रविवार, 14 मार्च 2021

" पर उपदेश कुशल बहुतेरे " : प्रगतिशील विद्वान


 

कबीरदास जी ने कहा था :

'' सार - सार को गही देय , थोथा देय उडाय   । 

साधू ऐसा चाहिए     जैसा सूप       सुभाय     । । "

लेकिन आज प्रगतिशील कहाय जाने वाले विद्वान सिर्फ समारोहों में माला पहनने तक ही सीमित है साहित्य का परिमार्जन खुद वे नहीं करेंगे " पर उपदेश कुशल बहुतेरे " नीति के तहत दूसरों से ऐसा करने की अपेक्षा रखेगे ------


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सोमवार, 7 सितंबर 2020

लखनऊ मेट्रो



साभार 
Road : 

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मंगलवार, 4 अगस्त 2020

ज्योतिष का विरोध करते करते ------




 * ज्योतिष का विरोध करते करते जब मैं खुद ज्योतिष का जानकार बन गया और सार्वजनिक रूप से लोगों को समाधान बताने लगा तब आगरा में एक स्थापित जानकार के जी शर्मा साहब ने तंज़ किया था कि आपने ब्राह्मणों के मुंह पर तमाचा मारा है जो इस क्षेत्र में आ गए।
लखनऊ आने पर एक उच्च पदस्थ ब्राह्मण कामरेड साहब का कहना था कि जब इस क्षेत्र में आए हो तो वैसे ही चलो जैसे सब चलते हैं तभी सफल हो सकते हो वरना नहीं।
सिर्फ ब्राह्मणों की ही नहीं बल्कि ज़्यादातर लोगों की यही समझ है कि ज्योतिष का जानकार केवल ब्राह्मण ही हो सकता है या गैर ब्राह्मण अगर स्थापित ब्राह्मण की तर्ज पर चले तभी उसे सफल माना जाएगा। लेकिन खुद ब्राह्मण अपने निजी हित  में बड़े आराम से मुझसे परामर्श लेकर लाभ उठाते रहे हैं। आगरा कालेज,आगरा में जूलाजी के विभागाध्यक्ष रहे डॉ वी के तिवारी, बी पी सी एल के उच्चाधिकारी रहे डॉ बी एम उपाध्याय,सी एफ टी आई , आगरा में डिप्टी डाइरेक्टर रहे आर पुरी,सपा नेता पंडित एस पालीवाल तथा लखनऊ में भाकपा के एक बड़े पदाधिकारी  ब्राह्मण कामरेड के साथ साथ दो अन्य ब्राह्मण कामरेड्स मुझसे ज्योतिषीय परामर्श लाभ ले चुके हैं।

 ** लेकिन जब हमारे अपने रिश्तेदार मुझसे परामर्श तो ले लेते हैं फिर भी मानते ब्राह्मण पंडितों की हैं और नुकसान उठा लेते हैं तब बेहद वेदना होती है कि मुझसे पूछने का उनको फायदा क्या हुआ जब लकीर का फकीर ही बने रहना था?  ऐसे ही एक रिश्तेदार ने अपनी बेटी की शादी किसी ब्राह्मण पंडित से गुण मिलवा कर ऐसे समय में कर दी जो मैंने ल्खित में खराब बताया था और उसका समाधान भी लिख कर दिया था। जब मुझे बताए ही नहीं तो मेरा बताया समाधान कैसे कर सकते थे ? अब जब सुसराल में उनकी बेटी को संकट का सामना करना पड़ रहा है तब ब्राह्मण पंडित के पास न जाकर मुझसे उसका समाधान चाहते हैं। यदि पहले ही मेरी बात माने होते तब अब उनकी बेटी के समक्ष संकट खड़ा ही न होता।
इसी प्रकार आगरा में भी रिश्ते के एक बहनोई और एक भांजे ने अपनी अपनी बेटियों की शादी के समय मेरे बताए उपाए न करके ब्राह्मण पंडितों के बताए उपाए अपनाए और उन दोनों के समक्ष ही संकट खड़े हुये थे।

*** परंतु गैर रिश्तेदार कायस्थ परिवारों ने आगरा में मेरा ही परामर्श मान कर स्वंय  और अपने परिवार को संकटों से बचा लिया था। उनमें से एक ने दो  मकान बनाए और दोनों के गृह - प्रवेश पर ब्राह्मण पंडित न बुलाकर मुझसे ही हवन करवाने को कहा। 

**** लेकिन आपने कुछ निकटतम रिश्तेदार ऐसे भी हैं जो मुझसे परामर्श लेकर लाभ तो उठाया चुके हैं और आज मुझको ही नुकसान पहुंचाने में व्यस्त हैं। 


