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बुधवार, 5 नवंबर 2014

'अपनत्व ' राजनीति की धुरी है और इसका आभाव?--- विजय राजबली माथुर


अमर उजाला में एक समाचार प्रकाशित हुआ है कि दिल्ली में कांग्रेस के छह विधायक तोड़ कर भाजपा सरकार बनाने जा रही थी। किन्तु सोनिया जी ने अपने एक विधायक को फोन करके उसकी निजी समस्याओं पर चर्चा की और कभी मिलने को घर आने को कहा। विधायक जी सोनिया जी से मिले और वार्ता के बाद साथियों सहित भाजपा को समर्थन न देने का निश्चय किया और भाजपा को मन मसोस कर रह जाना पड़ा।

इसी पर उपरोक्त टिप्पणी है इन पत्रकार बंधु की फेसबुक पर।

लगता है यह एक सही और सटीक  निष्कर्ष है ।  'राजनीति ' शब्द POLITICS के समानार्थी के रूप में प्रयुक्त होता है। ग्रीक शब्दों POLY + TRICS का समन्वय है POLITICS जिसका शब्दानुवाद है मल्टी ट्रिक्स अर्थात मतलब निकालने के विभिन्न तरीके। अधिकांश लोग राजनीति को इसी अर्थ में लेते हैं जिस कारण इसे घृणा की दृष्टि से भी देखा जाता है। किन्तु सोनिया जी की भांति ही कुशल राजनीतिज्ञ 'अपनत्व ' के आधार पर ही राजनीति चलाते हैं और वे अक्सर सफल भी रहते हैं। आक्रामकता द्वारा भावावेष से क्षणिक सफलता ही हासिल की जा सकती है 'स्थाई ' नहीं।

इस संदर्भ में 24-22  वर्ष पूर्व का घटनाक्रम याद आ गया है। 1992 में उत्तर-प्रदेश भाकपा का राज्य सम्मेलन आगरा में आयोजित हुआ था। आगरा के तत्कालीन  जिलामंत्री कामरेड रमेश मिश्रा जी का कहना था कि राज्य सचिव का .जगदीश नारायण त्रिपाठी जी ने ज़बरदस्ती यह उन पर थोप दिया था । उस समय एक प्राइमरी अध्यापक रमेश कटारा साहब ने अपनी तांत्रिक प्रक्रियाओं से रमेश मिश्रा जी व उनके परिवार की बुद्धि जाम कर दी थी। अतः मिश्रा जी कटारा साहब को राज्य काउंसिल में भेजना चाहते थे लेकिन आगरा के कामरेड्स कटारा की स्वार्थलिप्सा को समझते थे। वे जानते थे कि कटारा न केवल पार्टी बल्कि मिश्रा जी के निजी व्यवसाय तथा भवन पर भी निगाह जमाये हुआ था। उन सबने कटारा का सामूहिक विरोध किया जिस कारण वह राज्य काउंसिल में न भेजे जा सके।
मिश्रा जी ने अपने निजी 'अपनत्व-सम्बन्धों' के आधार पर केंद्रीय कंट्रोल कमीशन के चेयरमेन कामरेड काली शंकर शुक्ला जी से प्रभाव डलवा कर कटारा को प्रदेशीय कंट्रोल कमीशन में समायोजित करवा दिया। इसका खामियाजा मिश्रा जी को अपनी कुर्सी खो कर भुगतना पड़ा फिर वह नौ वर्ष बाद ही पुनः ज़िला मंत्री बन पाये तब ही जबकि कटारा को उन्होने पार्टी से निकलवा दिया। कुर्सी जाने पर उसके लिए मिश्रा जी ने मुझको दोषी माना और मुझे कटारा के कहने पर पार्टी से निकलवाने का प्रस्ताव पास करा दिया जिसे अवैधानिक ठहराया गया और मैं अपने पदों पर बहाल रहा था। किन्तु यह आभास हो गया था कि आगे भी कटारा और कुछ हरकत कर सकता है। अतः 1994 में प्रदेश सचिव मित्रसेन यादव जी व रामचन्द्र बख़्श सिंह साहब के साथ मैं सम्मान जनक तरीके से चला गया था।

सामूहिक धरने-प्रदर्शन आदि पर भाकपा के वरिष्ठ नेता गण मिलते रहते थे और उनसे सौहाद्र पूर्ण वार्तालाप होते रहते थे। जब बेनी प्रसाद वर्मा जी  और राज बब्बर साहब ने भी सपा नहीं छोड़ी थी उनसे पूर्व ही मैं निष्क्रिय बैठ गया था।  2006 में एक दिन दयालबाग क्षेत्र में अनायास  ही कामरेड रमेश मिश्रा जी से मुलाक़ात हो गई तो उनका पहला प्रश्न था कि आजकल किसी आंदोलन में दिखाई नहीं पड़ते ,क्या बात है? जब मैंने बताया कि आप तो जानते ही हैं कि मैं दीवार के उस पार भी क्या है ताड़ लेता हूँ तब आप आसानी से समझ सकते हैं कि क्यों मैंने बब्बर साहब व वर्मा जी से बहुत पहले सपा को अलविदा कर दिया था।
(मध्य में डॉ जितेंद्र रघुवंशी जी के दाहिने हाथ पर बैठे हुये हैं-कामरेड रमेश मिश्रा जी )

इस पर मिश्रा जी का मुझसे  कहना था कि राजनीतिक व्यक्ति खाली नहीं बैठ सकता और वह मुझे खाली नहीं बैठे रहने देंगे। उन्होने स्पष्ट किया कि अब कटारा को पार्टी से निकलवा दिया है और मुझे कोई दिक्कत नहीं होगी अतः मैं वापिस भाकपा में लौट आऊँ। व्यक्तिगत रूप से मिश्रा जी के 'अपनत्व ' से मैं वाकिफ था और उसे नकारा नहीं जा सकता था अतः मैंने विचार करने का आश्वासन दे दिया था। किन्तु मिश्रा जी जब-तब मेरे घर पर 'अपनत्व' के तौर पर फिर आने लगे व एक-दो पार्टी कार्यक्रमों में अपने साथ ले भी गए जबकि मुझे सदस्यता लेना बाकी भी था। उनका कहना था कि -" आपकी निष्ठा व ईमानदारी पर कभी कोई संदेह नहीं था और आपके साथ रहने से हमें बल मिलता है"।

ऐसे ही कमिश्नरी पर हुये 2006 में एक प्रदर्शन में जन-मोर्चा अध्यक्ष राज बब्बर साहब के साथ उत्तर-प्रदेश भाकपा के तत्कालीन सह-सचिव डॉ गिरीश भी  आगरा आए थे। लौटते में डॉ साहब भी उसी ट्रेक्टर ट्राली में बैठ कर ज़िला पार्टी कार्यालय आए जिसमें मैं भी था।डॉ साहब की उपस्थिती में ही मिश्रा जी ने पार्टी सदस्यता का फार्म मुझसे भरवा कर विधिवत सदस्यता प्रदान कर दी । क्योंकि मैं पूर्व में ज़िला पार्टी में था अतः तत्काल पूर्ण सदस्यता मिली।मिश्रा जी का  'अपनत्व' ही वह आधार था जो मुझे पुनः भाकपा में लौटा लाया।

समय चक्र के अनुसार 2009 में मैं आगरा से लखनऊ चला आया और निजी समस्याओं के सुलझते ही 25 सितंबर 2010 को प्रदेश सचिव डॉ गिरीश जी से पार्टी कार्यालय में संपर्क किया जो कि आगरा से ही जानते थे। अतुल अंजान साहब व अशोक मिश्रा जी भी आगरा से ही जानते थे। इन सबसे बात 'अपनत्व ' के आधार पर ही होती रही ,किन्तु रमेश कटारा साहब का एक नया अवतार प्रदेश में निर्णायक पदाधिकारी बना हुआ  था जो डॉ साहब को मुझसे दूर करने में सफल हो चुका है। 13 जूलाई 2013 की ज़िला काउंसिल मीटिंग में कटारा के उस नए अवतार ने मेरे पेट में उँगलियाँ भोंकी व अपने पैरों से मेरे पैरों पर प्रहार किए किन्तु डॉ साहब ने उससे 'मोह' के वशीभूत उसको कुछ नहीं कहा। मेरे द्वारा अंजान साहब व वर्द्धन जी के विचार पार्टी ब्लाग में पोस्ट  करने पर उस अवतार ने न केवल वे पोस्ट डिलीट कर दिये बल्कि मुझको ब्लाग एडमिनशिप तथा आथरशिप से भी हटा दिया। डॉ साहब ने कटारा-अवतार के कृत्य का समर्थन किया था। उस अवतार ने न तो विश्वनाथ शास्त्री जी को और न ही डॉ गिरीश जी को पार्टी के अधिकृत ब्लाग में एडमिन रखा था न ही आथर। फिर मुझको आथर व एडमिन क्यों बनाया ?उसके पीछे उसकी जो चाल थी वह विफल हो गई थी। अतः मैंने प्रदेश सचिव डॉ गिरीश जी व प्रदेश सह सचिव डॉ अरविंद राज स्वरूप जी को उन दोनों से निवेदन करके उन दोनों को ही पार्टी ब्लाग में आथर व एडमिन बना दिया था। इससे भी अवतार चिढ़ गया था। अब इस अवतार ने ( जो कि प्रदेश की ओर से ज़िले का सदस्य होते हुये भी पर्यवेक्षक बनाने से खुद को सुपर जिलामंत्री समझ लिया है ) अपने तो खास लोगों से मुझको ज़िला सम्मेलन से पूर्व तिकड़म द्वारा  पार्टी से हटाये जाने का ऐलान कर दिया है। 
 न तो आगरा में और न ही लखनऊ में मैंने किसी पार्टी पोस्ट से कोई निजी या नाजायज लाभ उठाया है अतः मुझे उससे कोई फर्क भी नहीं पड़ेगा। यह तो रमेश मिश्रा जी का  ' अपनत्व ' ही था जो मुझे वापिस पार्टी में लौटा लाया था वरना मैं किसी लोभवश नहीं आया था। अवतार साहब का निजी लोभ मुझको बोझ समझता है तो समझता रहे।

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शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

क्या घोंगावादी प्रवृती से जन -समर्थन मिल सकेगा ?

लखनऊ,03 अक्तूबर 2014 : कल गांधी/शास्त्री जयंती थी परंतु हम लोग 22-क़ैसर बाग,स्थित भाकपा कार्यालय पर पूर्व जिलामंत्री कामरेड बाबू खाँ साहब की 19 वीं पुण्य तिथि मनाने के लिए एकत्रित हुये थे।  विचार गोष्ठी की अध्यक्षता का भार वयोवृद्ध कामरेड शिव प्रकाश तिवारी जी के कंधों पर था। संचालन जिलामंत्री कामरेड मोहम्मद ख़ालिक़ साहब ने किया। उन्होने बाबू खाँ साहब के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालने हेतु सर्व प्रथम वयोवृद्ध कामरेड मुख्तार अहम्मद साहब को आमंत्रित किया।
मुख्तार साहब ने बाबू खाँ साहब के साथ काम करने के अनुभवों के आधार पर उनका सरल शब्दों में गूढ परिचय दिया। एक सादगी पसंद और नेक इंसान के रूप में उनको सदैव याद किया जाएगा ऐसी उम्मीद उन्होने ज़ाहिर की।

ओ पी अवस्थी साहब ने बताया कि उनकी जन्मतिथि उपलब्ध न होने के कारण उनकी पुण्य तिथि मनाई जा रही है। उन्होने यह भी कहा कि किसी भी व्यक्ति के कार्यों का मूल्यांकन उसके जाने के बाद ही हो पाता है। 
मधुकर मौर्या ने नितांत निजी सम्बन्धों के आधार पर बाबू खाँ साहब का बेहद गुण गान किया। उन्होने कहा कि बाबू खाँ जैसा न कोई और कामरेड हुआ है और न आगे होगा। 

दीपा पांडे जी ने बचपन की यादें समेटते हुये बाबू खाँ साहब की विलक्षण मनोवैज्ञानिक क्षमता का उल्लेख किया कि किस प्रकार वह छोटे-छोटे बच्चों को प्रगतिशील विचार धारा की ओर मोड़ने में सक्षम रहते थे। छोटी-छोटी बातों के जरिये वह बड़ी-बड़ी बातों को सरलतम ढंग से समझाने में बड़े माहिर थे। दीपा जी ने बताया कि अबके कामरेड्स में इस गुण का आभाव होना ही कामरेड्स के बच्चों को अपनी विचार-धारा से दूर ले जा रहा है। उन्होने यह भी कहा कि लोग परिवारवाद की आलोचना करते हैं परंतु उनकी चिंता है कि जब कामरेड्स के अपने परिवार के ही सदस्य दूर जाएँगे तो हम दूसरे लोगों को कैसे अपने साथ जोड़ पाएंगे। उन्होने इसकी एक वजह यह भी बताई कि बच्चे जब यह देखते हैं कि उनके माता-पिता द्वारा त्याग करने के बावजूद पार्टी में उनकी कद्र नहीं है तो वे पार्टी से दूर रहने में ही भलाई समझते हैं जिसकी वजह से पार्टी सिकुड़ती जाती है। उन्होने अपेक्षा की कि पार्टी में  कामरेड्स की कद्र करने की ओर ध्यान दिया जाएगा और परिवारों के सदस्यों को भी विचार-धारा से जोड़ा जाएगा। सभी ने दीपा जी के सुझावों की सराहना की। 

कामरेड राजपाल यादव ने इस दोहे के साथ बात की शुरुआत की कि ---
"दुख में सुमिरन सब करें,सुख में करे  न कोय। 
जो सुख में सुमिरन करे ,तो दुख काहे   होय । । "
उन्होने साफ-साफ कहा कि हमें निराश नहीं होना चाहिए और जीवन काल में ही कामरेड्स के गुणों को पहचान कर उनको सम्मान देना चाहिए। उन्होने कहा कि आदरणीय बाबू खाँ साहब जैसे और भी बहुत से कामरेड्स हमारे बीच में आज भी मौजूद हैं। इस कड़ी में उन्होने वर्तमान जिलामंत्री कामरेड मोहम्मद ख़ालिक़ साहब की तुलना पूर्व जिलामंत्री बाबू खाँ साहब से की। 

कामरेड विजय माथुर ने कहा कि हमें महापुरुषों का स्मरण उनके आचरण को अपने व्यवहार में उतारने का संकल्प लेकर करना चाहिए न कि उनकी यादगार सभा में केवल चाय -नाश्ता करके और कोरा गुण गान  करके खाना-पूर्ती करनी चाहिए। 
उन्होने  प्रारम्भ में  कामरेड नजीरुल हक साहब का लिखा वह नोट पढ़ कर सुनाया जिसमें हक साहब ने 27-28 सितंबर 2014 को इस्लामाबाद में 5 वामपंथी गुटों के द्वारा मिल कर एक 'पाकिस्तान वर्कर्स अवामी पार्टी' बनाने की सूचना दी थी और भारतीय वामपंथियों का आह्वान किया था कि 'दुनिया के मजदूरों एक हो का स्लोगन देने वाले खुद तो एक हो'। http://vijai-vidrohi.blogspot.in/2014/09/duniya-ke-mazddoro-ek-ho-ka-slogan-dene.html
इसके बाद उन्होने किसान सभा व महिला सभा की कर्मठ नेत्री कामरेड अर्चना उपाध्याय जी द्वारा जारी नोट जिसमें उत्तर-प्रदेश भाकपा से सकारात्मक कदम उठाने की मांग की गई थी का ज़िक्र किया। दीपा पांडे जी ने सुझाव देते हुये कहा कि कामरेड माथुर को नजीरुल हक साहब का नोट 'मुक्ति संघर्ष' व 'पार्टी जीवन ' को प्रकाशनार्थ भेज देना चाहिए। उनका जवाब देते हुये कामरेड माथुर ने कहा कि 'मुक्ति संघर्ष' को भेज देंगे (प्रधान संपादक शमीम फैजी साहब को फेसबुक मेसेज के जरिये अब भेज दिया है ) लेकिन 'पार्टी जीवन ' नहीं छापेगा क्योंकि उसके कार्यकारी संपादक प्रदीप तेवारी उनके प्रति वितृष्णा भाव रखते हैं। उन्होने पार्टी की सिकुड़ती हुई स्थिति व गिरती हुई साख के लिए प्रदीप तेवारी को जिम्मेदार ठहराया। 
बीच में अनाधिकृत हस्तक्षेप करते हुये मधुकर मौर्या ने माथुर को बैठ जाने को कहा। उनको टोकते हुये राजपाल जी ने पूछा कि जब  सभा अध्यक्ष जी व जिलामंत्री जी कुछ नहीं कह रहे हैं तो मधुकर मौर्या किस हैसियत से हस्तक्षेप कर रहे हैं। इस पर अध्यक्ष जी व जिलामंत्री जी ने कामरेड माथुर को अपनी बात जारी रखने को कहा। किन्तु कामरेड माथुर ने यह कहते हुये कि --- 'सोते हुओं को तो जगाया जा सकता है लेकिन जो जागते हुये सोने का उपक्रम करें उनके लिए वह अब एक शब्द भी नहीं कहेंगे। जब इंसान उनको सुनने के लिए तैयार नहीं हैं तो दीवारों को सुनाने का कुछ फायदा नहीं है' ---आगे बोलने से इंकार कर दिया। *

