रविवार, 5 मार्च 2017

यादों के तहखाने से ------ विजय राजबली माथुर

****** प्रो. माशूक अली साहब का संबंध शाहजहाँपुर म्यूनिसपेलटी के चेयरमैन रहे छोटे खाँ साहब के परिवार से था जिनके यहाँ लकड़ी का व्यापार होता था। अतः माशूक साहब वेतन नहीं लेते थे, प्रबन्धक उनको रिक्शा और पान का खर्च मात्र रु 150 / - उनको भेंट करते थे। वह हमारे नानाजी ( डॉ राधे मोहन लाल माथुर साहब ) के एक छोटे भाई हरीश चंद्र माथुर साहब के सहपाठी रहे थे इसलिए मेरे प्रति विशेष अनुराग रखते थे। वैसे वह सभी छात्रों के प्रिय थे। हमारे हरीश नाना जी को वह अक्सर ' सलाम ' कहने को कहते थे और नाना जी भी उनको मेरे द्वारा 'सलाम ' भेजते रहते थे। 
इसी प्रकार पंजाब नेशनल बैंक के एक ब्रांच मेनेजर साहब को भी उनके पुत्र द्वारा 'सलाम' का आदान - प्रदान वह करते रहते थे। उस छात्र ( अब मुझे नाम याद नहीं है ) को भी मेरी तारह ही विशिष्ट अनुराग उनसे मिलता था। किसी रोज़ रिक्शे से घर लौटते में उन्होने उसको कुछ गाते हुये सुन लिया था अतः अगले रोज़ कक्षा में उससे वह गाना सुनाने को कहा कुछ झिझकते हुये उनका आदेश न टाल सकने  के कारण उसको वह गाना सुनाना ही पड़ा ******

विगत माह की छह तारीख को शुभेच्छुओं को धन्यवाद की पोस्ट में श्रीमती जी ( पूनम ) का उल्लेख इसलिए नहीं था कि, प्रत्येक कार्य की संपन्नता में उनके आगमन के बाद से उनका योगदान रहता ही है और घर में हर बात के लिए धन्यवाद की औपचारिकता की आवश्यकता मेरे समझ से परे है। परंतु उनका तर्क है कि, यशवन्त का नाम तो दिया था। मेरे अनुसार पुत्र पत्नी का विकल्प नहीं होता। 

चाहें राजनीतिक गतिविधियां रही हों अथवा ड्यूटी से संबन्धित अथवा  सामाजिक एवं ज्योतिष से संबन्धित उन सब में ही पूनम का पर्याप्त योगदान रहा है। उनके योगदान के बगैर ज़रा भी आगे बढ़ना संभव नहीं था। 

इस पोस्ट के माध्यम से कुछ पुरानी यादों को पुनः प्रकाश में लाना उद्देश्य था। 50 वर्ष पूर्व 1967 में जब सिलीगुड़ी से स्कूल फ़ाईनल करने के बाद बाबू जी का औपचारिक ट्रांसफर आर्डर मिलने में विलंब था हम लोगों को पढ़ाई खराब होने से बचाने के लिए माँ के साथ नानाजी के पास शाहजहाँपुर भेज दिया था। सितंबर माह में दाखिले में काफी दिक्कत आई क्योंकि न तो बाबू जी का ट्रांसफर वहाँ हुआ था और न ही स्कूल कालेज्स में जगहें बची थीं और जिन विषयों को मैं लेना चाहता था न ही  उनका कांबीनेशन सुलभ था। बहन को दाखिला मिशन स्कूल, बहादुर गंज में व भाई को उसी मिशन स्कूल में दाखिला मिल गया था जिसमें क्रांतिकारी राम प्रसाद 'बिस्मिल' जी भी पढे थे। 
 जी एफ कालेज,कैंट के प्रिंसिपल चौधरी मोहम्मद वसी  साहब ने सहर्ष मेरे मन पसंद विषयों सहित इंटर फर्स्ट ईयर में दाखिले की अनुमति दे दी।उस समय इस कालेज में इंटर और बी ए की कक्षाएं चलती थीं अब यह एम ए तक हो गया है और इंटर कक्षाओं को इस्लामिया इंटर कालेज के साथ सम्बद्ध कर दिया गया है। सिविक्स के प्रोफेसर आर के इस्लाम साहब और हिस्ट्री के प्रोफेसर  माशूक अली साहब  विषय के साथ - साथ ज्ञान वर्द्धक सामान्य चर्चा भी किया करते थे। 
प्रो. माशूक अली साहब का संबंध शाहजहाँपुर म्यूनिसपेलटी के चेयरमैन रहे छोटे खाँ साहब के परिवार से था जिनके यहाँ लकड़ी का व्यापार होता था। अतः माशूक साहब वेतन नहीं लेते थे, प्रबन्धक  रिक्शा और पान का खर्च मात्र रु 150 / - उनको भेंट करते थे। वह हमारे नानाजी ( डॉ राधे मोहन लाल माथुर साहब ) के एक छोटे भाई हरीश चंद्र माथुर साहब के सहपाठी रहे थे इसलिए मेरे प्रति विशेष अनुराग रखते थे। वैसे वह सभी छात्रों के प्रिय थे। हमारे हरीश नाना जी को वह अक्सर ' सलाम ' कहने को कहते थे और नाना जी भी उनको मेरे द्वारा 'सलाम ' भेजते रहते थे। 

इसी प्रकार पंजाब नेशनल बैंक के एक ब्रांच मेनेजर साहब को भी उनके पुत्र द्वारा 'सलाम' का आदान - प्रदान वह करते रहते थे। उस छात्र ( अब मुझे नाम याद नहीं है ) को भी मेरी तारह ही विशिष्ट अनुराग उनसे मिलता था। किसी रोज़ रिक्शे से घर लौटते में उन्होने उसको कुछ गाते हुये सुन लिया था अतः अगले रोज़ कक्षा में उससे वह गाना सुनाने को कहा कुछ झिझकते हुये उनका आदेश न टाल सकने  के कारण उसको वह गाना सुनाना ही पड़ा , लीजिये  आप भी सुनिए ------

