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गुरुवार, 6 जून 2013

हमें क्या करना चाहिए?---विजय राजबली माथुर

प्रत्येक व्यक्ति विभिन्न सोच रखता और तदनुरूप कार्य करता है। मेरा विचार अपने माता-पिता को कष्ट न पहुँचने देने का रहा है अतः मैंने भरसक प्रयास किया कि उनकी बातों को जैसे का तैसा पूरा किया जाये जैसा कि वे चाहते थे। मैं उनको पूर्ण संतुष्ट करने में कामयाब रहा या नहीं मैं खुद कोई दावा नहीं कर सकता। किन्तु दो वर्ष पूर्व लखनऊ आने पर छोटी बहन ने पूनम से कहा था कि माँ मेरा अत्यधिक पक्षपात करती थीं। मुझे नहीं लगता कि उन्होने छोटे भाई या बहन का ध्यान मुझ से कम रखा। बल्कि उन लोगों से ही मेरे बारे में भी सलाह लेती रहती थीं जो बात मुझे नागवार भी लगती थी। यहाँ तक कि,बहनोई साहब की एक भतीजी (जिसका खुलासा माता-पिता की मृत्यु के काफी बाद सिर्फ पाँच वर्ष पूर्व ही हुआ है और जिसे दो वर्ष पूर्व लखनऊ हमारे यहाँ आने पर खुद उन्होने स्वीकार भी किया है ) की नन्द से विवाह भी बहन-बहनोई की पसंद से ही तय किया गया था। परंतु बहन-बहनोई ने पत्नी के बाद माता-पिता से यशवन्त को हस्तगत करने का भी प्रयास किया था जिसे छोटे भाई की पत्नी ने विफल कर दिया था । यही कारण है कि माता-पिता की भी मृत्यु हो जाने पर उन लोगों ने तिकड़म से भाई को हमसे दूरी बनाने पर बाध्य कर दिया और हमें मिल कर हमें तबाह करने के षड्यंत्र में कुक्कू/पार्सल बाबू को लगा दिया। कुक्कू बहनोई साहब के बचपन के दोस्त व भतीज दामाद जो ठहरे। वे लोग आगरा छोडने के हमारे निर्णय के विरुद्ध थे। लेकिन मुझे यशवन्त की इच्छा को देखना चाहिए था या बहन/बहनोई की इच्छा को?

 स्वभाविक रूप से मैंने यशवन्त की इच्छा को वरीयता दी तो उन लोगों को नागवार लगना ही था। लिहाजा पूना निवासी हमारी छोटी भांजी ने ब्लाग्स में मेरे व यशवन्त के पोस्ट्स पर प्राप्त टिप्पणियों के सहारे टिप्पणी दाताओं की प्रोफाईल चेक कर -कर के कुछ ब्लागर्स को चुन कर हमारे विरुद्ध अपने पिता अर्थात हमारे बहनोई साहब के माध्यम से उकसाया। हैरानी की बात यह है कि ये पढे-लिखे और विद्वान ब्लागर्स कैसे किसी का निजी मोहरा बन गए और क्यों हमारे विरुद्ध लामबंदी में संलग्न हो गए?

दरियाबाद से संबन्धित एक ब्लागर और पटना से संबन्धित एक ब्लागर को इस आधार पर चुना गया कि वे पूनम की श्रीवास्तव बिरादरी से संबन्धित थे। इन लोगों में एक फिलहाल पूना प्रवासी है और हमारी भांजी के पड़ौस में भी रहना हुआ है। इनमें बी एस आर ने अपने रिश्तेदार एक प्रादेशिक राजनेता आर के  एल को जो उनके भाइयों के मोहल्लेदार भी हैं को हमें परेशान करने का कार्य सौंप रखा है। इन साहब को हमारे अपने पार्टी कार्यालय जाने पर भी आपत्ति है और फिर दोबारा आगरा न जाने पर भी। उनको यह जानने की उत्कंठा है कि मैं आगरा जाने पर किस-किस के यहाँ ठहर सकता हूँ। उनको यशवंत से कुछ कन्सेशनल और कुछ मुफ्त काम कराने एवं मुझसे निशुल्क दो जन्मपत्रियों का विश्लेषण कराने  के बाद भी हमारे परिवार के सभी सदस्यों पर नाहक तोहमत लगाने की एहसान फरामोशी करके आनंदानुभूति होती है। 

चूंकि लखनऊ यशवन्त की ख़्वाहिश के कारण आए थे अतः कानपुर के अपने संपर्कों द्वारा वहाँ जाब में उसकी भुआ द्वारा परेशान करवाया गया और मुझको सुझाव दिया गया कि मैं उससे जाब छुड़ा कर बहनोई साहब के मित्र बिल्डर के यहाँ जाब करने को कहूँ। परंतु मैंने उसको घर पर ही साईबर चलाने का प्रबंध कर दिया था। आर के एल के पेशेवर मित्र के माध्यम से उसे इस कार्य मे क्षति पहुंचाई गई। आर पी पी के माध्यम से पूना/पटना में जाब दिलवाने का उसे प्रलोभन दिया गया जिसके विफल होने पर उसे आर्थिक चोट पहुंचाने का उपक्रम किया गया। संबन्धित लोगों से कट आफ करने पर आर के एल आपत्ति करते हैं। वह इस पर भी आपत्ति करते हैं कि मैं अपनी पसंद की पार्टी में क्यों राजनीति में हूँ? आगरा में एक बार बहन ने भी पूनम से मेरे राजनीति में भाग लेने पर आपत्ति की थी। 