कामरेड ख़ालिक़ साहब ने अपने मार्मिक उद्बोद्धन में बाबू खाँ साहब को निर्भीक,साहसी और ईमानदार नेता बताया। उन्होने ज़िक्र किया कि बाबू खाँ साहब कहते थे कि 'प' अक्षर से सावधान रहना चाहिए जैसे-पड़ौसी,पार्टी,पैसा,प्रचार,'प' अक्षर वाले आदमी आदि। ख़ालिक़ साहब ने बताया कि वह सबकी निस्स्वार्थ भाव से मदद करते थे और उनको किसी प्रकार का लालच नहीं था। बेहद सादगी से रहते हुये वह दबंग विचारों के धनी थे। सरकारी अधिकारी उनकी इज्ज़त करते हुये काम कर देते थे। उन्होने कहा कि सच में हमें आज बाबू खाँ साहब के आदर्शों पर चलने की बहुत ज़रूरत है।

अंत में धन्यवाद देने से पूर्व सभा-अध्यक्ष आदरणीय कामरेड शिव प्रकाश तिवारी जी ने कामरेड बाबू खाँ साहब के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर व्यापक प्रकाश डाला। उन्होने इस कार्यक्रम को आयोजित करने के लिए कामरेड ख़ालिक़ को विशेष धन्यवाद भी दिया। उन्होने कहा कि बाबू खाँ साहब में न तो लालच था और न ही घमंड जिस वजह से वह हमेशा कामयाब रहे। लेकिन अब के कामरेड्स उनके आचरण को अपने जीवन में उतारना ही नहीं चाहते। उन्होने युवा साथी राजपाल यादव की इस बात के लिए भूरी-भूरी प्रशंसा की कि उन्होने लखनऊ पूर्व से चुनाव लड़ कर पार्टी का झण्डा और पहचान घर-घर फिर से पहुंचा दी। उन्होने राजपाल यादव को पार्टी के लिए आशा की एक किरण बताया। उन्होने अशोक मिश्रा जी की प्रशंसा करते हुये कहा कि जब वह जिलामंत्री थे तो उन्होने उनकी काफी सहायता की थी। शिव प्रकाश जी ने पार्टी के राष्ट्रीय सचिव और किसानसभा के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड अतुल अंजान को पार्टी की 'रीढ़' बताया। उन्होने कामरेड हरीश तिवारी के दामाद के भाजपा नेता होने का ज़िक्र करते हुये कहा कि कामरेड्स को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनकी सन्तानें भी पार्टी की विचार-धारा को ही आगे बढ़ाएँ इसके लिए पार्टी में सभी कामरेड्स को समान महत्व दिये जाने की उन्होने आवश्यकता बताई। पार्टी के सिकुड़ते जाने के लिए उन्होने कुछ नेताओं के अहंकार और स्टेटस को उत्तरदाई माना। इस दुर्वस्था से निकाल कर पार्टी को जनता के बीच ले जाने की ज़रूरत पर उन्होने ज़ोर दिया। 
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* ज्ञातव्य है कि मधुकर मौर्या डॉ गिरीश शर्मा/प्रदीप तेवारी गुट की ओर से जिलामंत्री पद के संभावित प्रत्याशी हैं और इसी अहंकार में अलोकतांत्रिक प्रक्रिया अपना कर प्रदीप तेवारी के प्रति अपनी निजी वफादारी का प्रदर्शन कर रहे थे। उनकी पुत्री AISF की प्रदेश कोषाध्यक्ष है  और प्रदीप तेवारी AISF के प्रदेश इंचार्ज जिस कारण भी उनको प्रदीप की तरफदारी करना  भी बेहद ज़रूरी था। 

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मंगलवार, 30 सितंबर 2014

हश्र क्या हुआ सफल रैली का ? ---विजय राजबली माथुर

30 सितंबर 2013 की सफल रैली की वर्षगांठ के अवसर पर विशेष :




मैंने गत वर्ष 30 सितंबर 2013 की सफल रैली के बाद डॉ साहब को आगाह करने का प्रयास किया था। :
"जहां तक रैली की भौतिक सफलता का प्रश्न है रैली पूर्ण रूप से सफल रही है और कार्यकर्ताओं में जोश का नव संचार करते हुये जनता के मध्य आशा की किरण बिखेर सकी है। लेकिन क्या वास्तव में इस सफलता का कोई लाभ प्रदेश पार्टी को या राष्ट्रीय स्तर पर मिल सकेगा?यह संदेहास्पद है क्योंकि प्रदेश में एक जाति विशेष के लोग आपस में ही 'टांग-खिचाई' के खेल में व्यस्त रहते हैं। यही वजह है कि प्रदेश में पार्टी का जो रुतबा हुआ करता था वह अब नहीं बन पा रहा है। ईमानदार और कर्मठ कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न एक पदाधिकारी विशेष द्वारा निर्लज्ज तौर पर किया जाता है और उसको सार्वजनिक रूप से वाह-वाही प्रदान की जाती है। एक तरफ ईमानदार IAS अधिकारी 'दुर्गा शक्ती नागपाल'के अवैध निलंबन के विरुद्ध पार्टी सार्वजनिक प्रदर्शन करती है और दूसरी तरफ उत्पीड़क पदाधिकारी का महिमामंडन भी। यह द्वंदात्मक स्थिति पार्टी को अनुकूल परिस्थितियों का भी लाभ मिलने से वंचित ही रखेगी। तब इस प्रदर्शन और इसकी कामयाबी का मतलब ही क्या होगा?  "
http://vidrohiswar.blogspot.in/2013/09/3-30.html

मेरे इस आंकलन  का कारण  प्रदीप तेवारी  द्वारा  डॉ साहब पर रैली के संबंध में किया गया यह व्यंग्य है कि वह ग्लैमर में लगे रहते हैं : रैली निकालना उनके बूते की बात नहीं है। जबकि रैली के मंच से राष्ट्रीय सचिव अतुल अंजान साहब ने इस रैली को 'राजनीतिक सन्नाटा तोड़ने वाली रैली' की संज्ञा दी थी। किन्तु तेवारी साहब अपने दबदबे से 'अंजान' साहब के विरुद्ध घृणित प्रचार अभियान चलाते रहते हैं उनकी एक पोस्ट  लगाने के कारण ही मुझे पार्टी ब्लाग के एडमिन व आथरशिप से उन्होने मुझे हटा दिया था जिस कारण मुझे 'साम्यवाद (COMMUNISM)' ब्लाग निकालना पड़ा। 

यह  है पिछली पोस्ट  का एक अंश। कहने की आवश्यकता नहीं है  कि उस सफल  रैली  के बाद मैंने जो आंकलन  किया था वह  शतशः सही निकला  है। डॉ साहब  रमेश कटारा  के नए अवतार  प्रदीप तेवारी  के पूर्ण प्रभाव में उसी प्रकार हैं जिस प्रकार 1992 में आगरा के जिलामंत्री कामरेड रमेश मिश्रा जी  रमेश कटारा के प्रभाव में थे। आगरा में सम्पन्न हुई राज्य काउंसिल के लिए  रमेश कटारा हेतु पार्टी का समर्थन हासिल न कर पाने पर मिश्रा जी ने केंद्रीय कंट्रोल कमीशन के चेयरमेन कामरेड काली शंकर शुक्ला जी से जातिवाद का प्रभाव डाल कर रमेश कटारा को राज्य कंट्रोल कमीशन में नामित करा दिया था। और इसकी कीमत मिश्रा जी को जिलमंत्री पद से नौ वर्ष लगातार वंचित रह कर चुकानी पड़ी थी। 'बोध' होने पर उन्होने रमेश कटारा को पार्टी से निष्कासित करा दिया था एवं पुनः नौ वर्ष आगरा के जिलामंत्री पद पर आसीन रहे ,आज भी वहाँ सर्वमान्य हैं लेकिन इस स्वीकृति हेतु उनको अपनी भूल को सुधारना पड़ा था। 

आज अभी तक  द्वितीय रमेश कटारा:प्रदीप  तेवारी का नशा डॉ साहब के सिर चढ़ कर बोल रहा है। जब पिछली पोस्ट मैंने उनको टैग करना चाहा तो ज्ञात हुआ कि सुबह बर्द्धन जी के जन्मदिन वाली पोस्ट मेरे लगाने के बाद उन्होने खिन्न होकर वह पोस्ट हटा कर मुझे फेसबुक पर ब्लाक कर दिया है। एक तरफ 16 सितंबर 2014 को उन्होने यह स्टेटस दिया था।:















 
http://vijaimathur.blogspot.in/2014/09/blog-post_28.html
कहाँ तो डॉ साहब ' वामपंथियों को जल्द से जल्द ' वास्तविक तथ्य को समझ लेने का आव्हान कर रहे हैं और एकता के पक्ष में सहमति दे रहे हैं लेकिन खुद ही वास्तविकता से आँखें मूँद कर मात्र प्रदीप के मोह में वैसे ही जनता से सिकुड़ी हुई पार्टी को जनोन्मुखी बनाने की बजाए कार्यकर्ताओं के उत्पीड़न में प्रदीप की पक्षधरता कर रहे हैं। फेसबुक पर मुझे ब्लाक करना उसी कड़ी का पहला कदम है और प्रदीप द्वारा मुझे पार्टी ब्लाग की एडमिनशिप से हटाने के कृत्य पर सार्वजनिक रूप से मोहर भी (प्रदीप ने ब्लाग चलाने के छह वर्ष तक न तो शास्त्री जी को न ही डॉ साहब को ब्लाग एडमिन बनाया था बल्कि मैंने न केवल डॉ साहब वरन अरविंद राज जी को भी निवेदन करके ब्लाग एडमिन बनवा दिया था जो कि प्रदीप को खूब अखरा भी था )।प्रदीप उनके फेसबुक पर आने का भी विरोधी था मैंने ही उनको फेसबुक पर आने व सक्रिय होने में सक्रिय सहयोग दिया था। उनको तमाम ग्रुप्स में शामिल किया व अपनी मित्र सूची से उनको फ्रेंड्स सजेस्ट किए थे। जब चल गए तो प्रदीप की गोद में बैठ कर उसके इशारों पर चलने लगे न अपने पद की गरिमा का ख्याल किया न ही व्यक्तिगत कोई ज़रा सा भी लिहाज।  हो सकता है ज़िला सम्मेलन से पूर्व वह मुझे पार्टी से निष्कासित करवाने का  कदम उठा कर प्रदीप को और भी खुश करें। पुरानी कहावत है :'काजर की कोठरी  में कैसे हु सयानों जाये एक लीक काजर की लागिहे पे लागिहे । ' यही बात डॉ साहब पर अब बखूबी चस्पा हो रही है। जब वह  हाथरस से रामवीर उपाध्याय के विरुद्ध चुनाव लड़ रहे थे तब ब्राह्मण बहुल क्षेत्र में 'डॉ गिरीश' नाम से किन्तु पोंगापंथी प्रदीप से प्रभावित होकर अब :
13 जूलाई 2013 की ज़िला काउंसिल बैठक के तुरंत बाद डॉ साहब ने प्रदीप की उपस्थिती में ही अंजान साहब को बताया था कि एक दिन पूर्व जब वह बांदा जा रहे थे उनकी जीप का विंड मिरर धमाके के साथ ब्लास्ट कर गया था और उसके काँच के घाव उनके शरीर पर भी थे जिन्हे उन्होने अंजान साहब को दिखाया भी था। संभवतः यह प्रदीप की कोई 'तांत्रिक करामात' ही होगी जिसने डॉ साहब के दिमाग को उसी प्रकार अपने कब्जे में कर रखा है जिस प्रकार तब रमेश कटारा ने रमेश मिश्रा जी के साथ कर रखा था।डॉ साहब ने स्वतः ही अंजान साहब को अपनी यह खूबी भी बताई थी कि उन्होने फारवर्ड ब्लाक के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राम किशोर जी को उनकी पार्टी से निकलवा दिया है । उन्होने उनको अपने सेक्रेटरी से सफलता पूर्वक भिड़ा दिया था। बड़े ही गर्व के साथ डॉ साहब ने यह भी बताया था कि फारवर्ड ब्लाक के  नए प्रदेश अध्यक्ष और सेक्रेटरी को उन्होने अलग-अलग अपने कब्जे में कर रखा है। 
  जी पी ओ पार्क,लखनऊ स्थित गांधी प्रतिमा पर महिला फेडरेशन के एक धरने  के दौरान डॉ साहब ने प्रदीप व मेरे मध्य साँप-नेवले के संबंध की बात कही थी। कहाँ तो प्रदीप प्रदेश कोषाध्यक्ष और कहाँ मैं ज़िला काउंसिल का सदस्य दोनों के मध्य प्रतिद्वंदिता अथवा समानता की बात ही कहाँ थी? परंतु डॉ साहब ऐसी तुलना कर रहे थे क्यों? 
मई 2012 में डॉ साहब ने खुद अपनी जन्मपत्री का व 06-11-12 को अपनी पत्नी की जन्मपत्री का तथा प्रदीप ने 12-11-12 को अपनी पुत्री की जन्मपत्री का विश्लेषण मुझसे निशुल्क प्राप्त किया था । किन्तु ये दोनों उसी प्रकार मेरा अनर्गल विरोध कर रहे हैं जिस प्रकार प्रदीप की भाभी की मित्र पूना प्रवासी भृष्ट-धृष्ट ब्लागर ने चार जन्मपत्रियों  का निशुल्क विश्लेषण प्राप्त करके ब्लाग जगत में किया था। क्या एक निकृष्ट ब्लागर और इन बड़े राजनेताओं में कोई फर्क नहीं होना चाहिए था?