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सोमवार, 6 फ़रवरी 2017

शुभेच्छुओं को धन्यवाद ------ विजय राजबली माथुर

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कल फेसबुक पर 65 वर्ष व्यतीत होने पर 66वें जन्मदिवस पर जिन लोगों ने बधाई व शुभकामनायें प्रेषित की हैं लगभग सभी को धन्यवाद प्रेषित किया है , परंतु यदि किसी को छूट गया हो तो उन सभी जनों को एक बार फिर  हार्दिक धन्यवाद।  वैसे प्लेटो के कथनानुसार तो अधिकांश लोग मुझसे नफरत ही करते हैं फिर भी सोशल मीडिया फेसबुक के जरिये इतने लोगों की सद्भावनाएं प्राप्त होना आश्चर्यजनक भी है। कुछ के कमेंट्स संग्रहीत करने के उद्देश्य से यहाँ संकलित कर लिए हैं। 


यशवंत राजबली माथुर द्वारा 









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सोमवार, 9 जनवरी 2017

ये चुनाव तय करेंगे भविष्य की बुनियाद : सहानुभूति लहर का फायदा पाएँगे अखिलेश यादव ------प्रो .मनीषा प्रियम / रजनीश कुमार श्रीवास्तव












Rajanish Kumar Srivastava
02-01-2016  · 
जनाब यू०पी० चुनाव में साईकिल फ्रीज होगी और फिर मोटरसाईकिल फर्राटे से दौड़ेगी।आश्चर्य ना कीजिएगा यह सत्य होने जा रहा है।यू०पी० चुनाव के मद्देनजर मेरा विश्लेषण है कि अगर प्रचार के चकाचौंध से इतर जमीनी हकीकत की पड़ताल की जाए तो आज भी यू०पी० का चुनाव सपा(अखिलेश यादव) के सम्भावित महागठबंधन और बसपा के बीच ही सिमटने जा रहा है।कारण बहुत स्पष्ट है कि एक ओर मुख्यमंत्री का चेहरा होंगे युवा अखिलेश यादव तो दूसरी तरफ मुख्यमंत्री का चेहरा होंगी सुश्री मायावती।लेकिन भाजपा ने रणनीतिक गलती करते हुए मुख्यमंत्री का चेहरा किसी को ना बनाने की रणनीति अपनाई है।बिना नरेन्द्र मोदी के भाजपा का अपना वोट यू०पी० में 15% से ज्यादा कतई नहीं हैं।यह मोदी फैक्टर था जिसने लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 30% वोटों तक पहुँचा दिया था। इस पृष्ठभूमि में केन्द्र सरकार भी आधा से ज्यादा कार्यकाल बिताने के बाद भी किसानों और मजदूरों के खाते में कोई ऐसी उपलब्धि नहीं डाल सकी है जिससे ग्रामीण क्षेत्र में वैसी मोदी लहर आ सके जैसी लोकसभा चुनाव में पैदा की गयी थी। लिहाजा मुख्य मुकाबला 25% से 30% तक का अक्षुण जनाधार रखने वाली बसपा और सपा (अखिलेश यादव) महागठबंधन के बीच होने जा रहा है।इसमें भी बेहतर रणनीतिक तैयारी की वजह से अखिलेश यादव महागठबंधन बड़ी जीत हासिल कर लेगा।कैसे चलिए एक पड़ताल की जाए:--
सपा में मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव खेमें की वर्तमान लड़ाई अखिलेश यादव का सबसे बड़ा मास्टर स्ट्रोक है।बेहद स्मार्ट मूव के तहत अखिलेश खेमें ने अपनी वर्तमान चुनौतियों को एक लाभ के अवसर के रूप में परिवर्तित कर लिया है।गुँण्डागर्दी के आरोप वाली परम्परावादी समाजवादी पार्टी से पीछा छुड़ा लिया है और गुण्डों और बाहुबलियों के विरुद्ध संघर्ष करने वाली और केवल विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ने की घोषणा करने वाली प्रगतिशील पार्टी की छवि बखूबी गढ़ ली है।पार्टी के इस अंदरूनी संघर्ष को जानबूझकर अखिलेश यादव ने चुनाव के समय नजदीक आने पर निर्णायक मोड़ दिया है और प्लान A और प्लान B दोनों तैयार रखें हैं।मुलायम खेमा चारो खाना चित गिरने जा रहा है।अब जबकि पार्टी में चुनाव चिन्ह का मामला चुनाव आयोग की दहलीज पर पहुँच चुका है तो अखिलेश खेमा तय रणनीति के तहत जानता है कि इतना कम समय चुनाव में बचा है कि चुनाव आयोग के सामने साईकिल चुनाव चिन्ह फ्रीज करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता शेष नहीं हैं ऐसे में अखिलेश खेमें ने प्लान B के तहत एक सुरक्षित पार्टी #समाजवादी जनता पार्टी# का इंतजाम पहले से सुरक्षित कर लिया है जिसका चुनाव चिन्ह है मोटरसाईकिल।जबकि मुलायम खेमा बिना तैयारी के इतना मुलायम हो जाएगा जहाँ बचेगी तो सिर्फ भगदड़। यहाँ अखिलेश यादव जहाँ एक तरफ एण्टी इन्कम्बेन्सी वाली सारी विरासत को पीछे छोड़कर प्रगतिशील पार्टी के रूप में सहानुभूति लहर का फायदा पाएँगे वहीं दूसरी तरफ महागठबंधन की बड़ी ताकत के साथ लगभग तीन सौ सीटों पर फर्राटे से मोटरसाईकिल चलाते हुए दमदारी से विधानसभा भवन में प्रवेश कर जाएँगे।यानी जिसका जलवा कायम है उसका बाप मुलायम है। चुनाव परिणाम बताएगा कि मेरा विश्लेषण कितना सही है।

