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बुधवार, 27 मार्च 2013

नाना जी की कुछ स्मृतियाँ ---विजय राजबली माथुर

( स्व डॉ राधे मोहन लाल माथुर सुपुत्र स्व श्याम सुंदर लाल माथुर )
जैसा कि हमने बचपन से सुना है कि हमारे नानजी का जन्म 01 जनवरी 1900 ई को हुआ था। उनका निधन तो 27 मार्च 1979 ई को हुआ था ,आज यह वर्णन उनकी पुण्य तिथि के अवसर पर उनकी स्मृति मे उनको ही समर्पित है ---

हमारे नानाजी अपने जीवित रहे तीन बच्चों मे हमारी माँ जो बीच की थीं को ज़्यादा मानते थे। इसी प्रकार माँ के तीनों बच्चों मे बीच के हमारे भाई अजय को ज़्यादा मानते थे। ऐसा किसी दूसरे का अनुमान नहीं उन्होने खुद ही कहा था। हमारी माँ भी नाना जी का पूरा ख्याल रखती थीं किन्तु अजय के विचारों के बारे मे मैं कुछ भी कह सकने मे अक्षम हूँ।

माँ की शादी के बाद जब बाबूजी दरियाबाद मे मर्ज़ी मुताबिक खेती देखने की इच्छा बाबाजी के (बड़े ताऊजी के पक्ष मे)निर्णय के कारण पूरी न कर सके तो एम ई एस मे नौकरी करने लखनऊ आ गए थे। मामाजी रिसर्च के लिए आस्ट्रेलिया गए हुये थे तो नानाजी ने न्यू हैदराबाद मे ही उनके साथ टिकने का आग्रह किया था। अतः बेहद छुटपन मे भी हमे नानाजी के साथ रहने का अवसर मिला है। नानाजी तब कृषि विभाग मे नौकरी करते थे। माँ से सुना था कि नानाजी एक बूंदी का लड्डू रोजाना लाकर मुझे दिया करते थे। माँ के कहे मुताबिक मैं नानाजी की  साईकिल घर के  ऊपर चढ़ते ही उनके पास आकर कहता था "नाना जी --लड्डू" और नानाजी झोले से निकाल कर वह लड्डू मुझे दे देते थे। माँ ने बताया है तो ऐसा उस समय मेरा स्वभाव रहा होगा किन्तु अपनी याद दाश्त के समय से तो मैं किसी से भी कुछ मांगता ही नहीं था और खुद देने पर भी बड़ी मुश्किल से ही लेता था। नाना जी के बाद वाले उनके भाई जिनको हम लोग बड़े नाना जी कहते थे हम लोगों की शिकायत खुद हमारी माँ से करते थे कि तुमने इन बच्चों को कैसी आदत डाली है ये कभी हमसे कुछ मांगते ही नहीं दो तो भी नखरे दिखाते हैं। खैर दो -ढाई साल की उम्र मे मेरा वैसा स्वभाव रहा होगा तो मुझे खुद उसकी याद नहीं है।

नाना जी जब बनारस यूनीवर्सिटी से होम्योपैथी पढ़ने विभाग से छुट्टी लेकर गए थे तब उनके भांजे (गोपाल मामाजी) लखनऊ यूनिवर्सिटी के हास्टल मे रहने चले गए थे जो वहाँ से LLb कर रहे थे। नानाजी जब बनारस से आए तो उनसे मिलने एक रोज़ सुबह-सुबह गए थे साथ मे मुझे भी ले गए थे तब शायद 4 या साढ़े चार वर्ष का रहा हूंगा। पैदल ही न्यू हैदराबाद से यूनिवर्सिटी गए थे तब बीच से पुलिस लाईन होकर गए थे। आज की तरह तब पुलिस लाईन प्रवेश कोई समस्या नहीं थी। IT कालेज चौराहे से सिटी बस पकड़ने के लिए भी पुलिस लाईन होकर निकल जाते थे -बहुत अच्छे तरीके से मुझे याद है। गोपाल मामाजी ने बेचने आए फेरी वाले से केले लेकर मुझे एक खाने को दिया तब भी मैंने लेने से इंकार ही किया था और फिर नानाजी के ''ले लो " कहने पर ही लिया और खाया था।

बाद मे दुगांवा मे कुछ दिन रहने के बाद हम लोग हुसैन गंज मे नाले के किनारे वाले 'फखरुद्दीन मंज़िल'के नीचे के हिस्से मे रहने लगे थे। नानाजी अक्सर हम लोगों से मिलने आ जाते थे और हम लोग भी न्यू हैदराबाद मामाजी/नानाजी से मिलने जाते रहते थे। शुरू शुरू मे बाबूजी का वोटर लिस्ट मे नाम न्यू हैदराबाद मे ही था। अतः 1957 के आम चुनाव मे वोट डालने बाबूजी न्यू हैदराबाद ही गए थे। नाना जी की तो ड्यूटी भी उनके घर के सामने वाले पार्क मे ही थी। शाम को ड्यूटी से लौट कर नानाजी ने बाबूजी को बताया था कि उनके एक साथी ने ड्यूटी पर क्या कारस्तानी की थी। तब उम्मीदवारों के चुनाव निशान के साथ उनके अलग-अलग बाक्स होते थे और जिस बाक्स मे से वोट के पर्चे निकलते थे उसी उम्मीदवार के पक्ष मे गिने जाते थे। दो बैलों की जोड़ी के बाक्स मे कुछ वोट के पर्चे पूरे अंदर नही जा पाये थे और नानाजी उनको अंदर करने लगे तो उनके दूसरे साथी ने आ कर उनसे कहा-"क्या गजब करते हो?" और बाहर को लटकते हुये पर्चे खींच कर 'हंसिया और गेंहू की बाली' वाले लाल बाक्स मे डाल दिये। शायद नाना जी की अपनी विचार धारा 'जनसंघ' के पक्ष मे थी किन्तु ड्यूटी के अनुसार वह कांग्रेस के पर्चे उसके बाक्स मे ठीक से डालने जा रहे थे जबकि उनके दूसरे साथी ने ड्यूटी ठीक से नहीं निभाई थी।

गुड़ियों के मेले (नाग पंचमी)के दिन एक बार जोरदार बारिश हुई और सारा मेला गड़बड़ा गया था। खादी  आश्रम/विजय मेडिकल हाल के सामने वाली सड़कों  की पटरी पर मिट्टी के खिलौने बेचने वालों के बहुत से खिलौने पानी मे बह-बह कर हमारे घर के सामने की सड़क से होते हुये नाले मे समा गए थे। ऐसे मे नानाजी सब्जी वाले की दुकान पर रुक गए थे जो हम लोगों से मिलने आ रहे थे। उस समय सड़क पर कमर तक पानी हमारे घर के सामने भरा था। जब पानी एडी तक रह गया तब नाना जी हमारे घर पहुंचे और बाबूजी भी बाद मे आ पाये। नाना जी तब हमारी माँ या दिल्ली मे मौसी के घर बिना पैसे दिये कुछ नहीं खाते थे। उनको पैसे न खर्च करने पड़े इसलिए माँ भी उनको चाय वगैरह को नहीं पूंछती थी परंतु पानी मे इतना भीग जाने के कारण नानाजी को गरम चाय बना कर दी। उस समय हमारे माता-पिता केवल सुबह एक बार ही चाय पीते थे और हम बहन-भाई को तो चाय देने का कोई सवाल ही नहीं था जैसा कि आजकल नन्हें-मुन्ने को भी बोतल के जरिये चाय देने का चलन देखते हैं तब कोई ऐसा सोच भी नहीं सकता था।

