बुधवार, 27 मार्च 2013

नाना जी की कुछ स्मृतियाँ ---विजय राजबली माथुर

( स्व डॉ राधे मोहन लाल माथुर सुपुत्र स्व श्याम सुंदर लाल माथुर )
जैसा कि हमने बचपन से सुना है कि हमारे नानजी का जन्म 01 जनवरी 1900 ई को हुआ था। उनका निधन तो 27 मार्च 1979 ई को हुआ था ,आज यह वर्णन उनकी पुण्य तिथि के अवसर पर उनकी स्मृति मे उनको ही समर्पित है ---

हमारे नानाजी अपने जीवित रहे तीन बच्चों मे हमारी माँ जो बीच की थीं को ज़्यादा मानते थे। इसी प्रकार माँ के तीनों बच्चों मे बीच के हमारे भाई अजय को ज़्यादा मानते थे। ऐसा किसी दूसरे का अनुमान नहीं उन्होने खुद ही कहा था। हमारी माँ भी नाना जी का पूरा ख्याल रखती थीं किन्तु अजय के विचारों के बारे मे मैं कुछ भी कह सकने मे अक्षम हूँ।

माँ की शादी के बाद जब बाबूजी दरियाबाद मे मर्ज़ी मुताबिक खेती देखने की इच्छा बाबाजी के (बड़े ताऊजी के पक्ष मे)निर्णय के कारण पूरी न कर सके तो एम ई एस मे नौकरी करने लखनऊ आ गए थे। मामाजी रिसर्च के लिए आस्ट्रेलिया गए हुये थे तो नानाजी ने न्यू हैदराबाद मे ही उनके साथ टिकने का आग्रह किया था। अतः बेहद छुटपन मे भी हमे नानाजी के साथ रहने का अवसर मिला है। नानाजी तब कृषि विभाग मे नौकरी करते थे। माँ से सुना था कि नानाजी एक बूंदी का लड्डू रोजाना लाकर मुझे दिया करते थे। माँ के कहे मुताबिक मैं नानाजी की  साईकिल घर के  ऊपर चढ़ते ही उनके पास आकर कहता था "नाना जी --लड्डू" और नानाजी झोले से निकाल कर वह लड्डू मुझे दे देते थे। माँ ने बताया है तो ऐसा उस समय मेरा स्वभाव रहा होगा किन्तु अपनी याद दाश्त के समय से तो मैं किसी से भी कुछ मांगता ही नहीं था और खुद देने पर भी बड़ी मुश्किल से ही लेता था। नाना जी के बाद वाले उनके भाई जिनको हम लोग बड़े नाना जी कहते थे हम लोगों की शिकायत खुद हमारी माँ से करते थे कि तुमने इन बच्चों को कैसी आदत डाली है ये कभी हमसे कुछ मांगते ही नहीं दो तो भी नखरे दिखाते हैं। खैर दो -ढाई साल की उम्र मे मेरा वैसा स्वभाव रहा होगा तो मुझे खुद उसकी याद नहीं है।

नाना जी जब बनारस यूनीवर्सिटी से होम्योपैथी पढ़ने विभाग से छुट्टी लेकर गए थे तब उनके भांजे (गोपाल मामाजी) लखनऊ यूनिवर्सिटी के हास्टल मे रहने चले गए थे जो वहाँ से LLb कर रहे थे। नानाजी जब बनारस से आए तो उनसे मिलने एक रोज़ सुबह-सुबह गए थे साथ मे मुझे भी ले गए थे तब शायद 4 या साढ़े चार वर्ष का रहा हूंगा। पैदल ही न्यू हैदराबाद से यूनिवर्सिटी गए थे तब बीच से पुलिस लाईन होकर गए थे। आज की तरह तब पुलिस लाईन प्रवेश कोई समस्या नहीं थी। IT कालेज चौराहे से सिटी बस पकड़ने के लिए भी पुलिस लाईन होकर निकल जाते थे -बहुत अच्छे तरीके से मुझे याद है। गोपाल मामाजी ने बेचने आए फेरी वाले से केले लेकर मुझे एक खाने को दिया तब भी मैंने लेने से इंकार ही किया था और फिर नानाजी के ''ले लो " कहने पर ही लिया और खाया था।

बाद मे दुगांवा मे कुछ दिन रहने के बाद हम लोग हुसैन गंज मे नाले के किनारे वाले 'फखरुद्दीन मंज़िल'के नीचे के हिस्से मे रहने लगे थे। नानाजी अक्सर हम लोगों से मिलने आ जाते थे और हम लोग भी न्यू हैदराबाद मामाजी/नानाजी से मिलने जाते रहते थे। शुरू शुरू मे बाबूजी का वोटर लिस्ट मे नाम न्यू हैदराबाद मे ही था। अतः 1957 के आम चुनाव मे वोट डालने बाबूजी न्यू हैदराबाद ही गए थे। नाना जी की तो ड्यूटी भी उनके घर के सामने वाले पार्क मे ही थी। शाम को ड्यूटी से लौट कर नानाजी ने बाबूजी को बताया था कि उनके एक साथी ने ड्यूटी पर क्या कारस्तानी की थी। तब उम्मीदवारों के चुनाव निशान के साथ उनके अलग-अलग बाक्स होते थे और जिस बाक्स मे से वोट के पर्चे निकलते थे उसी उम्मीदवार के पक्ष मे गिने जाते थे। दो बैलों की जोड़ी के बाक्स मे कुछ वोट के पर्चे पूरे अंदर नही जा पाये थे और नानाजी उनको अंदर करने लगे तो उनके दूसरे साथी ने आ कर उनसे कहा-"क्या गजब करते हो?" और बाहर को लटकते हुये पर्चे खींच कर 'हंसिया और गेंहू की बाली' वाले लाल बाक्स मे डाल दिये। शायद नाना जी की अपनी विचार धारा 'जनसंघ' के पक्ष मे थी किन्तु ड्यूटी के अनुसार वह कांग्रेस के पर्चे उसके बाक्स मे ठीक से डालने जा रहे थे जबकि उनके दूसरे साथी ने ड्यूटी ठीक से नहीं निभाई थी।

गुड़ियों के मेले (नाग पंचमी)के दिन एक बार जोरदार बारिश हुई और सारा मेला गड़बड़ा गया था। खादी  आश्रम/विजय मेडिकल हाल के सामने वाली सड़कों  की पटरी पर मिट्टी के खिलौने बेचने वालों के बहुत से खिलौने पानी मे बह-बह कर हमारे घर के सामने की सड़क से होते हुये नाले मे समा गए थे। ऐसे मे नानाजी सब्जी वाले की दुकान पर रुक गए थे जो हम लोगों से मिलने आ रहे थे। उस समय सड़क पर कमर तक पानी हमारे घर के सामने भरा था। जब पानी एडी तक रह गया तब नाना जी हमारे घर पहुंचे और बाबूजी भी बाद मे आ पाये। नाना जी तब हमारी माँ या दिल्ली मे मौसी के घर बिना पैसे दिये कुछ नहीं खाते थे। उनको पैसे न खर्च करने पड़े इसलिए माँ भी उनको चाय वगैरह को नहीं पूंछती थी परंतु पानी मे इतना भीग जाने के कारण नानाजी को गरम चाय बना कर दी। उस समय हमारे माता-पिता केवल सुबह एक बार ही चाय पीते थे और हम बहन-भाई को तो चाय देने का कोई सवाल ही नहीं था जैसा कि आजकल नन्हें-मुन्ने को भी बोतल के जरिये चाय देने का चलन देखते हैं तब कोई ऐसा सोच भी नहीं सकता था।

1960 मे जब पीलीभीत बांध से गोमती मे ज़्यादा पानी छोड़ दिया गया था और बाढ़ आना निश्चित था तो नाना जी अपने दफ्तर से सीधे माँ को यह बताने आए थे कि बाढ़ के बाद ही अब वहाँ आना और वह भी तभी दोबारा आ पाएंगे। बाबूजी के दफ्तर से आने तक नाना जी रुके रहे जिस कारण जब वह न्यू हैदराबाद पहुंचे तो घुटनों तक पानी पार करते हुये ही जाना पड़ा। मामाजी के घर के तीन तरफ पानी भर गया था और वहाँ नाव भी चली थी। नाले के मुहाने पर घर होने के बावजूद हम लोग सुरक्षित रहे बल्कि 06 सप्रू मार्ग से पानी मे घर घिर जाने पर भुआ-फूफाजी,दोनों भाई साहब सब हमारे घर ही शरण लेने आए थे। (उनमे छोटे वाले लाखेश भाई साहब जो कमलेश बाबू के अज़ीज़ों अज़ीज़ हैं हमारे घर से डेढ़ किलो मीटर की दूरी पर हैं लेकिन 'धन्ना सेठ' होने के कारण मुझसे मुंह सिकोड़े हुये हैं क्योंकि मैं गरीब मेहनतकश हूँ)।डॉ शोभा/कमलेश बाबू से वह फोन के माध्यम से संपर्क मे रहते हैं। उनसे बड़े भाई साहब तो शोभा की बेटी मुक्ता के ही शहर पूना मे लखनऊ से जाकर बस गए हैं। 

नानाजी समय से पूर्व रिटायरमेंट लेकर शाहजहाँपुर चले गए थे। वहाँ स्टेशन और टाउन हाल के निकट भारद्वाज कालोनी मे उन्होने अपना मकान बनवा लिया था। यह कालोनी पहले अमरूदों का बाग थी जो पाकिस्तान चले गए लोगों के स्वामित्व का था। कलेक्टर भारद्वाज साहब के प्रयास से उसे आवासीय कालोनी बना दिया गया था अतः उनके ही नाम पर यह कालोनी बनी। इसमे कुल 30 मकान बनाए गए थे। हमारे नानाजी के बाद के दो भाइयों को छोड़ कर उनके बाद के दो भाइयों ने भी उनके साथ-साथ मकान बनाए थे जो तीनों लगातार एक साथ हैं। पांचों भाइयों मे एकजुटता थी और जानते हुये भी किसी ने (जिन्होने मकान नहीं बनाए थे ने  भी) अपने पिताजी को ज़मीन खरीदने की सूचना नहीं दी थी क्योंकि वह मकान-ज़मीन को झगड़े का साधन मानते थे। उनके बाद ही सबने मकान बनाए थे। मामाजी की शादी के बाद तक वह जीवित थे और उन्होने मौसी के तीन बच्चों तथा हम दो भाइयों को भी देखा था। नानाजी ने उनका चित्र अन्य राम आदि के चित्रों के साथ अपने पूजा-स्थल पर रखा हुआ था। सुबह-शाम दोनों वक्त पौराणिक आधार पर नाना जी पूजा किया करते थे। 

