शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

पीपल के पत्ते ------ विजय राजबली माथुर

                                               



कभी - कभी बहुधा घटित होते रहने वाली छोटी सी बात भी एक अलग ध्यान आकर्षित कर देती है और आज कुछ ऐसा ही हुआ। मेरी श्रीमती जी ने एक गमले में और पौधों के अलावा एक पीपल का पौधा भी लगा रखा है। चिड़ियों द्वारा लाये बीज से यह पौधा स्वतः प्राप्त हुआ था। हमेशा की तरह आज भी दो पीले पड़ चुके पत्ते हवा से झड़ कर छत पर गिरे हुये थे इनको देख कर 55 वर्ष पूर्व की एक घटना का स्मरण हो आया।हम लोग बाबूजी के नान फेमिली स्टेशन सिलीगुड़ी ट्रांसफर हो जाने के कारण शाहजहाँपुर में नानाजी के पास 1962 से ही थे। 1963 में मैं 7 वीं कक्षा का छात्र था  और इससे मतलब भी नहीं था तब भी जी एफ कालेज यूनियन के छात्रसंघ चुनाव में एक उम्मीदवार  का पेंफ्लेट मुझे स्कूल से लौटते वक्त दे दिया गया। वह पेंफ्लेट और कुछ नहीं छांव में सुखाये हुये पीपल के पत्ते पर सफ़ेद पेंट से लगाई मोहर द्वारा उस उम्मेद्वार  को वोट देने की अपील थी।यह एक सादगी भरा, अलग हट कर अनोखा प्रचार माध्यम था जबकि और लोग कागज के पर्चे बाँट रहे थे पीपल के पत्ते चर्चा और आकर्षण बटोर रहे थे। 
दूसरी घटना 20 वर्ष पूर्व आर्यसमाज, कमलानगर- बल्केश्वर, आगरा के वेद प्रचार सप्ताह में  मेरठ के गायक प्रचारक वेगराज जी द्वारा सुनाये वर्णन की है। ढोंग - पाखंड -  आडंबर पर प्रहार करते हुये व्यर्थ के सांप्रदायिक तनाव का विरोध करते हुये उन्होने बताया था कि बिना सोचे विचारे बेवजह लोग आपस में लड़ना शुरू कर देते हैं और बेगुनाह मारे जाते हैं।
उन्होने बताया कि एक गाँव से ताजिये का जुलूस निकल रहा था चूंकि ताजिये बहुत लंबे थे और झुकाये नहीं जा सकते थे अतः मार्ग में पड़ रहे  शिव मंदिर  के वृक्ष की डालियों को काटने की बात उठी तथाकथित हिन्दू अड़ गए कि उनके शिव भगवान की जटाएँ नहीं काटी जा सकतीं। बढ़ती तकरार से खून - खराबे की आशंका के मद्दे नज़र पुलिस ने ताजिये उसी स्थान पर रखवा कर सुरक्षा के लिए पहरा बैठा दिया और जुलूस के लिए पीपल शाखाओं के काटने का मामला अदालत के फैसला आने तक  के लिए टल गया। अदालती कारवाई जैसी होती है उसमें फैसला क्या आता या नहीं आता उससे पहले एक रोज़ जोरदार आंधी तूफान आ गया जिससे ताजिये भी फट कर बिखर गए और पीपल की शाखाएँ भी टूट कर पत्ते भी झड़ कर बिखर गए । अगले रोज सफाई कर्मचारी ने बुहार कर पत्ते और ताजिये सब फेंक दिये। प्राकृतिक न्याय के आगे किसी की कुछ नहीं चली। हिन्दू - मुस्लिम सांप्रदायिकता धरी की धरी रह गई। इसी लिए आर्यसमाज देश - काल- जाति- धर्म - नस्ल से परे मनुष्य मात्र को आर्य= आर्ष = श्रेष्ठ बनाने की बात करता है।   

जब बात पीपल के पत्तों की चली है  तब लगभग पाँच वर्ष पुरानी इस पोस्ट को भी उद्धृत कर रहा हूँ  : 


हार्ट अटैक: ना घबराये ......!!!
सहज सुलभ उपाय ....
99 प्रतिशत ब्लॉकेज को भी रिमूव कर देता है पीपल
का पत्ता....
पीपल के 15 पत्ते लें जो कोमल गुलाबी कोंपलें न हों, बल्कि पत्ते
हरे, कोमल व भली प्रकार विकसित हों। प्रत्येक का ऊपर व नीचे
का कुछ भाग कैंची से काटकर अलग कर दें।
पत्ते का बीच का भाग पानी से साफ कर लें। इन्हें एक गिलास
पानी में धीमी आँच पर पकने दें। जब पानी उबलकर एक तिहाई रह
जाए तब ठंडा होने पर साफ कपड़े से छान लें और उसे ठंडे स्थान
पर रख दें, दवा तैयार।
इस काढ़े की तीन खुराकें बनाकर प्रत्येक तीन घंटे बाद प्रातः लें।
हार्ट अटैक के बाद कुछ समय हो जाने के पश्चात लगातार पंद्रह
दिन तक इसे लेने से हृदय पुनः स्वस्थ हो जाता है और फिर दिल
का दौरा पड़ने की संभावना नहीं रहती। दिल के रोगी इस नुस्खे
का एक बार प्रयोग अवश्य करें।
* पीपल के पत्ते में दिल को बल और शांति देने की अद्भुत
क्षमता है।
* इस पीपल के काढ़े की तीन खुराकें सवेरे 8 बजे, 11 बजे व 2
बजे ली जा सकती हैं।
* खुराक लेने से पहले पेट एक दम खाली नहीं होना चाहिए,
बल्कि सुपाच्य व हल्का नाश्ता करने के बाद ही लें।
* प्रयोगकाल में तली चीजें, चावल आदि न लें। मांस, मछली,
अंडे, शराब, धूम्रपान का प्रयोग बंद कर दें। नमक, चिकनाई
का प्रयोग बंद कर दें।
* अनार, पपीता, आंवला, बथुआ, लहसुन, मैथी दाना, सेब
का मुरब्बा, मौसंबी, रात में भिगोए काले चने, किशमिश, गुग्गुल,
दही, छाछ आदि लें । ......
तो अब समझ आया, भगवान ने पीपल के पत्तों को हार्टशेप
क्यों बनाया..
http://vijaimathur05.blogspot.in/2013/12/blog-post_24.html