1960 मे जब पीलीभीत बांध से गोमती मे ज़्यादा पानी छोड़ दिया गया था और बाढ़ आना निश्चित था तो नाना जी अपने दफ्तर से सीधे माँ को यह बताने आए थे कि बाढ़ के बाद ही अब वहाँ आना और वह भी तभी दोबारा आ पाएंगे। बाबूजी के दफ्तर से आने तक नाना जी रुके रहे जिस कारण जब वह न्यू हैदराबाद पहुंचे तो घुटनों तक पानी पार करते हुये ही जाना पड़ा। मामाजी के घर के तीन तरफ पानी भर गया था और वहाँ नाव भी चली थी। नाले के मुहाने पर घर होने के बावजूद हम लोग सुरक्षित रहे बल्कि 06 सप्रू मार्ग से पानी मे घर घिर जाने पर भुआ-फूफाजी,दोनों भाई साहब सब हमारे घर ही शरण लेने आए थे। (उनमे छोटे वाले लाखेश भाई साहब जो कमलेश बाबू के अज़ीज़ों अज़ीज़ हैं हमारे घर से डेढ़ किलो मीटर की दूरी पर हैं लेकिन 'धन्ना सेठ' होने के कारण मुझसे मुंह सिकोड़े हुये हैं क्योंकि मैं गरीब मेहनतकश हूँ)।डॉ शोभा/कमलेश बाबू से वह फोन के माध्यम से संपर्क मे रहते हैं। उनसे बड़े भाई साहब तो शोभा की बेटी मुक्ता के ही शहर पूना मे लखनऊ से जाकर बस गए हैं। 

नानाजी समय से पूर्व रिटायरमेंट लेकर शाहजहाँपुर चले गए थे। वहाँ स्टेशन और टाउन हाल के निकट भारद्वाज कालोनी मे उन्होने अपना मकान बनवा लिया था। यह कालोनी पहले अमरूदों का बाग थी जो पाकिस्तान चले गए लोगों के स्वामित्व का था। कलेक्टर भारद्वाज साहब के प्रयास से उसे आवासीय कालोनी बना दिया गया था अतः उनके ही नाम पर यह कालोनी बनी। इसमे कुल 30 मकान बनाए गए थे। हमारे नानाजी के बाद के दो भाइयों को छोड़ कर उनके बाद के दो भाइयों ने भी उनके साथ-साथ मकान बनाए थे जो तीनों लगातार एक साथ हैं। पांचों भाइयों मे एकजुटता थी और जानते हुये भी किसी ने (जिन्होने मकान नहीं बनाए थे ने  भी) अपने पिताजी को ज़मीन खरीदने की सूचना नहीं दी थी क्योंकि वह मकान-ज़मीन को झगड़े का साधन मानते थे। उनके बाद ही सबने मकान बनाए थे। मामाजी की शादी के बाद तक वह जीवित थे और उन्होने मौसी के तीन बच्चों तथा हम दो भाइयों को भी देखा था। नानाजी ने उनका चित्र अन्य राम आदि के चित्रों के साथ अपने पूजा-स्थल पर रखा हुआ था। सुबह-शाम दोनों वक्त पौराणिक आधार पर नाना जी पूजा किया करते थे। 

अपने मकान मे नाना जी ने रहने पर दिल्ली से मौसी व लखनऊ से हमारी माँ को बुलाया था। मौसी पहले पहुँच गई थीं और हम लोग बाद मे पहुंचे थे। उनकी बड़ी बेटी (मिथ्थे जीजी )से नाना जी ने चटनी पीसने का आग्रह किया था तो उन्होने जवाब दिया था कि,नाना जी चटनी तो आपकी शोभा ही पीसेगी। नाना जी ने यह बात  बाद मे हमारी माँ से बताई थी। वही मिथ्थे जीजी और शोभा आज भोपाल मे अपने-अपने मकान बनाए हुये हैं और दोनों मे गहरी छन्न रही है। मुक्ता की शादी मे कानपुर मे सात वर्ष पूर्व मिली थीं। यशवन्त के बारे मे शोभा से जानकारी पूछती रहती हैं । 

नाना जी ने माँ से अजय को (जिसे वह सबसे ज़्यादा मानते थे)अपने पास शाहजहाँपुर मे छोडने को कहा था  
उन्होने तो मना कर दिया था  किन्तु मौसी ने अपने सबसे बड़े बेटे (लाल भाई साहब)को उनके पास छोड़ दिया था लेकिन उनके लगातार दो वर्ष हाई स्कूल मे फेल हो जाने पर नाना जी ने मौसाजी से अपने पास वापिस बुला लेने को कहा था। वह नानाजी का कहना नहीं मानते थे और उनके भाइयों के साथ शतरंज पर पढ़ाई छोड़ कर डटे रहते थे तो पास कहाँ से होते?नाना जी को यह बात नापसंद थी। आज शोभा और लाल भाई साहब मे भी गहरी छनती है।( लालभाई साहब भी कमलेश बाबू की ही तरह मेरे ज्योतिषीय ज्ञान का मखौल उड़ाते हैं क्योंकि मैं पोंगा-पंथ का खंडन करता हूँ और वह उसे पूजते हैं। अपनी बेटी की जन्मपत्री को मेरे द्वारा गलत बताए जाने पर वह भड़क गए थे और मुझे आगरा यूनिवर्सिटी से ज्योतिष का कोर्स करने की हिदायत दी थी।लेकिन मेरे द्वारा बनाई जन्मपत्री और बताए गए समय पर ही उनकी बेटी की शादी हुई उनके बताए समय पर तीन वर्ष पूर्व नहीं। नाना जी के भतीजे (बबुए मामाजी )भी उनको ही सही मान कर अपने बेटे का काफी नुकसान करा चुके हैं क्योंकि मैंने जो वैज्ञानिक उपाय बताए थे उनमे कोई टीम-टाम नहीं थी और लाल भाई साहब के  बताए उपाय तड़क-भड़क और  ख़र्चीले होने के कारण उनको भाए थे। उनका तर्क था कि तुम (यानि कि मैं)घर से प्रेक्टिस करते हो जबकि लाल ने दिल्ली मे एयर कंडीशंड आफिस खोला है एक  लेडी सेक्रेटरी भी रखे हुये है। तो उनके अधिक ज्ञान का पैमाना हुआ लेडी सेक्रेटरी और एयर कंडीशंड आफिस को मेंटेन करना जो मैं नहीं कर सकता इसलिए अज्ञानी हुआ लेकिन नुकसान बबुए मामाजी के बेटे विवेक का हुआ जिनसे शोभा/कमलेश बाबू चिढ़ते हैं। )

