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रविवार, 10 फ़रवरी 2013

यादों के झरोखे से -61 वर्ष (भाग-2)---विजय राजबली माथुर

 भाग 1 से आगे .......................................................

नौ वर्ष की उम्र मे लखनऊ छोडने से पहले अक्सर बउआ हम दोनों भाईयों को( जब कोई बाबूजी से मिलने अतिथि आते थे तभी )समोसे-मिठाई लाने भेजती थीं। हालांकि डेरी का मक्खन लेने कभी-कभी  और स्कूल तो रोजाना सड़क पार करके जाते थे किन्तु ये सामान बिना सड़क पार किए लाने की हिदायत देती थीं जिस कारण ज़्यादा दूर चल कर 'हेवेट  रोड' चौराहा स्थित (जिसे अब रोडवेज के टिकट पर हुसैन गंज लिखा जाता है)हलवाई से लाते थे। एक बार बउआ  ने मिठाई का नाम नहीं बताया केवल 'मिठाई' कह दिया तब हलवाई ने  चार समोसों के अलावा बाकी चार आनो मे खोये की बर्फी के कटे छोटे-छोटे टुकड़ों वाली मिठाई दे दी ;तब समोसा एक आने मे एक मिलता था जो अब तब से आकार मे बहुत छोटा पाँच रुपयों मे मिलता है।

हमारे स्कूल मे विभिन्न कार्यक्रमों मे अक्सर और बच्चे अपने छोटे भाई-बहनों  को दिखाने ले आते थे ,हम भी बउआ से शोभा को भेज देने को कहते थे ,एक बार 'वसंत' के कार्यक्रम मे  हम दोनों भाईयों के साथ शोभा को  इस हिदायत के साथ भेजा था कि दोनों लोग बीच मे रखें और बहन के दोनों हाथ पकड़े रखें। स्कूल मे बूंदी वितरण के दौरान भी लाईन मे शोभा को अजय के बाद खड़ा किया और खुद सबसे पीछे रहा था। आज तक अपने छोटे भाई-बहनों से पीछे ही चल रहा हूँ। वे दोनों खुद को ज़्यादा काबिल और मुझको मूर्ख मानते हैं तथा समाज व रिशतेदारों के  बीच भी उन दोनों की ही मान्यता अधिक है। छोटी बहन की छोटी पुत्री ने तो पूना मे बस कर ब्लाग जगत मे भी वहाँ प्रवास करने वाले  'भ्रष्ट-धृष्ट-निकृष्ट'ब्लागर (जो धूर्त और ठग भी है) का सहारा लेकर हम लोगों के विरुद्ध अनर्गल छींटा-कशी भी करवाई है।जबकि आगरा मे एम बी ए करने के दौरान उसका हमारे पास आना -जाना और कभी-कभी रुकना भी हुआ है और पढ़ाई से संबन्धित कुछ सलाह भी हम लोगों से प्राप्त की है।यूरेका फोर्ब्समे नौकरी करने के दौरान कुछ माह हमारे घर रही है फिर बिदक कर हास्टल चली गई थी ,कमलेश बाबू आकर शिफ्ट कर गए थे और हमे बताए बगैर लोकल गार्जियन की जगह हमारा नाम-पता लिखा गए थे। 

