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शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

बाबूजी का जन्मदिन पर एक स्मरण ------ विजय राजबली माथुर

**जन्मदिन 24 अक्तूबर पर एक स्मरण बाबूजी का :
(ताज राजबली माथुर : जन्म 24 -10-1919 मृत्यु 13-06-1995 )
हमारे बाबूजी का जन्म 24-10-1919 को दरियाबाद, बाराबंकी में हुआ था और मृत्यु 13-06-1995 को आगरा में । बाबूजी जब चार वर्ष के ही थे तभी दादी जी नहीं रहीं और उनकी देख-रेख तब उनकी भुआ ने की थी। इसीलिए जब बाबूजी को बाबाजी ने जब पढ़ने के लिए काली चरण हाई स्कूल, लखनऊ भेजा तो वह कुछ समय अपनी भुआ के यहाँ व कुछ समय स्कूल हास्टल में रहे। 

भीखा लाल जी उनके सहपाठी और  कमरे के साथी भी थे। जैसा बाबूजी बताया करते थे-टेनिस के खेल में स्व.अमृत लाल नागर जी ओल्ड ब्वायज असोसियेशन की तरफ से खेलते थे और बाबूजी उस समय की स्कूल टीम की तरफ से। स्व.ठाकुर राम पाल सिंह जी भी बाबूजी के खेल के साथी थे। बाद में जहाँ बाकी लोग अपने-अपने क्षेत्र के नामी लोगों में शुमार हुए ,हमारे बाबूजी 1939-45  के द्वितीय  विश्व-युद्ध में भारतीय फ़ौज की तरफ से शामिल हुए। 

अमृत लाल नागर जी हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हुए तो ठा.रामपाल सिंह जी नवभारत टाइम्स ,भोपाल के सम्पादक। भीखा  लाल जी पहले पी.सी एस. की मार्फ़त तहसीलदार हुए ,लेकिन स्तीफा देके भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए और प्रदेश सचिव भी रहे। बाबूजी को लगता था  जब ये सब बड़े लोग बन गए हैं तो उन्हें पहचानेंगे या नहीं ,इसलिए फिर उन सब से संपर्क नहीं किया। एक आन्दोलन में आगरा से मैं लखनऊ आया था तो का.भीखा  लाल जी से मिला था,उन्होंने बाबूजी का नाम सुनते ही कहा अब उनके बारे में हम बताएँगे तुम सुनो-उन्होंने वर्ष का उल्लेख करते हुए बताया कब तक दोनों साथ-साथ पढ़े और एक ही कमरे में भी रहे। उन्होंने कहा कि,वर्ल्ड वार में जाने तक की खबर उन्हें है उसके बाद बुलाने पर भी वह नहीं आये,खैर तुम्हें भेज दिया इसकी बड़ी खुशी है। बाद में बाबूजी ने स्वीकारोक्ति की कि, जब का.भीखा लाल जी विधायक थे तब भी उन्होंने बाबूजी को बुलवाया था परन्तु वह संकोच में नहीं मिले थे। 


बाबूजी के फुफेरे भाई साहब स्व.रामेश्वर दयाल माथुर जी के पुत्र कंचन ने (10  अप्रैल 2011  को मेरे घर आने पर) बताया कि ताउजी और बाबूजी  दोस्त भी थे तथा उनके निवाज गंज के और साथी थे-स्व.हरनाम सक्सेना जो दरोगा बने,स्व.देवकी प्रसाद सक्सेना,स्व.देवी शरण सक्सेना,स्व.देवी शंकर सक्सेना। इनमें से दरोगा जी को 1964  में रायपुर में बाबाजी से मिलने आने पर व्यक्तिगत रूप से देखा था बाकी की जानकारी पहली बार प्राप्त हुई थी । 