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रविवार, 18 फ़रवरी 2018

कश्मीर ,करगिल, आगरा और लखनऊ ------ विजय राजबली माथुर

कश्मीर संबंधी यह विवरण पढ़ कर 37 वर्ष पूर्व के कुछ समय वहाँ बिताए अपने संस्मरण याद पड़ गए। उस समय भी कश्मीर व लद्दाख(करगिल )   दोनों के निवासियों का व्यवहार काफी अच्छा पाया था। इस विवरण से ज्ञात हुआ कि आज भी वहाँ के लोग अच्छे ही हैं। 





* मई 1981 में होटल मुगल, आगरा से टेम्पोरेरी ट्रांसफर पर जो छह लोग होटल हाईलैंड्स, कर्गिल भेजे गए थे उनमें मैं एकाउंट्स सुपरवाइज़र और एक मेकेनिकल सुपरवाइज़र को छोड़ कर बाकी लोग जूनियर स्टाफ के थे। बाकी सब कोई भी टूरिस्ट ग्रुप आने पर व्यस्त रहते थे रात को मेरे पास कोई काम न होने के कारण  जब कभी एक्स्ट्रा ग्रुप आ गया तो बाजार से सब्जी,ब्रेड लेने मुझे ही भेजा जाता था। मैनेजर चावला साहब  कंजूसी के तहत एक्स्ट्रा स्टाक नहीं रखते थे। कभी -कभी जीप न देकर पैदल भेजते थे। एक बार लौटते समय तेज तूफानी हवाएं चलने लगीं ,संभावना बारिश आने की भी थी,मैंने एक जीप आता देख कर उसे टैक्सी समझते हुए रुकने का इशारा किया वह रुक गयी और मैं बारू जाना है कह कर बैठ गया। उतरने पर उस समय के रेट के मुताबिक़ रु.२/-का नोट ड्राइवर को देने लगा परन्तु उसने हाथ जोड़ कर मना कर दिया-साहब यह सरकारी गाडी है। जीप आगे बढ़ने पर मैंने देखा उस पर डायरेक्टर फिशरीज लिखा था अर्थात मेरे साथ दूसरी सवारी नहीं वह एक अधिकारी थे। एक हमारे मेनेजर और दुसरे वह लद्धाखी सरकारी  अधिकारी दोनों के व्यवहार बड़े आश्चर्यजनक रहे। जीप तेजी से चले जाने के कारण मैं तो धन्यवाद भी न दे सका था।

** प्रातः काल मैं जल्दी उठ जाता था और आस-पास टहलने निकल जाता था। एक बार टी.बी.अस्पताल की तरफ चला गया तो बाहरी आदमी देख कर सी.एम्.ओ.साहब ने बुलाया और अपना परिचय देकर मुझ से परिचय माँगा। मेरे यह बताने पर कि, होटल मुग़ल, आगरा में एकाउन्ट्स सुपरवाईजर हूँ और यहाँ टेम्पोरेरी ट्रांसफर पर होटल हाई लैण्ड्स  में आया हुआ हूँ।  उन्होंने यदा-कदा आते रह कर मिलने को कहा। विशिष्ट प्रश्न जो उन्होंने पूंछा वह यह था कि क्या आप लखनऊ के हैं ? मैंने प्रति-प्रश्न किया आपने कैसे पहचाना ? वैसे मेरा जन्म और प्रारम्भिक शिक्षा लखनऊ की ही है। डा.साहब का जवाब था आपकी जबान में उर्दू की जो श्रीन्गी है वह लखनऊ में ही पायी जाती है दूसरी जगहों पर नहीं। हालांकि उस समय हमें लखनऊ छोड़े हुए १९ वर्ष व्यतीत हो चुके थे और मैं उर्दू पढ़ा भी नहीं था। घर में बोली जाने वाली बोली से ही डा. साहब ने पहचाना था जो खुद श्रीनगर के सुन्नी थे। 
***  होटल मालिक के बेटे बशीर अहमद जान साहब भी चुटकुले सुनाने  वालों में थे परन्तु उनके चुटकुलों को अश्लील नहीं कह सकते, उदाहरणार्थ उनका एक चुटकुला यह था-
 "करगिल आने से पहले पड़ता है द्रास। 
दूर क्यों बैठी हो ,आओ बैठें पास-पास। ।"   

बशीर साहब सुन्नी होते हुए भी भोजन से पूर्व बिस्कुट,ब्रेड,रोटी जो भी हो थोडा सा हाथ में लेकर मसल कर चिड़ियों को डालते थे। उन्होंने इसका कारण भी स्पष्ट किया था -एक तो हाथ साफ़ हो जाता है, दूसरे चिड़ियों के खाने से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि, वह भोज्य पदार्थ खाने के योग्य है (क्योंकि यदि चिड़िया को तकलीफ होगी तो पता चलने पर उस भोजन का परित्याग करेंगे), और पुण्य तो है ही। चावला साहब  की श्रीमती जी के आने के बाद बशीर साहब श्री नगर लौट गए थे। 
बशीर साहब के पिताजी गुलाम रसूल जान साहब एम्.ई.एस.में ठेकेदार थे। उन्होंने श्री नगर के लाल चौक में 'हाई लैंड फैशंस 'नामक दुकान बेटों को खुलवा दी थी। लकड़ी के फर्श, छत और दीवारों के कमरे श्री नगर में बनवा कर ट्रकों से करगिल पहुंचवाए थे और यह 'होटल हाई लैंड्स'बनवाया था। बशीर साहब  बीच-बीच में आते रहते थे। सारे स्टाफ के साथ बशीर साहब का व्यवहार बहुत अच्छा था। 
**** चावला साहब के व्यवहार पर हमारे कुछ साथियों का वापिस आगरा लौटने का इरादा बना, मैं भी उनके साथ ही लौट लिया श्रीमती चावला ने हम लोगों को जीप से डोरमेटरी पहुंचा दिया था।  
हम लोग बस से सुबह  तडके  चल कर श्रीनगर  शाम को पहुंचे और रु.15/- प्रति बेड के हिसाब से एक शिकारा में सामान रखा। उसमें तीन बेड थे यदि और कोई आता तो उसे उसमें एडजस्ट करना था परन्तु कोई आया नहीं।  एस.पी. सिंह और मैं पहले रोडवेज के काउंटर पर गए और अगले दिन का जम्मू का टिकट लिया। फिर रात का खाना खाने के इरादे से बाजार में गए । वहां बशीर साहब ने  हमें देख लिया और पहले चाय-नाश्ता एक दूकान पर कराया और काफी देर विस्तृत वार्ता के बाद हम दोनों को एक रेस्टोरेंट में खाना भी उन्हीं ने खिलाया। 
शिकारा मालिक भी अच्छे व्यवहार के थे उनका वायदा था कि  अगले दिन वह बस के समय से पहले ही जगा देंगे किन्तु हम लोग खुद ही जाग गए ।  सुबह तड़के श्रीनगर से बस चल दी। शाम तक हम लोग जम्मू में थे। ट्रेन पकड़ कर आगरा के लिए रवाना हो गए और अगले दिन आगरा भी पहुँच गए। 