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1770129799978293&set=a.1488982591426350.1073741827.100009438718314&type=3
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विभिन्न विश्लेषण व विचार पहली जनवरी के विशेष सपा अधवेशन के संबंध में आप देख पढ़ रहे हैं। हम यहाँ केवल ग्रह - नक्षत्रों का विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं । 01-01-2017 को प्रातः 11:30 पर सपा के विशेष प्रतिनिधि सम्मेलन में मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव को पार्टी अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव प्रस्तुत हुआ जो सर्व - सम्मति से स्वीकृत हुआ।
*यह समय चंद्र महादशा में गुरु की अंतर्दशा का हुआ जो सामान्य है और 13 दिसंबर 2017 तक रहेगा,  इसीलिए उनके लिए स्थितियाँ भी सामान्य ही बनी रहीं और बनी रहेंगी। फिर 13 जूलाई 2019 तक शुभ समय रहेगा। 13 मार्च 2023 तक श्रेष्ठ समय भी रहेगा लेकिन 13 जूलाई 2019 से 12 दिसंबर 2020 तक बीच के समय में ज़रूर सतर्कता पूर्वक चलना होगा। 
* उस समय लखनऊ में कुम्भ लग्न चल रही थी जो एक स्थिर राशि की लग्न है ।यही कारण है कि, यह पद  चुनाव स्थिर रहने वाला है  और सभी सम्झौता प्रस्ताव किसी भी कारण से असफल रहे हैं। लग्न में ही मंगल, केतू व शुक्र ग्रह स्थित हैं। जहां मंगल, केतु नेतृत्व क्षमता में दृढ़ता के परिचायक हैं वहीं शुक्र सौम्यता, मधुरता व दूरदर्शिता के लक्षण बताता है जिस कारण वह किसी दबाव या प्रलोभन में झुक न सके । 
* दिवतीय भाव में जो राज्यकृपा का होता है मीन लग्न स्थित है जिसका स्वामी ब्रहस्पति अष्टम भाव में बैठ कर पूर्ण सप्तम दृष्टि से उसे देख रहा है। अतः उन पर आगे भी राज्य - योग कृपा बनाए रखेग। 
*तृतीय भाव में जो जनमत, पराक्रम व स्वाभिमान का होता है मेष लग्न स्थित है जिसका स्वामी मंगल लग्न में ही बैठ कर अनुकूलता प्रदान कर रहा है और इसी कारण पार्टी पदाधिकारियों के 90 प्रतिशत का समर्थन ही उनको न केवल मिला वरन जनमत सर्वेक्षणों में भी लोकप्रियता हासिल रही है। इस प्रकार उनका स्वाभिमान आगे भी बरकरार रहने की संभावनाएं बनी हुई हैं। 
*चतुर्थ भाव में जो लोकप्रियता व मान -सम्मान का होता है वृष राशि स्थित है जिसका स्वामी लग्न में बैठ कर उनमें दूरदर्शिता का संचार कर रहा है अतः आगामी चुनावों में भी उनको इसका लाभ मिलने की संभावनाएं मौजूद हैं। 
*पंचम भाव में जो लोकतन्त्र का होता है मिथुन लग्न स्थित है जिसका स्वामी बुध लाभ के एकादश भाव में सूर्य के साथ स्थित है। बुध सूर्य के साथ होने पर और अधिक बलशाली हो जाता है तथा सूर्य - बुध मिल कर आदित्य योग भी बनाते हैं जो कि, राज्य योग होता है। अतः चुनावों में अखिलेश जी की सफलता लोकतन्त्र को मजबूत करने वाली ही होगी क्योंकि इससे फासिस्ट शक्तियों को मुंह की खानी पड़ेगी। 
*सप्तम भाव में जो सहयोगियों, राजनीतिक साथियों व नेतृत्व का होता है सिंह राशि स्थित है जिसका स्वामी सूर्य एकादश भाव में गुरु की राशि धनु में बुध के साथ स्थित है। इसके अतिरिक्त इस भाव में राहू भी बैठ कर कुम्भ लग्न को देख रहा है जो उसकी अपनी राशि भी मानी जाती है। इस प्रकार अखिलेश जी अपनी पार्टी के बुद्धिजीवियों, नेताओं और साथियों में अधिकांश का समर्थन पाने में सफल रहे हैं जो फिलहाल जनतंत्र व जनता के लिए उत्तम स्थितियों का ही संकेत करता है। उम्मीद है कि, अपने बुद्धि कौशल से वह ग्रहों की अनुकूलता का पूर्ण लाभ उठाने में सफल रहेंगे। 
(विजय राजबली माथुर )
https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/1297391700322803


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मंगलवार, 3 जनवरी 2017

कहते हैं लालाजी निर्मल साहब : 'अगर आप धनपशु नहीं हैं तो आज की राजनीति में सर्वाईव नहीं कर सकते' ------ विजय राजबली माथुर



हिंदुस्तान,लखनऊ,02-01-2016,पृष्ठ ---02

वर्ष 1979 में  RSS (राजनारायन संजय संघ ) के सहयोग से चौधरी चरण सिंह जी प्रधानमंत्री बन चुके थे और उनके भांजे साहब को होटल मौर्य कर्मचारी संघ ,दिल्ली का अध्यक्ष बना दिया गया था जो आगरा आकर होटल मुगल कर्मचारी संघ के पदाधिकारियों को दिल्ली  आमंत्रित कर गए थे। आगरा से पाँच प्रतिनिधि दिल्ली गए थे जिनमें महामंत्री की हैसियत से मैं भी शामिल था। लौटते में G T एक्स्प्रेस में हमारे साथियों का सीट को लेकर विवाद जिन सज्जन से हुआ वह डॉ राजेन्द्र कुमारी बाजपेयी (राज्यसभा सदस्य एवं यू पी की पूर्व विद्युत मंत्री ) के भांजे साहब थे। मैंने उनको बैठने का स्थान उपलब्ध करा दिया और चर्चा के दौरान उनसे उनके राजनीति में शामिल होने के बारे में  उनके विचार पूंछे । वह तब बिजनेस प्रारम्भ किए ही थे और उनका कहना था कि, जब पर्याप्त धन जुटा लेंगे तभी राजनीति में उतरेंगे; मेरे लिए भी उनका सुझाव था कि, यदि मुझे राजनीति में आना हो तो पहले बिजनेस करके धन एकत्र करूँ तभी आऊँ वरना कामयाब नहीं हो पाऊँगा। आज की परिस्थितियों में उनका कथन अक्षरश : सत्य प्रतीत होता है।