1962 मे जब नानाजी दिल्ली से मौसी के पास से लौटते मे बरेली हम लोगों के पास मिलने हेतु रुके थे तब तक बाबूजी को सिलीगुड़ी ज्वाइन करने के आर्डर आ चुके थे। नानाजी ने बाबूजी से पूछा था कि वह नान फेमिली स्टेशन होने के कारण ये लोग कहाँ रहेंगे?कहाँ पढ़ेंगे?तो बाबू जी ने बउआ से सलाह किए बगैर ही तुरंत कह दिया था कि आपके पास तब वह चुप रह गए थे। अतः सब सामान व हम लोगों को शाहजहाँपुर छोड़ कर बाबूजी सिलीगुड़ी चले गए थे। नवंबर के महीने मे स्कूलों मे दाखिला कैसे होता?कभी नानाजी के घर मे खाना बनाने वाली मिसराईंन के बड़े बेटे बड़े अधिकारी हो गए थे और उन्होने तलुआ ,बहादुरगंज मे 'विश्वनाथ जूनियर हाई स्कूल' की स्थापना की थी उनके छोटे भाई उसके प्रबन्धक थे उनसे नाना जी ने हम लोगों की समस्या बताई जिनके कहने पर अजय व मेरा दाखिला उस स्कूल मे  हो सका। 1963 मे बउआ व शोभा बाबूजी के पास सिलीगुड़ी चले गए क्योंकि शोभा का एडमीशन नाना जी ने नहीं करवाया था। दोनों भाई नानाजी के पास रहे। नाना जी हम दोनों भाइयों को उसी प्रकार रखते थे जिस प्रकार हमारी माँ जिन्हे  हम लोग बउआ कहते थे।अजय कभी -कभी लाउड स्पीकर पर बज रहे गानों को गुंनगुनाता रहता था। एक बार वह ऐसे ही दोहरा रहा था-"जो वादा किया वह निभाना पड़ेगा" ;नाना जी ने सुन कर  कहा कि "निभा तो रहे हैं"। उनका आशय हम लोगों को रखने से था,हालांकि हम लोगों को तो उन्हे मजबूरी मे  रखना पड़ा था। 1964 मे हम लोग भी सिलीगुड़ी चले गए थे तब नाना जी लखनऊ आए थे  हम लोगों को छोडने /विदा करने। जिस दिन की हम लोगों की ट्रेन थी उस दिन नेहरू जी का दिल्ली मे अंतिम संस्कार था और लखनऊ मे बस आदि परिवहन  सब चलना बंद था अतः किसी प्रकार भुआ के घर सप्रू मार्ग से हम लोग तो चारबाग पहुंचे ही वह लोग स्टेशन तक पहुँचाने  नहीं गए। तब मामाजी ने मोपेड़ ली हुई थी उस पर ही पहली बार नानाजी उनके साथ बैठ कर स्टेशन तक गए जबकि वह उस पर नहीं बैठते थे। ट्रेफिक के कारण ही माईंजी भी स्टेशन तक न आ सकीं। 

1967 मे बाबूजी का तबादला यू पी की ओर तो एनाउंस हो गया था स्टेशन डिक्लेयर होना व रिलीव होना बाकी था। सितंबर मे बाबूजी ने बउआ के साथ हम लोगों को एक बार फिर शाहजहाँपुर नानाजी के पास भेज दिया। इतना लंबा सफर पहली बार बउआ ने अकेले हम लोगों व सामान के साथ किया जबकि इससे पहले वह लखनऊ या बरेली से भी शाहजहाँपुर अकेले नहीं गई थीं। लखनऊ मे छोटी लाईन से बड़ी की गाड़ी बदलते हुये हम लोग शाम को 5 बजे के लगभग शाहजहाँपुर पहुंचे थे। फिर बीच मे दाखिले की समस्या थी क्योंकि कोई भी स्कूल/कालेज उस समय प्रवेश नहीं लेता है। हाथी गोदाम स्थित आर्य कन्या पाठशाला मे शोभा को दाखिल कराने मे तो नानाजी को दिक्कत नहीं आई क्योंकि प्रबन्धक  तिनकू लाल वर्मा जी उनके पूर्व परिचित थे।  अजय और मेरा दाखिला कराने हेतु नानाजी ने किन्ही माथुर साहब से बात की जो सरदार पटेल हिन्दू इंटर कालेज मे वाईस प्रिंसिपल थे। उन्होने प्रिंसिपल टंडन जी से सिफ़ारिश नहीं की केवल उनके सामने ले जाकर खड़ा कर दिया और उन्होने मिड सेशन मे दाखिला करने से मना कर दिया। 

GF(गांधी फैजाम) कालेज के प्रिंसिपल चौधरी मोहम्मद वसी साहब  से नाना जी मुझे ले जाकर अकेले ही मिले तो उन्होने खुशी-खुशी मेरा दाखिला मेरे मन पसंद विषयों मे  कक्षा 11 मे कर लिया। इसके बाद अजय को ले कर मिशन स्कूल के प्राचार्य से नाना जी मिले तो उन्होने भी कक्षा 9 मे अजय को साईन्स विषय मे दाखिल कर लिया(जिस  विद्यालय मे क्रांतिकारी राम प्रसाद 'बिस्मिल' जी भी पढे थे)। 

पहले भी जब हम लोग नाना जी के पास थे उनके साथ सार्वजनिक सभाओं मे नेताओं के भाषण सुनने जाते थे जब बउआ सिलीगुड़ी मे थीं तो अजय भी जाते थे वरना वह नहीं जाते थे। नाना जी प्रत्येक पार्टी के नेता की सभा ज़रूर सुनते थे भले ही वह खुद 'जनसंघ' समर्थक थे। डॉ राम मनोहर लोहिया की सभा भी हमने नाना जी के साथ टाउन हाल मे सुनी थी। लोहिया जी की खास बात "जैसे यह मालूम होते हुये भी कि कूड़ा फिर आएगा,रोज़ झाड़ू लगाते हैं उसी प्रकार सरकारों को भी बुहारते रहना चाहिए" मुझे आज भी याद है बाकी बातें याद नहीं हैं। एस एम बनर्जी साहब की सभा भी हमने नानाजी के साथ सुनी थी जो लाल झंडे लगा कर हुई थी जबकि वह तो कानपुर से निर्दलीय सांसद थे। यू पी मे तब मंत्री और जनसंघ नेता परमेश्वर (या बरमेश्वर )पांडे की सभा भी नाना जी के साथ सुनने गए थे। 

बबुए मामा जी अपनी आर्डिनेंस क्लोदिग फ़ेक्टरी स्थित मंदिर कमेटी मे कुछ पदाधिकारी थे वह जालंधर के संत श्याम जी पाराशर को प्रवचनों हेतु बुलवाया करते थे। जितने दिन प्रवचन चले मैं नाना जी के साथ सुनने जाता रहा। मेरे इसी ब्लाग मे लिखे लेख-'रावण वध एक पूर्व निर्धारित योजना','सीता का विद्रोह','राष्ट्र वादी केकेयी' का स्त्रोत संत श्याम जी पाराशर के प्रवचन ही हैं। उनकी चार पुस्तकें भी नाना जी के पास पढ़ी थीं जो बाद मे दीमक लग जाने के कारण माईंजी ने सब किताबों के साथ फेंक दी।मांगने की आदत न होने के कारण ही बउआ ने नहीं मांगी वरना उन्हें किताबें फिंकने का बहुत अफसोस रहा क्योंकि एक तो उनके पिताजी की किताबें थीं दूसरे मुझे किताबें ही पढ़ने का तो शौक है। 

