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शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

डाक्टर्स डे पर कुछ चिकित्सकों का ज़िक्र ------ विजय राजबली माथुर



यों तो समय समय पर अनेक चिकित्सक संपर्क में आते ही रहते हैं किन्तु जिनसे कुछ व्यक्तिगत आधार पर निजत्व रहा उनमें से ही जिनकी कुछ खास बातें याद हैं उनका ही उल्लेख हो सकेगा।
डॉ रामनाथ :
सबसे पहले डॉ रामनाथ का ज़िक्र करना चाहूँगा जो होटल मुगल,आगरा में हमारे  एक साथी के सहपाठी थे। उनसे मित्रवत ही मुलाक़ात हुई थी। माता जी के इलाज के लिए उनसे सलाह व दवा भी लेने लगे थे।  :उनके परामर्श  और सहयोग पर ही मैंने आयुर्वेद रत्न किया तथा वैद्य के रूप में RMP रेजिस्ट्रेशन भी करवाया। हालांकि वह तो इसी रेजिस्ट्रेशन पर एलोपैथी की ही ज़्यादा प्रेक्टिस करते थे। एलोपैथी व आयुर्वेदिक औषद्धियों दोनों का ही अध्यन कोर्स में किया भी था। किन्तु मेरी दिलचस्पी व जानकारी  होम्योपैथी औषद्धियों की अधिक थी/है। अतः मैंने प्रेक्टिस तो नहीं की किन्तु आयुर्वेदिक व होम्योपैथी उपचार परिचितों को बताता रहा।
सरोजनी नायडू मेडिकल कालेज,आगरा के एक पूर्व चिकित्सक जिनका नर्सिंग होम हमारी कालोनी में ही था चाहते थे कि, मैं घर पर क्लीनिक खोल लूँ और क्रटिकल केस उनको रेफर करता रहूँ औरों की भांति मुझे कमीशन मिलता रहेगा। परंतु इस प्रकार धनार्जन मैं कर ही नहीं सकता था अतः उनके प्रस्ताव पर अमल नहीं किया।
इन्ही रामनाथ जी के पिताजी (कालीचरण वैद्य जी ) से एक बार माँ की दवा लेकर उनको पैसे दे आया था। अगले दिन फिर जाने पर पहले तो उन्होने वे पैसे लौटाए और फिर कहा कि तुम मेरे बेटे के मित्र हो तुमने हिम्मत कैसे की पैसे देने की और हिदायत दी कि आगे से दवा ले जाओ पैसे न दो। ज़्यादा पुरानी बात नहीं है सिर्फ 36 वर्ष पूर्व 1980 की बात है यह। लेकिन अब तो अपनी तीन-तीन जन्म पत्रियों का निशुल्क विश्लेषण प्राप्त करने वाले डॉ ज़रूरत पर सलाह मांगने पर चुप्पी साध लेते है। 36 वर्षों में चरित्र इतने बदल गए हैं।