अजय ने तो बाबूजी के तुरंत बाद बउआ का भी निधन होने के साथ ही हम से रिश्ता समाप्त कर लिया था किन्तु ऊपरी तौर पर शोभा और कमलेश बाबू ने हम से एक तरफ तो संबंध बनाए रखे तो दूसरी तरफ भीतर ही भीतर हमारे विरुद्ध साज़िशों मे भी तल्लीन रहे जैसा कि वे पूर्व मे भी करते रहे थे ;वे तो आगे भी कामयाब रहते यदि मैं आगरा छोड़ कर लखनऊ न आ गया होता तो। इसीलिए वे मेरे लखनऊ स्थानांतरण का तीव्र विरोध कर रहे थे। शोभा ने मुझसे कहा था कि मैं या तो उनके साथ भोपाल मे शिफ्ट करूँ या फिर पूनम के भाई के साथ पटना जा कर रहूँ परंतु स्वतंत्र रूप से लखनऊ मे न रहूँ। अतः ब्लागर्स  को टिप्पणियों के माध्यम से टटोल कर उनकी छोटी पुत्री मुक्ता ने  यशवन्त को गुमराह कराने का भरसक प्रयास किया।पूना प्रवासी ब्लागर ने अपनी पटना स्थित शिष्य ब्लागर के माध्यम  से यशवन्त को पूना मे जाब करने का आफ़र दिया जिसे रद्द कर देने पर उस ब्लागर के पति के आफिस मे पटना मे जाब करने का प्रलोभन दिलाया। उद्देश्य यशवन्त को मुझसे अलग करके दबोचना था। 

शालिनी के निधन के बाद शोभा ने यशवन्त को बउआ से अपने पास रखने की मांग की थी जिसे अजय की श्रीमतीजी ने बउआ से रद्द करा दिया था और बउआ ने यह बात मुझे पूनम से विवाह करने के लिए प्रेरित करते वक्त बताई थी। शोभा नहीं चाहती थीं कि मैं पूनर्विवाह पूनम जो श्रीवास्तव हैं से करूँ। इसलिए उन्होने पटना की श्रीवास्तव ब्लागर जो पूना मे प्रवास कर रही है को मोहरा बना कर ब्लागजगत मे मेरे विरुद्ध हड़कंप खड़ा करवाया जिससे अधिकांश श्रीवास्तव ब्लागर्स मेरा व यशवन्त का विरोध करें तो प्रतिरोध करने पर पूनम और हम लोगों के विरुद्ध दरार पड़े सके। ये लोग अपने उद्देश्य मे कितना सफल हुये या हो सकते हैं वे ही जाने परंतु हम अडिग व अविचलित हैं । फिलहाल तो मई 2011 मे हमारे यहाँ लखनऊ आने पर  यशवन्त को 'कपूत' बता कर शोभा/कमलेश बाबू ही हम से कट गए और इस प्रकार हम भी उनके भीतरी षडयंत्रों से बच गए।  

क्रमशः ..............

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गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

मिलना जुलना कमजोरी नहीं (भाग-3)---विजय राजबली माथुर


 पिछले अंक से जारी .............

जब मैंने भोपाल या पटना के रिशतेदारों के साथ नहीं लखनऊ मे( यशवन्त की इच्छानुरूप आगरा के मकान को बेच कर)मकान ले लिया तो डॉ शोभा को जो पीड़ा हुई उसे उन्होने उजागर भी कर दिया था।मैं नहीं समझता कि मुझे अपने निर्णय छोटी बहन की इच्छानुरूप क्यों लेने चाहिए थे और पुत्र की इच्छा को क्यों ठुकराना चाहिए था?पूनावासी छोटी भांजी ने इस दरार को खाई मे बदलने मे कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। 06-10-2010 को प्रवासी ब्लागर  डॉ दिव्या श्रीवास्तव जी  ने एक पोस्ट यशवन्त के संबंध मे अपने ब्लाग मे दी थी तब मुक्ता(चंद्र प्रभा)ने पूना से फोन पर बताया था कि उसने डॉ दिव्या  का पूरा प्रोफाईल चेक किया है उसने तत्काल झांसी फोन करके शोभा को बताया था और कमलेश बाबू ने घबराहट भरे शब्दों मे विस्मय व्यक्त किया था।  ब्लागर्स प्रोफाईल  चेक करने मे उन लोगों द्वारा दी टिप्पणियों का मुक्ता ने सहारा लिया था और उसी क्रम मे पटना की मूल निवासी और विमान नगर मे उसकी पड़ौसन रही ब्लागर का भरपूर सहारा लिया। उक्त ब्लागर ने 'क्रांतिस्वर' मे प्रकाशित पूनम की एक कविता को 'वटवृक्ष' मे 19 नवंबर 2011 को प्रकाशित किया लेकिन धूर्ततापूर्वक ऊपर एक तमंचा का फोटो लगा दिया । पूनम को यह बात काफी अखरी थी लेकिन हमने तब विशेष रण-नीति के तहत विरोध नहीं जतलाया था। फिर उसके बाद 27 अप्रैल 2012 को उसी ब्लागर ने एक तीसरे ब्लाग पर मेरे ज्योतिषीय ज्ञान की खिल्ली उड़ाई और उस टिप्पणी को पिछले कई  पोस्ट मे भी  उद्धृत किया है।

