सोमवार, 21 मार्च 2016

'होली ' क्या थी और क्या हो - ली ? ------ विजय राजबली माथुर

हमारे देश में आजकल दो प्रकार के प्रचलित मत हैं ।  एक तो ढोंगवाद/ब्रहमनवाद का पक्षधर है जो अपनी गढ़ी हुई पौराणिकताओं के भंवर जाल में फंसा कर जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ता आ रहा है। दूसरा नास्तिक/मूलनिवासी पक्ष जो ढोंगवाद के आधार पर ही उसे गलत ढंग से चुनौती देने की कोशिश करता प्रतीत होता है परंतु वास्तव में वह भी ढोंगवाद को ही परिपुष्ट करता जाता है। मैं अपने ब्लाग्स के माध्यम से समय-समय पर वास्तविकताओं को प्रकाश में लाने का प्रयास तो करता रहता हूँ जिस पर एक-दूसरे का विपरीत कहलाने वाले पक्ष मिल कर प्रहार करते रहते हैं। प्रस्तुत टिप्पणी पर मैंने जो टिप्पणी की थी उसे पूर्णतया स्पष्ट करने हेतु अपने पूर्व -प्रकाशित लेख को पुनर्प्रकाशित कर रहा हूँ :


https://www.facebook.com/bharat.bhushan.568/posts/1068170779891451



Friday, March 18, 2011
होली मुबारक

*****                                                                         *****                                      ***** 


प्रति वर्ष हर्षोल्लास के साथ होली पर्व हम  सभी मनाते हैं.इस होली पर हम सब आप सब को बहुत-बहुत मुबारकवाद देते हैं.तमाम तरह की बातें तमाम दन्त-कथाएं होली के सम्बन्ध में प्रचलित हैं.लेकिन वास्तव में हम होली क्यों मनाते हैं.HOLY =पवित्र .जी हाँ होली पवित्र पर्व ही है.जैसा कि हमारे कृषी-प्रधान देश में सभी पर्वों को फसलों के साथ जोड़ा गया है उसी प्रकार होली भी रबी की फसल पकने पर मनाई जाती है.गेहूं चना जौ आदि की बालियों को अग्नि में आधा पका कर खाने का प्राविधान है.दरअसल ये अर्ध-पकी बालियाँ ही 'होला' कहलाती है संस्कृत का 'होला' शब्द ही होली का उद्गम है.इनके सेवन का आयुर्वेदिक लाभ यह है कि आगे ग्रीष्म काल में 'लू' प्रकोप से शरीर की रक्षा हो जाती है.वस्तुतः होली पर्व पर चौराहों पर अग्नि जलाना पर्व का विकृत रूप है जबकि असल में यह सामूहिक हवन(यज्ञ) होता था.विशेष ३६ आहुतियाँ जो नयी फसल पकने पर राष्ट्र और समाज के हित के लिए की जाती थीं और उनका प्रभाव यह रहता था कि न केवल अन्न धन-धान्य सर्व-सुलभ सुरक्षित रहता था बल्कि लोगों का स्वास्थ्य भी संरक्षित होता था.लेकिन आज हम कर क्या रहे है.कूड़ा-करकट टायर-ट्यूब आदि हानिकारक पदार्थों की होली जला रहे हैं.परिणाम भी वैसा ही पा रहे हैं.अग्निकांड अति वर्षा, बाढ़-सूखा, चोरी -लूट, विदेशों को अन्न का अवैद्ध परिगमन आदि कृत गलत पर्व मनाने का ही दुष्फल हैं.संक्रामक रोग और विविध प्रकोप इसी का दुष्परिणाम हैं.

इस पर्व के सम्बन्ध में हमारे पोंगा-पंथी बन्धुओं ने 'प्रह्लाद' को उसके पिता द्वारा उसकी भुआ के माध्यम से जलाने की जो कहानी लोक-प्रिय बना रखी है उसके वैज्ञानिक मर्म को समझने तथा मानने की आवश्यकता है न कि बहकावे में भटकते रहने की.लेकिन बेहद अफ़सोस और दुःख इस बात का है कि पढ़े-लिखे विद्व-जन भी उसी पाखंड को पूजते एवं सिरोधार्य करते हैं,सत्य कथन/लेखन को 'मूर्खतापूर्ण कथा' कह कर उपहास उड़ाते हैं और लोगों को जागरूक नहीं होने देना चाहते हैं.इसी विडम्बना ने हमारे देश को लगभग हजार वर्षों तक गुलाम बनाये रखा और आज आजादी के 68  वर्ष बाद भी देशवासी उन्हीं पोंगा-पंथी पाखंडों को उसी प्रकार  चिपकाये हुए हैं जिस प्रकार बन्दरिया अपने मरे बच्चे की खाल को चिपकाये  फिरती रहती है.


