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रविवार, 23 अप्रैल 2017

यादों के तहखाने से ( भाग - 2 ) ------ विजय राजबली माथुर

****** " मुझे खेलों में भाग लेने का शौक नहीं था। लेकिन मुझे अपनी कक्षा के एक पहलवान टाईप सहपाठी जिसके पिताश्री पुजारी / कथावाचक थे का हमेशा कबड्डी में आउट न होना अखरता था। सुना था कि, वह रोजाना भगवा झंडे के साथ लगने  वाली शाखा में भाग लिया करता था। उसको सबक सिखाने के लिहाज से एक रोज़ मैंने उसकी विरोधी टीम में कबड्डी खेलने की इच्छा व्यक्त कर दी , ...........................उनको इस बात की खुशी थी कि, पढ़ाई में अनाड़ी छात्र ( जिसे अक्सर बेंच पर पूरे क्लास वह दंड स्वरूप खड़ा करते थे ) को खेल में भी चाहे एक ही बार सही उस छात्र ने परास्त कर दिया जिसे वह सराहते थे और जिससे अक्सर पाठ का वाचन करवाते थे। 
चूंकि पढ़ाई में फिसड्डी होने के कारण वह हम लोगों से मदद लेता था इसलिए अपनी हार पर भी प्रतिशोध उसने नहीं माना था। " ******

पचपन वर्ष पीछे 1962 में लौटते हैं तो ध्यान आता है कि, चीन के हमले के बाद जब बाबूजी का ट्रांसफर बरेली से सिलीगुड़ी हो गया था तब भी बीच सत्र में हम लोगों को दाखिले की समस्या का सामना करना पड़ा था वजह यह थी कि, बाबू जी का ट्रांसफर जहां हुआ वहाँ हम लोग नहीं गए थे । तब भी हम लोग शाहजहाँपुर नाना जी के पास रहने गए थे क्योंकि सिलीगुड़ी शुरू में नान - फैमिली स्टेशन घोषित हुआ था। बहन का दाखिला तो नाना जी ने अपने एक परिचित तिनकू  लाल वर्मा जी के प्रबंध वाले आर्य कन्या पाठशाला में सहजता से करवा दिया था। अंततः अपने एक और पूर्व परिचित के तल्लउआ, बहादुरगंज स्थित  विश्वनाथ जूनियर हाई स्कूल  में भाई व मुझे भी प्रवेश दिलवा दिया। 

स्कूल के बाहर खाली पड़ी ज़मीन में स्कूल के बच्चे इंटरवेल में कबड्डी वगैरह खेलते थे। मुझे खेलों में भाग लेने का शौक नहीं था। लेकिन मुझे अपनी कक्षा के एक पहलवान टाईप सहपाठी जिसके पिताश्री पुजारी / कथावाचक थे का हमेशा कबड्डी में आउट न होना अखरता था। सुना था कि, वह रोजाना भगवा झंडे के साथ लगने  वाली शाखा में भाग लिया करता था। उसको सबक सिखाने के लिहाज से एक रोज़ मैंने उसकी विरोधी टीम में कबड्डी खेलने की इच्छा व्यक्त कर दी , मैं रोज़ उसकी गतिविधियों को बारीकी से देखता रहा था। उसके विरोध की टीम का नेतृत्व हर नारायण नामक छात्र ही करता था जिसने मुझे सहर्ष शामिल कर लिया। हमारी टीम में हर नारायण समेत जब सभी छात्र आउट हो गए और मैं अकेला ही बचा तब वह पंडित पुत्र पहलवान छात्र आया मैं पीछे हटते  हुये  उसे पाले के अंतिम छोर तक ले आया और वहाँ कस कर उसका हाथ पकड़ लिया पूरी ताकत लगा कर भी वह छुड़ा न पाया , मुझे गिराया तो खुद भी गिर पड़ा और खींचता रहा किन्तु पाले तक न पहुँच पाया और उसे भी पहली बार आउट होना ही पड़ गया। यह खबर तुरंत प्राचार्य शर्मा जी तक पहुँच गई जो हम लोगों को हिस्ट्री (इतिहास ) पढ़ाते थे , वह सरदार पटेल हिन्दू इंटर कालेज के प्रिंसिपल पद से रिटायर्ड़ थे और निशुल्क पढ़ाते थे किन्तु आने - जाने का रिक्शा भाड़ा प्रबन्धक उनको दे देते थे। उनको इस बात की खुशी थी कि, पढ़ाई में अनाड़ी छात्र ( जिसे अक्सर बेंच पर पूरे क्लास वह दंड स्वरूप खड़ा करते थे ) को खेल में भी चाहे एक ही बार सही उस छात्र ने परास्त कर दिया जिसे वह सराहते थे और जिससे अक्सर पाठ का वाचन करवाते थे। 
चूंकि पढ़ाई में फिसड्डी होने के कारण वह हम लोगों से मदद लेता था इसलिए अपनी हार पर भी प्रतिशोध उसने नहीं माना था। एक बार नाना जी के साथ उनके किसी परिचित के यहाँ कथा में गए थे वहाँ भी वह अपने कथावाचक पिता जी के साथ उनके सहायक के रूप में आया था और बाद में उनको बताया था कि, हिस्ट्री में यह हमारी बहुत मदद करते हैं वैसे तो खेलते नहीं हैं लेकिन एक बार खेल कर मुझे हरा दिया था। उसके पिता जी ने हिस्ट्री में उसकी मदद कर देने के लिए शाबाशी ही दी थी। 
1963 में सिलीगुड़ी के फैमिली स्टेशन घोषित हो जाने पर माँ और बहन बाबू जी के पास चले गए थे। भाई और मैं नाना जी के पास ही रहे थे। जब नाना जी बाज़ार जाते थे हम भाई लकड़ी चीड़ कर रख देते थे और कुएं से पानी भी भर कर रख लेते थे। हालांकि नाना जी एतराज़ करते थे कि, तुम लोग पानी भरने और लकड़ी चीड़ने का काम क्यों करते हो ? इसलिए रोकने के लिए कभी कभी वह हम दोनों को भी बाज़ार अपने साथ ले जाते थे। 
वैसे तो नाना जी को गाना वगैरह पसंद नहीं था लेकिन अजय को वह अधिक चाहते थे इसलिए उसके गुनगुनाने पर एतराज़ नहीं करते थे। अजय को 'जो वादा किया वह निभाना पड़ेगा ' बेहद पसंद था उसी को अक्सर गुनगुनाते थे :

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रविवार, 5 मार्च 2017

यादों के तहखाने से ------ विजय राजबली माथुर

****** प्रो. माशूक अली साहब का संबंध शाहजहाँपुर म्यूनिसपेलटी के चेयरमैन रहे छोटे खाँ साहब के परिवार से था जिनके यहाँ लकड़ी का व्यापार होता था। अतः माशूक साहब वेतन नहीं लेते थे, प्रबन्धक उनको रिक्शा और पान का खर्च मात्र रु 150 / - उनको भेंट करते थे। वह हमारे नानाजी ( डॉ राधे मोहन लाल माथुर साहब ) के एक छोटे भाई हरीश चंद्र माथुर साहब के सहपाठी रहे थे इसलिए मेरे प्रति विशेष अनुराग रखते थे। वैसे वह सभी छात्रों के प्रिय थे। हमारे हरीश नाना जी को वह अक्सर ' सलाम ' कहने को कहते थे और नाना जी भी उनको मेरे द्वारा 'सलाम ' भेजते रहते थे। 
इसी प्रकार पंजाब नेशनल बैंक के एक ब्रांच मेनेजर साहब को भी उनके पुत्र द्वारा 'सलाम' का आदान - प्रदान वह करते रहते थे। उस छात्र ( अब मुझे नाम याद नहीं है ) को भी मेरी तारह ही विशिष्ट अनुराग उनसे मिलता था। किसी रोज़ रिक्शे से घर लौटते में उन्होने उसको कुछ गाते हुये सुन लिया था अतः अगले रोज़ कक्षा में उससे वह गाना सुनाने को कहा कुछ झिझकते हुये उनका आदेश न टाल सकने  के कारण उसको वह गाना सुनाना ही पड़ा ******

विगत माह की छह तारीख को शुभेच्छुओं को धन्यवाद की पोस्ट में श्रीमती जी ( पूनम ) का उल्लेख इसलिए नहीं था कि, प्रत्येक कार्य की संपन्नता में उनके आगमन के बाद से उनका योगदान रहता ही है और घर में हर बात के लिए धन्यवाद की औपचारिकता की आवश्यकता मेरे समझ से परे है। परंतु उनका तर्क है कि, यशवन्त का नाम तो दिया था। मेरे अनुसार पुत्र पत्नी का विकल्प नहीं होता। 

चाहें राजनीतिक गतिविधियां रही हों अथवा ड्यूटी से संबन्धित अथवा  सामाजिक एवं ज्योतिष से संबन्धित उन सब में ही पूनम का पर्याप्त योगदान रहा है। उनके योगदान के बगैर ज़रा भी आगे बढ़ना संभव नहीं था। 

