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मंगलवार, 16 जून 2026

३३ वीं पुण्यतिथि पर स्मरण ------ विजय राजबली माथुर

 



(शलिनी माथुर : 04 जनवरी 1959- 16 जून 1994 )

कुल साढ़े बारह वर्ष का ही साथ रहा और 25 मार्च 1981 को एंगेजमेंट के तुरंत बाद जब उन लोगों ने शालिनी के हाथ का अध्यन करने को कहा था और आयु रेखा 35 वर्ष पर ही समाप्त दीखी थी तब माथा तो ठनका था कि क्या महज़ 13 वर्ष का ही साथ होगा। उस वक्त कुछ किसी को बताया नहीं जा सका , बताना उचित भी नहीं था फिर दिमाग से बात ऐसे गायब हो गई जैसे गधे के सिर से सींग। फिर जब मथुरा में शालिनी के ममेरे भाई राम अवध नारायण माथुर साहब की पुत्री लवलीन ने उनका हाथ देख कर कहा था  कि " भुआ आपकी आयु तो 36 वर्ष ही है। " तो उनका जवाब था कि अब हम मरने वाले हैं। उनके बड़े भाई कुक्कू के दोस्त वीर बहादुर सिंह टामटा ने टूंडला से इटावा पहुँच कर हाथ देख कर पहले ही बता दिया था कि कुल आयु 36 तक है अतः उन सबको पहले से ही मालुम था। 16 जून 1994 को मृत्यु के समय 36 वां वर्ष ही चल रहा था। 

चूंकि अजय को शीघ्र ही वापिस फरीदाबाद लौटना था अतः बाबूजी ने परंपरागत तेरहवीं के चक्कर में न पड़ कर 'आर्यसमाज' के पुरोहित से पाँच दिन पर 'हवन' करवा लिया था। दकियानूस पोंगापंडितों के चक्कर में फंसे रिशतेदारों व अन्य लोगों ने इसकी आलोचना की कि तेरहवीं क्यों नहीं की। गोविंद बिहारी मौसाजी सबसे ज़्यादा बाबूजी के विरुद्ध मुखर थे। तब माँ ने बताया कि उन मौसाजी के श्वसुर अर्थात माँ के फूफाजी ने तो उनकी भुआ के निधन पर सिर्फ तीन दिन बाद ही हवन करवा लिया था। मैंने इस प्रश्न को उनके समक्ष रखा और पूछा कि वह अपने  साढ़ू अर्थात हमारे बाबूजी की तो निंदा कर रहे हैं अपने श्वसुर साहब के बारे में उनकी क्या राय है। तब से मुझको सद्दाम हुसैन कहने व प्रचारित करने लगे थे। 

बहरहाल शालिनी के बाद से जो आर्यसमाज से संपर्क हुआ वह अगले वर्ष जून 1995 में बाबूजी व माँ के निधन के बाद से और गहरा हो गया व बाद में कमलानगर-बल्केशवर  आर्यसमाज, आगरा की कार्यकारिणी में भी मैं शामिल रहा किन्तु आर्यसमाज के आर एस एस प्रभुत्व के लोगों के नियंत्रण के बाद संगठन छोड़ दिया। जबकि नीति और सिद्धांतों का अनुसरण अब भी करता हूँ। आर्यसमाज 'हिंदूवाद' के विरुद्ध है अतः मौलिक आर्यसमाजी सदैव आर एस एस जिसका गठन ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा के लिए हुआ था का विरोधी होता है  जबकि आर्यसमाज का गठन ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ने हेतु किया गया था।
बहरहाल हम लोग आर्यसमाज के निकट शालिनी के निधन के बाद आए थे , आर्यसमज,कमला नगर -बलकेश्वर,आगरा से शालिनी के पुत्र यशवंत उर्फ बाँके को पुरस्कृत  भी किया जा चुका है। शालिनी अक्सर कहा करती थीं कि, वह बाँके की शादी नहीं करेंगी , चाहे उनके भई कुक्कू के दोस्त के बताए अनुसार या उनकी एक भतीजी के बताए अनुसार। जब आगे जीवित ही नहीं रहीं तो पुत्र की शादी करतीं कैसे ?