1973 मे मैं लखनऊ एल आई सी की एक परीक्षा देने आया था जबकि सारू स्मेल्टिंग मे जाब कर रहा था। मामाजी के बादशाहबाग वाले यूनीवर्सिटी बंगले पर ही आया था। माईंजी ने पहचान लिया था लेकिन मामाजी ने नहीं पहचाना था। सप्रू मार्ग मिलने गया था तो फूफाजी ने पहचान लिया था और भुआ ने भी नहीं पहचाना था। लौटते मे मामा जी -माईंजी मुझे सिटी बस पर छोडने आई टी कालेज चौराहे तक आए थे। तब चारबाग तक कुल 50 पैसे का टिकट था मैं लखनऊ मेल से चल कर रात मे शाहजहाँपुर पहुंचा था ,स्टेशन से पटरी-पटरी के सहारे चल कर भारद्वाज कालोनी आ गया था तब तक कोई दिक्कत नहीं थी अब तो ऐसा करना जुर्म है। लगभग एक बजे नाना जी का दरवाजा खटखटाया और उनके  कौन पूछने पर मैंने कहा नानाजी दरवाजा खोलिए तो तुरंत नानाजी ने मेरा नाम पुकार कर कहा अभी खोल रहे हैं। नाना जी ने केवल मेरी आवाज़ पर ही मुझे पहचान लिया था। बगल के घर मे नानाजी के दो भाई रहते थे उनमे से एक जिनको हम लोग बंबई वाले नाना जी कहते थे उधर से बोले कौन है दादा ऐसे दरवाजा न खोलिएगा इतनी रात मे कोई दूसरा भी आवाज़ बदल कर धोखा दे सकता है। चूंकि मेरे वहाँ पहुँचने की कोई सूचना नहीं थी इसलिए उनका ख्याल भी गलत नहीं था किन्तु हमारे नाना जी ने अपने भाई से मेरा नाम लेकर  कह दिया कि वह लखनऊ से मेरठ जा रहा था यहाँ मुझे लेने आया है। बउआ से मैंने नानाजी से मिलते हुये आने की बात कही थी साथ उनको लाने की नहीं किन्तु उनकी बात रखते हुये उनसे  साथ चलने को औपचारिक रूप से कहा  और यह मेरा खुद का किया पहला फैसला था जिसमे बाबूजी या बउआ से राय लेने का अवसर भी न था। 

बरेली और हापुड़ मे गाडियाँ बदलते हुये जब हम मेरठ घर पहुंचे तो बउआ भी नानाजी को साथ देख कर आश्चर्य चकित हो गई। नानाजी ने उनसे भी यही कहा यह हमे भी ले आया। यह  मिलेटरी क्वार्टर  कैंट स्टेशन के प्लेट फार्म की सीध मे ही आगे था। कुछ दिन रह कर नाना जी फिर दिल्ली मौसी से मिलने चले गए और लौटते मे दोबारा यहाँ होते जाने की बात कही थी। इससे पूर्व जब महेश नानाजी के बेटे विजय मामा जी की शादी मे नाना जी रुड़की रोड वाले क्वार्टर मे आए थे तब मेरे लिए दो होम्योपैथी किताबे लाकर दे गए थे कि अब अपने पास रख कर क्या करेंगे तुम स्तेमाल करना। दिल्ली मे मौसी की तबीयत ज़्यादा खराब थी और उन्होने अपने पास नानाजी से 15 दिन रुकने का आग्रह किया अतः वह अपना सामान लेने दो रोज़ को फिर मेरठ आए और लौटते मे एक होम्योपैथी किताब गोपाल (जो अब जीवित नहीं हैं) को देने हेतु ले गए कि वह इससे देख कर मौसी को दवा दे सकेगा। फिर नानाजी दिल्ली से ही सीधे शाहजहाँपुर लौट गए। 

दिसंबर 1974 मे आगरा मे अजय का एक्सीडेंट होने के बाद 1975 मे शुरू मे नाना जी वहाँ गए थे तब मैं मेरठ से वहाँ पहुंचा था। उस वक्त कुछ दिन नानाजी के साथ रहना हुआ था। सितंबर 1977 मे मामाजी के निधन के बाद चार दिन लखनऊ मे उनके साथ और रहे थे। 1978 मे आगरा मे जब हमने अपना मकान लिया तब तक नानाजी का स्वास्थ्य सफर करने लायक नहीं रह गया था। अक्तूबर मे बाबूजी और बउआ उनके द्वारा आँखों का आपरेशन करवाने पर शाहजहाँपुर गए थे। 27 मार्च 1979 को नानाजी ने यह शरीर इस संसार से छोड़ दिया। वस्तुतः मौसी के बाद मामाजी का भी निधन हो जाने से नानाजी को ज़बरदस्त मानसिक आघात लगा था और वह शारीरिक दृष्टि से भी क्षीण हो गए थे मैं उनकी बीमारी मे उनको देखने नहीं जा पाया था उनके निधन के बाद भी बउआ व बाबूजी ही गए थे। 

हालांकि राजनीतिक रूप से मेरी विचार धारा नानाजी की राजनीतिक विचार धारा से 180 डिग्री के अंतर पर है और वह भी उनके सान्निध्य से पढ़ी हुई पुस्तकों के आधार पर ही किन्तु उनका अन्य दूसरे मामलों मे व्यापक प्रभाव मैं खुद मे महसूस करता हूँ । नाना जी की ईमानदारी, सत्य बोलने की प्रवृत्ति,किसी के आगे न झुकने और न दबने की आदत ,दूसरों का ज़्यादा से ज़्यादा भला करने की चाहत एवं प्रयास आदि कुछ सिद्धान्त मैंने नानाजी से ही ग्रहण किए हैं और चूंकि बउआ व बाबूजी भी इन सिद्धांतों को मानते तथा इन पर ही चलते थे अतः मुझे इन बातों  को अपनाने से कभी रोका नहीं।

आज हमारे नानाजी को यह संसार छोड़े हुये 34 वर्ष पूर्ण हो गए हैं परंतु उनके साथ बिताया गया समय और उनकी बातें अभी कल ही की लगती हैं और उनसे हमे आगे भी प्रेरणा मिलती रहेगी। आज की होली पर हम अपने नानाजी की आत्मा की शांति की परमात्मा से प्रार्थना करते हैं।





 

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शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

आगरा/1986-87(भाग-6)

मेरे सामने नाभा मे जिक्र था कि वे लोग आर्य समाज से हवन जल्दी कराएंगे क्योंकि दोनों लोग को ड्यूटियाँ ज्वाइन करनी है। उस अनुसार हमारे बाबूजी उनके टूंडला निवास पर शोक प्रकट करने हेतु गए परंतु वहाँ कोई नहीं लौटा था ,पता चला कि 13 वी करके लौटेंगे। पोंगा-पंडितवाद लोगों के दिमाग मे बुरी तरह घुसा हुआ है और समाज को खोखला कर रहा है। पढे-लिखे लोग भी समझने को तैयार नहीं होते यही देश और समाज के पतन का कारण है।