 परंतु गलत व्यक्ति को लाभ पहुंचा कर न तो पार्टी को मजबूत बनाया जा सकता है न ही जनता के मध्य लोकप्रिय। 
http://communistvijai.blogspot.in/2013/12/blog-post_24.html

Tuesday, 24 December 2013


अवाम की आवाज़ और चेहरा :लखनऊ की शान और उत्तर प्रदेश का सितारा - अतुल अनजान:

"कामरेड अतुल अनजान लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष और AISF के भी पूर्व अध्यक्ष तो हैं ही। वर्तमान में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के 'राष्ट्रीय सचिव' तथा AIKS-अखिल भारतीय किसानसभा के 'राष्ट्रीय महामंत्री हैं'।  न केवल अपनी ओजस्वी वाक-शैली वरन जनता के मर्म को समझने वाले एक जन-प्रिय नेता के रूप में भी जाने जाते हैं। 

यदि भाकपा केंद्रीय नेतृत्व उनके राष्ट्रीय कृत्यों के अतिरिक्त उत्तर प्रदेश में पार्टी के पथ -प्रदर्शक के रूप में उनको अतिरिक्त भार  दे दे  तो पार्टी को अत्यंत लाभ हो सकता है। "  

मेरी उपरोक्त पोस्ट भी डॉ साहब व प्रदीप को नागवार गुज़री थी किन्तु यह हकीकत है कि यदि उत्तर-प्रदेश में भाकपा को मजबूत करना है तो अंजान साहब का सहयोग लेना ही पड़ेगा जो कि डॉ साहब व प्रदीप गठबंधन के पूर्वाग्रहों के कारण संभव नहीं है क्योंकि अंजान साहब की मौजूदगी में प्रदीप निर्बाध मनमानी नहीं चला सकेगा जैसी की डॉ साहब की कृपा से अभी चला रहा है और पार्टी को निरंतर सिकोड़ता जा रहा है। 

उदारता एक मानवीय गुण है सभी को उदार होना चाहिए किन्तु उसके साथ-साथ पात्र की अनुकूलता भी होनी चाहिए। :

विगत वर्ष (30 सितंबर 2013 ) को आगरा के एक वरिष्ठ कामरेड  साहब से  रैली स्थल पर भेंट हुई थी तब वह मंच की ओर पीठ कर के खड़े हुये थे(जबकि आगरा में मैंने उनके व डॉ साहब के  मध्य मधुर संबंध देखे थे )।  इस दृष्टांत से पूर्व जिलामंत्री  डॉ जवाहर सिंह धाकरे साहब द्वारा दी गई इस जानकारी की पुष्टि हो गई कि चंडीगढ़ के महिला फेडरेशन के कार्यक्रम हेतु ट्रेन में जाते समय उन वरिष्ठ कामरेड की कामरेड पत्नी को  डॉ साहब अभद्र व अश्लील चुट्कुले सुनाते गए थे। आगरा के तत्कालीन जिलामंत्री कामरेड रमेश मिश्रा जी ने तबके प्रदेश सहायक सचिव डॉ साहब को इस बात के लिए कड़ी फटकार लगाई थी और भविष्य में फिर ऐसा न करने का आश्वासन देकर डॉ साहब ने पिंड छुड़ाया था। फिर भी इस जानकारी के बावजूद  भी मैंने लखनऊ में उनके प्रति उनके द्वारा बताई बात कि उनकी बीमारी के कारण यहाँ के कामरेड्स उनसे घृणा करते हैं उनके प्रति उदार रवैया अपनाया था । किन्तु डॉ साहब उस उदारता हेतु अनुकूल पात्र नहीं निकले। 

डॉ साहब के रुष्ट होने का एक बड़ा कारण उनके एक फेसबुक मित्र को 07 अगस्त को भेजा मेरा यह संदेश भी हो सकता है :

"आदरणीय कामरेड, लाल सलाम, उम्मीद है कि आप सपरिवार कुशल-मंगल होंगे। कुछ ज़रूरी सूचना देना चाहता हूँ और उम्मीद करता हूँ कि आप अन्यथा न लेंगे। 05 अगस्त को एक प्रो ए के सिंह (का. अशोक कुमार सेठ ) आए थे और लगभग ढाई घंटे बैठे थे । आते ही उनका कहना था कि डॉ गिरीश जी के आदेश से आए हैं व उनको मेरा फोन न . कामरेड ख़ालिक़ ने दिया था। उनकी तमाम बातों का लबबों-लुआब यह था कि मुझको कामरेड अतुल अंजान साहब का विरोध करना चाहिए। चुप-चाप उनकी सारी बातें सुन ली किन्तु जब उनके द्वारा प्रदीप तिवारी की बात सुनी तो मैंने उनको स्पष्ट कर दिया था कि वही पार्टी को क्षति पहुंचा रहा है और कामरेड अंजान साहब नहीं। फिर कल 06 अगस्त को उनका फोन आया कि पार्टी आफिस में उनकी डेढ़ घंटे गिरीश जी से बातें हुईं व वह प्रदीप का ठोस समर्थन कर रहे हैं। आप लोग अतुल जी का विरोध करें या प्रदीप तिवारी का समर्थन करें इसमें मेरा तो कोई वास्ता नहीं है। किन्तु मैं भी अतुल जी का विरोध करूँ इसकी क्या ज़रूरत है ?मैं ऐसा नहीं कर सकता। हाँ मैं प्रदीप तिवारी का विरोध करता रहूँगा क्योंकि उस कमबख्त ने 13 जूलाई 2013 की ज़िला काउंसिल बैठक में मेरे पेट में न केवल उँगलियाँ भोंकी बल्कि मेरे पैरों पर अपनी लातों से भी प्रहार किया था। मुझे मालूम चला है कि प्रदीप मुझे पार्टी से निष्कासित कराना चाहता है और वह ऐसा कर सकता है। मोहम्मद ख़ालिक़ या अकरम की तरह मेरी कोई दूकानदारी पार्टी के दम पर नहीं चल रही है और न ही पार्टी के दम पर प्रदीप की तरह मैं किसी बैंक मेनेजर या व्यापारियों को ब्लैकमेल कर रहा हूँ जो मुझे निष्कासित होने पर घाटा हो जाएगा। उस सूरत में मैं तो प्रदीप तिवारी के विरुद्ध FIR करने के लिए स्वतंत्र हो जाऊंगा। आपसे सानुरोध विनम्र प्रार्थना है कि डॉ गिरीश जी से कहें कि जिस प्रकार उन्होने प्रो साहब को मेरे पास आने का आदेश दिया है उसी प्रकार उनको मुझसे मिलने से मना कर दें। वरना उनका फोन आने पर मैं खुद तो मना कर ही दूँगा और घर पर फिर भी आ गए तो उसी प्रकार बैरंग कर दिया जाएगा  जिस प्रकार प्रदीप तिवारी के इशारे पर आने वाले कामरेड राम किशोर जी को प्रतिबंधित कर दिया है। अपने ब्लाग्स व फेसबुक के माध्यम से मैं प्रदीप तिवारी का विरोध व अतुल अंजान साहब का समर्थन जारी रखूँगा। उसके लिए डॉ गिरीश जी की बात नहीं मानी जा सकती हैं। वैसे व्यक्तिगत रूप से डॉ गिरीश जी का सम्मान करता रहूँगा। धन्यवाद।"

(इस  पूरे मेसेज को डॉ साहब द्वारा सेठ साहब को पहुंचा दिया गया था जैसा कि सेठ साहब ने 24 अगस्त की काउंसिल बैठक के बाद ज़िक्र किया था।क्या यह डॉ साहब के ओहदे के अनुकूल प्रक्रिया हुई?) 

 अब आज 30 सितंबर 2013 की सफल रैली की वर्षगांठ के अवसर पर विगत एक वर्ष की असफलताओं का लेखा-जोखा करते हुये भविष्य में उनसे बचाने व सुधार का संकल्प लेना चाहिए; तभी भाकपा का भविष्य उज्ज्वल बनाया जा सकता है।

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शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

बहुत मुश्किल है कुछ यादों का भुलाया जाना (भाग-1 ) ---विजय राजबली माथुर

आर्यसमाज -कमलानगर,आगरा में यशपाल आर्य जी ने एक प्रवचन देते हुये एक ब्रिटिश जज साहब का वृतांत सुनाया था जिसके अनुसार वह जज साहब शार्ट -कट के लिए घर से अदालत जाते वक्त 'रेड लाईट एरिया' का रास्ता अपना लेते थे। यद्यपि वह संयमित प्राणी थे किन्तु उनके अवचेतन मस्तिष्क पर वहाँ चल रही गालियां अंकित हो गई थीं। जब वृद्धावस्था में वह गंभीर रुग्ण हुये और अनकांशस  रहने लगे तब कभी-कभी उनके मुख से वे भद्दी गलियाँ निकल जाती थीं जो उन्होने कभी रास्ते में सुनी थीं। डाक्टरों ने जब इसकी खोज की तब पता चला कि जज साहब अदालत जाने के लिए जिस रास्ते का उपयोग करते थे ये गालियां उसी का दुष्परिणाम हैं। यह तो अवचेतन मस्तिष्क की बात थी। किन्तु चेतन अवस्था में कुछ घटना-क्रम इस प्रकार असर डालते हैं कि चाह कर भी उनको भुलाना संभव नहीं होता क्योंकि फिर-फिर उसी प्रकार की घटनाओं का जब-जब दोहराव होता है तब-तब उन पुरानी घटनाओं की यादें तरो-ताजा हो जाती हैं। 

कामरेड रमेश मिश्रा :
होटल मुगल शेरटन,आगरा से 'सुपर वाईजर  अकाउंट्स' की पोस्ट से बर्खास्तगी को कानूनी चुनौती देने के दौरान कामरेड अब्दुल हफीज साहब से संपर्क हुआ था जो त्याग की सच्ची मूर्ती थे और उनको संत कामरेड की संज्ञा प्राप्त थी। उनको लोग प्यार से 'चचे' भी पुकारते थे और वह आगरा में भाकपा के पर्यायवाची थे। कम्युनिस्ट पार्टी से अभिप्राय आम जनता में चचे की पार्टी से था। यह ठीक उसी प्रकार था जैसे कि लखनऊ में कम्युनिस्ट पार्टी से अभिप्राय यहाँ के आम नागरिक कामरेड अतुल अंजान की पार्टी से लेते हैं। हफीज साहब ने पार्टी के आडिटर कामरेड हरीश आहूजा एडवोकेट के पास मुझे भेज दिया जिन्होने मेरा केस तैयार कराया। कामरेड आहूजा ने मुझे भाकपा में शामिल कर लिया। वह प्रत्येक ब्रहस्पतिवार को 'मजदूर भवन' पर एक स्कूल चलाते थे जिसमें बतौर पार्टी शिक्षक कामरेड डॉ रामगोपाल सिंह चौहान,कामरेड डॉ महेश चंद्र शर्मा और पार्टी के जिलामंत्री कामरेड रमेश मिश्रा आया करते थे।

एक दिन मैं किसी और कार्य से मजदूर भवन की तरफ से निकल रहा था तो आहूजा साहब ने इशारा करके मुझे पास बुलाया और कहा कि आपको डॉ चौहान और डॉ शर्मा पार्टी आफिस में याद करते हैं और आप कल ही उनसे संपर्क करें और वहीं जाया करें यहाँ आने की आवश्यकता नहीं है। कामरेड डॉ चौहान साहब ने मुझे पार्टी कार्यालय में कार्य करने को कहा और मैं उनके तथा डॉ शर्मा जी के निर्देशन में  उनको सहयोग करने लगा। जिलमंत्री कामरेड रमेश मिश्रा जी ने मुझे अपने घर से कुछ पार्टी साहित्य भी पढ़ने को दिया और कई सभाओं में मुझे मेरे घर से लेकर अपने साथ गए और वापिस भी घर पहुंचा देते थे। डॉ चौहान के बीमार पड़ने पर उनके सुझाव पर मुझे ज़बरदस्ती ज़िला कोषाध्यक्ष के पद पर नियुक्त करा दिया। उनका पूर्ण विश्वास मुझे हासिल रहा। प्राइमरी शिक्षक संघ के एक नेता कामरेड रमेश कटारा जो कुछ 'तांत्रिक' प्रक्रियाओं के भी विशेज्ञ थे एक के बाद एक मिश्रा जी के विश्वस्तों को उनसे दूर कराते जा रहे थे। कटारा साहब ने मिश्रा जी का मस्तिष्क जाम कर दिया था और उनका विवेक समाप्त कर दिया था उनके बड़े पुत्र को पढ़ाई से विरक्त कर दिया था। उनकी निगाह मिश्रा जी का कारोबार हड़पने पर लगी थी जिसके लिए उनको उनसे सहयोग करने वालों से दूर करना ज़रूरी था। मिश्रा जी के माध्यम से कटारा साहब प्रदेश कंट्रोल कमीशन में शामिल हो गए थे। उनकी फितरत के कारण मुझे भी 1994 में भाकपा से अलग होना पड़ा था। 

कई आंदोलनों में मिश्रा जी कलेक्टरेट पर मिलते थे और घरेलू हाल-चाल पूछते रहते थे। एक बार दयालबाग में इत्तिफ़ाकीया वह मिल गए तो बोले आजकल दिखाई नहीं पड़ते क्या बात है? मैंने जब कहा कि अब मैं किसी भी राजनीतिक दल में नहीं हूँ और निष्क्रिय हूँ। तब कामरेड मिश्रा जी ने कहा कि यह नहीं हो सकता कि एक राजनीतिक व्यक्ति निष्क्रिय बैठा रहे आप को वापिस अपनी मूल पार्टी में लौटना होगा मैं आपके घर आऊँगा। और वाकई मिश्रा जी मुझे मेरे घर से अपने साथ लेकर पार्टी कार्यक्रमों में शामिल करने लगे जबकि औपचारिक रूप से मैं पुनः सदस्य भी नहीं बना था।2006 में  आगरा कमिश्नरी पर संसद-सदस्य  राज बब्बर के साथ डॉ गिरीश (जो अब प्रदेश सचिव हैं) एक प्रदर्शन में शामिल हुये थे। मिश्र जी मुझे लेकर गए थे और पार्टी के नए कार्यालय पर चलने को कहा था जहां डॉ गिरीश जी एक ट्रेक्टर ट्राली पर बैठ कर गए थे मैं भी उसी में था। पार्टी कार्यालय पर डॉ गिरीश जी की उपस्थिती में कामरेड मिश्रा जी ने मुझे पुनः सदस्यता प्रदान करने की औपचारिकता पूर्ण की थी। 2008 के सम्मेलन में मिश्रा जी ने मुझे भी सह-सचिव के रूप में अपने साथ नियुक्त किया था। किन्तु कुछ घरेलू कारणों से मुझे 2009 में  आगरा छोड़ कर लखनऊ सेटिल होना पड़ा और अब लखनऊ की पार्टी ज़िला काउंसिल में सक्रिय हूँ।

आज चार वर्ष बाद अचानक कामरेड रमेश मिश्रा जी की याद आने का प्रबल कारण यह है कि जिस रमेश कटारा को मिश्रा जी ने प्रदेश कंट्रोल कमीशन में शामिल कराया था और जिसके कारण मुझसे उनकी दूरी बनी थी उसको खुद मिश्रा जी ने ही पार्टी से निष्कासित करा दिया था और उसी के बाद मुझसे संपर्क किया था। आज उस रमेश कटारा का नया अवतार प्रदीप तिवारी के रूप में मुझे नज़र आ रहा है जिसने 12 जूलाई को डॉ गिरीश जी की जीप के साथ एक हादसा करने में सफलता प्राप्त की थी।13 जूलाई को उसी शख्स ने मीटिंग के दौरान मेरे कुर्सी पर,पैरों पर अपने पैरों से  और मेरे पेट  पर अपनी उंगली से प्रहार किए थे। उसी की कारगुजारी के कारण मुझे 18 वर्ष बाद बाहर के डाक्टर का आसरा लेकर पुत्र का इलाज करना पड़ा। तब से अब तक परिवार के सभी सदस्यों के इलाज पर लगभग रु 2000/-फिजूल खर्च हो चुके है। इस नए रमेश कटारा ने अपने मित्र एक दूसरे दल के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष के माध्यम से मुझे पार्टी से अलग करवाने का विफल प्रयास किया था और अब सत्तारूढ़ पार्टी के कुछ लोगों को मेरी छवी खराब करने के अभियान में लगाया है। काश आज कामरेड रमेश मिश्रा जी प्रदेश में पदाधिकारी बने होते तो इस नए रमेश कटारा  को उसका सही रास्ता दिखा देते। 




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शनिवार, 9 मार्च 2013

हमे पहले ही आभास हो गया था---विजय राजबली माथुर

28 फरवरी और 01 मार्च, 2013 के हिंदुस्तान,लखनऊ के अंक मे उपरोक्त समाचार व चित्र देख कर सहसा याद हो आया कि,मैंने 2005 ई मे सपा छोड़ कर बहुत ही अच्छा निर्णय ले लिया था। फिर बाद मे आगरा संसदीय क्षेत्र से सांसद राज बब्बर जी ने भी सपा को अलविदा कर दिया था और उनके बाद मुलायम सिंह जी के सहयोगी-सलाहकार हमारे दरियाबाद के मूल निवासी बेनी प्रसाद वर्मा जी ने भी सपा छोड़ कर 'समाजवादी क्रांति दल'का गठन कर लिया था। परंतु मैं न तो उनके दल मे गया न ही बब्बर जी के 'जन - मोर्चा' जिसके संरक्षक वी पी सिंह जी थे मे ही शामिल हुआ;मैं राजनीतिक रूप से निष्क्रिय हो गया था। अतः भाकपा के तत्कालीन ज़िला मंत्री द्वारा बार-बार मेरे घर पर आकर पुनः भाकपा मे लौटने का आग्रह किया जाने लगा -मैं उनके साथ भी पहले ज़िला कोषाध्यक्ष रह चुका  था। अंततः वह मुझे सदस्य न होते हुये भी पार्टी कार्यक्रमों मे बुलाने लगे और मुझे उनको सम्मान देने हेतु शामिल होना पड़ा। 

 2006 मे आगरा कमिश्नरी पर एक प्रदर्शन  मे जिसमे राज बब्बर जी के साथ रथ पर उत्तर प्रदेश के वर्तमान भाकपा सचिव डॉ गिरीश जी भी  भाग लेने आए थे भी मैंने भाग लिया था।  मदिया कटरा स्थित  पार्टी कार्यालय जाते समय डॉ गिरीश जी के साथ ही मैं भी ट्रैक्टर ट्राली मे बैठ कर आया था और उनकी मौजूदगी मे ही कामरेड जिलामंत्री जी ने मुझसे पुनः पार्टी प्रवेश का आवेदन तभी  ले लिया था। तबसे अब  फिर भाकपा मे सक्रिय हूँ और और अब लखनऊ मे रहते हुये  डॉ गिरीश जी द्वारा भेजी सूचनाओं को फेसबुक के माध्यम से भी प्रचारित करता रहता हूँ। 

