गुरुवार, 25 जून 2026

ब उआ की ३२ वीं पुण्यतिथि पर स्मरण ------ विजय राजबली माथुर

 



(स्व.कृष्णा माथुर : जन्म- 20 अप्रैल 1924 मृत्यु - 25 जून 1995 )


ब उआ को यह संसार छोड़े ३१ वर्ष आज पूर्ण हो गए हैं ,वह जननी,  माँ  और माता थीं। मैंने भरसक कोशिश की कि, उनको और बाबूजी को हमारी वजह से कोई दिक्कत न हो। ब उआ की इच्छा थी कि, बाबूजी डालीगंज, लखनऊ में जमीन खरीदने के बाद भी मकान न बना सके थे तो मैं सरकारी स्कीम में बना - बनाया मकान ले लूँ। इत्तिफ़ाक से मेरठ की सवा तीन साल की नौकरी में बचत के तीन हजार रु वहीं जमा थे जिनको निकाल कर २७ मार्च १९७७ को ड्राफ्ट बनवा  कर लखनऊ भेज दिया था। कमला नगर, आगरा में मुझे मकान एलाट  हो गया और बाबूजी के रिटायरमेंट के बाद १२ नवंबर १९७८ से मृत्युपर्यंत ब उआ एवं बाबूजी उसी  मकान में हमारे साथ ही रहे । बीच में एक बार भतीजी के जन्म के समय और एक बार और मिलाकर कुल छह माह भाई के पास फरीदाबाद रहे।  

२५ मार्च १९८१ को शालिनी से एंगेजमेंट के बाद २४ मई १९८१ को टेंपोरेरी ट्रांसफर पर मैं तो कारगिल चला गया था । मेरे गैर - हाजिरी में शालिनी का भाई शरद मोहन माथुर बउआ के पास आया और वहाँ रहने की उत्कंठा व्यक्त की , ब उआ ने उसको किराये पर मकान दिल देने की बात कही। लेकिन उसकी तो गिद्ध -दृष्टि हमारे मकान पर थी वह बहन की शादी से पूर्व ही घर में घुसपैठ बनाना चाहता था। अतः शहर में ही ड्यूटी करते हुए भी कभी अपनी बहन से मिलने भी नहीं आया । उसकी माँ का कहना था शरद खुशखबरी लेकर ही आएगा। २४ नवंबर १९८२ को यह सूचना लेकर आया कि, बच्चे की डेथ हो गई। उसकी माँ की यह खुशखबरी थी। इस कारण उस परिवार से संपर्क अवरुद्ध हो गया था। १९८४ में जब ब उआ गंभीर बीमार हुईं तब शालिनी के माता-पिता उनको देखने आए और माफी मांग कर गए तो पुनः आवागमन शुरू हो सका जो १६ जून १९९४ तक : शालिनी के निधन तक ही चल सका। १३ जून १९९५ को बाबूजी और २५ जून १९९५ को ब उआ के निधन के बाद जब पूनम यशवंत की माँ की हैसियत में आईं जिस बाबत चर्चा बाबूजी ने ब उआ के सुझाव पर चलाई थी । पूनम शालिनी की माँ को अपनी स्थानीय माँ घोषित कर आईं लेकिन उन्होंने उलटे पूनम को ही उकसाया कि, किसी को किसी के बच्चे की जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए। शरद मोहन माथुर ने यशवंत को नाले में गिरवाने और अपहरण करवाने के प्रयास भी किए जिस कारण उन लोगों के खिलाफ एफ आई आर भी करवानी पड़ी थी। 

२००९ में आगरा का मकान बेच कर लखनऊ के जानकीपुरम में एक छोटे मकान में आ गए थे। उसे बेच कर और कुछ गाँव के खेत बेच कर बंथरा, लखनऊ में पूनम और यशवंत के लिए एक- एक मकान तथा यशवंत के लिए एक दुकान भी ले दी है। लेकिन शरद मोहन माथुर के रक्त - बीज हर जगह मौजूद हैं जिनकी गिद्ध -दृष्टि उनके मकानों पर गड़ी हुई है जिनका नेतृत्व गोकागु अर्थात घसियारा करता है। यशवंत विरोधी मकान का पहला गिद्ध शरद मोहन खुद और उसकी पत्नी भी टी बी से ग्रसित हो चुके हैं,उनके लिए यह परमात्मा और प्रकृति की ओर से प्रतीकात्मक दंड था। मैंने खुद और यशवंत तथा पूनम ने भी किसी का बुरा किया नहीं बल्कि यथा -संभव लोगों का भला ही किया है। अतः जो लोग भी उनके मकानों पर गिद्ध -दृष्टि डालेंगे निश्चय ही परमात्मा और प्रकृति की ओर से दंडित ही होंगे। ये मकान ब उआ की इच्छा और आशीर्वाद से हैं जिनको कोई भी गिद्ध हड़पना चाहेगा तो अपना ही नुकसान करेगा। 
ब उआ की आत्मा जहां भी हो हम उनके लिए शांति की प्रार्थना करते हैं। 


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मंगलवार, 16 जून 2026

३३ वीं पुण्यतिथि पर स्मरण ------ विजय राजबली माथुर

 



(शलिनी माथुर : 04 जनवरी 1959- 16 जून 1994 )

कुल साढ़े बारह वर्ष का ही साथ रहा और 25 मार्च 1981 को एंगेजमेंट के तुरंत बाद जब उन लोगों ने शालिनी के हाथ का अध्यन करने को कहा था और आयु रेखा 35 वर्ष पर ही समाप्त दीखी थी तब माथा तो ठनका था कि क्या महज़ 13 वर्ष का ही साथ होगा। उस वक्त कुछ किसी को बताया नहीं जा सका , बताना उचित भी नहीं था फिर दिमाग से बात ऐसे गायब हो गई जैसे गधे के सिर से सींग। फिर जब मथुरा में शालिनी के ममेरे भाई राम अवध नारायण माथुर साहब की पुत्री लवलीन ने उनका हाथ देख कर कहा था  कि " भुआ आपकी आयु तो 36 वर्ष ही है। " तो उनका जवाब था कि अब हम मरने वाले हैं। उनके बड़े भाई कुक्कू के दोस्त वीर बहादुर सिंह टामटा ने टूंडला से इटावा पहुँच कर हाथ देख कर पहले ही बता दिया था कि कुल आयु 36 तक है अतः उन सबको पहले से ही मालुम था। 16 जून 1994 को मृत्यु के समय 36 वां वर्ष ही चल रहा था। 

चूंकि अजय को शीघ्र ही वापिस फरीदाबाद लौटना था अतः बाबूजी ने परंपरागत तेरहवीं के चक्कर में न पड़ कर 'आर्यसमाज' के पुरोहित से पाँच दिन पर 'हवन' करवा लिया था। दकियानूस पोंगापंडितों के चक्कर में फंसे रिशतेदारों व अन्य लोगों ने इसकी आलोचना की कि तेरहवीं क्यों नहीं की। गोविंद बिहारी मौसाजी सबसे ज़्यादा बाबूजी के विरुद्ध मुखर थे। तब माँ ने बताया कि उन मौसाजी के श्वसुर अर्थात माँ के फूफाजी ने तो उनकी भुआ के निधन पर सिर्फ तीन दिन बाद ही हवन करवा लिया था। मैंने इस प्रश्न को उनके समक्ष रखा और पूछा कि वह अपने  साढ़ू अर्थात हमारे बाबूजी की तो निंदा कर रहे हैं अपने श्वसुर साहब के बारे में उनकी क्या राय है। तब से मुझको सद्दाम हुसैन कहने व प्रचारित करने लगे थे। 

बहरहाल शालिनी के बाद से जो आर्यसमाज से संपर्क हुआ वह अगले वर्ष जून 1995 में बाबूजी व माँ के निधन के बाद से और गहरा हो गया व बाद में कमलानगर-बल्केशवर  आर्यसमाज, आगरा की कार्यकारिणी में भी मैं शामिल रहा किन्तु आर्यसमाज के आर एस एस प्रभुत्व के लोगों के नियंत्रण के बाद संगठन छोड़ दिया। जबकि नीति और सिद्धांतों का अनुसरण अब भी करता हूँ। आर्यसमाज 'हिंदूवाद' के विरुद्ध है अतः मौलिक आर्यसमाजी सदैव आर एस एस जिसका गठन ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा के लिए हुआ था का विरोधी होता है  जबकि आर्यसमाज का गठन ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ने हेतु किया गया था।
बहरहाल हम लोग आर्यसमाज के निकट शालिनी के निधन के बाद आए थे , आर्यसमज,कमला नगर -बलकेश्वर,आगरा से शालिनी के पुत्र यशवंत उर्फ बाँके को पुरस्कृत  भी किया जा चुका है। शालिनी अक्सर कहा करती थीं कि, वह बाँके की शादी नहीं करेंगी , चाहे उनके भई कुक्कू के दोस्त के बताए अनुसार या उनकी एक भतीजी के बताए अनुसार। जब आगे जीवित ही नहीं रहीं तो पुत्र की शादी करतीं कैसे ?

बाँके के आग्रह पर ही बाबूजी ने पूनम के पिताजी को पोस्ट कार्ड भेज दिया था जिसके उत्तर में आए उनके एक पत्र का पुनः उत्तर भी भेज चुके थे परंतु १३ जून १९९५ की रात्रि  उनका निधन हो गया और १२ दिन बाद २५ जून १९९५ को ब उआ का भी निधन हो गया। 

वैसे बाबाजी और नानाजी की भांति ही मैं भी पुनर्विवाह नहीं करना चाहता था किन्तु बाबूजी और ब उआ के इरादे और चुनाव का सम्मान करते हुए पूनम से पुनर्विवाह कर लिया था। माता - पिता का निधन होने के कारण  मुझे खुद पत्रचार और बात- चीत करना पड़ा क्योंकि भाई- बहन दोनों मुझसे छोटे हैं। पूनम ने माता का फर्ज पूरी तरह निभाया । 

लेकिन जब यशवंत की इच्छानुसार विवाह की अनुमति हमने दे  दी तो उसके सुसरालियों ( पुत्र - वधू के माता - पिता दोनों ही पहले ही दिवंगत हो चुके थे ) ने सीधे ही यशवंत से संपर्क रखा हम लोगों से नहीं। हम लोग विवाह में अपने फर्ज के लिए शामिल थे अवांछित के रूप में। 

जब इस बार विवाह के बाद पहली बार शालिनी तथा बाबूजी की पुण्यतिथियों पर पुत्र और पुत्र - वधू विशेष छह वैदिक आहूतियों से हवन कर सकते थे ( जो पूनम को ग्लूकोमा एवं मोतियाबिंद  होने के बाद से रुक गया था ) लेकिन सुसरालियों के साथ वे लोग इन तारीखों में ही तीर्थाटन पर चले गए। 

पुत्र - पुत्रवधू अपने दायित्वों का निर्वहन करें या न करें जैसा उनका बुद्धि- विवेक कहे लेकिन हम तो उनके प्रति अपने दायित्व का निर्वहन करेंगे ही। शालिनी के हक के अनुसार मकान के दो  भाग में से एक भाग की वसीयत पुत्र के नाम रेजिस्टर करा दी है। उस  भाग में वे लोग निवास भी कर रहे हैं। 

शालिनी के एक भाई शरद मोहन ने आगरा में यशवंत को नाले में गिरवाने और अपहरण करवाने का भी प्रयास किया था इसलिए आगरा छोड़ कर लखनऊ आ गए थे। शरद मोहन की भाभी ने मुजफ्फर नगर में बताया था कि,शरद मोहन ने उनका सारा जेवर रेल यात्रा में गायब करा लिया था। अतः हम शालिनी को इस श्रद्धांजली के माध्यम से पुत्र और पुत्र- वधू को सचेत करना चाहते हैं कि वे यशवंत   के ननसालियों से पक्के तौर पर दूर रहें और इतना साहस सुसरालियों से कहने का रखें कि परिवार के प्रति भी उनको अपना फर्ज निभाने दें। 


