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बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

लखनऊ पुनरागमन के चार वर्ष ---विजय राजबली माथुर

 लखनऊ से लखनऊ :
जन्म से लेकर 1961 में बाबूजी के बरेली तबादले तक लखनऊ में ही रहे थे और यहीं के डी पी निगम गर्ल्स जूनियर हाईस्कूल, हुसैनगंज से चौथी कक्षा उत्तीर्ण करके गए थे। नवंबर 1962 में बाबूजी का तबादला सिलीगुड़ी होने और सिलीगुड़ी के नान फैमिली स्टेशन होने के कारण शाहजहाँपुर में नानाजी के पास रहे। 1964 में सातवीं कक्षा पास करके सिलीगुड़ी गए और वहीं से हाईस्कूल की परीक्षा 1967 में पास करके शाहजहाँपुर से इंटर फर्स्ट ईयर1968 में  किया। 1969  में इंटर फ़ाईनल मेरठ से करके, मेरठ कालेज, मेरठ से स्नातक 1971 में किया और मई  1972 से  जून 1975 तक वहीं 'सारू स्मेल्टिंग प्रा लिमिटेड' के लेखा विभाग में कार्य किया। सितंबर 1975 से जनवरी 1985 तक 'होटल मुगल शेरटन, आगरा' में फिर मार्च - 2000 तक स्वतंत्र रूप से लेखा कार्य किया। फिर ज्योतिष  क्षेत्र को अपनाया। 

जून 2006 में  यशवन्त 'बिग बाज़ार', लखनऊ ट्रेनिंग पर आया और उसे लखनऊ इतना भाया कि उसने अपना जन्म स्थान आगरा छोड़ कर मेरे जन्म स्थान वापिस लौटने का प्रस्ताव रखा। 1978 से आगरा में अपने ही घर में रहते आने के कारण हम हड़बड़ी में नहीं थे। 2007 में वह तबादला कराकर मेरठ फिर मई 2009 में कानपुर आ गया अतः सितंबर 2009 में आगरा का मकान बेच कर हम 09 अक्तूबर को लखनऊ आ गए थे और नवंबर से अपना नया मकान लेकर यहाँ रह रहे हैं। 

 लखनऊ पुनरागमन  के चार वर्ष:
वैसे तो चार वर्षों का समय अत्यल्प ही है। परंतु इन चार वर्षों में काफी कुछ ऐसा घटित हुआ है जिसे घाटे का सौदा नहीं कह सकते हैं। हालांकि मई 2010 में कानपुर -बिग बाज़ार से रिज़ाईन करवाकर यशवन्त को लखनऊ बुलवा लेना पड़ा है । घर पर ही उसने कंप्यूटर संबंधी कार्य प्रारम्भ किया जिसे आर्थिक रूप से तो सफल नहीं कहा जा सकता है किन्तु ब्लाग-लेखन के क्षेत्र हम सभी को उसके माध्यम से एक अलग पहचान मिल सकी है।इस वर्ष  ब्लाग लेखन के एक सर्वे में यशवन्त का निजी ब्लाग -'जो मेरा मन कहे' व सामूहिक ब्लाग-'नई पुरानी हलचल' तथा मेरा ब्लाग-'क्रान्ति स्वर' तीन सौ हिन्दी ब्लाग्स के बीच स्थान प्राप्त कर सके   हैं।

'क्रांतिस्वर' मेरा पहला ब्लाग है जिसका प्रारम्भ जून 2010 से हुआ है। उसके बाद 'विद्रोही स्व स्वर में', 'कलम और कुदाल', 'जनहित में', और अभी कुछ माह पूर्व 'सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामयः' एवं 'साम्यवाद (COMMUNISM)' ब्लाग्स अपने चला रहा हूँ ।'जनहित' नामक एक फेसबुक ग्रुप भी जूलाई 2012 से संचालित कर रहा हूँ। दूसरों के विभिन्न ग्रुप्स में भी सक्रियता रहती है,  इनके अतिरिक्त पिछले एक वर्ष से श्रीमती जी के ब्लाग 'पूनम वाणी' का भी संचालन कर रहा हूँ। 