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गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

कौन अपना ? कौन पराया ? ------ विजय राजबली माथुर





प्रस्तुत चित्र में प्रदर्शित अपने देश के सर्वाधिक ठंडे स्थान ' द्रास ' क्षेत्र के ' ज़ोजिला ' दर्रे में फंस कर एक पूरी रात गुजारने का मौका मुझे भी मिला है जिसका वर्णन 2011 में लिखित संस्मरणों से उद्धृत किया जा रहा है :

 "हेमंत कुमार जी छात्र जीवन में सयुस(समाजवादी युवजन सभा)  में रहे थे और बांग्लादेश आन्दोलन में दिल्ली के छात्र प्रतिनिधि की हैसियत  से भाग ले चुके थे.लेकिन होटल मुग़ल के पर्सोनल मेनेजर के रूप में कर्मचारियों के हितों के विपरीत कार्य करके हायर मेनेजमेंट  को खुश करना चाहते थे.कारगिल,लद्दाख में आई.टी.सी.ने एक लीज प्रापर्टी 'होटल हाई लैंड्स'ली थी.यह होटल ,होटल मुग़ल के जी.एम्.के ही अन्डर था.पेंटल साहब सीराक होटल,बम्बई ट्रांसफर होकर जा चुके थे और सरदार नृप जीत  सिंह चावला साहब नये जी.एम्.थे,वह भी एंटी एम्प्लोयी छवि के थे.यूं.ऍफ़.सी.शेखर साहब की जगह पी.सुरेश रामादास साहब आ गए थे जो पूर्व मंत्री एवं राज्यपाल सत्येन्द्र नारायण सिंहां के दामाद थे और अटल बिहारी बाजपाई के प्रबल प्रशंसक थे.१९८० के मध्यावधी चुनावों में इंदिरा गांधी पहली बार आर.एस.एस.के समर्थन से पूर्ण बहुमत से सत्ता में वापिस आ चुकीं थीं.२५ मार्च १९८१ को मेरी शादी करने की बाबत फाइनल फैसला हो चुका था.इतनी तमाम विपरीत परिस्थितियों में मुझे अस्थायी तौर पर (मई से आक्टूबर)होटल हाई लैंड्स ,कारगिल ट्रांसफर कर दिया गया.इन्कार करके नौकरी छोड़ने का यह उचित वक्त नहीं था.

२४ मई १९८१ को होटल मुग़ल से पांच लोगों ने प्रस्थान किया.छठवें अतुल माथुर,मेरठ से सीधे कारगिल ही पहुंचा था.आगरा कैंट स्टेशन से ट्रेन पकड़ कर दिल्ली पहुंचे और उसी ट्रेन से रिजर्वेशन लेकर जम्मू पहुंचे.जम्मू से बस   द्वारा श्री नगर गए जहाँ एक होटल में हम लोगों को ठहराया गया.हाई लैंड्स के मेनेजर सरदार अरविंदर सिंह चावला साहब -टोनी चावला के नाम से पापुलर थे,उनका सम्बन्ध होटल मौर्या,दिल्ली से था.वह एक अलग होटल में ठहरे थे,उन्होंने पहले १५ हजार रु.में एक सेकिंड हैण्ड जीप खरीदी जिससे ही वह कारगिल पहुंचे थे.४-५ रोज श्री नगर से सारा जरूरी सामान खरीद कर दो ट्रकों में लाद कर और उन्हीं ट्रकों से हम पाँचों लोगों को रवाना कर दिया.श्री नगर और कारगिल के बीच 'द्रास'क्षेत्र में 'जोजीला'दर्रा पड़ता है.यहाँ बर्फबारी की वजह से रास्ता जाम हो गया और हम लोगों के ट्रक भी तमाम लोगों के साथ १२ घंटे रात भर फंसे रह गए.नार्मल स्थिति में शाम तक हम लोगों को कारगिल पहुँच चूकना था.( ठीक इसी स्थान पर बाद में किसी वर्ष सेना के जवान और ट्रक भी फंसे थे जिनका बहुत जिक्र अखबारों में हुआ था).

इंडो तिब्बत बार्डर पुलिस के जवानों ने अगले दिन सुबह बर्फ कट-काट कर रास्ता बनाया और तब हम लोग चल सके.सभी लोग एकदम भूखे-प्यासे ही रहे वहां मिलता क्या?और कैसे?बर्फ पिघल कर बह रही थी ,चूसने पर उसका स्वाद खारा था अतः उसका प्रयोग नहीं किया जा सका .तभी इस रहस्य का पता चला कि,इंदिरा जी के समक्ष एक कनाडाई फर्म ने बहुत कम कीमत पर सुरंग(टनेल)बनाने और जर्मन फर्म ने बिलकुल मुफ्त में बनाने का प्रस्ताव दिया था.दोनों फर्मों की शर्त थी कि ,'मलवा' वे अपने देश ले जायेंगें.इंदिराजी मलवा देने को तैयार नहीं थीं अतः प्रस्ताव ठुकरा दिए.यदि यह सुरंग बन जाती तो श्री नगर से लद्दाख तक एक ही दिन में बस  द्वारा पहुंचा जा सकता था जबकि अभी रात्रि हाल्ट कारगिल में करना पड़ता है.सेना रात में सफ़र की इजाजत नहीं देती है. " 
घर , बाहर , समाज, राजनीति  सभी  क्षेत्रों  का मेरा निजी अनुभव यह रहा है कि , जिन लोगों ने मुझसे कोई भी फायदा उठाया है वे ही मुझे पीछे धकेलने के  प्रयासों में आगे रहे हैं। वैसे तो मैं  निराश कभी होता नहीं हूँ परंतु इस बार अपने जन्मदिन  ( 05 फरवरी ) पर प्राप्त बधाई संदेशों पर प्रारम्भ में यह उत्तर बतौर टिप्पणी दिया था : 
 " आपकी शुभकामनाओं के लिए धन्यवाद , वस्तुतः इस धरती पर एक बोझ के 66 वर्ष कम हुये। "  वैसे मैंने प्रत्येक संदेश - प्रेषक को व्यक्तिगत रूप से उत्तर दिया है फिर भी उनमें से कुछ का उल्लेख करना उचित प्रतीत होता है। 
किन्तु उत्तर - प्रदेश की प्रथम संविद सरकार में गृह राज्यमंत्री रहे कामरेड रुस्तम सेटिन साहब की सुपुत्री कामरेड रीना सेटिन जी ने जो प्रत्युत्तर दिया उसी ने इस विवरण का शीर्षक " कौन अपना ?  कौन पराया ? " रखने की प्रेरणा दी है।   
कामरेड रीना सेटिन जी ने  सन्मार्ग को इंगित कर सच्चे अर्थों में एक बहन की भूमिका का निर्वहन किया है। 
जबकि सगे कहे जाने वाले बहन - भाई और रिश्तेदार  तथा निकटतम लोग टांग - खिचाई का कोई भी मौका नहीं छोडते हैं। 



