शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

सच का सामना किए बगैर जीतना मुमकिन नहीं ---विजय राजबली माथुर

सच का सामना करेंगे तभी तो सीखेंगे!

 http://www.livehindustan.com/news/editorial/guestcolumn/article1-story-57-62-412179.html
1980 में पहली बार RSS के शुद्ध समर्थन से इन्दिरा कांग्रेस पुनः सत्तारूढ़ हुई थी। तभी से RSS को विभिन्न दलों में घुसपैठ करने का चस्का लग गया था। आज भाजपा के अतिरिक्त सपा ,आ आ पा,यहाँ तक कि CPM की केरल यूनिट में भी संघी लोग प्रवेश पा चुके हैं। ऐसे मे अमेरिका भी एक बार फिर से भारत को तोड़ने के लिए सक्रिय हो चुका है। मेंनका गांधी,कांशीराम को भी अमेरिका ने समर्थन देना चाहा था किन्तु वे जन-समर्थन नहीं हासिल कर सके थे जबकि मोदी ने हज़ारे व केजरीवाल के सहारे युवा वर्ग को आकर्षित कर लिया है। इसी लिए अमेरिका ने अपने राजदूत (नैन्सी पावेल)की कुर्बानी मोदी को सफल बनाने हेतु ले ली है। प्रबुद्ध/जागरूक जनता को इस खतरे के मद्दे नज़र ही मतदान करना चाहिए एवं विभाजनकारी शक्तियों को सामूहिक शिकस्त इन चुनावों में देनी चाहिए।









  आदरणीय कामरेड अरविंद जी थोड़ा सा याद दाश्त पर ज़ोर देंगे तो आपको ध्यान आ जाएगा कि मोरारजी सरकार में मंत्री रहते हुये अटल और आडवाणी दोनों महोदय RSS की बैठकों में शामिल हुये थे जिसका सख्त विरोध वाराणासी के राजनारायन सिंह ने किया था और उनको चौधरी चरण सिंह का वरद हस्त प्राप्त था। इस स्थिति का लाभ लेकर इन्दिरा जी ने तिहाड़ जेल से संजय गांधी की मार्फत 23 दिसंबर को चौधरी साहब को जन्मदिन पर गुलाब पुष्प भेजा था । बाद में कांग्रेस के समर्थन से उनको प्रधानमंत्री बनवा कर जनता सरकार गिरवा दी थी। RSS को राजनारायन व चौधरी चरण सिंह को नीचा दिखाना था एवं नई बनी भाजपा इसमें सहायक नहीं हो सकती थी अतः 'देवरस' /'इन्दिरा' गुप्त समझौते के अंतर्गत RSS का वोट इन्दिरा कांग्रेस को दिलवाया गया था जिसमें UP की 85 सीटों में से 80 कांग्रेस ने जीत ली थीं। दूसरे दलों में अपने हिमायती भेज कर RSS अपना दायरा निरंतर बढ़ाता जा रहा है CPM में भी उसके लोग आ चुके हैं। इस खतरे को उसके विरोधी क्यों नहीं समझ रहे हैं यह बात चिंताजनक है। केवल बिखरी हुई कम्युनिस्ट शक्तियाँ एकजुट होकर ही आरएसएस का मुक़ाबला कर सकती हैं परंतु इसके विपरीत वे आपसी खींचतान में अपनी शक्ती व्यर्थ नष्ट कर रही हैं यह और भी चिंताजनक है।

Arvind Raj Swarup Cpi Vijai ji RSS ka yeha charitra Hai ki vo tatkalin sarkar ki lallo chappo karta hai,is baar vo modi ke zariya swayam hi satta me aana chahta hai.1980 me indira ji ki lehar chali thee.Rss ka dam nahi tha ki vaha ek seat par bhi kiso ko jitwa sakta.Par me is se sahmat hun ki kisi bhi secular dal me RSS pravratti ki log Nahi hone chahiye.CPM me RSS ki log kahan ghus Gaye mujhe nahi pata.Hamare Hindu samaj me bhi ponga panthi vichar logo ko hindu Samprdayik vicharon ki taraf le jate hai.Is par sawdhani nirantar baratne ki nirantar zaroorat hai.

