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सोमवार, 29 दिसंबर 2014

वर्ष 2014 की सबसे मूल्यवान उपलब्धि --- विजय राजबली माथुर

बहुत कम ही ऐसे अवसर रहे हैं जबकि मेरे कार्यों या निर्णयों को समर्थन मिला हो। अधिकांशतः मुझे आलोचनाओं व विरोध का ही सामना करना पड़ता रहा है। किन्तु विगत 30 नवंबर 2014 ,रविवार का दिन मेरे लिए इस संदर्भ में इसलिए स्मरणीय बना रहेगा कि इस दिन मेरे निर्णयों व कार्यों को हमारे ऊपर की पीढ़ी के हमारे चाचा  (पिताजी के एक चचेरे भाई ) द्वारा सही ठहराया गया। 1978 में जब हमने अपने निजी मकान (कमला नगर,आगरा ) में प्रवेश किया था तब हमारे माता-पिता दोनों जीवित थे अतः भाई-बहन तो आते ही रहते थे बल्कि ऊपर की पीढ़ी के भुआ-फूफाजी व एक ताऊजी भी वहाँ आए थे। माँ के दो चाचा, एक चाची और चचेरे भाई-बहन भी वहाँ आए थे। किन्तु 1995 में माता-पिता के न रहने के  तत्काल बाद माईंजी आईं थीं । एक अरसे बाद   पिताजी के एक चचेरे भाई व माँ के एक चचेरे भाई ही हमसे मिलने आए जबकि 2009 में लखनऊ आ जाने के बाद से अब तक छोटी बहन -बहनोई व बड़ी भांजी सपरिवार आए जबकि एक चचेरे भाई व एक चचेरी भांजी ही सपरिवार आए हैं।

30 नवंबर को पिताजी के दूसरे चचेरे भाई जब हमसे मिलने आए तो बेहद  खुशी हुई  कि अभी हमें बुज़ुर्गों ने  भुलाया नहीं  है। माता-पिता द्वारा पूनम से मेरे पुनर्विवाह का निर्णय लेने के बाद उन दोनों का ही निधन हो जाने के कारण जहां छोटे भाई -बहन सहित अधिकांश रिश्तेदार पूनम से विवाह किए जाने को गलत ठहरा रहे थे इन चाचा ने स्पष्ट कहा कि तुमने भाई साहब -भाभी जी की बात उनके बाद भी मान कर सही निर्णय लिया है।उन्होने मेरे ब्लाग -लेखन को भी सही ठहराया। उन्होने पैतृक संपति न लेने के हमारे पिताजी के निर्णय को भी सही ठहराया। पिताजी की ईमानदारी व परिवार के प्रति निभाए कर्तव्यों की भी चाचा ने सराहना की। इससे यह ढाड़स  मिला की अभी भी ईमानदारी अपना कर हमने कुछ भी गलत नहीं किया है और इसी पथ  पर आगे भी चलते रहना चाहिए। 

1975 में बहन की शादी हुई थी और 1976 में बहनोई साहब ने बहन से माँ को कहलाया था कि बाबूजी को दरियाबाद की पैतृक संपति ले लेनी चाहिए उसकी देख-रेख करने के लिए वह BHEL की अपनी नौकरी भी छोडने को तैयार थे। उनका यह भी कहना था कि यदि बाबूजी मकान बनाते हैं तो उनको एक-एक कमरे के ही सही तीन मकान बनाने होंगे। परंतु बाबूजी जब 1978 में रिटायर हुये तो उनको पूरी पेंशन भी इसलिए न मिली कि वह पहले ही बहन की शादी के वक्त पेंशन बेच चुके थे तो मकान कैसे बनाते? मेरे द्वारा 15 वर्षीय किश्तों पर आगरा में मकान लेना उनको भी नागवार गुजरा था। होटल मुगल में जाब खत्म कराने में उनकी भी भूमिका रही थी जिसका अब जाकर खुलासा हुआ है। वे लोग सोचते थे किश्तें अदा न कर पाने के कारण मेरा एलाटमेंट केन्सिल हो जाएगा।  परंतु मैंने भूखे रह कर भी किश्तें चुका दीं थी और उसी मकान को बेच कर अब लखनऊ में घाटे पर लिया है। मेरा लखनऊ आना तो उनको इतना अखरा कि तिकड़म करके मेरे पुत्र का जाब भी खत्म करा दिया। दरियाबाद में बाबूजी के भतीजों को भी अपने साथ लामबंद करके उन्होने हमें अलग-थलग करने की किलेबंदी कर रखी है।