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शनिवार, 13 जून 2026

बाबूजी की ३२ वीं पुण्यतिथि पर श्रद्धावत स्मरण ------ विजय राजबली माथुर

 


जन्म:24-10-1919,दरियाबाद (बाराबंकी );मृत्यु:13-06-1995;आगरा  

हमारे बाबूजी ताज राजबली माथुर साहब ने अपनी पूरी ज़िंदगी 'ईमान ' व 'स्वाभिमान ' के साथ आभावों में गुज़ार दी लेकिन कभी उफ तक न की न ही कोई उलाहना कभी किसी को दिया। आज जब लोग अपने हक हुकूक के लिए किसी भी हद तक गिर जाते हैं हमारे बाबूजी ने अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपने हक को भी ठुकरा दिया था। मैंने भी पूरी कोशिश करके 'ईमान ' व 'स्वाभिमान ' की भरसक रक्षा की है भले ही अपने ही भाई - बहन की निगाहों में मूर्ख सिद्ध हुआ हूँ। उत्तर प्रदेश के माथुर कायस्थ परिवारों में हमारे  बली  खानदान  से सभी परिचित हैं।

बाबूजी ने फूफा जी के साथ साथ डालीगंज ,लखनऊ में जमीन खरीदी थी लेकिन न तो फूफा जी और न ही बाबूजी मकान बनवा सके दोनों को अपनी - अपनी ज़मीनें बेचनी पड़ीं। बाबूजी ने पुश्तैनी खेती में भी हिस्सा नहीं लिया था। १९७५ में जब मैं मेरठ में बेरोजगार होकर आगरा पहुंचा तो बउआ ने मुझसे आगरा में मकान लेने को कहा, कार्यस्थल पर एक साथी ने बताया कि हाउसिंग बोर्ड में कुछ मकान बिकाऊ हैं। मेरठ में रोजगार की बचत के रु ३०००/- जमा थे उनको आगरा मँगवाकर २७ मार्च १९७७ को ड्राफ्ट बनवाकर लखनऊ भेज दिया। उस समय वेतन रु २७५ /-मासिक था और मकान की मासिक किश्त रु २९०/- प्रतिमाह जमा करना था। ०३ अप्रैल १९७८ को जब मकान एलाट  हुआ  तब वेतन रु ५००/- हो चुका था अतः किश्त आसानी से देते रहे। सितंबर १९७८ में बाबूजी के रिटायरमेंट के बाद १२ नवंबर १९७८ को कमलानागर स्थित उस मकान में शिफ्ट हो गए तब से अपनी मृत्यु तक बाबूजी और बउआ वहीं मेरे साथ ही रहे। बीच में शायद पाँच माह के लिए फरीदाबाद भतीजी के जन्म  के समय  गए थे।

२५ मार्च १९८१ को शालिनी से शादी तय  होने के बाद  उनका भाई शरद मोहन ने आकार बउआ से वहाँ रहने की इच्छा जाहिर की उन्होंने आस - पास किराये पर दिलवाने को कहा लेकिन नहीं लिया क्योंकि बहन के आने से पहले ही घर में घुसना उद्देश्य था। फिर उसे शहर में जाब करते हुए भी कभी बहन से मिलने भी नहीं आया। उनकी मा का कहना था कि वह खुशखबरी लेकर आएगा। फिर२४ नवंबर १९८२ को  आया तो यह समाचार लेकर कि, बच्चे की डेथ हो गई है । 

१९८४ की अक्षय तृतीया पर जब यशवंत सवा  साल का था बउआ की इच्छा पर उसको लेकर वृंदावन , बाँके बिहारी जी के दर्शन हेतु गए वहाँ से आने के बाद मिथ्या आरोपों पर मुझे सस्पेंड कर दिया गया । १९६२  मेंभी जब  बउआ की इच्छा पर वृंदावन , बाँके बिहारी जी के दर्शन हेतु गए वहाँ से आने के बाद बाबूजी का ट्रांसफर नान  फेमिली स्टेशन सिलीगुड़ी हो गया था और हम सब भई- बहन की पढ़ाई गड़बड़ा गई थी। 

बाबूजी प्रति वर्ष कुछ रु बद्रीनाथ भेजते थे और डाक से वहाँ से प्रसाद प्राप्त करते थे। आजीवन कष्ट में उन दोनों का जीवन व्यतीत हुआ। जब मैंने ज्योतिष का ज्ञान अर्जित किया और  अध्ययन किया तो पाया कि, बाबूजी की जन्म -कुंडली में ब्रहस्पति  ' उच्च ' का था । जिनका ब्रहस्पति  ' उच्च ' का अथवा ' स्व - राशि ' का होता है उन लोगों को न तो मंदिर में दान देना चाहिए न मंदिर  के पुजारी को दक्षिणा देनी चाहिए अन्यथा उनको कष्ट ही होता है। इसी प्रकार सभी ग्रहों के अनुसार उनके उच्च  अथवा स्व- राशिस्थ होने पर उनके दान करने पर कूफल ही मिलता है। 

पुत्र के विवाह के बाद आज बाबूजी की पुण्यतिथि पहली बार थी यदि पुत्र और पुत्र- वधू तीर्थ -यात्रा पर न जाते तो जैसे हम छह विशेष आहुतियों के साथ पुण्यतिथि पर आत्मा की शांति हेतु हवन करते थे वे लोग कर सकते थे। पूनम की आँखों में ग्लूकोमा  और मोतियाबिंद होने के बाद से यह प्रक्रिया रुक गई थी जिसे बाबूजी के पौत्र और पौत्र- वधू कर सकते थे। किन्तु पुत्र अपने जिन सुसरालियों के साथ तीर्थाटन पर है वे आर्यसमाज पद्धति के विरोधी हैं। 

शालिनी के निधन के बाद बाबूजी ने आर्यसमाज पद्धति से ही ५ दिन बाद  हवन करवाया था। तब गोविंद बिहारी मौसाजी ने हमारे बाबूजी की खिली उड़ाई थी जबकि उनके श्वसुर साहब ने भी उनकी सास साहिबा के निधन पर ३ दिन बाद हवन करवाया था। खुद बाबूजी और फिर ब उआ के निधन के बाद भी हमने  आर्यसमाज पद्धति से ही हवन करवाए थे। आर्यसमाज कमला नगर - बलकेश्वर, आगरा में मैं सक्रिय सदस्य भी बन गया था। कार्यक्रमों में भाग भी लेता था। कई बार मुझको भी अपने विचार रखने का मौका दिया गया था। २००९ में आगरा से लखनऊ आ जाने पर यह सिलसिला टूट गया था। इस वर्ष १५ फरवरी २०२६ को आर्यसमाज सदर, लखनऊ में मंत्री महोदय ने शिव -रात्रि के अवसर पर मुझे बोलने का अवसर प्रदान किया था। 

मैं चाहता तो था कि,पुत्र और पुत्र - वधू हम लोगों के कार्य जो छूट  गया था अपने हाथ में ले लेते लेकिन मैंने उन लोगों की इच्छा में रोड़ा बनना उचित नहीं समझा। बाबूजी जैसा ब्रहस्पति पुत्र - वधू का होने के कारण उन लोगों को दान करने का निषेध जरूर कर दिया है। 

मैंने तो बाबूजी की इज्जत की खातिर आर्यसमाज को अपना लिया था लेकिन उनके पौत्र और पौत्र - वधू आगे इसे जारी रखेंगे इसमें घोर संदेह है। जून का माह शालिनी, बाबूजी और ब उआ के निधन का माह है , १६ और १३ तथा  २५ जून  उनकी पुण्यतिथियाँ है। 

पूनम  भी बाबूजी को अपने श्रद्धा - सुमन अर्पित कर रही हैं । 



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रविवार, 15 फ़रवरी 2026

शिव : ज्ञान -विज्ञान का प्रदाता : : ------ विजय राजबली माथुर

 "ॐ नमः शिवाय च का अर्थ है-Salutation To That Lord The Benefactor of all "यह कथन है संत श्याम जी पाराशर का.अर्थात हम अपनी मातृ -भूमि भारत को नमन करते हैं.वस्तुतः यदि हम भारत का मान-चित्र और शंकर जी का चित्र एक साथ रख कर तुलना करें तो उन महान संत क़े विचारों को ठीक से समझ सकते हैं.शंकर या शिव जी क़े माथे पर अर्ध-चंद्राकार हिमाच्छादित हिमालय पर्वत ही तो है.जटा से निकलती हुई गंगा -तिब्बत स्थित (अब चीन क़े कब्जे में)मानसरोवर झील से गंगा जी क़े उदगम की ही निशानी बता रही है.नंदी(बैल)की सवारी इस बात की ओर इशारा है कि,हमारा भारत एक कृषि -प्रधान देश है.क्योंकि ,आज ट्रेक्टर-युग में भी बैल ही सर्वत्र हल जोतने का मुख्य आधार है.शिव द्वारा सिंह-चर्म को धारण करना संकेत करता है कि,भारत वीर-बांकुरों का देश है.शिव क़े आभूषण(परस्पर विरोधी जीव)यह दर्शाते हैंकि,भारत "विविधताओं में एकता वाला देश है."यहाँ संसार में सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र चेरापूंजी है तो संसार का सर्वाधिक रेगिस्तानी इलाका थार का मरुस्थल भी है.विभिन्न भाषाएं बोली जाती हैं तो पोशाकों में भी विविधता है.बंगाल में धोती-कुर्ता व धोती ब्लाउज का चलन है तो पंजाब में सलवार -कुर्ता व कुर्ता-पायजामा पहना जाता है.तमिलनाडु व केरल में तहमद प्रचलित है तो आदिवासी क्षेत्रों में पुरुष व महिला मात्र गोपनीय अंगों को ही ढकते हैं.पश्चिम और उत्तर भारत में गेहूं अधिक पाया जाता है तो पूर्व व दक्षिण भारत में चावल का भात खाया जाता है.विभिन्न प्रकार क़े शिव जी क़े गण इस बात का द्योतक हैं कि, यहाँ विभिन्न मत-मतान्तर क़े अनुयायी सुगमता पूर्वक रहते हैं.शिव जी की अर्धांगिनी -पार्वती जी हमारे देश भारत की संस्कृति (Culture )ही तो है.भारतीय संस्कृति में विविधता व अनेकता तो है परन्तु साथ ही साथ वह कुछ  मौलिक सूत्रों द्वारा एकता में भी आबद्ध हैं.हमारे यहाँ धर्म की अवधारणा-धारण करने योग्य से है.हमारे देश में धर्म का प्रवर्तन किसी महापुरुष विशेष द्वारा नहीं हुआ है जिस प्रकार इस्लाम क़े प्रवर्तक हजरत मोहम्मद व ईसाईयत क़े प्रवर्तक ईसा मसीह थे.हमारे यहाँ राम अथवा कृष्ण धर्म क़े प्रवर्तक नहीं बल्कि धर्म की ही उपज थे.राम और कृष्ण क़े रूप में मोक्ष -प्राप्त आत्माओं का अवतरण धर्म की रक्षा हेतु ही,बुराइयों पर प्रहार करने क़े लिये हुआ था.उन्होंने कोई व्यक्तिगत धर्म नहीं प्रतिपादित किया था.आज जिन मतों को विभिन्न धर्म क़े नाम से पुकारा जा रहा है ;वास्तव में वे भिन्न-भिन्न उपासना-पद्धतियाँ हैं न कि,कोई धर्म अलग से हैं.लेकिन आप देखते हैं कि,लोग धर्म क़े नाम पर भी विद्वेष फैलाने में कामयाब हो जाते हैं.ऐसे लोग अपने महापुरुषों क़े आदर्शों को सहज ही भुला देते हैं. 

"भक्ति"  : 

आचार्य श्री राम शर्मा गायत्री परिवार क़े संस्थापक थे और उन्होंने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा था -"उन्हें मत सराहो जिनने अनीति पूर्वक सफलता पायी और संपत्ति कमाई."लेकिन हम देखते हैं कि,आज उन्हीं क़े परिवार में उनके पुत्र व दामाद इसी संपत्ति क़े कारण आमने सामने टकरा रहे हैं.गायत्री परिवार में दो प्रबंध समितियां बन गई हैं.अनुयायी भी उन दोनों क़े मध्य बंट गये हैं.कहाँ गई भक्ति?"भक्ति"शब्द ढाई अक्षरों क़े मेल से बना है."भ "अर्थात भजन .कर्म दो प्रकार क़े होते हैं -सकाम और निष्काम,इनमे से निष्काम कर्म का (आधा क) और त्याग हेतु "ति" लेकर "भक्ति"होती है.आज भक्ति है कहाँ? 


