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बुधवार, 7 नवंबर 2012

कारपोरेट ट्रेड यूनियनिज़्म का खेल/शिकार

"अपने आर्थिक हितों के लिए बनाए गए स्वेच्छिक संघों को श्रम संघ कहते हैं । " यह है ट्रेड यूनियन्स की सर्वमान्य परिभाषा।
15 मई 1972 से 'सारू स्मेल्टिंग प्रा.लि.',मेरठ मे मैंने अकाउंट्स विभाग मे कार्य प्रारम्भ किया था। 11 माह बाद दो और लोगों के साथ मुझसे भी रिज़ाईन करने को कहा गया था,आश्वासन यह था कि दो दिन बाद फिर से नया एप्वाईंट मेंट लेटर मिल जाएगा। उन दो साथियों की सोर्स तब भी मौजूद थी जबकि मुझे जाब दिलवाने वाले फेकटरी इंस्पेक्टर महेश चंद्र माथुर  साहब स्थानांतरित हो चुके थे। मैंने यह सोच कर कि नौकरी यों भी जानी  ही है तो रिज़ाईन क्यों करूँ जब चाहें मेनेजमेंट हटा ही देगा रिज़ाईन करने से इंकार कर दिया। दो दिन के अंतराल दिखा कर उन दोनों को नया एप्वाईंट मेंट लेटर दे दिया गया जबकि कार्य लगातार करते रहे। कुछ दिन बाद फेकटरी मेनेजर बृजेन्द्र कुमार अखोरी साहब द्वारा हस्ताक्षरित 'शो काज नोटिस' मुझे दिया गया।

पूर्व परसोनल आफ़ीसर डॉ मिश्री लाल झा साहब (जो मेरठ यूनिवर्सिटी मे ए आर हो गए थे ) को मैंने वह पत्र दिखाया जिसका उन्होने उत्तर डिक्टेट कर दिया और हिदायत दी कि लिख कर मैं उसे पूर्व फेकटरी मेनेजर जैन साहब को(जो दूसरी फेकटरी मे चले गए थे) दिखा लूँ। जैन साहब ने झा साहब के लिखाये उत्तर को सही बता कर जमा करने को कह दिया। उत्तर पढ़ते ही अखोरी साहब खुद मेरी सीट पर चल कर आए और अपने साथ गैलरी मे ले जाकर बोले मुझसे क्यों लड़ते हो?मैं भी तो कायस्थ हूँ। मैंने कहा साहब तो आपने फिर यह लेटर मुझे क्यों दिया था?उत्तर देना मेरा फर्ज़ था। वह बोले लगता है तुम उस गधे (यह उन्होने झा साहब के लिए कहा था)के पास चले गए वह पंडित दोनों कायस्थों को लड़ाना चाहता है। खैर अब इसकी कापी जो रिसीव कराई है उसे फाड़ दो ओरिजनल भी फाड़ देते हैं। मैंने उनसे कहा मैं कोई कागज नहीं फाड़ सकता आप अपने लेवल पर उसे रिजेक्ट कर सकते हैं। उन्होने कहा कि ठीक है हम कोई एक्शन नहीं लेंगे तुम भी अब चुप रहना।

बात आई गई हो गई। 'सारू मजदूर संघ 'के कोषाध्यक्ष आनंद स्वरूप गुप्ता जी मुझसे बोले जब तुम अकेले अपने लिए लड़ सकते हो तो यूनियन मे शामिल होकर सबके भले के लिए काम करो और इस प्रकार ट्रेड यूनियन मे मेरा पिछली तारीख से प्रवेश हो गया। बाद मे कार्यकारिणी मे भी मैं रहा। किन्तु प्रेसीडेंट सहदेव शर्मा जी को मिला कर जून 1975 मे एमर्जेंसी लागू होने पर मेनेजमेंट ने मुझे बर्खास्त कर दिया।