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सोमवार, 3 अगस्त 2020

सोमवार, 22 जून 2020

डॉ अजीत माथुर



 डॉ अजीत माथुर के निधन की इस सूचना से व्यक्तिगत रूप से आघात लगा है। डॉ अजीत  माथुरसभा,आगरा के अध्यक्ष तो रहे ही थे उनसे हमारी रिश्तेदारी भी दरियाबाद के खानदानी तौर पर थी। रिश्ते में वह हमारे भांजे होते थे। उनकी माताजी ने ही स्पष्ट किया था कि वह खानदानी रिश्ते में हमारी बहन थीं। वह यू एस ए प्रवासी अजीत जी के छोटे भाई के संबंध में ज्योतिषीय सलाह के लिए मुझे बुलवाती थी। रश्मी जी ( डॉ अजीत की पत्नी ) भी मुझसे अपनी बेटी के विवाह के संदर्भ में परामर्श ले चुकी थीं। एक बार डॉ अजीत के बहनोई साहब भी उनके घर आए हुए थे जो ज्योतिष के विरुद्ध थे। रश्मी जी ने मुझसे उनका हाथ देख कर यह बताने को कहा कि उनके ऐसे विचार क्यों हैं? वह किसी को हाथ नहीं दिखाते थे परंतु रश्मी जी के जोर देने पर इस शर्त के साथ मुझे हाथ दिखाने को राजी हुए कि पहले मैं उनको यह बताऊँ कि वह करते क्या हैं ? सबसे पहले मैंने उनको दोनों हाथ उलट कर दिखाने को कहा फिर सीधे करके। उनको जब यह बताया कि आप या तो डॉ होंगे या मिलेटरी आफ़ीसर तब उनका स्पष्ट कहना था कि वह दोनों हैं अर्थात amc – आर्मी मेडिकल कोर में चिकित्साधिकारी हैं। लेकिन वह अब यह जानना चाहते थे कि यह निष्कर्ष कैसे निकाला ? उनको जब इसका आधार समझाया तो उनको ताज्जुब हुआ कि न तो पंडित लोग उलटे करके हाथ देखते हैं न ही दोनों हाथ जबकि मैंने ऐसा ही किया । उस समय वहाँ डॉ अजीत साहब की पत्नी व बहन दोनों उपस्थित थे दोनों के लिए यह पद्धति नई थी जबकि  हस्त – ज्योतिष का यह मूल सिद्धांत है। 
माथुरसभा के कार्यक्रमों में भी डॉ अजीत बड़ी आत्मीयता से ही मिलते रहे थे। उनके निधन की सूचना बेहद दुखद रही।  

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मंगलवार, 2 जून 2020

ब्लाग - लेखन के दस वर्ष ------ विजय राजबली माथुर

" 1-Quick & fast decision but slow & steady action.
2-Decided at once decided for ever & ever .
3-उदारता एक मानवीय गुण है सभी को उदार होना चाहिए किन्तु उसके साथ-साथ पात्र की अनुकूलता भी होनी चाहिए।
4-जब तक जियो स्वाभिमान से जियो ; चाहे सर कटा लियो पर सर झुका न लियो।
5-सत्य बोलो चाहे कटु ही हो, असत्य न बोलो चाहे प्रिय ही हो।
6-न सूरत बुरी है, न सीरत बुरी है; बुरा है वह जिसकी नीयत बुरी है।"
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इन तथ्यों के आधार पर 02 जून 2010 से ' क्रांतिस्वर ' नाम से ब्लाग लेखन प्रारंभ किया था उसके बाद 03 अगस्त 2010 से ' विद्रोही स्व - स्वर में ' नामक एक और ब्लाग का प्रारंभ किया तत्पश्चात ' कलम और कुदाल ' , ' सुर संगीत ',' सर्वे भवन्तु सुखिन : ' ब्लागस भी शुरू किए किन्तु मोदी / केजरीवाल ग्रुप द्वारा इन ब्लागस को फ़ेसबुक पर कम्युनिटी के अगेनसट् घोषित कराए जाने के कारण अब लिंक देना संभव नहीं रह गया है। ' साम्यवाद - communism ' नामक एक और ब्लाग लेखन भी जारी है।
2010 में ब्लाग - लेखन से पूर्व मेरठ में ' पी सी टाईम्स ' एवं आगरा के ' सप्तदि वा ' साप्ताहिक, ' ब्रह्मपुत्र ' साप्ताहिक में तथा कुछ समय ' अग्रमंत्र ' त्रैमासिक में मेरे लेख छपते रहे थे।
' सप्तदिवा ' साप्ताहिक तथा ' अग्रमंत्र ' त्रैमासिक में मैंने उप - संपादक के रूप में भी कार्य किया है। लखनऊ आने पर भी एक स्थानीय अखबार में ब्लाग - लेखन से पूर्व मेरे लेख छपे हैं।
कुछ ब्लाग पोस्ट्स को कुछ अखबारों ने सूचित करके अपने यहाँ भी स्थान दिया है।
सं सामयिक विषयों पर ' सर्वजन हिताय - स्वांतः सुखाय ' आधार पर ब्लागस तथा फ़ेसबुक पर लेखन सतत जारी है और स्वस्थ रहने तक जारी रहेगा ।