यद्यपि अपने ही माता - पिता के पुत्र - पुत्री मेरे सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से भी विपरीत  रुख रखने के कारण और छोटे होने के कारण  जबरिया दबा पाने में असमर्थ रहने के कारण दूरी बनाए हुये हैं  हमारे बाबाजी  ( Grand Father ) के चचेरे भाई साहब के पौत्र - पौत्री  अपने कहलाने वाले भाई - बहन से भी कहीं अधिक अपनत्व अपनाते हैं । उनके बधाई संदेशों  को सहेजना और सार्वजनिक करना ज़रूरी लगता है :



:

पुत्र एवं कुछ अन्य फेसबुक फ्रेंड्स के संदेशों को भी देना अनुचित नहीं होगा। जिन लोगों ने इन बाक्स मेसेज के जरिये अपने संदेश भेजे वे क्रमानुसार अशरफ पूकम, पवन करन,महेश दौनिया,गौतम कुमार साहेबान तथा बहन सुषमा सिंह जी एवं सूर्यकांत सरवासे व नाना साहब कदम साहेबान  हैं। 






इनके अतिरिक्त एक निकटतम रिशेदार की निकटतम रिश्तेदार जिनसे मेरा कोई सीधा रिश्ता नहीं है , सिर्फ फेसबुक फ्रेंड हैं ने भी उतनी ही आत्मीयता से अपना संदेश दिया है जितनी आत्मीयता से उपरोक्त चचेरे भाइयों व बहन ने किन्तु उनका नामोल्लेख करना इसलिए उचित नहीं है कि, नाम सार्वजनिक होने पर उनके व हमारे निकटतम रिश्तेदार कहीं उनसे  भी नफरत न करने लगें जिस प्रकार कि मुझसे घोर नफरत रखते हैं। 

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सोमवार, 11 सितंबर 2017

11 सितंबर 1978 का एग्रीमेंट : ट्रेड यूनियन के तथ्य और कथ्य ------ विजय राजबली माथुर

39 वर्ष पूर्व 11 सितंबर 1978 को होटल मुगल कर्मचारी संघ , आगरा और प्रबंधन के मध्य जो पहला एग्रीमेंट हुआ था उसको सम्पन्न कराने में यूनियन के महामंत्री की हैसियत से मुझे जो भूमिका निभानी पड़ी थी वह काफी जटिलताओं से परिपूर्ण थी। होटल के पर्सोनेल मेनेजर हरिमोहन झा साहब बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा के भतीज दामाद थे। वह खुद को रिंग मास्टर कहा करते थे। उनका दावा था कि, सारे मेनेजर्स को वह अपने साथ लामबंद कर चुके हैं और यूनियन को भी उनके अनुसार ही चलना होगा। वह अक्सर जमशेदपुर का किस्सा सुनाते थे जिसमें वहाँ टाटा कारखाने की यूनियन के सेक्रेटरी जेनरल को धक्के देकर वह आफिस से निकाल चुके थे। भले ही टाटा मेनेजमेंट ने उनको यूनियन के प्रकोप से बचाने के लिए अन्यत्र स्थानांतरित कर दिया था। अब जब वह आई टी सी ग्रुप में थे तब कंपनी  चेयरमेन अजित नारायण हकसर के तत्कालीन पी एम इन्दिरा गांधी के सलाहकार परमेश्वरी नारायण हकसर का रिश्तेदार होने के कारण उनके हौसले बुलंद थे। लेकिन जेनेरल मेनेजर चरणजीत सिंह पेंटल साहब भी तत्कालीन केंद्रीय उद्योग राज्यमंत्री चरणजीत चानना साहब के रिश्ते के चाचा थे और वह झा साहब की तिकड़मों को झटकने हेतु मौके की तलाश में थे। उनको यह मौका मिला यूनियन को खुला समर्थन दे देने के कारण।

जून 1975 में एमर्जेंसी के दौरान मेरठ का जाब समाप्त  होने पर आगरा आये थे राजनीतिक लक्ष्य के तहत और युनियन से दूर रहना चाहते थे लेकिन  थुप गई गंभीर जिम्मेदारी.काम ओढ़ लिया तो करना था पूरी क्षमता से.अतः जब यूनियन के रजिस्ट्रेशन के लिए एक इन्स्पेक्टर जैन साहब उप-श्रमायुक्त कार्यालय, आगरा में पधारे तो मैंने उनके समक्ष महेश नानाजी का जिक्र कर दिया जो मेरठ से डिप्टी चीफ   इन्स्पेक्टर आफ फैक्टरीज होकर कानपुर गए थे. हालांकि उस वक्त वह रिटायर हो चुके थे.परन्तु जैन साहब ने कहा वह हमारे बॉस रहे हैं और तुम उनके रिश्तेदार हो और युनियन के सेक्रेटरी हो तो समझो इंस्पेक्शन हो गया और यूनियन रजिस्टर्ड हो गई इस आशय का लेटर डाक से भेज देंगे.सच में जैन साहब ने अपना वायदा पूरा किया और ०३.०४ .१९७८ की ता.में यूनियन रजिस्टर्ड होने का लेटर हमें जल्दी ही मिल गया.

हमारी युनियन के अध्यक्ष सी.पी.भल्ला साहब ने रजिस्ट्रेशन होते ही मेनेजमेंट के समक्ष मान्यता प्रदान करने की मांग रख दी.पर्सोनल मेनेजर झा साहब ने जेनेरल मेनेजर पेंटल साहब से पक्ष में सिफारिश कर दी.हमारी युनियन-'होटल मुग़ल कर्मचारी संघ'को मेनेजमेंट ने मान्यता शीघ्र ही दे दी ,जिस दिन यह घोषणा हुई उस दिन फ़ूड एंड बेवरेज मेनेजर कार्यवाहक जी.एम्.थे .उन्होंने मेनेजमेंट की तरफ से सम्पूर्ण स्टाफ को 'गाला लंच' देने का भी एलान कर दिया.मैं वैसे वहां लंच नहीं लेता था,परन्तु अध्यक्ष,कार्यकारिणी सदस्यों तथा झा साहब का आग्रह टाल न सका और उस दिन वह लंच करना ही पडा.