अपने मकान मे नाना जी ने रहने पर दिल्ली से मौसी व लखनऊ से हमारी माँ को बुलाया था। मौसी पहले पहुँच गई थीं और हम लोग बाद मे पहुंचे थे। उनकी बड़ी बेटी (मिथ्थे जीजी )से नाना जी ने चटनी पीसने का आग्रह किया था तो उन्होने जवाब दिया था कि,नाना जी चटनी तो आपकी शोभा ही पीसेगी। नाना जी ने यह बात  बाद मे हमारी माँ से बताई थी। वही मिथ्थे जीजी और शोभा आज भोपाल मे अपने-अपने मकान बनाए हुये हैं और दोनों मे गहरी छन्न रही है। मुक्ता की शादी मे कानपुर मे सात वर्ष पूर्व मिली थीं। यशवन्त के बारे मे शोभा से जानकारी पूछती रहती हैं । 

नाना जी ने माँ से अजय को (जिसे वह सबसे ज़्यादा मानते थे)अपने पास शाहजहाँपुर मे छोडने को कहा था  
उन्होने तो मना कर दिया था  किन्तु मौसी ने अपने सबसे बड़े बेटे (लाल भाई साहब)को उनके पास छोड़ दिया था लेकिन उनके लगातार दो वर्ष हाई स्कूल मे फेल हो जाने पर नाना जी ने मौसाजी से अपने पास वापिस बुला लेने को कहा था। वह नानाजी का कहना नहीं मानते थे और उनके भाइयों के साथ शतरंज पर पढ़ाई छोड़ कर डटे रहते थे तो पास कहाँ से होते?नाना जी को यह बात नापसंद थी। आज शोभा और लाल भाई साहब मे भी गहरी छनती है।( लालभाई साहब भी कमलेश बाबू की ही तरह मेरे ज्योतिषीय ज्ञान का मखौल उड़ाते हैं क्योंकि मैं पोंगा-पंथ का खंडन करता हूँ और वह उसे पूजते हैं। अपनी बेटी की जन्मपत्री को मेरे द्वारा गलत बताए जाने पर वह भड़क गए थे और मुझे आगरा यूनिवर्सिटी से ज्योतिष का कोर्स करने की हिदायत दी थी।लेकिन मेरे द्वारा बनाई जन्मपत्री और बताए गए समय पर ही उनकी बेटी की शादी हुई उनके बताए समय पर तीन वर्ष पूर्व नहीं। नाना जी के भतीजे (बबुए मामाजी )भी उनको ही सही मान कर अपने बेटे का काफी नुकसान करा चुके हैं क्योंकि मैंने जो वैज्ञानिक उपाय बताए थे उनमे कोई टीम-टाम नहीं थी और लाल भाई साहब के  बताए उपाय तड़क-भड़क और  ख़र्चीले होने के कारण उनको भाए थे। उनका तर्क था कि तुम (यानि कि मैं)घर से प्रेक्टिस करते हो जबकि लाल ने दिल्ली मे एयर कंडीशंड आफिस खोला है एक  लेडी सेक्रेटरी भी रखे हुये है। तो उनके अधिक ज्ञान का पैमाना हुआ लेडी सेक्रेटरी और एयर कंडीशंड आफिस को मेंटेन करना जो मैं नहीं कर सकता इसलिए अज्ञानी हुआ लेकिन नुकसान बबुए मामाजी के बेटे विवेक का हुआ जिनसे शोभा/कमलेश बाबू चिढ़ते हैं। )

1962 मे जब नानाजी दिल्ली से मौसी के पास से लौटते मे बरेली हम लोगों के पास मिलने हेतु रुके थे तब तक बाबूजी को सिलीगुड़ी ज्वाइन करने के आर्डर आ चुके थे। नानाजी ने बाबूजी से पूछा था कि वह नान फेमिली स्टेशन होने के कारण ये लोग कहाँ रहेंगे?कहाँ पढ़ेंगे?तो बाबू जी ने बउआ से सलाह किए बगैर ही तुरंत कह दिया था कि आपके पास तब वह चुप रह गए थे। अतः सब सामान व हम लोगों को शाहजहाँपुर छोड़ कर बाबूजी सिलीगुड़ी चले गए थे। नवंबर के महीने मे स्कूलों मे दाखिला कैसे होता?कभी नानाजी के घर मे खाना बनाने वाली मिसराईंन के बड़े बेटे बड़े अधिकारी हो गए थे और उन्होने तलुआ ,बहादुरगंज मे 'विश्वनाथ जूनियर हाई स्कूल' की स्थापना की थी उनके छोटे भाई उसके प्रबन्धक थे उनसे नाना जी ने हम लोगों की समस्या बताई जिनके कहने पर अजय व मेरा दाखिला उस स्कूल मे  हो सका। 1963 मे बउआ व शोभा बाबूजी के पास सिलीगुड़ी चले गए क्योंकि शोभा का एडमीशन नाना जी ने नहीं करवाया था। दोनों भाई नानाजी के पास रहे। नाना जी हम दोनों भाइयों को उसी प्रकार रखते थे जिस प्रकार हमारी माँ जिन्हे  हम लोग बउआ कहते थे।अजय कभी -कभी लाउड स्पीकर पर बज रहे गानों को गुंनगुनाता रहता था। एक बार वह ऐसे ही दोहरा रहा था-"जो वादा किया वह निभाना पड़ेगा" ;नाना जी ने सुन कर  कहा कि "निभा तो रहे हैं"। उनका आशय हम लोगों को रखने से था,हालांकि हम लोगों को तो उन्हे मजबूरी मे  रखना पड़ा था। 1964 मे हम लोग भी सिलीगुड़ी चले गए थे तब नाना जी लखनऊ आए थे  हम लोगों को छोडने /विदा करने। जिस दिन की हम लोगों की ट्रेन थी उस दिन नेहरू जी का दिल्ली मे अंतिम संस्कार था और लखनऊ मे बस आदि परिवहन  सब चलना बंद था अतः किसी प्रकार भुआ के घर सप्रू मार्ग से हम लोग तो चारबाग पहुंचे ही वह लोग स्टेशन तक पहुँचाने  नहीं गए। तब मामाजी ने मोपेड़ ली हुई थी उस पर ही पहली बार नानाजी उनके साथ बैठ कर स्टेशन तक गए जबकि वह उस पर नहीं बैठते थे। ट्रेफिक के कारण ही माईंजी भी स्टेशन तक न आ सकीं। 

1967 मे बाबूजी का तबादला यू पी की ओर तो एनाउंस हो गया था स्टेशन डिक्लेयर होना व रिलीव होना बाकी था। सितंबर मे बाबूजी ने बउआ के साथ हम लोगों को एक बार फिर शाहजहाँपुर नानाजी के पास भेज दिया। इतना लंबा सफर पहली बार बउआ ने अकेले हम लोगों व सामान के साथ किया जबकि इससे पहले वह लखनऊ या बरेली से भी शाहजहाँपुर अकेले नहीं गई थीं। लखनऊ मे छोटी लाईन से बड़ी की गाड़ी बदलते हुये हम लोग शाम को 5 बजे के लगभग शाहजहाँपुर पहुंचे थे। फिर बीच मे दाखिले की समस्या थी क्योंकि कोई भी स्कूल/कालेज उस समय प्रवेश नहीं लेता है। हाथी गोदाम स्थित आर्य कन्या पाठशाला मे शोभा को दाखिल कराने मे तो नानाजी को दिक्कत नहीं आई क्योंकि प्रबन्धक  तिनकू लाल वर्मा जी उनके पूर्व परिचित थे।  अजय और मेरा दाखिला कराने हेतु नानाजी ने किन्ही माथुर साहब से बात की जो सरदार पटेल हिन्दू इंटर कालेज मे वाईस प्रिंसिपल थे। उन्होने प्रिंसिपल टंडन जी से सिफ़ारिश नहीं की केवल उनके सामने ले जाकर खड़ा कर दिया और उन्होने मिड सेशन मे दाखिला करने से मना कर दिया। 

GF(गांधी फैजाम) कालेज के प्रिंसिपल चौधरी मोहम्मद वसी साहब  से नाना जी मुझे ले जाकर अकेले ही मिले तो उन्होने खुशी-खुशी मेरा दाखिला मेरे मन पसंद विषयों मे  कक्षा 11 मे कर लिया। इसके बाद अजय को ले कर मिशन स्कूल के प्राचार्य से नाना जी मिले तो उन्होने भी कक्षा 9 मे अजय को साईन्स विषय मे दाखिल कर लिया(जिस  विद्यालय मे क्रांतिकारी राम प्रसाद 'बिस्मिल' जी भी पढे थे)। 

पहले भी जब हम लोग नाना जी के पास थे उनके साथ सार्वजनिक सभाओं मे नेताओं के भाषण सुनने जाते थे जब बउआ सिलीगुड़ी मे थीं तो अजय भी जाते थे वरना वह नहीं जाते थे। नाना जी प्रत्येक पार्टी के नेता की सभा ज़रूर सुनते थे भले ही वह खुद 'जनसंघ' समर्थक थे। डॉ राम मनोहर लोहिया की सभा भी हमने नाना जी के साथ टाउन हाल मे सुनी थी। लोहिया जी की खास बात "जैसे यह मालूम होते हुये भी कि कूड़ा फिर आएगा,रोज़ झाड़ू लगाते हैं उसी प्रकार सरकारों को भी बुहारते रहना चाहिए" मुझे आज भी याद है बाकी बातें याद नहीं हैं। एस एम बनर्जी साहब की सभा भी हमने नानाजी के साथ सुनी थी जो लाल झंडे लगा कर हुई थी जबकि वह तो कानपुर से निर्दलीय सांसद थे। यू पी मे तब मंत्री और जनसंघ नेता परमेश्वर (या बरमेश्वर )पांडे की सभा भी नाना जी के साथ सुनने गए थे। 