बाँके के आग्रह पर ही बाबूजी ने पूनम के पिताजी को पोस्ट कार्ड भेज दिया था जिसके उत्तर में आए उनके एक पत्र का पुनः उत्तर भी भेज चुके थे परंतु १३ जून १९९५ की रात्रि  उनका निधन हो गया और १२ दिन बाद २५ जून १९९५ को ब उआ का भी निधन हो गया। 

वैसे बाबाजी और नानाजी की भांति ही मैं भी पुनर्विवाह नहीं करना चाहता था किन्तु बाबूजी और ब उआ के इरादे और चुनाव का सम्मान करते हुए पूनम से पुनर्विवाह कर लिया था। माता - पिता का निधन होने के कारण  मुझे खुद पत्रचार और बात- चीत करना पड़ा क्योंकि भाई- बहन दोनों मुझसे छोटे हैं। पूनम ने माता का फर्ज पूरी तरह निभाया । 

लेकिन जब यशवंत की इच्छानुसार विवाह की अनुमति हमने दे  दी तो उसके सुसरालियों ( पुत्र - वधू के माता - पिता दोनों ही पहले ही दिवंगत हो चुके थे ) ने सीधे ही यशवंत से संपर्क रखा हम लोगों से नहीं। हम लोग विवाह में अपने फर्ज के लिए शामिल थे अवांछित के रूप में। 

जब इस बार विवाह के बाद पहली बार शालिनी तथा बाबूजी की पुण्यतिथियों पर पुत्र और पुत्र - वधू विशेष छह वैदिक आहूतियों से हवन कर सकते थे ( जो पूनम को ग्लूकोमा एवं मोतियाबिंद  होने के बाद से रुक गया था ) लेकिन सुसरालियों के साथ वे लोग इन तारीखों में ही तीर्थाटन पर चले गए। 

पुत्र - पुत्रवधू अपने दायित्वों का निर्वहन करें या न करें जैसा उनका बुद्धि- विवेक कहे लेकिन हम तो उनके प्रति अपने दायित्व का निर्वहन करेंगे ही। शालिनी के हक के अनुसार मकान के दो  भाग में से एक भाग की वसीयत पुत्र के नाम रेजिस्टर करा दी है। उस  भाग में वे लोग निवास भी कर रहे हैं। 

शालिनी के एक भाई शरद मोहन ने आगरा में यशवंत को नाले में गिरवाने और अपहरण करवाने का भी प्रयास किया था इसलिए आगरा छोड़ कर लखनऊ आ गए थे। शरद मोहन की भाभी ने मुजफ्फर नगर में बताया था कि,शरद मोहन ने उनका सारा जेवर रेल यात्रा में गायब करा लिया था। अतः हम शालिनी को इस श्रद्धांजली के माध्यम से पुत्र और पुत्र- वधू को सचेत करना चाहते हैं कि वे यशवंत   के ननसालियों से पक्के तौर पर दूर रहें और इतना साहस सुसरालियों से कहने का रखें कि परिवार के प्रति भी उनको अपना फर्ज निभाने दें। 


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शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

पीपल के पत्ते ------ विजय राजबली माथुर

                                               