पहले वहाँ 'मेटल वर्कर्स यूनियन'सक्रिय थी जिसका नेतृत्व एस पी सहगल साहब के पास था,वह जसवंत शुगर मिल के कर्मचारी और यूनियन के महामंत्री रहे थे। किन्तु एक अन स्किल्ड वर्कर ओ पी शर्मा साहब को मेनेजमेंट ने आगे करके 'सारू मजदूर संघ' की स्थापना करा दी थी जो शुरू मे एक पपेट यूनियन थी। फिर सहगल साहब के निर्देश पर सभी कर्मचारी इसी मे प्रवेश कर गए थे और अधिकार कर लिया था ,अंततः नियंत्रण भी सहगल साहब के हाथों मे आ गया था। एस डी शर्मा जी भी ओ पी शर्मा जी की राह पर चल निकले थे और पहला शिकार मुझे बनाया गया था। मेरे हटने के कुछ वर्ष बाद यूनियन दो फाड़ होकर भंग हो गई थी। 

सवा तीन वर्ष के अनुभव के आधार पर निर्माणाधीन 'होटल मोगूल ओबेराय',आगरा मे मुझे 22 सितंबर,1975 से  जाब तो मिल गया परंतु बिना एक्सपीरिएन्स सर्टिफिकेट के वेतन कम मिला। बाद मे चालू होने पर यह 'होटल मुगल शेरेटन'हो गया और मेनेजमेंट को 'स्टैंडिंग आर्डर्स' मे 'होटल एंड रेस्टोरेन्ट वर्कर्स यूनियन' की ओर से दाखिल आपत्तियों से निपटना था। अतः कुछ सुपरवाईजर्सको आगे करके मेनेजमेंट ने एक 'स्टाफ फेल्फेयर कमेटी' का गठन कराने की पहल की। अकाउंट्स विभाग के प्रतिनिधि के रूप मे सुदीपतो मित्रा ने मेरा नाम लिख कर एक कागज पर हस्ताक्षर शुरू कराये थे और तीन हस्ताक्षर हुआ वह कागज जैसे ही मेरे समक्ष आया मैंने उसी पर लिख दिया कि,हम सब सुदीपतो मित्रा को अपना प्रतिनिधि चुनते हैं। शेष 30-35 लोगों ने मेरे कथन का समर्थन कर दिया। बाकी विभागों से सर्व सम्मत एक-एक नाम पहुंचे थे। मित्रा का तर्क था कि बहुमत ने विजय माथुर का समर्थन किया है अतः वही निर्वाचित माना जाए और मेरा तर्क था कि चूंकि मैंने सुदीप्तों मित्रा के लिए समर्थन मांगा है अतः वह निर्वाचित हो चुके हैं -शेर की सवारी कर चुके हैं अब उतर नहीं सकते। पर्सोनेल मेनेजर को मेरा तर्क स्वीकार करना पड़ा। एक तरफ जेनरल मेनेजर की अध्यक्षता वाली यह स्टाफ वेल्फेयर कमेटी कर्मचारियों के हितों की बात उठाती रही दूसरी तरफ स्टाफ के इन कुल  11 सदस्यों ने मेनेजमेंट की शह  पर 'होटल मुगल कर्मचारी संघ' नामक यूनियन का गठन प्रारम्भ कर दिया। समस्या सदयस्ता की थी कुछ सुपरवाईजर्स ही इसके सदस्य बने थे। मेरठ मे सारू स्मेल्टिंग के कटु अनुभव के कारण मैं दिलचस्पी नहीं ले रहा था और बाकी स्टाफ मेरी गैर हाज़िरी वाली किसी भी यूनियन मे शामिल नहीं हो रहा था।