इस पोस्ट के माध्यम से कुछ पुरानी यादों को पुनः प्रकाश में लाना उद्देश्य था। 50 वर्ष पूर्व 1967 में जब सिलीगुड़ी से स्कूल फ़ाईनल करने के बाद बाबू जी का औपचारिक ट्रांसफर आर्डर मिलने में विलंब था हम लोगों को पढ़ाई खराब होने से बचाने के लिए माँ के साथ नानाजी के पास शाहजहाँपुर भेज दिया था। सितंबर माह में दाखिले में काफी दिक्कत आई क्योंकि न तो बाबू जी का ट्रांसफर वहाँ हुआ था और न ही स्कूल कालेज्स में जगहें बची थीं और जिन विषयों को मैं लेना चाहता था न ही  उनका कांबीनेशन सुलभ था। बहन को दाखिला मिशन स्कूल, बहादुर गंज में व भाई को उसी मिशन स्कूल में दाखिला मिल गया था जिसमें क्रांतिकारी राम प्रसाद 'बिस्मिल' जी भी पढे थे। 
 जी एफ कालेज,कैंट के प्रिंसिपल चौधरी मोहम्मद वसी  साहब ने सहर्ष मेरे मन पसंद विषयों सहित इंटर फर्स्ट ईयर में दाखिले की अनुमति दे दी।उस समय इस कालेज में इंटर और बी ए की कक्षाएं चलती थीं अब यह एम ए तक हो गया है और इंटर कक्षाओं को इस्लामिया इंटर कालेज के साथ सम्बद्ध कर दिया गया है। सिविक्स के प्रोफेसर आर के इस्लाम साहब और हिस्ट्री के प्रोफेसर  माशूक अली साहब  विषय के साथ - साथ ज्ञान वर्द्धक सामान्य चर्चा भी किया करते थे। 
प्रो. माशूक अली साहब का संबंध शाहजहाँपुर म्यूनिसपेलटी के चेयरमैन रहे छोटे खाँ साहब के परिवार से था जिनके यहाँ लकड़ी का व्यापार होता था। अतः माशूक साहब वेतन नहीं लेते थे, प्रबन्धक  रिक्शा और पान का खर्च मात्र रु 150 / - उनको भेंट करते थे। वह हमारे नानाजी ( डॉ राधे मोहन लाल माथुर साहब ) के एक छोटे भाई हरीश चंद्र माथुर साहब के सहपाठी रहे थे इसलिए मेरे प्रति विशेष अनुराग रखते थे। वैसे वह सभी छात्रों के प्रिय थे। हमारे हरीश नाना जी को वह अक्सर ' सलाम ' कहने को कहते थे और नाना जी भी उनको मेरे द्वारा 'सलाम ' भेजते रहते थे। 

इसी प्रकार पंजाब नेशनल बैंक के एक ब्रांच मेनेजर साहब को भी उनके पुत्र द्वारा 'सलाम' का आदान - प्रदान वह करते रहते थे। उस छात्र ( अब मुझे नाम याद नहीं है ) को भी मेरी तारह ही विशिष्ट अनुराग उनसे मिलता था। किसी रोज़ रिक्शे से घर लौटते में उन्होने उसको कुछ गाते हुये सुन लिया था अतः अगले रोज़ कक्षा में उससे वह गाना सुनाने को कहा कुछ झिझकते हुये उनका आदेश न टाल सकने  के कारण उसको वह गाना सुनाना ही पड़ा , लीजिये  आप भी सुनिए ------

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रविवार, 19 जुलाई 2015

कुछ आज की :कुछ कल की ' टाईम नहीं है ' --- विजय राजबली माथुर

टाईम नहीं है :

कल दो पहर पौने दो बजे एक साहब का फोन आया कि यदि शाम को पानी नहीं बरसा तो वह अपने भाई साहब के काम से आएंगे। शाम तक मौसम सूखा रहने पर पौने छह बजे उनकी सूचना आई कि कुछ तकनीकी कारणों से वह न आ सकेंगे फिर कल -वल में देखेंगे।
इस प्रसंग ने कुछ पुरानी यादें ताज़ा कर दीं। बात 15 वर्ष पुरानी 2000 ई .की हैं। मैंने सरला बाग,दयालबाग (आगरा ) में अपना ज्योतिष कार्यालय खोला था। आर्यसमाज के नेता और व्यापारी एस पी कुमार साहब का सुझाव था कि खुद को व्यस्त दिखाओ और जब कोई बुलाये तो उसको कहो कि टाईम नहीं है बाद में समय लेना। इसी प्रकार हमारे पड़ौसी नरेंद्र चौहान साहब का सुझाव था कि एक पर्दा लगा कर पार्टीशन कर लो तथा बाहर लोगों से इंतज़ार करवाओ जिससे लगे कि काफी व्यस्त हो।
कुमार साहब को हार्ट अटेक हुआ और उनकी दुकान में चोरी भी हो गई ,वह व्यापार समेट कर बंगलौर चले गए। चौहान साहब पर भी हार्ट अटेक ने धावा किया। सब को त्वरित उपचार की ज़रूरत थी यदि तब डॉ/चिकित्सक भी टाईम के नाम पर उनसे इंतज़ार करवाते तो उन पर कैसी बीतती?
मैंने उनमें से किसी के सुझाव को नहीं माना था और लोगों को तत्काल उपलब्ध रहता था। यह अलग बात है कि जिनको मैंने मदद की उन लोगों में से अधिकांश ने मतलब निकल जाने के बाद लात ही मारी। किन्तु वक्त पर मुझे अनजान-अपरिचित लोगों की सहायता मिलती रही है।
https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/905345732860737 
 

कुछ अराजक व शरारती स्वभाव के लोग जब अपने खास संबंधियों को भी न बख्शें और किसी अन्य से यह अपेक्षा करें कि वह/वे उनके बहकावे में आकर उनके जाल मे फंस जाएँगे। तब इसे उन ज़रूरत से ज़्यादा चालाक लोगों की 'परले दर्जे की मूर्खता' ही माना जाएगा।
Satyanarayn Tirpathi पर ऐसेलोग ही अपने को सबसेज्यादा होशियार मान के चलते है पर समाज मेउनकाआत्मिक सम्मान उनकास्वय कापरिवार ही नहीकरता ॽ
https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/907424232652887 
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 टाईम या समय की बात पर ध्यान आता है कि हमारे नानाजी डॉ राधे मोहन लाल माथुर साहब (सुपुत्र श्याम सुंदर लाल, मुंसरिम साहब ) जब किसी से मिलने जाते थे तो जितना समय घर से निर्धारित जिसके लिए करते थे उसका पूरी तरह पालन करते थे। एक वर्ष होली मिलने मुझे भी साथ ले गए थे। शाहजहांपुर के मशहूर वकील रहे भगवती प्रसाद जी के दामाद ओंकार बाबू, वकील साहब के यहाँ ठीक दस मिनट बाद उठ लिए। बहादुरगंज निवासी एक परिचित के यहाँ से बीस मिनट बाद उठ लिए । उनके पिताजी के एक मित्र पहले लकड़ी की टाल चलाते थे जो उस समय अवस्था के कारण केवल विश्राम पर रहते थे उनको 'चाचा' का सम्बोधन देते थे जबकि वह रिश्तेदार नहीं थे उनके लिए तीस मिनट का समय निर्धारित किया था जिसे उनके कहने पर बढ़ाते-बढ़ाते डेढ़ घंटा हो गया था तब मेरा बहाना करके बोले कि इसकी माँ इसे याद कर रही होगी अब इजाजत दें जिस पर उन्होने जाने दिया। मैं ग्यारह वर्ष का रहा हूंगा और नानाजी के साथ होने से माँ को चिंता का सवाल भी नहीं था। 
लौटते में नानाजी से मैंने ऐसा कहने का कारण पूछा तो उनका कहना था कि तुम साथ न होते और ऐसा न कहते तो वह दो-तीन घंटा और रोकते। नानाजी मरीजों को निशुल्क दवा वितरित करते थे फिर भी उनका इतना ख्याल करते थे कि वे खाली न लौट जाएँ। समय के बाद भी जो मरीज उनके पास आ गया उसे वह लौटाते नहीं थे चाहे पूजा बीच में ही छोड़ कर उठना पड़े उसका हाल जान कर दवा ज़रूर देते थे। गरीबों के प्रति उनको हमेशा हमदर्दी रहती थी यद्यपि खुद भी अमीर नहीं थे। अपनी पेंशन से ही परोपकार के लिए भी खर्च करते थे। 
जहां गरीब मरीजों के लिए उनके द्वार चौबीसों घंटे खुले थे वहीं रिशतेदारों के व्यवहार के अनुसार उनसे मिलने का समय : टाईम निर्धारित करते थे। गैर रिश्तेदार किन्तु पिता के मित्र 'चाचा' के लिए निर्धारित समय से तीन गुना अधिक समय दिया तो उनके असीम प्रेम के कारण ही।  मेरे ही सामने की बात है कि एक बार जब नानाजी कुछ कमरे बनवा रहे थे वह मिलने आए थे नानाजी ने उनसे ज़िक्र किया मरम्मत के नाम पर सिर्फ पाँच बोरी सीमेंट का परमिट मिला है बड़ी दिक्कत है। वह बोले नहीं थे लेकिन अपने नाम से पाँच बोरी का परमिट बनवा कर नानाजी को दे गए और बोले इसमें से एक बोरी उनको देकर बाकी चार बोरी वह रख लें और उस एक बोरी सीमेंट का मूल्य नानाजी को सौंप गए थे। ऐसे  मददगार गैर रिश्तेदार 'चाचा' के लिए अधिक टाईम : समय देना न्याय संगत ही है। 
उस तुलना में जब अब देखता हूँ तो लगता है कि नानाजी के समय : टाईम की बात और थी आज के समय में किसी के लिए अपना समय या टाईम निकाल कर मदद कर देना बड़ी मूर्खता ही है क्योंकि जिसको मदद देते हैं वह एहसान मानने की बजाए मुझको ही गरजू = जरूरतमन्द समझ कर मेरा ही उपहास उड़ाता है। अतः जो लोग टाईम नहीं है का बहाना बना कर अपने सगे-संबंधियों को धोखा देते हैं वे ही आज के व्यावहारिक जीवन में सफल व सम्मानित होते हैं।

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शुक्रवार, 27 मार्च 2015

नानाजी : डॉ राधे मोहन लाल माथुर साहब का स्मरण आज क्यों? --- विजय राजबली माथुर

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नानाजी की पुण्य तिथि - 27 मार्च पर स्मरण- श्रद्धांजली :
( बाएँ से नानाजी के भाई एवं  नानाजी - डॉ राधे मोहन लाल माथुर )
( बाएँ से मामाजी -डॉ कृपा शंकर माथुर, पूर्व विभाध्यक्ष एनथ्रोपालोजी, लखनऊ विश्व विद्यालय एवं नानीजी )

हमारे नानाजी को यह संसार छोड़े हुये आज 36 वर्ष पूर्ण हो गए हैं यों तो उनके संबंध में विचार इसी ब्लाग में अलग-अलग कई बार आ  भी चुके  हैं  किन्तु पुनः कुछ खास-खास बातों का  एक साथ उल्लेख करना उचित प्रतीत हो रहा है। नानाजी वैसे तो मुरादाबाद के थे किन्तु उनके पिताजी श्याम सुंदर लाल माथुर साहब नौकरी के सिलसिले में शाहजहाँपुर आ गए थे अतः उनके बाद नानाजी ने अपने दो अन्य भाइयों की भांति भारद्वाज कालोनी, शाहजहाँपुर में मकान बना लिया था जो अगल-बगल ही हैं। चित्र में नानाजी के चौथे  भाई हैं उनका मकान ठीक नानाजी के बाद है और उनसे मिला हुआ उनके सबसे छोटे भाई का है। उनके दो भाई इन लोगों के साथ ही रहते थे। बचपन में दो बार नानाजी के यहाँ रह कर पढ़ना पड़ा है पहली बार 1962 - 64 में तब जब बाबूजी का ट्रांसफर नान फेमिली स्टेशन- सिलीगुड़ी हो गया था और दूसरी बार 1967 -68 में जब सिलीगुड़ी से लौटना तय हो गया था लेकिन स्टेशन घोषित नहीं हुआ था। इससे भी छुटपन में लखनऊ से शाहजहाँपुर नानाजी के पास जाते ही रहते थे।

