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शनिवार, 16 जुलाई 2016

सत्य कहने - मानने का साहस सब में नहीं होता ------ विजय राजबली माथुर



*चौधरी चरण सिंह जी जिस मेरठ कालेज,मेरठ के छात्र रहे उसी कालेज का 1969-71 मैं भी छात्र रहा हूँ। हमारे सोशियोलाजी के एक प्रोफेसर साहब जो चौधरी साहब की जाति से ही संबन्धित थे और चौधरी साहब के नाम से मशहूर थे तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह जी के कई कार्यों की सामाजिक समीक्षा किया करते थे , हालांकि यह कोर्स से हट कर होती थी। उनके अनुसार छपरौली में चौधरी चरण सिंह के कार्यकर्ता दलित बस्तियों को घेर कर उन लोगों को निकलने नहीं देते थे और उनके वोट चौधरी साहब को डाल लिए जाते थे। अखबारों की सुर्खियों में रहता था चौधरी साहब को दलितों का भरपूर समर्थन।
*इस वक्त भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल उस वक्त के SYS (समाजवादी युवजन सभा ) नेता और मेरठ कालेज छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष रहे सतपाल मलिक साहब जिनकी दौराला की शुगर फेक्टरियों से चौधरी चरण सिंह जी को भरपूर चन्दा मिलता था उनके छात्रसंघ 'एच्छिक' किए जाने के निर्णय से क्षुभ्ध होकर उनको चप्पलों की माला पहनाने की घोषणा कालेज कैंपस में कर गए थे।
*मुख्यमंत्री रहते ही चरण सिंह जी एक बार मेरठ के तत्कालीन जज जगमोहन लाल सिन्हा साहब के पास घर पर किसी केस के सिलसिले में पहुंचे थे। सिन्हा साहब ने अर्दली से पुछवाया था कि, पूछो चौधरी चरण सिंह मिलना चाहते हैं या मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह। चौधरी साहब ने जवाब भिजवाया था कि, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह जज साहब से मिलना चाहते हैं।  सिन्हा साहब ने बगैर मिले ही उनको लौटा दिया था यह कह कर कि, उनको मुख्यमंत्री से नहीं मिलना है। केस का निर्णय चौधरी साहब के चहेते के विरुद्ध आया था । सिन्हा साहब को एहसास था कि उसी की सिफ़ारिश मुख्यमंत्री करना चाहते थे जिस कारण वह उनसे नहीं मिले थे। 1975 में इन सिन्हा साहब ने ही इलाहाबाद हाई कोर्ट में इन्दिरा गांधी के निर्वाचन के विरुद्ध निर्णय दिया था।
*संविद सरकार ने चौधरी चरण सिंह के स्थान पर  राज्यसभा सदस्य त्रिभुवन नारायण सिंह जी (लाल बहादुर शास्त्री जी के मित्र और वैसे ही ईमानदार ) को मुख्यमंत्री बना लिया था। उनको छह माह के भीतर विधायक बनना था गोरखपुर के मनीराम क्षेत्र से उनको उप चुनाव लड़ना था। कांग्रेस ने अमर उजाला केअलीगढ़ स्थित पत्रकार  राम कृष्ण दिवेदी को खड़ा किया था चौधरी चरण सिंह जी ने गुपचुप उनको समर्थन दिला दिया और अपने मोर्चे के उम्मीदवार टी एन सिंह को हरवा दिया वह त्याग-पत्र देकर वापस राज्यसभा चले गए।
*1971 के लोकसभा के मध्यवधी चुनाव में चौधरी चरण सिंह शामली संसदीय क्षेत्र से प्रत्याशी थे उनके विरुद्ध भाकपा के ठाकुर विजय पाल सिंह खड़े थे। चौगटा मोर्चे का भी प्रत्याशी मैदान में था लेकिन उसके वोट कम्युनिस्ट विजयपाल सिंह जी को डलवाए गए और चौधरी चरण सिंह जी को हरवा दिया गया। तब जनसंघ के ए बी बाजपेयी साहब ने खुल्लमखुल्ला कहा था कि, हमने मनीराम की हार का बदला ले लिया।
*1977  में जब  बाबू जगजीवन राम को पी एम बनाने का सवाल आया था चौधरी चरण सिंह जी अड़ गए थे कि वह दलित प्रधानमंत्री नहीं कुबूल करेंगे जिस कारण फिर मोरारजी देसाई  पी एम बने थे और जब 1979 में उनके बाद फिर से बाबू जगजीवन राम जी का नाम आया तब चंद्रशेखर जी उनको न बनाने के लिए अड़ गए थे जिससे चौधरी चरण सिंह जी इन्दिरा जी के समर्थन से पी एम बन सके थे।



