शनिवार, 8 जनवरी 2011

क्रांति नगर मेरठ में सात वर्ष(६)

बेरोजगारी क़े दौरान संघर्ष की बाबत ज़िक्र करने से पहले मेरठ कालेज में देखी,सुनी ,समझी और अनुभव की कुछ बातों का उल्लेख करना अप्रासंगिक नहीं होगा.मेरे विषय -राजनीति-शास्त्र,समाज-शास्त्र और अर्थ-शास्त्र थे.मैं इतिहास का विद्यार्थी था ,उसमें बेहद दिलचस्पी भी थी.परन्तु १९ ६९ में लखनऊ में मामाजी ने बउआ से कहा विजय को हिस्ट्री न दिलाएं यह जीजाजी से कह देना.मैंने स्वतः ही इतिहास छोड़ कर मामाजी की इच्छा का विषय सोशियोलोजी ले लिया था.इसके एच.ओ.डी.प्रो.डा.आर.एस.यादव तथा प्रो.हुसैना बेगम (जैसा सुना था)एक -दूसरे से विवाह धर्म क़े आड़े पड़ने पर नहीं कर सके थे. हमें तो प्रो.बेगम पढ़ातीं थीं बहुत अच्छे ढंग से.वह कांग्रेस (आर)में सक्रिय थीं.बाद में उन्होंने विधायक का असफल चुनाव भी लड़ा था.प्रो.एम.एस.रघुवंशी भी अच्छा पढ़ाते थे.एक चौ.सा :भी थे.सोशियोलोजी की कक्षा में राजनीतिक खिंचाई करते रहते थे.चौ.चरण सिंह को भी क्रिटीसाइज़  करते थे,कुछ छात्रों से तकरार भी इस पर उनकी होती थी.एक मेजर की विडो और इकोनामिक्स की प्रो.आशा चौधरी को रेस्टोरेंट में ले जाकर वह आवभगत करते थे;जबकि खुद समर्थक छात्रों की साईकिल क़े डंडे पर बैठ कर ढाबे पर उनके खर्च से चाय पीते थे.

अर्थ-शास्त्र में प्रो.ए. एस. गर्ग तथा प्रो. एम. पी. सिंह अच्छा पढ़ाते थे.गर्ग सा :की पत्नी प्रो एस. क़े.गर्ग रघुनाथ गर्ल्स डिग्री कालेज में इकोनामिक्स की एच. ओ. डी .थीं उनसे टकराव क़े कारण प्रो. आशा चौ.ने वहां की अपेक्षा  मेरठ कालेज को पसन्द किया था.वह बिलकुल अच्छा नहीं पढ़ातीं थीं.परन्तु उनकी कक्षा में उपस्थिति अधिक रहती थी.कक्षा छोड़ने की प्रवृत्ति  न होने क़े कारण उनकी बेकार की बातों को भी सुनना पड़ता था.डा.गर्ग इकोनामिक्स को राजनीति का मूल बताते थे और सामाजिक   समीकरणों को सुन्दर ढंग से समझाते थे.वह छात्र कैप्टन रमेश शर्मा (जिनके पिताजी मेरठ कालेज क़े प्रिंसीपल रहे थे)का भी आदर करते थे.


पोलिटिकल साईंस में प्रो.कैलाश चन्द्र गुप्ता और प्रो. आर.क़े.भाटिया क़े अलावा एक प्रो.शर्माजी भी बहुत अच्छा पढ़ाते थे.उनकी पत्नी भी हमारी कक्षा की छात्रा थीं.बेटे-बेटियों की शादी करके फुर्सत से अपनी छूटी पढ़ाई पूरी कर रहीं थीं.पति अध्यापक और पत्नी विद्यार्थी होतीं थीं.उनको सभी छात्रों का पूर्ण सम्मान प्राप्त था.सब लोग उन्हें अध्यापक की पत्नी ही मानते थे.कहा जाता था शर्माजी पी.एच.डी.हेतु विदेश गये थे,नयी शादी हुई थी.उनके किसी साथी ने ईर्ष्यावश तार भेज दिया कि उनकी पत्नी नहीं रहीं.वह पढ़ाई छोड़ कर लौट आये ,मानसिक आघात लगा.पढ़ाई और अध्यापन में व्यवधान आया.तभी उनकी पत्नी की भी पढ़ाई अधूरी छूट गई थी.प्रो.शर्मा हमें १९७१ में बताया करते थे कि जब ३० वर्ष पूर्व वह केंद्रीय वित्त-मंत्रालय में अधिकारी थे,तब वहां एक भी ईमानदार अधिकारी न था,जिस कारण उन्हें वह वैभवशाली नौकरी छोड़ कर अध्यापन को अपनाना पड़ा.
हमारी समाज-शास्त्र की कक्षा में उर्मिल खुराना नामक एक छात्रा शायद किसी बड़े अधिकारी की पुत्री होगी अक्सर ही तड़क-भड़क पोशाकों में आती थी.अर्थ-शास्त्र में उसका सेक्शन दूसरा था.उस सेक्शन क़े उन साथियों ने जो समाज-शास्त्र में हमारे साथ थे बताया था कि एक दिन उस छात्रा का टाईट स्लाइस क्लास में फट गया था. हास्टल क़े एक लड़के ने अपने कमरे से बड़ा तौलिया लाकर दिया जिसे लपेट कर रिक्शा पर बैठ कर वह घर गई और आधे घंटे क़े भीतर उसी रिक्शा द्वारा कपडे बदल कर बाकी क्लासेज अटेंड करने लौट आई.पूरे कालेज में यह चर्चा कई दिनों रही.


