जन्म कुंडली लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
जन्म कुंडली लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

डा.राजेन्द्र प्रसाद की जन्म कुंडली- (03दिसंबर जयंती पर विशेष) ---विजय राजबली माथुर


भारत क़े प्रथम राष्ट्रपति डा.राजेन्द्र प्रसाद की जयंती प्रतिवर्ष 03 दिसंबर को धूम धाम से मनाई जाती है। आइये देखें इतनी विलक्षण क्षमता प्राप्त कर क़े वह कैसे इतना ऊपर उठ सके  :


उनकी जन्म कुंडली से स्पष्ट है कि चन्द्रमा से केंद्र स्थान में बृहस्पति बैठकर गजकेसरी योग बना रहा है इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति अनेक मित्रों,प्रशंसकों व सम्बन्धियों में घिरा रहता है व उनके द्वारा सराहा जाता है। स्वभाव से नम्र,विवेकवान व गुणी होता है। तेजस्वी,मेधावी,गुणज्ञ,तथा राज्य पक्ष में प्रबल उन्नति प्राप्त करने,उच्च  पद प्राप्त करने तथा मृत्यु क़े बाद भी अपनी यश गाथा अक्षुण रखने वाला होता है। ठीक ऐसे ही थे राजेन्द्र बाबू जिनका जन्म बिहार क़े छपरा जिले में जीरादेई ग्राम में हुआ था। एक किसान परिवार में जन्म लेकर अपने बुद्धि कौशल से राजेन्द्र बाबू ने वकालत पास की उस समय कायस्थ वर्ग सत्ता क़े साथ था परन्तु राजेन्द्र बाबू ने गोपाल कृष्ण गोखले क़े परामर्श से देश की आजादी क़े आन्दोलन में कूदने का निश्चय किया और कई बार जेल यात्राएं कीं। राजेन्द्र बाबू ने स्वंत्रता आन्दोलन क़े दौरान जेल में रहकर कई पुस्तकें लिखीं जिन में 'खंडित भारत' विशेष उल्लेखनीय है। इसमें राजेन्द्र बाबू ने तभी लिख दिया था कि यदि अंग्रेजों की चाल से देश का विभाजन हुआ तो क्या क्या समस्याएँ उठ खडी होंगी और हम आज देखते हैं कि दूर दृष्टि कितनी सटीक थी। डा.राजेन्द्र प्रसाद मध्यम मार्ग क़े अनुगामी थे और उन्हें नरम तथा गरम दोनों विचारधाराओं का समर्थन प्राप्त था। जब नेता जी सुभाष चन्द्र बोस महात्मा गांधी क़े उम्मीदवार डा.पट्टाभि सीता रमैया को हराकर कांग्रेस अध्यक्ष निर्वाचित हो गये तो गांधी जी क़े प्रभाव से उनकी कार्यकारिणी में कोई भी शामिल नहीं हुआ और सुभाष बाबू को पद  त्याग करना पडा। उस समय कांग्रेस की अध्यक्षता  राजेन्द्र बाबू ने संभाली और स्वाधीनता आन्दोलन को गति प्रदान की। राजेन्द्र बाबू की कुडली क़े चतुर्थ भाव में मीन राशी है जिसके प्रभाव से वह धीर गंभीर और दार्शनिक बन सके। इसी कारण धार्मिक विचारों क़े होते हुए भी वह सदा नवीन विचारों को ग्रहण करने को प्रस्तुत रहे। राजेन्द्र बाबू ने एक स्थान पर लिखा है कि यदि जो कुछ पुरातन है और उससे कोई नुक्सान नहीं है तो उसका पालन करने में कोई हर्ज़ नहीं है लेकिन उनके इसी भाव में स्थित हो कर केतु ने उनको जीवन क़े अंतिम वर्ष में कष्ट एवं असफलता भी प्रदान की। पंडित नेहरु से मतभेद क़े चलते राजेन्द्र बाबू को तीसरी बार राष्ट्रपति पद नहीं मिल सका और इस सदमे क़े कारण ६ माह बाद उनका निधन हो गया। परन्तु इसी केतु ने उन्हें मातृ -पितृ भक्त भी बनाया विशेषकर माता से उन्हें अति लगाव रहा। एक बार माता की बीमारी क़े चलते बोर्ड परीक्षा में वह एक घंटा की देरी से परीक्षा हाल में पहुंचे थे और उनकी योग्यता को देखते हुए ही उन्हें परीक्षा की अनुमति दी गयी थी तथा राजेन्द्र बाबू ने उस परीक्षा को प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया था। षष्ठम भावस्थ उच्च  क़े चन्द्र ने भी उन्हें हर प्रकार क़े सुख प्राप्त करने में सहायता की। नवम क़े बृहस्पति तथा दशम क़े राहू ने राजेन्द्र बाबू को राजनीति में दक्षता प्रदान की तो द्वादश क़े सूर्य ने शिक्षा क़े क्षेत्र में प्रसिद्धि दिला कर दार्शनिक बना दिया। 