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54 वर्ष पूर्व 1962 में छोटी दिवाली के रोज़ हमारे 'रूक्स हायर सेकेन्डरी स्कूल,' बरेली कैंट जो अब 'रवीन्द्रनाथ टैगोर इंटर कालेज ' के नाम से जाना जाता है में हमारी कक्षा V I की छात्राओं से कक्षाध्यापक दीनानाथ जी द्वारा 'धर्मयुग' में प्रकाशित एक नाटक का मंचन करवाया  गया था जिसकी प्रारम्भिक पंक्तियाँ थीं ---" अमर सिंह तो मर गया, लक्ष्मी होकर करें मजूरी "।

भले ही यह एक व्यंग्य संगीत नाटिका हो किन्तु इसके द्वारा इस कटु  'सत्य ' को उजागर किया गया था कि, इस संसार में लोगों के नाम से भ्रम हो सकता है उसके अनुरूप वे होते नहीं हैं। प्रस्तुत फोटो द्वारा आरोप लगाने वाले प्रिंसपल साहब इसका ज्वलंत उदाहरण हैं जिनकी सत्य से मित्रता तो दूर-दूर तक नहीं ही है।जब कोई विख्यात हो जाता है तो समझने लगता है कि, वह जो भी झूठ परोस देगा उसे लोग उसकी ख्याति व उम्र के चलते सत्य ही मान लेंगे। इसी कारण आईने में अपना ही चेहरा देख कर दूसरे पर निराधार आरोप मढ़ दिया और जब इरादतन ऐसा किया गया हो तब खेद या पश्चाताप का प्रश्न ही कहाँ उठता है?

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1119108774817764&set=a.154096721318979.33270.100001559562380&type=3

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फेसबुक पर अक्सर कुछ लोग अपनी पोस्ट को लाईक करने व शेयर करने का अनुरोध करते दिखते हैं जबकि ऐसे लोग खुद दूसरों की पोस्ट शायद न ही शेयर करते हैं और न ही लाईक। लेकिन इसके विपरीत जब किसी विद्वान की अच्छी पोस्ट पर कुछ कमेन्ट करते हैं तब पोस्ट लेखक तो उसे लाईक करते हैं जबकि,मिश्रा,तिवारी,त्रिपाठी,पाण्डेय उपजाति के ब्राह्मण बेवजह कूद कर अनर्गल टिप्पणियाँ कर देते हैं। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि, एक अच्छे पोस्ट पर भी कोई कमेन्ट अहंकारी लोगों की अनर्गल टिप्पणियों से बचने हेतु न किया जाये। 
यदि किसी अच्छी पोस्ट को ब्लाग में स्थान दिया है तो अधिकांश प्रख्यात विद्वानों ने उसे पसंद किया है। किन्तु यदि किसी को महत्व दे दिया जाये और वह पूर्व ख्याति प्राप्त नहीं है न ही वह दूरदृष्टा निकले तो उसके दिमाग सातवें आसमान पर पहुँच जाते हैं। तब ऐसी पोस्ट को हटाना ही श्रेयस्कर रहता है।
https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/1120608251334483


