटियाँ भी वहाँ अकेली थीं। 23 जून को मेरे बहुत मना करने के बावजूद  अजय भी अपनी पत्नी व बेटी के साथ फरीदाबाद लौट गए। 25 की रात 7-45 पर माँ का भी प्राणान्त होने के समय फिर यशवन्त ही मेरे साथ मौजूद रहा। हालांकि आज बाबूजी की अंतिम विदाई के 18 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं परंतु लगता है कि अभी कल की ही घटना है। माँ के तुरंत बाद ही अजय ने तो सम्पर्क तोड़ लिया था ,मई 2011 में शोभा/कमलेश बाबू के लखनऊ आगमन के बाद से मैंने उन लोगों से सम्पर्क तोड़ लिया है। क्योंकि यह खुलासा हो चुका था कि पूना वासी छोटी भांजी ने पूनम की श्रीवास्तव बिरादरी के ब्लागर्स चुन कर उनको मेरे व यशवन्त के विरुद्ध अपने पिता श्री के माध्यम से उकसाया था। इसका प्रभाव हमारी हमारी पार्टी के कुछ विशिष्ट पदाधिकारियों पर भी है जो उन ब्लागर्स से संबन्धित हैं।

यह सब सार्वजनिक करने का उद्देश्य छोटे बहन-भाई को कोसना नहीं है बल्कि यह  सोच कर हैरानी होती है कि आखिर मुझे,पूनम को या यशवन्त को नुकसान पहुंचाने पर बहन-भाई को तो कुछ लाभ होगा नही;सिर्फ ऐरे-गैरे नत्थू -खैरे ही लाभ उठा सकेंगे  तो फिर वे क्यों ऐसा करते हैं?

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