'श्री मद देवी भागवत -वैज्ञानिक व्याख्या' में पहले ही स्पष्ट किया गया है-हिरण्याक्ष और हिरणाकश्यप कोई व्यक्ति-विशेष नहीं थे.बल्कि वे एक चरित्र का प्रतिनिधित्व करते हैं जो पहले भी थे और आज भी हैं और आज भी उनका संहार करने की आवश्यकता है .संस्कृत-भाषा में हिरण्य का अर्थ होता है स्वर्ण और अक्ष का अर्थ है आँख अर्थात वे लोग जो अपनी आँखे स्वर्ण अर्थात धन पर गडाये रखते हैं हिरण्याक्ष कहलाते हैं.ऐसे व्यक्ति केवल और केवल धन के लिए जीते हैं और साथ के अन्य मनुष्यों का शोषण  करते हैं.आज के सन्दर्भ में हम कह सकते हैं कि उत्पादक और उपभोक्ता दोनों का शोषण करने वाले व्यापारी और उद्योगपति गण ही हिरण्याक्ष  हैं.ये लोग कृत्रिम रूप से वस्तुओं का आभाव उत्पन्न करते है और कीमतों में उछाल लाते है वायदा कारोबार द्वारा.पिसती है भोली और गरीब जनता.



एक और   तो ये हिरण्याक्ष लोग किसान को उसकी उपज की पूरी कीमत नहीं देते और उसे भूखों मरने पर मजबूर करते हैं और दूसरी और कीमतों में बेतहाशा वृद्धी करके जनता को चूस लेते हैं.जनता यदि विरोध में आवाज उठाये तो उसका दमन करते हैं और पुलिस -प्रशासन के सहयोग से उसे कुचल डालते हैं.यह प्रवृति सर्व-व्यापक है -चाहे दुनिया का कोई देश हो सब जगह यह लूट और शोषण अनवरत हो रहा है.
'कश्यप'का अर्थ संस्कृत में बिछौना अर्थात बिस्तर से है .जिसका बिस्तर सोने का हो वह हिरण्यकश्यप है .इसका आशय यह हुआ जो धन के ढेर पर सो रहे हैं अर्थात आज के सन्दर्भ में काला व्यापार करने वाला व्यापारी और घूसखोर अधिकारी (शासक-ब्यूरोक्रेट तथा भ्रष्ट नेता दोनों ही) सब हिरण्यकश्यप हैं.सिर्फ ट्यूनीशिया,मिस्त्र और लीबिया के ही नहीं हमारे देश और प्रदेशों के मंत्री-सेक्रेटरी आदि सभी तो हिरण्य कश्यप हैं.प्रजा का दमन करना उस पर जुल्म ढाना यही सब तो ये कर रहे हैं.जो लोग उनका विरोध करते हैं प्रतिकार करते है सभी तो उनके प्रहार झेलते हैं.

अभी 'प्रहलाद' नहीं हुआ है अर्थात प्रजा का आह्लाद नहीं हुआ है.आह्लाद -खुशी -प्रसन्नता जनता को नसीब नहीं है.करों के भार से ,अपहरण -बलात्कार से,चोरी-डकैती ,लूट-मार से,जनता त्राही-त्राही कर रही है.आज फिर आवश्यकता है -'वराह अवतार' की .वराह=वर+अह =वर यानि अच्छा और अह यानी दिन .इस प्रकार वराह अवतार का मतलब है अच्छा दिन -समय आना.जब जनता जागरूक हो जाती है तो अच्छा समय (दिन) आता है और तभी 'प्रहलाद' का जन्म होता है अर्थात प्रजा का आह्लाद होता है =प्रजा की खुशी होती है.ऐसा होने पर ही हिरण्याक्ष तथा हिरण्य कश्यप का अंत हो जाता है अर्थात शोषण और उत्पीडन समाप्त हो जाता है.