लेकिन आज यहाँ मैं सपा मे बिताए लगभग 10 वर्षों की कुछ खास-खास बातों का ही  ज़िक्र करना चाहता हूँ। 

अप्रैल 1994 मे आगरा से लखनऊ आकर कामरेड रामचन्द्र बक्श सिंह और कामरेड मित्र सेन यादव के साथ मैं सपा मे शामिल तो हो गया था किन्तु तत्काल सक्रिय न हो सका क्योंकि पहले से बीमार चल रही शालिनी का जून'94 मे और जून'95 मे बाबूजी व बउआ का भी निधन हो गया था। इस प्रकार मेरी निष्क्रियता का लाभ उठा कर होटल मुगल के प्रबन्धकों ने श्रम न्यायालय के पीठासीन अधिकारी को खरीद कर मेरे विरुद्ध एक्स पार्टी केस जीत लिया था। 
फिर भी आगरा पूर्वी विधानसभा क्षेत्र,सपा के अध्यक्ष पूर्व कामरेड शिव नारायण कुशवाहा जी से व्यक्तिगत परिचय के कारण कुछ ज़रूरी बैठकों मे शामिल हो लेता था,यशवन्त को साथ ले जाता था-घर मे तब अकेला नहीं छोड़ा जा सकता था। बाद मे पूनम(जिनके पिताजी से मेरे पिताजी का पत्राचार हो चुका था)के आने के बाद पुनः सक्रिय होना शुरू किया। पूर्वी विधासभा क्षेत्र के नए अध्यक्ष अशोक सिंह चंदेल साहब ने मुझे अपने साथ महामंत्री के रूप मे  कार्यकारिणी मे शामिल कर लिया। उनके साथ 1999 के संसदीय  चुनावों  मे राज बब्बर जी के लिए प्रचार मे भाग लिया । मैं जब सक्रिय नहीं था तब भी पत्राचार करता रहता था। मैंने ही राम गोपाल यादव जी से अनुरोध किया था कि,आगरा से राज बब्बर जी को खड़ा करें। आगरा को विशेष महत्व दें और अखिलेश यादव जी को युवाओं के बीच लाएँ। और इस प्रकार सपा का आगरा से लोकसभा मे प्रतिनिधित्व हो सका। लेकिन आगरा क्षेत्र के प्रभारी राम आसरे विश्वकर्मा जी ने इन सब का श्रेय खुद ले लिया। 

चुनावों के बाद नए नगर - सपाध्यक्ष डॉ डी सी गोयल साहब ने मुझे नगर कार्यकारिणी मे शामिल कर लिया था। डॉ गोयल सभी कार्यकर्ताओं के साथ समान व्यवहार करते थे । अक्सर वह कार्यकर्ताओं को शुभकामनायें प्रेषित करते रहे जिसका एक नमूना यह कार्ड है-


चूंकि पूनम समाजवादी महिला सभा मे वार्ड अध्यक्ष थीं और मैं नगर कार्यकारिणी मे था अतः डॉ साहब ने यह शुभकामना कार्ड संयुक्त रूप से भेजा था। 
2002 के चुनावों मे उनको ही सपा ने पूर्वी विधानसभा क्षेत्र से खड़ा किया था। उनके लिए मैंने व पूनम ने सक्रिय रूप से भाग लिया ,हालांकि उसी बीच मुझको पाल्स का  एक आपरेशन भी कराना पड़ा था।  ठीक चुनावों के बीच विश्वकर्मा जी ने प्रत्याशी डॉ गोयल को सपाध्यक्ष पद से हटवा दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि वह चुनाव हार गए।जनता मे यह संदेश गया कि पार्टी को ही प्रत्याशी पर विश्वास नहीं है।  पत्र लिख कर  मैंने इस निर्णय को गलत बताया था जिस पर विश्व कर्मा जी  मुझ पर क्रुद्ध भी हो गए थे कि मैं उनके प्रभारी रहते हुये सीधे अध्यक्ष को पत्र क्यों भेजता हूँ। तभी मैंने सपा छोडने का निर्णय मन मे कर लिया था किन्तु चंदेल साहब एवं डॉ साहब की आत्मीयता के कारण उनको दो वर्ष बाद तक  सहयोग करता रहा था। जब अखिलेश यादव जी को युवा मामलों का राष्ट्रीय प्रभारी बना दिया गया और वह सांसद भी हो गए तब उनके आगरा आगमन पर उनको भी वे बातें दोहराई थीं जिनके लिए विश्व कर्मा जी क्रुद्ध हुये थे। अखिलेश जी के कहने पर विस्तृत वर्णन उनको डाक से भेजा था जिसकी प्राप्ति की सूचना  उन्होने अपने सहायक गजेन्द्र सिंह जी द्वारा पत्र भिजवाकर भी दी थी। उस पत्र की स्कैन कापी सार्वजनिक की जा रही है-
 

2007 के विधानसभा चुनावों मे डॉ डी सी गोयल साहब ने राज बब्बर जी के 'जन-मोर्चा'प्रत्याशी के रूप मे सपा/भाजपा के विरुद्ध मुक़ाबला किया था। स्थानीय तौर पर भाकपा ने डॉ गोयल का समर्थन किया था अतः एक बार फिर भाकपा की तरफ से हमने डॉ गोयल साहब के लिए चुनाव प्रचार मे भाग लिया। 
आगरा मे विशेष सपा - अधिवेशन के बाद घटनाक्रम 'ताज कारीडोर' के नाम पर बदला तो प्रधानमंत्री ए बी बाजपेयी जी के सहयोग से मुलायम सिंह जी मुख्यमंत्री बन गए तब वह निवर्तमान राज्यपाल विष्णूकांत शास्त्री जी को रेल से मुगलसराय तक विदा करने गए थे। उसी समय मुझे उनकी भाजपा से निकटता का आभास हो गया था।  

पहले निष्क्रिय रह कर फिर सदस्यता का नवीनीकरण न कराकर मैंने सपा से अलगाव कर लिया था। मेरा निर्णय गलत नहीं था क्योंकि राज बब्बर जी और बेनी प्रसाद वर्मा जी को भी बाद मे सपा को छोडना ही पड़ा। भाजपा के  अप्रत्यक्ष समर्थन  से बनी मुलायम सपा सरकार मे भाजपा व्यापारियों की पौ बारह रही। हालांकि जब जार्ज फरनाडीज़ साहब बाजपेयी जी के रक्षा मंत्री और संकटमोचक थे तब मुलायम सिंह जी उनकी तुलना संसद मे गियोलित्ती से करते थे जिनके समर्थन से हिटलर सत्ता मे आया था। लेकिन आज फरनाडीज़ साहब के उस दायित्व का निर्वहन खुद मुलायम सिंह जी बखूबी कर रहे हैं। सुषमा स्वराज जी भी कभी सोशलिस्ट पार्टी की तरफ से हरियाणा मे शिक्षा मंत्री रही थीं,आज भाजपा की तरफ से विपक्ष की नेता हैं। उनके साथ मुलायम सिंह जी की घनिष्ठता अकारण नहीं है बल्कि यह भविष्य का एक भयावह संकेत है। 

 

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शुक्रवार, 23 मार्च 2012

आगरा/1994 -95 / (भाग-2 )

मार्च के महीने मे दुकानों मे अकाउंट्स का काम ज्यादा होता था अतः मै काफी समय से इसी बहाने राजा-की-मंडी क्वार्टर पर नही गया हालांकि पार्टी आफिस बराबर जाता रहा था। होली पर भी नही गया था बावजूद शालिनी के कहने के।तब  संगीता ने चिट्ठी भेज कर अपनी सास की तरफ से शालिनी से मिलने आने को कहा था। लिहाजा एक रोज सुबह छोड़ गया था और शाम को लेने गया था और उस रोज पार्टी आफिस की छुट्टी करनी पड़ी। चाय के बाद संगीता और शालिनी अंदर के बारामदे मे बाते कर रही थी मुझे भी वहाँ बुलवा लिया। संगीता ने अक्तूबर की बात अब शालिनी को बताई होगी अतः शालिनी बोली कि भाभी जी आपसे होली खेलना चाहती थी आप आए नहीं। अब आज उन्हे पावडर लगा कर होली मना दे।संगीता ने पावडर का डिब्बा शालिनी को पकड़ा कर अपना सीना खोल लिया और शालिनी ने पावडर छिड़क कर मुझसे रगड़ देने को कहा। मेरे यह कहने पर कि जरूरत पर दवा लगाने और पावडर लगाने मे फर्क है - शालिनी ने खुद ही उनके पावडर छिड़क दिया। शालिनी ने बताया कि नौ जनवरी को संगीता जान-बूझ कर वैसा ब्लाउज पहन कर आई थी अगर आप ड्यूटी न चले गए होते तो ऊपर आनंद लेती।

हालांकि पार्टी आफिस जाकर जिला मंत्री कामरेड नेमीचन्द को मै पूर्ण सहायता करता था किन्तु रमेश मिश्रा जी उन्हे परेशान करने का कोई मौका नही चूकते थे। किशन बाबू श्रीवास्तव और एस कुमार के साथ हादसे हो चुके थे। कामरेड रामचन्द्र बख्श सिंह,MLC का एक पोस्ट कार्ड मिला जिसमे उन्होने 11 अप्रैल 1994 को रविन्द्रालय,लखनऊ मे 'उत्तर  प्रदेश भाकपा के समाजवादी पार्टी मे विलय सम्मेलन' मे शामिल होने को बुलाया था। मै नौ तारीख को चल कर 10 तारीख को लखनऊ आ गया और मीरा जीजी के घर पहुंचा क्योंकि माधुरी जीजी तब तक आफिस जा चुकी थी। दोनों के घर देने के लिए मिठाई लेने हलवाई की दुकान पर जैसे ही बढ़ा एकदम से मधु मक्खियों का एक झुंड आकर सिर पर चिपक गया जैसे -तैसे एक-एक मधु मक्खी को हटाया ,पूरा सिर और मुंह सूज गया था। माधुरी जीजी के एक बेटे को लेकर एक होम्योपैथी डॉ को दिखाया जिनहोने दवा दी और उससे लाभ हुआ। दिन मे सो गया जबकि सोने की आदत न थी। शाम को A-15,दारुल शफा मे कामरेड रामचन्द्र बख्श सिंह जी से मिलने गया वह बेहद खुश हुये कि आगरा से मै पहुंचा था। मेरे साथ महेंद्र जीजाजी भी गए थे उनको उनकी मदद चाहिए थी। रु 100/- के गबन के इल्जाम मे वह सस्पेंड हो चुके थे और बहाल होने के बाद भी अब उनका प्रमोशन प्रभावित हो रहा था। कामरेड रामचन्द्र जी ने न केवल आश्वासन दिया बल्कि अपनी ओर से उनकी पूरी पूरी मदद भी की जैसा कि खुद उन्होने स्वीकार किया था इस पत्र द्वारा-
(हालांकि तीन वर्ष बाद उन्होने रिश्ता भी तोड़ लिया था )

अगले दिन 11 अप्रैल को मै मय सामान के रविन्दरालय के लिए बस से जा रहा था परंतु महेंद्र जीजाजी बोले आफिस जाते मे तुम्हें रास्ते मे छोड़ देंगे और उन्होने रविन्दरालय के गेट पर मुझे छोड़ दिया। कामरेड मित्रसेन यादव जी ने मुझसे कहा जिस प्रकार भाकपा मे काम कर रहे थे उसी प्रकार अब सपा मे करना। मुख्यमंत्री मुलायम सिंह जी ने भाकपा से आए प्रत्येक पदाधिकारी को मंच पर बुला कर सम्मानित किया था जबकि पदाधिकारियों ने उन्हे । आगरा भाकपा के कोषाध्यक्ष की हैसियत से मंच पर मुख्यमंत्री मुलायम सिंह जी ने मुझ से भी हाथ मिलाया था।

'अमर उजाला',आगरा के प्रथम पृष्ठ पर छपी खबरों मे मेरा भी नाम था। तब शरद मोहन ने व्यंग्योक्ति भी की थी कि अभी तक मिश्रा जी का नाम प्रथम पृष्ठ पर नही छपा  था जबकि विजय बाबू का आ गया है। जलने-चिढ़ने वालो की कमी कभी नही होती है। जब नजीर बसंत मेला 1990 मे दूरदर्शन पर मिश्रा जी के साथ मेरा फोटो प्रदर्शित हो गया था तब भी ज़्यादातर लोग चिढ़ गए थे। पुराने कामरेड्स ने मिश्रा जी से आपत्ति भी की थी कि कामरेड माथुर को टी वी पर दिखा दिया उन्हे क्यों छोड़ दिया। वस्तुतः मिश्रा जी को खुद पता न था कि हम लोग टी वी पर प्रदर्शित हो जाएँगे चूंकि वह आगे अकेले बैठे थे उन्होने मुझे आगे बुला लिया था जबकि बाकी लोग पीछे ही बैठे रहे थे और टी वी पर न आ सके। 

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रविवार, 5 फ़रवरी 2012

सठिया गये



(विजय,पूनम एवं यशवन्त माथुर)


अक्सर लोगों को कहते सुना है कि वह या यह सठिया गया है। वैसे लोग किस संदर्भ मे कहते हैं वे ही जानें। परंतु मै समझता हूँ कि जब कोई जीवन के साठ वर्ष पूर्ण कर ले तो उसे सठियाया कहते होंगे। यदि ऐसा ही है तब अब मै भी सठिया गया। मेरा ब्लाग का प्रारम्भिक लेख था-'आठ और साठ  घर मे नहीं'। 02 जून 2010 को ब्लाग मे प्रकाशन से पूर्व यह लेख लखनऊ के एक स्थानीय अखबार मे प्रकाशित हो चुका था। इसके मुताबिक मुझे अब घर छोड़ कर 'वानप्रस्थ'ग्रहण कर लेना चाहिए। परंतु समाज मे व्यावहारिक रूप से आज ऐसी व्यवस्था नहीं है। अतः आज 61वे वर्ष मे प्रवेश के बावजूद घर मे ही मेरी उपस्थिती बरकरार रह गई है। हालांकि मै चाहता हूँ कि घर मे न उलझा रह कर 'राजनीति' एवं लेखन  के माध्यम से समाज सेवा/जन सेवा मे अधिकाधिक अपना समय लगाऊ । यों तो राजनीति मे मै किसी न किसी रूप मे युवावस्था से ही हूँ। 22 वर्ष की अवस्था मे मै 'सारू मजदूर संघ',मेरठ की कार्यकारिणी मे था और कुछ समय कार्यवाहक कोषाध्यक्ष  भी रहा था। न चाहते हुये भी 26 वर्ष की अवस्था मे 'होटल मुगल कर्मचारी संघ',आगरा का महामंत्री (SECRETARY GENERAL)बनना पड़ा था। 25 वर्ष की अवस्था मे 'जनता पार्टी'(चंद्रशेखर की अध्यक्षता वाली) का साधारण सदस्य और 28-29 वर्ष की अवस्था मे ए बी बाजपाई की अध्यक्षता वाली 'भाजपा' का सक्रिय सदस्य था। 34 वर्ष की आयु से 'भाकपा' मे आया (42 वर्ष आयु से 54 वर्ष आयु तक मुलायम सिंह की अद्यक्षता वाली 'समाजवादी पार्टी' मे -पूर्वी विधान सभा क्षेत्र ,आगरा का महामंत्री फिर बाद मे डॉ डी.सी .गोयल के महानगर अध्यक्ष बनने पर उनकी नगर कार्यकारिणी मे भी रहा और राज बब्बर से भी पहले 'सपा'छोड़ कर खाली बैठा था कि आगरा-भाकपा के मंत्री के आग्रह पर वापिस 'भकपा'मे लौट आया)और आज 'सठियाते समय' लखनऊ -भाकपा की जिला काउंसिल मे हूँ।