बबुए मामा जी अपनी आर्डिनेंस क्लोदिग फ़ेक्टरी स्थित मंदिर कमेटी मे कुछ पदाधिकारी थे वह जालंधर के संत श्याम जी पाराशर को प्रवचनों हेतु बुलवाया करते थे। जितने दिन प्रवचन चले मैं नाना जी के साथ सुनने जाता रहा। मेरे इसी ब्लाग मे लिखे लेख-'रावण वध एक पूर्व निर्धारित योजना','सीता का विद्रोह','राष्ट्र वादी केकेयी' का स्त्रोत संत श्याम जी पाराशर के प्रवचन ही हैं। उनकी चार पुस्तकें भी नाना जी के पास पढ़ी थीं जो बाद मे दीमक लग जाने के कारण माईंजी ने सब किताबों के साथ फेंक दी।मांगने की आदत न होने के कारण ही बउआ ने नहीं मांगी वरना उन्हें किताबें फिंकने का बहुत अफसोस रहा क्योंकि एक तो उनके पिताजी की किताबें थीं दूसरे मुझे किताबें ही पढ़ने का तो शौक है। 

1973 मे मैं लखनऊ एल आई सी की एक परीक्षा देने आया था जबकि सारू स्मेल्टिंग मे जाब कर रहा था। मामाजी के बादशाहबाग वाले यूनीवर्सिटी बंगले पर ही आया था। माईंजी ने पहचान लिया था लेकिन मामाजी ने नहीं पहचाना था। सप्रू मार्ग मिलने गया था तो फूफाजी ने पहचान लिया था और भुआ ने भी नहीं पहचाना था। लौटते मे मामा जी -माईंजी मुझे सिटी बस पर छोडने आई टी कालेज चौराहे तक आए थे। तब चारबाग तक कुल 50 पैसे का टिकट था मैं लखनऊ मेल से चल कर रात मे शाहजहाँपुर पहुंचा था ,स्टेशन से पटरी-पटरी के सहारे चल कर भारद्वाज कालोनी आ गया था तब तक कोई दिक्कत नहीं थी अब तो ऐसा करना जुर्म है। लगभग एक बजे नाना जी का दरवाजा खटखटाया और उनके  कौन पूछने पर मैंने कहा नानाजी दरवाजा खोलिए तो तुरंत नानाजी ने मेरा नाम पुकार कर कहा अभी खोल रहे हैं। नाना जी ने केवल मेरी आवाज़ पर ही मुझे पहचान लिया था। बगल के घर मे नानाजी के दो भाई रहते थे उनमे से एक जिनको हम लोग बंबई वाले नाना जी कहते थे उधर से बोले कौन है दादा ऐसे दरवाजा न खोलिएगा इतनी रात मे कोई दूसरा भी आवाज़ बदल कर धोखा दे सकता है। चूंकि मेरे वहाँ पहुँचने की कोई सूचना नहीं थी इसलिए उनका ख्याल भी गलत नहीं था किन्तु हमारे नाना जी ने अपने भाई से मेरा नाम लेकर  कह दिया कि वह लखनऊ से मेरठ जा रहा था यहाँ मुझे लेने आया है। बउआ से मैंने नानाजी से मिलते हुये आने की बात कही थी साथ उनको लाने की नहीं किन्तु उनकी बात रखते हुये उनसे  साथ चलने को औपचारिक रूप से कहा  और यह मेरा खुद का किया पहला फैसला था जिसमे बाबूजी या बउआ से राय लेने का अवसर भी न था। 

बरेली और हापुड़ मे गाडियाँ बदलते हुये जब हम मेरठ घर पहुंचे तो बउआ भी नानाजी को साथ देख कर आश्चर्य चकित हो गई। नानाजी ने उनसे भी यही कहा यह हमे भी ले आया। यह  मिलेटरी क्वार्टर  कैंट स्टेशन के प्लेट फार्म की सीध मे ही आगे था। कुछ दिन रह कर नाना जी फिर दिल्ली मौसी से मिलने चले गए और लौटते मे दोबारा यहाँ होते जाने की बात कही थी। इससे पूर्व जब महेश नानाजी के बेटे विजय मामा जी की शादी मे नाना जी रुड़की रोड वाले क्वार्टर मे आए थे तब मेरे लिए दो होम्योपैथी किताबे लाकर दे गए थे कि अब अपने पास रख कर क्या करेंगे तुम स्तेमाल करना। दिल्ली मे मौसी की तबीयत ज़्यादा खराब थी और उन्होने अपने पास नानाजी से 15 दिन रुकने का आग्रह किया अतः वह अपना सामान लेने दो रोज़ को फिर मेरठ आए और लौटते मे एक होम्योपैथी किताब गोपाल (जो अब जीवित नहीं हैं) को देने हेतु ले गए कि वह इससे देख कर मौसी को दवा दे सकेगा। फिर नानाजी दिल्ली से ही सीधे शाहजहाँपुर लौट गए। 

दिसंबर 1974 मे आगरा मे अजय का एक्सीडेंट होने के बाद 1975 मे शुरू मे नाना जी वहाँ गए थे तब मैं मेरठ से वहाँ पहुंचा था। उस वक्त कुछ दिन नानाजी के साथ रहना हुआ था। सितंबर 1977 मे मामाजी के निधन के बाद चार दिन लखनऊ मे उनके साथ और रहे थे। 1978 मे आगरा मे जब हमने अपना मकान लिया तब तक नानाजी का स्वास्थ्य सफर करने लायक नहीं रह गया था। अक्तूबर मे बाबूजी और बउआ उनके द्वारा आँखों का आपरेशन करवाने पर शाहजहाँपुर गए थे। 27 मार्च 1979 को नानाजी ने यह शरीर इस संसार से छोड़ दिया। वस्तुतः मौसी के बाद मामाजी का भी निधन हो जाने से नानाजी को ज़बरदस्त मानसिक आघात लगा था और वह शारीरिक दृष्टि से भी क्षीण हो गए थे मैं उनकी बीमारी मे उनको देखने नहीं जा पाया था उनके निधन के बाद भी बउआ व बाबूजी ही गए थे। 

हालांकि राजनीतिक रूप से मेरी विचार धारा नानाजी की राजनीतिक विचार धारा से 180 डिग्री के अंतर पर है और वह भी उनके सान्निध्य से पढ़ी हुई पुस्तकों के आधार पर ही किन्तु उनका अन्य दूसरे मामलों मे व्यापक प्रभाव मैं खुद मे महसूस करता हूँ । नाना जी की ईमानदारी, सत्य बोलने की प्रवृत्ति,किसी के आगे न झुकने और न दबने की आदत ,दूसरों का ज़्यादा से ज़्यादा भला करने की चाहत एवं प्रयास आदि कुछ सिद्धान्त मैंने नानाजी से ही ग्रहण किए हैं और चूंकि बउआ व बाबूजी भी इन सिद्धांतों को मानते तथा इन पर ही चलते थे अतः मुझे इन बातों  को अपनाने से कभी रोका नहीं।

आज हमारे नानाजी को यह संसार छोड़े हुये 34 वर्ष पूर्ण हो गए हैं परंतु उनके साथ बिताया गया समय और उनकी बातें अभी कल ही की लगती हैं और उनसे हमे आगे भी प्रेरणा मिलती रहेगी। आज की होली पर हम अपने नानाजी की आत्मा की शांति की परमात्मा से प्रार्थना करते हैं।





 

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शनिवार, 16 मार्च 2013

क्या गांधी जी धर्म निरपेक्ष थे? ---विजय राजबली माथुर

प्रेस-संवाददाता/संपादक की अपनी मर्यादाएं,मजबूरीया,आयोजको से संबंध/प्रभाव/प्रलोभन आदि बहुत सी तमाम बातें होती हैं जिंनका किसी भी समाचार के प्रकाशन पर प्रभाव पड़ता है।यही बातहिंदुस्तान,लखनऊ,दिनांक 14 मार्च 2013,पृष्ठ 07 पर प्रकाशित इस समाचार के साथ भी सत्य
घटित हुई है। आयोजकों द्वारा जारी किए गए 'प्रेस नोट' को ही संक्षिप्त रूप मे सभी समाचार पत्रों द्वारा प्रकाशित कर दिया जाता है और वास्तविक घटनाक्रम की उपेक्षा कर दी जाती है। चूंकि मैं इस गोष्ठी मे आमंत्रित होने के कारण उपस्थित था अतः समस्त घटनाक्रम आँखों से देखा व कानों से सुना है और मैं समझता हूँ कि प्रबुद्ध जनों की गोष्ठी मे घटित एक घटना को सार्वजनिक करना मेरा नैतिक दायित्व भी है अतः उस कर्तव्य का पालन मात्र कर रहा हूँ। न किसी का समर्थन और न ही किसी का विरोध करना मेरा अभीष्ट है।




एक आमंत्रित विद्वान जो शायद भूगोल के शिक्षक हैं अपने सम्बोधन मे डॉ अंबेडकर को गांधी जी से श्रेष्ठ बोल गए थे। 'गांधी भवन' मे गांधी जी की प्रतिमा के समक्ष यह बात अन्य विद्वान वक्ताओं को बुरी लगी। किसी ने गांधी जी के प्रसंग को उठाना विषय से भटकना बताया तो कुछ भड़क गए और डॉ अंबेडकर की आलोचना करने लगे। कुल 24 या 25 विद्वानों की गोष्ठी मे इस प्रकार का विवाद हास्यास्पद ही कहा जा सकता है। उन शिक्षक महोदय ने प्रारम्भ मे ही कहा था कि विषय परिवर्तन लगे तो उनको बता दिया जाये। संचालक,अध्यक्ष और संयोजक द्वारा उस समय कुछ भी इंगित नहीं किया गया लेकिन बाद मे सभी बिफर गए।

 मेरे दृष्टिकोण मे गांधी भवन मे गांधी प्रतिमा के समक्ष गोष्ठी का स्थान चयन 'गांधी जी'को विषय से अलग नहीं होने देता।  जैसा की उन शिक्षक महोदय से कहा गया था  मैं समझता हूँ कि उनको अनावश्यक रूप से दबाव मे लेने का प्रयास था। दूसरे विद्वान और आयोजक एक ओर तो यह कह रहे थे कि गांधी जी सांप्रदायिकता के विरोधी थे और दूसरी ओर यह भी कह रहे थे कि डॉ राही मासूम रज़ा के अनुसार 'धर्म' को 'राजनीति'से अलग किया जाना चाहिए। वह शिक्षक महोदय भारी चूक कर गए जो उन्होने यह नहीं कहा कि ये दोनों बातें परस्पर विरोधी हैं। गांधी जी तो  'धर्म' के बिना 'राजनीति' की कल्पना भी नहीं करते थे। गांधी जी का धर्म पाखंड नहीं था उनका ज़ोर 'सत्य और अहिंसा' पर था। उनका मानना था पहले सत्य और अहिंसा का पालन सुनिश्चित हो जाये तब बाद मे 'अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य' का पालन करना सुगम हो जाएगा। गांधी जी मजहब को धर्म नहीं मानते थे जैसा कि यहाँ आयोजक और दूसरे विद्वान मजहब के पर्यायवाची के रूप मे धर्म का प्रयोग अनधिकृत रूप से कर रहे थे। वस्तुतः समस्या ही आज यह है कि 'ढोंग-पाखंड-आडंबर' और मजहबों की विभिन्नता को धार्मिक विभिन्नता की संज्ञा  और मान्यता दी जा रही है और  अड़ियल ज़िद्द को अपनाया जा रहा है। यदि गांधी जी के बताए वास्तविक धर्म=सत्य,अहिंसा(मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य को अपनाया जाये तो समाज मे टकराव को ठहराव मिल ही नहीं सकता। 'धर्म निरपेक्षता' की बात कह कर इन धर्म तत्वों से दूर रहने का उपदेश दिया जाता है और यही सामाजिक टकराव का कारण है।
ढोंग-पाखंड पर आधारित विभिन्न मजहब समाज मे वैमनस्य उत्पन्न करते है और विभिन्न लोगों के आर्थिक हितों के संरक्षण हेतु विभिन्न गुट विभिन्न मजहबों के इर्द-गिर्द एकजुट होकर तनाव व टकराव का सृजन करते हैं। आर्थिक स्वार्थों को मजहबी 'आस्था व विश्वास' का जामा पहना कर पृष्ठपोषण किया जाता है।