अब एक कौतूहल यह रह जाता है कि 'नृसिंह अवतार' क्या है ? खम्बा क्या है?किसी चित्रकार ने समझाने के लिए आधा शेर और आधा मनुष्य वाला चित्र बनाया होगा.अगर आज हमारे यहाँ ऐसा ही होता आ रहा है तो इसका कारण साफ़ है लोगों द्वारा हकीकत को न समझना.बहरहाल हमें चित्रकार के मस्तिष्क को समझना और उसी के अनुरूप व्याख्या करना चाहिए.'खम्बा' का तात्पर्य हुआ उस जड़ प्रशासनिक व्यवस्था से जो जन-भावनाओं को नहीं समझती है और क्रूरतापूर्वक उसे कुचलती रहती है.जब शोषण और उत्पीडन की पराकाष्ठा हो जाती है ,जनता और अधिक दमन नहीं सह पाती है तब क्रांति होती है जिसके बीज सुषुप्तावस्था में जन-मानस में पहले से ही मौजूद रहते हैं.इस अवसर पर देश की युवा शक्ति सिंह -शावक की भाँती ही भ्रष्ट ,उत्पीड़क,शोषक शासन-व्यवस्था को उखाड़ फेंकती है जैसे अभी मिस्त्र और ट्यूनीशिया में आपने देखा-सुना.लीबिया में जन-संघर्ष चल ही रहा है.१७८९ ई. में फ़्रांस में लुई १४ वें को नेपोलियन के नेतृत्व में जनता ने ऐसे ही  उखाड़  फेंका था.अभी कुछ वर्ष पहले वहीं जेनरल डी गाल की तानाशाही को मात्र ८० छात्रों द्वारा पेरिस विश्वविद्यालय से शुरू आन्दोलन ने उखाड़ फेंका था.इसी प्रकार १९१७ ई. में लेनिन के नेतृत्व में 'जार ' की जुल्मी हुकूमत को उखाड़ फेंका गया था. १८५७ ई. में हमारे देश के वीरों ने भी बहादुर शाह ज़फ़र,रानी लक्ष्मी बाई ,तांत्या टोपे,अवध की बेगम आदि-आदि के नेतृत्व में क्रांति की थी लेकिन उसे ग्वालियर के  सिंधिया,पजाब के सिखों ,नेपाल के राणा आदि की मदद से साम्राज्यवादियों ने कुचल दिया था.कारण बहुत स्पष्ट है हमारे देश में पोंगा-पंथ का बोल-बाला था और देश में फूट थी.इसी लिए 'प्रहलाद' नहीं हो सका.


आज के वैज्ञानिक प्रगति के युग में यदि हम ढकोसले,पाखण्ड आदि के फेर से मुक्त हो सकें सच्चाई  को समझ सकें तो कोई कारण नहीं कि आज फिर जनता वैसे ही आह्लादित न हो सके.लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि हमारे देश में आज स्वंयभू भगवान् जो अवतरित हो चुके है (ब्रह्माकुमारी,आनंद मार्ग,डिवाईन लाईट मिशन,आशाराम बापू,मुरारी बापू ,गायत्री परिवार, साईं बाबा ,राधा स्वामी  आदि -आदि असंख्य) वे जनता को दिग्भ्रमित किये हुए हैं एवं वे कभी नहीं चाहते कि जनता जागे और आगे आकर भ्रष्ट व्यवस्था को उखाड़ फेंके.


विकृति ही विकृति-होली के पर्व पर आज जो रंग खेले जा रहे हैं वे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं जबकि रंग खेलने का उद्देश्य स्वास्थ्य रक्षा था.टेसू (पलाश) के फूल रंग के रूप में इस्तेमाल करते थे जो  रोगों से त्वचा की रक्षा करते थे और आने वाले प्रचंड ताप के प्रकोप को झेलने लायक बनाते थे.पोंगा-पंथ और  पाखण्ड वाद ने यह भी समाप्त कर दिया एवं खुशी व उल्लास के पर्व को गाली-गलौच का खेल बना दिया. जो लोग व्यर्थ दावा करते हैं  -होली पर सब चलता है वे अपनी हिंसक और असभ्य मनोवृतियों को रीति-रस्म का आवरण पहना देते हैं. आज चल रहा फूहण पन भारतीय सभ्यता के सर्वथा विपरीत है उसे त्यागने की तत्काल आवश्यकता है.काश देशवासी अपने पुराने गौरव को पुनः  प्राप्त करना चाहें !


आप सभी को एक बार फिर से  सपरिवार होली मुबारक.