जहां अधिकांश लोगों को कहते सुना जाता है कि राजनीति भले लोगों के लिए नहीं है वहीं इसके ठीक विपरीत मेरा सुदृढ़ अभिमत है कि 'राजनीति' है ही भले लोगों के लिए और राजनीति को 'गंदा' करने के लिए जिम्मेदार हैं तथाकथित 'भद्र जन'जो छुद्र स्वार्थों के कारण राजनीति से दूर रहते है और इसे गंदे लोगों के लिए खाली छोड़ देते हैं। MAN IS A POLITICAL BEING -यह कथन है सुकरात (प्लूटो)का जो अरस्तू (एरिस्टाटल )का गुरु था। अर्थात Man is a social animal -मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है-कहने वाले के गुरु का कहना है कि ' मनुष्य जन्म से ही एक राजनीतिक प्राणी है'। समाँज मे तो मनुष्य जन्म के बाद ही आता है तब जब वह सक्रिय होता है किन्तु राजनीति मे तो वह जन्मते ही शामिल हो जाता है। फिर कैसे 'राजनीति' गंदे लोगों के लिए है?दरअसल ऐसा कहने वाले लोग ही गंदे होते हैं जो समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन नही करना चाहते-उनका मूल मंत्र होता है-मेरा पेट हाऊ मै न जानूँ काऊ ।

आज सठियाते समय मै तो सामान्य से अधिक सक्रिय हूँ अपने शौक(Hobby)-राजनीति मे और लेखन मे भी  क्योंकि अभी हमारे उत्तर प्रदेश मे विधान सभा चुनाव चल रहे हैं। आज से दो सप्ताह बाद हमारे नगर लखनऊ मे मतदान होना है। इस बार हमारी भाकपा ने पूरे प्रदेश मे अपने 55 और सम्पूर्ण बामपंथ ने 115 प्रत्याशी चुनाव मे उतारे हैं एक मजबूत विपक्ष विधानसभा मे बनाने हेतु जो दबे-कुचले,शोषित-उपेक्षित ,किसानों-मजदूरों की समस्याओं पर सदन के भीतर ही सशक्त आवाज बुलंद करेगा। एक मजबूत विपक्ष के आभाव मे सरकारें निरंकुश और भ्रष्ट होती रही हैं। भ्रष्टाचार मुक्त पार्टी-भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी इस बार के चुनावों के माध्यम से सरकार को अंकुश मे रखने का प्रयास कर रही है। सभी भद्र जनों को हमारे इस प्रयास मे सहयोग करना चाहिए। 'एकला चलो रे' सिद्धान्त के अनुसार मै तो इस अभियान मे संलिप्त हूँ ही और इस सठियाने के बाद और अधिक सक्रिय रहने का प्रयास करूंगा।

11 माह की नौकरी करने के बाद स्तीफ़ा मांगे जाने का विरोध करके डटे रहने के कारण 'सारू मजदूर संघ ',मेरठ के कोषाध्यक्ष ने मुझ से कहा था जब अपने लिए संघर्ष कर सकते हो तो सब के भले के लिए यूनियन मे शामिल हो जाओ और पिछ्ले समय से सदस्यता देकर मुझे कार्यकारिणी मे शामिल कर लिया गया था। आगरा मे भी मुझ पर दबाव था कि मै आगे आ कर यूनियन के गठन मे सहयोग दूँ परंतु पहले मै दूर ही रहा। किन्तु 'होटल मुगल कर्मचारी संघ',आगरा का रेजिस्ट्रेशन होने से पूर्व ही महामंत्री का चयन बैंक आफ बरोदा मे DRO के रूप मे हो गया। मँझधार मे छूटी यूनियन का मुझे सीधे महामंत्री घोषित कर दिया गया और फिर बाद मे मुझे पिछले समय से सदस्यता ग्रहण करनी पड़ी थी। जनता पार्टी सरकार बनने के बाद मुगल होटल मे सहयोगी केरल वासी विजय नायर साहब ने एक रुपया लेकर जबर्दस्ती 'जनता पार्टी' की सदस्यता दे दी थी। क्योंकि 'होटल मुगल कर्मचारी संघ',आगरा के रेजिस्ट्रेशन के वक्त बी एम एस नेताओं ने मदद की थी अतः उनके प्रस्ताव को नजरंदाज न कर पाने के कारण 'भाजपा' का सक्रिय सदस्य बनना मजबूरी का सबब था। 25 लोगों से एक-एक रुपया लेकर रसीद बुक जमा कर देने के कारण 'सक्रिय सदस्यता' प्रदान कर दी गई थी। जब किसी से एक पान भी  खाये बगैर ही सबका कार्य सम्पन्न कराया हो तब सीट पर बैठे-बैठे एक-एक रु.की रसीद तो सम्पूर्ण 450 लोगों की काटी जा सकती थी 25 की क्या  कोई बात थी?एक-आध बार बैठकों मे भाग लिया तो समझ आया कि यह-भाजपा  तो व्यापारियों और पोंगापंथियों की पोषक पार्टी है  ,आम जनता के हितों से इसका कोई सरोकार नहीं है । अंदरूनी बैठकों मे इसके नेता और कार्यकर्ता कुत्ते-बिल्ली की तरह लड़ते हैं। अतः गुप-चुप तरीके से अलग हो गया।

होटल मुगल से बर्खास्तगी के विरुद्ध कानूनी लड़ाई लड़ने के वक्त बने संपर्कों के आधार पर 1986 मे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मे शामिल कर लिया गया और बाद मे कोषाध्यक्ष भी रहा। 1994 से 2004 तक समाजवादी पार्टी ,आगरा मे रहा, दो वर्ष निष्क्रिय रहने के बाद वापिस सी पी आई  मे आ गया और 2006 से पुनः भाकपा मे सक्रिय हूँ। 45 वर्ष से 52 वर्ष की आयु तक 'बल्केश्वर-कमला नगर आर्यसमाज',आगरा मे भी सक्रिय रहा और इसकी कार्यकारिणी मे भी शामिल किया गया जिससे एक माह मे ही हट गया था। स्वामी दयानन्द सरस्वती से शुरू से ही प्रभावित था 11 वर्ष की उम्र मे उनका 'सत्यार्थ प्रकाश' काफी अच्छा लगा था। 17 से 19 वर्ष की आयु के मध्य मेरठ कालेज ,मेरठ के पुस्तकालय मे उनके प्रवचनों का संग्रह-'धर्म और विज्ञान' भी पढ़ा-समझा था और आज भी उनके विचार सर्वोत्कृष्ट लगते हैं। किन्तु महर्षि द्वारा स्थापित संगठन 'आर्यसमाज' अधिकांशतः उनके विचारों के विरोधी संगठन आर एस एस से प्रभावित लोगों के चंगुल मे फंस गया है अतः गुप-चुप तरीके से संगठन से प्रथक्क हो गया। 49  वर्ष से 53 वर्ष की आयु तक 'कायस्थ सभा',आगरा मे भी सक्रिय रहा और इसकी कार्यकारिणी मे तथा कई सचिवों मे से एक सचिव भी रहा। इसका तथा 'अखिल भारतीय कायस्थ महासभा',आगरा का आजीवन सदस्य होते हुये भी इन संगठनों से निष्क्रिय इसलिए हो गया क्योंकि ये संगठन इनको चलाने वाले नेताओं के व्यापारिक हितों का संरक्षण करते हैं न कि आम लोगों का कल्याण। 

कुछ क्या अधिकांश लोगों को यह हास्यास्पद प्रतीत होता है कि मै कम्युनिस्ट पार्टी मे होते हुये भी 'वैदिक'मत का समर्थक कैसे हूँ?कारण यह है कि लोग भी समझते हैं और कम्युनिस्ट खुद भी अपने को धर्म विरोधी कहते हैं। वस्तुतः 'धर्म' को न समझने के कारण ही ऐसा भ्रम बना हुआ है। साधारणतः लोग ढोंग और पाखंड को धर्म कहते हैं और कम्यूनिज़्म इसी का विरोध करता है और स्वामी दयानन्द ने भी इसी का विरोध किया है। यही कारण है कि ठोस आर्यसमाजी को भी कम्युनिस्टों की भांति ही संशय की दृष्टि से देखा जाता है। जबकि वास्तव मे 'मानव जीवन को सुंदर,सुखद और समृद्ध' बनाने हेतु दोनों के विचार समान हैं । 'साम्यवाद' जिसे कम्यूनिज़्म कहा जाता है मूल रूप से भारतीय अवधारणा ही है जिसे मैक्स मूलर साहब अपने साथ यहाँ की मूल पांडु लिपियाँ लेकर जर्मनी पहुंचे और वहाँ उनके जर्मन अनुवाद से प्रभावित हो कर कार्ल मार्क्स ने जो निष्कर्ष निकाले वे ही कम्यूनिज़्म के नाम से जाने जाते हैं। सारा का सारा भ्रम साम्राज्यवाद के हितचिंतक संप्रदाय वादी आर एस एस का फैलाया हुआ है। इसी भ्रम को तोड़ना मेरा लक्ष्य है। अधिकाधिक लोगों का कल्याण हो और वे भटकें नहीं इसी विचार को लेकर मै 'हवन विज्ञान' संस्था बनवाना चाहता था और लोगों का हकीकत -सत्य से साक्षात्कार करवाना चाहता था। अपने निकटतम रिशतेदारों ( जो मेरे लखनऊ आने के प्रबल विरोधी रहे और अब संबंध तोड़ लिए )के फैलाये कुचक्र के कारण इस विचार को फिलहाल स्थगित रखा है परंतु उम्मीद है कि भविष्य मे सफल हो सकूँगा।

दूसरे शौक लेखन मे 19 वर्ष की आयु मे 'मेरठ कालेज पत्रिका',मे एक लेख 'रावण वध एक पूर्व निर्धारित योजना' के प्रकाशन के साथ ही शामिल हूँ।21 वर्ष की अवस्था मे आगरा जहां अजय इंजीनियरिंग पढ़ रहे थे घूमने गया था और उनके परिचय से फारवर्ड ब्लाक के एक नेता के अखबार 'युग का चमत्कार' मे पहला लेख-'अंधेरे उजाले' जो महर्षि स्वामी दयानन्द 'सरस्वती'पर था प्रकाशित  हुआ था। आगरा के ही एक अखबार 'पैडलर टाइम्स' मे पहली कविता'यह महाभारत क्यों होता?' प्रकाशित हुई थी।  सारू स्मेल्टिंग,मेरठ मे अकौण्ट्स विभाग मे होने के कारण पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों से भी वास्ता पड़ता रहता था। 'पी  सी टाइम्स' के संपादक प्रकाश चंद जी मेरे सभी लेख छापने लगे उस वक्त उम्र 22  वर्ष थी। लेखों के आधार पर पत्र के प्रबन्धक मिश्रा जी ने एक बार मुझसे पूछा था कि आपने एम ए 'राजनीति शास्त्र' मे किया है अथवा 'हिन्दी साहित्य' मे? विनम्रता पूर्वक उन्हे समझाना पड़ा कि ,साहब मैंने तो एम ए ही नहीं किया है मात्र बी ए किया है। उन्होने प्रसन्नतापूर्वक कहा था जब भी इधर आना मुझसे मिले बगैर न जाना। उनके निर्देश का मैंने सहर्ष पालन सदैव किया।

आगरा मे 29 वर्ष की अवस्था से 'सप्त दिवा'साप्ताहिक मे नियमित लेख प्रकाशित होते रहे बाद मे सहायक संपादक तथा उसके बाद उप संपादक के रूप मे भी इससे संबद्ध रहा। 'ब्रह्मपुत्र समाचार' ,आगरा मे 50 वर्ष की आयु से नियमित लेख आदि छपते रहे। 'माथुर सभा','कायस्थ सभा' की मेगजीन्स मे तो लेख छ्पे ही वैश्य समुदाय की 'अग्रमंत्र' त्रैमासिक पत्रिका मे भी उप-संपादक के तौर पर संबद्ध रहकर नियमित लिखता रहा। 58 वर्ष की उम्र मे लखनऊ के एक स्थानीय अखबार मे भी लेख छपे किन्तु जून 2010 से 'क्रांतिस्वर' ब्लाग बन जाने के बाद केवल ब्लाग्स और फेसबुक मे ही लिख रहा हूँ और आगे भी यह शौक बदस्तूर जारी ही रहने की संभावना है।








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शनिवार, 24 दिसंबर 2011

आगरा /1992 -93 ( विशेष राजनीतिक भाग- 5 )

गतांक से आगे---
लगातार नौ वर्षों तक आगरा भाकपा के जिला मंत्री रह चुकने के बाद मिश्रा जी ने अपने हटाये जाने को अपनी करारी हार माना और बदले की कारवाइयों पर अमल करने लगे। उन्हें लगा कि यह उनके विरोधियों की उनके विरुद्ध साजिश है। उन्हें अपना अतीत याद आ रहा था जैसा पुराने कामरेड्स ने बताया था और कभी-कभी मौज मे होने पर वह खुद भी बताते रहते थे। आगरा भाकपा के संस्थापक मंत्री कामरेड महादेव नारायण टंडन के विरुद्ध डॉ जवाहर सिंह धाकरे से मिल कर मिश्रा जी ने खूब गुट-बाजी की थी और उन्हें हटने पर मजबूर किया था । टंडन जी ने भी अपने समर्थक डॉ महेश चंद्र शर्मा के पक्ष मे ही पद छोड़ा था। शर्मा जी को बीच कार्यकाल मे पद छोडने पर डॉ धाकरे और मिश्रा जी ने मजबूर कर दिया था। डॉ धाकरे जिला मंत्री और मिश्रा जी सहायक जिला मंत्री बने थे। डॉ धाकरे के 06 माह हेतु सोवियत रूस पार्टी स्कूल मे जाने की वजह से मिश्रा जी कार्यवाहक जिला मंत्री बने तो जमे ही रहे वापस चार्ज डॉ धाकरे को नहीं दिया तब से ही दोनों मे मन-मुटाव चला आ रहा था। मिश्रा जी को लगा कि यह डॉ धाकरे का खेल है। परंतु डॉ धाकरे तो पिछड़ा वर्ग के ओमप्रकाश जी को भले ही कुबूल कर रहे थे अनुसूचित वर्ग के कारेड नेमी चंद उनकी पसंद के नहीं थे। डॉ धाकरे के भांजा दामाद कामरेड भानु प्रताप सिंह ने मुझ से साफ कहा था कि,माथुर साहब कहने -सुनने मे तो बातें अच्छी लगती हैं -नेमीचन्द से तो मिश्रा जी ही भले थे। हालांकि नेमीचन्द बनेंगे मुझे खुद सम्मेलन के दूसरे दिन ही पता चला था हमारी त्तरफ से तो ओमप्रकाश जी उम्मीदवार थे। परंतु चुने जाने के बाद जैसा दूसरे लोग चाहते थे मै नेमीचन्द जी को हटाये जाने के सख्त खिलाफ था। हालांकि नेमीचन्द जी लिखत-पढ़त कुछ भी नहीं करते थे और यह भार मुझ पर अतिरिक्त था लेकिन मै चट्टान की तरह उनके समर्थन मे डटा रहा। नेमीचन्द जी भी जानते थे कि उनका पद पर कायम रहना केवल मेरे कारण ही संभव हो रहा है। लोगों ने उनके दिमाग मे खलल डालने के लिए उन्हें नेमीचन्द माथुर कहना शुरू कर दिया। परंतु वह विचलित नहीं हुये।



मिश्रा जी के समक्ष स्पष्ट था कि जब तक मै नेमीचन्द जी के साथ हूँ तब तक उनकी दाल नहीं गल पाएगी। मुझे झुका-दबा या खरीद लेने की फितरत उनके पास नहीं थी। इसलिए उन्होने षड्यंत्र का सहारा लिया। एक बार अचानक कार्यकारिणी बैठक मे मिश्रा जी ने मुझे पार्टी से निकालने का प्रस्ताव रख दिया। शायद वह पहले से लामबंदी कर चुके थे। नेमीचन्द जी भी कुछ न बोले। उस समय बाहर बारिश हो रही थी मैंने अपना छाता उठाया और बैठक से उठ कर घर चल दिया। कामरेड जितेंद्र रघुवंशी ने कहा कि बारिश बंद होने के बाद चले जाना तेज बारिश मे छाता भी बेकार है। मैंने कहा जब आप लोगों ने पार्टी से अकारण मुझे निकाल ही दिया तो चिंता क्यों?यह अवैधानिक फैसला है और मै इसे चुनौती दूंगा।