समय करे नर क्या करे,
समय बड़ा बलवान।

असर ग्रह सब पर करे

परिंदा,पशु,इंसान। ।

हम देखते हैं कि विद्वान् कवि क़े ये उदगार राजेन्द्र बाबू पर हू ब हू लागू होते हैं.उनके जन्मकालीन ग्रह नक्षत्रों ने उन्हें स्वाधीन भारत क़े प्रथम राष्ट्रपति क़े पद तक पहुंचाया.आजादी से पूर्व वह संविधान निर्मात्री सभा क़े अध्यक्ष भी रहे.अपने पूर्वकालीन संस्कारों से अर्जित प्रारब्ध क़े आधार पर ग्रह नक्षत्रों क़े योग से डा.राजेन्द्र प्रसाद स्तुत्य बन सके ।


 
 http://krantiswar.blogspot.in/2010/12/03.html

(02 दिसंबर 2010 को यह लेख प्रस्तुत लिंक पर पूर्व प्रकाशित है। )

Link to this post-



शनिवार, 16 जून 2012

'शालिनी'--एक ज्योतिषयात्मक विश्लेषण

18 वर्ष बाद प्रथम बार लिपिबद्ध श्रद्धांजली-

(सिकन्दरा,आगरा मे अक्तूबर 1993 मे लिए सामूहिक चित्र से 'शालिनी माथुर')


04 जनवरी 1959 को साँय 06 बजे मैनपुरी मे जन्मी शालिनी की मूल जन्म पत्री तो कभी दिखाई ही नहीं गई ,बताया गया कि खो गई है परंतु जो हस्त-लिखित प्रतिलिपि हमारे यहाँ भेजी गई थी उसका विवरण यह है-

रविवार,कृष्ण पक्ष दशमी,पूष मास,विक्रमी संवत 2015,'स्वाती नक्षत्र'।
लग्न-मकर और उसमे 'शुक्र'।
तृतीय भाव मे- 'मीन' का केतू।
चतुर्थ भाव मे -मेष का मंगल।
नवे भाव मे-कन्या का राहू।
दशम भाव मे -तुला का चंद्र।
एकादश भाव मे-वृश्चिक के बुध व गुरु।
द्वादश भाव मे -धनु के सूर्य व शनि।

ग्रहों का विश्लेषण देने से पूर्व यह भी बताना ज़रूरी है कि शालिनी के पिताजी और के बी माथुर साहब (डॉ शोभा के पति) के पिताजी 'रेलवे' के साथी थे और उनही के माध्यम और उनकी सिफ़ारिश पर विवाह हुआ था। जन्म कुंडली डॉ रामनाथ जी ने मिलाई थी ,14 गुण मिलने पर विवाह नहीं हो सकता था अतः उन्होने 28 गुण मिल रहे हैं बताया था। शालिनी के भाई 'कुक्कू' के बी माथुर साहब के पुराने मित्र थे । इससे निष्कर्ष निकाला कि डॉ रामनाथ को खरीद लिया गया था और उन्होने हमारे साथ विश्वासघात किया था। इस धोखे के बाद ही खुद 'ज्योतिष' का गहन अध्यन किया और तमाम जन्म-कुंडलियों का विश्लेषण व्यवहारिक ज्ञानार्जन हेतु किया। (  रेखा -राजनीति मे आने की सम्भावनालेख 19 अप्रैल 2012 को दिया था और 26 अप्रैल 2012 को वह 'राज्य सभा' मे नामित हो गईं। )