सुदीप्तों मित्रा का बैंक आफ बरोदा मे DRO के रूप मे सिलेक्शन हो गया। होटल मुगल कर्मचारी संघ का महामंत्री पद रिक्त हो गया। प्रेसीडेंट अशोक भल्ला साहब और ज्वाईंट सेक्रेटरी योगेन्द्र कुमार सिक्का ने कमेटी की बैठक मे महामंत्री पद पर मेरे चुनाव की घोषणा कर दी जबकि हकीकत मे मैं तो साधारण सदस्य भी न था। सार्वजनिक घोषणा हो चुकने के बाद  मेरा इंनकार 'पलायन' हो जाता  अतः 'गले पड़े का ढ़ोल बजाना' मेरी मजबूरी हो गई। एक सप्ताह मे सदस्यता 250 की संख्या पार कर गई। यूनियन के रेजिस्ट्रेशन हेतु जो इंस्पेक्टर जैन साहब कानपुर से आए थे उनसे मैंने रिटायर्ड  'डिप्टी चीफ इंस्पेक्टर आफ फेकटरीज़' श्री महेश चंद्र माथुर का हवाला देते हुये बताया कि वह हमारे नानाजी के फुफेरे भाई हैं। जैन साहब उनके आधीन काम कर चुके थे उन्होने बगैर कुछ चेक किए ही यूनियन रेजिस्टर्ड करने की सिफ़ारिश कर दी।

जेनेरल मेनेजर सरदार चरण जीत सिंह पेंटल ओबेराय ग्रुप मे यूनियन दो फाड़ करने मे कामयाब रहे थे उनको पर्सोनेल मेनेजर हरी मोहन झा साहब ज़्यादातर मेनेजर्स को अपने साथ लामबंद करके तथा स्टाफ फेल्फेयर कमेटी (एवं यूनियन)के सदस्यों को पोट-पाट कर अपने पाले मे करते हुये झुका लेते थे। झा साहब खुद को रिंग मास्टर कहते थे। मेरे यूनियन का महामंत्री बनने पर भी  उन्होने पुराना खेल जारी रखना चाहा जो न चल सका। मैंने यूनियन को पूरी तरह कर्मचारी हितों के साथ जोड़ दिया और मेनेजमेंट की गुटबाजी का मोहरा न बनने दिया। झा साहब ने मुझे चेतावनी  देने के तौर पर अपना पुराना किस्सा सुनाया था जो इस प्रकार है ---

झा साहब डॉ जगन्नाथ मिश्रा एवं ललित नारायण मिश्रा जी के भतीज दामाद थे और इसी योग्यता के आधार पर कालेज से मात्र बी ए करने बाद जमशेदपुर मे टाटा के यहाँ पर्सोनेल आफ़ीसर बन गए थे। यूनियन का बुजुर्ग घाघ महामंत्री हर मेनेजर को काबू रखता था। इनमे नया जोश था इनहोने एक दिन उसे धक्का देकर अपने आफिस से हटा दिया वह चला भी गया। जेनेरल मेनेजर ने इनको बुला कर हवाई टिकट पकड़ा कर प्रमोशन पर कलकत्ता रवाना कर दिया और हिदायत दी कि सामान भूल जाओ वहाँ कंपनी बंदोबस्त कर देगी ।जब स्टाफ को एकत्र कर वह मजदूर नेता पहुंचा तो जी एम ने उसे झूठ कह दिया कि झा को बर्खास्त करके हटा दिया है अतः वह भाग गया।