विकृति  : 


महर्षि दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना धर्म में प्रविष्ट कुरीतियों को समाप्त करने हेतु ही एक आन्दोलन क़े रूप में की थी.नारी शिक्षा,विधवा-पुनर्विवाह ,जातीय विषमता की समाप्ति की दिशा में महर्षि दयानंद क़े योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता.आज उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज में क्या हो रहा है-गुटबाजी -प्रतिद्वंदिता .

काफी अरसा पूर्व आगरा में आर्य समाज क़े वार्षिक निर्वाचन में गोलियां खुल कर चलीं थीं.यह कौन सी अहिंसा है?जिस पर स्वामी जी ने सर्वाधिक बल दिया था. स्वभाविक है कि, यह सब नीति-नियमों की अवहेलना का ही परिणाम है,जबकि आर्य समाज में प्रत्येक कार्यक्रम क़े समापन पर शांति-पाठ का विधान है.यह शांति-पाठ यह प्रेरणा देता है कि, जिस प्रकार ब्रह्माण्ड में विभिन्न तारागण एक नियम क़े तहत अपनी अपनी कक्षा (Orbits ) में चलते हैं उसी प्रकार यह संसार भी जियो और जीने दो क़े सिद्धांत पर चले.परन्तु एरवा कटरा में गुरुकुल चलाने  वाले एक शास्त्री जी ने रेलवे क़े भ्रष्टतम व्यक्ति जो एक शाखा क़े आर्य समाज का प्रधान भी रह चुका था क़े भ्रष्टतम सहयोगी क़े धन क़े बल पर एक ईमानदार कार्यकर्ता पर प्रहार किया एवं सहयोग दिया पुजारी व पदाधिकारियों ने तो क्या कहा जाये कि, आज सत्यार्थ-प्रकाश क़े अनुयायी ही सत्य का गला घोंट कर ईमानदारी का दण्ड देने लगे हैं.यह सब धर्म नहीं है.परन्तु जन-समाज ऐसे लोगों को बड़ा धार्मिक मान कर उनका जय-जयकारा करता है.आज जो लोगों को उलटे उस्तरे से मूढ़ ले जाये उसे ही मान-सम्मान मिलता है.ऐसे ही लोग धर्म व राजनीति क़े अगुआ बन जाते हैं.ग्रेषम का अर्थशास्त्र में एक सिद्धांत है कि,ख़राब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है.ठीक यही हाल समाज,धर्म व राजनीति क़े क्षेत्र में चल रहा है.जबसे आर्यसमाज में संघ अनुयायी छा गए हैं आर्यसमाज दयानन्द सरस्वती के मार्ग से भटक गया है और इसी लिए उसमें उपरोक्त विकृति पनप सकीं .


दुनिया लूटो,मक्कर से.

रोटी खाओ,घी-शक्कर से.

   एवं

अब सच्चे साधक धक्के खाते हैं .

फरेबी आज मजे-मौज  उड़ाते हैं.


शिव : ज्ञान -विज्ञान का प्रदाता  : :


आज बड़े विद्वान,ज्ञानी और मान्यजन लोगों को जागरूक होने नहीं देना चाहते,स्वजाति बंधुओं की उदर-पूर्ती की खातिर नियमों की गलत व्याख्या प्रस्तुत कर देते हैं.राम द्वारा शिव -लिंग की पूजा किया जाना बता कर मिथ्या सिद्ध करना चाहते हैं कि, राम क़े युग में मूर्ती-पूजा थी और राम खुद मूर्ती-पूजक थे. वे यह नहीं बताना चाहते कि राम की शिव पूजा का तात्पर्य भारत -भू की पूजा था. वे यह भी नहीं बताना चाहते कि, शिव परमात्मा क़े उस स्वरूप को कहते हैं कि, जो ज्ञान -विज्ञान का दाता और शीघ्र प्रसन्न होने वाला है. ब्रह्माण्ड में चल रहे अगणित तारा-मंडलों को यदि मानव शरीर क़े रूप में कल्पित करें तो हमारी पृथ्वी का स्थान वहां आता है जहाँ मानव शरीर में लिंग होता है.यही कारण है कि, हम पृथ्वी -वासी शिव का स्मरण लिंग रूप में करते हैं और यही राम ने समझाया भी होगा न कि, स्वंय ही  लिंग बना कर पूजा की होगी. स्मरण करने को कंठस्थ करना कहते हैं न कि, उदरस्थ करना.परन्तु ऐसा ही समझाया जा रहा है और दूसरे विद्वजनों से अपार प्रशंसा भी प्राप्त की जा रही है. यही कारण है भारत क़े गारत होने का.



जैसे सरबाईना और सेरिडोन क़े विज्ञापनों में अमीन सायानी और हरीश भीमानी जोर लगते है अपने-अपने उत्पाद की बिक्री का वैसे ही उस समय जब इस्लाम क़े प्रचार में कहा गया कि हजरत सा: ने चाँद क़े दो टुकड़े  कर दिए तो जवाब आया कि, हमारे भी हनुमान ने मात्र ५ वर्ष की अवस्था में सूर्य को निगल लिया था अतः हमारा दृष्टिकोण श्रेष्ठ है. परन्तु दुःख और अफ़सोस की बात है कि, सच्चाई साफ़ करने क़े बजाये ढोंग को वैज्ञानिकता का जामा ओढाया जा रहा है.


यदि हम अपने देश  व समाज को पिछड़ेपन से निकाल कर ,अपने खोये हुए गौरव को पुनः पाना चाहते हैं,सोने की चिड़िया क़े नाम से पुकारे जाने वाले देश से गरीबी को मिटाना चाहते हैं,भूख और अशिक्षा को हटाना चाहते हैं तो हमें "ॐ नमः शिवाय च "क़े अर्थ को ठीक से समझना ,मानना और उस पर चलना होगा तभी हम अपने देश को "सत्यम,शिवम्,सुन्दरम"बना सकते हैं.आज की युवा पीढी ही इस कार्य को करने में सक्षम हो सकती है.अतः युवा -वर्ग का आह्वान है कि, वह सत्य-न्याय-नियम और नीति पर चलने का संकल्प ले और इसके विपरीत आचरण करने वालों को सामजिक उपेक्षा का सामना करने पर बाध्य कर दे तभी हम अपने भारत का भविष्य उज्जवल बना सकते हैं.काश ऐसा हो सकेगा?हम ऐसी आशा तो संजो ही सकते हैं.

" ओ ३ म *नमः शिवाय च" कहने पर उसका मतलब यह होता है.:-

*अ +उ +म अर्थात आत्मा +परमात्मा +प्रकृति 

च अर्थात तथा/ एवं / और 

शिवाय -हितकारी,दुःख हारी ,सुख-स्वरूप 


नमः नमस्ते या प्रणाम या वंदना या नमन ******


'शैव' व 'वैष्णव' दृष्टिकोण की बात कुछ विद्वान उठाते हैं तो कुछ प्रत्यक्ष पोंगापंथ का समर्थन करते हैं तो कुछ 'नास्तिक' अप्रत्यक्ष रूप से पोंगापंथ को ही पुष्ट करते हैं। सार यह कि 'सत्य ' को साधारण जन के सामने न आने देना ही इनका लक्ष्य होता है। सावन या श्रावण मास में सोमवार के दिन 'शिव' पर जल चढ़ाने के नाम पर, शिव रात्रि पर भी तांडव करना और साधारण जनता का उत्पीड़न करना इन पोंगापंथियों का गोरख धंधा है। 


'परिक्रमा' क्या थी ?: 



वस्तुतः प्राचीन काल में जब छोटे छोटे नगर राज्य (CITY STATES) थे और वर्षा काल में साधारण जन 'कृषि कार्य' में व्यस्त होता था तब शासक की ओर से राज्य की सेना नगर राज्य के चारों ओर परिक्रमा (गश्त) किया करती थी और यह सम्पूर्ण वर्षा काल में चलने वाली निरंतर प्रक्रिया थी जिसका उद्देश्य दूसरे राज्य द्वारा अपने राज्य की व अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था। कालांतर में जब छोटे राज्य समाप्त हो गए तब इस प्रक्रिया का औचित्य भी समाप्त हो गया। किन्तु ब्राह्मणवादी पोंगापंथियों ने अपने व अपने पोषक व्यापारियों के हितों की रक्षार्थ धर्म की संज्ञा से सजा कर शिव के जलाभिषेक के नाम पर 'कांवड़िया' प्रथा का सूत्रपात किया जो आज भी अपना तांडव जारी रखे हुये है। अफसोस की बात यह है कि पोंगापंथ का पर्दाफाश करने के बजाए 'नास्तिकवादी' विद्वान भी पोंगापंथ को ही बढ़ावा दे रहे हैं और सच्चाई का विरोध कर रहे हैं।ऐसे ही लोग विविधता और मत- वैभिन्यता का विरोध करते हैं .


 ~विजय राजबली माथुर ©

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गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

क्रांतिकारी सन्यासी' (REVOLUTIONARY SAINT) : महर्षि दयानन्द ------ विजय राजबली माथुर

 


मूल नक्षत्र  ( १२ फरवरी १८२४ )में जन्में मूल शंकर तिवारी को नौ वर्ष की अवस्था में जब यह भान हुआ कि, जिस शिव लिंग को ईश्वर बताया जा रहा था उस पर चढ़े फल-फूल, मिष्ठान्न को बड़े आराम से चूहा जैसा छोटा जीव उस पर चढ़ कर खा सकता है तो वह भ्रम है-ईश्वर नहीं और वह गृह त्याग कर 'गुरु' की खोज में निकल पड़े थे। 'गुरु' अर्थात 'गु' अंधकार से 'रू' प्रकाश की ओर ले जाने वाला। भटकते हुये वह जब वृन्दावन (मथुरा ) के स्वामी विरजानन्द जी के यहाँ पहुंचे तो उनकी खोज सम्पन्न हुई। नया जमाना ब्लाग के लेखक ने एक अन्य लेख द्वारा स्वामी विरजानन्द जी को हिन्दू-मुस्लिम एकता का पक्षधर घोषित किया है। 


वस्तुतः स्वामी विरजानन्द जी ने स्वामी दयानन्द सरस्वती जी को जो शिक्षा दी वह सम्पूर्ण मानवता को श्रेष्ठ =आर्ष=आर्य बनाने की थी और उसी पर दयानन्द जी चले भी। यह आर्य न कोई जाति है न धर्म न ही नस्ल न ही किसी मजहब की शाखा या प्रशाखा। न ही किसी क्षेत्र विशेष से संबन्धित। विश्व का कोई भी वह मनुष्य जो श्रेष्ठ कर्म करे वह आर्य है। अश्रेष्ठ या निकृष्ट कर्म करने वाला अनार्य । 


स्वामी दयानन्द जी का जन्म मूल शंकर तिवारी के रूप में हुआ था अर्थात प्रचलित ब्राह्मण जाति में लेकिन उन्होने घर-परिवार और दुनिया में जो देखा व अपने गुरु विरजानन्द जी से जो समझा-सीखा उससे वह जिस निष्कर्ष पर पहुंचे थे उनके ही शब्दों में प्रस्तुत है। ('सत्यार्थप्रकाश' : सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा , नई दिल्ली- 2 से प्रकाशित के पृष्ठ- 262 व 263 पर ) :