जब वे लोग टूंडला लौटे तो उन्हीं के साथ  शालिनी भी यशवन्त को लेकर वहाँ पहुँच गईं। कुछ दिन माँ के साथ और रहने की इच्छा व्यक्त की थी अतः वहाँ रहने दिया। दिसंबर के आखिर तक मथुरा मे नरेंद्र चाचा (बाबूजी के चचेरे भाई जो वहाँ डेंटल सर्जन हैं) के यहाँ रह कर और वृन्दावन घूमते हुये भुआ -फूफा जी हमारे घर आए। उन लोगों की इच्छा शालिनी और यशवन्त से मिलने की थी। बउआ वैसे तो इन लोगों को मकर संक्रांति पर बुलाने का इरादा रखती थीं। परंतु भुआ का लिहाज करते हुये मै टूंडला जाकर बुला लाया। भुआ ने आते ही शालिनी को वृन्दावन का प्रशाद दे दिया और उनके पिता के निधन की बाबत कोई शोक नहीं व्यक्त किया जो शालिनी को तीखा चुभा। उन्होने प्रशाद छिपा कर रख दिया और खाया नहीं। भुआ से तो नहीं परंतु मुझ से कहा क्या भुआ जी ने उनके मरने के लिए प्रशाद बोला था? मैंने यह बात बउआ-बाबूजी तक पहुंचा दी किन्तु भुआ से किसी ने कुछ नहीं कहा।

भुआ की हद तो तब हुयी जब उन्होने हमारे सामने ही हमारे माता-पिता को भड़काते हुये कहा कि यह मकान विजय का कैसे हुआ?जब उन्हें उन लोगों ने बताया कि उसने (मैंने) अपने बचत के पैसों से सिक्यूरिटी जमा करके लिया और अब भी अपने ही पैसों से किश्तें जमा कर रहा है तो भुआ की गणित सामने आई कि तुमने (मेरे बाबूजी ने)पढ़ाई मे पैसा खर्च किया था अतः यह मकान तुम्हारा हुआ और इसमे तीनों बच्चो का हिस्सा लगाना चाहिए था;विजय को अपने नाम करने दे कर गलती की। बाबूजी ने बड़ी बहन की बातें चुप-चाप सुन ली और उन पर कान नहीं धरा। बाबूजी ने बहन से तो नहीं कहा परंतु हकीकत तो थी ही कि मैंने तो बी ए तक पढ़ कर छोड़ दिया,अजय ने 3 वर्षीय डिप्लोमा कोर्स को 6 साल मे पूर्ण किया उस पर भी तो खर्च हुआ था और 12 वी तक शोभा पर भी तब केवल विजय पर पढ़ाई का खर्च करने से उसके पैसे पर दूसरे बहन भाई का अधिकार कैसे हो सकता है?भुआ की भूमिका फूट डलावा, आग-लगावा की थी। भुआ ने अपने से बड़े  एक दूसरे भाई के खिलाफ दरियाबाद मे पैतृक संपत्ति का मुकदमा लंबे समय तक लड़ा और फूफा जी की तमाम तंख्वाह तबाह करा दी। पोस्टमैन को खरीद कर उनके सम्मन गायब करा कर एक्स पार्टी केस जीत लिया और लाखेश भाई साहब के डी आई जी दोस्त के मार्फत खेतों  पर कब्जा कर लिया।

हमारे घर से भुआ -फूफा जी कानपुर तूफान एक्स्प्रेस से लौटे पहुँचते-पहुँचते वहाँ अंधेरा हो गया था। गाड़ी मे भीड़ अधिक थी ,कुली आ नहीं पाया और वे दोनों उतर गए एवं उनका सामान आगे गाड़ी मे चला गया। दिल्ली तक लिखा-पढ़ी कर लिए कुछ भी वापिस न मिला। शालिनी को बेहद प्रसन्ता हुयी क्योंकि पिता के निधन के बाद आने पर उन्हे भुआ ने परशाद भेंट किया था और मकान को विवादित बनाने की कुचेष्टा की थी। भुआ को अपनी काली करतूतों की सजा परमात्मा से मिल गई थी किन्तु आदत नहीं बदली। पहले कभी बाबा जी के साथ रामेश्वरम गईं थीं ,फूफा जी नहीं गए थे। लौटते मे रात्री मे मैदान मे मूत्र विसर्जन हेतु गईं और खुले पड़े डी सी बिजली के तारों से छू गईं -करेंट ने उन्हें दूर फेंक दिया था और उनके दायें हाथ की हड्डी कोहनी से कलाई तक टूट गई थी। बकरे की हड्डी डलवाने के बावजूद वह हाथ निष्क्रिय रहा। फूफाजी और उनके बच्चे खाना बनाने तक का काम करते थे। खुद भुआ नहाने-धोने तक मोहताज थीं किन्तु हेंकड़ी आसमान पर थी।

हमारी छोटी बहन जी अपनी भुआ से हेंकड़ी मे टक्कर लेती हैं और लाखेश भाई साहब से उनके मधुर संबंध हैं नेल्लोर मे बैठ कर भी जबकि सवा कि मी दूर हमसे रह कर भी संबंध लाखेश भाई साहब ने  नहीं रखना पसंद किया। जैसे भुआ ठोकर खाकर भी नहीं सुधरती थीं वैसे ही डा शोभा भी सुधर नहीं सकतीं आखिर वह हिन्दी और संस्कृत मे एम ए ,संस्कृत मे पी एच डी ,बी एड जो सुसराल जाकर हो गई हैं। भुआ के तो नौ सगे भतीजे थे इसलिए जिन के खिलाफ थी उनमे मेरा नाम प्रमुख था क्योंकि मैंने छब्बीस वर्ष की उम्र मे अपना मकान हासिल कर लिया और फूफाजी रिटायरमेंट तक न बना सके। डा शोभा का तो संभवतः  एक ही भतीजा यशवन्त और शायद एक ही भतीजी अनुमिता (अजय की पुत्री) है परंतु वह उनके खिलाफ हैं। फूफा जी (नृत्य बिहारी लाल) की भांति ही बहनोयी साहब (कमलेश बिहारी) भी सुसराल की संपत्ति पर निगाह रखते हैं। 1975 मे शादी के बाद 1976 मे उन्होने (जैसा तब शोभा ने बउआ को बताया और उन्होने मुझे) शोभा से कहा था कि बाबूजी दरियाबाद मे अपना हिस्सा मांग लें ,शोभा के यह पूछने पर कि वे दोनों (मै और अजय) तो देखने जाएँगे नहीं तो कौन देखेगा?उन्होने बी एच ई एल  ,हरद्वार की अपनी मेषीनिस्ट की पोस्ट छोड़ कर हमारे बाबूजी के बिहाफ पर देखने की बात कही थी। परंतु बाबू जी ने उनकी बात पर गौर नहीं किया। मैं भी उनकी इस बात से सहमत नहीं था। अतः उन्होने मेरे विरुद्ध मन मे गांठ बांध ली और जब मौका पड़ा मुझे नीचा दिखाने और नुकसान पहुंचाने का कृत करते रहे जिसे मै तब तक न समझ सका जब तक उन्हीं की छोटी बिटिया ने यह खुलासा नहीं कर दिया कि,शालिनी के बड़े भाई कुक्कू की पत्नी मधु उनकी भतीजी हैं और कुक्कू उनके बहौत अच्छे दोस्त रहे हैं। जब इस बात का जिक्र अभी उनके अपनी भतीजी की शादी मे आने के अवसर   पर मेरे घर आने पर किया तो खीसे निपोरते रह गए । अब प्रतीत होता है कि कुक्कू को हमारे ज्योतिषीय सलाहकार का पता बता कर उन्हें खरीद कर हम लोगों को गुमराह करने का सुझाव कमलेश बाबू का ही रहा होगा। उन पंडित जी ने 14 गुण को 28 बता कर जन्म पत्री मिला दी थी और जब भेद खुलने पर मैंने उनसे सवाल उठाया तो उन्होने मेरे बाबूजी की इच्छा बता दिया जबकि बाबूजी कोई भी जन्म पत्री मिलवाने कभी नहीं गए मुझे ही भेजते थे। मुझसे फरेब मेरे अपने रिशतेदारों के सुझाव पर उन्होने किया था।