 (रश्मि प्रभा...Apr 27, 2012 07:21 AM





कब मैं हिट होउंगी ... और राज्य सभा की सदस्य बनूँगी - आईला

Replies



आप जल्दी राज्यसभा में पहुंचें,
मेरी भी शुभकामना है)


मई 2012 के 'वटवृक्ष' के पृष्ठ 28 पर (जिसकी स्कैन कापी नीचे देखें) एक परिचर्चा उक्त ब्लागर ने बतौर संपादक दी थी।


पहली चर्चा जिस सौरभ प्रसून की है उससे उक्त ब्लागर को अपनी पुत्री का विवाह करना है।इसकी भी जन्मपत्री बनाने को ईमेल आया था और एक वर्ष के अंतर के दो डिटेल भेजे गए थे।  दूसरी चर्चा जिस छात्रा शिखा श्रीवास्तव की है उसकी जन्मपत्री द्वारा  अपने पुत्र मृगाङ्क से विवाह हेतु गुण मिलाने को मुझे  ईमेल पर कहा था। यह अलग बात है कि बाद मे फेक आई डी द्वारा उक्त ब्लागर ने शिखा के विरुद्ध इन्टरनेट जगत मे भारी अनर्गल दुष्प्रचार किया था।उक्त ब्लागर ने चार जन्मपत्रियों का निशुल्क परामर्श प्राप्त करने के बाद मेरे विरुद्ध घृणित अभियान अपने IBN7 वाले चमचे तथा और एक-दो लोगों द्वारा चलवा रखा है। 


इस क्रम मे तीसरी चर्चा मे यशवन्त का नाम क्यों और किस षड्यंत्र के तहत शामिल किया गया ?इस पर मुझे भारी आपत्ति है। जहां दो चर्चाए संपादक महोदया ने अपने परिवार से सम्बद्ध होने वालों की शामिल की थीं वहीं उनके साथ मेरे पुत्र यशवन्त की चर्चा क्यों और किस हैसियत से शामिल की गई?एक ओर तो मेरे तथा मेरी पत्नी के प्रति खौफनाक दृष्टिकोण और दूसरी ओर मेरे पुत्र को अपने खेमे मे दिखाना सरासर षड्यंत्र नहीं तो और क्या है?

इस षड्यंत्र मे वटवृक्ष के प्रधान संपादक और प्रबंध संपादक भी शामिल हैं अथवा केवल संपादिका की अपनी भूमिका है ?यह प्रश्न अभी अनुत्तरित है किन्तु रहस्य छिपा हुआ नहीं है। उक्त संपादिका ने अपने IBN7 वाले चमचा ब्लागर से (जिससे 27 अप्रैल को लेख लिखवाया तथा बाद मे 'ज्योतिष एक मीठा जहर')27 अगस्त 2012 के ब्लागर सम्मेलन के बाद 'वटवृछ' के प्रधान संपादक के विरुद्ध विष-वमन करवाया था लेकिन आज भी उनके साथ बतौर 'संपादक' डटी हुई हैं। हाल ही मे उस सम्मेलन के सहयोगी आयोजक ने अपने ब्लाग पर ज्योतिष के विरुद्ध एक लेख लिखा है और उस पर मेरे द्वारा की गई टिप्पणी का अभद्र जवाब दिया है। जबकि वही महाशय पहले मेरे 'क्रांतिस्वर' की समीक्षा 'जन संदेश टाईम्स' मे  मार्च 2011 मे निकाल चुके थे और उसे उन्होने अपने ब्लाग पर भी प्रकाशित किया था।किसी दूसरे ब्लागर से रचना चोरी के इल्जाम लगने  पर तब मुझसे अपने पक्ष मे टिप्पणी लिखने का अनुरोध किया था ,27 अगस्त के ब्लागर सम्मेलन मे भाग लेने हेतु 26 को उन्होने मुझसे फोन पर अनुरोध भी किया था ('वटवृक्ष'के प्रबंध संपादक ने भी 23 तारीख को फोन करके मुझसे उस सम्मेलन मे भाग लेने का अनुरोध किया था और आश्वस्त किया था की,"रश्मि प्रभा जी लखनऊ नहीं आ रही हैं")और अब  वह सह-संयोजक उस संपादिका के जाल मे उलझ कर मेरे ज्ञान को चुनौती दे रहे हैं। उनके प्रमाण पत्र की कोई आवश्यकता या अहमियत नहीं है।