फेसबुक विवरण एवं के विक्रम राव जी के लेख को उद्धृत करने का उद्देश्य 'सत्य' को सामने लाना है। जैसा कि विवरण से स्पष्ट है कि प्रदेश के वरिष्ठ कामरेड किसी भी रणनीति के तहत सच को सामने नहीं आने देना चाहते हैं।"Rss ka dam nahi tha ki vaha ek seat par bhi kiso ko jitwa sakta." इस कथन का जवाब तो विक्रम राव जी के लेख में ही दिया हुआ है। उनके अनुसार तो उस चुनाव में वाराणासी में कम्युनिस्ट पार्टी ने भी उसी पक्ष का समर्थन किया जिसका कि RSS ने किया था। 1967 में भी चौधरी चरण सिंह की संविद सरकार में RSS/जनसंघ के पांडे जी, कल्याण सिंह के साथ-साथ कम्युनिस्ट पार्टी के कामरेड झारखण्डे राय व कामरेड रुस्तम सैटिन  भी भागीदार थे। 1989-90 में   वी पी सिंह की सरकार   को कम्युनिस्टों ने भाजपाइयों (RSS) के साथ-साथ समर्थन दिया था। फिर  1996-98   में देवेगौड़ा व इंदर गुजराल की सरकारों में वरिष्ठ कामरेड मंत्री होते हुये भी RSS को रोकने हेतु कुछ नहीं किया जा सका और अभी कुछ ही समय पूर्व केरल भाजपा से केरल-CPM में काफी लोग आए हैं जिनको प्रकाश करात साहब (मुलायम सिंह जी के भक्त) के समर्थन से शामिल किया गया है इसलिए स्थानीय इकाई को विरोध के बावजूद चुप रहना पड़ा है। इस बाबत यह टिप्पणी 'सच' को छिपाने का असफल प्रायास है:

 1925 में स्थापित कम्युनिस्ट पार्टी से  1964 में विभक्त होकर CPM का गठन हुआ जिसका (CPM) का  पुनः  विभाजन 1967 में हुआ और आज तो लगभग 60 विभिन्न कम्युनिस्ट गुट हैं जो परस्पर संघर्षरत हैं। जैसा कि इस तथ्य से स्पष्ट होता है : 


 जबकि 1925 में ही स्थापित RSS ने 1951 में 'जनसंघ'के रूप में राजनीति में कदम रखा और डॉ राम मनोहर लोहिया के सहयोग से 1967 में उत्तर-प्रदेश की संविद सरकार में भाग लिया। रामायण मेला की शुरुआत डॉ लोहिया ने की व बढ़ाया नानजी देशमुख (RSS) जिन्होंने  1974 में जयप्रकाश नारायण की छाया बन कर 1977 में जनता पार्टी की मार्फत अटल व आडवाणी को केंद्र सरकार में पहुंचाया जिन लोगों ने विदेश ,संचार  व गृह मंत्रायल्यों में अपने RSS के लोगों को भर दिया तथा 1998-2004 भाजपा नीत  केंद्र सरकार के जरिये रक्षा  और इंटेलीजेंस समेत सभी सरकारी विभागों में संघी-घुसपैठ करा दी। 1980 में इन्दिरा जी को पुनः सत्तारूढ़ कराने के बाद लगभग सभी दलों में RSS के लोगों का प्रतिनिधित्व है जो अपने मूल संगठन के हितार्थ कार्य करते हैं जबकि कम्युनिस्ट रूस और चीन के नेताओं के नाम पर एक-दूसरे को नीचा दिखाने के प्रयास में ही नहीं लगे रहते बल्कि चुनावों में भी एक दूसरे को हराने के लिए संघर्षरत हैं। अपनी ही पार्टी के केंद्रीय नेताओं के विरुद्ध कुछ  प्रादेशिक नेता/पदाधिकारी अभियान चलाये रहते हैं व 'दुनिया के मजदूरों एक हो' का नारा लगाते हुये अपने ही कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न-शोषण करने लगते हैं। इस प्रकार कैसे RSS का मुक़ाबला कम्युनिस्ट कर सकेंगे?