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सोमवार, 20 अप्रैल 2020

कोरोना लाकडाउन नौकरियों में अनिश्चितता व संघर्ष का जनक

२० अप्रैल हमारी दिवंगत माँ  का भी जन्मदिन है और हमारे दिवंगत छोटे बहनोई का भी ।
बहन ने माँ  को बताया था कि कमलेश बाबू को टिंडे की सब्जी पसंद नहीं है कभी नहीं खाते है। जब वह पहली बार बहन के साथ हमारे घर शाहगंज आगरा के  प्रतापनगर वाले किराये के  मकान में आए थे। बउआ (माँ ) ने भरवां टिंडे की सब्जी बना भोजन के साथ परोसी थी , वह स्वादपूर्वक खा  गए बल्कि और की मांग भी की। फिर कमलानगर , आगरा वाले अपने मकान में भी कई  बार भरवां टिंडे की सब्जी वह शौक से खाते रहे। बउआ व कमलेश बाबू के जन्मदिन के अवसर पर अकस्मात यह पुरानी घटना सादर स्मरण हो आई। 

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१९७२ और २०२० में फ़र्क
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१५ मई १९७२ को  सरधना रोड ,कंकरखेड़ा, स्थित जिस फेक्टरी में बी ए कर के बेरोजगार होने के कारण  मैंने पहली नौकरी अकाउंट्स विभाग में शुरू की थी  वह जैनियों की थी और उसमें एक क्लर्क जैनी थे, कैशियर मालिकों के मामा थे और मेनेजर अकाउंट्स रिटायर्ड बैंक मेनेजर थे। मेरे पास कोई अनुभव नहीं था जैन साहब बताने को तैयार नहीं थे और मुझको अनफ़िट और सरप्लस बताते थे  । मेनेजर साहब कमर्शियल अकाउंट्स से अनभिज्ञ थे ।
पुरानी फ़ाइलें मेनेजर साहब से मांग कर अध्ययन करके दो  दिन बाद मैंने मेनेजर साहब से कुछ वाउचर्स मुझसे भी बनवाने का निवेदन किया और मैं भी वाउचर्स बनाने लगा तब वह जैन साहब मेनेजर साहब से कहने लगे आप मेनेजर हैं केवल वाउचर्स पास कीजिए चेक करने को उनको दिलवाएं।
दो - तीन दिन बाद वह मेनेजर साहब से बोले अब इनको काम आ गया है यही सारे वाउचर्स बनाएंगे और वह चेक करेंगे, वाउचर नहीं बनाएंगे सिर्फ वाउचर्स  देखेंगे । न तो मेनेजर साहब को न ही मुझको आपत्ति थी कुछ माह बाद ही  मुझको अनफ़िट और सरप्लस  बताने वाले  जैन साहब ने मुझे  बिल पेमेंट्स,चेक बनाना सब कुछ सौंप दिया ।
सवा  तीन साल मैं वहाँ रहा मेरे संबंध जैन साहब से मधुर रहे फिर वह भी सहयोग करते रहे।

२०२० मे मुझे निजी संस्थान में कार्यरत लोगों से जो सूचनाएं मिलती हैं उनमें सभी संस्थानों में सीनियर्स जूनीयर्स को प्रतिद्वंदी मान  कर उखाड़ने के प्रयासों में संलग्न पाए गए हैं। कोरोना लाकडाउन में नौकरियां जाने की आशंका में सीनियर्स अपने वरिष्ठ जूनियर के विरुद्ध कई  जगह षड्यंत्रों में मशगूल हो गए हैं। क्योंकि सेवायोजक कहीं पुराने ज्यादा वेतन वाले कर्मचारी को हटा कर कम वेतन वाले उसके निकटतम जूनियर से काम न चला  ले  अतः उसके भी जूनि यर्स को उसके विरुद्ध भड़काना सीनियर मोस्ट का शगल बन गया है।कोरोना लाकडाउन नौकरियों में अनिश्चितता व संघर्ष का जनक सिद्ध हो रहा है।  

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