सारू स्मेल्टिंग कर्मचारी  संघ,मेरठ  की कार्यकारिणी और फिर होटल मुगल कर्मचारी संघ, आगरा के महामंत्री रह चुकने के बाद AITUC की मार्फत भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, आगरा के ज़िला कोषाध्यक्ष के रूप में भी कार्य कर चुका हूँ तथा सक्रिय राजनीति में भी शामिल रहता हूँ लेकिन कोई बिजनेस या व्यवसाय न करने के कारण वरिष्ठ नेताओं को प्रभावित कर पाने  में असमर्थ रहता हूँ। बीच मे (बाद में 2006 में पुनः भाकपा में वापिस लौट चुका हूँ और अब लखनऊ में सक्रिय हूँ  ज़िला काउंसिल में भी रहा हूँ )जब कामरेड मित्रसेन यादव जी के साथ  सपा में रहा था तब आगरा में नगर कार्यकारिणी में भी मुझे शामिल किया गया था। जब  2002 में आगरा मे सपा का विशेष राष्ट्रीय अधिवेन्शन हुआ था तब नगर महामंत्री फारुखसियर ने मुझसे पूछा था आपके पास वाहन क्या है? मेरे जवाब देने पर कि, साईकिल वह बिदक गए थे, मतलब कि, साधन - सम्पन्न होना ही सफलता का मंत्र था और यहाँ फिर 1979 में मिले रेल यात्री बाजपेयी साहब का कथन सत्य हो रहा था।
अभी सपा में जो राजनीतिक घमासान दीख रहा है वह वस्तुतः आर्थिक घमासान है जैसा कि, किरण्मय नंदा साहब ने कहा भी है कि, अमर सिंह सपा में व्यापार करने आए थे। मूलतः अमर सिंह राजनीतिज्ञ नहीं विशुद्ध व्यापारी ही हैं। जब वीर बहादुर सिंह जी यू पी के सिंचाई विभाग में ठेकेदार थे तब अमर सिंह जी उनके साथ पेटी ठेकेदार थे। वीर बहादुर जी कांग्रेस सरकार में सिंचाई मंत्री ही बनते थे क्योंकि उसी विभाग में उनका बिजनेस चलता था , मुख्यमंत्री होते हुये भी सिंचाई विभाग अपने ही पास रखे रहे थे। उसी समय विरोधी दल के नेता मुलायम सिंह जी को वीर बाहादुर सिंह जी के गोपनीय सूत्र उपलब्ध कराते रहने के कारण  उनके हितैषी बन गए  और आज भी बने हुये हैं पूर्व सिंचाई मंत्री शिवपाल सिंह जी भी उनके चहेते हैं। सिंचाई विभाग की ठेकेदारी से ही अपना बिजनेस बढ़ाते हुये आज उद्योगपति बन चुके हैं और राजनीति को प्राभावित करने की अपार क्षमता अर्जित कर चुके हैं।

वर्तमान परिस्थितियाँ भी उस व्यापारिक गतिविधि से उत्पन्न हुई हैं जिसे ZEE NEWS के मालिक सुभाष चंद्रा  साहब के राज्यसभा सदस्य बनने के उपलक्ष्य में दी गई अमर सिंह जी की पार्टी में जन्म मिला था। भाजपा के ज़ी न्यूज़ वाले अमर सिंह जी के सहयोग से यू पी में अपना बिजनेस खड़ा करना चाहते थे जिसमें मुख्यसचिव दीपक सिंघल का सहयोग मिलता। इसी कारण मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जी ने राहुल भटनागर साहब को सिंघल साहब के स्थान पर मुख्यसचिव बना दिया था जिसकी कीमत उनको यू पी सपा के अध्यक्ष पद से हटने  के रूप में चुकानी पड़ी। चूंकि भाजपा सांसद यू पी में अपना बिजनेस नहीं जमा सके तो अमर सिंह जी के माध्यम से अखिलेश यादव जी के समक्ष पारिवारिक - राजनीतिक संकट खड़ा कर दिया गया। वर्तमान परिस्थितियों  में जनतंत्र समर्थक और सांप्रदायिकता विरोधी शक्तियों को एकजुट होकर अखिलेश यादव जी का ठोस समर्थन करना चाहिए अन्यथा 2019 में फासिस्ट शक्तियाँ और मजबूत होकर सामने आ सकती हैं।


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04-01-2017 
04-01-2017 

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गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

यह नोटबंदी उथल पुथल और विनाश का पूर्व संकेत है ------ विजय राजबली माथुर

22-12-2016 






***                                  ***                                                ***

नोटबंदी लागू हुये 45 दिन बीत गए हैं(जिसकी घोषणा 08 नवंबर, 2016 दिन मंगलवार को धनिष्ठा नक्षत्र , पंचक के दौरान रात्रि 08 : 00 से 08 :30 के मध्य हुई थी इसी के मध्य 08 : 13 से स्थिर  'वृष लग्न ' समाप्त होकर द्वि स्वभाव  'मिथुन लग्न ' प्रारम्भ ) और जनता की समस्याएँ सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ही जा रही हैं। इस पर सामाजिक चिंतकों व राजनेताओं ने अपने अपने  विश्लेषण प्रस्तुत किए हैं लेकिन हम यहाँ पर इसका ज्योतिषीय विश्लेषण इसलिए प्रस्तुत कर रहे हैं , क्योंकि मुंबई के एक ज्योतिषी का सहारा लेकर टी वी चेनल्स के माध्यम से इसे जन हितैषी कदम सिद्ध करने के भ्रामक  प्रयास सतत किए जा रहे हैं। हमारा यह विश्लेषण 'चंड मार्तंड पंचांग', निर्णय सागर में पूर्व प्रकाशित (पृष्ठ --- 46 से 50 तक ) तथ्यों पर आधारित है।

17 अक्तूबर से प्रारम्भ 14 नवंबर तक के ' कार्तिक ' मास में 5 रविवार थे और दीपावली भी रविवार को ही थी इसका परिणाम जो वर्णित है का अवलोकन करें :
दीपोत्सव रविवार का प्रतिभारक अधियोग। नहीं मन्दी की धारणा गृहिणी पक्ष  कुयोग । ।
धन - वृद्धि श्री मन्त की, निर्धन  विषय वियोग। साधन सुविधा नित्य की , निर्णय चक्र कुयोग। ।