****************************************
फेसबुक पर प्राप्त टिप्पणी :
06 मार्च 2015-
"http://krantiswar.blogspot.in/2011/03/blog-post_18.html" target="_blank">http://krantiswar.blogspot.in/2011/03/blog-post_18.html

********************************************************************
फेसबुक पर प्राप्त टिप्पणी :
22-03-2016 

Link to this post-



शनिवार, 27 फ़रवरी 2016

क्यों होते हैं मेरे खिलाफ कई लोग ? ------ विजय राजबली माथुर





ईश्वर= जो समस्त ऐश्वर्यों से सम्पन्न हो अर्थात आज कोई भी नहीं। धर्म= शरीर व समाज को धारण करने वाले तत्व जैसे ' सत्य,अहिंसा (मनसा- वाचा- कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह व ब्रह्मचर्य'। जो 'नास्तिक संप्रदाय' धर्म के खिलाफ है वह स्व्भाविक रूप से 'ढ़ोंगी-पाखंडी-आडंबरकारी ,पुरोहितवादी/ब्राह्मण वाद' को अप्रत्यक्ष समर्थन देकर मजबूत करता है। इसीलिए समष्टिवादी 'साम्यवाद' भारत की धरती पर जन-उपेक्षा का शिकार होकर लुटेरे शोषकों के हमले झेल रहा है और निर्दोष कन्हैया कुमार जेल में यातनाग्रस्त हैं।
ढ़ोंगी-पाखंडी-आडंबरकारी/बाजरवादी क्रियाओं को धर्म की संज्ञा देना जनता को धोखे में रख कर उसके शोषकों का बचाव करना मात्र है। क्यों नहीं जनता को 'धर्म' का 'मर्म' समझा कर अपने साथ लाया जाता ?-------------यह सब ढ़ोंगी पुराण वाद (ब्राह्मण वाद )का चक्कर है जिसमें व्यर्थ उलझने के बजाए सच्चाई की बात करें। होलिका 'होला' शब्द से बना है अर्थात जौ,गेंहू,चना आदि की अर्द्ध पकी बालियाँ जिनके सेवन से आगे लू से बचाव होता है। हिरनाकश्यप = सोने का बिछौना है जिसका अर्थात आज का लुटेरा व्यापारी/उद्योगपति आदि। हिरिण्याक्ष  = सोने सी आँखें हैं जिसकी अर्थात शोषक,उत्पीड़क अधिकारी/पुजारी। 'प्रह्लाद'=प्रजा का आह्लाद अर्थात जनता का मंगल/संतुष्टि। दुर्गा = दुर्दमनीया शक्ति अर्थात जिसमें रोगों को नष्ट कर शरीर को स्वस्थ रखने की क्षमता हो वे औषद्धीयाँ। रक्तबीज=कैंसर, चंड-मुंड, महिशासुर आदि AIDS, TB आदि रोगों के लिए है। पंडितों के विभाजनकारी एजेंडा के शिकार क्यों होते हैं?

https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/1026829084045734

पढे -लिखे व अनपढ़ दोनों ही प्रकार के लोग बुद्धि, ज्ञान व विवेक से जब 'मनन' का परित्याग कर दें तब क्या वास्तव में वे मनुष्य हैं? अथवा नर-तन धारी पशु? क्योंकि 'मनन' करने के कारण ही यह प्राणी 'मनुष्य' कहलाता है। महाभारत काल के बाद से 'मनन' प्रक्रिया का निरंतर ह्रास हुआ है। वेदों के 'कृण्वन्तो विश्वार्यम ' अर्थात समस्त विश्व को  आर्यमय बनाने के सिद्धान्त को गहरा आघात पहुंचाया गया है। आर्ष जिसका अर्थ होता है 'श्रेष्ठ' का अपभ्रंश है 'आर्य' शब्द किन्तु षड्यंत्र पूर्वक आर्य को एक आक्रांता जाति के रूप में प्रचारित किया गया है। 'पुराण' रच कर शोषण कारी ब्राह्मण पुरोहितों ने वैदिक ज्ञान को नष्ट करने हेतु मन-गढ़ंत कहानियाँ बना डाली हैं जिनका दुष्परिणाम है 'दुर्गा' बनाम 'महिशासुर' का जातीय विग्रह जिसका सामना आज देश वीभत्स रूप में कर रहा है। 

अथर्व वेद स्वास्थ्य पर आधारित है और उसकी एक शाखा आयुर्वेद कहलाती है। आयुर्वेद में 'दुर्गा' आदि का उल्लेख जीवनोपयोगी औषद्धियों के रूप में है तथा महिषासुर, रक्तबीज, आदि AIDS, T B , कैंसर आदि रोग हैं न कि, देवियाँ व राक्षस जैसा कि आज विवाद खड़ा करके जनता को आपस में लड़ाया जा रहा है। हिरनाकश्यप(आज का लुटेरा व्यापारी/उद्योगपति ),हिरिण्याक्ष (शोषक,उत्पीड़क अधिकारी/पुजारी),होलिका 'होला' शब्द से बना है अर्थात जौ,गेंहू,चना आदि की अर्द्ध पकी बालियाँ  हैं  जनता को जातीय आधार पर बांटने हेतु गढ़ी कहानियों  की चाल और गहराई को समझना व समझाना चाहिए। 