बाबू जी ने खेती कर पाने में विफल रहने पर पुनः नौकरी तलाशना शुरू कर दिया। उसी सिलसिले में इलाहाबाद जाकर लौट रहे थे तब उनकी कं.के पुराने यूनिट कमांडर जो तब लेफ्टिनेंट कर्नल बन चुके थे और लखनऊ में सी.डब्ल्यू.ई.की पोस्ट पर एम्.ई.एस.में थे उन्हें इलाहाबाद स्टेशन पर मिल गए। यह मालूम होने पर कि बाबूजी  पुनः नौकरी की तलाश में थे उन्हें अपने दफ्तर में बुलाया। बाद में बाबूजी जब उनसे मिले तो उन्होंने स्लिप देकर एम्प्लोयमेंट  एक्सचेंज भेजा जहाँ तत्काल बाबूजी का नाम रजिस्टर्ड करके फारवर्ड कर दिया गया और सी.डब्ल्यू ई. साहब ने अपने दफ्तर में उन्हें ज्वाइन करा दिया।  घरके लोगों ने ठुकराया तो बाहर के साहब ने रोजगार दिलाया। सात साल लखनऊ,डेढ़ साल बरेली,पांच साल सिलीगुड़ी,सात साल मेरठ,चार साल आगरा में कुल  चौबीस साल छः माह  दुबारा नौकरी करके 30  सितम्बर 1978  को बाबू जी रिटायर हुए.तब से मृत्यु पर्यंत (13  जून 1995 )तक मेरे पास बी-560  ,कमला नगर ,आगरा में रहे। बीच-बीच में अजय की बेटी होने के समय तथा एक बार और बउआ  के साथ फरीदाबाद कुछ माह रहे। 

कुल मिला कर बाबूजी का सम्पूर्ण जीवन संघर्ष और अभावों का रहा। लेकिन उन्होने कभी भी ईमान व स्वाभिमान को नहीं छोड़ा। मैं अपने  छोटे भाई-बहन की तो नहीं कह सकता परंतु मैंने तो उनके इन गुणों को आत्मसात कर रखा है जिनके परिणाम स्वरूप मेरा जीवन भी संघर्षों और अभावों में ही बीता है जिसका प्रभाव मेरी पत्नी व पुत्र  पर भी पड़ा है।चूंकि बाबूजी अपने सभी भाई-बहन में सबसे छोटे थे और बड़ों का आदर करते थे इसलिए अक्सर नुकसान भी उठाते थे। हमारी भुआ उनसे अनावश्यक दान-पुण्य करा देती थीं। अब उनकी जन्म-पत्री के विश्लेषण से ज्ञात हुआ है कि इससे भी उनको जीवन में भारी घाटा उठाना पड़ा है। उनकी जन्म-कुंडली में ब्रहस्पति 'कर्क' राशिस्थ है अर्थात 'उच्च' का है अतः उनको मंदिर या मंदिर के पुजारी को तो भूल कर भी 'दान' नहीं करना चाहिए था किन्तु कोई भी पोंगा-पंडित अधिक से अधिक दान करने को कहता है फिर उनको सही राह कौन दिखाता? वह बद्रीनाथ के दर्शन करने भी गए थे और जीवन भर उस मंदिर के लिए मनी आर्डर से रुपए भेजते रहे। इसी वजह से सदैव कष्ट में रहे। 1962 में वृन्दावन में बिहारी जी के दर्शन करके लौटने पर बरेली  के गोलाबाज़ार स्थित घर पहुँचने से पूर्व ही उनके एक साथी ने नान फेमिली स्टेशन 'सिलीगुड़ी' ट्रांसफर की सूचना दी। बीच सत्र में शाहजहांपुर में हम लोगों का दाखिला बड़ी मुश्किल से हुआ था।  

बाबूजी के निधन के बाद जो आर्यसमाजी पुरोहित शांति-हवन कराने आए थे उनके माध्यम से मैं आर्यसमाज, कमलानगर- बल्केश्वर, आगरा में शामिल हो गया था और कार्यकारिणी समिति में भी रहा। किन्तु ढोंग-पाखंड-आडंबर के विरुद्ध व्यापक संघर्ष चलाने वाले स्वामी दयानन्द जी के आर्यसमाज संगठन में आर एस एस वालों की घुसपैठ देखते हुये संगठन से बहुत शीघ्र ही अलग भी हो गया था परंतु  पूजा पद्धति के सिद्धान्त व नीतियाँ विज्ञान-सम्मत होने के कारण अपनाता हूँ।  

मेरे पाँच वर्ष की आयु से ही बाबूजी 'स्वतन्त्र भारत' प्रति रविवार को ले देते थे। बाद में बरेली व मेरठ में दफ्तर की क्लब से पुराने अखबार लाकर पढ़ने को देते थे जिनको उसी रोज़ रात तक पढ्ना  होता था क्योंकि अगले दिन वे वापिस करने होते थे,  पुराने मेगजीन्स जैसे धर्मयुग,हिंदुस्तान,सारिका,सरिता आदि पूरा पढ़ने तक रुक जाते थे फिर दूसरे सप्ताह के पुराने पढ़ने को ला देते थे। अखबार पढ़ते-पढ़ते अखबारों में लिखने की आदत पड़ गई थी। इस प्रकार कह सकता हूँ कि आज के मेरे लेखन की नींव तो बाबूजी द्वारा ही डाली हुई है। इसलिए जब कभी भूले-भटके कोई मेरे लेखन को सही बताता या सराहना करता है तो मुझे लगता है इसका श्रेय तो बाबूजी  को जाता है क्योंकि यह तो उनकी 'दूरदर्शिता' थी जो उन्होने मुझे पढ़ने-लिखने का शौकीन बना दिया था। आज उनको यह संसार छोड़े हुये बीस वर्ष व्यतीत हो चुके हैं परंतु उनके विचार और सिद्धान्त आज भी मेरा 'संबल' बने हुये हैं।  
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शुक्रवार, 13 जून 2014