जहां तक डॉ अंबेडकर की श्रेष्ठता का प्रश्न है निश्चित रूप से उनका पलड़ा गांधी जी से भारी है। 'कम्यूनल एवार्ड' के तहत अस्पृश्य जनों को प्रथक निर्वाचन का अधिकार मिल रहा था और यदि  डॉ अंबेडकर अपने समुदाय और वर्ग हित को ही सर्वोपरि वरीयता देते तो गांधी जी की परवाह न करते ;किन्तु उन्होने गांधी जी की अड़ियल ज़िद्द की पूर्ती की खातिर  अपने इतने बड़े वर्ग समुदाय के हितों को 'कुर्बान' कर दिया और गांधी से 'पूना पैकट' करके उनका अनशन तुड़वा दिया। ज़रा सोचिए कि यदि पूना पैक्ट न होता और अस्पृश्य जन प्रथक निर्वाचन के तहत अधिक संख्या मे चुन कर आते तो क्या गांधी जी के परम शिष्य पंडित नेहरू भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बन सकते थे?तब सम्भवतःडॉ अंबेडकर ही भारत के प्रथम प्रधानमंत्री होते और भारत की राजनीति आज कुछ और ही होती । अतः निश्चय ही डॉ अंबेडकर व्यक्तिगत रूप से गांधी जी  से श्रेष्ठ ठहरते हैं। यहाँ गांधीजी निश्चय ही ब्राह्मण वाद के पृष्ठ पोषक के रूप मे याद किए जाएँगे और उनका वह 'धर्म' जो आज बौना बना दिया गया है और उस पर पाखंड हावी है उसके भी वही हेतु सिद्ध होते हैं।

वस्तुतः धर्म निरपेक्षता के स्थान पर 'संप्रदाय निरपेक्षता' की बात पर बल दिया जाना चाहिए और वास्तविक धर्म जिसको शुरू मे गांधी जी ने भी सही माना था को अपनाया जाना चाहिए तभी समाज और राजनीति मे शुचिता की प्राप्ति हो सकती है।

 

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शनिवार, 9 मार्च 2013

हमे पहले ही आभास हो गया था---विजय राजबली माथुर

28 फरवरी और 01 मार्च, 2013 के हिंदुस्तान,लखनऊ के अंक मे उपरोक्त समाचार व चित्र देख कर सहसा याद हो आया कि,मैंने 2005 ई मे सपा छोड़ कर बहुत ही अच्छा निर्णय ले लिया था। फिर बाद मे आगरा संसदीय क्षेत्र से सांसद राज बब्बर जी ने भी सपा को अलविदा कर दिया था और उनके बाद मुलायम सिंह जी के सहयोगी-सलाहकार हमारे दरियाबाद के मूल निवासी बेनी प्रसाद वर्मा जी ने भी सपा छोड़ कर 'समाजवादी क्रांति दल'का गठन कर लिया था। परंतु मैं न तो उनके दल मे गया न ही बब्बर जी के 'जन - मोर्चा' जिसके संरक्षक वी पी सिंह जी थे मे ही शामिल हुआ;मैं राजनीतिक रूप से निष्क्रिय हो गया था। अतः भाकपा के तत्कालीन ज़िला मंत्री द्वारा बार-बार मेरे घर पर आकर पुनः भाकपा मे लौटने का आग्रह किया जाने लगा -मैं उनके साथ भी पहले ज़िला कोषाध्यक्ष रह चुका  था। अंततः वह मुझे सदस्य न होते हुये भी पार्टी कार्यक्रमों मे बुलाने लगे और मुझे उनको सम्मान देने हेतु शामिल होना पड़ा। 

 2006 मे आगरा कमिश्नरी पर एक प्रदर्शन  मे जिसमे राज बब्बर जी के साथ रथ पर उत्तर प्रदेश के वर्तमान भाकपा सचिव डॉ गिरीश जी भी  भाग लेने आए थे भी मैंने भाग लिया था।  मदिया कटरा स्थित  पार्टी कार्यालय जाते समय डॉ गिरीश जी के साथ ही मैं भी ट्रैक्टर ट्राली मे बैठ कर आया था और उनकी मौजूदगी मे ही कामरेड जिलामंत्री जी ने मुझसे पुनः पार्टी प्रवेश का आवेदन तभी  ले लिया था। तबसे अब  फिर भाकपा मे सक्रिय हूँ और और अब लखनऊ मे रहते हुये  डॉ गिरीश जी द्वारा भेजी सूचनाओं को फेसबुक के माध्यम से भी प्रचारित करता रहता हूँ। 

लेकिन आज यहाँ मैं सपा मे बिताए लगभग 10 वर्षों की कुछ खास-खास बातों का ही  ज़िक्र करना चाहता हूँ। 

अप्रैल 1994 मे आगरा से लखनऊ आकर कामरेड रामचन्द्र बक्श सिंह और कामरेड मित्र सेन यादव के साथ मैं सपा मे शामिल तो हो गया था किन्तु तत्काल सक्रिय न हो सका क्योंकि पहले से बीमार चल रही शालिनी का जून'94 मे और जून'95 मे बाबूजी व बउआ का भी निधन हो गया था। इस प्रकार मेरी निष्क्रियता का लाभ उठा कर होटल मुगल के प्रबन्धकों ने श्रम न्यायालय के पीठासीन अधिकारी को खरीद कर मेरे विरुद्ध एक्स पार्टी केस जीत लिया था। 
फिर भी आगरा पूर्वी विधानसभा क्षेत्र,सपा के अध्यक्ष पूर्व कामरेड शिव नारायण कुशवाहा जी से व्यक्तिगत परिचय के कारण कुछ ज़रूरी बैठकों मे शामिल हो लेता था,यशवन्त को साथ ले जाता था-घर मे तब अकेला नहीं छोड़ा जा सकता था। बाद मे पूनम(जिनके पिताजी से मेरे पिताजी का पत्राचार हो चुका था)के आने के बाद पुनः सक्रिय होना शुरू किया। पूर्वी विधासभा क्षेत्र के नए अध्यक्ष अशोक सिंह चंदेल साहब ने मुझे अपने साथ महामंत्री के रूप मे  कार्यकारिणी मे शामिल कर लिया। उनके साथ 1999 के संसदीय  चुनावों  मे राज बब्बर जी के लिए प्रचार मे भाग लिया । मैं जब सक्रिय नहीं था तब भी पत्राचार करता रहता था। मैंने ही राम गोपाल यादव जी से अनुरोध किया था कि,आगरा से राज बब्बर जी को खड़ा करें। आगरा को विशेष महत्व दें और अखिलेश यादव जी को युवाओं के बीच लाएँ। और इस प्रकार सपा का आगरा से लोकसभा मे प्रतिनिधित्व हो सका। लेकिन आगरा क्षेत्र के प्रभारी राम आसरे विश्वकर्मा जी ने इन सब का श्रेय खुद ले लिया। 

चुनावों के बाद नए नगर - सपाध्यक्ष डॉ डी सी गोयल साहब ने मुझे नगर कार्यकारिणी मे शामिल कर लिया था। डॉ गोयल सभी कार्यकर्ताओं के साथ समान व्यवहार करते थे । अक्सर वह कार्यकर्ताओं को शुभकामनायें प्रेषित करते रहे जिसका एक नमूना यह कार्ड है-


चूंकि पूनम समाजवादी महिला सभा मे वार्ड अध्यक्ष थीं और मैं नगर कार्यकारिणी मे था अतः डॉ साहब ने यह शुभकामना कार्ड संयुक्त रूप से भेजा था। 
2002 के चुनावों मे उनको ही सपा ने पूर्वी विधानसभा क्षेत्र से खड़ा किया था। उनके लिए मैंने व पूनम ने सक्रिय रूप से भाग लिया ,हालांकि उसी बीच मुझको पाल्स का  एक आपरेशन भी कराना पड़ा था।  ठीक चुनावों के बीच विश्वकर्मा जी ने प्रत्याशी डॉ गोयल को सपाध्यक्ष पद से हटवा दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि वह चुनाव हार गए।जनता मे यह संदेश गया कि पार्टी को ही प्रत्याशी पर विश्वास नहीं है।  पत्र लिख कर  मैंने इस निर्णय को गलत बताया था जिस पर विश्व कर्मा जी  मुझ पर क्रुद्ध भी हो गए थे कि मैं उनके प्रभारी रहते हुये सीधे अध्यक्ष को पत्र क्यों भेजता हूँ। तभी मैंने सपा छोडने का निर्णय मन मे कर लिया था किन्तु चंदेल साहब एवं डॉ साहब की आत्मीयता के कारण उनको दो वर्ष बाद तक  सहयोग करता रहा था। जब अखिलेश यादव जी को युवा मामलों का राष्ट्रीय प्रभारी बना दिया गया और वह सांसद भी हो गए तब उनके आगरा आगमन पर उनको भी वे बातें दोहराई थीं जिनके लिए विश्व कर्मा जी क्रुद्ध हुये थे। अखिलेश जी के कहने पर विस्तृत वर्णन उनको डाक से भेजा था जिसकी प्राप्ति की सूचना  उन्होने अपने सहायक गजेन्द्र सिंह जी द्वारा पत्र भिजवाकर भी दी थी। उस पत्र की स्कैन कापी सार्वजनिक की जा रही है-
 