यूनियन रजिस्टर्ड होने तथा मान्यता भी मिल जाने से स्टाफ का भारी दबाव था कि वेतन बढ़वाया जाए ,हालांकि उस वक्त होटल मुग़ल आगरा का हायेस्ट पे मास्टर था. हम लोगों ने एक चार्टर आफ डिमांड बना कर पर्सोनल मेनेजर को सौंप दिया. हमारे साथियों ने जितना चाहते थे उसका दुगुना वेतन बढाने की मांग रख दी जिसे देखते ही झा साहब व्यंग्य से मुस्करा दिए और बोले इसे तो हेड क्वार्टर भी मंजूर नहीं करने वाला.कई बैठकों के बाद भी जब कार्यकारिणी ने बार-बार इसी की पुष्टि कर दी तो झा साहब नया तर्क ले कर आये कि यह चार्टर आफ डिमांड उन पदाधिकारियों द्वारा बनाया गया है जिन्हें स्टाफ ने नहीं चुना था,लिहाजा फ्रेश मेंनडेट लेकर आओ .भल्ला साहब जो कभी ओबेराय होटल में भी पेंटल साहब के साथ काम कर चुके थे स्टाफ का भरोसा नहीं जीत सकते थे लिहाजा मैंने खुद एक दुसरे व्यक्ति को अध्यक्ष पद के लिए यह कह कर तैयार किया कि प्रत्यक्ष तौर पर तो मुझे भल्ला साहब का ही समर्थन करना होगा लेकिन जिताएंगे तुम्हे ही .वह शख्स ट्रेड यूनियन्स से अनजान थे और मुफ्त में युनियन की अध्यक्षता मिलती नजर आ रही थी. खुशी -खुशी राजी हो गए.

अध्यक्ष पद के दो उम्मेदवार हो गए किन्तु मेरे सेक्रेटरी जेनरल तथा कोषाध्यक्ष पद के लिए कोई दावेदार नहीं था.एक सज्जन को पकड़ कर कोषाध्यक्ष पद हेतु नामांकन कराया क्योंकि उस समय के कोषाध्यक्ष को संभावित प्रमोशन के कारण पद छोड़ना था.दो पद निर्विरोध निर्वाचित घोषित हुए.केवल अध्यक्ष पद का ही चुनाव हुआ.कार्यकारिणी सदस्य भी विभागों से निर्विरोध निर्वाचित हो गए थे.अध्यक्ष भल्ला साहब हर जगह मुझे साथ-साथ अपने प्रचार में ले जाते थे. मैं यही कहता था -आप लोगों ने भल्ला साहब का कार्य देखा है ,संतुष्ट हैं तो इन्हें ही पुनः मौक़ा दें.

लोगों को पता था मैं किसे चाहता हूँ और उन्हें वोट किसे देना है.झा साहब ने कूटनीति फेंकते हुए लोगों द्वारा मेरी पसन्द के उम्मेदवार को ही जिताने का अपनी और से प्रयास किया ताकि भल्ला साहब को बाद में समझाया जा सके और मेरे विरोधी के तौर  पर खड़ा किया जा सके.जैसा कि स्वभाविक था ठाकुर पुष्पेन्द्र बहादुर सिंह लगभग एकतरफा वोट पाकर जीत गए.भल्ला साहब चाहते थे मैं उनकी हार के बाद पद त्याग कर दूँ.परन्तु पेंटल साहब खूब होशियार थे उन्होंने यह समझते और बूझते हुए कि भल्ला साहब हारे ही इसलिए कि उन्हें मेरा समर्थन था ही नहीं,एक अन्य कार्यकारिणी सदस्य  श्री दीपक भाटिया के माध्यम से उन्होंने मुझे सन्देश भिजवाया कि यदि  मैं श्री भाटिया को पदाधिकारी बना लूं तो पेंटल साहब हर विवाद में मेरा ब्लाइंड समर्थन करेंगें.चूंकि झा साहब खुद को रिंग मास्टर समझते थे और युनियन को पाकेट युनियन बनाना चाहते थे इसलिए मुझे भी अपनी बातें मनवाने के लिए पेंटल साहब का समर्थन मिलने का आश्वासन घाटे  का सौदा नहीं लगा. 

श्री दीपक भाटिया पहले फिल्म ऐक्ट्रेस जया भादुरी के पी.ए.थे और उनकी शादी अमिताभ बच्चन से हो जाने पर कुछ दिन जया  के कहने पर भाटिया को अपना अतिरिक्त पी.ए.बनाये रखा परन्तु वह सरप्लस ही थे.आगरा के होने के कारण भाटिया को श्री बच्चन ने पेंटल साहब से कह कर ही मुग़ल में जाब दिलवाया था और वह पेंटल साहब के प्रति एहसानमंद भी थे.अतः श्री पेंटल ने भल्ला के बदले भाटिया को तरजीह दे दी. हमने श्री भाटिया को सेकिंड ज्वाइंट सेक्रेटरी पद दे दिया.

 पुनः चुनावों में जीत कर आई नई कार्यकारिणी ने भी पुराने चार्टर  आफ डिमांड को ही पास कर दिया अतः झा साहब के पास निगोशिएशन के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा.कई दौर की धुंआ धार मीटिंगों के बाद एक निश्चित वेतन मान को लेकर मेनेजमेंट के साथ सहमति बनाने के फार्मूले को ढूँढा गया.इसमें न्यूनतम वेतन-वृद्धि रु.४५/-और अधिकतम रु.९०/-किया जाना था सबसे निचले ग्रेड को अधिकतम और ऊपर उठते ग्रेड्स में कम वृद्धि होनी थी.आफिस के लोगों विशेषकर  लेखा विभाग वालों की कम वृद्धि का प्रस्ताव था.बस यहीं झा साहब को खेल करने का मौका भी था.उन्होंने अध्यक्ष को और पुराने अध्यक्ष को लेखा विभाग के मेरे साथियों के मध्य मेरी छवि ख़राब करने की मुहीम पर लगा कर कार्यकारिणी में एक अलग स्वर उठवा दिया जिसे मेनेजमेंट-युनियन मीटिंग में उन्होंने खुला समर्थन भी दिया ,उद्देश्य था लोअर स्टाफ जिसकी तादाद ज्यादा थी के मध्य मेरी इमेज बिगड़ जाए.श्री दीपक भाटिया के माध्यम से पेंटल साहब का सन्देश मुझे मिल गया वही होगा जो मैं चाहता हूँ.११ सितम्बर १९७८ की मीटिंग में पेंटल साहब ने निर्णायक तौर पर कह दिया आज के बाद और कोई मीटिंग नहीं होगी और सेक्रेटरी जेनेरल द्वारा समर्थित वेतन वृद्धि को वह मंजूर करते हैं अब कोई बदलाव उन्हें मंजूर नहीं है.