मैंने जिला मंत्री कामरेड नेमीचन्द से  बाद मे मिल कर कहा कि उनके समर्थन न देने के बावजूद मै कार्यकारिणी के इस अवैध्य फैसले को संवैधानिक चुनौती दे रहा हूँ और इस आशय का लिखित पत्र उनको सौंप दिया। उन्होने मुझे आश्वासन दिया कि वह जिला काउंसिल मे इस विषय पर मेरे साथ रहेंगे। कार्यकारिणी चूंकि मिश्रा जी द्वारा तोड़ ली गई थी वह चुप रहे थे। राज्य-केंद्र पर भी मैंने इस फैसले को चुनौती की सूचना भेज दी थी। मलपुरा शाखा के कामरेड्स जिंनका बहुमत था मेरे साथ थे ,उन्होने तो यहाँ तक कह दिया था कि यदि मिश्रा जी पीछे नहीं हटे तो वे सब भी पार्टी छोड़ देंगे। जिस दिन जिला काउंसिल की बैठक हुई मिश्रा जी ने कामरेड राजवीर सिंह चौहान को बैठक का सभापति घोषित करा दिया जिन्हें वह पहले ही सेट कर चुके थे। उन्होने सभापति बनते ही मुझे बैठक से बाहर कर दिया। अंदर धुआंधार बहस होती रही और मै इतमीनान से छत पर मौजूद रहा। डॉ जवाहर सिंह धाकरे ने आते ही मुझसे सवाल किया कि बैठक से बाहर क्यों हो ?मैंने कहा सभापति चौहान साहब का यही निर्णय है।

डॉ धाकरे से मेरे द्वारा पहले ही पार्टी संविधान पर चर्चा हो चुकी थी। उन्होने बैठक मे पहुँचते ही सभापति जी से संविधान की धाराओं पर चर्चा की और उन्हें बताया कि उनका फैसला एक और असंवैधानिक कारवाई है। कार्यकारिणी समिति का गठन जिला काउंसिल ने किया था और जिला काउंसिल का गठन सम्मेलन ने अतः कार्यकारिणी समिति जिला काउंसिल के सदस्य को हटा ही नहीं सकती थी। सभापति अगर अपना फैसला नहीं बदलेंगे तो उनके विरुद्ध भी संविधान-विरोधी कारवाई करने का प्रस्ताव पारित किया जाएगा। चौहान साहब की ठाकुर ब्रादरी के धाकरे साहब ने जब उन्हें चुनौती दी तो उन्होने अपना फैसला पलटते हुये दो-तीन वरिष्ठ कामरेड्स भेज कर मुझे बैठक के भीतर बुलवाया। उन्होने यह भी सूचित किया कि जिला काउंसिल ने कार्यकारिणी का फैसला रद्द कर दिया है अतः मै न केवल पार्टी मे बल्कि अपने सभी पदों पर पूर्ववत कार्य करता रहूँ। संवैधानिक जीत तो हासिल हो गई ,किन्तु एक बारगी इज्जत पर  तो नाहक  हमला हुआ ही इसलिए मन ही मन मौका मिलते ही पार्टी से खुद ही अलग हो जाने का निश्चय कर लिया और किसी से इस संबंध मे कुछ न कहा तथा कार्य पहले की भांति ही करता रहा।

एक बार जिला कचहरी पर कोई धरना  प्रदर्शन था मै वहाँ भी (उस घटना के बाद मैंने मिश्रा जी से बोलना बंद कर दिया था) मिश्रा जी से न बोला। मिश्रा जी मेरे पास आए और बोले माथुर साहब यह सब तो चलता ही रहता है,हम लोग एक ही पार्टी मे हैं ,उद्देश्य एक ही हैं ,काम एक साथ कर रहे हैं तो बोल-चाल बंद करने का क्या लाभ। मजबूरन उनका अभिवादन करना ही पड़ा वह वरिष्ठ थे और खुद मेरे पास चल कर आए थे । हम लोग उनके हित मे थे वह हमें गलत समझ रहे थे। कटारा ने तांत्रिक प्रक्रिया से उनके सोचने की शक्ति कुंन्द कर दी थी।

मिश्रा जी ने शायद यह भी मान लिया था कि वह मुझे हरा न पाएंगे। इसलिए उन्होने और गंभीर चाल चली जो अपने समय पर ही लिखित स्थान प्राप्त करेगी।


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शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

आगरा /1992 -93 (राजनीतिक विशेष -भाग- 2 )

गतांक से आगे....
पूर्व-पश्चिम के कार्यकर्ताओं मे वैभिन्य था और कामरेड रामचन्द्र बख्श सिंह को पश्चिम के कामरेड्स का समर्थन न मिल सका अतः उन्होने कामरेड मित्रसेन यादव का समर्थन किया जिनहे सर्व-सम्मति से राज्य-सचिव चुन लिया गया। आगरा से जो 5 कामरेड्स राज्य-काउंसिल हेतु चुने गए उनमे मिश्रा जी अपने परम-प्रिय कटारा को स्थान न दिला सके। केंद्रीय कंट्रोल कमीशन के चेयरमेन कामरेड काली शंकर शुक्ला जी से व्यक्तिगत सम्बन्धों के आधार पर मिश्रा जी ने कटारा को उत्तर-प्रदेश कंट्रोल कमीशन का सदस्य नामित करवा लिया। कोई कुछ बोल तो न सका परंतु मिश्रा जी ने ऐसा करके अपने सभी हितैषियों को अपने विरुद्ध कर लिया।

राज्य-सम्मेलन समाप्ती के बाद आगरा के जिला सम्मेलन की तैयारी होना था। मिश्रा जी ने मुझ से कहा कि,अपने ज्योतिष से गणना करके जून के महीने मे दो तारीखें बताओ जिससे सम्मेलन शांतिपूर्ण हो जाये ,राज्य सम्मेलन मे तो काफी तनाव रहा। मैंने पत्रा देख कर उन्हे मध्य जून की दो तारीखें बता दी उन्हीं मे उन्होने जिला सम्मेलन करने की घोषणा की। राज्य-सम्मेलन के आय-व्यय का विवरण तैयार होने पर मिश्रा जी भड़क गए क्योंकि लगभग रु 6000/-अधिक (EXCESS ) निकल रहे थे। अकाउंट्स का थोड़ा भी जानकार समझ सकता है कि धन का बच जाना (एक्सेस) क्राईम है जबकि कम पड़ना (शारटेज) होना आम बात है।

मिश्रा जी का भारी दबाव था कि मै अपने अकाउंट्स ज्ञान का प्रयोग करके इस विवरण को इस प्रकार एडजस्ट कर दूँ कि EXCESS न रहे। ईमानदारी और पार्टी के प्रति वफादारी का तकाजा था कि विवरण को जैसे का तैसा रखा जाये और वही मैंने किया भी,चर्चा करने पर मिश्रा जी के सहयोगी और विरोधी सभी मुझसे सहमत थे। इस विवरण को मुद्दा बना कर मिश्रा जी ने मुझे परेशान करने की तिक्ड़मे की तो मैंने उनकी हिदायत की अवहेलना करते हुये राज्य-सम्मेलन के विवरण पर बची रकम को बैंक मे जमा करा दिया उसी अकाउंट मे जिसमे जिले का धन रहता था। अब तो मिश्रा जी एक प्रकार से मेरे शत्रु ही हो गए। कामरेड सरदार रणजीत सिंह काफी पुराने थे और सबके सब हाल जानते थे और उनकी उपेक्षा थी ,मुझसे बोले इस विषय पर पूरी तरह अड़े रहो इस बार मिश्रा एक ईमानदार आदमी से टकरा रहा है उसकी करारी हार हो जाएगी। वह मुझे सुबह 7 बजे मलपुरा ले चलने हेतु मेरे घर पर 6 बजे दयालबाग से आ गए। दोनों अपनी-अपनी साइकिलों से 16 km चले,उनके लिए 72-73 वर्ष की आयु मे इतनी दूर साइकिल से आना-जाना मुश्किल था किन्तु पार्टी-हित मे उन्होने यह कष्ट भी सहा। मलपुरा शाखा पार्टी की सबसे ज्यादा संख्या वाली शाखा थी और पार्टी मे उनका बहुमत भी था। उस शाखा के वरिष्ठ नेताओं से उन्होने संपर्क किया और वस्तु-स्थिति बताई ,सभी ने इस विषय मे मिश्रा जी का विरोध करने और जरूरत पड़ने पर उन्हें जिला सम्मेलन मे हटा देने की बात कही। उन लोगों का कहना था वे सब मिश्रा जी के समर्थक माने जाते हैं इसलिए उनके प्रस्तावों का कामरेड जवाहर सिंह धाकरे विरोध करते हैं अतः उनका भी समर्थन हम लोग प्राप्त कर लें। कामरेड किशन बाबू श्रीवास्तव बाह के थे और वहीं के कटारा साहब भी थे बल्कि वही उन्हें पार्टी मे लाये थे किन्तु उन्होने श्रीवास्तव साहब को उनकी शाखा के मंत्री पद से हटवा दिया था क्योंकि उनकी छवी धाकरे साहब के पिछलग्गू की थी। लिहाजा हम लोगों ने उनसे संपर्क कर के धाकरे साहब से बात करने की जरूरत बताई। डॉ धाकरे तब R.B.S.कालेज के प्रिंसिपल थे उनके कार्यालय मे सरदारजी ,श्रीवास्तव साहब और मै मिले और उन्होने सहर्ष अपना समर्थन दे दिया। कभी भी अपने कालेज -निवास पर मिलने आने की बात भी उन्होने कही जहां ठीक से बात कर सकें।

मिश्रा जी के साथ ज़मीनों का धंधा करने वाले कामरेड पूरन खाँ जो उनके घर मे भी गहरे घुसे हुये थे और उनके सम्पूर्ण परिवार से सहानुभूति रखते थे,मुझसे लगातार कह रहे थे कि मिश्रा जी के परिवार को बचाओ कटारा उनके परिवार को तबाह करना चाहता है और वह कटारा प्रेम मे डूबे हुये हैं। कामरेड दीवान सिंह भी मिश्रा जी के एहसानमंद थे और वह भी उनके परिवार को कटारा से बचाना चाहते थे। मिश्रा जी के साथ जूते की फेकटरी खोलने वाले कामरेड नेमीचन्द भी उनके खैरख्वाह थे और भलीभाँति जानते थे कि उस फेकटरी को फेल करने मे कटारा और उनके बेटे का पूरा-पूरा हाथ था। इन लोगों का कहना था कि कटारा ने किसी तांत्रिक प्रक्रिया से मिश्रा जी को वशीभूत कर लिया है,पार्टी तो सम्हाल ली जाएगी और मिश्रा जी के बगैर भी चलती रहेगी किन्तु उनका परिवार बुरी तरह बिखर जाएगा। लिहाजा कटारा को काबू करने के लिए मिश्रा जी को हटाना जरूरी हो गया था। मलपुरा के कामरेड्स को भी मिश्रा जी से व्यक्तिगत सहानुभूति थी और वे भी कटारा से मुक्ति की मुहिम मे मिश्रा जी को पदच्युत करने के हामी थे। ...... 

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शनिवार, 3 दिसंबर 2011

आगरा/1992 -93 (भाग-1)


सेठ जी के मित्र और 'शू चैंबर' के प्रेसीडेंट शंकर लाल मुरजानी साहब अक्सर उनकी दुकान मे आकर सो जाते थे। वह रश्मि एन्क्लेव,कमला नगर मे रहते थे। एक दिन मुझ से बोले माथुर साहब क्या बात है बेहद कमजोर हो गए हो। मैंने कहा साहब जीवन  चलाने हेतु कमजोर होना जरूरी है,तो फिर वह बोले और कमजोर कर दें?मैंने कहा यदि आप उचित समझते हैं तो कर दें। उन्होने कहा कल सुबह मुझे घर पर मिलो। जब अगले दिन मै उनके घर गया तो उन्होने कहा तुम्हारा सेठ बड़ा मतलबी है जब फँसता है मेरे पास आता है,मैंने उससे कहा था कि,माथुर साहब को पूछो मेरे यहाँ पार्ट-टाईम करेंगे? एक साल हो गया कहता है पूछने का टाईम नहीं मिला। इसलिए मैंने तुमसे सीधे बात की। मेरे घर पर आकर डेढ़ घंटा गर्मियों मे 7-30 से 9 और जाड़ों मे 9 से 10-30 सुबह सेल्स टैक्स-इन्कम टैक्स का काम कर देना शुरू मे रु 600/- दूंगा। घर के नजदीक होने तथा उनके व्यापारी नेता होने के कारण उनसे व्यवहार रखना घाटे का सौदा नहीं था,मैंने स्वीकार कर लिया। वह 'शू फेक्टर्स फ़ेडेरेशन ' के वाईस प्रेसिडेंट थे और राज कुमार सामा जी प्रेसिडेंट जो भाजपा के बड़े नेता थे। हालांकि वह जानते थे कि मै भाकपा मे सक्रिय हूँ फिर भी उन्हे स्पष्ट कर दिया। वह बोले हमारा -तुम्हारा संपर्क सिर्फ जाब तक है हम अपनी राजनीति मे तुम्हें नहीं शामिल करेंगे और न तुम्हारी राजनीति मे दखल देंगे।

पता नहीं क्यों सेठ जी उनके घर मेरे काम स्वीकारने से खुश नहीं थे?वह खिचे-खिचे रहने लगे। मुझे उससे कोई फर्क नहीं पड़ता था लेकिन मै और सतर्क हो गया। इससे पूर्व वह खुद मुझे तीन अलग-अलग पार्ट-टाईम जाब दिला चुके थे परंतु उन्हें अपने मित्र के यहाँ मेरा जाब करना अखर गया था। मैंने अपने भाकपा ,जिला मंत्री मिश्रा जी से भी चर्चा की थी। उन्होने बताया कि ये जूता व्यापारी भाजपा के होते हुये भी कम्यूनिस्ट पार्टी से दबते हैं क्योंकि तमाम लोग 'सोवियत यूनियन' को जूता सप्लाई करते हैं। रूस से पेमेंट मिलना निश्चित रहता है। कभी कोई दिक्कत होती है तो पार्टी के बड़े नेताओं से संपर्क साधते हैं। इसी लिए आपका कम्यूनिस्ट होना उन्हे नागवार नहीं लगता है,और वह सेठ भी आपको अपनी तरफ से हटाने की पहल नहीं करेगा।

जब रमेशकान्त लवानिया मेयर थे तब मिश्रा जी ने अपने घर के आस-पास सीवर की समस्या को उनके दफ्तर मे जाकर बताया तो उन्होने कहा था -अरे मिश्रा जी आपने आने की तकलीफ बेकार की फोन कर देते तब भी काम हो जाता। जो काम भाजपा का क्षेत्रीय पार्षद न करा सका वह भाकपा के जिलामंत्री की पहल पर चुटकियों मे हो गया। इस उदाहरण से मिश्रा जी ने मुझे समझाया था कि ये व्यापारी बड़े डरपोक होते हैं जब तक उनकी नब्ज आपकी पकड़ मे है वे आपको हटा नहीं सकते।

राजनीति और आजीविका के क्षेत्र मे सभी कुछ बदस्तूर चलता रहा। सिर्फ घरेलू क्षेत्र मे शालिनी का अपनी भाभी संगीता के प्रति बदला हुआ व्यवहार आश्चर्यजनक रहा। इस वर्ष की गर्मियों मे भी उनकी माँ जब 7-8 रोज के लिए बाहर गई तो शालिनी जल्दी-जल्दी सिटी के क्वार्टर पर जाती थीं। चूंकि तब तक स्कूल बंद नहीं हुये थे और उनकी माँ जल्दी गई थीं। यशवन्त को स्कूल छोडते हये मै शंकर लाल जी के घर चला जाता था। उनके घर से लौटने पर शालिनी साईकिल पर मेरे साथ सिटी क्वार्टर की परिक्रमा करके उसकी छुट्टी से पहले लौट आती थीं। वहाँ दिन भर रुकने की बजाए दो ढाई घंटे मे लौट लेना होता था। मै सेठ जी के यहाँ 6 घंटों की बजाए सिर्फ 3 घंटे काम तब कर पाता था ,खैर वह कहते कुछ नहीं थे। इसी क्रम मे एक बार शालिनी ने संगीता को कुछ इशारा किया और उन्होने मुस्करा कर जवाब दिया हाँ वायदा याद है आप बताइये किस गाने पर डांस करना है। शालिनी ने उन्हें कान मे कुछ कहा और उन्होने कहा ठीक है मौन डांस ही करेंगे गाएँगे नहीं। मै नहीं कह सकता कि कोई गाना भी था या नहीं। डांस मेरे समझ से परे था। मै तो सिर्फ इतना ही समझ सका कि डांस के नाम पर वह शरीर को मटकाना भर था। ऐसी हरकत ने केवल संगीता के शरीर मे उत्तेजना ही व्याप्त की और पूर्व की भांति जब स्वतः वस्त्र न खुले तो संगीता ने भाव-प्रदर्शन के सहारे उन्हे खोला ,नारा ढीला करने के नाम पर नीचे के वस्त्र हटाने से साफ हो गया कि बार-बार एक ही प्रक्रिया का दोहराया जाना किसी खास मकसद की छोटी कड़ी है। डी एस पी इंटेलीजेंस (जो मुगल होटल मे सेक्यूरिटी आफ़ीसर थे जब मैंने 1975 मे ज्वाईन किया था) के साथ बैठकें-चर्चाए व्यर्थ नहीं थीं उनसे कुछ न कुछ सीखा ही था। अच्छी या बुरी किसी प्रकार की प्रतिक्रिया मैंने कभी भी न दी। मैंने घर पर शालिनी से पूछना भी बंद कर दिया कि ऐसा करने का कारण क्या?