Link to this post-



गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

डॉ नरेंद्र राजबली : एक और बुजुर्ग का कम होना ------ विजय राजबली माथुर


Late Dr. N.R.B. Mathur 



आज प्रातः वीरेंद्र चाचा के ई-मेल से नरेंद्र चाचा के यह दुनिया छोड़ जाने का समाचार ज्ञात होकर असीम वेदना व दुख हुआ। चाचा हमारे बाबूजी के चचेरे भाई थे , लेकिन हमारे बाबाजी स्व.धनराज बली साहब व चाचा के पिताजी स्व . धर्मराज बली साहब में काफी घनिष्ठता थी। बाबूजी की भी दिवंगत चाचा से घनिष्ठता रही । एक बार हमारे बाबूजी चार-पाँच माह के लिए फरीदाबाद हमारे छोटे भाई के पास गए हुये थे, और  हम आगरा में थे ।   मथुरा चाचा के पास  मिलने गए  थे तब उन्होने कहा था - " विजय तुम यह न समझना कि, दरियाबाद 400 km दूर है और तुम्हारे बाबूजी भी 200 km दूर हैं लेकिन हम तुम्हारे पास ही 50 km हैं। जब ज़रूरत हो तुरंत हमारे पास बेझिझक आ जाना। " ऐसे आत्मीय नरेंद्र चाचा का न रहना किसी झटके से कम नहीं है। इसलिए भाई धीरेन्द्र से फोन पर ज़्यादा देर बात नहीं कर सका। 

आदरणीय नरेंद्र चाचा मथुरा में वरिष्ठ दन्त चिकित्सक थे। 

लखनऊ आने के बाद से मथुरा न जा सका और चाचा से एक लंबे अरसे से व्यक्तिगत मुलाक़ात न हो सकी थी। पिछले वर्ष जब उनसे फोन पर बात हुई थी तब उन्होने मथुरा आने को कहा था। वैसे वह अभी भी सक्रिय रहते थे , ज़्यादा दिन बीमार भी नहीं रहे थे। हम उनकी पुण्य आत्मा की शांति के लिए परम-पिता परमात्मा से प्रार्थना करते हैं। उन की यादें सदा मन में बसी रहेंगी। 
*****************************************************************

दुखद समाचार है कि, हमारे चाचा वरिष्ठ दन्त चिकित्सक डॉ नरेंद्र राजबली माथुर का निधन विगत 27 जनवरी 2016 को मथुरा में हो गया है। हम परम-पिता परमात्मा से उनकी पुण्य आत्मा की शांति की प्रार्थना करते हैं और सभी परिवारीजनों को धैर्य व सहन शक्ति बनाए रखने का अनुरोध करते हैं।
विजय राजबली माथुर
Comments
Ritu Mathur I miss you papa
Dhirendra Mathur · Friends with Nrb Mathur and 1 other
Missing you Daddy ......
Pinky Mathur · Friends with Nrb Mathur and 1 other
Miss you daddy
Anita Mathur · Friends with Nrb Mathur and 1 other
Miss you mama ji
Archana Singh Rest in peace
Kashi Nath Kewat डॉक्टर साहब को नमन !
Jitendra Mathur · Friends with Ritu Mathur and 1 other
We love you daddy, you are in our heart
Yaduvendra Mathur · 2 mutual friends
Missing u Daddy love you
Shalini Mathur · Friends with Ritu Mathur and 1 other
We will always miss you daddy
Madhu Mathur · Friends with Nrb Mathur and 1 other
RIP Mamaji we miss you
Narendra Parihar RIP ..... sir ji ....sad news sada dukh hi deti hai or wah bhi jab apno ke sath ho ......
Sanjog Walter पुण्य आत्मा की शांति की प्रार्थना
Ananya Mathur · Friends with Ritu Mathur and 1 other
rest in peace nana ji
Kkl Srivastava विनम्र श्रधांजलि
Poonam Kumari दुखद। विनम्र श्रद्धांजली।
अरुण कुमार निगम भावभीनी श्रद्धांलजी
M Abrar Azizi Rest in peace
Udayvir Singh भगवान उनकी आत्मा को अपने चरणों मे स्थान दे।

Link to this post-



+Get Now!