*जब हम लोग लखनऊ में हुसैन गंज में थे 1957 में  बाबूजी का वोट न्यू हैदराबाद में पड़ना था वहाँ नानाजी/मामाजी के घर गए थे । उनके घर के सामने ही वोट पड़े थे तब हर उम्मीदवार का अलग-अलग बाक्स होता था, जिसके बाक्स से मतपत्र निकलते  उसके नाम गिने जाते थे। नानाजी की भी  ड्यूटी लगी थी । शाम को लौट कर नानाजी ने बाबूजी को बताया था और मुझे आज भी याद है- दो बैलों की जोड़ी वाले बाक्स में कुछ मतपत्र ऊपर फंसे दीख रहे थे जिनको नानाजी ने बाक्स के भीतर करना चाहा तो उनके साथ के दूसरे महोदय ने उनसे कहा ऐसा न करो और उन्होने बाहर फंसे सारे मतपत्र खींच कर 'लाल' रंग के  हंसिया-बाली वाले बाक्स में डाल दिये - निश्चय ही वह कर्मचारी कम्युनिस्ट पार्टी की ओर झुकाव रखते होंगे। आज जब पुड्डीचेरी में भाकपा का 22 वां राष्ट्रीय अधिवेन्शन चल रहा है नानाजी की पुण्यतिथि पर यह घटना याद आ रही है।
*चूंकि नवंबर 1962 में बाबूजी के सिलीगुड़ी जाने पर किसी भी स्कूल में शाहजहाँपुर में हम लोगों का दाखिला नहीं हो रहा था नानाजी ने कभी उनके पिताजी के जमाने में उनके घर खाना बनाने वाली मिश्राईंन के बड़े सुपुत्र (जो वाराणासी में उच्चाधिकारी थे ) द्वारा खोले गए विश्वनाथ जूनियर हाई-स्कूल के लिए उनके ही छोटे भाई जो तब कपड़ों की दुकान चलाते थे से बात की जिनहोने तुरंत अपने स्कूल मेनेजर  - काशीनाथ वैद्य जी को हम दोनों भाइयों को दाखिला दिलाने के लिए कहा जिनहोने प्राचार्य शर्मा जी (जो सरदार पटेल हिन्दू इंटर कालेज के रिटायर्ड़ प्रिंसिपल थे ) से कह दिया। उस वक्त तक लोग-बाग पुराने सम्बन्धों की भारी कद्र करते थे जिस कारण हम लोगों का एक वर्ष खराब होने से बच सका।
*इसी प्रकार सितंबर 1967 में भी सत्र चालू हो चुकने के कारण हम भाई-बहन का दाखिला करने में दिक्कत आ रही थी। नानाजी के इन चौथे  भाई के एक मित्र थे तिनकू  लाल वर्मा जी जो 'आर्य कन्या पाठशाला', के मेनेजर थे जिनसे नाना जी ने बात करके बहन को वहाँ दाखिल करा दिया। लेकिन छोटे भाई को नौवें में तथा मुझे इंटर पार्ट वन में प्रवेश लेना था जिस कारण दिक्कत थी। सरदार पटेल कालेज के वाईस प्रिंसिपल एक माथुर साहब के होते हुये भी प्रिंसिपल टंडन जी ने स्पष्ट इंकार कर दिया था।
 नानाजी ने अंततः गांधी फैजाम कालेज के प्रिंसिपल चौधरी मोहम्मद वसी साहब से संपर्क किया और उन्होने बिना किसी जान-पहचान के भी मुझे मेरे पसंद के विषयों के साथ दाखिला दे दिया। नानाजी के तीसरे भाई जिनको हम लोग बंबई वाले नानाजी कहते थे के एक सह-पाठी माशूक अली साहब जो  नगर पालिका के पूर्व चेयरमेन छोटे खाँ साहब के  खानदानी थे और हमें इतिहास पढ़ाते थे अक्सर बंबई वाले नानाजी को सलाम बोलने को कहते थे उसी प्रकार वह भी प्रोफेसर साहब को सलाम बोलने को कहते थे। 
छोटे भाई का दाखिला चौक स्थित मिशन स्कूल में  नाना जी ने करा दिया था - यह वही स्कूल था जिसमें क्रांतिकारी राम प्रसाद 'बिस्मिल' जी भी पढे थे ।  
* नानाजी टाउन हाल में होने वाले हर दल के नेता का भाषण सुनने जाते रहते थे मुझे भी ले जाते थे। डॉ राम मनोहर लोहिया, कामरेड एस एम बनर्जी, शेख अब्दुल्ला, सुचेता कृपलानी आदि को पहले चरण में 1964 तक 12 वर्ष की अवस्था में सुन चुके थे; नानाजी के पास उपलब्ध सत्यार्थ प्रकाश, महाभारत, गीता आदि पढ़ चुके थे। रामचरित मानस तो लखनऊ में ही नौ वर्ष की अवस्था तक माँ ने पढ़ने को दी थी । दूसरे चरण में 15 वर्ष  की अवस्था में संत श्याम जी पाराशर  के प्रवचन सुनने नाना जी के साथ गए हैं और उनकी पुस्तकों का अवलोकन किया है। 
* 1973 में मेरठ में प्रथम जाब करते हुये भी एल आई सी की एक परीक्षा देने लखनऊ  मामाजी के पास आया था और लौटते में शाहजहाँपुर होकर नानाजी से मिलने गया था ।  यूनिवर्सिटी की बादशाहबाग कालोनी से आई टी कालेज तक मामाजी व माईंजी भी पैदल ही  मुझे बस तक छोडने आए थे। उस वक्त सिटी बस में चारबाग तक के कुल पचास पैसे लगे थे। लखनऊ मेल रात को साढ़े बारह बजे  पहुंचता था और पटरी के सहारे ही चल कर मैं नानाजी के घर एक बजे पहुँच पाया था। नानाजी ने मेरी आवाज़ सुन कर दरवाजा खोल दिया था किन्तु बगल वाले घर से बंबई वाले नाना जी ने पूंछा कि आधी रात को दरवाजा क्यों खोल दिया? तब नानाजी ने तत्काल मेरा घर का नाम लेकर कहा कि मुझे लेने आया है। अतः मैं फिर वाकई नाना जी को अपने साथ मेरठ ले गया था जबकि माँ को ताज्जुब हुआ क्योंकि पहले से उनको पता न था तब फोन का ज़माना नहीं था। सीधी गाड़ी भी तब न थी- बरेली व हापुड़ में पेसेंजर ट्रेन  बदलते हुये मेरठ सिटी फिर वहाँ से कैंट स्थित मिलेटरी क्वार्टर पहुंचे थे। क्वार्टर के सामने ही लाईन पार करते ही वह फैक्टरी थी जिसमें मैं जाब करता था। घर के इतने नजदीक ड्यूटी करते मुझे देख कर नानाजी को अत्यधिक प्रसन्नता हुई थी।
* 1974 में नानाजी के( चित्र में साथ वाले ) भाई की दूसरी बेटी -कमल मौसी की शादी में भाग लेने शाहजहाँपुर नानाजी के पास गया था । उसके बाद मेरा शाहजहाँपुर जाना नहीं हुआ है और नानाजी भी फिर न ही मेरठ न ही आगरा पहुँच पाये थे। 
* 1977 में मामाजी के असामयिक निधन के बाद जब लखनऊ आए थे तब ही वह नानाजी से भी अंतिम भेंट थी। क्योंकि मामाजी (उनसे भी पूर्व मौसी भी नहीं रही थीं ) के बाद नानाजी अत्यधिक बीमार रहने लगे थे व काफी कमजोर हो गए थे। वह मोतियाबिंद का आपरेशन कराना चाहते थे मैंने भी और मौसेरे भाई तथा माईंजी ने भी उनको आपरेशन न कराने को कहा था। किन्तु नाना जी ने अक्तूबर 1978 में शाहजहाँपुर में आँखों का आपरेशन करा ही लिया था। तबसे निरंतर उनकी तबीयत बिगड़ती गई। 27 मार्च 1979 को उन्होने यह संसार छोड़ दिया। माँ-बाबूजी ही शाहजहाँपुर जा सके। मैं व भाई इसलिए न जा सके क्योंकि छोटी बहन आई हुई थीं व भांजी कुछ महीनों की ही थी । अतः बहन-भांजी के साथ हम भाइयों को आगरा में ही रहना पड़ा था। माँ ने बताया था कि नानाजी की अधिकांश किताबें देख-रेख के आभाव में दीमक ने खराब कर दी थीं। लखनऊ से पहुंची माईंजी को वे किताबें फेंकनी पड़ गईं थीं। माँ को माईंजी से उस दशा की किताबें मांगना उचित नहीं लगा था वरना वह मेरे किताबों के शौक के चलते मांग लातीं। 

* हालांकि अखबार व किताबें तो हमें बाबूजी भी लाकर देते रहते थे लेकिन नानाजी के पास उपलब्ध साहित्य के अध्यन  ने भी मेरे लेखन व विचार-धारा को प्रभावित किया है। माँ तो अक्सर यही कहती थीं कि यह ननसाल पर गया है।

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बुधवार, 27 मार्च 2013

नाना जी की कुछ स्मृतियाँ ---विजय राजबली माथुर

( स्व डॉ राधे मोहन लाल माथुर सुपुत्र स्व श्याम सुंदर लाल माथुर )
जैसा कि हमने बचपन से सुना है कि हमारे नानजी का जन्म 01 जनवरी 1900 ई को हुआ था। उनका निधन तो 27 मार्च 1979 ई को हुआ था ,आज यह वर्णन उनकी पुण्य तिथि के अवसर पर उनकी स्मृति मे उनको ही समर्पित है ---