"जब ब्राह्मण लोग विद्द्याहीन हुए तब क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के अविद्वान होने में तो कथा ही क्या कहनी? जो परंपरा से वेदादि शास्त्रों का अर्थसहित पढ़ने का प्रचार था वह भी छूट गया। केवल जीविकार्थ पाठमात्र ब्राह्मण लोग पढ़ते रहे, सो पाठ्मात्र भी क्षत्रिय आदि को न पढ़ाया। क्योंकि जब अविद्वान हुये गुरु बन गए तब छल, कपट, अधर्म भी उनमें बढ़ता चला । ब्राह्मणों ने विचारा कि अपनी जीविका का प्रबंध बांधना चाहिए। सम्मति करके यही निश्चय कर क्षत्रिय आदि को उपदेश करने लगे कि हम हीं तुम्हारे पूज्यदेव हैं। बिना हमारी सेवा किए तुमको स्वर्ग या मुक्ति न मिलेगी। किन्तु जो तुम हमारी सेवा न करोगे तो घोर नरक में पड़ोगे। जो-जो पूर्ण विद्या वाले धार्मिकों का नाम ब्राह्मण और पूजनीय वेद और ऋषि-मुनियों के शास्त्र में लिखा था, उसको अपने मूर्ख, विषयी, कपटी, लमपट,अधर्मियों पर घटा बैठे। भला वे आप्त विद्वानों के लक्षण इन मूरखों में कब घट सकते हैं? परंतु जब क्षत्रियादी यजमान संस्कृत विद्या से अत्यंत रहित हुये तब उनके सामने जो-जो गप्प मारी, सो-सो बिचारों सब मान ली। जब मान ली तब इन नाम मात्र ब्राह्मणों की बन पड़ी। सबको अपने वचन जाल में बांध कर वशीभूत कर लिया और कहने लगे कि :--- 

ब्रह्मवाक्यं जनार्दन:  :। । 


अर्थात जो कुछ ब्राह्मणों के मुख से वचन निकलता है, वह जानों साक्षात भगवान के मुख से निकला। जब क्षत्रियादी वर्ण 'आँख के अंधे और गांठ के पूरे' अर्थात भीतर विद्या की आँख फूटी हुई और जिनके पास धन पुष्कल है, ऐसे-ऐसे चेले मिले, फिर इन व्यर्थ ब्राह्मण नामवालों को विषयानंद का उपवन मिल गया। यह भी उन लोगों ने प्रसिद्ध किया कि जो कुछ पृथिवी में उत्तम पदार्थ हैं, वे सब ब्राह्मणों के लिए हैं। अर्थात जो गुण,कर्म,स्वभाव से ब्राहमणादि वर्णव्यवस्था थी, उसको नष्ट कर जन्म पर रखी और मृतक पर्यंत का भी दान यजमानों से लेने लगे। जैसी अपनी इच्छा हुई वैसा करते चले "   


स्वामी दयानन्द जी ने महाभारत काल के बाद से वैदिक व्यवस्था का पतन माना है जो ऐतिहासिक रूप से भी सत्य है। राम और कृष्ण के समय में उनके लिए 'आर्यपुत्र' शब्द प्रयुक्त होता था। बाद में बौद्धों के विहार व मठ उजाड़ने वालों को ( हिंसा देने वालों को  बौद्धों द्वारा )हिन्दू  कहा गया। जब ईरानी यहाँ आए तो अपनी फारसी भाषा की एक गंदी और भद्दी गाली के रूप में यहाँ के निवासियों को 'हिन्दू' कह कर पुकारा तब से ही यह शब्द प्रचलन में आया है जिसको ब्रिटिश शासकों ने एक राजनीतिक विचारधारा के रूप में पोषित किया था। 


स्वामी दयानन्द जी ने भी सन 1857 ई ॰ की क्रान्ति में सक्रिय भाग लिया था और क्रांति के विफल होने पर 1875 में उन्होने 'आर्यसमाज' की स्थापना पूर्ण स्वराज्य प्राप्ति के हेतु की थी और उसकी प्रारम्भिक शाखाएँ ब्रिटिश  छावनी वाले शहरों में स्थापित की थीं। 


एम एम अहलूवालिया साहब ने अपनी पुस्तक :FREEDOM STRUGGLE IN INDIA के पृष्ठ 222 पर लिखा है-


"The Government was never quite happy about the Arya Samaj. They disliked it for its propaganda of self-confidence,self-help and self-reliance.The authorities,sometimes endowed it with fictitious power by persecuting to members whose Puritanism became political under intolerable conditions." 



अर्थात-"आर्यसमाज से सरकार को कभी भी खुशी नहीं हुई। शासकों ने आर्यसमाज को इसलिए नहीं चाहा कि यह आत्मविश्वास,स्व-सहाय और आत्म-निर्भरता का प्रचार करता था। कभी-कभी तो अधिकारियों ने इसकी शक्ति को इतना अधिक महत्व दिया कि उसके सदस्यों को दंडित किया और असहनीय दशाओं में उनके सुधारवादी आंदोलन ने राजनीतिक रूप ले लिया। "

 ब्रिटिश शासकों ने महर्षि दयानन्द को 'क्रांतिकारी सन्यासी' (REVOLUTIONARY SAINT) की संज्ञा दी थी। आर्यसमाज के 'स्व-राज्य'आंदोलन से भयभीत होकर वाईस राय लार्ड डफरिन ने अपने चहेते अवकाश प्राप्त ICS एलेन आकटावियन (A. O.)हयूम के सहयोग से वोमेश चंद्र (W.C.)बेनर्जी जो परिवर्तित क्रिश्चियन थे की अध्यक्षता में 1885 ई .में  इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश साम्राज्य के 'सेफ़्टी वाल्व'के रूप मे करवाई थी। किन्तु महर्षि दयानन्द की प्रेरणा पर आर्यसमाजियों ने कांग्रेस में प्रवेश कर उसे स्वाधीनता आंदोलन चलाने पर विवश कर दिया। 'कांग्रेस का इतिहास' नामक पुस्तक में लेखक -डॉ पट्टाभि सीता रमईय्या ने स्वीकार किया है कि देश की आज़ादी के आंदोलन में जेल जाने वाले 'सत्याग्रहियों'में 85 प्रतिशत आर्यसमाजी थे।  



यही वजह है कि आज भी 'साम्राज्यवाद' के हितैषी लोग समय-समय पर महर्षि स्वामी दयानन्द पर हमले करते रहते हैं। दयानंद जी को 'महान हिन्दू' घोषित करना ब्राह्मणवादी षड्यंत्र के सिवा और कुछ नहीं है । आर्यसमाज प्रभावित गांधी जी के असहयोग आंदोलन को छिन्न -भिन्न करने हेतु प्रयासों में  (मुस्लिम लीग : स्थापित 1906 , हिंदूमहासभा : स्थापित 1920 ) विफल रहने के उपरांत 1925 में आर एस एस की स्थापना ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा हेतु करवाई गई थी जो तब 'दंगों की भट्टी' में देश को झोंक कर 1947 में साम्राज्यवादी विभाजन कराने में सफल रहा था और आज यू एस ए के साम्राज्यवादी हितों की रक्षा में अग्रणी और पुनः देश के कई विभाजन कराने की ओर अग्रसर है।  ऐसे संगठन की हौसला अफजाई का ही काम करेगा दयानन्द जी को हिन्दू घोषित करने का घृणित अभियान । आज आर्यसमाज पर भी वह आर एस एस जो उसके विरोध में गठित हुआ था हावी है इसलिए उस ओर से प्रतिरोध की आवाज़ उठने की संभावना क्षीण है जिससे दयानन्द के निंदकों व विरोधियों के हौसले बुलंद हैं जो उनको हिन्दू का खिताब दे डाला। 


1925 में आर्यसमाज प्रभावित क्रांतिकारी कांग्रेसियों ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन आज़ादी के आंदोलन को तीव्र करने के लिए किया था। इस साम्यवादी आंदोलन में उत्तर-प्रदेश से गेंदालाल दीक्षित, बिहार से स्वामी सहजानन्द और राहुल सांस्कृत्यायन व पंजाब से सरदार भगत सिंह जैसे प्रबुद्ध आर्यसमाजियों ने अपना प्रबल योगदान दिया है। लेकिन एथीज़्म के नाम पर उनकी ओर से भी दयानन्द जी के प्रति हो रहे अन्याय के प्रति प्रतिरोध की संभावना क्षीण ही है। फिर भी अपना फर्ज़ पूरा करना मेरा ध्येय था ही। 



 विजय राजबली माथुर 



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गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

सफर ७४ वर्ष का ------ विजय राजबली माथुर

 



जैसा कि, बचपन वाले चित्र से स्पष्ट है स्वभाविक रूप से मैं एकांत प्रिय रहा हूँ। यह चित्र हमारे मामाजी द्वारा मथुरानागर,दरियाबाद में लिया गया था वहाँ आने पर उन्होंने मेरी माँ से पूछा और मुझे लेने वहाँ पहुँच गए जहां हमारी सबसे बड़ी जीजी मुझे खेलने के लिए ले गईं थीं , मुझे बेर के पत्ते से अकेला खेलते देख कर पहले यह चित्र खींच कर  फिर मुझे ले आए। 


पढ़ाई के दौरान भी मैं सामूहिक अंताक्षरी आदि जो शिक्षक करवाते थे उसमें तो भाग लेता था लेकिन सहपाठियों के साथ न खेल कर अकेले ही रहता  था। वाद - विवाद प्रतियोताओं में जरूर भाग लेता था। ७ वीं कक्षा  में प्रथम पुरुस्कार और स्नातक में भाषण गोष्ठी में द्वितीय पुरुस्कार भी प्राप्त किए। 


नौकरी के दौरान ट्रेड यूनियन्स के जरिए राजनीति से भी सम्बद्ध रहा ( कम्युनिस्ट पार्टी - समाजवादी पार्टी -  कम्युनिस्ट पार्टी )। आई टी सी के होटल मुगल , आगरा में कार्यरत रहने के दौरान बार्डर सिक्युरिटी फोर्स के रिटायर्ड सब इंस्पेक्टर अमर सिंह जी के सान्निध्य से ज्योतिष के प्रति रुझान हुआ जबकि पहले ज्योतिष - विरोधी था। ज्योतिष के क्षेत्र में पोंगा - पंडित वाद का विरोधी हूँ। आगरा कालेज जूलाजी विभाध्यक्ष डाक्टर विजय कृष्ण तिवारी, भारत पेट्रोलियम लिमिटेड के उच्चाधिकारी डाक्टर ब्रिज मोहन उपाध्याय, सपा नेता और मर्चेन्ट नेवी के पूर्व उच्चाधिकारी पंडित सुरेश पालीवाल, कांग्रेस नेता और अध्यापक- स्कूल प्रबंधक मुन्ना लाल द्विवेदी , यू पी के क्राफ्ट  एंड फुटवियर इंस्टिचयूट के डिप्टी डायरेक्टर राहुल पूरी आदि ब्राह्मण  लोगों ने पोंगा - पंडितों से न पूछ कर मुझसे ज्योतिषीय परामर्श लिया और मुझसे अपने - अपने निवास - स्थानों पर हवंन  - यज्ञ सम्पन्न करवाए। लेकिन अपने निकटतम रिश्तेदारों ने मुझसे परामर्श लेने के बावजूद पोंगा  -पंडितों के बताए उपाय ही अपनाए। 


जहां विभिन्न ज्योतिषी भी ग्रहों के निदान हेतु दान - पुण्य पर जोर देते हैं वहीं मैं ' दान का निषेद्ध करता हूँ और लोगों को दान उन वस्तुओं का करने को मना करता हूँ जो - जो ग्रह उनकी जन्म - कुंडली में उच्च के या स्व -ग्रही होते हैं। सिर्फ दो उदाहरण दान देने के बाद नुकसान उठाने वालों के देना बेहद जरूरी समझता हूँ। 

१) ------ हमारी अपनी छोटी बहन ने अपनी कालोनी के मंदिर हेतु रु ११०० /- दान दिया और दाताओं की सूची में उनका नाम भी अंकित हुआ उनको एक अनावश्यक मुकदमे का लगभग नौ वर्षों तक सामना करना पडा  जबकि, उनकी कुंडली में ब्रहस्पति उच्च का होने के कारण किसी भी मंदिर या मंदिर के पुजारी आदि को दान नहीं देना चाहिए था लेकिन पोंगा - पंडित तो दान - पुण्य करवाते है सो कर दिया और परेशानी का सामना  किया। 


२ ) ------ upsidc के एक एक्ज़ीक्यूटिव इंजीनियर साहब वृंदावन में दो  भूखों को भोजन कराकर  तथा पुजारी को  दान देकर लौटे और आगरा प्रवेश करते ही सिकंदरा के पास लूट का शिकार हो गए। उनकी घड़ी की सोने की चेन  , उनकी श्रीमती जी के कानों के कुंडल,हाथों के कडे ,गले का हार सब जबरिया उतरवा लिए गए क्योंकि उनको न तो मंदिर में दान करना था न ही अन्न  का लेकिन उनको तो पोंगा - पंडितों की सलाह पर दान - पुण्य करना था ,किए और लूटे गए। 


मुझसे ईर्ष्या करने वाले चाहे वे रिश्तेदार हो या अन्य परिचित मुझे असफल सिद्ध करने को सदैव प्रयासरत रहते हैं उनको परमात्मा और प्रकृति की दया पर छोड़ कर उनसे दूर रहता  हूँ।


मैंने अपने लिए कुछ सूत्र तय  कर लिए हैं उनका ही अनुसरण करता हूँ  ------


1) ------ Healthy Mind Keeps the Body Healthy.