प्रोमोशन के लिए जो लिस्ट मैंने दी थी उसमें से अपना नाम मुझे हटाना पड़ा,इसी विवाद  के कारण अतः मेरे अतिरिक्त सभी लोगों को अपग्रेड भी करने की बात मान ली गई.पेंटल साहब ने उठते-उठते कहा आप लोगों की डिमांड नहीं थी फिर भी साल में एक बार फ्री जूता यूनिफार्म के साथ देंगें.उनके इतना कहते ही मैंने तपाक से कह दिया और आप अपनी तरफ से दे ही क्या सकते हैं.मेरे जवाब पर सभी लोग ठट्टे लगाते हुए उठ गए और इस प्रकार 'एग्रीमेंट सेटलमेंट'सम्पन्न हो गया.

 हमारे चार्टर आफ डिमांड में लोअर स्टाफ का अधिक ख्याल रखने का मुद्दा हमारे आफिस स्टाफ के हितों के प्रतिकूल पड़ता था.झा साहब आफिस वालों को मेरे विरुद्ध उकसा रहे थे और मैं बहुमत साथ रखने की खातिर आफिस वालों का विरोध सहने के लिए पूरे तौर पर तैयार था.मैंने अपना 'सुपरसेशन' वाला केस भी विद्ड्रा कर लिया जिससे किसी को यह भी कहने का मौका न मिले कि खुद तो प्रमोशन ले लिया और बाकी साथियों का ख्याल नहीं रखा.

युनियन प्रेसीडेंट और बाकी कार्य कारिणी सदस्य झा साहब के इन्फ्लुएंस में चल रहे थे.दीपक भाटिया पूरे तौर पर मेरे साथ थे उनकी ड्यूटी ही ऐसी थी कि अनेकों बार जी.एम्.से सामना होता था उनके माध्यम से मुझे पता था कि पेंटल साहब झा साहब से कितना दुखी हैं और वह हर हाल में मेरे ऊपर झा साहब को नहीं हावी होने देंगे यदि मैं अड़ा रहा तो.इसलिए गिनती के हिसाब से अल्पमत में होते हुए भी और इसलिए भी कि मेरे हटने पर कोई भी सेक्रेटरी जेनरल बनने को तैयार न होता मैं अपने निर्णय को लागू करने में पूर्ण कामयाब रहा.झा साहब की कूटनीति उनके और उनके समर्थक कार्यकारिणी सदस्यों के खिलाफ पड़ गई.सारे स्टाफ के मध्य सन्देश साफ़ था केवल विजय माथुर की अड़ के कारण लोअर स्टाफ का बेनिफिट हुआ है.लिहाजा झा साहब को अपना स्टैंड बदलना पडा.झा साहब के सिखाये आफिस के लोग भी अब पूरी तौर पर मेरे फैसले के पक्ष में हो गए .

तब की बात और थी आज ट्रेड यूनियन्स में लोग सौदेबाजी करके अपना मतलब साधते हैं और कर्मचारियों के हित बलाए ताक पर रख दिये जाते हैं जिस कारण 'संविदा ' और एन जी ओ कर्मियों की भरमार हो रही है और स्थाई कर्मचारी छंटनी का सामना करने को मजबूर हैं। 


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रविवार, 6 अगस्त 2017

संस्कृत को बाजारू बनाने के भयंकर दुष्परिणाम होंगे ------ विजय राजबली माथुर

संस्कृत को बाजारू बनाने के भयंकर दुष्परिणाम होंगे  




(१ ) गणेश स्तुति में एक शब्द आता है - 'सर्वोपद्रवनाश्नम ' अब यदि बाजारू संस्कृत में इसे ऐसे ही पढ़ा गया तो इसका अर्थ होगा 'सारा धन नाश कर दो '. 
इस शब्द को लिखे अनुसार नहीं संधि विच्छेद करके पढना चाहिए यथा - सर्व + उपद्रव + नाश्नम जिसका अर्थ होगा सारे उपद्रव / झंझटों का नाश कर दो. 
(२ ) गणेश स्तुति में ही एक और शब्द है ' बुद्धिरज्ञाननाशो ' इसे बाजारू संस्कृत में जैसे का तैसा पढ़ा गया तो उसका अर्थ होगा बुद्धि और ज्ञान का नाश कर दो. इस शब्द को वस्तुतः संधि विच्छेद करके पढना चाहिए यथा - बुद्धि + अज्ञान + नाशो ' जिसका अर्थ होगा बुद्धि का अज्ञान नष्ट कर दो. 
( ३ ) दुर्गा स्तुति में एक शब्द है ' चाभयदा ' यदि इसे बाजारू संस्कृत में ज्यों का त्यों पढ़ा जाए तो अर्थ होगा ' और भय दो ' . इसको संधि विच्छेद करके च + अभय + दा पढना चाहिए जिसका अर्थ होगा ' और अभय दो '. 
संस्कृत एक श्रेष्ठ वैज्ञानिक भाषा है उसको इस प्रकार बाजारू बनाना षड्यंत्र प्रतीत होता है जिसका साधारण जनता को बेहद बुरा खामियाजा भुगतना पड़ेगा. संस्कृत में तमाम शब्द 'समास ' रूप में प्रयुक्त किये गए हैं लेकिन उनका उच्चारण संधि विच्छेद करके किया जाना उपयुक्त होता है. लेकिन बाजारू संस्कृतबाज़ जनता को ये गूढ़ रहस्य न बता रहे हैं न समझा रहे है - यह घोर अनर्थ है.