हमारे नानाजी अपने जीवित रहे तीन बच्चों मे हमारी माँ जो बीच की थीं को ज़्यादा मानते थे। इसी प्रकार माँ के तीनों बच्चों मे बीच के हमारे भाई अजय को ज़्यादा मानते थे। ऐसा किसी दूसरे का अनुमान नहीं उन्होने खुद ही कहा था। हमारी माँ भी नाना जी का पूरा ख्याल रखती थीं किन्तु अजय के विचारों के बारे मे मैं कुछ भी कह सकने मे अक्षम हूँ।

माँ की शादी के बाद जब बाबूजी दरियाबाद मे मर्ज़ी मुताबिक खेती देखने की इच्छा बाबाजी के (बड़े ताऊजी के पक्ष मे)निर्णय के कारण पूरी न कर सके तो एम ई एस मे नौकरी करने लखनऊ आ गए थे। मामाजी रिसर्च के लिए आस्ट्रेलिया गए हुये थे तो नानाजी ने न्यू हैदराबाद मे ही उनके साथ टिकने का आग्रह किया था। अतः बेहद छुटपन मे भी हमे नानाजी के साथ रहने का अवसर मिला है। नानाजी तब कृषि विभाग मे नौकरी करते थे। माँ से सुना था कि नानाजी एक बूंदी का लड्डू रोजाना लाकर मुझे दिया करते थे। माँ के कहे मुताबिक मैं नानाजी की  साईकिल घर के  ऊपर चढ़ते ही उनके पास आकर कहता था "नाना जी --लड्डू" और नानाजी झोले से निकाल कर वह लड्डू मुझे दे देते थे। माँ ने बताया है तो ऐसा उस समय मेरा स्वभाव रहा होगा किन्तु अपनी याद दाश्त के समय से तो मैं किसी से भी कुछ मांगता ही नहीं था और खुद देने पर भी बड़ी मुश्किल से ही लेता था। नाना जी के बाद वाले उनके भाई जिनको हम लोग बड़े नाना जी कहते थे हम लोगों की शिकायत खुद हमारी माँ से करते थे कि तुमने इन बच्चों को कैसी आदत डाली है ये कभी हमसे कुछ मांगते ही नहीं दो तो भी नखरे दिखाते हैं। खैर दो -ढाई साल की उम्र मे मेरा वैसा स्वभाव रहा होगा तो मुझे खुद उसकी याद नहीं है।

नाना जी जब बनारस यूनीवर्सिटी से होम्योपैथी पढ़ने विभाग से छुट्टी लेकर गए थे तब उनके भांजे (गोपाल मामाजी) लखनऊ यूनिवर्सिटी के हास्टल मे रहने चले गए थे जो वहाँ से LLb कर रहे थे। नानाजी जब बनारस से आए तो उनसे मिलने एक रोज़ सुबह-सुबह गए थे साथ मे मुझे भी ले गए थे तब शायद 4 या साढ़े चार वर्ष का रहा हूंगा। पैदल ही न्यू हैदराबाद से यूनिवर्सिटी गए थे तब बीच से पुलिस लाईन होकर गए थे। आज की तरह तब पुलिस लाईन प्रवेश कोई समस्या नहीं थी। IT कालेज चौराहे से सिटी बस पकड़ने के लिए भी पुलिस लाईन होकर निकल जाते थे -बहुत अच्छे तरीके से मुझे याद है। गोपाल मामाजी ने बेचने आए फेरी वाले से केले लेकर मुझे एक खाने को दिया तब भी मैंने लेने से इंकार ही किया था और फिर नानाजी के ''ले लो " कहने पर ही लिया और खाया था।

बाद मे दुगांवा मे कुछ दिन रहने के बाद हम लोग हुसैन गंज मे नाले के किनारे वाले 'फखरुद्दीन मंज़िल'के नीचे के हिस्से मे रहने लगे थे। नानाजी अक्सर हम लोगों से मिलने आ जाते थे और हम लोग भी न्यू हैदराबाद मामाजी/नानाजी से मिलने जाते रहते थे। शुरू शुरू मे बाबूजी का वोटर लिस्ट मे नाम न्यू हैदराबाद मे ही था। अतः 1957 के आम चुनाव मे वोट डालने बाबूजी न्यू हैदराबाद ही गए थे। नाना जी की तो ड्यूटी भी उनके घर के सामने वाले पार्क मे ही थी। शाम को ड्यूटी से लौट कर नानाजी ने बाबूजी को बताया था कि उनके एक साथी ने ड्यूटी पर क्या कारस्तानी की थी। तब उम्मीदवारों के चुनाव निशान के साथ उनके अलग-अलग बाक्स होते थे और जिस बाक्स मे से वोट के पर्चे निकलते थे उसी उम्मीदवार के पक्ष मे गिने जाते थे। दो बैलों की जोड़ी के बाक्स मे कुछ वोट के पर्चे पूरे अंदर नही जा पाये थे और नानाजी उनको अंदर करने लगे तो उनके दूसरे साथी ने आ कर उनसे कहा-"क्या गजब करते हो?" और बाहर को लटकते हुये पर्चे खींच कर 'हंसिया और गेंहू की बाली' वाले लाल बाक्स मे डाल दिये। शायद नाना जी की अपनी विचार धारा 'जनसंघ' के पक्ष मे थी किन्तु ड्यूटी के अनुसार वह कांग्रेस के पर्चे उसके बाक्स मे ठीक से डालने जा रहे थे जबकि उनके दूसरे साथी ने ड्यूटी ठीक से नहीं निभाई थी।

गुड़ियों के मेले (नाग पंचमी)के दिन एक बार जोरदार बारिश हुई और सारा मेला गड़बड़ा गया था। खादी  आश्रम/विजय मेडिकल हाल के सामने वाली सड़कों  की पटरी पर मिट्टी के खिलौने बेचने वालों के बहुत से खिलौने पानी मे बह-बह कर हमारे घर के सामने की सड़क से होते हुये नाले मे समा गए थे। ऐसे मे नानाजी सब्जी वाले की दुकान पर रुक गए थे जो हम लोगों से मिलने आ रहे थे। उस समय सड़क पर कमर तक पानी हमारे घर के सामने भरा था। जब पानी एडी तक रह गया तब नाना जी हमारे घर पहुंचे और बाबूजी भी बाद मे आ पाये। नाना जी तब हमारी माँ या दिल्ली मे मौसी के घर बिना पैसे दिये कुछ नहीं खाते थे। उनको पैसे न खर्च करने पड़े इसलिए माँ भी उनको चाय वगैरह को नहीं पूंछती थी परंतु पानी मे इतना भीग जाने के कारण नानाजी को गरम चाय बना कर दी। उस समय हमारे माता-पिता केवल सुबह एक बार ही चाय पीते थे और हम बहन-भाई को तो चाय देने का कोई सवाल ही नहीं था जैसा कि आजकल नन्हें-मुन्ने को भी बोतल के जरिये चाय देने का चलन देखते हैं तब कोई ऐसा सोच भी नहीं सकता था।

1960 मे जब पीलीभीत बांध से गोमती मे ज़्यादा पानी छोड़ दिया गया था और बाढ़ आना निश्चित था तो नाना जी अपने दफ्तर से सीधे माँ को यह बताने आए थे कि बाढ़ के बाद ही अब वहाँ आना और वह भी तभी दोबारा आ पाएंगे। बाबूजी के दफ्तर से आने तक नाना जी रुके रहे जिस कारण जब वह न्यू हैदराबाद पहुंचे तो घुटनों तक पानी पार करते हुये ही जाना पड़ा। मामाजी के घर के तीन तरफ पानी भर गया था और वहाँ नाव भी चली थी। नाले के मुहाने पर घर होने के बावजूद हम लोग सुरक्षित रहे बल्कि 06 सप्रू मार्ग से पानी मे घर घिर जाने पर भुआ-फूफाजी,दोनों भाई साहब सब हमारे घर ही शरण लेने आए थे। (उनमे छोटे वाले लाखेश भाई साहब जो कमलेश बाबू के अज़ीज़ों अज़ीज़ हैं हमारे घर से डेढ़ किलो मीटर की दूरी पर हैं लेकिन 'धन्ना सेठ' होने के कारण मुझसे मुंह सिकोड़े हुये हैं क्योंकि मैं गरीब मेहनतकश हूँ)।डॉ शोभा/कमलेश बाबू से वह फोन के माध्यम से संपर्क मे रहते हैं। उनसे बड़े भाई साहब तो शोभा की बेटी मुक्ता के ही शहर पूना मे लखनऊ से जाकर बस गए हैं। 

नानाजी समय से पूर्व रिटायरमेंट लेकर शाहजहाँपुर चले गए थे। वहाँ स्टेशन और टाउन हाल के निकट भारद्वाज कालोनी मे उन्होने अपना मकान बनवा लिया था। यह कालोनी पहले अमरूदों का बाग थी जो पाकिस्तान चले गए लोगों के स्वामित्व का था। कलेक्टर भारद्वाज साहब के प्रयास से उसे आवासीय कालोनी बना दिया गया था अतः उनके ही नाम पर यह कालोनी बनी। इसमे कुल 30 मकान बनाए गए थे। हमारे नानाजी के बाद के दो भाइयों को छोड़ कर उनके बाद के दो भाइयों ने भी उनके साथ-साथ मकान बनाए थे जो तीनों लगातार एक साथ हैं। पांचों भाइयों मे एकजुटता थी और जानते हुये भी किसी ने (जिन्होने मकान नहीं बनाए थे ने  भी) अपने पिताजी को ज़मीन खरीदने की सूचना नहीं दी थी क्योंकि वह मकान-ज़मीन को झगड़े का साधन मानते थे। उनके बाद ही सबने मकान बनाए थे। मामाजी की शादी के बाद तक वह जीवित थे और उन्होने मौसी के तीन बच्चों तथा हम दो भाइयों को भी देखा था। नानाजी ने उनका चित्र अन्य राम आदि के चित्रों के साथ अपने पूजा-स्थल पर रखा हुआ था। सुबह-शाम दोनों वक्त पौराणिक आधार पर नाना जी पूजा किया करते थे। 