2007 के विधानसभा चुनावों मे डॉ डी सी गोयल साहब ने राज बब्बर जी के 'जन-मोर्चा'प्रत्याशी के रूप मे सपा/भाजपा के विरुद्ध मुक़ाबला किया था। स्थानीय तौर पर भाकपा ने डॉ गोयल का समर्थन किया था अतः एक बार फिर भाकपा की तरफ से हमने डॉ गोयल साहब के लिए चुनाव प्रचार मे भाग लिया। 
आगरा मे विशेष सपा - अधिवेशन के बाद घटनाक्रम 'ताज कारीडोर' के नाम पर बदला तो प्रधानमंत्री ए बी बाजपेयी जी के सहयोग से मुलायम सिंह जी मुख्यमंत्री बन गए तब वह निवर्तमान राज्यपाल विष्णूकांत शास्त्री जी को रेल से मुगलसराय तक विदा करने गए थे। उसी समय मुझे उनकी भाजपा से निकटता का आभास हो गया था।  

पहले निष्क्रिय रह कर फिर सदस्यता का नवीनीकरण न कराकर मैंने सपा से अलगाव कर लिया था। मेरा निर्णय गलत नहीं था क्योंकि राज बब्बर जी और बेनी प्रसाद वर्मा जी को भी बाद मे सपा को छोडना ही पड़ा। भाजपा के  अप्रत्यक्ष समर्थन  से बनी मुलायम सपा सरकार मे भाजपा व्यापारियों की पौ बारह रही। हालांकि जब जार्ज फरनाडीज़ साहब बाजपेयी जी के रक्षा मंत्री और संकटमोचक थे तब मुलायम सिंह जी उनकी तुलना संसद मे गियोलित्ती से करते थे जिनके समर्थन से हिटलर सत्ता मे आया था। लेकिन आज फरनाडीज़ साहब के उस दायित्व का निर्वहन खुद मुलायम सिंह जी बखूबी कर रहे हैं। सुषमा स्वराज जी भी कभी सोशलिस्ट पार्टी की तरफ से हरियाणा मे शिक्षा मंत्री रही थीं,आज भाजपा की तरफ से विपक्ष की नेता हैं। उनके साथ मुलायम सिंह जी की घनिष्ठता अकारण नहीं है बल्कि यह भविष्य का एक भयावह संकेत है। 

 

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सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

यादों के झरोखे से -61 वर्ष (भाग-3 )---विजय राजबली माथुर

पिछले भाग-2- से आगे......... 

जब मैंने इस ब्लाग का प्रारम्भ किया था तब मेरा विचार नितांत व्यक्तिगत-घरेलू बातों से परहेज रखने का था और इसी लिए इन बातों का ज़िक्र पूर्व मे नहीं किया था किन्तु हमारे लखनऊ आने के बाद भी बहन/बहनोई द्वारा हमारे लखनऊ स्थानांतरण पर सवाल उठाया गया और हद्द तो तब हो गई जब वे लोग 2011 मे हमारे घर आए। शोभा ने तो अपने भतीजे को 'कुपूत' की संज्ञा दी ही जबकि पहले वही उसे हस्तगत करना चाहती थीं। कमलेश बाबू की एक बात ने अत्यंत आश्चर्य ही नहीं प्रस्तुत किया बल्कि उन लोगों के प्रति अब कठोर निर्णय लेकर दूरी बनाने को भी मजबूर किया। इसका उल्लेख उपयुक्त अवसर पर ही करना उचित होगा। 

1995 मे जब बउआ व बाबूजी ने मुझ पर पुनर्विवाह का दबाव बनाया था तब यदि वे आगे भी जीवित रहते तो निश्चय ही बहन/बहनोई अपने खेल मे कामयाब हो जाते जैसे कि वे 1981 मे मेरे तथा 1988 मे अजय के विवाह के समय हो गए थे। चूंकि उन सब बातों का विस्तृत उल्लेख इसी ब्लाग मे हो चुका है अतः दोहराना आवश्यक नहीं है। तमाम फोटो व जन्मपत्रियाँ केवल इसलिए लौटा दी गई थीं कि वे लड़कियां शोभा की सास अर्थात कमलेश बाबू की माताजी को पसंद नहीं थीं। जिन शालिनी को उन्होने पसंद करवाया था वह उनकी रिश्तेदार की नन्द थीं। उनके घर वालों को पहले ही पता था कि,उनका जीवन-काल मात्र 35 वर्ष है। ज़रूर ही उन लोगों ने कमलेश बाबू के पिताजी को सच बता कर मदद मांगी होगी और उन लोगों ने हमारे माता-पिता से यह बात छिपाई होगी। उस वक्त मैं खुद ज्योतिष का ज्ञान होने के बावजूद  पारंगत नहीं था जिनसे हम लोग सलाह लेते थे उनको कमलेश बाबू के इशारे पर शालिनी के भाई कुक्कू (जो कमलेश बाबू के दोस्त भी थे और भतीज दामाद भी)ने खरीद लिया होगा। पंडितों के इसी बिकाऊपन के मद्दे नज़र मुझे खुद बाद मे ( धोखा खाने के बाद) मशक्कत करके  खुद ज्योतिषीय ज्ञान बढ़ाना पड़ा। आज उसी पर प्रहार पूना प्रवासी 'भ्रष्ट-धृष्ट-धूर्त-ठग ब्लागर'के माध्यम से करवाकर पोंगा पंडितवाद को संरक्षण दिया जा रहा है।

यह बेहद दुखद पहलू है कि हमारी बहन जी की आदर्श  हमारी भुआ साहिबा ने तो अपने एक बड़े भाई के खिलाफ अदालत मे मुक्कदमा भी लड़ा था और एक पोस्टमेन को खरीद कर अदालत से भेजे उनके नाम के सम्मन हड़प लिए थे और सूचना के आभाव मे वह पैरोकारी  न कर सके तथा भुआ के हक मे 'एक्स पार्टी' निर्णय हो गया। भुआ के छोटे बेटे( जो इस समय हमारे घर से एक किलो मीटर की दूरी पर मकान बनाए हुये हैं और शोभा/कमलेश बाबू के घनिष्ठ हैं)ने अपने किसी DIG मित्र के सहयोग से छल से जीते मुकदमे के आधार पर खेतों पर कब्जा लिया था। 

हमारे पिताजी ने तो अपना हक नहीं लिया था और आजीवन नौकरी के जरिये तंग हाली मे गुज़ारा किया। अतः पुश्तैनी एक चुटकी भी धूल या कंकड़ी लिए बगैर जब मैंने 15 वर्षों की किश्तों मे कमला नगर,आगरा मे आवास विकास का मकान हासिल किया तो भुआ समेत सभी रिशतेदारों को खूब चुभा था और अब सामने आया है कि बहन/बहनोई भी उन लोगों के सरताज थे। 1975 मे शोभा की शादी के बाद 1976 मे कमलेश बाबू ने शोभा के जरिये बउआ को कहलाया था कि बाबूजी दरियाबाद मे अपना हिस्सा ले लें और चूंकि मैं या अजय उसे देखने वहाँ नहीं जाएँगे तो कमलेश बाबू BHEL,हरिद्वार की नौकरी छोड़ कर दरियाबाद मे बाबूजी के प्रतिनिधि के तौर पर देखेंगे। बाबूजी,अजय और मैं इसके पक्ष मे नहीं थे अतः उनके मंसूबे पूरे नहीं हो सके और उन्होने हम भाईयों को सबक सिखाने का दृढ़ निश्चय कर उस पर अमल भी कर लिया। हम लोग उनको बहन/बहनोई मानते रहे और वे लोग हम लोगों को दुश्मन। हालांकि BHEL,झांसी से फोरमेन के रूप मे अवकाश ग्रहण करके अब प्राईवेट फर्म मे इंजीनियर भी बन गए दोनों पुत्रियों का विवाह भी कर चुके अपना मकान भी भोपाल मे बना चुके  लेकिन तब भी श्वसुर की संपत्ति कैसे हस्तगत करें (जबकि हम लोग उससे दूर हैं)इसी फिराक मे लगे हुये हैं। दरियाबाद मे हमारे विरुद्ध नाहक दुष्प्रचार कर दिया है कि मैं लखनऊ ,आगरा छोड़ कर इसलिए आया हूँ कि दरियाबाद मे पुश्तैनी हिस्सा कब्जे मे ले सकूँ। चकबंदी मे हम दोनों भाईयों का नाम होने के बावजूद लखनऊ आने के तीन वर्ष बीत जाने पर भी हम दरियाबाद नहीं गए हैं जबकि एक राजनीतिक कार्यक्रम मे बाराबंकी तो अभी 27 जनवरी को हो भी आए हैं। मुझे ये सूचनाएँ कमल दादा ने दी और उनकी ही बहन शैल जीजी ने तो शीघ्र ही उन दोनों का निधन हो गया है। माधुरी जीजी ने कमलेश बाबू द्वारा अपने सबसे छोटे भाई को परेशान करके ज़मीन मे हिस्सा मांगने की सूचना दी तो शीघ्र ही उनका भी निधन हो गया और कमलेश बाबू के उन छोटे भाई की दोनों आँखों की रोशनी चली गई जो खुद मैं अप्रैल 2011 मे उनकी भतीजी की शादी के समय देख आया हूँ। उसी के बाद वे लोग हमारे घर आए थे। 

ITC के कुछ शेयर बाबूजी के पास थे उनको कमलेश बाबू ने मुझे अपने नाम कराने की सलाह आगरा मे ही दी थी कि खुद को अकेला बता कर क्लेम कर दो। मैं अनैतिक कार्य नहीं कर सकता था भले ही बाबूजी की मेहनत की रकम डूब जाए तो डूब जाये। फिर उनका सुझाव था कि अजय को फरार बता दो शोभा हस्ताक्षर कर देंगी। लेकिन वकील कमलेश सिंह जी  ने उन लोगों से मिलने से मना कर दिया  तब कमलेश बाबू ने गर्दन और कंधा झटकाते हुये कहा कि वकील को मिलना तो चाहिए था। फोन पर इंकार करने के दस मिनट बाद वकील कमलेश सिंह जी की मोटर साईकिल का एकसीडेंट हो गया उनके दोनों हाथों मे प्लास्टर चढ़ाना पड़ा। इस दुर्घटना को देख कर मैंने शोभा/कमलेश बाबू से किनारा करना ही बेहतर समझा है। 