मैं यह समझने में असमर्थ हूँ कि मुझे क्यों किसी दूसरे की सलाह पर कार्य करने चाहिए?मैं खुद क्यों अपने निर्णय नहीं ले सकता?हमें क्या करना चाहिए ? क्यों दूसरे लोग हमें बिन सलाह मांगे बताना चाहते हैं कि हम क्या करें और क्या नहीं?सबसे बड़ा ताज्जुब तो यह होता है कि जिस श्रीवास्तव बिरादरी में डॉ राजेन्द्र प्रसाद जैसे राष्ट्रपति,लाल बहादुर शास्त्री जी जैसे प्रधानमंत्री और डॉ सम्पूर्णान्द जैसे संविधान शास्त्री हुये हों उस बिरादरी में हुये ब्लागर्स व राजनेता किस स्वार्थ/बुद्धिहीनता  के कारण  अपनी उसी बिरादरी की  पूनम का विरोध करने की हमारे बहन-बहनोई  की मुहिम का मोहरा क्यों बने हुये हैं?

 

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गुरुवार, 18 अगस्त 2011

आगरा /1984-85 (भाग-2)

नवंबर 1983 मे यशवंत का जन्म हुआ और जनवरी 1984 मे शालिनी के रेलवे वाले भाई शरद मोहन का विवाह हुआ अतः हम लोगों के शामिल होने का सवाल ही नहीं था ,बउआ ने पहले ही उन लोगों से कह दिया था जाड़ों मे छोटे बच्चे को नहीं भेजेंगे यदि शामिल करना चाहें तो गर्मियों मे शादी करे। इसी प्रकार 1982 मे नवंबर मे यशवंत के बड़े भाई के होने और न रहने के तुरंत बाद उन लोगों ने दिसंबर मे शालिनी की छोटी बहन सीमा की शादी की  थी अतः उसमे भी वह शामिल न हो सकी थी। मुझे झांसी जाना पड़ा था। वहाँ बहनोयी साहब बड़ी भांजी को लेकर शामिल हुये थे उनकी सीधे रिश्तेदारी थी (कूकू की पत्नी मधु उनकी भतीजी जो हैं)।

अगले दिन मै बहन के घर गया था । बड़ी भांजी का हाथ पकड़ कर( और छोटी भांजी को गोद लेकर ) उसी से रास्ता पूंछ कर मिठाई की दुकान पर जाकर शुगन की मिठाई लेकर दे दी थी। इसी छोटी भांजी की देवरानी की भाभी है कूकू की वही बेटी जो दिसंबर 1983 मे  सीमा की शादी मे मेरे गोद मे आकार चुप हो जाती थी और और लोगों के पास रो रही थी।

मेरे सस्पेंशन पीरियड मे ही यूनियन के वार्षिक चुनाव हो रहे थे मुझ पर साथियों का दबाव था जब मेनेजमेंट ने वादा तोड़ा है तो तुम भी चुनाव लड़ कर सक्रिय हो जाओ। मैं केम्पस के भीतर तो प्रचार कर नहीं सकता था बाहर ही थोड़ी देर लोगों से मिल लेता था। वोटिंग 10 जनवरी को हुयी थी,मतगणना स्लो स्पीड से करने की मेनेजमेंट की हिदायत थी। साथियों का कहना था परिणाम की घोषणा के वक्त मौजूद रहो। अतः घर पर देर से आने की खबर करने गया  तो वहाँ शालिनी की माता और छोटी भाभी संगीता मौजूद थे जो यशवंत के जन्म के बाद वहाँ से आने वाले पहले लोग थे। मै तो सूचना देकर और चाय पीकर वापिस होटल मुगल जो हमारे घर से 9 K M की दूरी पर था के लिए चला तभी आगंतुक लोग भी वापिस टूंडला लौट गए।

रात 10 बजे परिणामों का खुलासा किया गया प्रेसीडेंट की टीम के 11 मे 10 तथा मेरे टीम के 11 मे 1 जो खुद मै था जीते थे। कुल पड़े मतो मे सेकेंड हाएस्ट वोट मुझे मिले थे। मेनेजमेंट समर्थकों का कहना था जैसे फरनाडीज़ को जेल मे रहते हुये सहानुभूति के वोट मिले थे उसी प्रकार मुझे सस्पेंशन के कारण इतने अधिक मत मिल गए। जबकि हकीकत यह थी कि अपने सेक्रेटरी जेनरल रहते मैंने निचले पोस्ट के लोगों को जो लाभ दिलाये थे उन्हे वे भूले नहीं थे और पुराने उपकार का प्रतिफल उन्होने वोट के रूप मे दिया था।

14 जनवरी 1985 को मकर संक्रांति  के दिन शरद मोहन और उनकी पत्नी संगीता अपनी शादी की वर्षगांठ 16 जनवरी का निमंत्रण लेकर आए और चूंकी यशवंत के जन्म के बाद वहाँ से पहली बार वह आए थे  तो उसके लिए खिलौने-कपड़े,मिठाई भी लाये थे। कड़ाके की सर्दी मे यशवंत और शालिनी तो नहीं गए मुझे ही औपचारिकता निबाहनी पड़ी।

चूंकि मै कार्यकारिणी का चुनाव जीत गया था और इस कार्यकारिणी के सेक्रेटरी और प्रेसीडेंट मेनेजमेंट का खिलौना थे अतः कोई बैठक तब तक नहीं बुलाई गई जब तक 19 फरवरी 1985 को मुझे टर्मिनेशन लेटर नहीं पोस्ट कर दिया गया। नौकरी खोने के बाद............. 

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