चलन कलन  शनि भौम का, राशि भाव संबंध। अनहोनी होनी बने, गोचर फलित प्रबंध। ।
दल विरोध की जागृति, नायक सत्ता द्वंद। राज काज विपदा गति, निर्णय कथन द्वंद। । ***)

*** )  =  घोषणा के समय 'मंगल ' शनि की राशि 'मकर ' में था और 'शनि ' मंगल की राशि 'वृश्चिक ' में था अर्थात परस्पर विरोधी व शत्रु ग्रहों में परस्पर संबंध था । यही कारण है कि, इस घोषणा ने निर्धन वर्ग की कमर तोड़ दी तथा साधन सम्पन्न लोगों ने भरपूर लुत्फ उठा लिया जबकि अर्थ व्यवस्था बुरी तरह से ध्वस्त हो गई। इसका असर दीर्घकालीन होगा जिसके कारण शासकों की गद्दी हिले बगैर न रहेगी। जनाक्रोश को बदलते निर्णयों से थामा नहीं जा सकेगा।

15 दिसंबर दिन गुरुवार को 'सूर्य ' गुरु की धनु राशि में आ गया है और आगामी 'अमावस्या ' 29 दिसंबर दिन गुरुवार को पड़ रही है । इस स्थिति  ( खप्पर योग ) का भी अवलोकन करें :
"यस्मिन वारेअस्ति ....................जीव धान्यादि नाशक : "
अर्थात ---
रवि संकर्मण वार वो , मावस वो हो वार। ' खप्पर योग ' कहते इसे, शुभ लक्षण नहीं सार। । 
वित्त व्यवस्था विश्व की, असंतुलित परिवेश । मुद्रा कोष आर्थिक विषय, चिंतन देश विदेश। । 

वस्तु नित्य उपयोग की, उन्नत भाव विशेष। गृहिणी लेवे आपदा, ग्रह गोचर संदेश । । 
मंगसर एवं अग्रिम मास, पक्ष  शुक्ल में तिथि विनाश । नायक नेता - दल संताप, राजतंत्र बाधित अवकाश। । *****)

*****) =   आप एथीस्ट ( नास्तिक ) हैं अर्थात आपको अपने ऊपर विश्वास नहीं है , आप नहीं मानते तो न मानें क्या इससे ग्रह - नक्षत्रों की चाल को रोक या बदल सकेंगे?  या आप पौराणिक पोंगापंथी हैं और गलत अर्थ निकाल कर खुद गुमराह हैं और जनता व शासकों को गुमराह कर रहे हैं तो उनको तो गफलत में डाल कर उनका नुकसान तो कर सकते हैं लेकिन आप इस प्रक्रिया से ग्रह - नक्षत्रों की चाल को रोक या बदल नहीं सकते। ग्रह - नक्षत्रों के अरिष्ट का शमन करने की जो वैज्ञानिक प्रक्रिया है उसी को अपनाना होगा पौराणिक या पाखंडी प्रक्रिया को नहीं। कितना ही हास्यास्पद है कि, एक तरफ तो पौराणिक पाखंडी वैज्ञानिक प्रक्रिया का विरोध करते हैं और दूसरी तरफ खुद को वैज्ञानिक होने का दावा करने वाले एथीज़्म ( नास्तिकता ) की सनक में वास्तविक वैज्ञानिक प्रक्रिया को अवैज्ञानिक बता कर पौराणिक पाखंडी लोगों के लिए खुला मैदान उपलब्ध कराते हैं । इस द्वंद में पिसती साधारण जनता है उसी का शोषण व उत्पीड़न होता है। और यही हुआ है भारत में भी, वेनेजुएला और पाकिस्तान में भी। विश्व व्यापी आर्थिक उथल पुथल समृद्ध वर्ग की साज़िशों का ही दुष्परिणाम है और ग्रह - नक्षत्रों की चाल से यह पहले ही स्पष्ट था। 

  ध्यान कौन देता ? समृद्ध वर्ग के हितैषी शासक वर्ग द्वारा ध्यान देने का प्रश्न ही नहीं था। जन हितैषी होने का दावा करने वाले तो एथीस्ट ( नास्तिक ), वैज्ञानिक  जो ठहरे ? यही वजह है कि, उत्तर प्रदेश में सपा सरकार के पदारूढ़ होते ही जो संकेत स्पष्ट दिये थे उनकी अनदेखी की गई लेकिन ग्रह - नक्षत्रों की चाल को बदला न जा सका यथा ---
Friday, March 16, 2012

ग्रहों के आईने मे अखिलेश सरकार
"ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार के मध्य काल तक पार्टी मे अंदरूनी कलह-क्लेश और टकराव बढ़ जाएँगे। ये परिस्थितियाँ पार्टी को दो-फाड़ करने और सरकार गिराने तक भी जा सकती हैं। निश्चय ही विरोधी दल तो ऐसा ही चाहेंगे भी।*****"
http://krantiswar.blogspot.in/2012/03/blog-post_16.html

'खप्पर योग ' के साथ साथ आगामी 'माघ ' मास की 'पूर्णिमा' का क्षय हो रहा है 10 फरवरी 2017 को अतः तैयार रहिए शासक - शासित संघर्ष के लिए यह नोटबंदी उथल  पुथल और विनाश का पूर्व संकेत है। 
22-12-2016 

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फेसबुक कमेंट्स : 
22-12-2016 
24-12-2016 




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शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