कभी - कभी बहुधा घटित होते रहने वाली छोटी सी बात भी एक अलग ध्यान आकर्षित कर देती है और आज कुछ ऐसा ही हुआ। मेरी श्रीमती जी ने एक गमले में और पौधों के अलावा एक पीपल का पौधा भी लगा रखा है। चिड़ियों द्वारा लाये बीज से यह पौधा स्वतः प्राप्त हुआ था। हमेशा की तरह आज भी दो पीले पड़ चुके पत्ते हवा से झड़ कर छत पर गिरे हुये थे इनको देख कर 55 वर्ष पूर्व की एक घटना का स्मरण हो आया।हम लोग बाबूजी के नान फेमिली स्टेशन सिलीगुड़ी ट्रांसफर हो जाने के कारण शाहजहाँपुर में नानाजी के पास 1962 से ही थे। 1963 में मैं 7 वीं कक्षा का छात्र था  और इससे मतलब भी नहीं था तब भी जी एफ कालेज यूनियन के छात्रसंघ चुनाव में एक उम्मीदवार  का पेंफ्लेट मुझे स्कूल से लौटते वक्त दे दिया गया। वह पेंफ्लेट और कुछ नहीं छांव में सुखाये हुये पीपल के पत्ते पर सफ़ेद पेंट से लगाई मोहर द्वारा उस उम्मेद्वार  को वोट देने की अपील थी।यह एक सादगी भरा, अलग हट कर अनोखा प्रचार माध्यम था जबकि और लोग कागज के पर्चे बाँट रहे थे पीपल के पत्ते चर्चा और आकर्षण बटोर रहे थे। 
दूसरी घटना 20 वर्ष पूर्व आर्यसमाज, कमलानगर- बल्केश्वर, आगरा के वेद प्रचार सप्ताह में  मेरठ के गायक प्रचारक वेगराज जी द्वारा सुनाये वर्णन की है। ढोंग - पाखंड -  आडंबर पर प्रहार करते हुये व्यर्थ के सांप्रदायिक तनाव का विरोध करते हुये उन्होने बताया था कि बिना सोचे विचारे बेवजह लोग आपस में लड़ना शुरू कर देते हैं और बेगुनाह मारे जाते हैं।
उन्होने बताया कि एक गाँव से ताजिये का जुलूस निकल रहा था चूंकि ताजिये बहुत लंबे थे और झुकाये नहीं जा सकते थे अतः मार्ग में पड़ रहे  शिव मंदिर  के वृक्ष की डालियों को काटने की बात उठी तथाकथित हिन्दू अड़ गए कि उनके शिव भगवान की जटाएँ नहीं काटी जा सकतीं। बढ़ती तकरार से खून - खराबे की आशंका के मद्दे नज़र पुलिस ने ताजिये उसी स्थान पर रखवा कर सुरक्षा के लिए पहरा बैठा दिया और जुलूस के लिए पीपल शाखाओं के काटने का मामला अदालत के फैसला आने तक  के लिए टल गया। अदालती कारवाई जैसी होती है उसमें फैसला क्या आता या नहीं आता उससे पहले एक रोज़ जोरदार आंधी तूफान आ गया जिससे ताजिये भी फट कर बिखर गए और पीपल की शाखाएँ भी टूट कर पत्ते भी झड़ कर बिखर गए । अगले रोज सफाई कर्मचारी ने बुहार कर पत्ते और ताजिये सब फेंक दिये। प्राकृतिक न्याय के आगे किसी की कुछ नहीं चली। हिन्दू - मुस्लिम सांप्रदायिकता धरी की धरी रह गई। इसी लिए आर्यसमाज देश - काल- जाति- धर्म - नस्ल से परे मनुष्य मात्र को आर्य= आर्ष = श्रेष्ठ बनाने की बात करता है।   

जब बात पीपल के पत्तों की चली है  तब लगभग पाँच वर्ष पुरानी इस पोस्ट को भी उद्धृत कर रहा हूँ  : 


हार्ट अटैक: ना घबराये ......!!!
सहज सुलभ उपाय ....
99 प्रतिशत ब्लॉकेज को भी रिमूव कर देता है पीपल
का पत्ता....
पीपल के 15 पत्ते लें जो कोमल गुलाबी कोंपलें न हों, बल्कि पत्ते
हरे, कोमल व भली प्रकार विकसित हों। प्रत्येक का ऊपर व नीचे
का कुछ भाग कैंची से काटकर अलग कर दें।
पत्ते का बीच का भाग पानी से साफ कर लें। इन्हें एक गिलास
पानी में धीमी आँच पर पकने दें। जब पानी उबलकर एक तिहाई रह
जाए तब ठंडा होने पर साफ कपड़े से छान लें और उसे ठंडे स्थान
पर रख दें, दवा तैयार।
इस काढ़े की तीन खुराकें बनाकर प्रत्येक तीन घंटे बाद प्रातः लें।
हार्ट अटैक के बाद कुछ समय हो जाने के पश्चात लगातार पंद्रह
दिन तक इसे लेने से हृदय पुनः स्वस्थ हो जाता है और फिर दिल
का दौरा पड़ने की संभावना नहीं रहती। दिल के रोगी इस नुस्खे
का एक बार प्रयोग अवश्य करें।
* पीपल के पत्ते में दिल को बल और शांति देने की अद्भुत
क्षमता है।
* इस पीपल के काढ़े की तीन खुराकें सवेरे 8 बजे, 11 बजे व 2
बजे ली जा सकती हैं।
* खुराक लेने से पहले पेट एक दम खाली नहीं होना चाहिए,
बल्कि सुपाच्य व हल्का नाश्ता करने के बाद ही लें।
* प्रयोगकाल में तली चीजें, चावल आदि न लें। मांस, मछली,
अंडे, शराब, धूम्रपान का प्रयोग बंद कर दें। नमक, चिकनाई
का प्रयोग बंद कर दें।
* अनार, पपीता, आंवला, बथुआ, लहसुन, मैथी दाना, सेब
का मुरब्बा, मौसंबी, रात में भिगोए काले चने, किशमिश, गुग्गुल,
दही, छाछ आदि लें । ......
तो अब समझ आया, भगवान ने पीपल के पत्तों को हार्टशेप
क्यों बनाया..
http://vijaimathur05.blogspot.in/2013/12/blog-post_24.html