अपने मकान मे नाना जी ने रहने पर दिल्ली से मौसी व लखनऊ से हमारी माँ को बुलाया था। मौसी पहले पहुँच गई थीं और हम लोग बाद मे पहुंचे थे। उनकी बड़ी बेटी (मिथ्थे जीजी )से नाना जी ने चटनी पीसने का आग्रह किया था तो उन्होने जवाब दिया था कि,नाना जी चटनी तो आपकी शोभा ही पीसेगी। नाना जी ने यह बात  बाद मे हमारी माँ से बताई थी। वही मिथ्थे जीजी और शोभा आज भोपाल मे अपने-अपने मकान बनाए हुये हैं और दोनों मे गहरी छन्न रही है। मुक्ता की शादी मे कानपुर मे सात वर्ष पूर्व मिली थीं। यशवन्त के बारे मे शोभा से जानकारी पूछती रहती हैं । 

नाना जी ने माँ से अजय को (जिसे वह सबसे ज़्यादा मानते थे)अपने पास शाहजहाँपुर मे छोडने को कहा था  
उन्होने तो मना कर दिया था  किन्तु मौसी ने अपने सबसे बड़े बेटे (लाल भाई साहब)को उनके पास छोड़ दिया था लेकिन उनके लगातार दो वर्ष हाई स्कूल मे फेल हो जाने पर नाना जी ने मौसाजी से अपने पास वापिस बुला लेने को कहा था। वह नानाजी का कहना नहीं मानते थे और उनके भाइयों के साथ शतरंज पर पढ़ाई छोड़ कर डटे रहते थे तो पास कहाँ से होते?नाना जी को यह बात नापसंद थी। आज शोभा और लाल भाई साहब मे भी गहरी छनती है।( लालभाई साहब भी कमलेश बाबू की ही तरह मेरे ज्योतिषीय ज्ञान का मखौल उड़ाते हैं क्योंकि मैं पोंगा-पंथ का खंडन करता हूँ और वह उसे पूजते हैं। अपनी बेटी की जन्मपत्री को मेरे द्वारा गलत बताए जाने पर वह भड़क गए थे और मुझे आगरा यूनिवर्सिटी से ज्योतिष का कोर्स करने की हिदायत दी थी।लेकिन मेरे द्वारा बनाई जन्मपत्री और बताए गए समय पर ही उनकी बेटी की शादी हुई उनके बताए समय पर तीन वर्ष पूर्व नहीं। नाना जी के भतीजे (बबुए मामाजी )भी उनको ही सही मान कर अपने बेटे का काफी नुकसान करा चुके हैं क्योंकि मैंने जो वैज्ञानिक उपाय बताए थे उनमे कोई टीम-टाम नहीं थी और लाल भाई साहब के  बताए उपाय तड़क-भड़क और  ख़र्चीले होने के कारण उनको भाए थे। उनका तर्क था कि तुम (यानि कि मैं)घर से प्रेक्टिस करते हो जबकि लाल ने दिल्ली मे एयर कंडीशंड आफिस खोला है एक  लेडी सेक्रेटरी भी रखे हुये है। तो उनके अधिक ज्ञान का पैमाना हुआ लेडी सेक्रेटरी और एयर कंडीशंड आफिस को मेंटेन करना जो मैं नहीं कर सकता इसलिए अज्ञानी हुआ लेकिन नुकसान बबुए मामाजी के बेटे विवेक का हुआ जिनसे शोभा/कमलेश बाबू चिढ़ते हैं। )

1962 मे जब नानाजी दिल्ली से मौसी के पास से लौटते मे बरेली हम लोगों के पास मिलने हेतु रुके थे तब तक बाबूजी को सिलीगुड़ी ज्वाइन करने के आर्डर आ चुके थे। नानाजी ने बाबूजी से पूछा था कि वह नान फेमिली स्टेशन होने के कारण ये लोग कहाँ रहेंगे?कहाँ पढ़ेंगे?तो बाबू जी ने बउआ से सलाह किए बगैर ही तुरंत कह दिया था कि आपके पास तब वह चुप रह गए थे। अतः सब सामान व हम लोगों को शाहजहाँपुर छोड़ कर बाबूजी सिलीगुड़ी चले गए थे। नवंबर के महीने मे स्कूलों मे दाखिला कैसे होता?कभी नानाजी के घर मे खाना बनाने वाली मिसराईंन के बड़े बेटे बड़े अधिकारी हो गए थे और उन्होने तलुआ ,बहादुरगंज मे 'विश्वनाथ जूनियर हाई स्कूल' की स्थापना की थी उनके छोटे भाई उसके प्रबन्धक थे उनसे नाना जी ने हम लोगों की समस्या बताई जिनके कहने पर अजय व मेरा दाखिला उस स्कूल मे  हो सका। 1963 मे बउआ व शोभा बाबूजी के पास सिलीगुड़ी चले गए क्योंकि शोभा का एडमीशन नाना जी ने नहीं करवाया था। दोनों भाई नानाजी के पास रहे। नाना जी हम दोनों भाइयों को उसी प्रकार रखते थे जिस प्रकार हमारी माँ जिन्हे  हम लोग बउआ कहते थे।अजय कभी -कभी लाउड स्पीकर पर बज रहे गानों को गुंनगुनाता रहता था। एक बार वह ऐसे ही दोहरा रहा था-"जो वादा किया वह निभाना पड़ेगा" ;नाना जी ने सुन कर  कहा कि "निभा तो रहे हैं"। उनका आशय हम लोगों को रखने से था,हालांकि हम लोगों को तो उन्हे मजबूरी मे  रखना पड़ा था। 1964 मे हम लोग भी सिलीगुड़ी चले गए थे तब नाना जी लखनऊ आए थे  हम लोगों को छोडने /विदा करने। जिस दिन की हम लोगों की ट्रेन थी उस दिन नेहरू जी का दिल्ली मे अंतिम संस्कार था और लखनऊ मे बस आदि परिवहन  सब चलना बंद था अतः किसी प्रकार भुआ के घर सप्रू मार्ग से हम लोग तो चारबाग पहुंचे ही वह लोग स्टेशन तक पहुँचाने  नहीं गए। तब मामाजी ने मोपेड़ ली हुई थी उस पर ही पहली बार नानाजी उनके साथ बैठ कर स्टेशन तक गए जबकि वह उस पर नहीं बैठते थे। ट्रेफिक के कारण ही माईंजी भी स्टेशन तक न आ सकीं। 

1967 मे बाबूजी का तबादला यू पी की ओर तो एनाउंस हो गया था स्टेशन डिक्लेयर होना व रिलीव होना बाकी था। सितंबर मे बाबूजी ने बउआ के साथ हम लोगों को एक बार फिर शाहजहाँपुर नानाजी के पास भेज दिया। इतना लंबा सफर पहली बार बउआ ने अकेले हम लोगों व सामान के साथ किया जबकि इससे पहले वह लखनऊ या बरेली से भी शाहजहाँपुर अकेले नहीं गई थीं। लखनऊ मे छोटी लाईन से बड़ी की गाड़ी बदलते हुये हम लोग शाम को 5 बजे के लगभग शाहजहाँपुर पहुंचे थे। फिर बीच मे दाखिले की समस्या थी क्योंकि कोई भी स्कूल/कालेज उस समय प्रवेश नहीं लेता है। हाथी गोदाम स्थित आर्य कन्या पाठशाला मे शोभा को दाखिल कराने मे तो नानाजी को दिक्कत नहीं आई क्योंकि प्रबन्धक  तिनकू लाल वर्मा जी उनके पूर्व परिचित थे।  अजय और मेरा दाखिला कराने हेतु नानाजी ने किन्ही माथुर साहब से बात की जो सरदार पटेल हिन्दू इंटर कालेज मे वाईस प्रिंसिपल थे। उन्होने प्रिंसिपल टंडन जी से सिफ़ारिश नहीं की केवल उनके सामने ले जाकर खड़ा कर दिया और उन्होने मिड सेशन मे दाखिला करने से मना कर दिया। 

GF(गांधी फैजाम) कालेज के प्रिंसिपल चौधरी मोहम्मद वसी साहब  से नाना जी मुझे ले जाकर अकेले ही मिले तो उन्होने खुशी-खुशी मेरा दाखिला मेरे मन पसंद विषयों मे  कक्षा 11 मे कर लिया। इसके बाद अजय को ले कर मिशन स्कूल के प्राचार्य से नाना जी मिले तो उन्होने भी कक्षा 9 मे अजय को साईन्स विषय मे दाखिल कर लिया(जिस  विद्यालय मे क्रांतिकारी राम प्रसाद 'बिस्मिल' जी भी पढे थे)। 

पहले भी जब हम लोग नाना जी के पास थे उनके साथ सार्वजनिक सभाओं मे नेताओं के भाषण सुनने जाते थे जब बउआ सिलीगुड़ी मे थीं तो अजय भी जाते थे वरना वह नहीं जाते थे। नाना जी प्रत्येक पार्टी के नेता की सभा ज़रूर सुनते थे भले ही वह खुद 'जनसंघ' समर्थक थे। डॉ राम मनोहर लोहिया की सभा भी हमने नाना जी के साथ टाउन हाल मे सुनी थी। लोहिया जी की खास बात "जैसे यह मालूम होते हुये भी कि कूड़ा फिर आएगा,रोज़ झाड़ू लगाते हैं उसी प्रकार सरकारों को भी बुहारते रहना चाहिए" मुझे आज भी याद है बाकी बातें याद नहीं हैं। एस एम बनर्जी साहब की सभा भी हमने नानाजी के साथ सुनी थी जो लाल झंडे लगा कर हुई थी जबकि वह तो कानपुर से निर्दलीय सांसद थे। यू पी मे तब मंत्री और जनसंघ नेता परमेश्वर (या बरमेश्वर )पांडे की सभा भी नाना जी के साथ सुनने गए थे। 

बबुए मामा जी अपनी आर्डिनेंस क्लोदिग फ़ेक्टरी स्थित मंदिर कमेटी मे कुछ पदाधिकारी थे वह जालंधर के संत श्याम जी पाराशर को प्रवचनों हेतु बुलवाया करते थे। जितने दिन प्रवचन चले मैं नाना जी के साथ सुनने जाता रहा। मेरे इसी ब्लाग मे लिखे लेख-'रावण वध एक पूर्व निर्धारित योजना','सीता का विद्रोह','राष्ट्र वादी केकेयी' का स्त्रोत संत श्याम जी पाराशर के प्रवचन ही हैं। उनकी चार पुस्तकें भी नाना जी के पास पढ़ी थीं जो बाद मे दीमक लग जाने के कारण माईंजी ने सब किताबों के साथ फेंक दी।मांगने की आदत न होने के कारण ही बउआ ने नहीं मांगी वरना उन्हें किताबें फिंकने का बहुत अफसोस रहा क्योंकि एक तो उनके पिताजी की किताबें थीं दूसरे मुझे किताबें ही पढ़ने का तो शौक है। 