मैंने झा  साहब की कहानी सुन कर कोई जवाब नहीं दिया लेकिन मन मे दृढ़ निश्चय कर लिया कि चाहे जो हो उनके आगे झुकना नहीं है। बदली परिस्थितियों मे जेनेरल मेनेजर मीटिंग मे मेरे द्वारा प्रस्तुत सुझावों को तत्काल मंजूर करने लगे जिससे झा साहब को झटका लगा और स्टाफ के समक्ष मेरी साख और बढ़ गई। भल्ला साहब एवं सिक्का जी तो पहले ही पंजाबी होने के कारण पेंटल साहब के प्रति सौम्य थे किन्तु झा साहब की किलेबंदी मे फंस जाते थे जो अब नहीं होने से प्रसन्न थे। 03-04-1978 के दिनांक से यूनियन रेजिस्टर्ड होने का पत्र आने पर मेनेजमेंट ने यूनियन को मान्यता भी दे दी। जो चार्टर् आफ डिमांड सुदीप्तों मित्रा पेश कर गए थे उसमे झा साहब रद्दो-बदल करवा कर विवाद खड़ा करना चाहते थे मैंने दृढ़ता पूर्वक किसी भी बदलाव से इंकार कर दिया।झा  साहब ने तब मेंडेट न होने का दांव चल दिया।  हमने यूनियन के चुनाव घोषित कर दिये। भल्ला साहब पर जी एम के पिट्ठू का ठप्पा होने से मैंने उनका समर्थन न करके पी बी सिंह का समर्थन किया। सिंह साहब को झा साहब ने कालांतर मे तोड़ लिया,किन्तु मैं पहले ही जिन दीपक भाटिया साहब को नया ज्वाईंट सेक्रेटरी बनवा चुका था वह मेरे बहुत काम आए। दीपक भाटिया जी पहले जया भादुरी जी के पी ए थे और शादी के बाद अमिताभ जी से कह कर उनका एडीशनल  पी ए जया जी उनको बनवा दिया था। पेंटल साहब से अमिताभ जी ने आगरा मे दीपक भाटिया को  नौकरी देने की सिफ़ारिश की थी और वह पेंटल साहब के मुंह लगे थे। हालांकि उनको ज्वाईंट सेक्रेटरी बनवाने पर लोगों को ताज्जुब भी हुआ था कि मैंने ऐसा क्यों किया। झा साहब की चाल बाजियों को पेंटल साहब तक वह पहुंचा देते थे और पेंटल साहब मुझे समर्थन देकर मेनेजमेंट की गुटबाजी मे झा साहब को झकझोर देते थे। 11-09-1978 को जो सम्झौता हुआ उसमे झा साहब की एक भी दाल न गली। 

झा साहब ने पी बी सिंह को भड़का कर यूनियन मे विवाद खड़ा करना चाहा लेकिन मैंने मध्यावधी चुनाव करा दिये। खुद मैंने चुनाव नहीं लड़ा और दीपक सरकार को समर्थन देकर खड़ा करा दिया। झा साहब के इशारे पर मुकेश भटनागर उनके विरोध मे खड़ा हो गया। प्रेसीडेंट का निर्वाचन निर्विरोध करा दिया और भटनागर साहब मेरा समर्थन न होने के कारण हार गए। जी एम पेंटल साहब और पर्सोनेल मेनेजर झा साहब अन्यत्र स्थानांतरित हो गए। नए पर्सोनेल मेनेजर हेमंत कुमार जी ने मुझे एक नई यूनियन खड़ी करने के लिए अनेक प्रलोभन दिखाये किन्तु मैंने कर्मचारी विरोधी कोई भी कदम उठा कर निजी लाभ लेना मंजूर नहीं किया। बाद मे अप्रैल 1984 मे सस्पेंड करके 19-01-1985 से मेरी सेवाएँ समाप्त कर दी गई ,इसी प्रकार होटल मौर्य शेरेटन ,दिल्ली मे यूनियन सेक्रेटरी बी सी गोस्वामी  के कर्मचारी हितैषी होने के कारण सेवाएँ समाप्त कर दी गई थीं। 


आज दिनांक 07-11-2012 के हिंदुस्तान लखनऊ मे नारायण मूर्ती साहब के केजरीवाल संबन्धित खुलासे के बाद कारपोरेट घरानों का यह पुराना खेल याद आ गया कि किस प्रकार कर्मचारियों मे अपने नुमाईन्दे फिट करके कारपोरेट कंपनियाँ मजदूर आंदोलनों को छिन्न-भिन्न करने हेतु कर्मठ कर्मचारी नेताओं को बर्खास्त कर देते हैं। ये कारपोरेट घराने जनता के बीच जन-हितैषी नेताओं की छ्वी धूमिल करने हेतु हज़ारे/केजरीवाल/रामदेव जैसे लोगों को फ़ाईनेन्स करके फर्जी नेता बना कर खड़ा कर देते हैं। मजदूर आंदोलनों की भांति ही जन-आंदोलन भी ध्येय से इन लोगों के कारण भटक जाते हैं और जनता का शोषण बदस्तूर चलता-बढ़ता रहता है।