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रविवार, 13 जुलाई 2014

आर्यसमाज से संपर्क और व्यक्तिगत अनुभव ---विजय राजबली माथुर

माँ जी व बाबूजी साहब,1999 में आगरा में हवन करते हुये

वैसे आर्यसमाज का  विधिवत सदस्यता फार्म तो 13 जूलाई 1997 को ही भरा था और उस समय पूनम पटना गई हुई थीं। परंतु जून 1994 में आर्यसमाज से प्रथम संपर्क तब हुआ था जब शालिनी के निधन के बाद हवन कराने पुरोहित जी आए थे। अजय ने बलकेश्वर कमलानगर आर्यसमाज में संपर्क किया था।  फिर जून 1995 में बाबूजी के निधन के बाद अजय ने पुनः वहाँ संपर्क किया था किन्तु इस बार इंटर कालेज के अध्यापक जो शास्त्री जी आए थे वह अजय को अपने घर का पता दे गए थे। अतः 12 दिन बाद माँ का निधन होने पर अजय सीधे ही शास्त्री जी के घर संपर्क करने गए थे। चूंकि मै और यशवन्त ही अब आगरा में रह गए थे अतः यह शास्त्री जी यदा-कदा यों ही हाल लेने आते रहते थे। 

बाबूजी ने बाबूजी साहब (पूनम के पिताजी ऊपर चित्र में हवन करते हुये) से पत्र-व्यवहार चला रखा था और माँ व बाबूजी ने पूनम को पसंद किया था अतः उनके बाद मुझे खुद  ही यह पत्र-व्यवहार चालू रखना पड़ा क्योंकि भाई-बहन दोनों छोटे हैं और उन दोनों में मतभेद भी थे। पूनम से विवाह के बाद उनके भाई साहब-भाभी जी के सामने भी वह शास्त्री जी आए थे और सबको शामिल करते हुये हवन करवा गए थे। पोंगापंथी-आडंबरयुक्त पाखंडी प्रक्रियाओं के विरुद्ध होने के कारण मैंने शास्त्री जी के अनुरोध पर बगैर सदस्यता लिए हुये ही आर्यसमाज में जाना शुरू कर दिया था। विधिवत सदस्यता लेने के बाद मैं सक्रिय रूप से भाग लेने लगा था और मुझे कार्यकारिणी में भी शामिल कर लिया गया था लेकिन बाद में मैं कार्यकारिणी से हट गया था।

