गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

दो कलियाँ आज भी प्रेरक फिल्म ----- विजय राजबली माथुर

 वीभत्स आतंकवाद (पेशावर कांड ) के शिकार सवा सौ से अधिक बच्चों के मार्मिक दुखांत ने हमें 1968 में रिलीज़ हुई 'दो कलियाँ' देखने को प्रेरित कर दिया। जिसमें बाल-कलाकार के रूप में नीतू सिंह की मुख्य भूमिका है। निर्देशक द्वय आर कृष्णन व एस पंजू ने इस फिल्म के माध्यम से मनोरंजन करते हुये जो संदेश दिया है वह वास्तव में नितांत गंभीर है। इसके माध्यम से समाज की तमाम विकृतियों, विभ्रम, स्वार्थ-लिप्सा, अनैतिक कार्यों के दृष्टांत प्रस्तुत करते हुये यह भी दिखाया गया है कि इसी पथ -भ्रष्ट समाज में कुछ लोग  अपने साहस व लगन के द्वारा उन पर विजय हासिल करने में भी समर्थ हैं। हालांकि फिल्म के उपसंहार में बालाजी पर आस्था व विश्वास के दृश्यों द्वारा समाज में व्याप्त अंध-विश्वास व ढोंग को महिमामंडित कर दिया गया है जिससे जनता में कर्तव्य पथ से परे परा -  शक्ति  पर भरोसा रखने की प्रवृत्ति को बेजा बढ़ावा मिलता है। यदि फिल्म के अंतिम पाखंडी दृश्यों की उपेक्षा कर दी जाये तो बाकी फिल्म प्रेरक प्रतीत होती है जिसने दो छोटी-छोटी बच्चियों के साहस,बुद्धि-कौशल व दृढ़ निश्चय को दर्शाया है। इन दोनों जुड़वां बहनों ने न केवल अपनी माँ के प्रति उत्पन्न अपने पिता की गलत फहमी को दूर किया वरन अपनी घमंडना  नानी को एड़ियों के बल खड़ा होने पर मजबूर कर दिया। 

'गंगा'/'जमुना'  के रूप में बाल-कलाकार बेबी सोनिया नाम से  नीतू सिंह की भूमिकाएँ और उनका प्रस्तुतिकरण सराहनीय व प्रशंसनीय हैं।  किरण के रूप में माला सिन्हा की भूमिकाएँ ठीक रही हैं जबकि निगार सुलताना को उनकी माँ के रूप में विकृत चेहरा प्रस्तुत करना पड़ा है। उनके समकक्ष शबनम की माँ मधुमती  के रूप में मनोरमा को भी अनैतिकता का सहारा लेते दिखाया गया है। सुजाता के रूप में सुजाता की भूमिका भी आदर्श प्रस्तुतीकरण है।शेखर के रूप में  बिस्वजीत किरण की माँ के व्यवहार की प्रतिक्रिया  वश मधुमती के  प्रपंच व जाल में फँसते दिखाये गए हैं।

गंगा जब वेश बदल कर जमुना के रूप में ननसाल में माँ के साथ रहती है तो उसकी मार्मिक भूमिका में बालिका नीतू सिंह का कमाल इस गीत के माध्यम से देखिये- 
 

किरण के पिता के रूप में ओमप्रकाश व शेखर के मित्र के रूप में महमूद अली की भूमिकाएँ भी कम सराहनीय नहीं हैं। समाज में फैले भ्रष्टाचार, कर-चोरी, जनता के शोषण-उत्पीड़न पर हास्य प्रस्तुति के रूप में महमूद के कृत्य का कायल हुये बगैर नहीं रहा जा सकता है- 
   

खुले दिल और दिमाग से देखें  और पाखंड को त्याज्य दें तो आज की परिस्थितियों में भी फिल्म 'दो कलियाँ' एक आदर्श मनोरंजक फिल्म सिद्ध होती है।

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2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना शनिवार 20 दिसंबर 2014 को लिंक की जाएगी........... http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. हां...वाकई फि‍ल्‍म बहुत अच्‍छी है

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