हमारी तीनों विषयों की कक्षाओं क़े एक साथी थे जय किशन  जैन,जिनसे सम्बन्ध सदैव मधुर रहे.४ थे सेमेस्टर में परीक्षाओं से डेढ़ माह पूर्व उन्होंने निवेदन किया कि उम्र में उनसे छै माह छोटी भतीजी उनसे ठीक से नहीं पढ़ रही है,दो बार फेल होकर तीसरी बार हाईस्कूल का इम्तिहान देगी और उसकी एंगेजमेंट हो चुकी है ,अतः उत्तीर्ण होना भी जरूरी है,मैं उसे ट्यूशन पढ़ा दूं.मेरे मना करने पर भी वह नहीं माने और मुझे बाध्य होकर अपनी पढ़ाई में कटौती कर क़े भी उनकी बिगडैल भतीजी को पढ़ाना ही पड़ा.शर्त क़े मुताबिक मैंने सिर्फ एक माह ही पढाया था.जय किशन क़े भाई साहब ने एक महीने का पारिश्रमिक ३० रु.देना स्वीकार किया था परन्तु बाद में कुल ३५ रु. दिये थे. इस बार वह सेकिंड डिवीजन में उत्तीर्ण हो गई.

एक पूरे सेमेस्टर में मेरा एक पूरा घंटा खाली पड़ता था.इसमें मैं लाईब्रेरी में बैठ कर वे पुस्तकें जो कोई नहीं पढता था लेकर पढ़ा करता था.जैसे हिन्दी सेवी संसार,धर्म और विज्ञान ,आचार्य काका कालेकर आदि की पुस्तकें.धर्म और विज्ञान महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती क़े प्रवचनों का संग्रह है.रोज आलमारी से निकालते-रखते परेशान होकर लाईब्रेरी सहायक सा :ने उस मोटे ग्रन्थ को अपनी कुर्सी क़े नीचे रख लिया था.वह मेरी शक्ल देखते ही मुझे धर्म और विज्ञान पकड़ा देते थे.आज जो मैं धार्मिक लेख लिख पाता हूँ उसमें इस अध्ययन का व्यापक योगदान है.अखबारों में सम्पादकीय पृष्ठ खाली पड़े मिल जाते थे,वही मुझे पढने भी होते थे.बाकी लोगों को तो खेल तथा मनोरंजन से वास्ता था.

प्रो.कैलाश चन्द्र गुप्ता द्वारा वर्णन की एक बात का ज़िक्र किये बगैर मेरठ कालेज का वृतांत समाप्त नहीं किया जा सकता.वह स्वंय बनिक समाज क़े होते हुए भी बनियों की मनोदशा पर बहुधा एक कहानी दोहरा देते थे.उन्होंने सुनाया था कि,एक गाँव में एक बनिए ने शौकिया मूंछें रख लीं थीं जो उसी गाँव क़े एक ठाकुर सा :को नागवार लगा.ठाकुर सा :ने बनिए को धमकाया तो वह नहीं माना;फिर उन्होंने बनिए को दस रु.का नोट देकर मूंछें नीची रखने को कहा तो बनिए ने अगले दिन से ऐसा करने का वायदा कर दिया. ठाकुर सा :प्रसन्न होकर चले गये.बनिया रोज एक तरफ की मूंछ नीची और एक तरफ की ऊँची रखने लगा. जब एक रोज दोबारा ठाकुर सा :उधार से गुजरे तो बनिए की एक मूंछ ऊँची देख कर भड़क गये.बोले तुम्हें दस रु. किस बात क़े दिये थे?बनिए ने सहज जवाब दिया सा :इतने में सिर्फ एक ओर की मूंछें नीची की जा सकतीं थीं सो वह मैं कर रहा हूँ.ठाकुर सा :ने तुरन्त एक और दस का नोट देकर कहा अब से दोनों मूंछें नीची रखना. बनिए ने फिर दोनों तरफ की मूंछें नीची कर लीं. प्रो. गुप्ता यह कहानी सुनकर जोरदार ठहाका लगते थे.

आगे अगले अंक में......


सम्पादन समन्वय-यशवन्त माथुर 

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3 टिप्‍पणियां:

  1. अच्‍छा लगा आपकी यादों के झरोखों में गुजरना।

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  2. विजय जी, इस महत्‍वपूर्ण घटना को साझा करने का शुक्रिया।

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    पति को वश में करने का उपाय।

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  3. यादों के झरोखे से अच्छा संस्मरंण, माथुर सहाब ! इसी यादो की पोटली पर आज ही आपके बेटे यशवन्त जी की भी एक सुन्दर रचना पढने को मिली !

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