हिंदुस्तान,लखनऊ,07-11-2012,पृष्ठ 14

  • Danda Lakhnavi दोहों के आगे दोहे
    ===========
    पद-परमिट-कोटा तथा, टिकट-भवन-भूखंड।
    आदि सुखों का देवता, पूज्य......पार्टी-फ़ंड॥
    ===========

    सद्भावी- डॉ० डंडा लखनवी

    आपका कथन सत्य है....प्राय: ऐसा होता है ...
  • Vijai RajBali Mathur डॉ Danda Lakhnavi साहब बहुत-बहुत धन्यवाद ,पीड़ा समझने हेतु।
     (फेसबुक 'जनहित' ग्रुप मे प्राप्त टिप्पणी और उसका जवाब)

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रविवार, 5 फ़रवरी 2012

सठिया गये



(विजय,पूनम एवं यशवन्त माथुर)


अक्सर लोगों को कहते सुना है कि वह या यह सठिया गया है। वैसे लोग किस संदर्भ मे कहते हैं वे ही जानें। परंतु मै समझता हूँ कि जब कोई जीवन के साठ वर्ष पूर्ण कर ले तो उसे सठियाया कहते होंगे। यदि ऐसा ही है तब अब मै भी सठिया गया। मेरा ब्लाग का प्रारम्भिक लेख था-'आठ और साठ  घर मे नहीं'। 02 जून 2010 को ब्लाग मे प्रकाशन से पूर्व यह लेख लखनऊ के एक स्थानीय अखबार मे प्रकाशित हो चुका था। इसके मुताबिक मुझे अब घर छोड़ कर 'वानप्रस्थ'ग्रहण कर लेना चाहिए। परंतु समाज मे व्यावहारिक रूप से आज ऐसी व्यवस्था नहीं है। अतः आज 61वे वर्ष मे प्रवेश के बावजूद घर मे ही मेरी उपस्थिती बरकरार रह गई है। हालांकि मै चाहता हूँ कि घर मे न उलझा रह कर 'राजनीति' एवं लेखन  के माध्यम से समाज सेवा/जन सेवा मे अधिकाधिक अपना समय लगाऊ । यों तो राजनीति मे मै किसी न किसी रूप मे युवावस्था से ही हूँ। 22 वर्ष की अवस्था मे मै 'सारू मजदूर संघ',मेरठ की कार्यकारिणी मे था और कुछ समय कार्यवाहक कोषाध्यक्ष  भी रहा था। न चाहते हुये भी 26 वर्ष की अवस्था मे 'होटल मुगल कर्मचारी संघ',आगरा का महामंत्री (SECRETARY GENERAL)बनना पड़ा था। 25 वर्ष की अवस्था मे 'जनता पार्टी'(चंद्रशेखर की अध्यक्षता वाली) का साधारण सदस्य और 28-29 वर्ष की अवस्था मे ए बी बाजपाई की अध्यक्षता वाली 'भाजपा' का सक्रिय सदस्य था। 34 वर्ष की आयु से 'भाकपा' मे आया (42 वर्ष आयु से 54 वर्ष आयु तक मुलायम सिंह की अद्यक्षता वाली 'समाजवादी पार्टी' मे -पूर्वी विधान सभा क्षेत्र ,आगरा का महामंत्री फिर बाद मे डॉ डी.सी .गोयल के महानगर अध्यक्ष बनने पर उनकी नगर कार्यकारिणी मे भी रहा और राज बब्बर से भी पहले 'सपा'छोड़ कर खाली बैठा था कि आगरा-भाकपा के मंत्री के आग्रह पर वापिस 'भकपा'मे लौट आया)और आज 'सठियाते समय' लखनऊ -भाकपा की जिला काउंसिल मे हूँ।