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रविवार, 23 जुलाई 2017

रिश्ते सिर्फ घरेलू ही नहीं होते ? ------ विजय राजबली माथुर




* यों साधारण तौर पर 'रिश्ते' से तात्पर्य घरेलू और पारिवारिक रिश्ते - नातों से लिया जाता है। परंतु सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक परस्पर संबंध भी 'रिश्ते ' ही होते हैं। कार्यस्थल पर सह-कर्मियों,अधीनस्थों और वरिष्ठों के मध्य भी रिश्ते होते हैं। मेरठ की एक प्राईवेट लिमिटेड कंपनी मे मुझे पहली नौकरी अपने नानाजी के फुफेरे भाई जो तब वहाँ इंस्पेक्टर ऑफ फैक्टरीज थे के ज़रिये मिली थी.  जब वह कानपुर प्रमोशन पर जा चुके थे और मुझे कार्य करते हुये ग्यारह माह हो चुके थे तब अचानक एक दिन कहा गया कि, लेखा विभाग के तीनों कर्मचारी त्याग - पत्र दे दें तीन दिनों के अंतराल के बाद नया नियुक्ति पत्र दे दिया जाएगा। जबकि अन्य दो लोगों ने ऐसा ही किया मैंने त्यागपत्र न देकर टर्मिनेट किए जाने को कहा।मुझे शो काज नोटिस दिया गया जिसका जवाब मैंने पूर्व पर्सोनेल आफिसर डॉ एम एल झा साहब से लिखवा लिया और उनके निर्देश पर पूर्व फैक्ट्री मेनेजर जैन साहब से वेरिफ़ाई करवाकर टाईप करा कर दे दिया। फैक्ट्री  मेनेजर बृजेन्द्र कुमार अखौरी साहब मेरी सीट पर आए और मुझे बाहर बुलाकर अपना जवाब वापिस लेने को कहा उनकी दलील थी कि, शो काज नोटिस और जवाब दोनों फाड़ देंगे। लेकिन मैंने कहा कि, आप फाड़ने के बजाए कनसेंट टू रिकार्ड कर सकते हैं। अंततः वैसा ही किया गया और मेरी नौकरी लगातार जारी रही जबकि दोनों साथियों की फ्रेश सर्विस हो गई।  
गैर मान्यता प्राप्त यूनियन के कोशाध्यक्ष महोदय ने मुझे दो माह पीछे से सदस्यता देकर यूनियन कार्यकारिणी में शामिल किए जाने का प्रस्ताव किया ( उनकी धारणा थी कि, जब मैं अकेले टकरा सकता हूँ तब मुझे सबके हित के लिए आगे आना चाहिए ) जिसे मैंने स्वीकार कर लिया और इस प्रकार 1973 में 21 वर्ष की आयु से ट्रेड यूनियन के साथ रिश्ते शुरू हुये। ** 1975 मे एमर्जेंसी के दौरान मैं वहाँ से छोड़ कर आगरा चला गया और कुछ दिन बाद निर्माणाधीन होटल मोघुल ओबेराय ज्वाइन कर लिया जो बाद में मुगल शेरटन हो गया था। 1977 मे होटल मुगल कर्मचारी संघ की स्थापना में प्रयासरत सुदीप्तो  मित्रा का बैंक आफ बरोदा में पी ओ के रूप में चयन हो गया और उनके सुझाव पर मुझे सेक्रेटरी जेनरल बना दिया गया। वस्तुतः प्रारम्भ में ही वह मुझे चाह रहे थे जबकि मैंने उनको प्रस्तावित कर दिया था। 
मेरठ के अपने अनुभवों के आधार पर मैं आगरा में अलग थलग रहना चाहता था। एक बार  शुरुआत  में पर्सोनेल मेनेजर आनंदों शोम ने मुझसे अपने आफिस में  बुला कर किसी दूसरी कंपनी में रोज़गार ढूँढने को कहा (मतलब साफ़ था कि, मुझे रिजाइन करना है ), मैंने उनको जवाब दिया कि, आप टर्मिनेट कर सकते हैं परन्तु मैं रिजाइन नहीं कर रहा और बात आई गयी ख़त्म हो गई थी किन्तु खतरा था इसी लिए मैंने युनियन के महामंत्री पद का दायित्व सम्हाल लिया था. मैंने अपने कार्यकाल में कई लोगों की नौकरी बचाने में मदद की, कई लोगों को निहायत ज़रुरत पर भी छुट्टी न मिलने पर उनको सवैतनिक अवकाश मंजूर करवाया,जिनके साथ ज्यादती हुई थी उनको वाजिब प्रोमोशन दिलवाया . इन सबका ही नतीजा था जब इन्वेंटरी में मैंने घपला पकड़ा था तब मुझको रिवार्ड न देकर निलंबित करके दोषियों को बचाया गया था . तब जनवरी १९८५ में निलंबन के दौरान हुए युनियन के चुनावों में बगैर प्रचार के भी मुझे सेकेण्ड हायेस्ट वोट मिले थे जिससे भयभीत होकर फरवरी में टर्मिनेट कर दिया गया. होटल मुग़ल के विरुद्ध श्रम न्यायालय में परिवाद (Case ) करने के सिलसिले में AITUC से संपर्क हुआ जिसके ज़रिये CPI से. पार्टी में शामिल होने के दस माह बाद ही मुझे जिला काउन्सिल में शामिल कर लिया गया और मैं पार्टी कार्यालय में सहयोग करने लगा. हालांकि जिलामंत्री तो कामरेड रमेश मिश्र थे परन्तु कार्यालय का कार्य कोषाध्यछ कामरेड डॉ रामगोपाल सिंह चौहान और डॉ एम् सी शर्मा देखते थे. वे दोनों मेरे कार्य करने से काफी प्रभावित थे. डॉ चौहान तो इतने कि, जब वह गंभीर रूप से बीमार हुए तब अपने उत्तराधिकारी के रूप में मेरा ही नाम प्रस्तावित कर दिया और उनके सम्मान को देखते हुए काफी सीनियर्स के होने के बावजूद मुझे ही उनका चार्ज दिया गया.
*** ईमानदार कार्य और परस्पर व्यवहार - रिश्तों के कारण ही युनियन और पार्टी में मुझे दायित्व मिले थे. लेकिन फिर भी कुछ लोग सभी जगहों पर जल्खोरे और चिढोकरे होते हैं उनसे CPI भी अछूती नहीं है इसी कारण आगरा में १४ वर्षों तक पार्टी से अलग रहा था परन्तु वहां के तत्कालीन जिलामंत्री के आग्रह पर पुनः पार्टी में वापिस आ गया था और लखनऊ आने पर यहाँ भी सक्रिय रहा.किन्तु यहाँ भी वैसे जल्खोरे और चिढोकरे दो लोगों के कारण फिलहाल शारीरिक रूप से सक्रिय नहीं हूँ क्योंकि, एथीस्ट होने का एलान करने के बावजूद इन दोनों ने तांत्रिक प्रक्रिया से मुझे अस्वस्थ कर रखा है.
निहित स्वार्थ वाले लोगों की कथनी और करनी में अंतर होता है और उनके साथ काम करने में मुझे दिक्कत होती है. इसलिए चुप बैठना ही श्रेयस्कर भी है.