उपरोक्त चित्र में हवन करा रहे पुरोहित जी भी शास्त्री जी के माध्यम से यदा-कदा वैसे ही मिलने आते रहते थे। सन 1999 में जब माँ जी व बाबूजी साहब आगरा आए थे तब उनकी उपस्थिती में हमने पुरोहित जी से हवन करवाया था। जूलाई 2000 में बाबूजी साहब के निधन के बाद जब भाई साहब पूनम को आगरा पहुंचाने आए थे तब उपरोक्त चित्र वाले पुरोहित जी उनके सामने आए थे और अपने साथ पेठा-मिठाई लाये थे (जबकि हमेशा तो यों ही आते थे) भाई साहब से बात करते हुये पुरोहित जी बोले हमको तो उनके न रहने की खुशी है। जो पुरोहित उनसे मिल चुके थे उनको हवन करा चुके थे उनके मुख से ऐसे शब्द सुन कर हैरानी भी हुई और धीरे-धीरे मैंने गतिविधियों में भाग लेना बंद कर दिया और सदस्यता से भी अलग हो गया। किन्तु शास्त्री जी फिर भी घर पर व्यक्तिगत रूप से मिलने आते रहे। उनसे ही पता चला था कि उपरोक्त पुरोहित जी जयपुर हाउस के पुरोहित जी को हटाये जाने पर उनके स्थान पर वहाँ चले गए थे और कमलानगर छोड़ दिया था। उसके बाद वहाँ से नोयडा चले गए और आगरा ही छोड़ दिया। स्वभाविक रूप से   पुरोहित जी अधिक वेतन वाले स्थान पर जाते रहे । धन-लोलुप और RSS से प्रभावित लोगों के कारण आज आर्यसमाज स्वामी दयानन्द 'सरस्वती' के सिद्धांतों से हटा हुआ प्रतीत होता है। 17 वर्षों बाद आज जब पीछे मुड़ कर देखता हूँ कि 'मस्तिष्क' के परिष्कृत होने तथा भ्रम निवारण में आर्यसमाज का अमिट योगदान है किन्तु अधिकांश लोग व्यक्तिगत स्वार्थों के कारण 'कथनी व करनी' में अंतर कर रहे हैं।एक प्रधान जी जो रेलवे में कार्यरत थे और कमलेश बाबू के बालसखा-कुक्कू के छोटे भाई के साथी थे मेरे विरुद्ध षड्यंत्र में रहते थे जिसका खुलासा शास्त्री जी की मार्फत हो गया था।  मेरे लिए ऐसा करना संभव नहीं है इसलिए मैं संगठन से दूर हूँ फिर भी सिद्धांतों पर यथा-संभव चलने का प्रयास करता रहता हूँ।

13 जूलाई 2013 को हमारी पार्टी के एक प्रदेश पदाधिकारी( जो कुक्कू के ज़िले-सीतापुर के ही हैं ) ने ज़िला काउंसिल बैठक के दौरान हाथ और पैरों से मुझे ठोकरें मारी थीं भी आर्यसमाज के बिगड़े पुरोहितों की भांति ही 'कथनी-करनी' के अंतर वाले हैं। हालांकि राजनीतिक रूप से मैं पार्टी संगठन में सक्रिय हूँ परंतु उन सीतापुरिए से दूर रहता हूँ।

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मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

आगरा/1994 -95 / (भाग-7)

गतांक से आगे ......

अजय को फरीदाबाद लौटना था वह भी प्राईवेट जाब तब छोड़ कर किसी के साझे मे अपना काम कर रहे थे,कितना नुकसान उठाते अतः आर्यसमाँजी पद्धति से हवन कराने का निर्णय बाबूजी ने लिया। कमला नगर आर्यसमाज मे उस समय कोई पुरोहित न था अतः वहाँ से पता करके उनके सेक्रेटरी के घर अजय गए जहां सेक्रेटरी साहब तो नहीं मिले किन्तु उनकी पत्नी ने सामग्री लिखवा दी और दिये समय पर पुरोहित भिजवाने का आश्वासन दे दिया। निर्धारित दिन और समय पर हवन कुंड और समिधा लेकर हींग -की -मंडी आर्यसमाज के पुरोहित अशोक शास्त्री जी पहुँच गए। विधानपूर्वक उन्होने शांति हवन करा दिया। जो दक्षिणा  बाबूजी  ने उन्हें दी बिना किसी हुज्जत के उन्होने स्वीकार कर ली। बल्कि जो साड़ी और बर्तन बाबूजी ने अजय से उन्हें देने के लिए मँगवाए थे वे भी लेने से उन्होने यह कह कर मना कर दिया कि न उसका कोई औचित्य है न ही आर्यसमाज मे चलता है। उनका कहना था आपको देना है तो किसी और पंडित को दे दें। बड़ी मुश्किल से बाबूजी और अजय ने उन्हें वे चीजें ले जाने को यह कह कर राजी किया कि आप ही जिसे चाहे दे दें।