यह ब्लाग मेरे जीवन के संघर्षों की कहानी सार्वजनिक करने हेतु मैंने शुरू किया है परंतु एक  काबिल ब्लागर् का  मत है कि निजी बातों को सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए। जबकि वही ब्लागर महोदय अपने परिवार तथा मित्रों से संबन्धित जांनकारी सचित्र अपने ब्लाग पर देते रहते हैं। 'पर उपदेश कुशल बहुतेरे' हमारे देश की पुरानी रीति है पैसे वालों  के लिए सब छूट किन्तु कोई निर्धन उनकी बराबरी मे कैसे आ सकता है? मैंने ब्लाग लेखन को 'स्वांतः सुखाय,सर्वजन हिताय 'घोषित किया है उसका भी उन्होने अपने ब्लाग पर उपहास किया है। प्रत्येक का लेखन उसके अपने हिसाब से होता है और उससे औरों का सहमत होना आवश्यक नहीं होता है। परंतु किसी एक को दूसरे को हिदायत देने का अधिकार भी नहीं बंनता है। किन्तु मेरे ब्लाग्स पर कुछ धनवान ब्लागर्स हिदायत यदा-कदा देते रहते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि हमारी ही छोटी भांजी  ने फेक आई डी से जो कुचक्र रचा है यह भी उसी का एक हिस्सा होगा।


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गुरुवार, 22 सितंबर 2011

आगरा/1986-87 (भाग-4)/लखनऊ-कानपुर यात्रा

शायद 27 सितंबर 1987 को मामाजी के सबसे छोटे बेटे शेष की शादी थी। अपने स्वास्थ्य के कारण बउआ का और उनके कारण बाबूजी का जाना संभव न था,भुआ ने हम लोगों को कानपुर आने को कहा था और मै अपनी तरफ से सबसे मेल-जोल व रिश्ता रखना चाहता था/हूँ। अतः 26 ता की रात को अवध एक्स्प्रेस से चल कर 27 को लखनऊ पहुंचा। अब माईंजी न्यू हैदराबाद मे यूनिवर्सिटी बंगले से लौट कर रहने नहीं गईं थी,नई कालोनी रवीन्द्र पल्ली मे थीं। चारबाग से हजरतगंज आकर दूसरे टेम्पो से  रवीन्द्र पल्ली पहुंचे और उनके घर पहुँचने के लिए रिक्शा किया जैसा कि नई कालोनियों मे होता है कोई उनके घर के न . B-2,सविता सदन,गोखले विहार मार्ग की लोकेशन बताने की स्थिति मे न था। माई जी के छोटे भाई हरीश माथुर साहब कहीं से लौट रहे थे मैंने उन्हें पहचान कर आवाज दी -हरीश मामाजी ,देख कर वह पहचान गए और उनके साथ घर पहुँच गए। तब तक सब लोग नाश्ता कर चुके थे और शादी के लिए लिए गए कम्यूनिटी हाल(संस्कार,B-1/15,'E'पार्क ,मंदिर मार्ग,महानगर एक्सटेंशन) चलने की तैयारी मे थे। माई जी ने हम लोगों को नाश्ता देकर कहा तुम्हारा साथ कोई नहीं देगा सब कर चुके हैं। यों अकेले-अकेले गड़पने की आदत हमारी नहीं है,शुगन भर का चख लिया और उल्टे पैरों फिर चलने के लिए तैयार हो गए। वहाँ लोगों को पहुंचा दिया गया था और खाने-पीने का सब सामान घर से सबसे आखीर मे आया ,लिहाजा खाना बेहद देर से बना हलवाई खाली बैठा-बैठा शोर मचाता रहा वह बिना समान के करता क्या?माईजी बोलीं हमने कहा था तुमने वहाँ नाश्ता नहीं किया अब हम यहाँ क्या करें भूखे तो होगे?हम यशवन्त हेतु जो रस्क आदि आगरा से लाये थे वह उसे तथा दूसरे छोटे बच्चों को दे दिये गए और लाया गया सारा स्टाक तत्काल खत्म हो गया। खाना 3-4 बजे तक हुआ।

वहाँ राजन मामाजी , रंजना मौसी ,मंजु मौसी, (तीनों बउआ के छोटे चाचा के बच्चे) कमल मौसी(बउआ  के विश्वनाथ चाचा की बेटी) आदि भी मिले थे। गोपाल मामा जी  (बउआ के फुफेरे भाई) से भी काफी लंबे समय बाद मुलाक़ात हुयी।  शायद यह शेष की लव मैरेज थी ।

वहाँ माईं जी की एक बहन मनोरमा मौसी भी आयीं थी जो तब विधवा हो चुकी थीं और  उनकी आर्थिक स्थिति भी बदल चुकी थी उनके प्रति माईं जी का व्यवहार अब उपेक्षा भरा था। जबकि न्यू हैदराबाद मे 196 0 के लगभग जब वह आयीं थीं तो उनका तथा मौसा जी का मामा जी एवं माईं जी ने गरम जोशी से स्वागत किया था। तब वह मुरादाबाद मे बर्तनों के सफल व्यापारी थे। आर्थिक ,सामाजिक स्थिति बदलते ही पारिवारिक रिश्तों मे यह परिवर्तन लगा तो अटपटा ही परंतु अब सभी जगह ऐसा ही दिख रहा है। जहां माईं जी अपने अमीर रिशतेदारों को अपने प्रबंध से चारबाग से बुला और विदा के समय भेज रहीं थीं वहीं इन मनोरमा मौसी को  आना और जाना अपने माध्यम से रिक्शा द्वारा तय करना पड़ा।