जहां अधिकांश लोगों को कहते सुना जाता है कि राजनीति भले लोगों के लिए नहीं है वहीं इसके ठीक विपरीत मेरा सुदृढ़ अभिमत है कि 'राजनीति' है ही भले लोगों के लिए और राजनीति को 'गंदा' करने के लिए जिम्मेदार हैं तथाकथित 'भद्र जन'जो छुद्र स्वार्थों के कारण राजनीति से दूर रहते है और इसे गंदे लोगों के लिए खाली छोड़ देते हैं। MAN IS A POLITICAL BEING -यह कथन है सुकरात (प्लूटो)का जो अरस्तू (एरिस्टाटल )का गुरु था। अर्थात Man is a social animal -मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है-कहने वाले के गुरु का कहना है कि ' मनुष्य जन्म से ही एक राजनीतिक प्राणी है'। समाँज मे तो मनुष्य जन्म के बाद ही आता है तब जब वह सक्रिय होता है किन्तु राजनीति मे तो वह जन्मते ही शामिल हो जाता है। फिर कैसे 'राजनीति' गंदे लोगों के लिए है?दरअसल ऐसा कहने वाले लोग ही गंदे होते हैं जो समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन नही करना चाहते-उनका मूल मंत्र होता है-मेरा पेट हाऊ मै न जानूँ काऊ ।

आज सठियाते समय मै तो सामान्य से अधिक सक्रिय हूँ अपने शौक(Hobby)-राजनीति मे और लेखन मे भी  क्योंकि अभी हमारे उत्तर प्रदेश मे विधान सभा चुनाव चल रहे हैं। आज से दो सप्ताह बाद हमारे नगर लखनऊ मे मतदान होना है। इस बार हमारी भाकपा ने पूरे प्रदेश मे अपने 55 और सम्पूर्ण बामपंथ ने 115 प्रत्याशी चुनाव मे उतारे हैं एक मजबूत विपक्ष विधानसभा मे बनाने हेतु जो दबे-कुचले,शोषित-उपेक्षित ,किसानों-मजदूरों की समस्याओं पर सदन के भीतर ही सशक्त आवाज बुलंद करेगा। एक मजबूत विपक्ष के आभाव मे सरकारें निरंकुश और भ्रष्ट होती रही हैं। भ्रष्टाचार मुक्त पार्टी-भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी इस बार के चुनावों के माध्यम से सरकार को अंकुश मे रखने का प्रयास कर रही है। सभी भद्र जनों को हमारे इस प्रयास मे सहयोग करना चाहिए। 'एकला चलो रे' सिद्धान्त के अनुसार मै तो इस अभियान मे संलिप्त हूँ ही और इस सठियाने के बाद और अधिक सक्रिय रहने का प्रयास करूंगा।

11 माह की नौकरी करने के बाद स्तीफ़ा मांगे जाने का विरोध करके डटे रहने के कारण 'सारू मजदूर संघ ',मेरठ के कोषाध्यक्ष ने मुझ से कहा था जब अपने लिए संघर्ष कर सकते हो तो सब के भले के लिए यूनियन मे शामिल हो जाओ और पिछ्ले समय से सदस्यता देकर मुझे कार्यकारिणी मे शामिल कर लिया गया था। आगरा मे भी मुझ पर दबाव था कि मै आगे आ कर यूनियन के गठन मे सहयोग दूँ परंतु पहले मै दूर ही रहा। किन्तु 'होटल मुगल कर्मचारी संघ',आगरा का रेजिस्ट्रेशन होने से पूर्व ही महामंत्री का चयन बैंक आफ बरोदा मे DRO के रूप मे हो गया। मँझधार मे छूटी यूनियन का मुझे सीधे महामंत्री घोषित कर दिया गया और फिर बाद मे मुझे पिछले समय से सदस्यता ग्रहण करनी पड़ी थी। जनता पार्टी सरकार बनने के बाद मुगल होटल मे सहयोगी केरल वासी विजय नायर साहब ने एक रुपया लेकर जबर्दस्ती 'जनता पार्टी' की सदस्यता दे दी थी। क्योंकि 'होटल मुगल कर्मचारी संघ',आगरा के रेजिस्ट्रेशन के वक्त बी एम एस नेताओं ने मदद की थी अतः उनके प्रस्ताव को नजरंदाज न कर पाने के कारण 'भाजपा' का सक्रिय सदस्य बनना मजबूरी का सबब था। 25 लोगों से एक-एक रुपया लेकर रसीद बुक जमा कर देने के कारण 'सक्रिय सदस्यता' प्रदान कर दी गई थी। जब किसी से एक पान भी  खाये बगैर ही सबका कार्य सम्पन्न कराया हो तब सीट पर बैठे-बैठे एक-एक रु.की रसीद तो सम्पूर्ण 450 लोगों की काटी जा सकती थी 25 की क्या  कोई बात थी?एक-आध बार बैठकों मे भाग लिया तो समझ आया कि यह-भाजपा  तो व्यापारियों और पोंगापंथियों की पोषक पार्टी है  ,आम जनता के हितों से इसका कोई सरोकार नहीं है । अंदरूनी बैठकों मे इसके नेता और कार्यकर्ता कुत्ते-बिल्ली की तरह लड़ते हैं। अतः गुप-चुप तरीके से अलग हो गया।