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रविवार, 14 अप्रैल 2013

उदारता और पात्र की अनुकूलता ---विजय राजबली माथुर


हाई स्कूल के कोर्स मे हिन्दी मे एक लेख के अंश पढे थे जो आज भी याद हैं और सही लगते हैं। "उदारता एक मानवीय गुण है और सभी को उदार होना चाहिए। किन्तु उसके साथ-साथ पात्र की अनुकूलता भी होनी चाहिए। "जब कभी अनुकूल पात्र की पहचान किए बगैर किसी  के साथ उदारता बरती है तब-तब भारी नुकसान का सामना करना पड़ा है। पूना प्रवासी 'भ्रष्ट,निकृष्ट और धृष्ट ब्लागर 'का मामला भी ऐसा ही है। पहले चार जन्मपत्रियों का विश्लेषण निशुल्क प्राप्त कर के फिर ज्योतिष विरोधी लेख कई दूसरे ब्लागर्स से लिखवाये गए। इनमे से एक लखनऊ वासी ब्लागर ने तो टिप्पणी मे अभद्र भाषा का भी प्रयोग मेरे लिए किया था। अब वही ब्लागर महोदय मुझे तथा यशवन्त को फोन करके अपने लिए किसी अंतर्राष्ट्रीय कंपटीशन मे 'वोट' मांग रहे हैं। इस हेतु 36 किलोमीटर दूर मेरे घर भी आने को तैयार हैं। जब पूना प्रवासी 'ठग ब्लागर' के उकसावे पर मेरे विरुद्ध टिप्पणी कर रहे थे तब तो हेंकड़ी और घमंड मे थे अब हमे समर्थन देने को किस मुंह से कह रहे हैं?यही है आज की प्रगतिशीलता?

दिनांक 11 अप्रैल,2013 को यह फेसबुक पर दिया गया स्टेटस था जिसे संबन्धित सहयोगी  ब्लाग पर भी टिप्पणी के रूप मे चस्पा कर दिया था। ब्लाग संचालक ने इस टिप्पणी को हटा दिया किन्तु फेसबुक पर आई प्रतिक्रिया और समर्थन तो हमारे पास सुरक्षित हैं ही-


  • Girish Pankaj chinta n kare. aap vijayi honge.

  • भूपट शूट उसे अब गरज हैं वोट और बड़े आदमी के रूप में आपके समर्थन से भी सहयोग लेकर उभरने की.
    12 hours ago · Unlike · 2

    कितने आश्चर्य की बात है टिप्पणी हटाने वाले ब्लाग संचालक साहब ने 12 अप्रैल 2013 को किसी इंटरवियू मे किसी खास ब्लाग की निंदा कर दी और उसके संचालक ने संपादक से उन ब्लागर साहब द्वारा रुपयों के एवज मे नाम छापने का इल्जाम लगा दिया जिस पर अब इल्जामकरता ब्लागर को 'मान हानि' का मुकदमा झेलने को कहा गया है। एक वकील साहब ने रुपए देने वालों को यह धमकी देकर कि 'लेना व देना'दोनों अपराध हैं चुप रहने का इशारा किया है। 'चोर की दाढ़ी मे तिनका'कहावत को चरतार्थ करते हुये 'भृष्ट-धृष्ट-ठग'ब्लागर ने टिप्पणी दी है-
    ..... ' ने कहा…
    "लोग अपने कार्य से अलग किस उधेड़बुन में हैं !!! बहुत दुखद है = किताब के पैसे देना या साहित्य में अपना योगदान देना पैसे माँगना है तो ऐसी सोच के साथ कुछ नहीं कर सकते ...... मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ है ".
    ये तो ऐरे-गैरे-नत्थू -खैरे लोग थे जो ब्लाग के माध्यम से हमसे ज्योतीषीय लाभ लेकर आंखे तरेर गए। लेकिन जिनसे कभी रिश्ता रहा और उस रिश्ते के  आधार पर उन लोगों ने हमसे लाभ उठाया और हमारे वक्त पर उन लोगों ने आंखे तरेरते हुये कहा था कि मैंने उनको इसलिए मदद की थी कि मैं बेवकूफ था। लिहाजा उन लोगों से संपर्क समाप्त कर दिया था। पहले पूनम ने उन लोगों से संपर्क पुनः जोड़ना चाहा था फिर एक रिश्तेदार के माध्यम से उनसे आना-जाना चालू करने पर उन्होने यशवन्त को मोहरा बना कर किस प्रकार उत्पीड़न करने का कुत्सित प्रयास किया वह निम्नाकिंकित स्कैन कापियों से ज्ञात हो जाएगा---  



    यह भी दृष्टव्य : है कि,उन लोगों के यहाँ रिश्ता जुड़वाने वाले कमलेश बाबू ऊपर-ऊपर हम लोगों के सगे बने रहे और अंदरूनी तौर पर हम लोगों के विरुद्ध उन लोगों को मदद करते रहे क्योंकि उनको कुक्कू जो उनका भतीज दामाद है को प्लीज़ करना था। हमारे यशवन्त की इच्छानुसार  आगरा छोड़ कर लखनऊ आने की बात भी उन्हें न सुहाई। अपने भाई के माध्यम से हमे परेशान करने मे विफल रहने पर अपनी पूनावासी छोटी पुत्री के माध्यम से उन्होने पूना प्रवासी 'भृष्ट-धृष्ट-ठग'ब्लागर का चयन किया जिसने बाराबंकी और रांची स्थित ब्लागरों की मदद से ब्लाग जगत व हमारी पार्टी मे भी हमे परेशान करने का उपक्रम किया। 