माईं जी के बाद वाली उनकी बहन सरोज मौसी और राजेन्द्र बहादुर मौसा जी की आव-भगत ज्यादा थी। डा आर बी श्रीवास्तव साहब तब सोमैया आर्गेनिक ,बाराबंकी मे उच्च अधिकारी थे। उन्हीं ने बताया था कि,पद्मा शंकर पांडे को विनोद दीक्षित के स्थानांतरित होते ही हटा दिया गया था।

बउआ ने शेष के लिए थ्री पीस सूट भिजवाया था उसका जिक्र माईं जी ने किसी से नहीं किया जबकि उनके पीहर वाले जो लाये थे उनका खूब बखान सब से कर रही थीं। वैसे उनके यहाँ सुबह 09 बजे नाश्ता और दोपहर  एक बजे खाना ,04 बजे चाय,रात 09 बजे खाना समय से चला। सुबह नाश्ते के समय मामा जी के चित्र पर हलवा ,जलेबी आदि माईं जी रखवाती थीं ,अक्सर यशवन्त उनमे से कुछ न कुछ उठा लेता था और खा लेता था। वहाँ भी इस पर किसी को ऐतराज नहीं था और बउआ ने भी इसे उसकी अच्छी आदत ही माना ।

तीसरे दिन दोपहर  मे हम कानपुर भुआ के यहाँ जाने के लिए उनके यहाँ से चल दिये। सुबह का नाश्ता करके चले थे और चारबाग मे पेसेंजर गाड़ी काफी देर से मिली थी। गाड़ी मे भीड़ भी थी। वैसे हमने यशवन्त को प्लेटफार्म पर केले खिला दिये थे और किसी दूसरे से न लेने की उसकी आदत भी घर की परंपरा के अनुसार डाली हुयी थी। एक वृद्ध सज्जन जिनकी पत्नी बुर्का पहने थीं भी कानपुर जा रहे थे। उन्होने हमसे थोड़ी जगह उनके लिए एडजस्ट करने को कहा ,हमने यशवन्त को गोदी मे बैठा लिया और उन दोनों को जगह उपलब्ध करा दी। यशवन्त के यह पूछने पर कि ये कौन हैं,उनकी आयु को देखते हुये उसे बताया कि ये बाबाजी-अम्मा जी हैं। इस बात पर वे लोग खुश हुये। आगे एक जगह उन लोगों ने केले खरीदे तो यशवन्त को भी देने लगे और 04 वर्षीय बच्चे द्वारा लेने से इंकार करने पर उन्हें अटपटा लगा। वह बोले हम तो बाबा जी हैं हमसे क्यों नहीं ले रहे हो तब हम लोगों ने भी उससे लेने को कह दिया तभी उसने उनसे लेकर केला खाया। उन्हें हमने स्पष्ट किया कि यह उनके लिए नहीं कुल मिला कर इस लिए उसकी आदत हमारे माता-पिता ने डाली है कि आज के युग मे सब का भरोसा नहीं किया जा सकता। इस बात से उन्होने भी सहमति जतलायी।

शाम तक भुआ के घर कानपुर पहुंचे। खाना तो रात को ही हुआ। बउआ ने कहा था अगर माईं जी शादी का पकवान भेजें तो भुआ से कहना कि वह थोड़ा उसमे से ले लें ,मुझे अपने हाथ से देने को मना किया था । भुआ ने खुद न निकाल कर मंजु भाभी जी से निकालने को कह दिया जिनहोने सारा का सारा लेकर रख लिया। चलते समय थोड़ा सा भी घर ले जाने को नहीं दिया। बउआ को अपनी नीति के चलते अपने भतीजे की शादी का पकवान न खुद मिला न हम लोगों को चखनेको मिला।

1979 मे एक बार यूनियन के काम से कानपुर गए थे और एक दिन वहाँ रुके थे तब भुआ-फूफा जी भी नहीं थे,लाखेश भाई साहब भी दिल्ली गए हुये थे। अगले दिन मंजू भाभी जी छोटी बेटी स्वाती को डा के पास दिखाने ले गईं ,मुझे भी ले गईं थीं। दवा के रु 10/-देने थे बोलीं अपना पर्स भूल आए है क्या आपके पास रु 10/- हैं?जो सफर मे बाहर निकला हो वह बिलकुल खाली हाथ कैसे निकाल सकता है?मैंने तत्काल एक दस रु का नोट दे दिया। वह बोलीं घर पर मांग लीजिएगा, भला भतीजी की दवा के दस रु भी मांगने वाली बात थी?हमे ऐसे संस्कार हमारे माता-पिता से नहीं मिले थे। हम अपना बैग उठा कर यूनियन दफ्तर होते हुये कानपुर सेंट्रल पहुंचे और केले खाकर लच कर लिया। उस समय हम तो रात की अवध एक्स्प्रेस से जाने के इंतजार मे वेटिंग रूम मे बैठे थे। एक टी टी साहब  आए और उन्होने सुझाव दिया कि यदि वह पहले जाने की गाड़ी का बंदोबस्त कर दें तो क्या हम शाम तक घर नहीं पहुँच जाएंगे। भला स्टेशन के वेटिंग रूम मे बैठने का कोई तुक तो था नहीं। कोई सज्जन इलाहाबाद से कानपुर जाना चाहते थे और उन्हें मजबूरी मे टूंडला तक का टिकट लेना पड़ा था ऐसे ही टिकट को दूसरे अपने साथी से मँगवा कर उन्होने मुझे दे दिया और कुल रु 50/- लिए । टूंडला से बस पकड़ कर 05 बजे तक मै आगरा घर पहुँच गया था।

भुआ और लाखेश भाई साहब का चाय-दूध का बंदोबस्त अलग-अलग था ,खाना एक साथ था। वह नव-रात्र के दिन थे भुआ तो उपवास भी रखती थीं। लाखेश भाई साहब दफ्तर से लौटते मे कुछ अधिक टाफिया लाये और यशवन्त को सौंप कर कहा एक एक कर खाते रहना परंतु उससे मंजू भाभी जी ने वह पेकेट ले लिया एवं एक टाफी पकड़ा दी। उसके बाद उस पेकेट का क्या हुआ?चलने तक खबर न थी। यह भी सुनने मे आया था कि बाद मे जब लाखेश भाई साहब ने कार ले ली थी तो भाभी जी शराब के नशे मे चलते हुये टकरा बैठी थी और रीढ़ मे चोट खा ली थी। शायद सभी अमीर हमेशा ही नशे मे रहते हैं। अच्छा ही है उन लोगों ने रिश्ता नहीं माना वरना एक कि मी दूरी पर रह कर वे हमारा कितना नुसान करने की स्थिति मे होते?