होटल मुगल से बर्खास्तगी के विरुद्ध कानूनी लड़ाई लड़ने के वक्त बने संपर्कों के आधार पर 1986 मे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मे शामिल कर लिया गया और बाद मे कोषाध्यक्ष भी रहा। 1994 से 2004 तक समाजवादी पार्टी ,आगरा मे रहा, दो वर्ष निष्क्रिय रहने के बाद वापिस सी पी आई  मे आ गया और 2006 से पुनः भाकपा मे सक्रिय हूँ। 45 वर्ष से 52 वर्ष की आयु तक 'बल्केश्वर-कमला नगर आर्यसमाज',आगरा मे भी सक्रिय रहा और इसकी कार्यकारिणी मे भी शामिल किया गया जिससे एक माह मे ही हट गया था। स्वामी दयानन्द सरस्वती से शुरू से ही प्रभावित था 11 वर्ष की उम्र मे उनका 'सत्यार्थ प्रकाश' काफी अच्छा लगा था। 17 से 19 वर्ष की आयु के मध्य मेरठ कालेज ,मेरठ के पुस्तकालय मे उनके प्रवचनों का संग्रह-'धर्म और विज्ञान' भी पढ़ा-समझा था और आज भी उनके विचार सर्वोत्कृष्ट लगते हैं। किन्तु महर्षि द्वारा स्थापित संगठन 'आर्यसमाज' अधिकांशतः उनके विचारों के विरोधी संगठन आर एस एस से प्रभावित लोगों के चंगुल मे फंस गया है अतः गुप-चुप तरीके से संगठन से प्रथक्क हो गया। 49  वर्ष से 53 वर्ष की आयु तक 'कायस्थ सभा',आगरा मे भी सक्रिय रहा और इसकी कार्यकारिणी मे तथा कई सचिवों मे से एक सचिव भी रहा। इसका तथा 'अखिल भारतीय कायस्थ महासभा',आगरा का आजीवन सदस्य होते हुये भी इन संगठनों से निष्क्रिय इसलिए हो गया क्योंकि ये संगठन इनको चलाने वाले नेताओं के व्यापारिक हितों का संरक्षण करते हैं न कि आम लोगों का कल्याण। 

