शनिवार, 24 नवंबर 2012

श्रद्धांजली उसे जो 12 घंटे ही जीवित रहा








आज तीस वर्षों मे पहली बार उसे श्रद्धांजली देने हेतु 07 विशेष आहुतियों से हवन किया। मेरी श्रीमती जी (पूनम) का कहना था कि जब हम परिवार के निकटतम दिवंगत सदस्यों यथा-बाबूजी,बउआ,शालिनी हेतु हवन करते हैं तो हमे उस अनाम संतान हेतु भी हवन करना ही चाहिए।  क्योंकि चाहे वह  12 घंटे ही जीवित रहा हो, था तो परिवार-खानदान का ही सदस्य। बात ठीक थी तो हमने 24 नवंबर 1982 की प्रातः 04 बजे जन्मे और उसी साँय 04 बजे दिवंगत बड़े पुत्र को पहली बार इस प्रकार स्मरण किया।

वह आत्मा जिसका संबंध हमसे रहा है अब चाहे जहां हो जिस अवस्था मे हो उसकी शांति व सद्गति हेतु हवन द्वारा दी आहूतियाँ तत्काल उस तक हमारी श्रद्धा को वायु के माध्यम से पहुंचा देती हैं।

उसके जन्म से पूर्व हमारी बउआ ने शालिनी की इच्छा के अनुरूप उनको उनकी माँ के पास टूंडला भेज दिया था। 24 नवंबर 1982 को प्रातः सात बजे उसके नानाजी आगरा आए और उसके जन्म तथा अस्वस्थता की सूचना दी। तत्काल उनके साथ बउआ व मैं टूंडला गए वहाँ के प्रसिद्ध चाईल्ड स्पेशलिस्ट को दिखाया। उन्होने चिंता न होने की बात कही थी। तीन बजे तक हम लोग वहाँ थे फिर आगरा लौट आए थे। शाम सात बजे पार्सल बाबू शरद मोहन माथुर यह संदेश लेकर आए कि "बच्चे की डेथ हो गई है"। पहले उनकी माता श्री कहती थीं कि शरद खुशखबरी लेकर ही हमारे घर आएगा। राजा-की-मंडी पर रोजाना ड्यूटी करने आने के बावजूद वह कभी अपनी बहन शालिनी से मिलने हेतु भी  इससे पहले कभी  नहीं आए थे।

रात मे मैं उनके साथ चला गया था। बउआ व बाबूजी को धक्का लगा था और वे सफर की स्थिति मे न थे। अगले दिन 25 तारीख को एक पंखे पर उसके पार्थिव शरीर को रख कर टूंडला मे ही दफना दिया। चूंकि मैं ही उसे अपने हाथों ले कर गया था इस पर मेरे माता-पिता का दृष्टिकोण था कि उन लोगों को मेरे द्वारा नहीं भिजवाना चाहिए था। जब लौट कर आ गए थे तब किसी प्रकार हिम्मत करके बउआ व बाबूजी भी पहुंचे । बाबूजी ने उसे बिलकुल भी न देखा था जिसका उन्हे मलाल रहा । बउआ ने तो गोद मे लिया भी था। 

कुछ कारणों से उस बच्चे की जन्मपत्री का विश्लेषण अभी नहीं दे रहे हैं ,फिर कभी मौका लगा तब देंगे। लेकिन एक स्वप्न का ज़िक्र करना अभी ही मुनासिब समझता हूँ। उसके जन्म से लगभग दो माह पूर्व मैंने स्वप्न मे उस बच्चे को सफ़ेद कफन मे लिपटे देखा था। बउआ को बताया तो उन्होने कह दिया कि स्वप्न मे मुर्दा देखना शुभ होता है-स्वप्न शास्त्र का ऐसा ही दृष्टिकोण है भी। किन्तु मैंने तो जन्म से पूर्व बच्चे की स्थिति देखी थी और अक्सर बहुत बातों का मुझे पूर्वाभास होता रहा है अतः मुझे कुछ-कुछ खटका भी था जो सही ही निकला भी।

पहले शालिनी को मानसिक वेदना के भय  से उसका स्मरण नहीं किया फिर इसलिए कि,उसके छोटे भाई यशवन्त को जिसने उसे देखा भी नहीं है कोई वेदना न हो। परंतु अब यह सोच कर पूनम का सुझाव स्वीकार कर लिया कि आने वाले कुछ वर्षों बाद जब यशवन्त हमे श्रद्धांजली देना चाहे  तब अपने बड़े भाई को भी स्मरण मे रख सके अतः अभी अपने समय से ही उस अनाम  संतान को श्रद्धांजली देना प्रारम्भ कर दिया है। 

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