2 ) ------ Quick & Fast Decision but Slow & Steady Actio.  


3 ) ------ Decided at Once Decided for Ever & Ever. 


७५ वें वर्ष में प्रवेश पर सभी शुभकामनाएं प्रेषित करने वालों और उनके परिवारीजनों के लिए असीम मंगलकांनाएं.। 




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बुधवार, 5 फ़रवरी 2025

74 वें वर्ष में प्रवेश के अवसर पर ------ विजय राजबली माथुर

(अक्टूबर 2019 में पिताजी स्व ताज राज बली के शताब्दी वर्ष पर प्रकाशित पुस्तक )

(2011  में हिंदुस्तान दैनिक में एन डी टी वी के रविश कुमार द्वारा प्रस्तुत समीक्षा )



" Quick & Fast Decision But Slow & Steady Action. "
   " Decided At Once , Decided For Ever & Ever "

ये दो मूल मंत्र मैंने अपने स्वंय के लिए निर्धारित किए और इन पर अमल करने का प्रयास भी किया है। 60 वर्ष पूर्व 9 वीं कक्षा में पढ़ते समय ज्ञात हुआ था कि,उदारता एक मानवीय गुण है सभी को उदार होना चाहिए परंतु उसके साथ - साथ पात्र की अनुकूलता भी होनी चाहिए। इस तथ्य का पूर्ण पालन न कर सका और कुछ अपात्रों के प्रति भी उदारता बरतता गया जिसका काफी नुकसान व्यक्तिगत रूप से उठाना ही पड़ा  है। अब तक जो कुछ पढ़ा,सुना  और सीखा है , अनुभव के आधार पर उसमें से कुछ को अभिव्यक्त करना चाहता हूँ :


पूजा और धर्म मानव जीवन को सुंदर,सुखद और समृद्ध बनाने के लिए थे लेकिन आज पूंजी -वाद के युग में इनको विकृत करके विभेद व विभ्रम का सृजक बना दिया गया है। क्या पढे-लिखे और क्या अनपढ़ सभी विभ्रम का शिकार हैं ; कुछ अनजाने में तो कुछ जान-बूझ कर भी। 


संत ------ जिसने अपने जीवन को संयमित एवं संतुलित कर लिया हो। 

साधू ------ जिसने अपने जीवन का उद्देश्य साध लिया हो। 


धर्म शब्द की उत्पत्ति धृति धातु से हुई है जिसका अर्थ है धारण करना अर्थात मानव जीवन व समाज को धारण करने हेतु आवश्यक तत्व ही धर्म हैं अन्य कुछ नहीं, यथा----

सत्य, अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ), अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य। 

आज इन तत्वों/लक्षणों का पालन न करने वाले ही खुद को धर्म का ठेकेदार घोषित किए हुये हैं। 


पूजा भगवान की करनी थी जड़ पदार्थों की नहीं, लेकिन आज जड़-पूजक ही खुद को भगवान-भक्त घोषित करके मानवता को कुचलने पर आमादा हैं। 

भगवान/खुदा/गाड को समझते नहीं और इनके नाम पर झगड़ा खड़ा करने को तैयार रहते हैं। 

राम और कृष्ण को 'भगवान' या भगवान का अवतार बताने वाले इस वैज्ञानिक 'सत्य ' को स्वीकार नहीं करते कि 'भगवान' न कभी जन्म लेता है न उसकी मृत्यु होती है। अर्थात भगवान कभी भी 'नस' और 'नाड़ी' के बंधन मे नहीं बंधता है क्योंकि,-


भ=भूमि अर्थात पृथ्वी।

ग=गगन अर्थात आकाश।

व=वायु।

I=अनल अर्थात अग्नि (ऊर्जा )।

न=नीर अर्थात जल।


प्रकृति के ये पाँच तत्व ही 'भगवान' हैं और चूंकि इन्हें किसी ने बनाया नहीं है ये खुद ही बने हैं इसी लिए ये 'खुदा' हैं। ये पांचों तत्व ही प्राणियों और वनस्पतियों तथा दूसरे पदार्थों की 'उत्पत्ति'(GENERATE),'स्थिति'(OPERATE),'संहार'(DESTROY) के लिए उत्तरदाई हैं इसलिए ये ही GOD हैं। पुरोहितों ने अपनी-अपनी दुकान चमकाने के लिए इन को तीन अलग-अलग नाम से गढ़ लिया है और जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ रहे हैं। इनकी पूजा का एकमात्र उपाय 'हवन' अर्थात 'यज्ञ' ही है और कुछ भी कोरा पाखंड एवं ढोंग।



इनकी पूजा का अर्थ है इन तत्वों का संरक्षण व संवर्धन अर्थात प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह भगवान/खुदा/गाड तत्वों की रक्षा करे व उन्हें नष्ट होने से बचाए। लेकिन आज हो क्या रहा है? अलग-अलग नाम पर इनको नष्ट करने का मानवीय दुष्चक्र चल रहा है वह भी धर्म के नाम पर। 


ज्योतिष वह विज्ञान है जो मानव जीवन को सुंदर, सुखद व समृद्ध बनाने हेतु चेतावनी व उपाय बताता है। लेकिन आज इस विज्ञान को स्वार्थी व धूर्त लोगों ने पेट-पूजा का औज़ार बना कर इसकी उपादेयता को गौड़ कर दिया व इसे आलोचना का शिकार बना दिया है।


यह संसार एक परीक्षालय(Examination Hall) है और यहाँ सतत परीक्षा चलती रहती है। परमात्मा ही पर्यवेक्षक(Invegilator) और परीक्षक (Examiner) है।  जीवात्मा कार्य क्षेत्र में स्वतंत्र है और जैसा कर्म करेगा परमात्मा उसे उसी प्रकार का फल देगा। आप अवश्य ही जानना चाहेंगे कि तब ग्रहों की शांति से क्या तात्पर्य और लाभ हैं?मनुष्य पूर्व जन्म के संचित प्रारब्ध के आधार पर विशेष ग्रह-नक्षत्रों की परिस्थिति में जन्मा है और अपने बुद्धि -विवेक से ग्रहों के अनिष्ट से बच सकता है। यदि वह सम्यक उपाय करे अन्यथा कष्ट भोगना ही होगा। जिस प्रकार जिस नंबर पर आप फोन मिलायेंगे बात भी उसी के धारक से ही होगी,अन्य से नहीं। इसी प्रकार जिस ग्रह की शांति हेतु आप मंत्रोच्चारण करेंगे वह प्रार्थना भी उसी ग्रह तक हवन में दी गयी आपकी आहुति के माध्यम से अवश्य ही पहुंचेगा । .अग्नि का गुण है उसमे डाले गए पदार्थों को परमाणुओं (Atoms) में विभक्त करना और वायु उन परमाणुओं को मन्त्र के आधार पर प्रवाहित कर देता है जिससे  ग्रहों की शांति द्वारा उनके प्रकोप से बचा जा  सकता है। प्रचलन में लोग अन्य उपाय भी बताते हैं परन्तु उन से ग्रहों की शांति होने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं मिलता,हाँ मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ सकता है। 


ज्योतिष पूर्णतः एक विज्ञान है। वस्तुतः विज्ञान किसी भी विषय के नियम बद्ध  एवं क्रम बद्ध  अध्ययन को कहा जाता है। ज्योतिष के नियम खगोलीय गणना पर आधारित हैं और वे पूर्णतः वैज्ञानिक हैं वस्तुतः ज्योतिष में ढोंग पाखण्ड का कोंई स्थान नहीं है। परन्तु फिर भी हम देखते हैं कि कुछ लोग अपने निजी स्वार्थों की खातिर जनता को दिग्भ्रमित कर के ठगते हैं और उन्हीं के कारण सम्पूर्ण ज्योतिष विज्ञान पर कटाक्ष किया जाता है। यह एक गलत क्रिया की गलत प्रतिक्रिया है। जहाँ तक विज्ञान के अन्य विषयों का सवाल है वे What & How का तो जवाब देते हैं परन्तु उनके पास Why का उत्तर नहीं है.ज्योतिष विज्ञान में इस Why का भी उत्तर मिल जाता है। 

जन्म लेने वाला कोई भी बच्चा अपने साथ भाग्य (प्रारब्ध) लेकर आता है। यह प्रारब्ध क्या है इसे इस प्रकार समझें कि हम जितने भी कार्य करते हैं,वे तीन प्रकार के होते हैं-सद्कर्म,दुष्कर्म और अकर्म। 

यह तो सभी जानते हैं की सद्कर्म का परिणाम शुभ तथा दुष्कर्म का अशुभ होता है,परन्तु जो कर्म किया जाना चाहिए और नहीं किया गया अथार्त फ़र्ज़ (duity) पूरा नहीं हुआ वह अकर्म है और इसका भी परमात्मा से दण्ड मिलता है। अतएव सद्कर्म,दुष्कर्म,और अकर्म के जो फल इस जन्म में प्राप्त नहीं हो पाते वह आगामी जन्म के लिए संचित हो जाते हैं। अब नए जन्मे बच्चे के ये संचित कर्म जो तीव्रगामी होते हैं वे प्रारब्ध कहलाते हैं और जो मंदगामी होते हैं वे अनारब्ध कहलाते हैं। मनुष्य अपनी बुद्धि व् विवेक के बल पर इस जन्म में सद्कर्म ही अपना कर ज्ञान के द्वारा अनारब्ध कर्मों के दुष्फल को नष्ट करने में सफल हो सकता है और मोक्ष भी प्राप्त कर सकता है। मोक्ष वह अवस्था है जब आत्मा को कारण और सूक्ष्म शरीर से भी मुक्ति मिल जाती है.और वह कुछ काल ब्रह्मांड में ही स्थित रह जाता है.ऐसी मोक्ष प्राप्त आत्माओं को संकटकाल में परमात्मा पुनः शरीर देकर जन-कल्याण हेतु पृथ्वी पर भेज देता है। भगवान् महावीर,गौतम बुद्ध,महात्मा गांधी,स्वामी दयानंद ,स्वामी विवेकानंद,आदि तथा और भी बहुत पहले मर्यादा पुरषोत्तम श्री राम एवं योगी राज श्री कृष्ण तब अवतरित हुए जब पृथ्वी पर अत्याचार अपने चरम पर पहुँच गया था। 

जब किसी प्राणी की मृत्यु हो जाती है तो वायु,जल,आकाश,अग्नि और पृथ्वी इन पंचतत्वों से निर्मित यह शरीर तो नष्ट हो जाता है परन्तु आत्मा के साथ-साथ कारण शरीर और सूक्ष्म शरीर मोक्ष प्राप्ति तक चले चलते हैं और अवशिष्ट संचित कर्मफल के आधार पर आत्मा भौतिक शरीर को प्राप्त कर लेती है जो उसे अपने किये कर्मों का फल भोगने हेतु मिला है। यदि जन्म मनुष्य योनी में है तो वह अपनी बुद्धि व विवेक के प्रयोग द्वारा मोक्ष प्राप्ति का प्रयास कर सकता है। 