एक सोची-समझी रण -नीति के तहत उक्त 'वटवृक्ष' की संपादक ब्लागर द्वारा मेरे ज्योतिषीय ज्ञान पर प्रहार लगातार किया जा रहा है। लेकिन क्या इससे मेरे ज्ञान को कुंद किया जा सकेगा?और इस धृष्ट अभियान का लाभ किसको मिलेगा?



Saturday, November 19, 2011


कुछ तो लगता है 

http://urvija.parikalpnaa.com/2011/11/blog-post_19.html








ख़ुशी में भय
और झूठ में ख़ुशी ...
इस बदली हवा ने सारे मायने बदल दिए हैं
सब उल्टा पुल्टा ही अच्छा लगता है !!!

रश्मि प्रभा

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कुछ तो लगता है

त्योहारों से मुझे अब डर लगता है
बचपन बीता
सब कुछ सपना सा लगता है
रिश्ता एक छलावा लगता है..
छल-बल दुनिया के नियम
कौन किसका
सबको अब अपना अहम् अच्छा लगता है
ऊपर उठाना-गिराना अब यही सच्चा धर्म लगता है
खून-खराबा - अब यही धर्म सब को अच्छा लगता है
त्योहारों का मौसम है
सब को 'नमस्ते' कहना अच्छा लगता है
दुबारा न मिलने का यह संदेश अच्छा लगता है
राम-रहीम का ज़माना पुराना लगता है
बुजुर्गों का कुछ भी कहना बुरा लगता है
मारा-मारी करना अच्छा लगता है
खुदगरजी का जमाना अच्छा लगता है
नैनो से तीर चलाने का ज़माना अब पुराना लगता है
गोली-बारी चलाना अच्छा लगता है
भ्रष्टाचार और घूस कमाना अच्छा लगता है
बदलते दुनिया का नियम अच्छा लगता है
शोर-शराबा करना अच्छा लगता है
हिटलर और मुसोलिनी कहलाना अच्छा लगता है
हिरोशिमा की तरह बम बरसाना अच्छा लगता है
अब गांधी-सुभाष बनना किसी को अच्छा नही लगता है
शहीदों की कुर्बानी बेमानी लगती है
मैं ' आज़ाद हूँ
दुनिया मेरी मुट्ठी में है - कहना अच्छा लगता है
अपने को श्रेष्ठ ,दूसरे को निकृष्ट कहना अच्छा लगता है
चिल्लाना और धमकाना अच्छा लगता है
बेकसूर को कसूरवार बनाना अच्छा लगता है
न्यायालय में झूठा बयान देना अच्छा लगता है
औरों को सता कर 'ताज' पहनना अब अच्छा लगता है
झूठ को सच कहना अच्छा लगता है
दिलों को ठेस पहुंचाना अच्छा लगता है
किसी ने कहा-क्या शर्म नहीं आती
शर्म को ख़ाक करना अच्छा लगता है
अब यह सब करना ही अच्छा लगता है....