पिताजी को श्रद्धांजली के बहाने ---विजय राजबली माथुर

बाबूजी (निधन-13 जून 1995 )और बउआ(निधन-25 जून 1995) चित्र 1978 मे रिटायरमेंट से पूर्व  लिया गया
आज बाबूजी को यह संसार छोड़े हुये 19 वर्ष व्यतीत हो गए हैं। परंतु उनकी दी हुई शिक्षा व सीख आज भी मेरे लिए पथ -प्रदर्शक के रूप मेरे साथ बनी हुई हैं। आर्थिक रूप से जिस प्रकार बाबूजी समृद्ध नहीं हो पाये थे उसी प्रकार 62 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुकने के बाद भी मैं भी आर्थिक समृद्धता से कोसों दूर हूँ और इसी लिए दूर हूँ निकटतम एवं घनिष्ठतम कहे जाने वाले रिशतेदारों से भी। आज रिश्तों का नहीं आर्थिक समृद्धि का महत्व है जिसमें मैं पिछड़ा हुआ हूँ। एक बार मैंने बाबूजी से सवाल उठाया था कि आपने बचपन से ईमानदारी ऐसी सिखा दी है जो मुझे न ऊपर उठने देती है और न ही आर्थिक समृद्धि मिलने देती है। बाबू जी ने इस प्रश्न के उत्तर में बड़ी सीधी बात कही थी कि हमने तो तुम तीनों को एक सी बातें बताई हैं लेकिन जब तुम्हारे छोटे भाई-बहन उनको ठुकरा कर आगे बढ़ गए हैं तो तुम भी ठुकरा सकते थे। यदि मैं माँ-पिताजी को ठुकरा सकता होता तो 1973 में ही माईंजी की बात मान कर ठुकरा सकता था। मैं मेरठ से एल आई सी की एक परीक्षा देने लखनऊ आया था और बादशाह बाग में मामाजी के घर ठहरा था। उसी मौके पर माईंजी ने कहा था कि विजय अब तुम सर्विस कर रहे हो जीजी-जीजाजी से अलग हो जाओ नहीं तो उनकी ही तरह रह जाओगे। मैंने माईंजी से विनम्रतापूर्वक कह दिया था कि माईंजी चाहे जो हो बउआ-बाबूजी को छोडना व ठुकराना मेरे लिए संभव नहीं है और 1995 में मृत्यु-पर्यंत वे दोनों मेरे साथ ही रहे जबकि उनसे एक वर्ष पूर्व शालिनी का निधन हो चुका था। वे लोग पूनम से मेरे पुनः विवाह कर ने का दबाव बनाए हुये थे उनके पिताजी से पत्राचार चला चुके थे। बाबूजी के निधन और माँ के अचेतावस्था में पहुँच जाने के बाद छोटे भाई व बहन चाहते थे कि आगे पत्राचार वे करें परंतु मैंने उन दोनों को हस्तक्षेप नहीं करने दिया। जब माईंजी देहरादून से आगरा शोक व्यक्त करने आईं थीं तब फिर उन्होने कहा था कि विजय तुम किसी नीडी और कम पढ़ी लड़की से विवाह करो और जीजी-जीजाजी की पसंद का ख्याल न करो । उस अवसर पर मैंने माईंजी को कोई जवाब तो नहीं दिया था चुप ही रहा परंतु उनके सुझाव पर अमल नहीं किया। नतीजा यह है कि आज माईंजी को आदर्श मानने वाले छोटे भाई-बहन मेरे खिलाफ तो हैं ही खिलाफत में  लामबंदी भी किए हुये हैं।  