शालिनी के एंगेजमेंट के वक्त जब कुक्कू साहब की पत्नी मधू (जो के बी माथुर साहब की भतीजी भी हैं) ने गाना गाया तब के बी साहब ने स्टूल को तबला बना कर उनके साथ संगत की थी। इस एंगेजमेंट के बाद कुक्कू के मित्र वी बी एस टामटा ने टूंडला से इटावा जाकर शालिनी का हाथ देख कर उनके 35 वर्ष जीवित रहने की बात बताई थी और इसका खुलासा खुद शालिनी ने किया था। यह भी शालिनी ने ही बताया था कि कुक्कू उनको मछली के पकौड़े खूब खिलाते थे। कुक्कू अश्लील साहित्य पढ़ने के शौकीन थे और पुस्तकें बिस्तर के नीचे छिपा कर रखते थे। यह भी रहस्योद्घाटन खुद शालिनी ही ने किया था।

05 जनवरी 1981 से 10 दिसंबर 1981 तक शालिनी की 'गुरु' महादशा मे 'मंगल' की अंतर्दशा थी। यह काल भूमि लाभ दिलाने वाला था। इसी बीच 25 मार्च 1981 को एंगेजमेंट और 08 नवंबर 1981 को मेरे साथ विवाह हुआ । अर्थात विवाह होते ही वह स्वतः मकान स्वामिनी हो गई।

11 दिसंबर 1981 से 04 मई 1984 तक वह 'गुरु' महादशांतर्गत 'राहू' की अंतर्दशा मे थीं जो समय उनके लिए हानि,दुख,यातना का था। नतीजतन उनका प्रथम पुत्र 24 नवंबर 1982 को टूंडला मे प्रातः 04 बजे जन्म लेकर वहीं उसी दिन साँय 04 बजे दिवंगत भी हो गया।
इसी काल मे 1983 मे 'यशवन्त' का भी जन्म हुआ जो बचपन मे बहुत बीमार रहा है।

05 मई 1984से 07 मई 1987 तक का कार्यकाल  'शनि' की महादशांतर्गत 'शनि' की ही अंतर्दशा का उनके लिए लाभदायक था। परंतु   इसी काल मे 24/25 अप्रैल  1984 को मुझे होटल मुगल शेरेटन ,आगरा से सस्पेंड कर दिया गया क्योंकि मैंने इंटरनल आडिट करते हुये पौने 06 लाख का घपला पकड़ा था तो बजाए मुझे एवार्ड देने के घपलेबाजों को बचाने हेतु यही विकल्प था मल्टी नेशनल कारपोरेट घराने के पास। (यही कारण है कारपोरेट घरानों के मसीहा 'अन्ना'/'रामदेव' का मैं प्रबल विरोधी हूँ)।
लेकिन 01 अप्रैल 1985 से मुझे हींग-की -मंडी ,आगरा मे दुकानों मे लेखा-कार्य मिलना प्रारम्भ होने से कुछ राहत भी मिल गई।

26 फरवरी  1991 से 25 अप्रैल 1994 तक 'शनि' मे 'शुक्र' की अंतर्दशा का काल उनके लिए श्रेष्ठतम था। इस बीच मुझे कुछ नए पार्ट टाईम जाब भी मिलने से थोड़ी राहत बढ़ गई थी। इसी बीच 11 अप्रैल 1994 को लखनऊ के रवींद्रालय मे प्रदेश भाकपा के सपा मे विलय के  समय मैं भी आगरा ज़िला भाकपा के कोषाध्यक्ष पद को छोड़ कर सपा मे आ गया था। किन्तु नवंबर 1993 मे अपनी माँ के घर खाना खा कर शालिनी बुखार से जो घिरीं वह बिलकुल ठीक न हुआ।

26 अप्रैल 1994 से अक्तूबर तक 'शनि'महादशांतर्गत 'सूर्य'की अंतर्दशा उनके लिए सामान्य थी। किन्तु 16 जून 1994 को साँय 04 बजे से 05 बजे के बीच उनका प्राणान्त हो गया। 

इस समय के अनुसार शालिनी की जो मृत्यु कुंडली बनती है उसका विवरण यह है-

ज्येष्ठ शुक्ल सप्तमी,संवत-2051 विक्रमी,पूरवा फाल्गुनी नक्षत्र।
लग्न तुला और उसमे-गुरु व राहू।
पंचम भाव मे -कुम्भ का शनि।
सप्तम भाव मे-मेष के केतू व मंगल।
नवे भाव मे -मिथुन के सूर्य और बुध।
दशम भाव मे-कर्क का शुक्र।
एकादश भाव मे -सिंह का चंद्र।

अब इस मृत्यु कुंडली का ग्रह-गोचर फल इस प्रकार होता है -
गुरु भय और राहू हानि दे रहे हैं। शनि पुत्र को कष्ट दे रहा है। केतू कलह कारक है और 'मंगल' पति को कष्ट दे रहा है। बुध पीड़ा दे रहा है तो 'सूर्य' सुकृत का नाश कर रहा है और शुक्र भी दुख दे रहा है। जब सुकृत ही शेष नहीं बच रहा है तब जीवन का बचाव कैसे हो?