1973 मे मैं लखनऊ एल आई सी की एक परीक्षा देने आया था जबकि सारू स्मेल्टिंग मे जाब कर रहा था। मामाजी के बादशाहबाग वाले यूनीवर्सिटी बंगले पर ही आया था। माईंजी ने पहचान लिया था लेकिन मामाजी ने नहीं पहचाना था। सप्रू मार्ग मिलने गया था तो फूफाजी ने पहचान लिया था और भुआ ने भी नहीं पहचाना था। लौटते मे मामा जी -माईंजी मुझे सिटी बस पर छोडने आई टी कालेज चौराहे तक आए थे। तब चारबाग तक कुल 50 पैसे का टिकट था मैं लखनऊ मेल से चल कर रात मे शाहजहाँपुर पहुंचा था ,स्टेशन से पटरी-पटरी के सहारे चल कर भारद्वाज कालोनी आ गया था तब तक कोई दिक्कत नहीं थी अब तो ऐसा करना जुर्म है। लगभग एक बजे नाना जी का दरवाजा खटखटाया और उनके  कौन पूछने पर मैंने कहा नानाजी दरवाजा खोलिए तो तुरंत नानाजी ने मेरा नाम पुकार कर कहा अभी खोल रहे हैं। नाना जी ने केवल मेरी आवाज़ पर ही मुझे पहचान लिया था। बगल के घर मे नानाजी के दो भाई रहते थे उनमे से एक जिनको हम लोग बंबई वाले नाना जी कहते थे उधर से बोले कौन है दादा ऐसे दरवाजा न खोलिएगा इतनी रात मे कोई दूसरा भी आवाज़ बदल कर धोखा दे सकता है। चूंकि मेरे वहाँ पहुँचने की कोई सूचना नहीं थी इसलिए उनका ख्याल भी गलत नहीं था किन्तु हमारे नाना जी ने अपने भाई से मेरा नाम लेकर  कह दिया कि वह लखनऊ से मेरठ जा रहा था यहाँ मुझे लेने आया है। बउआ से मैंने नानाजी से मिलते हुये आने की बात कही थी साथ उनको लाने की नहीं किन्तु उनकी बात रखते हुये उनसे  साथ चलने को औपचारिक रूप से कहा  और यह मेरा खुद का किया पहला फैसला था जिसमे बाबूजी या बउआ से राय लेने का अवसर भी न था। 

बरेली और हापुड़ मे गाडियाँ बदलते हुये जब हम मेरठ घर पहुंचे तो बउआ भी नानाजी को साथ देख कर आश्चर्य चकित हो गई। नानाजी ने उनसे भी यही कहा यह हमे भी ले आया। यह  मिलेटरी क्वार्टर  कैंट स्टेशन के प्लेट फार्म की सीध मे ही आगे था। कुछ दिन रह कर नाना जी फिर दिल्ली मौसी से मिलने चले गए और लौटते मे दोबारा यहाँ होते जाने की बात कही थी। इससे पूर्व जब महेश नानाजी के बेटे विजय मामा जी की शादी मे नाना जी रुड़की रोड वाले क्वार्टर मे आए थे तब मेरे लिए दो होम्योपैथी किताबे लाकर दे गए थे कि अब अपने पास रख कर क्या करेंगे तुम स्तेमाल करना। दिल्ली मे मौसी की तबीयत ज़्यादा खराब थी और उन्होने अपने पास नानाजी से 15 दिन रुकने का आग्रह किया अतः वह अपना सामान लेने दो रोज़ को फिर मेरठ आए और लौटते मे एक होम्योपैथी किताब गोपाल (जो अब जीवित नहीं हैं) को देने हेतु ले गए कि वह इससे देख कर मौसी को दवा दे सकेगा। फिर नानाजी दिल्ली से ही सीधे शाहजहाँपुर लौट गए। 

दिसंबर 1974 मे आगरा मे अजय का एक्सीडेंट होने के बाद 1975 मे शुरू मे नाना जी वहाँ गए थे तब मैं मेरठ से वहाँ पहुंचा था। उस वक्त कुछ दिन नानाजी के साथ रहना हुआ था। सितंबर 1977 मे मामाजी के निधन के बाद चार दिन लखनऊ मे उनके साथ और रहे थे। 1978 मे आगरा मे जब हमने अपना मकान लिया तब तक नानाजी का स्वास्थ्य सफर करने लायक नहीं रह गया था। अक्तूबर मे बाबूजी और बउआ उनके द्वारा आँखों का आपरेशन करवाने पर शाहजहाँपुर गए थे। 27 मार्च 1979 को नानाजी ने यह शरीर इस संसार से छोड़ दिया। वस्तुतः मौसी के बाद मामाजी का भी निधन हो जाने से नानाजी को ज़बरदस्त मानसिक आघात लगा था और वह शारीरिक दृष्टि से भी क्षीण हो गए थे मैं उनकी बीमारी मे उनको देखने नहीं जा पाया था उनके निधन के बाद भी बउआ व बाबूजी ही गए थे। 

हालांकि राजनीतिक रूप से मेरी विचार धारा नानाजी की राजनीतिक विचार धारा से 180 डिग्री के अंतर पर है और वह भी उनके सान्निध्य से पढ़ी हुई पुस्तकों के आधार पर ही किन्तु उनका अन्य दूसरे मामलों मे व्यापक प्रभाव मैं खुद मे महसूस करता हूँ । नाना जी की ईमानदारी, सत्य बोलने की प्रवृत्ति,किसी के आगे न झुकने और न दबने की आदत ,दूसरों का ज़्यादा से ज़्यादा भला करने की चाहत एवं प्रयास आदि कुछ सिद्धान्त मैंने नानाजी से ही ग्रहण किए हैं और चूंकि बउआ व बाबूजी भी इन सिद्धांतों को मानते तथा इन पर ही चलते थे अतः मुझे इन बातों  को अपनाने से कभी रोका नहीं।

आज हमारे नानाजी को यह संसार छोड़े हुये 34 वर्ष पूर्ण हो गए हैं परंतु उनके साथ बिताया गया समय और उनकी बातें अभी कल ही की लगती हैं और उनसे हमे आगे भी प्रेरणा मिलती रहेगी। आज की होली पर हम अपने नानाजी की आत्मा की शांति की परमात्मा से प्रार्थना करते हैं।





 

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बुधवार, 5 सितंबर 2012

स्मृति पटल पर शिक्षक (भाग-2 )

बाजपेयी जी


आज शिक्षक दिवस पर सबसे पहले 'विश्वनाथ जूनियर हाईस्कूल ',तलउआ,बहादुरगंज,शाहजहाँपुर के अपने सेकेंड हेड मास्टर साहब-अचल बिहारी बाजपेयी जी का ज़िक्र करना चाहूँगा। 1962 मे चीन के आक्रमण के वक्त बाबूजी ट्रांसफर पर सिलीगुड़ी मे थे और हम लोग नाना जी के पास। नवंबर मे दाखिला किसी स्कूल मे नहीं मिला तो नानाजी अपने पुराने परिचित इस स्कूल स्थापक के छोटे भाई से मिले जिनके कारण दाखिला हो गया था। 6ठा क्लास आधा रूक्स हायर सेकेन्डरी स्कूल ,बरेली से और फाइनल यहाँ से किया था। सेकेंड हेड मास्टर बाजपेयी जी हिन्दी पढ़ाते थे। कभी-कभी कवितायें सबको याद है अथवा नहीं चेक करने हेतु क्लास मे अंताक्षरी करा देते थे। जिस तरफ मेरी सीट मुकर्रर थी उधर और भी कई लड़के याद रखते थे। अतः अंताक्षरी हेतु उस पीरियड मे बाजपेयी जी संतुलन बनाने हेतु मुझे दूसरे पक्ष मे बैठा देते थे। एक बार अकेले मेरे ही  दम पर वह हारने वाला पक्ष मेरे अपने असली पक्ष से जीत गया था। तब से स्कूल छोडने तक बाजपेयी जी मुझे विशेष महत्व देते रहे। बिलकुल नया होने के बावजूद उन्होने गवर्नमेंट स्कूल मे होने वाले ज़िला वाद-विवाद प्रतियोगिता मे 'पक्ष' मे बोलने हेतु मेरा चयन किया । मुझे तथा विपक्ष मे बोलने वाले को रिक्शा पर लेकर गए थे। 5 मिनट की जगह मैं ढाई मिनट मे बोल गया। लौटते मे वह बोले कोई बात नहीं अगली बार फिर तुमसे ही बुलवाएंगे। और सच मे 1963- 64 की ज़िला वाद-विवाद प्रतियोगिता मे उन्होने मुझे ही पक्ष मे बुलवाया। इस बार मैं साढ़े चार मिनट मे बोल गया। बोल कर सीट पर आते वक्त उन्होने मुझसे धीरे से कहा 'शाबाश' और जब परिणाम घोषित हुआ तो मुझे 'कामायनी' प्रथम पुरस्कार के रूप मे प्राप्त हुई शील्ड एक माह मेरे घर रह कर स्कूल मे रही।
यह तो बाजपेयी जी का वायदा निभाने की बात थी। नहीं तो किसी और छात्र को भी मौका दे सकते थे। उससे भी बड़ी एक और बात उनकी है कि वह अक्सर अचानक 'टेस्ट' लिया करते थे और 7 वी कक्षा मे एक ऐसे ही अचानक के टेस्ट मे 'संस्कृत' मे मुझे कोई अंक नहीं मिला। उन्होने मुझसे कहा तुम्हारे नाना जी से शिकायत करेंगे। नाना जी बाज़ार वगैरह मे हमारे स्कूल के अध्यापकों को देख कर उनको नमस्ते करने के अलावा हम दोनों भाइयों की रिपोर्ट भी पूछते थे कि, कैसा पढ़ रहे हैं?आचरण कैसा है?उसके बाद मिलने पर बाजपेयी जी ने नाना जी से कहा ज़रा 'संस्कृत' पर ज़ोर दीजिये बाकी सब मे यह ठीक है। नाना जी ने उनसे कहा मास्टर साहब हम तो उर्दू,फारसी,अङ्ग्रेज़ी ही पढे हैं कृपया आप ही ध्यान दे लीजिये। आज का युग होता तो वह कहते 'ट्यूशन' लगवाइए। लेकिन उन्होने क्लास मे मुझ पर शिकंजा कस लिया और इस तुर्रे के साथ कि तुम्हारे नाना जी ने हमे अधिकार दे दिया है। यदि उनका दिया टास्क उनके पीरियड मे मैं पूरा जब नहीं कर पाता था तो वह मुझे किताब-कापी समेत अपने दूसरे क्लास मे ले चलते थे और मेरा अगला विषय छूट जाता था। फिर उन्होने ही कुछ सूत्र दिये जिनके बल पर मैं संस्कृत समझ सका और आज बिना संस्कृत पढे ही आज प्रोफेशन मे  'स्तुति' पाठ आराम से कर लेता हूँ।