बारह राशियों में विचरण करने के कारण आत्मा के साथ चल रहे सूक्ष्म व कारण शरीर पर ग्रहों व नक्षत्रों का प्रभाव स्पष्ट अंकित हो जाता है। जन्मकालीन समय तथा स्थान के आधार पर ज्योतिषीय गणना द्वारा बच्चे की जन्म-पत्री का निर्माण किया जाता है और यह बताया जा सकता है कि कब कब क्या क्या अच्छा  या बुरा प्रभाव पड़ेगा। अच्छे प्रभाव को प्रयास करके प्राप्त किया  जा सकता है और लापरवाही द्वारा छोड़ कर वंचित भी हुआ जा सकता है। इसी प्रकार बुरे प्रभाव को ज्योतिष विज्ञान सम्मत उपायों द्वारा नष्ट अथवा क्षीण किया जा सकता है और उस के प्रकोप से बचा जा सकता है। जन्मकालीन नक्षत्रों की गणना के आधार पर भविष्य फल कथन करने वाला विज्ञान ही ज्योतिष विज्ञान है। 


प्रारंभ में मैं ज्योतिष समर्थक इसलिए नहीं था कि, तथाकथित ज्योतिषियों के भ्रम - जाल के कारण तमाम लोगों को नुकसान उठाते देखता रहा था। 1976 में जब आई टी सी के होटल मुगल,आगरा  में कार्यरत था एक सहकर्मी द्वारा बी एस एफ के रिटायर्ड सब - इंस्पेक्टर साहब से मुलाकात करवाई गई थी जिन्होंने उन साथी के प्रश्न पर मेरे पास 26 वर्ष की उम्र में अपना मकान होने और अंततः दो मकान होने की बात कह दी  तब मैंने उनका मखौल ही कर दिया क्योंकि तब मेरा वेतन मात्र रु 275/- मासिक ही था। किन्तु दो वर्ष बाद जब वेतन रु 500/- था तब आवास - विकास परिषद का मकान हायर - पर्चेज योजना में रु 290/- मासिक किश्त पर मिल गया जो 15 वर्ष बाद अपना हो गया और आज तब से 45 वर्षों बाद लखनऊ में दो मकान प्राप्त कर सका हूँ। ज्योतिषियों से संघर्ष करते - करते खुद ज्योतिष का जानकार हो गया और चाहता हूँ कि,जो जानकारियाँ मैंने हासिल की हैं उनको कोई अन्य भी हस्त-गत कर ले जिससे पोंगा - पंडित -वाद से लोगों को निजात दिला सके। पत्नी को जानकारी तो हो गई किन्तु ग्लूकोमा से ग्रस्त हो जाने के कारण उनके द्वारा प्रयोग किया जाना संभव नहीं है। पुत्र को भी जानकारी हासिल करा  दी  थी लेकिन वह व्यवहार में भी प्रयोग करे तभी सफल हो सकेगा। जिन बी एस एफ के रिटायर्ड सब - इंस्पेक्टर साहब द्वारा मकान की बात कही गई थी उनके द्वारा ही 68 वर्ष से 76 वर्ष तक ' रोग -शय्या ' पर होने की भी बात कही थी लेकिन खुद ज्योतिष की  जानकारी हासिल होने के कारण अब तक उससे बचा रह सका हूँ । 

आश्चर्य और दुख दोनों इस बात का है कि, विद्वान ज्योतिषी भी पौराणिक कथाओं का मिश्रण ज्योतिषीय विश्लेषण में कर देते हैं। ' राहू ' और ' केतु ' की जो कहानी अमृत कलश - संघर्ष की गढ़ी जाती है उसका वैज्ञानिक आधार क्या है ?

वस्तुतः हमारी पृथिवी अपनी धुरी पर साढ़े 23 डिग्री झुकी हुई है और यह नारंगी कि भांति दोनों सिरों पर चपटी है जिस कारण सूर्य आदि ग्रहों से आने वाली किरणें पृथिवी पर परावर्तित होकर आती हैं और यहाँ के निवासियों को प्रभावित करती  हैं। इसलिए पृथिवी के इन दोनों ध्रुवों को हम ज्योतिष में राहू- केतु के छाया ग्रहों के रूप में गणना करते हैं। सब ग्रहों के साथ पृथिवी भी ब्रह्मांड में परिभ्रमण कर रही  है इसके दोनों ध्रुव 180 डिग्री पर स्थित होने के कारण ही विपरीत दिशाओं में परिभ्रमण करते प्रतीत होते हैं। 


अपने ब्लागस के जरिए धर्म,ज्योतिष,राजनीति,सामाजिक विषयों पर लिखता रहा था उसमें से कुछ लेखों का संकलन अपने पिताजी के शताब्दी वर्ष में पुस्तकाकार प्रकाशन 2019 में करवाया था । यदि पुत्र चाहेगा और उचित समझेगा तो भविष्य में अन्य लेखों का भी संकलन प्रकाशित करवा लेगा। 


शोषण,उत्पीड़न,अन्याय के विरुद्ध संघर्ष में योगदान देने के लिए 1986 में आगरा में कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुआ था, लखनऊ आकर भी सक्रिय रहा था किन्तु पत्नी की ग्लूकोमा बीमारी के कारण अब निष्क्रिय हूँ । 2014 के बाद देश और समाज में जो विभेद आए उनका प्रभाव पारिवारिक रिश्तेदारियों पर भी पड़ा है तथा ' एकला चलो ' सिद्धांत पर चल रहा हूँ और चलता रहूँगा। 




 

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शनिवार, 25 जनवरी 2025

100/Galat Bat Hai Ye Bilkul BakwasHai ------ Educated Illitrets

 





पटना के ' सिटी लाईव  ' चेनल ने मणिपुर जदयू के प्रदेश  मुखिया द्वारा पार्टी लेटर हेड पर भेजे पत्र को दिखाए जाने को 100% गलत , बिल्कुल बकवास  बता कर एक एजुकेटेड इललिट्रेट ने अपने मानसिक दिवालिएपन को नग्नता पूर्वक प्रदर्शित कर दिया है। वस्तुतः आज ऐसे लोग बहुतायत में मिल जाएंगे। 

जदयू के कार्यकारी राष्ट्रीय मुखिया के जरिए गृह मंत्री द्वारा बाद में जदयू के उस प्रदेशीय मुखिया को निलंबित कर दिया गया उस आधार पर खबर को चापलूसों द्वारा 100% गलत , बिल्कुल बकवास  बता कर अपने कारोबार - धंधे  की  अनियमिताओं पर सरकारी कारवाई से बचाव का निहित स्वार्थ छिपा हुआ है। 

वर्तमान प्रदेश और केंद्र सरकारों के समर्थक चाहे कितना भी पढे- लिखे हों मानसिक रूप से शून्य इसलिए बने हुए हैं जिससे उनके  कारोबारी आर्थिक हित हर हाल में सुरक्षित रहें और उनकी लूट - शोषण प्रवृत्ति यथावत जारी रह सके। 

इसी प्रकार किलिंग पैथी के दलाल होम्योपैथी को ' बकवास ' कहते हैं। 






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सोमवार, 5 फ़रवरी 2024

73 वें वर्ष का प्रवेश ------ विजय राजबली माथुर




 73 वें वर्ष में प्रवेश करने पर आज भी विगत वर्षों की भांति फ़ेसबुक और व्हाट्स एप पर लोगों से शुभकामनाएं प्राप्त हुई हैं। व्यक्तिगत, सामाजिक आदि संघर्षों को पार करते हुए 72 वर्ष पूर्ण तो कर लिए किन्तु ऐसे लोगों का भी सामना करना पड़ा है जिनके द्वारा मेरे जीवन को समाप्त करने के भरसक प्रयास किए गए हैं और अब भी प्रयास रत  हैं। 1982 में दो बार जिन लोगों द्वारा प्रयास किया गया वे खुद तो असफल रहे किन्तु रक्तबीज जैसे लोगों को निरंतर खड़ा करते रहे हैं। इन लोगों ने हमारे पारिवारिक सदस्यों को भी हमारे विरुद्ध खड़ा करके समाज में कुत्सित प्रचार भी किया। यहाँ तक कि वे मेरे पुत्र का भी विकास और उन्नति अवरुद्ध करते आ रहे हैं। 

अब हम जहां जिस कालोनी में रहते हैं वहाँ भी ऐसे लोगों का प्रतिनिधित्व गोंडा के एक गुंडे द्वारा किया जा रहा है। गोकागू द्वारा हमारे विरुद्ध दुष्प्रचार करके लोगों को लामबंद कर रखा है और एजुकेटेड इल लितरेट्स उसके झांसे में हैं। हम लोग लेखन - पठन में रुचि रखते हैं जबकि गोकागू और उसके एजुकेटेड इल लितरेट्स अखबार,किताब,कलम के दुश्मन हैं। 

देखना है कि अक्ल के ये दुश्मन अब सफल हो पाते हैं या विगत 72 वर्षों की भांति तमाम षड्यंत्रों को विफल करने में हम आगे भी कामयाब हो पाएंगें। 60 वर्ष पूर्व माँ की बीमारी के समय से जो घर में काम करने की आदत पड़ी थी उसकी वजह से आज श्रीमती जी की आँखों की बीमारी के कारण दिक्कतों में फँसने से बचे रहे हैं। गोकागू और उसके एजुकेटेड इल लितरेट्स तमाम हथकंडे अपना कर भी विफल ही होंगें और उनके मंसूबे ध्वस्त होंगें। 


58 वर्ष पूर्व कोर्स की किताब में पढ़ा था कि, " उदारता एक मानवीय गुण है सभी को उदार होना चाहिए किन्तु उसके लिए पात्र की अनुकूलता भी होनी चाहिए। " मैंने तभी से इस मूल मंत्र को अपना लिया है। 


Decided at once , Decided for Ever and Ever . 

Quick and Fast Decision but Slow and Steady action.


इन दो - तीन सिद्धांतों पर चल कर ही मैं विपरीत धाराओं पर विजय नामाकूल करता रहा हूँ और विश्वास रखता हूँ कि आगे भी कर सकूँगा। 

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सोमवार, 25 सितंबर 2023

घर, मकान और बदनीयतों की निगाहें




 दो वर्ष पूर्व आज ही के दिन अर्थात 25 सितंबर 2021 को हम अपने वर्तमान मकान में रहने आए थे। यह मकान वृहत्तर लखनऊ की एक नव- विकसित कालोनी में है। यहाँ बहुत से लोग लखनऊ के बाहर से आकर बसे हैं जो लखनवी तहज़ीब से नावाकिफ हैं , पैसे वाले हैं और दूसरों की मेहनत की कमाई से अर्जित मकानों पर गिद्ध दृष्टि लगाए हुए हैं। ऐसे लोगों ने पहले तो ये अफवाहें उड़ाईं कि, कालोनी के कुछ मकान अवैध निर्मित हैं जिससे घबरा कर उनके मालिक हड़बड़ा कर सस्ते में बेच कर भाग जाएँ और ये भू - माफिया अपना धंधा करके अकूत कमाई कर सकें। हो सकता है इससे कुछ लाभ उनको मिला भी हो। 
इन लोगों का शिष्य गोकागू तमाम तांत्रिक प्रक्रियाओं का सहारा लेकर भी हमें परेशान करने के उपक्रम करता रहता  है। 26 अगस्त 2022 को एक वृद्ध पड़ोसी साहब हमारे घर मिलने आए थे तो उनको ही गलत व्यक्ति साबित करने के लिए 27 अगस्त 2022 को अर्थात अगले ही दिन मुझे अपनी तांत्रिक प्रक्रिया से दुर्घटना - ग्रस्त कर दिया था जिसके कुछ जख्म मुंह पर अब भी बरकरार हैं । गोकागू को लगता है कि, चूंकि मेरी  पत्नी को ग्लूकोम और मोतियाबिंद की वजह से देखने और पहचानने में समस्या है  अतः मुझे मार कर वह आसानी से मेरे पुत्र को दबाव बना कर हमारे मकान पर बलात कब्जा कर लेगा और उन लोगों को खदेड़ देगा। संलग्न फ़ोटो प्रतियों से उन लोगों की गिद्ध - दृष्टि की पुष्टि भी होती है। 
आज अपने इस मकान में आने की तीसरी वर्षगांठ पर स्पष्ट करना चाहता हूँ कि, हमारे परिवार के किसी भी सदस्य को किसी भी प्रकार की अनहोनी का सामना करना पड़ता है तो गोकागू और उसके बुलडोजर आका को ही उत्तरदाई समझा जाए।  
------  विजय राजबली माथुर 