अब उन लोगों ने न केवल मूल रूप से पटना वासी और फिलहाल पूना प्रवासी ब्लागर जो उनकी छोटी बिटिया की विमान नगर मे पड़ौसन भी रही है के माध्यम से ब्लाग जगत मे मेरे व यशवन्त के विरुद्ध घृणित अभियान चलाया बल्कि उसी के माध्यम से हमारी पार्टी के एक नेता को भी उकसा रखा है। उन नेताजी का कहना है कि आजकल कोई बिना स्वार्थ के किसी को एक ग्लास पानी भी नहीं पिलाता है । वही नेताजी मुझको कहते हैं कि वह मुझे दरियाबाद मे अपना हिस्सा व हक दिला देंगे। 'मुद्दई सुस्त-गवाह चुस्त' तो कहावत सुनी  थी लेकिन बिना मांगी मदद देने को व्याकुल लोग सुने तो नहीं थे ,देखने को मिल गए। 

पूना निवासी और पटना से संबन्धित पूनम की एक रिश्तेदार के माध्यम से उन लोगों ने पूनम के घर भी हमारे विरुद्ध माहौल बनाने मे कामयाबी हासिल कर ली है और इसी वजह से सितंबर मे उनको बुलाने पटना जा कर भी हम उनके भाई के घर नहीं गए थे।कुल मिला कर उनका लक्ष्य श्रीवास्तव होने के कारण पूनम को परेशान करना है जिसमे श्रीवास्तव ब्लागर्स का ही उनको भरपूर सहयोग भी मिल रहा है। दूसरी ओर यशवन्त को परेशान करने व दबोचने के अभियान भी साथ-साथ चलाये हुये हैं।  

न ही मेरा लेखन न ही मेरी राजनीति अपने निजी स्वार्थों के लिए हैं न ही रिश्ते नाते। मैंने जीवन पर्यंत शोषण-उत्पीड़न,अत्याचार-ढोंग-पाखंड-आडंबर  का विरोध करने का बीड़ा उठाया हुआ है और बगैर भयभीत हुये डट कर समस्त परिस्थितियों का अंतिम श्वास व रक्त की अंतिम बूंद तक मुक़ाबला करता रहूँगा। 'जीवन ही संघर्ष है-संघर्ष ही जीवन है'।

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रविवार, 10 फ़रवरी 2013

यादों के झरोखे से -61 वर्ष (भाग-2)---विजय राजबली माथुर

 भाग 1 से आगे .......................................................

नौ वर्ष की उम्र मे लखनऊ छोडने से पहले अक्सर बउआ हम दोनों भाईयों को( जब कोई बाबूजी से मिलने अतिथि आते थे तभी )समोसे-मिठाई लाने भेजती थीं। हालांकि डेरी का मक्खन लेने कभी-कभी  और स्कूल तो रोजाना सड़क पार करके जाते थे किन्तु ये सामान बिना सड़क पार किए लाने की हिदायत देती थीं जिस कारण ज़्यादा दूर चल कर 'हेवेट  रोड' चौराहा स्थित (जिसे अब रोडवेज के टिकट पर हुसैन गंज लिखा जाता है)हलवाई से लाते थे। एक बार बउआ  ने मिठाई का नाम नहीं बताया केवल 'मिठाई' कह दिया तब हलवाई ने  चार समोसों के अलावा बाकी चार आनो मे खोये की बर्फी के कटे छोटे-छोटे टुकड़ों वाली मिठाई दे दी ;तब समोसा एक आने मे एक मिलता था जो अब तब से आकार मे बहुत छोटा पाँच रुपयों मे मिलता है।

हमारे स्कूल मे विभिन्न कार्यक्रमों मे अक्सर और बच्चे अपने छोटे भाई-बहनों  को दिखाने ले आते थे ,हम भी बउआ से शोभा को भेज देने को कहते थे ,एक बार 'वसंत' के कार्यक्रम मे  हम दोनों भाईयों के साथ शोभा को  इस हिदायत के साथ भेजा था कि दोनों लोग बीच मे रखें और बहन के दोनों हाथ पकड़े रखें। स्कूल मे बूंदी वितरण के दौरान भी लाईन मे शोभा को अजय के बाद खड़ा किया और खुद सबसे पीछे रहा था। आज तक अपने छोटे भाई-बहनों से पीछे ही चल रहा हूँ। वे दोनों खुद को ज़्यादा काबिल और मुझको मूर्ख मानते हैं तथा समाज व रिशतेदारों के  बीच भी उन दोनों की ही मान्यता अधिक है। छोटी बहन की छोटी पुत्री ने तो पूना मे बस कर ब्लाग जगत मे भी वहाँ प्रवास करने वाले  'भ्रष्ट-धृष्ट-निकृष्ट'ब्लागर (जो धूर्त और ठग भी है) का सहारा लेकर हम लोगों के विरुद्ध अनर्गल छींटा-कशी भी करवाई है।जबकि आगरा मे एम बी ए करने के दौरान उसका हमारे पास आना -जाना और कभी-कभी रुकना भी हुआ है और पढ़ाई से संबन्धित कुछ सलाह भी हम लोगों से प्राप्त की है।यूरेका फोर्ब्समे नौकरी करने के दौरान कुछ माह हमारे घर रही है फिर बिदक कर हास्टल चली गई थी ,कमलेश बाबू आकर शिफ्ट कर गए थे और हमे बताए बगैर लोकल गार्जियन की जगह हमारा नाम-पता लिखा गए थे। 

अजय ने तो बाबूजी के तुरंत बाद बउआ का भी निधन होने के साथ ही हम से रिश्ता समाप्त कर लिया था किन्तु ऊपरी तौर पर शोभा और कमलेश बाबू ने हम से एक तरफ तो संबंध बनाए रखे तो दूसरी तरफ भीतर ही भीतर हमारे विरुद्ध साज़िशों मे भी तल्लीन रहे जैसा कि वे पूर्व मे भी करते रहे थे ;वे तो आगे भी कामयाब रहते यदि मैं आगरा छोड़ कर लखनऊ न आ गया होता तो। इसीलिए वे मेरे लखनऊ स्थानांतरण का तीव्र विरोध कर रहे थे। शोभा ने मुझसे कहा था कि मैं या तो उनके साथ भोपाल मे शिफ्ट करूँ या फिर पूनम के भाई के साथ पटना जा कर रहूँ परंतु स्वतंत्र रूप से लखनऊ मे न रहूँ। अतः ब्लागर्स  को टिप्पणियों के माध्यम से टटोल कर उनकी छोटी पुत्री मुक्ता ने  यशवन्त को गुमराह कराने का भरसक प्रयास किया।पूना प्रवासी ब्लागर ने अपनी पटना स्थित शिष्य ब्लागर के माध्यम  से यशवन्त को पूना मे जाब करने का आफ़र दिया जिसे रद्द कर देने पर उस ब्लागर के पति के आफिस मे पटना मे जाब करने का प्रलोभन दिलाया। उद्देश्य यशवन्त को मुझसे अलग करके दबोचना था। 

शालिनी के निधन के बाद शोभा ने यशवन्त को बउआ से अपने पास रखने की मांग की थी जिसे अजय की श्रीमतीजी ने बउआ से रद्द करा दिया था और बउआ ने यह बात मुझे पूनम से विवाह करने के लिए प्रेरित करते वक्त बताई थी। शोभा नहीं चाहती थीं कि मैं पूनर्विवाह पूनम जो श्रीवास्तव हैं से करूँ। इसलिए उन्होने पटना की श्रीवास्तव ब्लागर जो पूना मे प्रवास कर रही है को मोहरा बना कर ब्लागजगत मे मेरे विरुद्ध हड़कंप खड़ा करवाया जिससे अधिकांश श्रीवास्तव ब्लागर्स मेरा व यशवन्त का विरोध करें तो प्रतिरोध करने पर पूनम और हम लोगों के विरुद्ध दरार पड़े सके। ये लोग अपने उद्देश्य मे कितना सफल हुये या हो सकते हैं वे ही जाने परंतु हम अडिग व अविचलित हैं । फिलहाल तो मई 2011 मे हमारे यहाँ लखनऊ आने पर  यशवन्त को 'कपूत' बता कर शोभा/कमलेश बाबू ही हम से कट गए और इस प्रकार हम भी उनके भीतरी षडयंत्रों से बच गए।  

क्रमशः ..............

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मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

यादों के झरोखे से-61 वर्ष(भाग-1) ---विजय राजबली माथुर

 अरे भई लीडर  नहीं,मैं तो एक       प्लीडर हूँ।

प्राफेसर     नहीं  ----प्रूफ      रीडर           हूँ। ।

आग फूंस की मत मुझको समझो,एक बबूला हूँ।

मत समझो मुझको छैनी,मैं तो एक वसूला हूँ। ।

मिट्टी का माधव मैं नहीं,कह लो शेर-ए-मिट्टी हूँ।

मत समझना मुझको अणु-विभु से भारी तुम,परमाणु की एक गिट्टी हूँ। ।

(20-11-1976 को 'विद्रोही स्व-स्वर मे'शीर्षक से लिपिबद्ध यह तुकबंदी ही मेरा परिचय  है। )

'मनुष्य अपने ग्रह-नक्षत्रों द्वारा नियंत्रित पर्यावरण की उपज है'। इसी लिए कभी अनपेक्षित सफलता मिल जाती है तो कभी सतत संघर्षों के बाद भी वांछित सफलता से वंचित रहना पड़ता है। इस सब मे 'सद -कर्म','दुष्कर्म' और सर्वाधिक प्रभाव 'अकर्म' का रहता है। जब तक मनुष्य का मस्तिष्क समझ-बूझ लायक सक्रिय नहीं हो जाता तब तक बाल्यावस्था मे वह पूर्व जन्म के संचित संस्कारों द्वारा संचालित रहता है। जहां तक याददाश्त का सवाल है मुझे भलीभाँति आज भी याद है कि,इसी लखनऊ मे हुसेन गंज नाले के पास 'फख़रुद्दीन मंजिल' मे जब हम लोग  रहते थे तब सड़क पार (विधानसभा मार्ग) सामने विजय मेडिकल हाल के निकट 'राष्ट्रीय पाठशाला' मे पढ़ने जाते थे लेकिन किस कक्षा मे यह याद नही है। उससे पूर्व जब बाबूजी नानाजी के साथ मामाजी (डॉ कृपा शंकर माथुर,पूर्व विभागाध्यक्ष-एङ्ग्थ्रोपालोजी ,लखनऊ विश्वविद्यालय)के आस्ट्रेलिया जाने पर उनके आग्रह पर न्यू हैदराबाद वाले मकान मे कुछ समय रहे थे तब वहीं किसी विद्यालय मे जो घर के बिलकुल नजदीक था मे किसी कक्षा मे पढ़ने भेजा था परंतु वहाँ बच्चे परेशान करते थे और किताबें फाड़ देते थे अतः स्कूल से हटा लिया गया था। राष्ट्रीय पाठशाला के बाद हेवट रोड स्थित बेंगाली ब्वायज स्कूल मे 'टेस्ट' के आधार पर मेरा दाखिला कक्षा तीन मे और छोटे भाई का कक्षा दो मे बाबूजी ने कराने का फैसला किया था। उसी दिन न्यू हैदराबाद से माईंजी आई और बोलीं कि इतनी दूर न भेजें बल्कि 'मुरली नगर' के 'डी पी निगम गर्ल्स जूनियर हाई स्कूल' मे भेजें वहाँ की प्रधानाध्यापिका उनकी सहेली थीं। वहाँ मुझे कक्षा दो मे तथा अजय को कक्षा एक मे लिया गया।