 परोपकार एवं सेवा भाव से हम लोगों का लेखन होता है किसी आर्थिक प्रलोभन से नहीं। अतः जहां सुयोग्य विद्वानों से सराहना मिलती है वहीं 'मेरा पेट हाऊ मैं न जानू काऊ' प्रवृति के लोगों से अवहेलना व निंदा भी। 

हमारे ब्लाग-लेखन व लखनऊ आने के कारण हमारी छोटी बहन-बहनोई हमसे बिदक गए। हमारे आगरा छोडने से पूर्व भी उन्होने कहा था कि या तो मैं उनके साथ मिल कर भोपाल में रहूँ  या पूनम के भाई साहब के साथ मिल कर पटना में। उनके अनुसार मुझे यशवन्त की पसंद को नज़रअंदाज़ करना चाहिए था जो मैंने नहीं किया। अतः मेरे साथ-साथ पूनम व यशवन्त भी उन लोगों के निशाने पर हैं। छोटी भांजी ने अपने पूना नगर में प्रवास कर रही पटना की एक ब्लागर को कालोनी की पड़ौसी होने के आधार पर गुमराह करके यशवन्त व मुझे परेशान करने हेतु प्रेरित किया। बहनोई साहब ने हमारे ताउजी के पुत्रों को गुमराह करके उनके माध्यम से हमारी कालोनी में ही हमें परेशान करने की व्यवस्था की। बाराबंकी/दरियाबाद के संपर्कों के आधार पर हमारी पार्टी भाकपा में शामिल कुछ पोंगापंथी  ब्लागर राजनीतिज्ञों   के माध्यम से हमारी स्थिति खराब करने के भी प्रयास  किए गए और किए जा रहे हैं ।

जहां तक हमारा प्रश्न है न तो हम राजनीतिक क्षेत्र का दुरुपयोग करके न ही ब्लाग क्षेत्र का दुरुपयोग करके आर्थिक कमाई करते हैं जो हमें किसी प्रकार का नुकसान इन हरकतों से हो सके। अतः हम प्रत्येक हमलावर का चाहे वह कितना भी समृद्ध व शक्तिशाली क्यों न हो डट कर मुक़ाबला करते हैं। 

एक ब्लागर साहब ने अपनी एक से अधिक पोस्ट्स में मेरे नामोल्लेख के साथ मेरे ब्लाग लेखन से दूर होने व फेसबुक में सक्रिय होने का वर्णन किया है। जबकि हकीकत यह है कि मेरे द्वारा संचालित ब्लाग्स की संख्या भी बढ़ी है और स्वभावत: पोस्ट्स की भी। मैं ब्लागर्स की आपसी गुटबाजी मे पड़े बगैर अपना लेखन जारी रखे हुये हूँ। 

 'साम्यवाद (COMMUNISM)' ब्लाग तो मुझको इसलिए बनाना पड़ा क्योंकि पार्टी के सामूहिक ब्लाग से हमारे एक राष्ट्रीय सचिव संबन्धित मेरी पोस्ट को डिलीट करके मुझे उसमें लेखन अधिकार से वंचित कर दिया गया था। ऐसा करने वाला यूनियन बैंक आफ इंडिया का कारिंदा पार्टी में दरियाबाद/बाराबंकी से संबन्धित गुमराह लोगों से प्रभावित है उसने बैंक व वकालत के लोगों को हमारी कालोनी में हमारे विरुद्ध  लामबंद कर रखा है।

कुल मिला कर  'लखनऊ पुनरागमन' हमें कुछ नए हौंसले ,नई सीख देने के कारण लाभप्रद ही रहा है बावजूद गंभीर   झंझावातों के।

   

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