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रविवार, 23 अप्रैल 2017

यादों के तहखाने से ( भाग - 2 ) ------ विजय राजबली माथुर

****** " मुझे खेलों में भाग लेने का शौक नहीं था। लेकिन मुझे अपनी कक्षा के एक पहलवान टाईप सहपाठी जिसके पिताश्री पुजारी / कथावाचक थे का हमेशा कबड्डी में आउट न होना अखरता था। सुना था कि, वह रोजाना भगवा झंडे के साथ लगने  वाली शाखा में भाग लिया करता था। उसको सबक सिखाने के लिहाज से एक रोज़ मैंने उसकी विरोधी टीम में कबड्डी खेलने की इच्छा व्यक्त कर दी , ...........................उनको इस बात की खुशी थी कि, पढ़ाई में अनाड़ी छात्र ( जिसे अक्सर बेंच पर पूरे क्लास वह दंड स्वरूप खड़ा करते थे ) को खेल में भी चाहे एक ही बार सही उस छात्र ने परास्त कर दिया जिसे वह सराहते थे और जिससे अक्सर पाठ का वाचन करवाते थे। 
चूंकि पढ़ाई में फिसड्डी होने के कारण वह हम लोगों से मदद लेता था इसलिए अपनी हार पर भी प्रतिशोध उसने नहीं माना था। " ******

पचपन वर्ष पीछे 1962 में लौटते हैं तो ध्यान आता है कि, चीन के हमले के बाद जब बाबूजी का ट्रांसफर बरेली से सिलीगुड़ी हो गया था तब भी बीच सत्र में हम लोगों को दाखिले की समस्या का सामना करना पड़ा था वजह यह थी कि, बाबू जी का ट्रांसफर जहां हुआ वहाँ हम लोग नहीं गए थे । तब भी हम लोग शाहजहाँपुर नाना जी के पास रहने गए थे क्योंकि सिलीगुड़ी शुरू में नान - फैमिली स्टेशन घोषित हुआ था। बहन का दाखिला तो नाना जी ने अपने एक परिचित तिनकू  लाल वर्मा जी के प्रबंध वाले आर्य कन्या पाठशाला में सहजता से करवा दिया था। अंततः अपने एक और पूर्व परिचित के तल्लउआ, बहादुरगंज स्थित  विश्वनाथ जूनियर हाई स्कूल  में भाई व मुझे भी प्रवेश दिलवा दिया। 

स्कूल के बाहर खाली पड़ी ज़मीन में स्कूल के बच्चे इंटरवेल में कबड्डी वगैरह खेलते थे। मुझे खेलों में भाग लेने का शौक नहीं था। लेकिन मुझे अपनी कक्षा के एक पहलवान टाईप सहपाठी जिसके पिताश्री पुजारी / कथावाचक थे का हमेशा कबड्डी में आउट न होना अखरता था। सुना था कि, वह रोजाना भगवा झंडे के साथ लगने  वाली शाखा में भाग लिया करता था। उसको सबक सिखाने के लिहाज से एक रोज़ मैंने उसकी विरोधी टीम में कबड्डी खेलने की इच्छा व्यक्त कर दी , मैं रोज़ उसकी गतिविधियों को बारीकी से देखता रहा था। उसके विरोध की टीम का नेतृत्व हर नारायण नामक छात्र ही करता था जिसने मुझे सहर्ष शामिल कर लिया। हमारी टीम में हर नारायण समेत जब सभी छात्र आउट हो गए और मैं अकेला ही बचा तब वह पंडित पुत्र पहलवान छात्र आया मैं पीछे हटते  हुये  उसे पाले के अंतिम छोर तक ले आया और वहाँ कस कर उसका हाथ पकड़ लिया पूरी ताकत लगा कर भी वह छुड़ा न पाया , मुझे गिराया तो खुद भी गिर पड़ा और खींचता रहा किन्तु पाले तक न पहुँच पाया और उसे भी पहली बार आउट होना ही पड़ गया। यह खबर तुरंत प्राचार्य शर्मा जी तक पहुँच गई जो हम लोगों को हिस्ट्री (इतिहास ) पढ़ाते थे , वह सरदार पटेल हिन्दू इंटर कालेज के प्रिंसिपल पद से रिटायर्ड़ थे और निशुल्क पढ़ाते थे किन्तु आने - जाने का रिक्शा भाड़ा प्रबन्धक उनको दे देते थे। उनको इस बात की खुशी थी कि, पढ़ाई में अनाड़ी छात्र ( जिसे अक्सर बेंच पर पूरे क्लास वह दंड स्वरूप खड़ा करते थे ) को खेल में भी चाहे एक ही बार सही उस छात्र ने परास्त कर दिया जिसे वह सराहते थे और जिससे अक्सर पाठ का वाचन करवाते थे। 
चूंकि पढ़ाई में फिसड्डी होने के कारण वह हम लोगों से मदद लेता था इसलिए अपनी हार पर भी प्रतिशोध उसने नहीं माना था। एक बार नाना जी के साथ उनके किसी परिचित के यहाँ कथा में गए थे वहाँ भी वह अपने कथावाचक पिता जी के साथ उनके सहायक के रूप में आया था और बाद में उनको बताया था कि, हिस्ट्री में यह हमारी बहुत मदद करते हैं वैसे तो खेलते नहीं हैं लेकिन एक बार खेल कर मुझे हरा दिया था। उसके पिता जी ने हिस्ट्री में उसकी मदद कर देने के लिए शाबाशी ही दी थी। 
1963 में सिलीगुड़ी के फैमिली स्टेशन घोषित हो जाने पर माँ और बहन बाबू जी के पास चले गए थे। भाई और मैं नाना जी के पास ही रहे थे। जब नाना जी बाज़ार जाते थे हम भाई लकड़ी चीड़ कर रख देते थे और कुएं से पानी भी भर कर रख लेते थे। हालांकि नाना जी एतराज़ करते थे कि, तुम लोग पानी भरने और लकड़ी चीड़ने का काम क्यों करते हो ? इसलिए रोकने के लिए कभी कभी वह हम दोनों को भी बाज़ार अपने साथ ले जाते थे। 
वैसे तो नाना जी को गाना वगैरह पसंद नहीं था लेकिन अजय को वह अधिक चाहते थे इसलिए उसके गुनगुनाने पर एतराज़ नहीं करते थे। अजय को 'जो वादा किया वह निभाना पड़ेगा ' बेहद पसंद था उसी को अक्सर गुनगुनाते थे :

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