मसालों आदि की पुड़िया/लिफाफे आदि जिनमे कोई कविता मिल जाती थी मैं बउआ से लेकर सम्हाल कर रख लेता था। शायद इसी लिए कक्षा तीन से  मेरे लिए बाबूजी प्रत्येक इतवार को 'स्वतंत्र भारत' अखबार खरीदने लगे थे। फुफेरे भाइयों को यह बहुत नागवार गुजरा था। वे भुआ-फूफाजी से शिकायत करते थे कि मामाँ जी विजय के लिए अखबार खरीदते हैं वह क्या पढ़ता होगा?निश्चय ही उस वक्त मैं सिर्फ बाल परिशिष्ठ की कविता/कहानियाँ ही पढ़ता रहा हूंगा। जब तक अखबार का कागज गल न गया तब तक मेरे पास सब सुरक्षित थे।  

1857की 'क्रान्ति' के  शताब्दी वर्ष 1957 मे किसी मेगज़ीन मे उस क्रांति की याद दाश्त मे  'अजीमुल्ला'साहब की कोई कविता छ्पी थी जो किसी पुड़िया के रूप मे मुझे मिली थी और  बहुत दिनों तक मैं सुरक्षित रखे था अब भी कुछ पंक्तियाँ जो इस प्रकार याद हैं---


हम हैं इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा |
पाक वतन है  कौम का, जन्नत से भी प्यारा ||
ये है हमारी मिल्कियत, हिंदुस्तान हमारा |
इसकी रूहानियत से, रोशन है जग सारा ||
कितनी कदीम, कितनी नईम, सब दुनिया से न्यारा |
करती है जरखेज जिसे, गंगो-जमुन की धारा ||
ऊपर बर्फीला पर्वत पहरेदार हमारा |
नीचे साहिल पर बजता सागर का नक्कारा ||
इसकी खाने उगल रहीं, सोना, हीरा, पारा |
इसकी शानो  शौकत का दुनिया में जयकारा ||
आया फिरंगी दूर से, ऐसा मंतर मारा |

लूटा दोनों हाथों से, प्यारा वतन हमारा ||
आज शहीदों ने है तुमको, अहले वतन ललकारा |
तोड़ो, गुलामी की जंजीरें, बरसाओ अंगारा ||
हिन्दू मुसलमाँ सिख हमारा, भाई भाई प्यारा |
यह है आज़ादी का झंडा, इसे सलाम हमारा ||


कक्षा चार पास करने के बाद 1961 मे बाबूजी का तबादला बरेली होने के कारण वहाँ 'रूक्स प्राईमरी स्कूल'से पाँचवी करके छ्ठे क्लास मे दाखिला 'रूक्स हायर सेकेन्डरी स्कूल' (जो अब टैगोर इंटर कालेज हो गया है)मे लिया परंतु 1962 मे चीनी आक्रमण के दौरान बाबूजी का पुनः ट्रांसफर सिलीगुड़ी (नान फेमिली स्टेशन)होने से हम लोगों को नानाजी के पास शाहजहाँपुर रहना पड़ा और छ्ठे क्लास का शेष भाग तलुआ,बहादुरगंज स्थित 'विश्वनाथ जूनियर हाई स्कूल' से करना पड़ा। यहीं सातवीं कक्षा मे ज़िला वाद-विवाद प्रतियोगिता मे 'प्रथम पुरस्कार' के रूप मे शील्ड के साथ 'कामायनी'पुस्तक प्राप्त हुई।
  बबूए मामाजी आदि (बउआ के चचेरे भाई-बहन)का कहना था कि बी ए स्तर की पुस्तक कक्षा सात मे विजय क्या करेगा?उन सबने पहले पुस्तक पढ़ी तब बाद मे मैं पढ़ पाया जो आज भी मेरे पास मौजूद है। सातवीं पास करने के बाद बाबूजी के पास सिलीगुड़ी चले गए जहां आश्रम पाड़ा स्थित 'कृष्ण माया मेमोरियल हाई स्कूल'से आठवीं  कक्षा से 10 वीं तक अध्यन किया और वहीं से हाई स्कूल पास किया। 9वीं कक्षा मे पढ़ने के दौरान 1965 मे भारत-पाक संघर्ष छिड़ गया था तब एक दिन कक्षा मे बैठे-बैठे ही एक तुकबंदी लिख डाली थी जिसे सहपाठी ने अध्यापकों को भी दिखा दिया था-
''लाल बहादूर शास्त्री'' -
खाने को था नहीं पैसा
केवल धोती,कुरता और कंघा ,सीसा
खदरी पोशाक और दो पैसा की चश्मा ले ली
ग्राम में तार आया,कार्य संभालो चलो देहली
जब खिलवाड़ भारत के साथ,पाकिस्तान ने किया
तो सिंह का बहादुर लाल भी चुप न रह कदम उठाया-
खदेड़ काश्मीर से शत्रु को फीरोजपुर से धकेल दिया
अड्डा हवाई सर्गोदा का तोड़,लाहोर भी ले लिया
अब स्यालकोट क्या?करांची,पिंडी को कदम बढ़ाया-
खिचड - पिचड अय्यूब ने महज़ बहाना दिखाया
''युद्ध बंद करो'' बस जल्दी करो यु-थांद चिल्लाया
चुप न रह भुट्टो भी सिक्योरिटी कौंसिल में गाली बक आया
उस में भी दया का भाव भरा हुआ था
आखिर भारत का ही तो वासी था
पाकिस्तानी के दांत खट्टे कर दिए थे
चीनी अजगर के भी कान खड़े कर दिए थे
ऐसा ही दयाशील भारतीय था जी
नाम भी तो सुनो लाल बहादुर शास्त्री जी
चूंकि बाबूजी का ट्रांसफर यू पी की तरफ होना सुनिश्चित हो गया था परंतु स्टेशन घोषित नहीं हुआ था अतः हम लोगों को पुनः शाहजहाँपुर मे नानाजी के पास आना पड़ा। 'गांधी फैजाम कालेज' से इंटर प्रथम वर्ष किया और द्वितीय वर्ष 'श्री सनातन धर्म इंटर कालेज',लाल कुर्ती,मेरठ कैंट से। फिर स्नातक 'मेरठ कालेज,मेरठ' से किया। यहाँ विभिन्न भाषण गोष्ठियों मे भाग लिया तथा एक जो प्रतियोगितात्मक थी उसमे द्वितीय पुरस्कार के रूप मे चार पुस्तकें  प्राप्त कीं जिनमे हिन्दी मे ये थीं-




आर आर दिवाकर साहब एवं के पी एस मेनन साहब लिखित दोनों अङ्ग्रेज़ी पुस्तकों सहित सभी आज भी मेरे पास हैं।

१९६९ -७० क़े दौरान शाहजहाँपुर मे लिखी अपनी यह लघु तुक-बन्दी जिसे २६ .१० १९७१ को हिन्दी टाईप सीखते समय मेरठ मे टाईप किया था ,प्रस्तुत है-


यह महाभारत क्यों होता?
जो ये भीष्म प्रतिज्ञा न करते देवव्रत ,
 तो यह महाभारत क्यों होता?
 होते न जन्मांध धृतराष्ट्र ,
 तो यह महाभारत क्यों होता?
 इन्द्रप्रस्थ क़े राजभवन से होता न तिरस्कार कुरुराज का,
तो यह महाभारत क्यों होता?
 ध्रूत-भवन में होता न चीर -हरण द्रौपदी का,
 तो यह महाभारत क्यों होता?
 होता न यदि यह महाभारत,
 तो यह भारत,गारत क्यों होता?
 होता न यदि यह महाभारत,
 तो यह गीता का उपदेश क्यों होता?
 होता न यदि यह गीता का उपदेश,
 तो इन वीरों का क्या होता?
मिलती न यदि वीर गति इन वीरों को,
तो इस संसार में हमें गर्व क्यों होता?
*               *              *


 बी ए करने के बाद 13 माह खाली बैठ कर नौकरी पाने के प्रयास करते रहे और नानाजी के फुफेरे भाई स्व महेश चंद्र माथुर,इंस्पेक्टर आफ फेकटरीज़,इंचार्ज-मेरठ रीज़न,मेरठ की कृपा से 'सारू स्मेल्टिंग'  मेरठ मे क्वार्टर के सामने ही ( रेलवे लाईन पार करते ही)अकाउंट्स विभाग मे नौकरी मिल गई। सवा तीन साल कार्य करने के  उपरांत एमेर्जेंसी के दौरान सर्विस समाप्त हो गई और 90 दिन खाली रहने के बाद आगरा मे होटल 'मोगुल ओबेराय' (जो बाद मे मुगल शेरेटन हो गया)मे अकाउंट्स विभाग मे जाब मिल गया। यहाँ से 1985  मे सुपर वाईजर अकाउंट्स के पद से ईमानदारी के चलते  बर्खास्त होने के बाद हींग की मण्डी,आगरा मे विभिन्न दुकानों मे अकाउंट्स जाब पार्ट-टाईम के रूप मे करते हुये होटल मुगल के विरुद्ध केस लगा दिया जिसके सिलसिले मे AITUC से संपर्क के कारण अक्तूबर 1986 मे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मे शामिल हो गया। बाद मे आगरा भाकपा का ज़िला कोषाध्यक्ष भी रहा। लखनऊ मे पूर्व राज्य सचिव  बाबूजी के सहपाठी और रूम मेट रहे कामरेड भीखा लाल जी से जब भेंट हुई तब उन्होने काफी खुशी ज़ाहिर की थी कि मैं (उनके सहपाठी का पुत्र)उनकी पार्टी मे सक्रिय हूँ।