1990-91  मे आडवाणी की रथ-यात्रा और रामजन्म भूमि आंदोलन  द्वारा होने वाले अनिष्ट से जनता को आगाह करने हेतु यू पी मे भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी ने तब की सातों कमिशनरियों के मुख्यालयों पर 'सांप्रदायिकता विरोधी रैली ' के आयोजन का फैसला किया था ।  मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने सभी जिलों मे रैली करने का प्रस्ताव किया ,उसी क्रम मे मथुरा मे भी एक रैली हुई थी। मै अपने भाकपा साथियों के साथ ट्रेन से मथुरा गया था। शालिनी का कहना था कि उनकी छोटी बहन सीमा के घर भी हाल-चाल लेता आऊ;  क्योंकि योगेन्द्र चंद्र का क्वार्टर मथुरा जंक्शन पर ही था मैंने साथियों से सीधे रैली स्थल पर मिलने का वादा करके प्लेटफार्म से ही क्वार्टर का रास्ता पकड़ा। तभी थोड़ी देर पहले योगेन्द्र दिल्ली की गाड़ी पकड़ने हेतु गए होंगे और सीमा ने समझा था कि उनकी गाड़ी छूट गई होगी जिससे वह घर लौट आए होंगे । उन लोगों को मेरे पहुँचने की सूचना नहीं थी। सीमा ने दरवाजे खोले तो अस्त-व्यस्त और पुराने-फटे कपड़ों मे थी ,सफाई करते -करते बेल बजने पर यह सोच कर दरवाजा खोला था कि योगेन्द्र ही उल्टे -पैरों लौटे होंगे। उस दशा मे पहले कभी सीमा को नहीं देखा था। सीमा ने सोफ़े पर बैठाने के बाद अपनी बेटी (जो जब 6-7 वर्ष की रही होगी )से पानी भिजवा दिया और खुद कपड़े बदलने के बाद ही आई। यह अंतर था शरद मोहन और उनकी पत्नी संगीता के चरित्र और शरद की छोटी बहन सीमा के चरित्र का ,गफलत की बात और थी जो सीमा ने दरवाजा खोला था तब की दशा मे और फिर बैठ कर बात-चीत करते समय की दशा मे। मुझे ताज्जुब भी था कि आवारा माँ, भाइयों,भाभी का असर सीमा पर भी अपनी और  बहनों की ही तरह  बिलकुल नहीं पड़ा था।बेटियाँ  अपनी माँ के चरित्र से प्रभावित नहीं थीं जबकि बेटे माँ के चरित्र से प्रभावित थे। कमलेश बाबू के जिगरी दोस्त और भतीज दामाद कुक्कू(जिनकी बेटी की नन्द कमलेश बाबू की छोटी बेटी की देवरानी है) तो अश्लील पुस्तकें ला कर बिस्तर के नीचे छिपा कर रखते थे ताकि उनकी बहनें भी पढे और प्रभावित हों परंतु उनकी बहनें अपने आवारा भाई से प्रभावित नहीं हुई। यह एक अच्छी बात रही।

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शनिवार, 26 नवंबर 2011

आगरा /1990-91 (भाग-8 )

इन दिनों विहिप आदि का रामजन्मभूमि आंदोलन भी ज़ोरों पर था। शिला पूजन आदि के नाम पर धन बटोरा जा रहा था विद्वेष भड़काया जा रहा था। 'मंटोला' क्षेत्र मे पी ए सी के माध्यम से तत्कालीन एस एस पी कर्मजीत सिंह घरों से निवासियों को खदेड़ने मे कामयाब रहे थे। वह कल्याण सिंह के चहेते थे बाद मे मायावती के चहेते बन कर डी जी पी बने। हमारी पार्टी भाकपा 'सांप्रदायिकता विरोधी' अभियान चलाती रहती थी ,अक्सर जिला मंत्री मिश्रा जी मुझ से भी विचार व्यक्त करने को कहते थे। मै संत कबीर के दोहों के माध्यम से अपनी बात सिद्ध करता था जो उन्हें तब पसंद आता था और वह भी कभी-कभी ऐसा ही करते थे।

इन्ही वर्षों के लगभग 'पनवारी' नामक गाँव मे एक दलित को घोड़ी पर चढ़ कर बारात निकालने से रोकने हेतु जातीय संघर्ष भी हुआ था। (सन ठीक से याद नहीं है)। कमलानगर मे भी कर्फ़्यू लागू था। बउआ -बाबूजी उस समय फरीदाबाद मे अजय के पास थे। एक दिन शरद की बड़ी बेटी मेरे साथ साइकिल पर बैठ कर आ गई थी। सुबह शालिनी ने ही सिटी पर मिलते आने को कहा था। दिन मे उन्हें बुखार चढ़ गया था ,शाम को खाना बनाने का विचार नहीं था परंतु भतीजी के अचानक आ जाने पर बनाना पड़ा हालांकि वह 4या 5 वर्ष की ही रही होगी। जब कर्फ़्यू लगा उस समय वह हमारे घर थी। दो दिन के बाद पहुंचाने का वादा कर्फ़्यू ने पूरा नहीं होने दिया। शरद के एक मौसेरे भाई आशुतोष मेडिकल कालेज मे शायद तब हाउस जाब कर रहे थे ,एक दोपहर आकर अपने स्कूटर से शरद की बेटी को ले गए । डॉ होने के नाते वह बिना पास के आ-जा सकते थे। अपने हास्टल से सिटी क्वार्टर पहुंचे उन लोगों का हाल-चाल लेने तो उनकी भाभी संगीता ने अपनी बेटी को ले आने को उनसे कहा था।

कर्फ़्यू समाप्त होने के काफी बाद एक दिन राज कुमार शर्मा जी (सप्तदिवा वाले विजय जी के बड़े भाई) एक और सज्जन के साथ यों ही मिलने चले आए थे। वह हमारी विचार -धारा से परिचित थे फिर भी बोले कि परंपरा तोड़ कर दलितों को बारात नहीं निकालनी चाहिए थी। पढे-लिखे सहायक अभियंता जी साईन्स साईड के थे फिर भी अवैज्ञानिक बातों के जरिये पोंगावाद का समर्थन कर रहे थे। वस्तुतः अमीर लोग गरीबों को ऊपर उठते नहीं देख सकते बल्कि उन्हें कुचले रखना चाहते हैं इसीलिए जातिवाद का समर्थन करते हैं।

लगभग यही धारणा शरद और उनकी माँ की भी थी। घर मे भी उनके यहाँ दकियानूस वाद  ही हावी था। संगीता को फिर रेलवे अस्पताल मे इलाज नहीं कराया जबकि फ्री होता। मेडीकल कालेज मे फेफड़ों की टी बी बताया गया और फेफड़ों से इंजेक्शन के जरिये पानी निकाला जाता था। एक दिन शालिनी सुबह मेरे साथ ड्यूटी जाने के समय यशवन्त को लेकर चलीं और सिटी क्वार्टर पर रुक गई। शाम को उन्हे लेने गया तो पता चला कि शरद टाईम न होने के नाम पर अपनी पत्नी को मेडीकल कालेज ड्यू टाईम पर नही ले गए थे। अतः उन लोगों ने शालिनी से कहा था कि अगले दिन ड्यूटी जाने से पहले मै संगीता को उनकी सास के साथ मेडीकल कालेज ले चलूँ और फेफड़ों से पानी निकाले  जाने के बाद अपनी ड्यूटी चला जाऊ और वे लोग अपने घर लौट आएंगे। मन  मे बुरा तो यह लगा कि जब संगीता के कहने पर डॉ रामनाथ को बुला लाया था तो झांसी से योगेन्द्र को बुला कर रेलवे अस्पताल भेज दिया था और मेरा समय बेवजह खराब करा दिया था तो अब मै साथ चलने से इंकार कर दूँ ।फेफड़ों मे भरा पानी पीठ की किसी नस से सीरिञ्ज द्वारा खींच कर निकाला जाता था।

 परंतु सब को मदद करने की आदत के कारण हामी भर दी और वादा भी निभाया।अतीत मे अजय की शादी और यशवन्त के जन्मदिन कार्यक्रम मे छोले -भटूरे बनाने का  शालिनी से  वायदा करके भी संगीता ने पूरा नहीं किया था। तब भी शालिनी की तमन्ना रहती थी कि मै उनकी भाभी को मदद कर दूँ। कभी तो शालिनी संगीता के असंगत व्यवहार पर उनमे बचपना होने की बात कह देती थीं जबकि उस समय खुद संगीता दो बच्चियों की माँ थीं। कभी -कभी खुद शालिनी को ही संगीता का व्यवहार पीड़ा पहुंचाता था। यो ही एक बार दिन मे यशवन्त को लेकर वह सिटी के क्वार्टर पर रुक गई थीं। शाम को दुकान से लौटते मे मै बुलाने गया था।चाय देने के बाद संगीता ने पूछा कि आपने मजेदार खबर सुनी है?उन लोगों के यहाँ 'अमर उजाला' आता था जो क्रिमिनल खबरें ज्यादा छापता था। दुकान पर 'पंजाब केसरी' आता था वहीं पढ़ लेता था ,घर पर नहीं लेता था। बाकी अखबार पार्टी (भाकपा)आफिस पर पढ़ लेता था। उस दिन पार्टी आफिस न जाकर वहाँ मौजूद था लिहाजा मै उस समाचार से बेखबर था। फिर खुद ही संगीता ने अखबार से वह खबर पढ़ कर सुनाई -दिल्ली मे आमने -सामने रहने वाले दो दम्पतियों के रोमांस की खबर को चटक ढंग से छापा गया था। एक परिवार का पुरुष दूसरे परिवार की महिला को लेकर नैनीताल मे गुलछर्रे उड़ाने गया था ,वह महिला अपने पति को झूठ बोल कर पीहर जाने के नाम पर पडौसी के संग गई थी। उसके पति ने सोचा कि पड़ौसन अकेली है उसका पति भी नहीं है वह उसे लेकर नैनीताल पहुँच गया। दोनों अलग-अलग होटलों मे ठहर कर एक -दूसरे की बीबियों के साथ मौज-मस्ती करते रहे। एक शाम दोनों अपनी-अपनी पड़ौसनो के साथ  विपरीत दिशा से घूमते हुये आमने-सामने आ गए और एक-दूसरे का कालर पकड़ कर मार-धाड़ करने लगे। भीड़ मे लोगो  ने उन्हें छुड़ा कर अपनी-अपनी बीबियों के साथ चुप-चाप चले जाने को कहा और चेतावनी दी कि यदि लड़े तो पुलिस को सौंप दिया जाएगा। इस खबर को जिस खुशी और मस्ती से संगीता ने पढ़ा था शालिनी को बुरा लगा होगा ,वहाँ तो चुप रहीं घर आकर मुझसे बोलीं दिन मे उन्हें बताया तो ठीक था परंतु उस खबर को मुझे इस अंदाज मे क्यों सुना रहीं थीं क्या वह मेरी पत्नी थीं। मैंने उन्हें जवाब दिया तुम्ही  समझो अपनी भाभी की बड़ी तरफदारी करती हो वह क्या हैं?उनमे बचपना है?या आवारगी?

'पनवारी कांड 'के कर्फ़्यू के दौरान ही गुरुशरण भाई साहब की बेटी की शादी भी पड़ी। लड़के वालों के बारात लाने से इंकार करने के कारण उन्होने दिल्ली जाकर शादी की  थी। शामिल न हो सके थे। अतः जब उनकी बेटी पीहर आई तो उन्होने सूचित किया कि शैली आई है। हम लोगों ने उनके घर जाकर अपनी हैसियत के अनुसार शैली को रु 21/- भेंट कर दिये।

हमने कभी बदले की आकांक्षा नहीं रखी और अपनी तरफ से सदा संबंध मधुर बनाए रखने का प्रयास किया जिसे मेरी कमजोरी समझा गया।


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सोमवार, 21 नवंबर 2011

आगरा/ 1990-91 ( विशेष राजनीतिक)

इसी काल मे भाकपा के जिला मंत्री रमेश मिश्रा जी के रमेश कटारा (जो अब पार्टी से बाहर हैं) के नियंत्रण मे आने की बात सामने आई। उनके निकटतम और घनिश्ठ्तम साथी आ -आ कर मुझ से कहते थे कि पार्टी और मिश्रा जी के परिवार को बचाओ। मैंने एक बार सीधे-सीधे मिश्रा जी से बात की तो पाया कि कटारा सहाब का जादू उनके सिर चढ़ कर बोल रहा था और कुछ फायदा कटारा के खिलाफ बोलने का नहीं होने वाला था। कटारा के मुद्दे पर ही मिश्रा जी को बड़ा भाई मानने वाले आनंद स्वरूप  शर्मा जी पहले 'लँगड़े की चौकी के शाखा मंत्री का पद' फिर बाद मे पार्टी ही छोड़ गए। एक एक कर लोग निष्क्रिय होते गए या पार्टी छोडते गए परंतु मिश्रा जी का कटारा प्रेम बढ़ता गया। अंदर ही अंदर एक काफी बड़ा वर्ग मिश्रा जी का विरोधी होता चला जा रहा था लेकिन मिश्रा जी इन सभी को पार्टी विरोधी घोषित करते जा रहे थे।

नानक चंद भारतीय भाकपा और नौ जवान सभा छोड़ कर बसपा मे चले गए। पार्षद शिव नारायण सिंह कुशवाहा भी भाकपा तथा नौ जवान सभा छोड़ कर समाजवादी पार्टी मे शामिल हो गए। पार्टी की शक्ति निरंतर कमजोर होती जा रही थी और रमेश मिश्रा जी कटारा के प्रेम मे मस्त थे। मेरी सहानुभूति कटारा विरोधियों के साथ थी परंतु कार्य मिश्रा जी के अनुसार करने की मजबूरी भी थी। कोशाध्यक्ष पद पार्टी का था मिश्रा जी की निजी फेकटरी का नहीं। कटारा साहब मुझे दबाने या धमकाने के फेर मे नहीं पड़े जबकि दूसरे लोगों के साथ ऐसी ज़ोर-आजमाईश करते रहते थे। डॉ  राम गोपाल सिंह चौहान और हफीज साहब भी कटारा से खुश नहीं थे यदि वे दबाव बनाते तो शायद मिश्रा जी उनकी बात मान सकते थे या शायद नहीं मानते तो इसी भय से उन लोगों ने कुछ कहा नहीं।

कटारा के प्रभाव मे मिश्रा जी के आने के बाद और अपनी बीमारी से पहले डॉ चौहान को प्रेक्टिल अनुभव हो चुका था कि कटारा को शिकस्त केवल मै ही दे सकता था। डॉ जवाहर सिंह धाकरे की पत्नी जो बहौत दिनों से महिला शाखा की मंत्री थीं अपने स्थान पर अपनी भतीजी श्रीमती मंजू सिंह को बनाने पर राजी थीं। कटारा की यह चाल थी कि अपनी भतीजी के पक्ष मे श्रीमती कमला धाकरे को हट जाने दो फिर वरिष्ठ शिक्षक नेता की हैसियत से कनिष्ठ शिक्षिका मंजू सिंह को अपने अनुकूल चलवाते रहेंगे। मिश्रा जी तो ब्लाईंड सपोर्ट कटारा की कर रहे थे उन्होने डॉ चौहान को महिला शाखा मे पर्यवेक्षक के रूप मे भेज कर श्रीमती मंजू सिंह को शाखा मंत्री चुनवाने का दायित्व सौंपा था। मिश्रा जी के भक्त किन्तु कटारा के प्रबल विरोधी कामरेड्स ने मुझसे अपेक्षा की कि कटारा की योजना को ध्वस्त कर दूँ। विकट स्थिति थी न तो मै मिश्रा जी को नाराज करना चाहता था न ही डॉ चौहान को  और न ही कटारा की योजना को सफल होने देना चाहता था और न ही डॉ धाकरे को यह एहसास होने देना चाहता था कि उनकी पत्नी की भतीजी को मैंने शाखा मंत्री नहीं बनने दिया।