ब्लाग-जगत में दरियाबाद से संबन्धित रांची स्थित एक ब्लागर के माध्यम से पटना के पूना प्रवासी ब्लागर को अपनी छोटी बेटी के संपर्क द्वारा मेरे व पुत्र के लेखन के विरुद्ध भी बवंडर खड़ा किया गया। उन्ही संपर्कों द्वारा हमारी पार्टी के एक प्रदेश नेता को भी मेरे विरुद्ध जुटाया गया जो मेरे लेखन का प्रखर विरोधी और आलोचक बन कर मुझे उत्पीड़ित करने का हर प्रयास करता रहता है। 

ऐसी परिस्थितियों के बीच हमारे चाचा ने हमारे घर आकर हमको सही ठहराया यही हमारी वर्ष 2014 की सबसे मूल्यवान उपलब्धि है। 

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गुरुवार, 24 जनवरी 2013

21 दिसंबर 12 और 23 जनवरी 13 की दास्तान---विजय राजबली माथुर

21 दिसंबर 2012 को माया केलेनडर के अनुयायी 'जियो टी वी' आदि ने 'प्रलय दिवस' के रूप मे प्रचारित कर रखा था।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ,लखनऊ के ज़िला मंत्री कामरेड मोहम्मद ख़ालिक़ साहब ने इसी दिन अपनी एक पुत्री की शादी की सायत रखी थी।   उससे एक  दिन  पूर्व रात्रि से ही मौसम मे अचानक ठंड काफी बढ़ गई थी सुबह काफी घना कोहरा था किन्तु बाद मे दिन मे धूप अच्छी हो गई थी। शाम को उनके यहाँ कार्यक्रम  मे आए कई कामरेड्स से मुलाक़ात हुई। प्रदेश के एक पदाधिकारी साहब मुझ से ज्योतिष के प्रश्न पर वार्ता करने लगे। ज्योतिष विरोधी यह कामरेड कुछ ही दिन पूर्व अपनी पुत्री के विवाह हेतु मुझसे ज्योतिषीय परामर्श ले चुके थे और उसका लाभ भी उठाया था। उनकी सफाई थी कि,एक कम्युनिस्ट होने के नाते उनका ज्योतिष पर विश्वास नहीं है परंतु लड़के वालों की इच्छानुरूप जन्मपत्री देनी होती है। 

मैंने उनको उपरोक्त संदर्भित लिंक पोस्ट का हवाला देकर बताया कि हम भी अंध-विश्वास-पाखंड और ढोंग का प्रबल विरोध करते हैं किन्तु ग्रह-नक्षत्रों के वैज्ञानिक प्रभाव को नकारना मानव अहित मे मानते हैं। तब उन्होने एक अलग कहानी बता कर उनके द्वारा ज्योतिष का विरोध करने की प्रवृत्ति को जायज ठहराया। उनका कथन था कि जब उनके बाबाजी (grand father)का देहावसान हुआ तब वह दो-ढाई वर्ष के थे और उनके पिताजी अवैतनिक छुट्टी पर रह कर लखनऊ मे उनका इलाज करा रहे थे और उस वक्त उनकी जेब मे मात्र एक रुपया ही शेष था। चूंकि उनके बाबाजी तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्र भानु गुप्त जी तथा IAS/IPS अधिकारियों के गुरु रहे थे अतः वे सब प्रतिदिन बलरामपुर अस्पताल मे उनको देखने आते रहते थे और व्यवस्था कराते रहते थे। उनकी अंतिम क्रिया की व्यवस्था भी प्रशासनिक तौर पर हुई। इस घटना के बाद उन पदाधिकारी साहब के पिताजी ने ब्राह्मण वंश मे होते हुये भी तेरहन्वी आदि कुसंस्कारों का परित्याग करके सदा के लिए 'धर्म-कर्म' को त्याग दिया था वह खुद भी उसी परंपरा का अनुसरण करते हुये ही कम्युनिस्ट बने हैं। 