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रविवार, 5 फ़रवरी 2023

यादों के झरोखों से 71 वर्ष





प्रारम्भिक शिक्षा डी पी निगम गर्ल्स जूनियर हाईस्कूल, मुरलीनगर,लखनऊ से सम्पन्न हुई और बाबूजी के बरेली स्थानांतरण होने पर 1961 में रूक्स  प्राइमरी स्कूल,बरेली कैंट से 5 वीं कक्षा  उत्तीर्ण करके रूक्स हायर सेकेंडरी  स्कूल ( जो अब रवीन्द्रनाथ टैगोर स्कूल हो गया है ) से 6 ठवीं कक्षा  की पढ़ाई अधूरी हुई क्योंकि बाबूजी का पुनः स्थानांतरण सिलीगुड़ी 1962 में हो गया और बाकी की पढ़ाई विश्वनाथ जूनियर हाईस्कूल,बहादुरगंज,शाहजहांपुर से हुई। यहीं 7 वीं कक्षा में जिला वादविवाद प्रतियोगिता में प्रथम स्थान मिलने पर ' कामायनी' पुस्तक  पुरस्कार स्वरूप प्राप्त हुई। 



1964 में सिलीगुड़ी के आश्रमपाड़ा स्थित कृष्ण माया मेमोरियल हाईस्कूल में 8 वीं कक्षा  में प्रवेश लिया और यहीं से 1967 में स्कूल फाईनल परीक्षा उत्तीर्ण की। 

सितंबर 1967 में गांधी फैज़ाम कालेज,शाहजहांपुर से 11 वीं कक्षा उत्तीर्ण करके इंटरमीजियट परीक्षा श्री सनातन धर्म इंटरमीजियट कालेज,लालकुर्ती,मेरठ कैंट से सम्पन्न करके 1969 में मेरठ कालेज,मेरठ में बी ए में प्रवेश लिया और 1971 में मेरठ विश्वविद्यालय , मेरठ ( जो अब चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय हो गया है)से स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की। 

 बिहार,कश्मीर,गोआ  और मेघालय के पूर्व  राज्यपाल  सत्यपाल मलिक साहब 1969 तक मेरठ कालेज छात्रसंघ के अध्यक्ष थे किन्तु डॉ वी पूरी के त्यागपत्र के बाद बने कार्यवाहाक प्रधानाचार्य डॉ बी भट्टाचार्य ने उनको निष्कासित करके जिलाधिकारी ऋषिकेश कौल  से उनके विरुद्ध इजेक्शन नोटिस जारी करा  दिया किन्तु सत्यपाल मलिक कालेज आते और साथियो से  मिलते रहे । 

 मुख्यमंत्री चौ.चरण सिंह ने छात्र संघों की सदस्यता को ऐच्छिक बना कर सारे छात्र नेताओं को आन्दोलन क़े एक मंच पर खड़ा कर दिया.। 

ताला पड़े यूनियन आफिस क़े सामने कालेज क़े अन्दर १९७० में जो सभा हुई उसमें पूर्व महामंत्री विनोद गौड ने दीवार पर चढ़ काला झंडा फहराया और पूर्व प्रेसीडेंट महावीर प्रसाद जैन ने उन्हें उतरने पर गले लगाया तो सतपाल मलिक जी ने पीठ थपथपाई और राजेन्द्र सिंह यादव ने हाथ मिलाया.इस सभा में सतपाल मलिक जी ने जो भाषण दिया उसकी ख़ास -ख़ास बातें ज्यों की त्यों याद हैं (कहीं किसी रणनीति क़े तहत वही कोई खण्डन न कर दें ).सतपाल मलिक जी ने आगरा और बलिया क़े छात्रों को ललकारते हुए,रघुवीर सहाय फिराक गोरखपुरी क़े हवाले से कहा था कि,उ .प्र .में आगरा /बलिया डायगनल में जितने आन्दोलन हुए सारे प्रदेश में सफल होकर पूरे देश में छा  गये और उनका व्यापक प्रभाव पड़ा.(श्री मलिक द्वारा दी  यह सूचना ही मुझे आगरा में बसने क़े लिए प्रेरित कर गई थी ).मेरठ /कानपुर डायगनल में प्रारम्भ सारे आन्दोलन विफल हुए चाहे वह १८५७ ई .की प्रथम क्रांति हो,सरदार पटेल का किसान आन्दोलन या फिर,भा .क .पा .की स्थापना क़े साथ चला आन्दोलन  हो.श्री मलिक चाहते थे कि आगरा क़े छात्र मेरठ क़े छात्रों का पूरा समर्थन करें.श्री मलिक ने यह भी कहा था कि,वह चौ.चरण सिंह का सम्मान  करते हैं,उनके कारखानों से चौ.सा :को पर्याप्त चन्दा दिया जाता है लेकिन अगर चौ.सा : छात्र संघों की अनिवार्य सदस्यता बहाल किये बगैर मेरठ आयेंगे तो उन्हें चप्पलों की माला पहनाने वाले श्री मलिक पहले सदस्य होंगें.चौ.सा :वास्तव में अपना फैसला सही करने क़े बाद ही मेरठ पधारे भी थे और बाद में श्री सतपाल मलिक चौ. सा : की पार्टी से बागपत क्षेत्र क़े विधायक भी बने और इमरजेंसी में चौ. सा :क़े जेल जाने पर चार अन्य भा.क्र.द.विधायक लेकर इंका.में शामिल हुए.। 

जब भारत का एक हवाई जहाज लाहौर अपहरण कर ले जाकर फूंक दिया गया था तो हमारे कालेज में छात्रों व शिक्षकों की एक सभा हुई जिसमें प्रधानाचार्य -भट्टाचार्य सा :व सतपाल मलिक सा :अगल -बगल खड़े थे.मलिक जी ने प्रारंभिक भाषण में कहा कि,वह भट्टाचार्य जी का बहुत आदर करते हैं पर उन्होंने उन्हें अपने शिष्य लायक नहीं समझा.जुलूस में भी दोनों साथ चले थे जो पाकिस्तान सरकार क़े विरोध में था.राष्ट्रीय मुद्दों पर हमारे यहाँ ऐसी ही एकता हमेशा रहती है,वरना अपने निष्कासन पर मलिक जी ने कहा था -इस नालायक प्रधानाचार्य ने मुझे नाजायज तरीके से निकाल  दिया है अब हम भी उन्हें हटा कर ही दम लेंगें.बहुत बाद में भट्टाचार्य जी ने तब त्याग -पत्र दिया जब उनकी पुत्री वंदना भट्टाचार्य को फिलासफी  विभाग में लेक्चरार नियुक्त कर लिया गया./। 

समाज-शास्त्र परिषद् की तरफ से बंगलादेश आन्दोलन पर एक गोष्ठी का आयोजन किया गया था.उसमें समस्त छात्रों व शिक्षकों ने बंगलादेश की निर्वासित सरकार को मान्यता देने की मांग का समर्थन किया.सिर्फ एकमात्र वक्ता मैं ही था जिसने बंगलादेश की उस सरकार को मान्यता देने का विरोध किया था और उद्धरण डा.लोहिया के हवाले से देते हुए .मैंने कहा था कि,बंगलादेश हमारे लिए बफर स्टेट नहीं हो सकता और बाद में जिस प्रकार कुछ समय को छोड़ कर बंगलादेश की सरकारों ने हमारे देश क़े साथ व्यवहार किया मैं समझता हूँ कि,मैं गलत नहीं था.परन्तु मेरे बाद क़े सभी वक्ताओं चाहे छात्र थे या शिक्षक मेरे भाषण को उद्धृत करके मेरे विरुद्ध आलोचनात्मक बोले.विभागाध्यक्ष डा.आर .एस.यादव (मेरे भाषण क़े बीच में हाल में प्रविष्ट हुए थे) ने आधा भाषण मेरे वक्तव्य क़े विरुद्ध ही दिया.तत्कालीन छात्र नेता आर.एस.यादव भी दोबारा भाषण देकर मेरे विरुद्ध बोलना चाहते थे पर उन्हें दोबारा अनुमति नहीं मिली थी.गोष्ठी क़े सभापति कामर्स क़े H .O .D .डा.एल .ए.खान ने अपने  भाषण में  मेरी सराहना करते हुये कहा था कि 

हम उस छात्र से सहमत हों या असहमत लेकिन मैं उसके साहस की सराहना करता हूँ कि,यह जानते हुये भी सारा माहौल बंगलादेश क़े पक्ष में है ,उसने विपक्ष में बोलने का फैसला किया और उन्होंने मुझसे इस साहस को बनाये रखने की उम्मीद भी ज़ाहिर की थी.। 

मेरे लिए फख्र की बात थी की सिर्फ मुझे ही अध्यक्षीय भाषण में स्थान मिला था किसी अन्य वक्ता को नहीं.इस गोष्ठी क़े बाद राजेन्द्र सिंह जी ने एक बार जब सतपाल मलिक जी कालेज आये थे मेरी बात उनसे कही तो मलिक जी ने मुझसे कहा कि,वैसे तो तुमने जो कहा था -वह सही नहीं है, डाक्टर लोहिया का हवाला गलत दे दिया था लेकिन अपनी बात ज़ोरदार ढंग से रखी ,उसकी उन्हें खुशी है.। 

  चूंकि राजनीति में मेरी शुरू से ही दिलचस्पी रही है,इसलिए राज-शास्त्र परिषद् की ज्यादातर गोष्ठियों में मैंने भाग लिया.समाज-शास्त्र परिषद् की जिस गोष्ठी का ज़िक्र पहले किया है -वह भी राजनीतिक विषय पर ही थी.राजशास्त्र परिषद् की एक गोष्ठी में एक बार एम.एस.सी.(फिजिक्स)की एक छात्रा ने बहुत तार्किक ढंग से भाग लिया था.प्रो.क़े.सी.गुप्ता का मत था कि,यदि यह गोष्ठी प्रतियोगी होती तो वह निश्चित ही प्रथम पुरस्कार प्राप्त करती.राजनीती क़े विषय पर नाक-भौं सिकोड़ने वालों क़े लिये यह दृष्टांत आँखें खोलने वाला है.प्रो.मित्तल कम्युनिस्ट  थे,उन्होंने" गांधीवाद और साम्यवाद " विषय पर अपने विचार व्यक्त किये थे.उनके भाषण क़े बाद मैंने भी बोलने की इच्छा व्यक्त की ,मुझे ५ मि.बोलने की अनुमति मिल गई थी किन्तु राजेन्द्र सिंह यादव छात्र -नेता ने भी अपना नाम पेश कर दिया तो प्रो.गुप्ता ने कहा कि फिर सभी छात्रों  हेतु अलग से एक गोष्ठी रखेंगे.१० अप्रैल १९७१ से हमारे फोर्थ सेमेस्टर की परीक्षाएं थीं,इसलिए मैंने नाम नहीं दिया था.प्रो.आर.क़े.भाटिया ने अपनी ओर से मेरा नाम गोष्ठी क़े लिये शामिल कर लिया था,वह मुझे ४ ता.को मिल पाये एवं गोष्ठी ६ को थी.अतः मैंने उनसे भाग लेने में असमर्थता व्यक्त की.वह बोले कि,वह कालेज छोड़ रहे हैं इसलिए मैं उनके सामने इस गोष्ठी में ज़रूर भाग लूं.वस्तुतः उनका आई.ए.एस.में सिलेक्शन हो गया था.वह काफी कुशाग्र थे.लखनऊ विश्विद्यालय में प्रथम आने पर उन्हें मेरठ-कालेज में प्रवक्ता पद स्वतः प्राप्त हो गया था.उनकी इज्ज़त की खातिर मैंने लस्टम-पस्टम तैयारी की.विषय था "भारत में साम्यवाद की संभावनाएं"और यह प्रो. गुप्ता क़े वायदे अनुसार हो रही गोष्ठी थी. अध्यक्षता प्राचार्य डा. परमात्मा शरण सा :को करनी थी. वह कांग्रेस (ओ )में सक्रिय थे उस दिन उसी समय उसकी भी बैठक लग गई.अतः वह वहां चले गये,अध्यक्षता की-प्रो. मित्तल ने.मैंने विपक्ष में तैयारी की थीऔर उसी अनुसार बोला भी.मेरा पहला वाक्य था-आज साम्यवाद की काली- काली घटायें छाई हुई हैं.मेरा मुंह तो आडियेंस की तरफ था लेकिन साथियों ने बताया कि,प्रो. मित्तल काफी गुस्से में भर गये थे..प्रथम पुरस्कार प्रमोद सिंह चौहान को "दास कैपिटल"मिली थी.वह मेरे ही सेक्शन में थाऔर मैंने भी यूनियन में एम.पी. हेतु अपना वोट उसे ही दिया था.बाद में प्रो. भाटिया ने बताया था कि,उन्होंने तथा प्रो. गुप्ता ने मुझे ९-९ अंक दिये थे,प्रो. मित्तल ने शून्य दिया अन्यथा प्रथम पुरुस्कार मुझे मिल जाता क्योंकि प्रमोद को प्रो. भाटिया तथा प्रो. गुप्ता ने ५-५ अंक व प्रो. मित्तल ने पूरे क़े पूरे १० अंक दिये थे.