हालांकि शालिनी भाकपा की महिला शाखा की सदस्य थीं किन्तु मैंने उन्हें सलाह दी थी कि वह बैठकों मे तटस्थ रुख ही रखें। सबसे पहले उस शाखा की सहायक मंत्री श्रीमती मंजू श्रीवास्तव (जो किशन बाबू श्रीवास्तव साहब की पत्नी थीं )को राजी किया कि वह सरला जी के स्थान पर उनकी भतीजी श्रीमती मंजू सिंह के विरुद्ध अपना नाम प्रस्तावित होने पर पीछे न हटें और मुक़ाबले मे डटी रहें। उसके बाद मिश्रा जी की सबसे विश्वस्त कामरेड को सारी परिस्थिति समझा कर उनसे महिला शाखा का मंत्री बनने का निवेदन किया और उनके इंकार करने पर   मंजू श्रीवास्तव जी का नाम प्रस्तावित करने का अनुरोध किया जिसे उन्होने न केवल स्वीकार कर लिया बल्कि रिक्शा से बाकी महिलाओं के घर-घर जाकर उन्हें कमला जी द्वारा प्रस्तावित मंजू सिंह के विरुद्ध मंजू श्रीवास्तव का समर्थन करने पर राज़ी किया।

बैठक मे कामरेड कमला  धाकरे ने खुद हटने और अपने स्थान पर अपनी भतीजी कामरेड मंजू सिंह का नाम प्रस्तावित किया जिसका किसी ने भी समर्थन नहीं किया और मिश्रा जी की विश्वस्त  कामरेड ने कामरेड मंजू श्रीवास्तव का नाम प्रस्तावित कर दिया जिसका (कमला  जी और मंजू सिंह के अतिरिक्त ) सभी ने ताली बजा कर स्वागत किया । बाद मे कमला  जी ने भी अपनी स्वीकृति दे दी और इस प्रकार अपने पहले ही शक्ति परीक्षण मे कटारा साहब मुंह की खा गए। डॉ चौहान की उपस्थिती मे हुये इस चुनाव की औपचारिक पर्यवेक्षक रिपोर्ट के अतिरिक्त मौखिक रूप से सारा विवरण उन्होने मिश्रा जी को दिया तो मिश्रा जी हैरान रह गए कि डॉ चौहान की मौजूदगी के बावजूद एक ठाकुर कामरेड को रिजेक्ट कर दिया गया। मिश्रा जी ने डॉ चौहान से पूछा कि आपने हस्तक्षेप क्यों नहीं किया तो वह बोले वहाँ मतभेद होता तभी तो हस्तक्षेप की नौबत आती ,कमला  जी ने भी तो खुद ही मंजू सिंह के स्थान पर मंजू श्रीवास्तव को स्वीकार कर लिया था तो बतौर पर्यवेक्षक वह क्या कर सकते थे?मिश्रा जी ने कहा डॉ साहब यह आपकी पहली हार है,पड़ताल कीजिये कि क्यों आप मिशन मे कामयाब नहीं हुये?उन्होने कहा जांच तो करेंगे ही और उन्होने अपने तरीके से जांच मे सच्चाई का पता भी निकाल लिया ,किन्तु मिश्रा जी को कहते रहे कुछ पता नहीं चल पा रहा है,उन्होने तभी मन मे तय कर लिया था कि मिश्रा जी को कटारा के चंगुल से यह (विजय माथुर)ही निकाल पाएगा और इसी लिए अपनी बीमारी के दौरान ही उन्होने अपना चार्ज मुझे दिलवाकर अपने स्थान पर कोशाध्यक्ष बनवा दिया था और निश्चिंत हो गए थे। जैसा कि मिश्रा जी ने बताया था कि उन्हें अपना नाम तक लिखना नहीं आता था यह डॉ चौहान ही थे जिनहोने उन्हें पार्टी मे भी बढ़ाया और पढ़ाया उनको खुद का नाम लिखना भी सिखाया। शायद इसी गुरु धर्म के निर्वाह मे वह मिश्रा जी का खुल कर विरोध या आलोचना नहीं करना चाहते होंगे और असंतुष्ट होने के कारण उन्हें खुशी ही हुई होगी कि मैंने डिप्लोमेटिक तरीके से कटारा का तिलस्म तोड़ दिया और मिश्रा जी पर आंच भी न आने दी ।हकीकत पता चलने पर डॉ धाकरे और उनकी पत्नी कमला  जी भी खुश थीं कि मैंने उनकी भतीजी श्रीमती मंजू सिंह को एक गलत आदमी के चंगुल मे फँसने से बचाने हेतु उनका विरोध करवाया था। धाकरे दंपति का मुझे आशीर्वाद भी इस घटना के बाद हासिल हो गया और आगे उन दोनों ने मुझे ब्लाईंड सपोर्ट भी किया जिसका वर्णन अपने उपयुक्त समय पर होगा ।  

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बुधवार, 19 अक्टूबर 2011

आगरा/1988-89 (भाग-5)-मध्यावधि चुनाव

राजीव गांधी की बोफोर्स कांड पर गिरती हुई साख और वित्त मंत्री के रूप मे उद्योगपतियों पर आय कर के डलवाए छापों से राजीव गांधी की असंतुष्टि के कारण वी पी सिंह ने कांग्रेस छोड़ कर 'जन-मोर्चा'गठित कर लिया था। उनके सहयोगी थे उनके भतीज दामाद संजय सिंह (जिनहोने बाद मे वी पी की भतीजी गरिमा सिंह को तलाक दे कर टेनिस खिलाड़ी मोदी की विधवा अमिता मोदी से विवाह कर लिया),आरिफ़ मोहम्मद खान और अरुण नेहरू (जो राजीव गांधी के ममेरे भाई थे)। इन तीनों ने नारा दिया था-'तख्त बदल दो,ताज बदल दो-बेईमानों का राज बदल दो  ' इन लोगों ने वी पी के बारे मे प्रचार किया था-'यह राजा नहीं फकीर है,भारत की तकदीर है'। हमारे मेरठ कालेज के पूर्व अध्यक्ष सतपाल मलिक(जो अब भाजपा मे हैं,तब समाजवादी थे -मधुलिम्ये और राजनारायन के हिमायती रहे थे )भी वी पी के जन-मोर्चा मे महत्वपूर्ण पदाधिकारी थे। हमारी कम्यूनिस्ट पार्टी भी वी पी का समर्थन कर रही थी। इस लिए जब राजीव गांधी ने संसद भंग करके मध्यावधि चुनावों की घोषणा की तो आगरा मे सभी स्थानों पर कम्यूनिस्ट पार्टी ने वी पी के जनता दल को समर्थन दिया किन्तु दयालबाग विधान सभा क्षेत्र से अपने उम्मीदवार मलपुरा के ग्राम प्रधान ओम प्रकाश राजपूत को खड़ा किया । हालांकि उन्हें पार्टी का चुनाव चिन्ह नहीं एलाट हुआ परंतु समस्त प्रचार कम्यूनिस्ट पार्टी के झंडे के साथ चला। इसमे भाग लेने हेतु भी मै सेठ जी को बता कर चला जाता था ।

अक्सर मिश्रा जी मुझे अपने साथ मलपुरा ले जाते थे। एक बार किशन बाबू श्रीवास्तव साहब भी अपने साथ ले गए थे जो राटौटी शाखा के ब्रांच सेक्रेटरी थे।वह रहते हमारी कालोनी के निकट ही गांधीनगर मे थे। उनकी पत्नी मंजू श्रीवास्तव पार्टी की महिला शाखा मे सक्रिय थीं और उन्होने शालिनी को भी पार्टी मे शामिल कर लिया था। उनके बच्चों के साथ यशवन्त काफी घुल-मिल गया था।

मतगणना के दिन और वोटिंग के दिन भी मेरी भी ड्यूटी मिश्रा जी ने रखी थी। ओम प्रकाश जी की बिरादरी कल्याण सिंह के कारण भाजपा की समर्थक थी किन्तु मलपुरा मे उन्होने बेहद काम कराया था अतः उनकी भी समर्थक थी। लोकसभा के लिए उनके वोट भाजपा प्रत्याशी भगवान शंकर रावत,एडवोकेट को पड़े तो विधान सभा दयालबाग  क्षेत्र मे ओम प्रकाश जी को।

वी पी के जनता दल के प्रत्याशी दयालबाग मे विजय सिंह राणा थे। उन्होने मिश्रा जी से बहौत अनुरोध किया कि ओम प्रकाश जी को हटा ले। उसी क्षेत्र मे कांग्रेस प्रत्याशी अतर सिंह यादव (जो बाद मे सपा मे शामिल हुये )
थे। आर बी एस कालेज के प्राचार्य और भाकपा नेता का जवाहर सिंह धाकरे ने पार्टी प्रत्याशी को न समर्थन देकर अपने कालेज के प्रवक्ता और कांग्रेस प्रत्याशी अतर सिंह यादव का प्रचार किया। सी पी एम वाले विजय सिंह राणा का प्रचार कर रहे थे। अतः ओम प्रकाश जी जीत तो न पाये किन्तु भाजपा प्रत्याशी को भी नहीं जीतने दिया और जनता दल प्रत्याशी विजय सिंह राणा जीत गए। जीतने के बाद राणा साहब ने मिश्रा जी का आभार व्यक्त किया कि यदि कम्यूनिस्ट प्रत्याशी को मिले वोट उनके न खड़े होने पर जाति के आधार पर  भाजपा को पड़ते तो वह जीतता अतः कम्यूनिस्ट उम्मीदवार ने खड़े रह कर भाजपा को हराने मे मदद ही की।

केंद्र मे वी पी सिंह प्रधान मंत्री और यू पी मे मुलायम सिंह मुख्यमंत्री बने। हमारी पार्टी के दोनों से संबंध मधुर थे। पार्टी की अंदरूनी बैठकों मे का लल्लू सिंह चौहान आगाह करते थे कि मुलायम सिंह जातिवादी हैं उनसे सावधान रहने की जरूरत है। उनका आंकलन शायद ठीक था ,बाद मे मुलायम सिंह ने यहाँ भाकपा को तोड़ा और काफी बाद मे प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की मदद से यू पी के मुख्यमंत्री भी फिर बने। अब भी वह कभी रामदेव तो कभी अन्ना हज़ारे का खुला समर्थन करते हैं।


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सोमवार, 5 सितंबर 2011

आगरा/1986-87(भाग-1)मुगल के विरुद्ध संराधन केस

सेठ जी ने अपने पार्ट टाईम अकाउंटेंट जो उनके सहपाठी भी रहे थे उनके स्वास्थ्य की आड़ लेकर उन्हें अपने यहाँ से हटा दिया और सम्पूर्ण कार्य मेरे ही पास आ गया परंतु वेतन बढ़ोतरी नहीं हुयी ,प्रतिवर्ष मात्र रु 100/-ही बढ़ाने की बात कही। किन्तु दो माह बाद ही मेरी  बात मान कर उन्होने अतिरिक्त रु 200/- बढ़ा दिये। फिर भी समस्या तो थी ही क्योंकि रु 290/- की किश्त तो हाउसिंग बोर्ड की ही जमा करनी होती थी। जिन लोगों का हाथ मुगल से नौकरी खत्म कराने का था उनकी सोच थी कि ,जाबलेस होकर यह मकान बेचने पर मजबूर हो जाएगा। परंतु कम ही सही कुछ तो अरनिंग हो ही रही थी झेल लिया और इसलिए भी कि पिताजी मेरे ही पास थे वह अंत तक आटा अपने खर्च पर मुहैया कराते रहे। मना करने पर उनका जवाब होता हम तुम्हें किराया नहीं दे रहे हैं -खाना खुद खाएँगे और तुम लोग भी उसी मे खा सकते हो।

हरीश छाबड़ा के चिकित्सक मित्र के एक दूसरे मित्र ने मुझे मुगल के विरुद्ध केस हेतु का अब्दुल हफीज से संपर्क करने को कहा। आगरा मे उस समय भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी की पहचान हफीज साहब की पार्टी या चचे की पार्टी के रूप मे थी। का हफीज ईमानदार ट्रेड यूनियन नेता थे और काफी वृद्ध हो  चुके थे वह सज्जन उनके पूर्व परिचित थे ,वही मुझे लेकर गए थे अतः उन्होने यह कह कर कि अब खुद नए केस नहीं ले रहे है का हरीश चंद्र आहूजा के घर भेज दिया। पहले तो वकील आहूजा साहब मुगल का नाम सुन कर भड़क गए क्योंकि झा साहब के परसोनल मेनेजर रहते उनके विरुद्ध इजेक्शन  नोटिस पारित कराया गया था। लेकिन बाद मे इस शर्त पर केस लड़ने पर राजी हो गए कि किसी भी सूरत मे कभी भी मुगल मेनेजमेंट से कोई सम्झौता नहीं करोगे।

आहूजा साहब ने संराधान अधिकारी,आगरा के समक्ष केस दायर कर दिया। इसके जवाब मे मुगल मेनेजमेंट ने एक माह की नोटिस पे का ड्राफ्ट बना कर भेज दिया और कहा सरप्लस होने के कारण छटनी की है। सरकारी श्रम विभाग मे जिस कछुआ गति से केस चलते हैं उसी प्रकार मेरा भी केस शुरू हो गया। आहूजा साहब ने प्रत्येक गुरुवार को श्रमिक प्रशिक्षण कार्यक्रम मे भाग लेने हेतु राम बाग स्थित 'मजदूर भवन' पर मुझे बुलाना शुरू किया जिसमे भाग लेने हेतु हींग की मंडी से सीधे पहले रामबाग जाता था फिर वहाँ से लौट कर घर पहुंचता था। इस स्कूल मे ट्रेनिंग देने हेतु प्रो डा जवाहर सिंह धाकरे,प्रो डा महेश चंद्र शर्मा,और का रमेश मिश्रा,जिला मंत्री भाकपा टर्न -बाई -टर्न आते रहते थे। जैसा मेरा मिजाज है मे मूक श्रोता न था। मैंने शंका होने पर सवाल उठाए जिंनका उत्तर प्रशिक्षक लोग बड़ी सौम्यता से समझा कर देते थे।

कुछ माह बाद आहूजा साहब ने कहा केस अपनी रफ्तार से चलता रहेगा लेकिन हम चाहते हैं कि जिस आंदोलन से हम जुड़े हैं आप भी जुड़ें। उन्होने 'माँ' उपन्यास पढ़ने को दिया। अक्तूबर 1986 मे उन्होने मुझे भाकपा का सदस्य बना लिया। का रमेश चंद्र मिश्रा जी ने मुझे अपने घर बुला कर कुछ और किताबें पढ़ने को दी। हमारी लँगड़े  की चौकी शाखा की पार्टी मीटिंगें मिश्रा जी के निवास पर ही होती थीं। 8-10 माह बाद आहूजा साहब ने मुझे 'मजदूर भवन' बुलाना बंद कर दिया और कहा कि आप राजा की मंडी आफिस मे चौहान साहब और शर्मा जी के साथ काम करो वे आप को वहाँ चाहते हैं। इनमे से चौहान साहब से मे मिला तक नहीं था अतः आश्चर्य भी हुआ । डा राम गोपाल सिंह चौहान ,आगरा कालेज के हिन्दी विभागाध्यक्ष से सेवा निवृत थे और भाकपा के जिला कोषाध्यक्ष थे । डा शर्मा जी आर बी एस कालेज ,आगरा मे बी एड के विभागाध्यक्ष थे और सहायक जिला मंत्री थे । वैसे दोनों ही पूर्व मे जिला मंत्री भी रह चुके थे। ये दोनों मुझे पार्टी आफिस मे अपनी सहायता के लिए चाहते थे क्योंकि जिला मंत्री मिश्रा जी भाग-दौड़ ,मजदूर व किसान  समस्याओं आदि मे व्यस्त रहते थे।

शुरू-शुरू मे चौहान साहब मुझे इमला बोल कर पत्रोत्तर लिखाते थे। बाद मे उन्हें कुछ लगा कि मे तो खुद लिख सकता हूँ तो कहने लगे रफ लिख कर रखना मुझे दिखाना। मे उनके आने से पहले प्रदेश और केंद्र से आए पत्रों के उत्तर लिख कर रखने लगा तो कुछ दिन बाद बोले बेकार दो बार लिखते हो सीधे पार्टी लेटर हेड पर लिख लो। अब उन्हें केवल हस्ताक्षर ही करने रहते थे। मुझे पार्टी की जिला काउंसिल मे भी सदस्यता प्रदान कर दी गई।.......... 

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