(पूनम माथुर)

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मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

मिलना-जुलना कमजोरी नहीं है ---विजय राज बली माथुर

मौलिक रूप से मुझे मेल-जोल और आना-जाना पसंद है। परंतु साथ-साथ मैं यह भी ध्यान रखता हूँ कि,यदि किसी को मेरा आना-जाना या मेल-जोल रखना पसंद नहीं है या इसे वह मेरी कोई कमजोरी समझ रहा है तो मैं फिर उसके यहाँ आना-जाना और उससे मेल-मुलाक़ात बंद कर देता हूँ।तीन वर्ष पूर्व  लखनऊ आने के बाद छोटों-बड़ों सभी के यहाँ मैं अपनी पहल पर गया था। सबसे पहले एक भांजी जो खानदान की सबसे बड़ी बहन की पुत्री हैं और जिंनका निवास मेरे निवास से कोई डेढ़ किलोमीटर दूर ही होगा ,गया था। फिर उनकी माता अर्थात माधुरी जीजी के यहाँ 18 km दूर गया परंतु भांजी को और जीजी के घर भांजे को शायद हमारा आर्थिक स्तर अपने अनुकूल न लगा। भांजी के घर दोबारा भांजा दामाद साहब की जन्मपत्री का विश्लेषण देने दो दिन बाद ही  गया था  और जीजी के निधन पर उनके शांति हवन मे भाग लेने इस वर्ष जनवरी मे। 

जीजी के घर से जनवरी 2011 मे उनके सबसे छोटे भाई उमेश के घर अशरफाबाद भी गया था। मैंने पाया कि उमेश को शायद अच्छा नहीं लगा था। वह अपनी भांजी के पास हमारी कालोनी मे आते रहते हैं परंतु हमारे घर आना उनको तौहीन लगता है । उनसे दोबारा मुलाक़ात अप्रैल 2011 मे इंदिरानगर मे छोटी बहन के देवर की बेटी की शादी मे हुई थी। उनको कमलेश बाबू ने मुझे चौराहे से विवाह स्थल तक ले आने को भेजा था। डॉ शोभा और कमलेश बाबू से उमेश,उनसे बड़े नरेश और उनसे बड़े ऋषिराज सभी मधुर संबंध रखे हैं। एक तो वह BHEL से फोरमेन के रूप मे रिटायर्ड  हैं दूसरे अब प्राईवेट कंपनी मे इंजीनियर। जो सबसे बड़ी बात है वह यह कि पूनावासी शोभा की छोटी बिटिया की सुसराल से उमेश और ऋषिराज के भी सुसराली रिश्ते हैं। इन तीनों की सुसराल का रिश्ता सीधा-सीधा कुक्कू (कमलेश बाबू के भतीज दामाद जो दिवंगत शालिनी के भाई भी हैं) से है। कुक्कू के पार्सल बाबू भाई हमारे आगरा के मकान पर आँखें गड़ाए हुये थे और आर्थिक व सामाजिक रूप से हमे वहाँ क्षती पहुंचाते रहे थे। 