    आम तौर पर धनाढ्य लोग समझते हैं कि वे अपने 'धन' और 'छल' से सबको अपने पीछे लामबंद करके जिसे चाहे उसे नेस्तनाबूद कर सकते हैं। वे यह नहीं समझ पाते कि 'सत्य,नीति और न्याय' के मार्ग पर चलने वाला चाहे कितना ही अभाव-ग्रस्त  क्यो न हो कभी भी धनवानों के समक्ष घुटने नहीं टेक सकता है। परमात्मा और प्रकृति ही ऐसे धूर्त लोगों को समय पर सीख दे देते हैं। अतः मैंने कभी भी किसी भी आक्रमण का उसी तरह का जवाब देने का प्रयास नहीं किया है। उस ग्रुप मे आपस मे मुक़दमेबाज़ी की धमकियाँ और सफाई उनके गुनाहों को भले ही ढकने मे कामयाब हो जाएँ परंतु अंततः अपने कुकर्मों का फल तो उन्हें ही भोगना होगा। किसी की उदारता को उसकी कमजोरी समझना,समझने वाले की अपनी भूल है। 

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गुरुवार, 3 जनवरी 2013

डॉ दराल साः को खुला पत्र ---विजय राजबली माथुर

विगत वर्षों की भांति इस बार मैंने अन्य ब्लाग्स व ब्लागर्स के संबंध मे अपना अवलोकन नहीं दिया था और देना भी नहीं चाहता था परंतु डॉ टी एस दराल सा :  ने अपने अवलोकन के एक खंड की अंतिम पंक्तियों मे मेरा उल्लेख किया है जिसका उत्तर मैंने अपनी टिप्पणी के रूप मे उस लेख पर इस प्रकार दिया था---

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हम से है ज़माना : दिनांक 28-12-2012

अत्यंत गुणवान और क्रातिकारी विचार रखने वाले श्री विजय माथुर जी के विचारों को लोग कम ही समझ पाते हैं. इसलिए वे अब ब्लॉग पर कम और फेसबुक पर ज्यादा नज़र आते हैं.     
विजय राज बली माथुरJanuary 01, 2013 6:47 PM
धन्यवाद डॉ साहब। वैसे मैं ब्लाग्स ('क्रांति स्वर','विद्रोही स्व-स्वर मे','कलम और कुदाल','जनहित मे'लगातार सक्रिय हूँ और श्रीमती जी के ब्लाग 'पूनम वाणी' की टाईपिंग भी खुद ही करता हूँ। शायद विवादों से बचने के कारण ब्लाग्स पर टिप्पणियाँ देने से संकोच करता हूँ इसीलिए आपने ऐसा निष्कर्ष निकाला होगा।
सुंदर है,वाह-वाह,खूब बढ़िया जैसे लच्छेदार शब्द मेरे पास नहीं हैं और लोगों को इनकी ही ख़्वाहिश रहती है अतः टिप्पणी देने से बचने लगा हूँ। 