1964 मे हम लोग भी बाबूजी के पास सिलीगुड़ी आ गए थे। वहाँ 'कृष्ण माया मेमोरियल हाई स्कूल ',आश्रम पाड़ा मे हमने मिड सेशन मे दाखिला लिया था। सभी अध्यापक बहुत अच्छे थे हेड मास्टर साहब अदिवतीय। 
डाक्टर के.एन.ओझा--हमारे हेड मास्टर साः भी द्वितीय विश्व युद्ध में सेना में रहे थे-वारेंट औफिसर के रूप में.उन्होंने बताया था उनके बैच में २० लोग भर्ती हुए थे १९ मारे गए.वह आगरा में C O D में तैनात रहे इसीलिए बच गए थे.निराला की ''वर दे वीणा वादिनी वर दे'' कड़क आवाज़ में सस्वर पाठ उनके ओज को दर्शाता था.पहले दिन कोई छात्र उनकी कसौटी पर खरा नहीं उतरा.दुसरे दिन मेरे साथ एक अन्य को उन्होंने पास किया.तीसरे दिन 3 को.६० छात्रों के बीच सिर्फ हम ५ छात्र ही निराला की कविता के लिए उपयुक्त पाए गये.डाक्टर ओझा ने कई पुस्तकें भी लिखीं थी;जब हम लोगों के स्कूल में लाइब्रेरी का प्रबंध हो गया तो उन्होंने कुछ पुस्तकें भेंट कर दीं.

1967 मे हम लोग एक बार फिर शाहजहाँपुर मे पढे थे ,विलंब से आने के कारण दाखिले मे फिर दिक्कत थी । गांधी फैजाम कालेज के प्राचार्य चौधरी वसी मोहम्मद साहब ने इंटर फर्स्ट ईयर मे मेरे मन मुताबिक विषयों मे दाखिला दे दिया । यहाँ सभी अध्यापक बहुत अच्छे थे सिर्फ कुछ की चर्चा कर रहा हूँ। 
  हमारे जी .ऍफ़ .कालेज में बी .ए .के साथ इंटर की पढ़ाई उस समय होती थी (अब वह केवल डिग्री कालेज है और इंटर सेक्शन इस्लामिया कालेज में चला गया है ).उ .प्र .में चौ .चरण सिंह की संविद सरकार ने अंगरेजी की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया था .लखनऊ से भुआ ने मुझे पत्र लिखा था कि ,"यह सरकार बच्चों को कुबड़डा बनाने पर तुली है ,तुम अंगरेजी जरूर लेना ".मै अंगरेजी में कमजोर था और नहीं लेना चाहता था .तब तक कालेज में सर्कुलर का इन्तजार था ,मैंने किताब नहीं खरीदी थी .किताब की शाहजहांपुर में किल्लत भी थी .प्रो .मोहिनी मोहन सक्सेना ने बरेली से मगाने  का प्रबंध किया था  ;समय बीतने के बाद उन्होंने सब की किताबें चेक करने को कहा था .मैंने उन्ही के रिश्तेदार जो वहां टी .ओ .थे के पुत्र जो मेरे क्लास में था से पुस्तक लेकर सारी रात टेबल लैम्प जला कर कापी में नक़ल उतार ली और अगले दिन कालेज ले गया .जब प्रो .सक्सेना ने मुझ से किताब दिखाने को कहा तो मैंने वही नक़ल दिखा दी .बोले ऐसा क्यों ?मैंने  जवाब दिया चूंकि मुझे अंग्रेजी छोड़ना है ,इसलिए किताब नहीं खरीदी -आपको दिखाना था इसलिए गिरिधर गोपाल की किताब से नक़ल बना ली है .प्रो .साहब इस बात से बहुत प्रसन्न हुए और बोले कि जब तुमने अग्रेजी के लिए इतनी मेहनत की है तो मेरी ख़ुशी के लिए तुम अंगरेजी को एडिशनल आप्शनल के रूप में जरूर लेना ,जिस से मेरा -तुम्हारा संपर्क बना रहे .इस प्रकार मैंने अंगरेजी को एडिशनल आप्शनल ले लिया .प्रो . सक्सेना बहुत अच्छी तरह पढ़ाते थे ,उनसे क्लास में संपर्क बनाये रखने में ख़ुशी ही हुई .

अंगरेजी के एक चैप्टर में पढ़ाते हुए प्रो . सक्सेना ने बड़े मार्मिक ढंग से कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी के लेख को समझाया जिसमे उन्होंने (तब वह भारत के शिक्क्षा मंत्र्री थे )ब्रिटिश कौसिल इन इंडिया का उद्घाटन करते हुए कहा था ---यहाँ मै एक साहित्यकार की हैसियत से आया हूँ ,एक राजनीतिग्य की हैसियत से नहीं क्योंकि यदि एक

राजनीतिग्य कहता है ---हाँ तो समझो शायद ,और यदि वह कहे शायद तो समझो नहीं और नहीं तो वह कहता ही नहीं .


हमारे इतिहास के प्रो .माशूक अली साहब नगर पालिका के चेयरमैन रहे छोटे खां सा .के परिवार से थे .उनका लकड़ी का व्यवसाय था वह तब केवल -रिक्शा और कालेज में खाए पान का खर्च मात्र १५० रु .आन्रेरियम लेते थे .हमारे नानाजी के एक भाई स्व .हरीश चन्द्र माथुर के वह सहपाठी रहे थे .जब उन्हें यह बताया तो बहुत खुश हुए और यदा -कदा मुझसे कहते थे अपने नानाजी को मेरा सलाम कह देना .इसी प्रकार बम्बई वाले नानाजी (नानाजी के वह भाई बम्बई में सर्विस काल में रहे थे)भी प्रो .सा .को अपना आदाब कहलाते थे .

 नागरिक -शास्त्र के प्रो .आर .के .इस्लाम सा .तथा अर्थ शास्त्र के प्रो .सा .(नाम अब याद नहीं है )भी अच्छा पढ़ाते थे ,इन दोनों का चयन अलीगढ मुस्लिम यूंनिवर्सिटी  में हो गया था .

इस्लाम सा .ने सर सैय्यद अहमद खां के बारे में बताते हुए उनके पुत्र सैय्यद महमूद जो बड़े वकील थे ,कभी केस हारे नहीं थे का उल्लेख किया था जो बहुत दिलचस्प है .:- पंजाब के किसी राज -परिवार के सदस्य को फांसी की सजा हो गयी थी उसे बचाने के लिए उन्हें महमूद सा . का नाम सुझाया गया था .जब वे लोग उनके पास पहुंचे तब उनके पीने का दौर चल रहा था और ऐसे में वह किसी से मिलते नहीं थे .बड़ी अनुनय -विनय करने पर उन्होंने सिख राज-परिवार के लोगों को बुलाया तथा काफी फटकार लगाई कि अब उनके पास क्यों आये ,अपने वकील से जाकर लड़ें जो अपील भी हार गया ,अब तो फांसी लगने दो .बड़ी खुशामद किये जाने पर उन्होंने कहा उनका कहा सब मानना होगा ,किसी के बहकावे में नहीं आना होगा .जब उनकी सभी शर्तें मान ली गयीं तब उन्होंने जिन्दगी बचाने की गारंटी दी और कोई अपील या केस नहीं किया .


फांसी का दिन आ गया ,घबराए परिवारीजनो से उन्होंने जेल पहुचने को कहा .खुद एन वक्त पर पहुंचे .फांसी का फंदा भी पड़ गया ,रोते लोगों को उन्होंने कहा उसे कुछ नहीं होगा ,इतने में  फंदा खींचने का हुक्म हो गया .फंदा खींच दिया गया उसी क्षण महमूद सा .ने तेज गुप्ती से फांसी का रस्सा काट दिया ,रस्सा गले में पड़ा -२ वह मुलजिम गढ़े में जिन्दा गिर गया .उसे उठाया गया लेकिन महमूद सा . ने कहा एक बार "हैंग "हो चुका दोबारा हैंग नहीं किया जा सकता .महमूद सा . के खिलाफ सरकारी काम में बाधा डालने का मुकदमा चला जिसे वह जीत गए उन्होंने सिद्ध किया कि वकील के नाते उनका काम मवक्किल को बचाना था उन्होंने बचा लिया .सरकारी काम में बाधा नहीं डाली क्योकि फांसी का फदा बाकायदा खींचा गया था .उन्होंने जजमेंट में खामी बताई कि टिळ डेथ नहीं लिखा था इसलिए दोबारा फांसी पर नहीं चढ़ाया जा सकता .वह यह मुकदमा भी जीते.लेकिन उसके बाद से फैसलों में लिखा जाने लगा -"हेंग टिळ डेथ ".इस वाकये ने न्याय  प्रणाली को बदल दिया था जो कि महमूद सा . के दिमाग का खेल था .

मैंने इस श्रंखला मे जिन शिक्षकों का उल्लेख किया है वे सभी कोर्स से हट कर काफी ज्ञानवर्द्धक बातें बताया करते थे जो आज तक व्यावहारिक जीवन मे काम आ रही हैं और उनके बल पर एक से बढ़ कर एक दिग्गजों के हमलों को मैं ध्वस्त करने मे सफल हो जाता हूँ।  



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बुधवार, 29 सितंबर 2010

सिलीगुडी में सवा तीन साल--(अंतिम भाग): विजय राजबली माथुर

(पिछली पोस्ट से आगे...)