कुछ क्या अधिकांश लोगों को यह हास्यास्पद प्रतीत होता है कि मै कम्युनिस्ट पार्टी मे होते हुये भी 'वैदिक'मत का समर्थक कैसे हूँ?कारण यह है कि लोग भी समझते हैं और कम्युनिस्ट खुद भी अपने को धर्म विरोधी कहते हैं। वस्तुतः 'धर्म' को न समझने के कारण ही ऐसा भ्रम बना हुआ है। साधारणतः लोग ढोंग और पाखंड को धर्म कहते हैं और कम्यूनिज़्म इसी का विरोध करता है और स्वामी दयानन्द ने भी इसी का विरोध किया है। यही कारण है कि ठोस आर्यसमाजी को भी कम्युनिस्टों की भांति ही संशय की दृष्टि से देखा जाता है। जबकि वास्तव मे 'मानव जीवन को सुंदर,सुखद और समृद्ध' बनाने हेतु दोनों के विचार समान हैं । 'साम्यवाद' जिसे कम्यूनिज़्म कहा जाता है मूल रूप से भारतीय अवधारणा ही है जिसे मैक्स मूलर साहब अपने साथ यहाँ की मूल पांडु लिपियाँ लेकर जर्मनी पहुंचे और वहाँ उनके जर्मन अनुवाद से प्रभावित हो कर कार्ल मार्क्स ने जो निष्कर्ष निकाले वे ही कम्यूनिज़्म के नाम से जाने जाते हैं। सारा का सारा भ्रम साम्राज्यवाद के हितचिंतक संप्रदाय वादी आर एस एस का फैलाया हुआ है। इसी भ्रम को तोड़ना मेरा लक्ष्य है। अधिकाधिक लोगों का कल्याण हो और वे भटकें नहीं इसी विचार को लेकर मै 'हवन विज्ञान' संस्था बनवाना चाहता था और लोगों का हकीकत -सत्य से साक्षात्कार करवाना चाहता था। अपने निकटतम रिशतेदारों ( जो मेरे लखनऊ आने के प्रबल विरोधी रहे और अब संबंध तोड़ लिए )के फैलाये कुचक्र के कारण इस विचार को फिलहाल स्थगित रखा है परंतु उम्मीद है कि भविष्य मे सफल हो सकूँगा।

दूसरे शौक लेखन मे 19 वर्ष की आयु मे 'मेरठ कालेज पत्रिका',मे एक लेख 'रावण वध एक पूर्व निर्धारित योजना' के प्रकाशन के साथ ही शामिल हूँ।21 वर्ष की अवस्था मे आगरा जहां अजय इंजीनियरिंग पढ़ रहे थे घूमने गया था और उनके परिचय से फारवर्ड ब्लाक के एक नेता के अखबार 'युग का चमत्कार' मे पहला लेख-'अंधेरे उजाले' जो महर्षि स्वामी दयानन्द 'सरस्वती'पर था प्रकाशित  हुआ था। आगरा के ही एक अखबार 'पैडलर टाइम्स' मे पहली कविता'यह महाभारत क्यों होता?' प्रकाशित हुई थी।  सारू स्मेल्टिंग,मेरठ मे अकौण्ट्स विभाग मे होने के कारण पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों से भी वास्ता पड़ता रहता था। 'पी  सी टाइम्स' के संपादक प्रकाश चंद जी मेरे सभी लेख छापने लगे उस वक्त उम्र 22  वर्ष थी। लेखों के आधार पर पत्र के प्रबन्धक मिश्रा जी ने एक बार मुझसे पूछा था कि आपने एम ए 'राजनीति शास्त्र' मे किया है अथवा 'हिन्दी साहित्य' मे? विनम्रता पूर्वक उन्हे समझाना पड़ा कि ,साहब मैंने तो एम ए ही नहीं किया है मात्र बी ए किया है। उन्होने प्रसन्नतापूर्वक कहा था जब भी इधर आना मुझसे मिले बगैर न जाना। उनके निर्देश का मैंने सहर्ष पालन सदैव किया।

आगरा मे 29 वर्ष की अवस्था से 'सप्त दिवा'साप्ताहिक मे नियमित लेख प्रकाशित होते रहे बाद मे सहायक संपादक तथा उसके बाद उप संपादक के रूप मे भी इससे संबद्ध रहा। 'ब्रह्मपुत्र समाचार' ,आगरा मे 50 वर्ष की आयु से नियमित लेख आदि छपते रहे। 'माथुर सभा','कायस्थ सभा' की मेगजीन्स मे तो लेख छ्पे ही वैश्य समुदाय की 'अग्रमंत्र' त्रैमासिक पत्रिका मे भी उप-संपादक के तौर पर संबद्ध रहकर नियमित लिखता रहा। 58 वर्ष की उम्र मे लखनऊ के एक स्थानीय अखबार मे भी लेख छपे किन्तु जून 2010 से 'क्रांतिस्वर' ब्लाग बन जाने के बाद केवल ब्लाग्स और फेसबुक मे ही लिख रहा हूँ और आगे भी यह शौक बदस्तूर जारी ही रहने की संभावना है।








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