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इसी खंड की पाँचवी पंक्ति मे डॉ साहब ने उल्लेख किया है-"रश्मि प्रभा जी की प्रभावशाली रचनाएँ अभी भी मन मोह रही हैं "
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मैंने ब्लाग लेखन के प्रारम्भ मे ही घोषणा की हुई है कि।मेरा लेखन-'स्वांतः सुखाय,सर्वजन हिताय' है। मैंने टिप्पणी बाक्स के ऊपर ही यह भी घोषणा की थी कि 'यह ब्लाग टिप्पणियों का मोहताज नहीं है'। अतः डॉ साहब का यह आरोप कि-"श्री विजय माथुर जी के विचारों को लोग कम ही समझ पाते हैं. इसलिए वे अब ब्लॉग पर कम और फेसबुक पर ज्यादा नज़र आते हैं. "-  मेरी समझ से बाहर है। मैंने अपने एक लेख मे खुद ही स्पष्ट लिखा था कि मैं जानता हूँ कि हमारे समकालीन लोगों को मेरे विचार अच्छे नहीं लगेंगे किन्तु मैं आने वाली पीढ़ियों के हितार्थ अपना लेखन करता हूँ और करता रहूँगा। मैं टिप्पणियों को लेन-देन  की धारणा से नहीं देखता हूँ यदि किसी के विचार अच्छे हैं तो निसंकोच अपनी समझ के अनुसार उसका उल्लेख करता हूँ अन्यथा अपना दृष्टिकोण भी बता देता हूँ किन्तु लेखक को संतुष्ट करने हेतु ख्वाम खाह की झूठी तारीफ़ों के पुल नहीं बांधता हूँ जैसा कि ब्लाग जगत का प्रचलन है। ब्लाग जगत मे कुछ लेखक खुद को खुदा और दूसरों को तुच्छ समझते हैं यही सबसे बड़ा कारण है कि मैंने टिप्पणियाँ देना बंद कर दिया है जिससे डॉ साहब ने यह निष्कर्ष निकाल लिया कि मैंने ब्लाग अध्ययन कम कर दिया है । बात जहां तक फेसबुक की है मैं उसे ब्लाग के 'पूरक'के रूप मे लेता हूँ। फेसबुक ग्रुप्स के माध्यम से काफी ज़्यादा लोगों तक ब्लाग मे व्यक्त विचारों का प्रसारण सुगमता से हो जाता है जबकि केवल ब्लाग जगत के आसरे रहने पर बात कुछ ही लोगों तक पहुँच पाती थी और फिर ब्लागर्स अपने थोथे  अहम व पूर्वाग्रहों  के कारण उसे ठुकरा देते थे। ब्लाग्स के संबंध मे अपनी पुस्तक'मीडिया समग्र' मे प्रो .डॉ जगदीश्वर चतुर्वेदी जी ने लिखा है-
"दसवां खण्ड- ब्लॉग संस्कृतिःतमाशबीनों की दुनिया"
वस्तुतः अधिकांश ब्लाग-लेखक तमाशबीन के तौर पर ही लिखते और एक-दूसरे की झूठी पीठ थपथपाते रहते हैं। मैं इस भेड़-चाल से बहुत दूर हूँ इसीलिए ब्लाग से दूर नज़र आता हूँ। फिर फेसबुक मे यह भी सुविधा है कि जिनसे हमे असुविधा है उनको हम अंफ्रेंड/ब्लाक करके छुटकारा पा सकते हैं किन्तु ब्लाग्स मे ऐसा करना शायद संभव नहीं है। 

डॉ साहब ने जिन नामों का उल्लेख किया है उनमे से डॉ दिव्या श्रीवास्तव व पी सी गोदियाल  जी की इसलिए प्रशंसा कर सकता हूँ कि वे राजनीतिक रूप से मुझसे 180 डिग्री के फासले पर होते हुये भी अभद्र व अश्लील भाषा के प्रयोग से बचे रहे हैं। अतः एक-दूसरे के लेखन पर टिप्पणियाँ न करना ठीक भी है और संतुलित भी। 

जिन राज भाटिया साहब का डॉ साहब ने उल्लेख किया है उन्होने  'हज़ारे आंदोलन' के दौरान फेसबुक पर मुझे 'नान-सेंस'तथा इंजीनियर सतीश सक्सेना साहब ने 'वाहियात' कह कर संबोधित किया था अतः उन दोनों को ब्लाक करके उनके ब्लाग्स अनफालों कर दिये थे। बाद मे सक्सेना साहब ने ईमेल के जरिये अपने बेटे व बेटी की एंगेजमेंट तथा शादियों पर उनके लिए आशीर्वाद देने को कहा था तो उन बच्चों को ईमेल के मार्फत शुभकामना व आशीर्वाद प्रेषित कर दिया था। एक और हरफन मौला ब्लागर मृत्युंजय कुमार राय की उस लेख पर टिप्पणी मौजूद है उनके व उनके बेटे माधव के ब्लाग्स भी अनफालों व उन दोनों को भी ब्लाक इसलिए करना पड़ा क्योंकि राय साहब ने मुझे 'बंगाल की खाड़ी मे डुबो देने' का ऐलान किया था।

ब्लाग जगत के केवल ये ही नमूने नहीं हैं। डॉ साहब का कहना है-"रश्मि प्रभा जी की प्रभावशाली रचनाएँ अभी भी मन मोह रही हैं "