भुआ के यहाँ दो रोज रुके थे। तीसरे दिन चल दिये थे । दूसरे दिन फूफा जी ने अपने दोस्त और शालिनी के फूफाजी के यहाँ मिलने जाने को कहा जो टेलर मास्टर थे। भुआ के यहाँ से नाश्ता करके ही चलना पड़ा और शालिनी के फूफा जी  की आर्थिक स्थिति टफ थी उनकी एक पुत्री रु 600/- की टीचरी करके गुजारा कर रही थीं। अतः उनके घर हम लोगों ने खाना खाना उचित नहीं समझा और भुआ के यहाँ हम लोगों के खाने का बंदोबस्त इसलिए नही हुआ कि शालिनी की भुआ खिलाएँगी। रात को ही खाना हुआ।

उस समय तक जेनरल कम्पार्टमेंट से जाना-आना मुश्किल न था यह जाफ़र शरीफ साहब की मेहरबानी से बहौत बाद मे मुश्किल हुआ है। लिहाजा हम लोग अवध एक्स्प्रेस से जाने के लिए रात का खाना खा कर सेंट्रल प्लेटफार्म पर आ गए। यशवन्त गोदी मे था और एक बेंच पर दो मोटे-मोटे लोग पसार कर आराम से बैठे थे। मैंने शालिनी से कहा उस बेंच पर बच्चे को लेकर बैठ जाओ परंतु उनकी हिम्मत उन लोगों से कहने की नहीं हुयी तो मुझे ही कहना पड़ा। बाद मे यह पता चलने पर कि हम लोग भी कमला नगर ,आगरा मे ही रहते हैं और उनका एवं हमारा घर आगे-पीछे की रो मे ही है तब उन लोगों ने मुझे भी बैठा लिया। वस्तुतः वहाँ उनके पुत्र रहते थे और यह साहब कहीं जज साहब के पी ए थे। बाद मे कल्याण सिंह की बिरादरी का होने के कारण तथा पूर्व मे ही वकालत पास होने के कारण यह खुद भी जज बन गए और जब रिटायरमेंट के बाद कालोनी मे रहने आए तो सब इन्हें जज साहब के रूप मे ही जानने लगे,किसी को पता ही नहीं है कि उनके प्रोमोशन का राज ?उन्हें तो संगम एक्स्प्रेस से टूंडला तक जाना था उनकी गाड़ी पहले आ गई और वह पहले चले गए। हमारी गाड़ी आने पर हम लोग भी चल दिये। हम तो आगरा फोर्ट पर उतरे उन्हें टूंडला से जीप से आना पड़ा होगा।

कुल मिला कर यह यात्रा खर्च करने के बाद भी खुश न करने वाली रही। ........





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सोमवार, 12 सितंबर 2011

आगरा /1986-87(भाग-3)-एपसो,कानपुर

आगरा से जो लोग चले थे उनमे एक बालेश्वर जी कांग्रेस के थे,एक शुक्ला जी भी हमारी पार्टी के नहीं थे। हम कम्यूनिस्ट पार्टी के लोगों मे डा महेश चंद्र शर्मा,डा जितेंद्र रघुवंशी (के एम मुंशी विद्यापीठ,आगरा के विदेशी भाषा विभाग के अध्यक्ष और रूसी भाषा के शिक्षक),का नेमीचन्द,का एम पी दीक्षित (यह कानपुर के ही थे),मै और शायद एक दो लोग और। दो-दो लोग एक-एक रिक्शा मे बैठ कर ठहराव स्थल पहुंचे। मेरे साथ का नेमिचन्द बैठे थे वह पेशे से जूता डिजाइनर थे ,मुझसे वह समृद्ध थे परंतु मैंने रिक्शा के पैसे दिये थे। पूरे प्रदेश के लोग वहाँ थे काफी भीड़ थी और नहाना संभव न था। जूलाई या अगस्त का महीना था और बिना नहाये ही कान्फरेंस मे शामिल होना पड़ा। नाश्ता वहाँ से कर् के चैंबर आफ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज के हाल पहुंचे।

अब उस कान्फरेंस की हू- ब -हू बातें याद नहीं हैं। का रमेश सिन्हा जो तब दूसरी कम्यूनिस्ट पार्टी मे थे इस संगठन के प्रधान के पद से मुक्त होना चाहते थे। का आर एन मिश्रा शायद महासचिव थे। लखनऊ से आने वालों मे उस समय के जिला मंत्री (जो बाद मे प्रदेश सचिव भी रहे और अब राष्ट्रीय परिषद के सदस्य हैं)का अशोक मिश्रा ,एवं लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष का अतुल 'अंजान'(जो बाद मे प्रादेशिक नेता रहे और अब राष्ट्रीय सचिव मण्डल के सदस्य हैं) का मुझे ध्यान है। एक वकील साहब मैनपुरी के थे जिनकी पत्नी का उर्मिला राजपूत शायद 6 0-70 महिलाओं का जत्था ले कर आयीं थीं शायद वह अब भाजपा मे हैं,कल्याण सिंह के जमाने मे जातिवाद के कारण चली गईं होंगी।

समारोह मे डा हेमलता स्वरूप (आचार्य नरेंद्र देव महाविद्यालय की तत्कालीन प्राचार्या और पूर्व कुलपति कानपुर विश्वविद्यालय) की भी शायद महत्वपूर्ण भूमिका थी। उनके पुत्र का अरविंद राज स्वरूप भी काफी सक्रिय थे और का हरबंश सिंह को भी दौड़-धूप करते देखा गया था।

दिन-रात का भोजन ठहराव -स्थल पर ही था। अगले दिन चुनाव भी हुआ। का अशोक मिश्रा जी को किसी महत्वपूर्ण पद पर का सिन्हा ने प्रस्तावित किया था जिसे उन्होने स्वीकार कर लिया था परंतु का अतुल 'अंजान' ने पहले पद लेने से इंकार किया था। परंतु बड़े नेताओं के आग्रह पर बाद मे मान गए थे। इस दिन कान्फरेंस कुछ जल्दी समाप्त हो गई थी और लौटने की गाड़ी रात की थी। हालांकि चलते समय मै भुआ के घर का पता बाबूजी से लेना भूल गया था परंतु पहले घर का उनका पता मालूम था। डा शर्मा जी से अनुमति लेकर मै भुआ के घर के लिए चला उनके पहले वाले मकान मालिक शरीफ थे और उन्होने नया पता दे दिया -111/4,हर्ष नगर,इंजीनियर्स पेट्रोल पंप के सामने । भुआ-फूफाजी तो थे ही लाखेश भाई साहब -भाभी जी उनकी बेटियाँ-वर्षा,स्वाती सभी मिले। (यह वही लाखेश भाई साहब हैं जो अब हमारे घर से सवा किलो मीटर की दूरी पर हैं परंतु संपर्क नहीं रखना चाहते)। उस समय लाखेश भाई साहब ने खाना जबर्दस्ती खिलवाया और अपने स्कूटर से मुझे ठहराव-स्थल पर पहुंचा दिया। वहाँ साथी का ने मेरे खाने का भी प्रबंध रख छोड़ा था जब की उस दिन रात का खाना जल्दी दे दिया गया था। मै दोबारा तो खा नहीं सकता था परंतु साथियों की बात रखने के लिए मीठा ले लिया था।

भुआ-फूफा जी ने शालिनी और यशवन्त को भी लेकर आने को कहा था। और इत्तिफ़ाक से सितंबर मे मामा जी के छोटे बेटे शेष की शादी मे लखनऊ आना हुआ तब लौटते मे कानपुर भुआ के घर उन लोगों को लेकर गए थे। ब्यौरा अगली बार.....







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