चाहें कम्युनिस्ट हों या और कोई प्रगतिशील या वैज्ञानिक धर्म को अफीम कहते हैं। नतीजा यह होता है कि,'धर्म' जिसका आशय शरीर और ज्ञान को धारण करना है यथा- 'सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह,ब्रह्मचर्य' को वे ठुकरा देते हैं और असफलता का सामना करते हैं जैसा कि 1991 मे रूस मे साम्यवादी शासन के पतन से सिद्ध हो जाता है। भारत मे भी 'स्टालिन' की सलाह की उपेक्षा करके वे रूसी लकीर के फकीर बने चले आ रहे हैं। इस सब का दुष्परिणाम यह होता है कि शोशंणकारी/उत्पीडंनकारी शक्तियाँ जनता के समक्ष 'ढोंग-पाखंड-आडंबर' को धर्म के रूप मे पेश करके उसे उल्टे उस्तरे से मूढ़ने मे सफल हो जाती हैं।  

यदि जनता को वास्तविक धर्म और वास्तविक 'भगवान'=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न(नीर-जल) जो खुद ही बने होने के कारण ' खुदा' कहलाते हैं और उत्पत्ति,स्थिति,संहार = G(जेनरेट)+O(आपरेट)+D(डेसट्राय) की प्रवृत्ति के कारण GOD भी कहे जाते हैं के बारे मे समझाया जाये तो वह व्यापारियों/उद्योगपतियों के ढोंगवाद को धर्म के धोखे मे न पूजे। किन्तु साईंसदा/प्रगतिशील कहलाने वाले लोग ही पाखंड और ढोंग के लिए खुला मैदान छोड़े रख कर उसे पोसते हैं।

23 जनवरी 2013 को मुझे सोशलिस्ट फाउंडेशन के अध्यक्ष और फारवर्ड ब्लाक के प्रदेशाध्यक्ष महोदय ने तीन विद्यालयों मे 'नेताजी सुभाष चंद्र बोस'के विषय मे अपने लेख से परिचित कराने को कहा था। 

जिस दिन मैंने उनको कार्यक्रम मे भाग लेने की सहमति दी उसी दिन रात्रि 08-30 बजे एक पुराने क्लाईंट 23 जनवरी 2013 को ही अपने मकान का गृह-प्रवेश हवन मुझसे करवाने का आग्रह लेकर आए। यह मुहूर्त उन्होने एक कांग्रेसी सांसद के पुरोहित से निकलवाया था जो उनके लिए उचित भी नहीं था किन्तु वह सबको निमंत्रण पत्र भेज चुके थे। अतः उस दिन उनके लिए शुभ समय चुन कर उनको हामी भर दी जिसके लिए 'नेताजी सुभाष' के कार्यक्रमों को छोड़ने का खूब मलाल रहा। हमेशा ढंग से नियमानुसार हवन करने वाले उन साहब ने बहुत महत्वपूर्ण हवन भी अनमनेपन से किया ,मेरे बताने के बावजूद मेरी राय की उपेक्षा करके उन्होने अपने निवास मे 'मंदिर' भी बनवा कर खुद ही वास्तु-विकार भी उत्पन्न कर रखा है। अपने कर्मों का मर्म वे ही जानें मैंने अपनी ओर से पूर्ण विधि-नियमों के अनुसार उनका हवन सम्पन्न करा दिया है। 

उनके पिताजी ने अपने जीवन की कारुणिक गाथा का ज़िक्र मुझसे निजी वार्ता मे  किया कि उनकी 06 वर्ष की आयु मे उनके पिताजी (अर्थात क्लाईंट के पितामह) का निधन हो गया था वह श्रम-मजदूरी करते थे और उनके निधन के बाद उनकी माताजी ने बड़े कष्टों से उन लोगों को पाला-पोसा और पढ़ाया। बड़े होने पर उनको खुद भी रात्रि मे मजदूरी करके दिन मे अपनी पढ़ाई जारी रखनी पड़ी। LLb करके वह न्यायिक सेवा मे आ गए तथा हाई कोर्ट ,अलाहाबाद से सेवा निवृत होने के बाद भी 72 वर्ष की आयु तक विभिन्न आयोगों के सदस्य के रूप मे अपनी सेवाएँ प्रदान करते रहे। उनके तीनो  पुत्र क्रमशः डाक्टर,एस पी,इंजीनियर हैं। पुत्रियाँ भी अच्छे खानदानों मे हैं । वह इस सब को अपने लिए परमात्मा की कृपा-प्रसाद मानते हैं। अपने बचपन मे जो कठोर श्रम और अध्यन उन्होने किया उसका प्रतिफल उनकी संतानों को भी मिल रहा है उनके अनुसार यह सब उनकी ईमानदारी का प्रतिफल है। उनके जीवन से प्रेरणा ग्रहण की जा सकती है।

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रविवार, 25 मार्च 2012

आगरा/1994 -95 / (भाग-3 )