"  (रश्मि प्रभा...Apr 27, 2012 07:21 AM कब मैं हिट होउंगी ... और राज्य सभा की सदस्य बनूँगी - आईला

Replies
महेन्द्र श्रीवास्तवApr 27, 2012 11:00 AM
आप जल्दी राज्यसभा में पहुंचें, मेरी भी शुभकामना है)"
प्रस्तुत टिप्पणी के माध्यम  से  'रश्मि प्रभा जी  ने ' ब्लाग जगत मे अपने चमचा ब्लागर्स के जरिये मेरे विरुद्ध अनर्गल और अबाध अभियान चलाया था जो अभी भी गतिमान है वह भी तब जबकि रश्मि प्रभा जी ने चार जन्म पत्रियों  का निशुल्क विश्लेषण मुझसे प्राप्त किया है और उनकी शिष्या ने भी चार जन्म पत्रियों का निशुल्क ही विश्लेषण प्राप्त किया है। 'हवन','ज्योतिष' आदि को निशाना बना कर लेख व टिप्पणियाँ खुले आम लिखे गए हैं। दूसरे ब्लागर्स की पोस्ट तक इन लोगों ने डिलीट कराई हैं अपने चमचों के द्वारा मुझे सपरिवार नष्ट करने की धमकियाँ दिलवाई हैं और वह खुद तांत्रिक प्रक्रियाओं से मेरे विरुद्ध षड्यंत्र चला रही हैं । जिन रश्मि प्रभा जी ने अपने  प्रबल चमचा ब्लागर से ब्लागर सम्मेलन के संयोजक ब्लागर रवीन्द्र प्रभात जी की कड़ी निंदा करवाई थी उनही के अगले आयोजन की अब निर्णायक बन गई हैं । उनके सह-संयोजक डॉ ज़ाकिर अली रजनीश जी से ज्योतिष को 100 प्रतिशत झूठा सिद्ध करवाया है। 

 ऐसे ब्लागजगत के लोगों से यदि 'टिप्पणियात्मक संबंध' मैंने सीमित कर दिया है तो गलत क्या किया है?यदि डॉ साहब को लगता है कि मैं ब्लाग जगत को कम समय दे रहा हूँ तो उसका कारण मेरे द्वारा टिप्पणियाँ न लिखना ही है।

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सोमवार, 14 नवंबर 2011

लखनऊ के अपने मकान मे दो वर्ष

आज ही की  तारीख मे गत वर्ष अपने लखनऊ आने का विवरण दिया था। पहले इस वर्ष इस विषय पर कुछ लिखने का विचार नहीं था ,हालांकि ऐसा कुछ भी विशेष कारण इसका नहीं था। यों तो हम लोग जिस प्रकार अपने लोगों के जन्मदिन पर केवल हवन करते हैं उसी प्रकार आज भी केवल हवन ही किया था ,किन्तु 'वास्तु शास्त्र' के मुताबिक कुछ विशेष सामाग्री और लेकर विशेष मंत्रों से अतिरिक्त आहुतियाँ और दे दी।

ब्लाग जगत मे पिछले कई पोस्ट मे नव-वर्ष आदि के अवसर पर जिन ब्लागर्स की तारीफ मे दो शब्द भी लिखे थे उनके प्रोफाईल खंगाल कर हमारी छोटी भांजी साहिबा ने अपने पिताश्री के बी माथुर साहब के माध्यम से उन्हें मेरे विरुद्ध करने का प्रयास किया। फिर 'अन्ना' का कारपोरेट घरानों का हितैषी आंदोलन चलने पर तमाम ब्लागर्स ने उसका अंध समर्थन किया। इस कारण मुझे कई ब्लाग्स अनफालों भी करने पड़े और कई को फेसबुक मे ब्लाक भी किया। कुछ पर 'अन्ना' के विरोध मे टिप्पणिया खुल कर दी और अधिकांश पर मौन रखा। हम-संम विचार धारा के ब्लागर्स ने अन्ना-विरोधी लेख प्रकाशित किए उन पर खुल कर समर्थन किया और उनमे से कुछ को अपने 'कलम और कुदाल' पर साभार  पुनर्प्रकाशित भी किया। जहां अन्ना/रामदेव की कीचड़ मे फंस कर अधिकांश ब्लागर्स अपना आपा खो बैठे थे और अन्ना विरोधियों को 'बकवास','वाहियात' जैसी उपाधियों से विभूषित कर रहे थे। उनके बीच मे उनके समर्थक होते हुये भी 'कीचड़ मे कमल' अथवा 'काँटों के बीच गुलाब' के रूप मे डॉ टी एस दराल साहब, मनोज कुमार जी एवं सलिल वर्मा जी का नाम आदर सहित लिया जा सकता है। इन तीनों का नाम पहले भी ससम्मान आया है इनके साथ और जो नाम प्रशंसा पाये थे वे सब अन्ना की अंध आंधी मे उड़ गए हैं।