अजय की बेटी अनुमिता तब पौने पाँच वर्ष की थी हवन के बाद बोली ताऊजी क्या आप हमे मोपेड़ पर नहीं घुमा सकते हैं?लिहाजा उसे बैठा कर थोड़ा आगे ही बढ़े थे कि उसने कह दिया बस घूमना हो गया अब वापिस चलिए। मुझे जानकारी नहीं थी किन्तु यशवन्त ने बताया कि मम्मी की इच्छा अनुमिता को एक फ़्राक देने की थी अब वह नहीं हैं इसलिए आप दिला दीजिये। तुरंत कुछ खरीदने-देने की मेरी इच्छा तो नहीं थी परंतु यशवन्त की इच्छा को देखते हुये उसी की पसंद की एक फ़्राक जिसे उस बच्ची ने भी पसंद किया ले दी जिसे यशवन्त ने ही अपनी चाची को सौंपा। फ़्राक को तो यशवन्त ने बताया था कि मम्मी देना चाहती थीं उनकी इच्छा को पूरा करने के लिए दी है उसे तो उन लोगों ने स्वीकार कर लिया। किन्तु यशवन्त अपनी तरफ से रु 4/- का हारलिक्स बिस्कुट का एक पैकेट और डेढ़ रुपया अपनी बहन को दे रहा था जिसे उस बच्ची ने ले भी लिया था। अजय ने पैसे उससे छीन कर उछाल दिये और बिस्कुट का पैकेट लौटा देने को कहा ,मन मसोस कर बच्ची ने रख दिया। यशवन्त को बहुत बुरा लगा और वह फूट-फूट कर रोने लगा। उसे रोता छोड़ कर वे लोग रवाना हो गए। मुझे बेहद ताज्जुब हुआ और धक्का भी लगा परंतु कर क्या सकता था?यशवन्त को ही बेमन से डांट दिया। बउआ -बाबूजी अजय से कुछ नहीं बोले यह बात भी समझ से परे थी।

डॉ रामनाथ, विजय शर्मा (सप्तदीवा साप्ताहिक के सम्पादक) और आस-पास के लोग 13 वी न करके आर्यसमाज से हवन कराने पर बिदक गए। गोविंद बिहारी मौसा जी (रानी मौसी के पति एवं अलीगढ़ के रिश्ते से  कमलेश बाबू के चाचा ) ने अपने घर पर मुझसे कहा कि -"तेरवी न करके जीजाजी ने अपना मुंह काला करवाया है,वह कबसे आर्यसमाजी हो गए?"

मुझे तो उनकी बात तीखी चुभी ही थी और मैंने इस दिन के बाद  उनके घर जाना छोड़ दिया और मन मे सोचा कि आपके जीजाजी (साढू) भले ही आर्यसमजी न हुये पर मै होके दिखाऊँगा। बउआ को भी छोटे फुफेरे बहनोई द्वारा अपने पति की तौहीन बेहद बुरी लगी। उन्होने बताया कि उनके फूफा जी ने उनकी भुआ (अर्थात गोविंद बिहारी जी के श्वसुर साहब ने उनकी सास )  के न रहने पर 5 दिन भी नहीं केवल 3 दिन बाद ही आर्यसमाज से हवन कराया था।मैंने एक पत्र भेज कर उनसे पूछा कि हमारे बाबूजी के बारे मे तो आपने तपाक से कह दिया कि अपना मुंह काला करवाया जो तेरवी न की तो आप अपने श्वसुर साहब के लिए क्या कहना चाहेंगे? रानी मौसी भी इस विषय पर अपने पिता को गलत नहीं ठहरा सकती थीं जबकि उनके सामने ही उनके पति ने मेरे पिता को गलत ठहरा दिया था।

इससे पूर्व गोविंद बिहारी मौसा जी के ही कहने पर मै कई बार यशवन्त को लेकर राजा-की-मंडी क्वार्टर पर गया था। किन्तु वे लोग उपेक्षित व्यवहार उसके साथ भी कर रहे थे। गोविंद बिहारी मौसा जी ने कहा था कि उनके कहने से एक बार और ले जाऊँ उस दिन शरद मोहन का आफ था वह घर पर थे किन्तु तुरंत ड्रेस पहन कर स्टेशन रवाना हो गए उनकी माता जी सोने चली गई और उनकी पत्नी ने अपनी पुत्रियों को रंग - ड्राइंग कापियाँ दे कर अलग कमरे मे बैठा दिया। लिहाजा मै यशवन्त को लेकर फ़ौरन सीधे अर्जुन नगर रानी मौसी के घर यह तथ्य बताने गया। तभी उन्होने तेरवी न करके आर्यसमाजी हवन कराने पर आपत्ति जताई थी। उसी दिन के बाद से गोविंद बिहारी मौसा जी के साथ-साथ शरद मोहन के घर भी जाना बंद कर दिया। 

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