भाकपा छोड़ कर सपा मे शामिल होना हींग की मंडी के दुकानदारो को अच्छा नहीं लगा क्योंकि वे सभी भाजपा के समर्थक थे और सपा को मुस्लिम समर्थक मानते थे ,भाकपा से उन्हे दिक्कत न थी क्योंकि रूस से व्यापार करने के कारण कम्युनिस्टो के वे संपर्क मे थे। मेरा होटल मुगल का केस जो मै मिश्रा जी की सलाह पर कामरेड जगदीश को सौंप (कामरेड हरीश आहूजा के भाकपा छोडने के बाद ) चुका था। चूंकि शालिनी की तबीयत ठीक नहीं चल रही थी कभी फायदा दीखता था और कभी परेशानी हो जाती थी। मै दोबारा लखनऊ या बाराबंकी जाकर कामरेड रामचन्द्र बख्श सिंह अथवा कामरेड मित्र सेन यादव से न मिल सका अन्यथा उनके द्वारा मुख्यमंत्री मुलायम सिंह जी से लेबर कोर्ट मे कहला कर फैसला अपने पक्ष मे कराने को कहता। परंतु इसी भय से मिश्रा जी ने कामरेड जगदीश से कह कर लेबर कोर्ट के पीठासीन अधिकारी (जो रिटायर्ड IAS होते हैं )को कहला दिया कि वह मेरे श्रमिक प्रतिनिधि नही हैं। मुगल मेनेजमेंट से मिल कर इन लोगों ने यह जजमेंट लिखवा लिया कि "Petitioner is no more interested" और इस प्रकार होटल मुगल एक्स पार्टी केस जीत गया। थोड़े दिनो बाद  वह पीठासीन अधिकारी मेरठ स्थानांतरित हो गए उनके पुत्र को कोई गंभीर बीमारी भी ग्रस्त कर गई किन्तु मेरे केस को तो वह बिगाड़ ही गए। इन सब बातो का पता भी तुरंत न चल सका जो हाई कोर्ट मे अपील करता और न ही तब यह सोचने की फुर्सत थी। जैसे तैसे घर और दुकानों की नौकरी चलाना था। सपा मे पूर्ण सक्रिय भी न हो सका।