पिछले वर्ष से अब तक (अप्रैल से नवंबर के मध्य) कुछ ब्लागर्स से व्यक्तिगत मुलाकातें भी सम्भव हुई जिनमे स्थानीय के अतिरिक्त दूसरे नगरों और विदेश से पधारे सज्जन भी थे। सभी मुलाकातें बेहद अच्छी रहीं  हैं। तीन साहित्यिक गोष्ठियों मे भी बुलावा मिला और हम तीनों मे ही उपस्थित हुये तथा  ज्ञानार्जन किया। AISF के प्लेटिनम जुबली समारोह मे एक कार्यकर्ता की हैसियत से भाग लिया। प्रगतिशील लेखक संघ के भी 75 वर्ष सम्पन्न होने के कार्यक्रम मे एक श्रोता की हैसियत से उपस्थित रहा और तमाम जानकारी हासिल कीं। भाकपा के आंदोलनों मे से कुछ मे एक कार्यकर्ता के नाते  सक्रिय रूप से शामिल हुआ। और इस प्रकार राजनीति एवं साहित्यिक गतिविधियों  मे पूरी तरह संतुष्टि प्राप्त हुई जबकि ब्लाग जगत का अनुभव अच्छा नहीं रहा। और अच्छा नहीं रहा व्यक्तिगत रिश्तेदारियों का कटु अनुभव। छोटी बहन डॉ शोभा और बहनोई माननीय कमलेश बिहारी माथुर साहब के पोल-पट्टों का खुलासा तथा उनकी के एम एवं शरद मोहन माथुर (पार्सल बाबू) के साथ घनिष्ठता का उजागर होना जहां धक्का लगने वाली बात थी वहीं इससे और आगे उनके द्वारा क्षति पहुंचाए जाने की कोशिश को ब्रेक भी लग सकता है जो हमारे लिए लाभदायक स्थिति ही होगी। हालांकि अभी तो छल-छ्द्म इनके चल ही रहे हैं। इनके रिशतेदारों तथा मित्रों को फेसबुक पर ब्लाक कर देने के कारण इन्हों ने kb mathur नाम से दूसरी आई डी बना कर हम लोगों का फेसबुक अकाउंट खँगालने का प्रबंध किया था जिसे भी ब्लाक कर देने के कारण अब यह और कोई तिकड़म भिढ़ाएंगे।  इनके रवैये के कारण ही 1990-91 और आगे -पीछे की वे बातें जो पहले ब्लाग मे देने का विचार नहीं था,देनी पड रही हैं।बात बेहद साफ है जब बहन-बहनोई की कारगुजारियाँ प्रकाश मे लानी पड़ी तो उन लोगों को क्यों छोड़ा जाये जिनके इशारे पर इन लोगों ने हमे मिल कर मारने की चाले चलीं।

पिछले वर्ष के लेख के बाद बाबूजी के फुफेरे भाई के पुत्रों -पुत्री से संपर्क हुआ था। इनमे से कमल दादा ने डॉ शोभा को 'टेढ़ी' बताया था उनका निधन मार्च 2011 मे हो गया। उनके शांति हवन मे मिली शैल जीजी ने भी डॉ शोभा को 'चिढ़ोकारी' बताया था उनका भी निधन अगस्त  2011 मे हो गया । यहाँ आने के बाद हमने सभी रिशतेदारों से संपर्क रखना चाहा था लेकिन ज़्यादातर के  अमीर होने के कारण निर्वाह नहीं हो सका ,अब हमने ऐसे संपर्क न करने का ही फैसला किया है। 'एकला चलो' वाला  जो सिद्धान्त पहले से ही प्रिय था उसी पर आगे चलने का पक्का फैसला किया है। यही इस एक वर्ष की उपलब्धि है। 

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