वस्तुतः ईस्टर्न कमांड अलग बन जाने के बाद हालात ये थे कि रिटायरमेंट तक इधर से गए सभी लोगों को वहीँ रहना था.वह तो डिफेन्स यूनियनों के नेता और कम्युनिस्ट समर्थित सांसद सुरेन्द्र मोहन बनर्जी के संसद के भीतर व बाहर किये गए प्रयासों का फल था कि सेंट्रल कमांड से गए लोगों को वापिस आने का मौका मिल रहा था. कब कहाँ का ट्रांसफर ऑर्डर मिल जाए यह तय नहीं था.अतः सितम्बर में हम लोग फिर एक बार नाना जी के पास शाहजहांपुर पढने के लिए गए.लेकिन इन सवा तीन वर्षों में सिलीगुड़ी में जिन लोगों के साथ रहे उनका भी ज़िक्र करना यहाँ ज़रूरी है.जिस मकान में पहले पहल उतरे थे वह बाबू जी के S D O राजकुमार अग्रवाल साः के घर के सामने था उन्हीं ने दिलवाया था जो उनके मकान मालिक चक्रवर्ती साः के छोटे भाई का था जो रेलवे में ड्राइवर थे.सब लोग व्यवहार में बहुत अच्छे थे.एक और S D O गोयल साः के घर से भी आना जाना था.दर असल सिलीगुड़ी में सभी गैर बंगाली अधिकारी और मातहत सभी मिलजुल कर चलते थे.सब एक दुसरे से घरेलू सम्बन्ध रखते थे.बंगाली पडौसी भी सभी अच्छे थे.दुसरे मकान में भी हम लीगों के अलावा बाकी सभी किरायेदार बंगाली थे-सब अच्छे थे.वहां बरसात में कुँए का जल स्तर इतना ऊपर आ जाता था कि मन पर थोडा झुकने पर बाल्टी सीधे डुबो कर पानी भर लेते थे.अख़बारों के मुताबिक़ अब वहां भी जल स्तर गिर गया है.

''नक्सल बाड़ी आन्दोलन''--चुनावों के बाद १४ पार्टियों के मोर्चे की सरकार अजोय मुखर्जी के नेतृत्व में बनी थी.उप मुख्यमंत्री व गृह मंत्री ज्योती बसु बने थे.खाद्य मंत्री प्रफुल्ल चन्द्र घोष थे.सिलीगुड़ी से डाक्टर मैत्रेयी बसु सांसद चुनी गयी थीं जो हुमायूँ कबीर के बांगला कांग्रेस की थीं.यह वही कबीर साः थे जिनकी पुत्री लैला कबीर जॉर्ज फर्नांडीज़ की पत्नी बनीं.नई सरकार में C P M सबसे बड़ी पार्टी थी और इसके  कुछ कार्यकर्ताओं ने सिलीगुड़ी से ८ या १० कि.मी.दूर स्थित नक्सलबाड़ी में आदिवासियों को आगे कर के बड़े किसानों की जमीनों पर कब्ज़ा कर लिया था.पुलिस का रूख आन्दोलनकारियों के प्रति नरम था आखिर गृह मंत्री की पार्टी के तो कार्यकर्ता थे.हमारे मकान मालिक के साढू सपरिवार अपनी भैंस,भैंसे लेकर उनकी शरण में आये उनके कमला (संतरा)बगान और खेत सब छिन गए थे.न्यू मार्केट में मारवाड़ियों की दुकानें जला दी गयीं थीं. बड़ी अफरा तफरी मच गयी थी.स्कूल,कॉलेज बंद हो गए.हम लोग तो वैसे ही नहीं जा रहे थे.कुछ दिनों बाद C P M ने संसदीय प्रणाली में विश्वास जताया और अपने कार्यकर्ताओं से अवैध कब्ज़े छोड़ने को कहा तिस पर उन लोगों ने अलग पार्टी का गठन कर लिया जिन में,चारु मजूमदार,कानू सान्याल और M T नागी रेड्डी प्रमुख थे.नक्सलबाड़ी से फांसीद्वार थाना आदि होते हुए असाम के नल बाड़ी तक यह आन्दोलन बढ़ गया (अब तो पूरे देश में फ़ैल गया है).

सरकार की सख्ती से भू स्वामियों को ज़मीनें वापिस मिलीं और मारवाड़ियों ने नुक्सान से ज्यादा पैसा इंश्योरेंस कम्पनियों से वसूल लिया.नुक्सान गरीब बंगाली मजदूरों का हुआ,मारवाड़ियों ने उन्हें निकाल कर दूसरे कर्मचारी रख लिए.एक आदर्श मांग को गलत तरीके से उठाने और पाने के प्रयास में यह आन्दोलन आज भटकाव में उलझा है और सरकारी दमन का शिकार हो रहा है.नतीजा गरीब भूमिहीन आदिवासियों मजदूरों को भुगतना पड़ रहा है.सिलीगुड़ी में बांगला भाषा में तब कुछ ऐसे पोस्टर भी चिपके थे जिन पर लिखा था--''चीन के चेयरमैन माओ हमारे चेयरमैन''.इस आधार पर इस आन्दोलन को चीन प्रेरित मान कर भी कुचला गया.

''दार्जिलिंग की सैर'' --मुझे तो घूमने का कोई शौक तब भी नहीं था,परन्तु अजय दार्जिलिंग घूमना चाहता था अतः १९६६ की शरद पूर्णिमा (लक्ष्मी पूजा) के दिन हम लोगों को बाबू जी दार्जिलिंग घुमाने  ले गए.हम लोग जब नैरोगेज की गाड़ी में सिलीगुड़ी जंक्शन से बैठे तो तीन-तीन डिब्बों के बाद कुल तीन इंजन लगे थे.शुरू में पूरी एक गाड़ी थी.पहाड़ियों पर जब गाड़ी घूमती थी तो तीनों इंजन खिडकी से दीख जाते थे.किसी स्टेशन पर तीनों इंजन तीन तीन डिब्बों की तीन गाड़ियों में बंट गए जो बहुत कम फासले पर चल रही थीं और दीख रही थीं.एक स्टेशन पर मूलियाँ भी बाबू जी ने लीं-पहाडी मूलियाँ बेहद मीठी थीं.एक स्टेशन पर अजय को शौच के लिए बाबू जी ले कर उतरे  उतने में हम लोगों की गाड़ी चल दी और वे छूट गए.साथ के लोगों ने कहा कि वह पिछली गाड़ी पकड़ लेंगे चिंता की बात नहीं है.अगले स्टेशन पर वे दोनों पिछली गाड़ी से उतर के हम लोगों के साथ आ गए.हम लोग ''घूम'' स्टेशन पर उतर गए.(दार्जिलिंग अगला स्टेशन था)वहां बाबु जी ने ठहरने का प्रबंध कराया था,साथ में राशन वगैरह ले गए थे.लेकिन बाबू जी के एक S D O श्रीवास्तव साः अपने घर ले गए तो माँ ने सारा राशन उन्हीं के घर दे दिया.घूम से अगले दो दिन दार्जिलिंग शहर घूमने गए.ऊपर की सड़क से नीचे का बाज़ार रात में जगमग दीवाली सा चमकता दीखता था.कंचनजंघा देखने नहीं गए.मुझे सर्दी माफिक नहीं आती मेरे हाथ-पाँव सूज गए थे.लौटते में अलग अलग तीन गाड़ियाँ चलीं थीं जो रास्ते में फिर एक गाड़ी में बदल गयीं.वैसे हिलकार्ट रोड से भी पहाड़ियों का अवलोकन सिलीगुड़ी में हो जाता था.दार्जिलिंग की बात दूसरी थी अजय और शोभा को घूमने की प्रसन्नता थी.
सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग जाने वाली 'हिल कार्ट रोड' के साथ-साथ नेरोगेज की रेलवे लाईन

शाहजहांपुर वापसी-जब अगस्त  १९६७ तक बाबू जी को ट्रांसफर ऑर्डर नहीं मिला तो बाबू जी ने नाना जी से पत्र लिख कर हम लोगों को एक वर्ष वहां फिर पढ़ाने हेतु भेजने को कहा तथा उनकी सहमती के बाद सितम्बर में A T मेल से RESERVATION कराकर बैठा दिया.माँ को पहली बार हम तीनों भाई-बहनों को लेकर अकेले सफ़र करना था वह भी एक दम इतनी लम्बी दूरी का परन्तु उन्होंने कहीं भी साहस नहीं छोड़ा.गाड़ी लखनऊ चारबाग की छोटी लाइन पर पहुंची और बड़ी लाइन की गाड़ी से शाहजहांपुर जाना था.छोटी लाइन के कुली काली पोशाक पहनते थे और बड़ी लाइन के कुली लाल पोशाक.एक दूसरे के स्टेशनों में नहीं जाते थे.परन्तु छोटी लाइन का एक कुली भला निकल आया उसने छोटी लाइन से ले जा कर बड़ी लाइन से शाहजहांपुर को छूटने वाली पैसेंजर गाड़ी में सामान कई फेरों में ले जा कर पहुंचा दिया.शायद कुछ ज्यादा रु.लिए होंगे.वह कुली मुझे और अजय को सामान के साथ लाकर इंजन के ठीक पीछे वाले डिब्बे में बैठा गया.सामान ज्यादा था क्योंकि बाद में बाबू जी को अकेले आना था कितना सामान ला पते?कुली बीच में अकेला ही सामान ढो कर लाया और हम भाइयों के पास रख गया.तीसरी या चौथी बार के फेरे में माँ और शोभा भी आये;गाड़ी सीटी देने लगी थी,गार्ड ने हरी झंडी दिखा दी थी-कुली ने दौड़ लगा कर पटरियां फांद कर इंजन के सामने से सामान ला दिया और भाप इंजन के ड्राइवर को रुकने का इशारा किया जब माँ और शोभा डिब्बे में चढ़ गए तब कुली ने मेहनताना लिया और धीमी चलती गाड़ी से उतर गया.आज का ज़माना होता तो लम्बी गाड़ी में इंजन का हार्न और गार्ड की सीटी की आवाज़ भी सुनाई नहीं देती और विद्युत् गति में गाड़ी दौड़ जाती.उस समय तक भलमनसाहत थी-वह अज्ञात कुली हम लोगों के लिए देवदूत सामान था उसे लाखों नमन.

(समाप्त)

Typist -यशवन्त

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