जन्म कुंडली मे 'बुध' ग्रह की स्थिति भाई-बहनों से लाभ न होने के संकेत दे रही है तो 'क्रोधी' भी बना रही है । 'केतू' की स्थिति अनावश्यक झगड़े मोल लेने की एवं पारिवारिक स्थिति सुखद न रहने की ओर संकेत कर रही है।  'ब्रहस्पति' की स्थिति पुत्रों से दुख दिलाने वाली है।



कैंसर -

हालांकि डॉ रामनाथ ने शालिनी को टी बी होने की बात कही थी  जो TB विशेज्ञ की जांच मे सिद्ध न हो सकी। 

बाद मे 1994 मे ही  डॉ रमेश चंद्र उप्रेती ने बताया था कि आँतें सूज कर लटक चुकी हैं एक साल इलाज से लाभ न हो तो आपरेशन करना पड़ेगा। उनकी मृत्यु के उपरांत जन्म-कुंडली की ओवरहालिंग से जो तथ्य ज्ञात हुये उनके अनुसार उनको आंतों का' कैंसर ' रहा होगा जिसे किसी भी मेडिकल डॉ ने डायगनोज नहीं किया। इसी लिए सही इलाज भी नही दिया। 

ज्योतिष के अनुसार शनि ग्रह का कुंडली के 'प्रथम'-लग्न भाव और 'अष्टम' भाव से संबंध हो तथा साथ ही साथ 'मंगल' ग्रह से 'शनि' का संबंध हो तो निश्चय ही 'कैंसर' होता है। 
शालिनी की जन्म कुंडली मे प्रथम भाव मे 'मकर' लग्न है जो 'शनि' की है। यह 'शनि' अष्टम  (सिंह राशि  )भाव के स्वामी 'सूर्य' के साथ द्वादश भाव मे स्थित है। द्वादश भाव (धनु राशि) का स्वामी ब्रहस्पति  एकादश भाव मे 'मंगल' की वृश्चिक राशि मे स्थित है। 

अनुमानतः 16-17 वर्ष की उम्र से शालिनी की आंतों मे विकृति प्रारम्भ हुई होगी जो मछली के पकौड़े जैसे पदार्थों के सेवन से बढ़ती गई होगी। चाय का सेवन अत्यधिक मात्रा  मे वह करती थीं जिससे आँतें निरंतर शिथिल होती गई होंगी। डॉ उप्रेती ने तले-भुने,चिकने पदार्थ और चाय से कडा परहेज बताया था फिर भी उनकी माता ने डॉ साहब के पास से लौटते ही मैदा की मठरी और एक ग्लास चाय उनको दी। इस व्यवहार ने ही रोग को असाध्य बनाया होगा।

मेडिकल विशेज्ञों की लापरवाही और खुद को उस वक्त ज्योतिष का गंभीर ज्ञान न होने के कारण ग्रहों की शांति या 'स्तुति' प्रयोग न हो सका। इसी कारण अब 'जन हित मे' स्तुतियों को सार्वजनिक करना प्रारम्भ किया है जिससे जागरूक लोग लाभ उठा कर अपना बचाव कर सकें। लेकिन अफसोस कि 'पूना' स्थित 'चंद्र प्रभा',ठगनी प्रभा' और 'उर्वशी उर्फ बब्बी' की तिकड़ी ब्लाग जगत मे भी मेरे विरुद्ध दुष्प्रचार करके लोगों को इनके लाभ उठाने से वंचित कर रही है। 

शालिनी अपने पुत्र यशवन्त की 'माँ' और 'माता' तो न बन सकीं किन्तु 'जननी' तो थी हीं। जिस प्रकार हम अपने बाबूजी और बउआ की मृत्यु की कैलेंडर तारीख को 'हवन' मे सात विशेष आहुतियाँ देते हैं उसी प्रकार शालिनी हेतु भी उन विशेष आहुतियों से उनकी 'आत्मा' की शांति की प्रार्थना करते हैं। किसी 'ढ़ोंगी' का पेट धासने  की बजाए वैज्ञानिक विधि से हवन करना हमे उचित प्रतीत होता है। 





Link to this post-



+Get Now!