क्या आज 'गर्म हवा ' के संदेश की ज़रूरत है ? ------ विजय राजबली माथुर



परिस्थियोंवश 1985 से 2000 तक आगरा के  हींग की मंडी  स्थित शू चैंबर की दुकानों में लेखा कार्य (ACCOUNTING ) द्वारा आजीविका निर्वहन करना पड़ा है। प्रत्यक्ष  रूप से जूता कारीगरों की समस्या को देखा समझा भी है कि, किस प्रकार थोक आढ़तिये  असली निर्माताओं का शोषण करते हैं। इसलिए जबसे गरम हवा का ज़िक्र सुना था इसका अवलोकन करना चाह रहा था ।  प्रस्तुत चित्र में जूता फेकटरी के मालिक सलीम मिर्ज़ा ( बलराज साहनी साहब ) पाकिस्तान से आए सिन्धी कारोबारियों के व्यवसाय और अपने करीबियों के पाकिस्तान चले जाने के बाद की स्थितियों से निबटने के लिए खुद भी कारीगरी करते हुये दिखाई दे रहे हैं। देश विभाजन के बाद भारत से गए मुस्लिम पाकिस्तान में और वहाँ से आए सिन्धी- पंजाबी यहाँ व्यवसाय में समृद्ध हो गए जबकि यहीं देश से लगाव के चलते रह गए मुस्लिम सलीम मिर्ज़ा की ही तरह दाने दाने को मोहताज हो गए। एक बार पलायन का विचार लाकर भी सलीम मिर्ज़ा (बलराज साहनी ) और उनका छोटा पुत्र सिकंदर (फारूख शेख ) कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा रोज़ी रोटी के संघर्ष में शामिल हो गए और देशवासियों की बेहतरी के पुण्य कार्य में लग गए। यही संदेश सथ्यु साहब द्वारा इस फिल्म के माध्यम से दिया गया है। 

जबसे केंद्र में भाजपा के पूर्ण बहुमत की सरकार बनी है निरंतर रोजगार में गिरावट हुई है और सांप्रदायिक दुर्भावना का तीव्र विस्तार हुआ है। आज़ादी के समय की कम्युनिस्ट पार्टी आज कई कई पार्टियों  में बंट गई है और उनका आंदोलन जनता को आकर्षित करने में विफल है। नोटबंदी अभियान के बाद जनता त्रस्त है और भयभीत भी लेकिन 'एथीस्ट्वाद' : नास्तिकता रूपी दीवार खड़ी करने  के कारण कम्युनिस्ट नेतृत्व ने जनता  को अपनी ओर आने से रोक रखा है। आज जब जरूरत थी कि, पाखंडी सरकार का पर्दाफाश करके उसे जनता के समक्ष अधार्मिक सिद्ध कर दिया जाता और भारतीय वांगमय के आधार पर जनता को कम्यूनिज़्म की ओर ले आया जाता तो केंद्र में भी उसी प्रकार कम्युनिस्ट सरकार लोकतान्त्रिक तरीके से स्थापित हो जाती जिस प्रकार केरल में विश्व की प्रथम निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार बनी थी। काश गरम हवा कम्युनिस्ट नेतृत्व को 'एथीस्ट्वाद' : नास्तिकता रूपी दीवार ढहाने में मदद कर सके और देश की जनता फ़ासिज़्म की जकड़न में फँसने से बच जाये। 

संदर्भ : फिल्म गर्म हवा 





एम एस सथ्यू साहब से संवाद करते प्रदीप घोष साहब 





प्रथम पंक्ति में राकेश जी, विजय राजबली माथुर, के के वत्स 


लखनऊ में दिनांक 04 फरवरी, 2016 को कैफी आज़मी एकेडमी , निशांतगंज के हाल में सुप्रसिद्ध फिल्म निर्देशक मैसूर श्रीनिवास सथ्यू साहब के साथ 'सिनेमा और सामाजिक सरोकार' विषय पर एक संवाद परिचर्चा का आयोजन कैफी आज़मी एकेडमी और इप्टा के संयुक्त तत्वावधान में किया गया था ।  
अपनी सुप्रसिद्ध फिल्म 'गर्म हवा' का ज़िक्र करते हुये सथ्यू साहब ने बताया  था कि ,यह इस्मत चुगताई की कहानी पर आधारित है किन्तु इसके अंतिम दृश्य में जिसको प्रारम्भ में पर्दे पर दिखाया गया था - राजेन्द्र सिंह बेदी की कहानी के कुछ अंशों को जोड़ लिया गया था। इस दृश्य में यह दिखाया गया था कि किस प्रकार मिर्ज़ा साहब (बलराज साहनी ) जब पाकिस्तान जाने के ख्याल से तांगे पर बैठ कर परिवार के साथ निकलते हैं तब मार्ग में रोज़ी-रोटी, बेरोजगारी, भुखमरी के प्रश्नों पर एक प्रदर्शन मिलता है जिसमें भाग लेने के लिए उनका बेटा (फारूख शेख जिनकी यह पहली फिल्म थी  ) तांगे से उतर जाता है बाद में अंततः मिर्ज़ा साहब तांगे पर अपनी बेगम को वापिस हवेली भेज देते हैं और खुद भी आंदोलन में शामिल हो जाते हैं। 

एक प्रश्न के उत्तर में सथ्यू साहब ने बताया था कि 1973 में 42 दिनों में 'गर्म हवा' बन कर तैयार हो गई थी। इसमें इप्टा आगरा के राजेन्द्र रघुवंशी और उनके पुत्र जितेंद्र रघुवंशी (जितेंद्र जी के साथ आगरा भाकपा में कार्य करने  व आदरणीय राजेन्द्र रघुवंशी जी को सुनने का सौभाग्य मुझे भी प्राप्त  हुआ है ) आदि तथा दिल्ली इप्टा के कलाकारों ने भाग लिया था। ताजमहल व फ़तहपुर सीकरी पर भी शूटिंग की गई थी। इप्टा कलाकारों का योगदान कला के प्रति समर्पित था। बलराज साहनी साहब का निधन हो जाने के कारण उनको कुछ भी न दिया जा सका बाद में उनकी पत्नी को मात्र रु 5000/- ही दिये तथा फारूख शेख को भी सिर्फ रु 750/- ही दिये जा सके थे। किन्तु कलाकारों ने लगन से कार्य किया था। सथ्यू  साहब ने एक अन्य प्रश्न के उत्तर में बताया कि, 'निशा नगर', 'धरती के लाल' व 'दो बीघा ज़मीन' फिल्में भी इप्टा कलाकारों के सहयोग से बनीं थीं उनका उद्देश्य सामाजिक-राजनीतिक चेतना को जाग्रत करना था। 