उमेश के अशरफाबाद से संबन्धित एक विकलांग बैक अधिकारी ने उनके इशारे पर यहाँ कालोनी मे हमारे विरुद्ध लामबंदी करके मेरे तथा यशवन्त के आर्थिक लाभ को अवरुद्ध कर रखा है। कमलेश बाबू ने अपने एक  मित्र  बिल्डर/ ठेकेदार  लिटोरिया के माध्यम से भी हमारे विरुद्ध वातावरण बना रखा है। चूंकि हम लोग अपने निजी आर्थिक हितों की परवाह किए बगैर सार्वजनिक हितों को सम्पन्न कराते रहते हैं इसलिए विपरीत परिस्थितियों मे भी स्वाभिमान से टिके रहते हैं। ब्लाग जगत मे भी यशवन्त लोगों को निशुल्क सहायता करता रहता है और मैं ब्लाग तथा फेसबुक के साथियों को निशुल्क ज्योतिषीय परामर्श देता रहता हूँ। डॉ शोभा/कमलेश बाबू की छोटी बेटी चंद्रप्रभा उर्फ मुकतामणि ने विमान नगर ,पूना मे अपनी पड़ौसन रही मूल रूप से पटनावासी श्रीवास्तव ब्लागर को उकसा/गुमराह करके ब्लाग जगत मे भी  यशवन्त और मेरे विरुद्ध  वातावरण तैयार किया है। इस पूना प्रवासी ब्लागर के दिल्ली वास कर रहे दो  सहयोगियों ने तो निम्नत्तम  स्तर पर जाकर मेरे ज्योतिषीय आंकलनों को गलत करार देने का असफल कुप्रयास भी किया है। जब कि  पूना प्र्वासी ब्लागर खुद मुझसे चार-चार जन्म्पत्रियों के निशुल्क विश्लेषण प्राप्त कर चुका है। खुद को ज़रूरत से ज़्यादा काबिल समझने वाले ये श्रीवास्तव ब्लागर्स यह नहीं समझ रहे हैं कि डॉ शोभा और उनकी बेटी जो श्रीवास्तव लोगों के घोर विरोधी और आलोचक हैं ने किस तिकड़म से उनको उलझाया है। क्योंकि मेरी यह पत्नी पूनम जो पटना के श्रीवास्तव परिवार से हैं उनको नागवार लगती हैं और कांटे से कांटा उखाड़ने के प्रयोग मे  मेरी उन बहन व भांजी ने पटना से ही संबन्धित श्रीवास्तव ब्लागर को मेरे विरुद्ध भिड़ाया है। 

शत्रु सिर्फ शत्रु होता है और उससे कोई रिश्ता-नाता नहीं होता है। जिनकी बुद्धि पैर के तलवे मे होती है उन्हे कोई समझा भी नहीं सकता है। ब्लाग जगत के इस झगड़े ने फेसबुक तथा ब्लाग जगत मे मेरे ज्योतिषीय विश्लेषणों को अच्छी मान्यता प्रदान कर दी है। अब तक ज्योतिष की आलोचना करने वाले साम्यवादी ब्लागर्स और नेता गण भी मुझसे ज्योतिषीय विश्लेषण इस झगड़े के बाद ले चुके हैं जो संख्या मे 11 हैं। इससे पूर्व एक तथाकथित साम्यवादी फेसबुकिया जो कानपुर से हैं झगड़ालू गुट मे मिल गए थे और मेरे विरुद्ध खूब लामबंदी कर चुके थे जो निष्प्रभावी रही। पूना प्रवासी श्रीवास्तव ब्लागर चाहे जितनी एहसान फरामोशी दिखाये और लामबंदी कर ले दूसरे लोगों को लाभ उठाने से तो वंचित कर सकता है परंतु मेरे ज्ञान को नष्ट नहीं कर सकता। कनाडा प्रवासी एक ब्लागर जो मुझसे ज्योतिषीय विश्लेषण निशुल्क प्राप्त कर चुका था इस पूना प्रवासी के भंवर जाल मे फंस गया तो वही प्रवास कर रहे एक दूसरे ब्लागर ने उसकी परवाह न करते हुये  मेरी सलाह पर चलते हुये भारत मे रोजगार प्राप्त करने मे सफलता प्राप्त कर ली। एहसान फरामोशों की इस दुनिया मे वह ब्लागर एहसानमंद निकला है। अपने विवाह का आमंत्रण जब उस ब्लागर ने दिया और आकांक्षा प्रकट की कि उनके वैवाहिक जीवन की सफलता हेतु मैं आशीर्वाद दूँ तो लगा कि धरा अभी अच्छे लोगों से विहीन नहीं हो गई है। IBN7 वाला चमचा हो या दूसरे ब्लागरों को मेरे विरुद्ध धमकाने वाला दूसरा चमचा पूना प्रवासी ब्लागर को उन लोगों की सहायता से मेरे परिवार को नष्ट करने मे सफलता नहीं मिल सकेगी।

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