शायद बीमारी की वजह से ही शालिनी को इस वर्ष गर्मी ज्यादा सता रही थी। रसोई की खिड़की के शीशे तोड़ कर उनके स्थान पर जाली लगा दी थी 08 मई को । इससे पहले दिन सुबह शालिनी अपनी भाभी से मिलने गई थीं उनकी माँ और भाई को कहीं ज्यादा दिनो के लिए जाना था सीमा को छोडने को योगेन्द्र ने मना कर दिया था। शालिनी की माँ ने बड़ी ही बेशर्मी से मुझसे शालिनी को उनकी गैर हाजिरी मे छोडने को कहा जबकि वह एक बार भी शालिनी को देखने नहीं आई थी और न ही शरद आए थे। मैंने भी दो टूक कह दिया आप लोग शालिनी की बीमारी मे देखने भी नहीं आए,पहले मेरे द्वारा मदद करने पर मुझे आपने व आपके जेठ ने बेवकूफ करार दिया अतः  अब मै यहाँ शालिनी को  नही रहने दूंगा। तब बनवारी लाल भी कुछ दिनो के लिए प्रताप गढ़ गए थे शायद अपना सामान वहाँ से लाने को। खरी बात बुरी लाग्ने के कारण वह उठ कर बच्चो के साथ टी वी देखने चली गई। संगीता ने स्वीकार किया कि मेरा तर्क गलत नही था और अपनी मजबूरी शालिनी से बता कर कहा कि विजय बाबू को दूसरे-तीसरे दिन भेज कर हाल-चाल ले लें। अब मुझे भाकपा कार्यालय राजा-की-मंडी नही जाना होता था लिहाजा खास तौर पर वहीं आना होता। उनही के सामने शालिनी ने वायदा कर दिया और उनकी बीमारी के मद्दे नजर इस बात को अस्वीकार न कर सका। चूंकि अक्सर दुकानों से जल्दी उठ जाता था इसलिए काम अधिक होने पर कभी -कभी देर तक रुकना भी पड़ता था। जिस दिन शालिनी ने क्वार्टर होकर आने को कहा उसी दिन देर भी हो गई। पहले न जाने का विचार किया परंतु यह सोच कर कि शालिनी यह मतलब न निकाले कि मैंने वहाँ  जाने से बचने हेतु दुकानों पर ज्यादा समय लगा दिया,अंततः चला गया। दोनों लडकियाँ सो चुकी थीं।संगीता ने दरवाजा बाहर के कमरे की लाइट जलाए बगैर खोला था क्योंकि साड़ी के बगैर थीं। सीधे अंदर के बारामदे मे ले गई और चारपाई पर बैठा कर रसोई मे चाय बनाने लगीं यह कहने के बावजूद कि अब चाय का समय नही है।चाय लेकर जब आई तो सामने के वस्त्र भी खुल कर सिर्फ लटके थे तर्क था गर्मी बेहद है बिना कूलर के रहना मुश्किल है। मैंने कहा कि इसी कारण मै आपके यहाँ नहीं आना चाहता हूँ आपको सबके सामने गर्मी नहीं लगती सिर्फ अकेले मे लगती है। जवाब की जगह सिर्फ हँसती रहीं। चलने के समय बाहर के कमरे मे भी वैसे ही आई और बोलीं कि आप बाहर से बंद कर देंगे तब अंदर से सांकल कुंडी लगा लेंगे। घर पर जब शालिनी को बताया तो उन्होने सुन कर कोई प्रतिक्रिया न दी।इतवार के दिन दुकाने बंद रहती थीं अतः खुद शालिनी ने वहाँ चलने को कहा,मै पहुंचा कर घर वापिस लौट आया तो बउआ को भी आश्चर्य था कि तेज गर्मी मे क्यों भागा-दोड़ी की वहीं क्यों नही रुका,अब उनसे क्या कहता ?तीन बजे तक आने को शालिनी ने कहा था कि कम से कम शाम की चाय यहाँ पी लें अन्यथा उनकी भाभी को बुरा लगेगा। सवा तीन के करीब जब पहुंचे तो सब बच्चे अंदर सो रहे थे शालिनी ने दरवाजा खोला था वह और संगीता अंदर के बारामदे मे थे। संगीता पोशाक मे केवल पेटीकोट पहने थीं मैंने शालिनी से पूछा तुम्हारे लिए गर्मी नहीं है । उनका जवाब था गर्मी है लेकिन संगीता (उन्होने भाभी जी शब्द नहीं बोला )को पसंद है अकेले होने पर ऐसे रह लेती हैं सब के सामने तो मजबूरी है ।संगीता बोलीं जब योगेन्द्र बाबू झांसी (शायद किसी बच्चे के जन्म के समय जब सीमा अस्पताल मे थीं )ले गए थे तब वह तो ऐसे मौके तलाशते थे जब कपड़े बदलने हों और पूरा आनंद लेते थे,लेकिन आपको बुरा लगता है। नियम और मर्यादा के विरुद्ध हर बात मुझे बुरी ही लगती है,मैंने भी स्पष्ट कर दिया अतः  चाय के बाद संगीता ने वस्त्र धारण करके बच्चो को जगा कर नाश्ता कराया।

भाकपा से भले ही अलग हो गए थे और सपा मे सक्रिय भी ज्यादा न थे परंतु भाकपा जिला मंत्री के आग्रह पर उनकी फेकटरी मे उनसे मिलते रहते थे। उन्होने बताया कि मेरे हटने के बाद उन्हे ज्यादा परेशान किया जा रहा है और उनका पद पर टिके रहना असंभव होता जा रहा है। सरदार रणजीत सिंह जी के घर पर भी मिल लेते थे उन्होने भी भाकपा छोड़ दी थी वह बहुत खिन्न थे मिश्रा जी और जगदीश जी के व्यवहार से। वह भी मानते थे कि हरीश आहूजा साहब ने इनही दोनों के व्यवहार से खिन्न होकर भाकपा को अलविदा कहा था। सपा नेता रवी प्रकाश अग्रवाल जो शिव पाल सिंह जी के सहपाठी होने के कारण तब प्रभावशाली थे चाहते थे कि मै दो-तीन घंटे का पार्ट टाईम जाब तो बाहर कर लूँ लेकिन उनके यहाँ कुल रु 1200/- मे फूल टाईम ज्वाइन कर लूँ। यह बिलकुल असंभव था कि अपनी आमदनी को घटा लिया जाये हालांकि वह सपा मे कोई उच्च पद दिलाने बात कह रहे थे। उस उच्च पद से मुझे तो कमाई करनी नहीं थी सो मै पदों के लालच के फेर मे नहीं फंसा। 

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