कुछ प्रश्नों के उत्तर में सथ्यू साहब ने रहस्योद्घाटन किया कि, यद्यपि 'गर्म हवा' 1973 में ही पूर्ण बन गई थी किन्तु 'सेंसर बोर्ड' ने पास नहीं किया था तब उनको प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी से संपर्क करना पड़ा था जिनके पुत्रों राजीव व संजय को वह पूर्व में 'क्राफ्ट' पढ़ा चुके थे। उन्होने बताया कि इंदिराजी अक्सर इन्स्टीच्यूट घूमने आ जाती थीं उनके साथ वी के कृष्णा मेनन भी आ जाते थे। वे लोग वहाँ चाय पीते थे, कभी-कभी वे कनाट प्लेस से खाना खा कर तीन मूर्ती भवन तक पैदल जाते थे तब तक सिक्योरिटी के ताम -झाम नहीं होते थे और राजनेता जन-संपर्क में रहते थे। काफी हाउस में उन्होने भी इंदर गुजराल व इंदिरा गांधी के साथ चर्चा में भाग लिया था। अतः सथ्यू साहब की सूचना पर इंदिराजी ने फिल्म देखने की इच्छा व्यक्त की जिसे तमाम झंझटों के बावजूद उन्होने दिल्ली ले जाकर दिखाया। इंदिराजी के अनुरोध पर सत्ता व विपक्ष के सांसदों को भी दिखाया और इस प्रकार सूचना-प्रसारण मंत्री गुजराल के कहने पर सेंसर सर्टिफिकेट तो मिल गया किन्तु बाल ठाकरे ने अड़ंगा खड़ा कर दिया अतः प्रीमियर स्थल 'रीगल थियेटर' के सामने स्थित 'पृथ्वी थियेटर' में शिव सेना वालों को भी मुफ्त फिल्म शो दिखाया जिससे वे सहमत हो सके। 1974 में यह फ्रांस के 'कान' में दिखाई गई और 'आस्कर' के लिए भी नामित हुई। इसी फिल्म के लिए 1975 में सथ्यू साहब को 'पद्मश्री' से भी सम्मानित किया गया और यह सम्मान स्वीकार करने के लिए गुजराल साहब ने फोन करके विशेष अनुरोध किया था अतः उनको इसे लेना पड़ा। 
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संदर्भ  :
http://krantiswar.blogspot.in/2016/02/blog-post.html
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सोमवार, 24 अक्तूबर 2016

बाबूजी के स्मरण के बहाने अपनी बात ------ विजय राजबली माथुर


जन्म:24-10-1919,दरियाबाद (बाराबंकी );मृत्यु:13-06-1995;आगरा  

हमारे बाबूजी ताज राजबली माथुर साहब ने अपनी पूरी ज़िंदगी 'ईमान ' व 'स्वाभिमान ' के साथ आभावों में गुज़ार दी लेकिन कभी उफ तक न की न ही कोई उलाहना कभी किसी को दिया। आज जब लोग अपने हक हुकूक के लिए किसी भी हद तक गिर जाते हैं हमारे बाबूजी ने अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपने हक को भी ठुकरा दिया था। मैंने भी पूरी कोशिश करके 'ईमान ' व 'स्वाभिमान ' की भरसक रक्षा की है भले ही अपने ही भाई - बहन की निगाहों में मूर्ख सिद्ध हुआ हूँ। उत्तर प्रदेश के माथुर कायस्थ परिवारों में हमारे  बली  खानदान  से सभी परिचित हैं। 


एक परिचय :

हमारे रिश्ते में एक  भतीजे थे राय राजेश्वर बली जो आज़ादी से पहले यू पी गवर्नर के एजुकेशन सेक्रेटरी भी रहे और रेलवे बोर्ड के सदस्य भी। उन्होने ही 'भातखण्डे यूनिवर्सिटी आफ हिन्दुस्तानी म्यूज़िक' की स्थापना करवाई थी जो अब डीम्ड यूनिवर्सिटी के रूप में सरकार द्वारा संचालित है। उसके पीछे ही उनके ही एक उत्तराधिकारी की यादगार में 'राय उमानाथ बली' प्रेक्षागृह है , वह भी सरकार द्वारा संचालित है।


'बली ' वंश एक ऐतिहासिक महत्व :

जब राय राजेश्वर बली साहब उत्तर-प्रदेश के शिक्षामंत्री थे (आज़ादी से पूर्व सम्बोधन एजुकेशन सेक्रेटरी था ) तब उन्होने महिलाओं की दशा सुधारने के लिए स्त्री-शिक्षा को विशेष महत्व दिया था। संगीत विश्वविद्यालय की स्थापना करवाना भी इसी दिशा में उठाया गया कदम था। 

ऐसा नहीं है कि ये क्रांतिकारी कदम राजेश्वर बली साहब ने यों ही उठा लिए थे बल्कि इसकी प्रेरणा उनको वंशानुगत रूप से मिली थी। हमारा 'बली ' वंश एक ऐतिहासिक महत्व रखता है । जिस समय बादशाह अकबर की  तूती बोल  रही थी हमारे पूर्वजों ने उनके विरुद्ध मेवाड़ के महाराना प्रताप के पक्ष में बगावत कर दी थी और 'दरियाबाद' में स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली थी। परंतु उस समय अकबर के विरुद्ध अधिक समय तक आज़ादी टिकाई नहीं जा सकती थी क्योंकि चारों ओर तो अकबर का मजबूत शासन स्थापित था। नतीजा यह हुआ कि शाही सेना ने पूरे के पूरे खानदान को मौत के घाट उतार दिया। परंतु स्थानीय लोग जो हमारे पूर्वजों के प्रति एहसानमंद थे ने किसी प्रकार इस परिवार की एक गर्भिणी महिला को छिपा लिया था। नर-संहार के बाद जब शाही सेना लौट गई तब उनको आगरा उनके भाई के पास भेजने की व्यवस्था की गई जो अकबर के दरबार के ही सदस्य थे। मार्ग में 'नीम' के दरख्त के एक खोटर में उन्होने जिस बालक को जन्म दिया उनका नाम 'नीमा राय ' रखा गया। हम लोग इन्हीं नीमा राय बली  साहब के वंशज हैं।