15 मई 1972 से जून 1975 तक मैं सारू कंपनी , मेरठ में सेवारत रहा। फिर 22 सितंबर 1975 से जनवरी  1985 तक होटल मुगल,,आगरा में रहा। दोनों जगह मुझे यूनियंस  कार्यकारिणी में शामिल किया गया , होटल मुगल कर्मचारी  संघ का मैं संस्थापक महामंत्री रहा। 1986 से भाकपा,जिला काउंसिल ,आगरा में शामिल हुआ और डाक्टर रामगोपाल सिंह चौहान साहब के रुग्ण होने पर मुझे जिला कोषाध्यक्ष का दायित्व दिया गया किन्तु 1994 में कामरेड  मित्रसेंन  यादव और कामरेड रामचन्द्र बक्श सिंह के साथ सपा में आ  गया लेकिन फिर 2006 में भाकपा में वापिस आ गया था वहाँ से 2009 में लखनऊ आने पर यहाँ भी जिला काउंसिल में शामिल किया गया। वर्तमान में भौतिक रूप से सक्रिय नहीं हो पा रहा हूँ किन्तु सदस्य के रूप में शामिल हूँ। 
आगरा में विभिन्न साप्ताहिक पत्रों में लिखता रहा था , सप्तदिवा साप्ताहिक और अग्रमंत्र  त्रैमासिक में उपसंपादक भी रहा।ब्रह्मपुत्र समाचार ,साप्ताहिक में भी लेख आगरा में छपते रहे थे ।  शुरुआत में लखनऊ में भी एक पत्र में लिखा लेकिन 2010 से ब्लाग्स लेखन प्रारंभ कर दिया। एनडीटीवी के पूर्व एंकर रविश कुमार साहब ने 02-02-2011 को हिन्दी के हिंदुस्तान में यह परिचय प्रकाशित किया था । लेकिन 2014 के बाद एक एक करके हमारे सभी ब्लागस को फ़ेसबुक पर एन्टी कम्युनिटी स्टेंडर्ड घोषित करके प्रतिबंधित कर दिया गया  है।


अभी भी लिखने का शौक है , अक्टूबर 2019 में बाबूजी की शताब्दी पर उनकी स्मृति में चुने हुए लेख यशवंत से संकलित करवा कर  '  विजय विचार ' पुस्तक प्रकाशित करवा चुका हूँ । 
धर्म,अध्यात्म,ज्योतिष और राजनीति पर स्वतंत्र विचार रखता हूँ और उन पर लेख ब्लाग्स में लिख चुका हूँ। 








जब मैं 7-9 वर्ष की आयु में डी पी निगम गर्ल्स जूनियर हाईस्कूल,लखनऊ में कक्षा 3-4 का छात्र था तब हमारे बाबूजी मेरे लिए प्रत्येक रविवार को 'स्वतंत्र भारत' की एक प्रति ले देते थे जिस पर हमारे फुफेरे भाइयों (जिनमें से एक पूना में सेटिल हैं तो दूसरे डेढ़ किलो मीटर की दूरी पर रहते व मुझे तुच्छ समझते थे अब हम दूसरी जगह आ चुके है तो स्वतः ही दूरी बन गई ,  लेकिन जो फासला एक अमीर एक गरीब के साथ रखता है वही वह भी रखते  रहे हैं-अब भूल चुके हैं कि कभी हमारे घर पर बाढ़ पीड़ित बन कर भी रहे थे वस्तुतः१९६० में जब जी.पी.ओ.तक बढ़ का पानी आ गया था तब हमारी भुआ,फूफाजी सपरिवार अपने सप्रू मार्ग के मकानमें ताला लगा कर आ गए और बाढ़ उतरने के बाद ही वापिस गए थे ) को एतराज होता था। वे भुआ-फूफाजी से शिकायत करते थे कि मामाजी बेकार विजय के लिए इतना खर्चा करते हैं वह क्या समझता होगा? मुझे खुद अब कुछ याद नहीं है कि उस समय वाकई मैं अखबार पढ़ कर क्या समझता था? परंतु हमारे बाबूजी कुछ तो समझते होंगे जो मेरे लिए खुद-ब-खुद पहल कर के अखबार लेने लगे थे और उस पर माँ को भी कभी कोई आपत्ति नहीं हुई थी बल्कि वह भी मसालों आदि की जिन पुड़ियों में कविता आदि मिलते थे मुझे सौंप देकर प्रोत्साहित ही करती थी। 1961-62  में बरेली में कक्षा 5-6  में मुझे बाबूजी अपने दफ्तर की स्टाफ क्लब से 'धर्मयुग','साप्ताहिक हिंदुस्तान',कुछ उपन्यास (जिनमें स्वाधीनता आंदोलन के कुछ क्रांतिकारी आंदोलन पर भी आधारित थे) भी पढ़ने को ला देते थे। उस पर भी माँ की तरफ से न  कोई आपत्ति थी न  ही पढ़ने से माँ ने रोका।
1969-71 के दौरान इंटर और बी ए की पढ़ाई के समय बाबू जी अपने आफिस की लाइब्रेरी से दैनिक 'नवभारत टाईम्स' और 'हिंदुस्तान' के विगत दिवस के अंक ला देते थे जिनको अगले दिन सुबह वापिस ले जाना होता था। इनके साथ-साथ 'धर्मयुग','हिंदुस्तान','सरिता','सारिका' और कुछ उपन्यास भी लाते थे जिनको 7 दिन में पढ़ कर वापिस करना होता था अखबार पढ़ते-पढ़ते अखबारों में लिखने की आदत पड़ गई थी। इस प्रकार कह सकता हूँ कि आज के मेरे लेखन की नींव तो बाबूजी द्वारा ही डाली हुई है। इसलिए जब कभी भूले-भटके कोई मेरे लेखन को सही बताता या सराहना करता है तो मुझे लगता है इसका श्रेय तो बाबूजी  को जाता है क्योंकि यह तो उनकी 'दूरदर्शिता' थी जो उन्होने मुझे पढ़ने-लिखने का शौकीन बना दिया था। आज उनको यह संसार छोड़े हुये सत्ताईस  वर्ष  से अधिक व्यतीत हो चुके हैं परंतु उनके विचार और सिद्धान्त आज भी मेरा 'संबल' बने हुये हैं।मेरे लेखन को  सम्पूर्ण श्रेय श्रद्धेय बाबूजी का है।
 मेरठ कालेज,मेरठ में बीच के खाली पीरियड्स में मैं लाइब्रेरी के एक अलग-थलग कोने में बैठ कर जिन पुस्तकों को पढ़ता था उनमें कुछ के नाम आज भी याद हैं-काका कालेकर साहब की गांधी जी पर पुस्तक,'हिन्दी के साहित्य सेवी' आदि। स्वामी दयानन्द 'सरस्वती' के प्रवचनों का संकलन-'धर्म और विज्ञान' पुस्तक काफी मोटी  और भारी थी कई माह में उसका अध्यन पूर्ण हो पाया था। लाइब्रेरियन साहब ने अपनी कुर्सी के नीचे उस पुस्तक को रख छोड़ा था क्योंकि उनको मालूम था कि पूरा पढे बगैर मैं रहूँगा नहीं तो रोज़-रोज़ आलमारी में रखने का झंझट वह क्यों करें?'मेरठ कालेज पत्रिका' में मेरा पहला लेख-'रावण -वध एक पूर्व निर्धारित योजना' 1970-71 के अंक में छ्पा था जिसका संशोधित और विस्तारित रूप आगरा में 'सप्तदिवा साप्ताहिक' में दो किश्तों में  1982 में प्रकाशित हुआ था जिसे 'क्रांतिस्वर' ब्लाग में 2010 में चार किश्तों मे दिया गया था।  

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रविवार, 27 फ़रवरी 2022

23 फरवरी 2022 लखनऊ चुनाव

 



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चौथे चरण के आज के मतदान तक 231 विधायकों के चुनाव का कार्य संपन्न हो गया है।वरिष्ठ पत्रकारों दीपक शर्मा, संजय शर्मा, पुण्य प्रसून बाजपेई के विश्लेषण समाजवादी पार्टी, रालोद गठबंधन की बढ़त को दर्शा रहे हैं।

लखनऊ के सरोजनीनगर के समाजवादी प्रत्याशी प्रोफेसर अभिषेक मिश्र की स्थिति मजबूत होने की सूचना पी पी बाजपेई साहब के पास है, साक्षी जोशी ने सरोजनी नगर के वोटरों के साक्षात्कार से अभिषेक मिश्र की मजबूती का संकेत दिया है।

प्रत्यक्ष रूप से हमने भी देखा है कि बकवादी भाजपा समर्थक शाम तक घरों में दुबके बैठे थे, संजय शर्मा को दिए साक्षात्कार में अखिलेश यादव ने कहा था कि भाजपा के खिलाफ यू पी की जनता चुनाव लड़ रही है और समाजवादी पार्टी जनता का समर्थन कर रही है यह प्रत्यक्ष दिखाई भी दे रहा है।

कोलकाता के ज्योतिषी सिद्धांत सहगल साहब ने पहले ही विश्लेषण दिया था कि मोदी के लिए मंगल की दशा हानिकारक हो चुकी है और अखिलेश के लिए शुभ। मोदी की सभा में खाली कुर्सियों और उनकी बदजुबानी तथा अखिलेश के गठबंधन को अपार जन समर्थन से उनके ज्योतिषी विश्लेषण की पुष्टि होती है।

यू पी के चुनाव परिणाम योगी के साथ साथ मोदी और शाह को भी पदच्युत करने वाले रहेंगे।भाजपा के भीतर से मोदी के विरुद्ध व्यापक विद्रोह होगा।




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रविवार, 14 मार्च 2021

" पर उपदेश कुशल बहुतेरे " : प्रगतिशील विद्वान


 

कबीरदास जी ने कहा था :

'' सार - सार को गही देय , थोथा देय उडाय   । 

साधू ऐसा चाहिए     जैसा सूप       सुभाय     । । "

लेकिन आज प्रगतिशील कहाय जाने वाले विद्वान सिर्फ समारोहों में माला पहनने तक ही सीमित है साहित्य का परिमार्जन खुद वे नहीं करेंगे " पर उपदेश कुशल बहुतेरे " नीति के तहत दूसरों से ऐसा करने की अपेक्षा रखेगे ------


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