डॉ डी मिश्रा :
इन डॉ रामनाथ जी के क्लीनिक के सामने ही डॉ डी मिश्रा साहब ने अपना होम्योपैथी का क्लीनिक खोला था और उनसे परिचय रामनाथ जी की मार्फत ही हुआ था। डॉ मिश्रा सिर्फ डॉ रामनाथ का मित्र होने के नाते मुझे जानते थे उनको मेरी होम्योपैथी में दिलचस्पी और आयुर्वेद रत्न होने की जानकारी नहीं थी। एक बार उनके कंपाउंडर जो डॉ रामनाथ के ही सहपाठी भी थे अपने पिता जी के निधन के कारण बंगलौर गए तब उनके स्थान पर  उनके आने तक डॉ मिश्रा ने मेरा सहयोग लिया था। इस दौरान उनकी कलाकारियों से परिचित होने के कई अवसर प्राप्त हुये। वैसे डॉ मिश्रा पाईलट आफ़ीसर थे और होटल क्लार्क शीराज, आगरा के पूर्व जेनरल मेनेजर के पुत्र थे। लंदन की उड़ानों के दौरान वहाँ की किसी होम्योपैथिक संस्था से रेजिस्ट्रेशन करवाकर वह होम्योपैथ चिकित्सक बन गए थे। अपने पिताजी के लकवाग्रस्त होने पर इंडियन एयर लाईन्स की सेवा जल्दी ही छोड़ दी थी । प्रारम्भ में वह सुबह हाथरस में और शाम को आगरा में प्रेक्टिस करते थे। फिर हाथरस जाना बंद कर दिया था। 
एक दिन किसी बच्चे के पेट में तीव्र दर्द होने के कारण उन्होने रेक्टीफ़ाईड स्प्रिट में मिला कर एलोपैथी की पिप्टाल के ड्राप्स देकर शीघ्र राहत प्रदान की थी। बाद में मेरे पूछने पर बोले बिजनेस में थोड़ा-बहुत इम मोरेल होना पड़ता है। अर्थात चिकित्सक का पेशा वह बतौर बिजनेस कर रहे थे। 
एक दिन मेहरा आफ़सेट प्रेस के श्याम मेहरा साहब जो उनके क्लब के साथी थे अपनी श्रीमती जी  के साथ उन की दवा लेने आए हुये थे अपनी कुछ समस्या भी बताने लगे। डॉ मिश्रा ने मुझसे कहा माथुर साहब श्याम बाबू को BG की एक डोज़ दे दो। मैंने सादी  गोलियों की पुड़िया दे दी। थोड़ी देर में उन्होने श्याम बाबू से पूछा कुछ राहत है? वह बोले हाँ थोड़ा ठीक है, डॉ मिश्रा ने उनको थोड़ी देर और रुकने को कहा उसके बाद ही कार ड्राइव करना ठीक रहेगा। जब वह चले गए तब मैंने डॉ मिश्रा से पूछा कि, BG(ब्लैंक  ग्लोबल्स ) अर्थात सादी  गोलियों से मेहरा साहब को फायदा कैसे हो गया? तब डॉ मिश्रा का जवाब था कि, उनको हुआ ही क्या था? वह तो अपनी मिसेज को यह जतलाना चाहते थे कि, वह भी बीमार हैं जिससे वह अपनी बीमारी का गम भूल जाएँ। तो यह था डॉ मिश्रा का साइक्लोजिकल ट्रीटमेंट। 
डॉ खेमचंद खत्री :
डॉ के सी खत्री, होम्योपैथ से व्यक्तिगत परिचय उन साथी की मार्फत ही हुआ था जिनके मार्फत डॉ रामनाथ से परिचय हुआ था। वैसे डॉ खत्री को मैं इसलिए जानता था कि, वह पहले डॉ पारीक के स्टोर्स में कार्यरत थे और मैं वहाँ से होम्योपैथी दवाएं खरीदता था। फिर डॉ खत्री के स्टोर्स से लेने लगा। हालांकि डॉ खत्री खुद दयालबाग के राधास्वामी सत्संग के सेक्रेटरी थे और उनको मेरे कम्युनिस्ट पार्टी से सम्बद्ध होने की जानकारी थी किन्तु व्यक्तिगत स्तर पर मधुर संबंध रहे। जब उनके दामाद साहब का स्टोर दयालबाग में खुल गया तब नजदीक होने के कारण उनसे दवाएं खरीदने लगे। वहाँ डॉ खत्री आते रहते थे और उनसे मुलाक़ात होती रहती थी। उनके दामाद डॉ डी डी पाराशर तो मुझे गुरु जी कहते थे और काफी सम्मान देते थे। आगरा छोडने तक इन दोनों से संपर्क बना रहा था।   

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शुक्रवार, 8 मई 2015

डॉ डी मिश्रा (होम्योपैथ ) :कुछ भूली बिसरी यादें (भाग-2 ) --- विजय राजबली माथुर

डॉ डी मिश्रा (होम्योपैथ ) :
https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/875505135844797