जब नीमा राय जी 10 -12 वर्ष के हो गए तब इनके मामाजी इनको भी अपने साथ दरबार में ले जाने लगे। यह बहुत ही मेधावी व होनहार थे। कभी-कभी बादशाह अकबर इनसे भी कुछ सवाल उठाते थे और इनके जवाब से बेहद संतुष्ट होते थे। लेकिन पूछने पर भी इनके मामाजी ने इनके पिता का नाम बादशाह को कभी नहीं बताया सिर्फ यही बताया कि उनके भांजा हैं। एक दिन इनके जवाब से अकबर इतना प्रसन्न हुये कि ज़िद्द पकड़ गए कि इस होनहार बालक के पिता का नाम ज़रूर जानेंगे । मजबूर होकर इनके मामाजी को बादशाह से कहना पड़ा कि पहले आप आश्वासन दें कि मेरे इस भांजे की आप जान नहीं लेंगे तब इसके पिता का नाम बताएँगे। अकबर ने ठोस आश्वासन दिया कि इस बालक की जान नहीं ली जाएगी। तब इनके मामाजी ने इनका पूरा परिचय दिया और बताया कि आपके पूरा खानदान नष्ट करने के आदेश के बावजूद मेरी बहन को स्थानीय लोगों ने बचा कर आगरा भिजवा दिया था और रास्ते में इस बालक का जन्म हुआ था। 

अकबर ने नीमाराय साहब के पूर्वजों का छीना हुआ राज-पाट वापिस करने का फरमान जारी कर दिया  और इनको अपनी सेना के संरक्षण में दरियाबाद भिजवाया। बालक नीमाराय  ने वह जगह जहां काफी खून खराबा  हुआ था और उनका खानदान तबाह हुआ था लेने से इंकार कर दिया । तब उसके बदले में दूसरी जगह चुन लेने का विकल्प इनको दिया गया। इनको दौड़ता हुआ एक खरगोश का बच्चा पसंद आया था और इनहोने कह दिया जहां यह खरगोश का बच्चा रुकेगा वही जगह उनको दे दी जाये । दिन भर शाही कारिंदे नीमाराय जी को लेकर खरगोश के बच्चे के पीछे दौड़ते रहे आखिकार शाम को जब थक कर वह खरगोश का बच्चा एक जगह सो गया उसी जगह को उन्होने अपने लिए चुन लिया। उस स्थान पर बादशाह अकबर के आदेश पर एक महल तहखाना समेत इनके लिए बनवाया गया था। पहले यह महल खंडहर रूप में 'दरियाबाद' रेलवे स्टेशन से ट्रेन में बैठे-बैठे भी दीख जाता था। किन्तु अब बीच में निर्माण होने से नहीं दीख पाता है। 

1964 तक जब हम मथुरा नगर, दरियाबाद गए थे इस महल के अवशेष उस समय की याद दिला देते थे। बाहरी बैठक तब तक मिट्टी की मोटी  दीवार से बनी थी और काफी ऊंचाई पर थी उसमें दुनाली बंदूकों को चलाने के स्थान बने हुये थे। लेकिन अब  बड़े ताऊ जी के बेटों ने उसे गिरवाकर आधुनिक निर्माण करा लिया है। अब भी खंडहर रूप में पुरानी पतली वाली मजबूत ईंटें वहाँ दीख जाती हैं। हमारे बाबाजी ने रायपुर में जो कोठी बनवाई थी वह भी 1964 तक उसी तरह थी परंतु अब उसे भी छोटे ताऊ जी के पुत्र व पौत्रों ने गिरवाकर आधुनिक रूप दे दिया है। हमारे बाबूजी तो सरकारी नौकरी में और दूर-दूर रहे, इसलिए  हम लोग विशेषतः मैं तो जमींदाराना  बू से दूर रहे हैं। यही वजह है कि, दोनों ताऊजियों के पुत्र हमसे दूरी बनाए रहे हैं। 

राजेश्वर बली साहब जब रेलवे बोर्ड के सदस्य थे तब उन्होने हर एक्स्प्रेस गाड़ी का ठहराव दरियाबाद रेलवे स्टेशन पर करवा दिया था । अब भी वह परंपरा कुछ-कुछ लागू है। हमारे बाबाजी के छोटे भाई साहब हैदराबाद निज़ाम के दीवान रहे थे और उनके वंशज उधर ही बस गए हैं। 
समय के विपरीत धारा पर  : 
जहां एक ओर इस परिवार के अधिकांश लोग समयानुसार चल रहे हैं सिर्फ मैं ही समय के विपरीत धारा पर चलते हुये भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से सम्बद्ध चल रहा हूँ। हमारे पिताजी के सहपाठी और रूम मेट रहे कामरेड भीखा लाल जी से मिलने का मुझे सौभाग्य मिला है। भाकपा एम एल सी रहे  बाराबंकी के कामरेड रामचन्द्र बख्श सिंह साहब से भी हमारा सान्निध्य रहा वह हमारे बाबाजी के चचेरे भाई राय धर्म राजबली साहब के परिचितों में थे। इन राय धर्म राजबली साहब के बड़े पुत्र डॉ नरेंद्र राजबली साहब का निधन भी इस वर्ष जनवरी में हो गया है जबकि सबसे छोटे  योगेन्द्र राजबली साहब का निधन कुछ वर्ष पहले ही हो चुका है । इनके दूसरे पुत्र डॉ वीरेंद्र राजबली साहब न्यूयार्क में अपना व्यवसाय कर रहे हैं। हमारे लखनऊ आने के बाद जब  वीरेंद्र चाचा  यहाँ आये  हैं तब हमसे भी मिलने पिछ्ले दो वर्षों से हमारे घर आए हैं। इस वर्ष भी उनसे मुलाक़ात होगी, मैं उनको अपने ब्लाग पोस्ट्स ई मेल के जरिये भेजता रहता हूँ और वह पढ़ कर प्रिंट करा कर रिकार्ड में रख लेते हैं।बाबूजी के इन चचेरे भाइयों से हमें अनुराग मिलता रहा है।   
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24-10-2016

25-10-2016 

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