लेकिन 1951 में ही सहारनपुर से प्रकाशित  'नया ज़माना' के संस्थापक संपादक कन्हैया लाल मिश्र'प्रभाकर'
जी ने RSS प्रचारक लिंमये जी से कह दिया था कि 'नई-दिल्ली' की सड़कों पर एक दिन RSS व कम्युनिस्टों के मध्य सत्ता के लिए 'निर्णायक संघर्ष' होगा। वर्तमान परिस्थितियों में जबकि 'संसदीय लोकतन्त्र' को अपनाने वाले कम्युनिस्ट संसदीय चुनावों से दूर रह कर दूसरों को समर्थन दे रहे हैं केवल और केवल 'सशस्त्र क्रान्ति' के समर्थक कम्युनिस्ट गुट ही RSS से संघर्ष कर सकेंगे। दोनों में जो भी सफल होगा वह केवल 'तानाशाही' ही कायम करेगा जिसके अंतर्गत देश की एकता भी कायम रखना मुश्किल हो जाएगा और अमेरिका यही तो चाहता है और इसीलिए तो कांग्रेस में नन्दन नीलकेनी,भाजपा में नरेंद्र मोदी व आ आ पा में अरविंद केजरीवाल को भारत का प्रधानमंत्री बनते देखना चाहता है।

 थोथा अहंकार छोड़ कर 'संसदीय लोकतन्त्र' को मजबूत करने की पहल करनी चाहिए थी जिसमें कम्युनिस्ट व वामपंथी चूक चुके है क्योंकि 'सच' का सामना नहीं करना चाहते हैं इसलिए जीतना भी मुमकिन नहीं है। 'वक्त' अभी भी हाथ से निकला नहीं है यदि 'सच' को स्वीकार करते हुये उसका मुक़ाबला किया जाये तो हारी हुई बाजी भी जीती जा सकती है।  
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फेसबुक पर प्राप्त कमेन्ट :(07-11-2014 )
 

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2 टिप्‍पणियां:

  1. Comment on Facebook---

    Ajay Malik · Friends with Roshan Suchan and 4 others
    Bhut kuch thik kha present leadership fail to in masses
    13 hours ago · Unlike · 2
    Rk Sharma Cpi · 10 mutual friends
    ....jarur wakt ke sath sath kuch karne ki jarurat ha
    13 hours ago · Unlike · 1
    Sameer Siddiqui · Friends with Atul Kumar Singh Anjan
    Shayad bahot zaroori kaam se so rahe hai communist
    13 hours ago · Unlike · 1
    Ajay Malik · Friends with Cpi Delhi and 4 others
    Central leadership Comrade Garvachoh hai
    13 hours ago · Like
    Ajay Malik · Friends with Cpi Delhi and 4 others
    Leftist aajkal Lupat Parjati ho gai hai
    12 hours ago · Like
    Shyam Mishra Vampanthi andolan ki aguai karanewala netrtwa sayad ise us gambhirata se nahi le raha hai anyatha jab desh ke samksha sari paristhitiyan left movement ko strong hone ki hai. Tab ye log bibhinn gharon me bante hain. United left movement is need of the hour.
    12 hours ago · Like
    DrAjit Dave · Friends with Surinder Singh
    This is a tragic part of Indian history.Left movement should have flourished in India.I support it.Asadbhai.
    12 hours ago · Like · 1

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