https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/703406903054622

"प्रदेश भाकपा के आह्वान पर लखनऊ में 22-क़ैसर बाग स्थित कार्यालय से एक प्रदर्शन जुलूस जिलाधिकारी कार्यालय तक निकाला गया। प्रदर्शन का उद्देश्य महिलाओं पर हिंसा,बच्चियों की सुरक्षा,बिगड़ी कानून-व्यवस्था,प्रशासन और अपराधियों की मिली-भगत से महिलाओं की इज्ज़त और ज़िंदगी पर हो रहे घातक हमलों के प्रति जनता का ध्यानकर्षण करना व राज्यपाल महोदय को प्रदेश सरकार की अकर्मण्यता के बारे में ज्ञापन द्वारा सूचित करना था।
ज्ञापन में मांग की गई है कि,घरेलू हिंसा हेतु अधिनियम-2005 लागू किया जाये,प्रदेश में वादों के जल्दी निपटारे हेतु विशेष अदालतों का गठन किया जाये तथा उसकी समय सीमा निर्धारित की जाये। हिंसा पीड़ित बेसहारा महिलाओं के पुनर्वास की व्यवस्था की जाये ।महिलाओं व बच्चियों पर हिंसा व उनकी हत्या को अंजाम देने वाली वीभत्स घटनाओं को रोका जाये।
जिलाधिकारी की ओर से सिटी मेजिस्ट्रेट ने ज्ञापन लिया और ज़रूरी कारवाई किए जाने का आश्वासन दिया।
प्रदर्शन का नेतृत्व डॉ गिरीश व कामरेड आशा मिश्रा ने किया जिसमें जिलामंत्री के अतिरिक्त अन्य लोगों में शामिल होने वाले प्रमुख कामरेड थे-दीपा पांडे,बबीता,अपने पुत्र सहित मुख्तार साहब,मास्टर सत्यनारायन,कनहाई लाल,रूपनारायण लोधी,मधुराम मधुकर एवं विजय माथुर। "


कल 12 जून 2014 को फेसबुक पर यह नोट प्रदर्शन में भाग लेने के उपरांत दिया था। तब 39 वर्ष पूर्व 12 जून 1975 को अलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा साहब के उस निर्णय का भी स्मरण हो आया था जिसमें उन्होने प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिराजी के 1971 के रायबरेली से निर्वाचन को अवेद्ध घोषित कर दिया था। एक 12 जून को एक शक्तिशाली महिला के विरुद्ध कोर्ट का निर्णय आता है और उसी 12 जून को भाकपा ने महिला उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष -दिवस के रूप में चुना। इस संघर्ष आंदोलन में भाग लेने हेतु मुझे फोन करके समय व स्थान की जानकारी हासिल करनी पड़ी।ज़िले की ओर से  अधिकृत रूप से अखबार या व्यक्तिगत रूप से कोई जानकारी मुझे नहीं दी गई थी।प्रदर्शन के बाद लौटते में  प्रदेश सचिव जी को मैंने इस बात की सूचना मौखिक रूप से दे दी थी। 2014 के लोकसभा चुनावों में 543 में से भाकपा को केवल एक स्थान प्राप्त हुआ है जबकि 1952 में 17 स्थान प्राप्त करके यह  पार्टी मुख्य विपक्षी दल के रूप में थी। इस स्थिति के बावजूद प्रदेश के एक पदाधिकारी जो लखनऊ ज़िले के सदस्य होते हुये भी ज़िले के इंचार्ज हैं मुझे निष्क्रिय कराने हेतु पार्टी मीटिंग्स की सूचनाएँ भी प्राप्त नहीं होने देते हैं। जब फेसबुक पर CPIML के लोगों द्वारा CPI की आलोचना देखता हूँ तो व्यथित हो जाता हूँ परंतु जब इस प्रकार का अंदरूनी व्यवहार देखता हूँ तब लगता है कि वे सही कह रहे हैं। जब नए लोग आ ही नहीं रहे हैं तब पुराने लोगों को हटाने का प्रयास तो CPIML के दृष्टिकोण का ही समर्थन करता है। यशवंत को भी पार्टी की सदस्यता ग्रहण करवा दी थी किन्तु दो वर्षों में एक बार भी ज़िले में जेनरल बाडी मीटिंग नहीं हुई है जिसमें वह भाग ले सकता। आगरा में तो वर्ष में दो-तीन जेनरल बाडी मीटिंग्स में साधारण सदस्यों को भाग लेने  व पार्टी-शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिल जाया करता था। बाबूजी के सहपाठी और रूम मेट रहे कामरेड भीखा लाल जी की पार्टी होने के कारण मैं तो अपमान सह कर भी बना हुआ हूँ किन्तु क्या आगे यशवंत और उस जैसे लोग बने रहना पसंद करेंगे?


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