1994 से 2006 तक भाकपा मे सक्रिय न रह कर 10वर्ष 'सपा' मे रहा था और  बाद मे निष्क्रिय था तब  भाकपा,आगरा के जिलामंत्री के कहने पर पुनः वापिस भाकपा मे शामिल हो गया उन्होने 2008 मे मुझे अपने साथ सहायक सचिव के रूप मे कार्यकारिणी मे भी शामिल किया था किन्तु मुझे लखनऊ आना था अतः इस पद पर कायम न रहा। 2009 मे लखनऊ आने पर मेरी सदस्यता यहाँ स्थानांतरित हो गई और अब यहाँ ज़िला काउंसिल सदस्य के रूप मे सक्रिय हूँ।कम्युनिस्ट पार्टी और आर्यसमाज मे रह कर काफी ज्ञानार्जन प्राप्त करने के मौके मिले और मैंने उनका सदुपयोग भी किया है। यों तो 1973 से ही मैं किसी न किसी समाचार पत्र मे लिखता रहा हूँ और एक साप्ताहिक तथा एक त्रैमासिक मे उप-सम्पादक के रूप मे भी सम्बद्ध रहा हूँ। परंतु जून 2010 से अपने विभिन्न ब्लाग्स के माध्यम से लेखन मे दोनों महान संगठनों से प्राप्त ज्ञान को सार्वजनिक करता आ रहा हूँ। स्व्भाविक रूप से प्रतिगामी सोच और विचारों वाले लोगों को चाहे वे रिश्तेदार हों या अन्य -जनहित के ये विचार रास नहीं आते हैं। ऐसे लोगों ने निर्ममता पूर्वक मुझे तथा मेरे परिवारीजनों को पीड़ित करने का कोई अवसर नहीं छोड़ा है। ऐसे लोगों का केंद्र 'पूना' बना हुआ है। भ्रष्ट-धृष्ट-निकृष्ट ब्लागर जो वर्तमान मे पूना मे प्रवास कर रहा है ऐसे लोगों का नेतृत्व व संरक्षण करता है। उस 'ठग' व 'धूर्त' ब्लागर के लगगे-बझझे ब्लागर्स मेरे ज्योतिषीय ज्ञान पर तीव्रता से प्रहार करते हैं क्योंकि मेरे द्वारा व्यक्त दृष्टिकोण को अपनाने से 'ढ़ोंगी-पाखंडी-आडम्बरधारियो'का शोषण-उत्पीड़न का खेल फीका पड़ जाता है। कारपोरेट/पूंजीवाद के दलाल ये ब्लागर्स जन-जागरण के घोर विरोधी हैं और पाखंड की वकालत करते हैं  अतः हम लोगों को परेशान करते रहने मे आनंद का अनुभव करते हैं।

क्रमशः..............

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गुरुवार, 24 जनवरी 2013

21 दिसंबर 12 और 23 जनवरी 13 की दास्तान---विजय राजबली माथुर

21 दिसंबर 2012 को माया केलेनडर के अनुयायी 'जियो टी वी' आदि ने 'प्रलय दिवस' के रूप मे प्रचारित कर रखा था।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ,लखनऊ के ज़िला मंत्री कामरेड मोहम्मद ख़ालिक़ साहब ने इसी दिन अपनी एक पुत्री की शादी की सायत रखी थी।   उससे एक  दिन  पूर्व रात्रि से ही मौसम मे अचानक ठंड काफी बढ़ गई थी सुबह काफी घना कोहरा था किन्तु बाद मे दिन मे धूप अच्छी हो गई थी। शाम को उनके यहाँ कार्यक्रम  मे आए कई कामरेड्स से मुलाक़ात हुई। प्रदेश के एक पदाधिकारी साहब मुझ से ज्योतिष के प्रश्न पर वार्ता करने लगे। ज्योतिष विरोधी यह कामरेड कुछ ही दिन पूर्व अपनी पुत्री के विवाह हेतु मुझसे ज्योतिषीय परामर्श ले चुके थे और उसका लाभ भी उठाया था। उनकी सफाई थी कि,एक कम्युनिस्ट होने के नाते उनका ज्योतिष पर विश्वास नहीं है परंतु लड़के वालों की इच्छानुरूप जन्मपत्री देनी होती है। 

मैंने उनको उपरोक्त संदर्भित लिंक पोस्ट का हवाला देकर बताया कि हम भी अंध-विश्वास-पाखंड और ढोंग का प्रबल विरोध करते हैं किन्तु ग्रह-नक्षत्रों के वैज्ञानिक प्रभाव को नकारना मानव अहित मे मानते हैं। तब उन्होने एक अलग कहानी बता कर उनके द्वारा ज्योतिष का विरोध करने की प्रवृत्ति को जायज ठहराया। उनका कथन था कि जब उनके बाबाजी (grand father)का देहावसान हुआ तब वह दो-ढाई वर्ष के थे और उनके पिताजी अवैतनिक छुट्टी पर रह कर लखनऊ मे उनका इलाज करा रहे थे और उस वक्त उनकी जेब मे मात्र एक रुपया ही शेष था। चूंकि उनके बाबाजी तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्र भानु गुप्त जी तथा IAS/IPS अधिकारियों के गुरु रहे थे अतः वे सब प्रतिदिन बलरामपुर अस्पताल मे उनको देखने आते रहते थे और व्यवस्था कराते रहते थे। उनकी अंतिम क्रिया की व्यवस्था भी प्रशासनिक तौर पर हुई। इस घटना के बाद उन पदाधिकारी साहब के पिताजी ने ब्राह्मण वंश मे होते हुये भी तेरहन्वी आदि कुसंस्कारों का परित्याग करके सदा के लिए 'धर्म-कर्म' को त्याग दिया था वह खुद भी उसी परंपरा का अनुसरण करते हुये ही कम्युनिस्ट बने हैं। 

चाहें कम्युनिस्ट हों या और कोई प्रगतिशील या वैज्ञानिक धर्म को अफीम कहते हैं। नतीजा यह होता है कि,'धर्म' जिसका आशय शरीर और ज्ञान को धारण करना है यथा- 'सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह,ब्रह्मचर्य' को वे ठुकरा देते हैं और असफलता का सामना करते हैं जैसा कि 1991 मे रूस मे साम्यवादी शासन के पतन से सिद्ध हो जाता है। भारत मे भी 'स्टालिन' की सलाह की उपेक्षा करके वे रूसी लकीर के फकीर बने चले आ रहे हैं। इस सब का दुष्परिणाम यह होता है कि शोशंणकारी/उत्पीडंनकारी शक्तियाँ जनता के समक्ष 'ढोंग-पाखंड-आडंबर' को धर्म के रूप मे पेश करके उसे उल्टे उस्तरे से मूढ़ने मे सफल हो जाती हैं।  

यदि जनता को वास्तविक धर्म और वास्तविक 'भगवान'=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न(नीर-जल) जो खुद ही बने होने के कारण ' खुदा' कहलाते हैं और उत्पत्ति,स्थिति,संहार = G(जेनरेट)+O(आपरेट)+D(डेसट्राय) की प्रवृत्ति के कारण GOD भी कहे जाते हैं के बारे मे समझाया जाये तो वह व्यापारियों/उद्योगपतियों के ढोंगवाद को धर्म के धोखे मे न पूजे। किन्तु साईंसदा/प्रगतिशील कहलाने वाले लोग ही पाखंड और ढोंग के लिए खुला मैदान छोड़े रख कर उसे पोसते हैं।

23 जनवरी 2013 को मुझे सोशलिस्ट फाउंडेशन के अध्यक्ष और फारवर्ड ब्लाक के प्रदेशाध्यक्ष महोदय ने तीन विद्यालयों मे 'नेताजी सुभाष चंद्र बोस'के विषय मे अपने लेख से परिचित कराने को कहा था। 

जिस दिन मैंने उनको कार्यक्रम मे भाग लेने की सहमति दी उसी दिन रात्रि 08-30 बजे एक पुराने क्लाईंट 23 जनवरी 2013 को ही अपने मकान का गृह-प्रवेश हवन मुझसे करवाने का आग्रह लेकर आए। यह मुहूर्त उन्होने एक कांग्रेसी सांसद के पुरोहित से निकलवाया था जो उनके लिए उचित भी नहीं था किन्तु वह सबको निमंत्रण पत्र भेज चुके थे। अतः उस दिन उनके लिए शुभ समय चुन कर उनको हामी भर दी जिसके लिए 'नेताजी सुभाष' के कार्यक्रमों को छोड़ने का खूब मलाल रहा। हमेशा ढंग से नियमानुसार हवन करने वाले उन साहब ने बहुत महत्वपूर्ण हवन भी अनमनेपन से किया ,मेरे बताने के बावजूद मेरी राय की उपेक्षा करके उन्होने अपने निवास मे 'मंदिर' भी बनवा कर खुद ही वास्तु-विकार भी उत्पन्न कर रखा है। अपने कर्मों का मर्म वे ही जानें मैंने अपनी ओर से पूर्ण विधि-नियमों के अनुसार उनका हवन सम्पन्न करा दिया है। 

उनके पिताजी ने अपने जीवन की कारुणिक गाथा का ज़िक्र मुझसे निजी वार्ता मे  किया कि उनकी 06 वर्ष की आयु मे उनके पिताजी (अर्थात क्लाईंट के पितामह) का निधन हो गया था वह श्रम-मजदूरी करते थे और उनके निधन के बाद उनकी माताजी ने बड़े कष्टों से उन लोगों को पाला-पोसा और पढ़ाया। बड़े होने पर उनको खुद भी रात्रि मे मजदूरी करके दिन मे अपनी पढ़ाई जारी रखनी पड़ी। LLb करके वह न्यायिक सेवा मे आ गए तथा हाई कोर्ट ,अलाहाबाद से सेवा निवृत होने के बाद भी 72 वर्ष की आयु तक विभिन्न आयोगों के सदस्य के रूप मे अपनी सेवाएँ प्रदान करते रहे। उनके तीनो  पुत्र क्रमशः डाक्टर,एस पी,इंजीनियर हैं। पुत्रियाँ भी अच्छे खानदानों मे हैं । वह इस सब को अपने लिए परमात्मा की कृपा-प्रसाद मानते हैं। अपने बचपन मे जो कठोर श्रम और अध्यन उन्होने किया उसका प्रतिफल उनकी संतानों को भी मिल रहा है उनके अनुसार यह सब उनकी ईमानदारी का प्रतिफल है। उनके जीवन से प्रेरणा ग्रहण की जा सकती है।

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