डॉ डी मिश्रा होटल क्लार्क शीराज, आगरा के पूर्व जेनरल मेनेजर के पुत्र तथा खुद पूर्व पाइलट आफ़ीसर थे। फ्लाईट लेकर लंदन जाते रहते थे अतः वहाँ की होम्योपैथी एकेडमी से डिग्री हासिल कर ली थी। पिता के 'लकवा' लग्ने परउनकी सेवा करने के लिए स्तीफ़ा देकर मेडिकल प्रेक्टिस करने लगे थे। उनसे मुलाक़ात इस वजह से हुई कि उनके कंपाउंडर के पिता की मृत्यु बंगलौर में हो गई थी जिसमें उनको जाना था लेकिन डॉ साहब ने उनसे शर्त रखी थी कि वह अपना रिपलेसमेंट देकर जाएँ तो चाहे जितने दिन भी बाद आयें वरना वह रिलीव नहीं करेंगे और बगैर रिपलेसमेंट देकर जाने पर वह जाब से हटा देंगे। वह कंपाउंडर हमारे एक परिचित डॉ के सहपाठी थे इसलिए मुझे जानते थे और यह भी कि होटल मुगल, आगरा में सुपरवाईजर अकाउंट्स के पद से सस्पेंड हो चुकने के कारण मेरे पास वक्त भी था। उन सज्जन ने अपनी मजबूरी में मदद करने का निवेदन किया और यह भी कि मैं डॉ मिश्रा को यह न बताऊँ कि मैं खुद 'आयुर्वेद रत्न', आर एम पी हूँ ।
दूसरों को मदद करने की आदत के कारण मैंने उनको रिलीव करा दिया। होम्योपैथी में दिलचस्पी व जानकारी मुझको बहुत पहले से थी अतः मैंने डॉ साहब को कोई दिक्कत न होने दी।हिसाब भी उनको इस प्रकार सौंपता था कि समझने में उनको दिक्कत न हो उसको तो उन्होने मेरी अकाउंट्स की जानकारी के संदर्भ में देखा किन्तु दवाएं मरीजों को देने व प्रयोग की विधि मरीजों को समझाने की मेरी विधि से वह खासे चकित थे। एक दिन डॉ साहब ने कंपाउंडर का नाम लेकर कहा कि उसको इतना समझाने व इतने दिन काम करने के बाद भी वह मरीजों को इस ढंग से नहीं समझा पाता है आपने अकाउंट्स में होते हुये भी क्या कमाल कर दिया है! मैंने डॉ साहब को बताया कि मेरे नानाजी डॉ राधे मोहन लाल माथुर साहब निशुल्क होम्योपैथी इलाज करते थे उनके साथ काफी रहने के कारण बचपन से समझता रहा हूँ। डॉ साहब को मुझसे आत्मीयता हो गई और समय मिलने पर यों ही बातें करते रहते थे।
डॉ साहब ने दैनिक दवाओं की तीन श्रेणियाँ बना रखी थीं : ए बी सी । ए-धनवानों की दर, बी- मध्यम वर्ग की दर और सी- निर्धनों के लिए दर। एक ही दवा की कीमत व्यक्ति की हैसियत के अनुसार अलग-अलग लेते थे एवं एक सफाई कर्मचारी की बारह वर्षीय पुत्री जिसके दिल में छेद था का इलाज वह निशुल्क कर रहे थे। अर्थात वह ही सच्चे कम्युनिस्ट थे जिसके अनुसार प्रत्येक से उसकी क्षमतानुसार व प्रत्येक को उसकी आवश्यकतानुसार देना होता है। (जबकि एक शीर्षस्थ कम्युनिस्ट मिश्रा जी की नीति है कि दलितों व पिछड़ों से काम तो लो पर उनको कोई पद न दो )।
आगरा यूनिवर्सिटी के निसंतान हेड क्लर्क जी पी माथुर साहब की पत्नी से वह 10 गुना अधिक चार्ज लेते थे क्योंकि वह जानते थे कि उनको सस्ती दवा देने पर वह डॉ साहब को मूर्ख समझेंगी । डॉ मिश्रा जी ने मुझसे पूछा था कि क्या मैं उनको जानता हूँ ? मैंने स्पष्ट कह दिया था कि हाँ जानता तो हूँ परंतु उनका रहस्य नहीं बताऊंगा। डॉ साहब की क्लब के साथी और उनके मित्र श्याम मेहरा साहब जिनका होटल मुगल में प्रिंटिंग कार्य चलता था और जिनको तमाम चेक मेरे द्वारा बनाए गए भुगतान हुये थे और वह दवा के भुगतान की हैसियत में थे किन्तु उनकी पत्नी का इलाज निशुल्क करते थे। एक रोज़ श्याम मेहरा साहब ने अपने सिर में चक्कर होने की बात कही तो डॉ साहब ने मुझसे बोला कि माथुर साहब श्याम बाबू को बी जी की एक डोज़ दे दीजिये। मैंने सादी गोलियों(BLANK GLOUBLES) को पुड़िया बना कर दे दिया। थोड़ी देर बाद डॉ साहब ने मेहरा साहब से पूछा कि श्याम बाबू कुछ आराम मिला वह बोले चक्कर कुछ कम तो हो गए हैं तब डॉ साहब ने उनको कुछ देर और रुके रहने को कहा कि बिलकुल आराम मिलने पर ही कार ड्राईव करें। पाँच मिनट बाद नार्मल होने की बात कह कर वह चले गए।
मैंने डॉ मिश्रा जी से पूछा कि आपने BG- सादी गोलियेँ दिलवाईं तो भी मेहरा साहब को फायदा हो गया? डॉ साहब का जवाब था कि श्याम बाबू को हुआ ही कुछ नहीं था वह तो अपनी मिसेज को जतलाना चाहते थे कि वही नहीं बीमार हैं खुद श्याम बाबू भी बीमारी के बावजूद इतनी मेहनत करते रहते हैं तो उनको सादी गोली नहीं देते तो दवा क्या देते?
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एक बार जान-पहचान हो जाने पर डॉ मिश्रा जी ने यदा-कदा मिलते रहने को कहा था और मैं उनसे मिलता भी रहता था। जीवनी मंडी , आगरा से जब उन्होने अपना क्लीनिक घटिया रोड पर स्थानांतरित कर लिया था तो मेरे बाज़ार जाते समय उन्होने आवाज़ देकर बुलाया और कहा कि " माथुर साहब दिस इज़ यौर क्लीनिक ,यू आर आलवेज मोस्ट वेलकम " । उनको मैंने बाद में बता भी दिया था कि मैंने 'आयुर्वेद रत्न' किया है तथा मेरा RMP रेजिस्ट्रेशन भी है। इसलिए उनको और भी दिलचस्पी हो गई थी। 
जब कम्युनिस्ट कर्ता-धर्ता मिश्रा जी का संकीर्ण दृष्टिकोण  देखता हूँ  तब डॉ डी मिश्रा जी की याद तीव्रतर हो जाती है। 

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