शनिवार, 16 मार्च 2013

क्या गांधी जी धर्म निरपेक्ष थे? ---विजय राजबली माथुर

प्रेस-संवाददाता/संपादक की अपनी मर्यादाएं,मजबूरीया,आयोजको से संबंध/प्रभाव/प्रलोभन आदि बहुत सी तमाम बातें होती हैं जिंनका किसी भी समाचार के प्रकाशन पर प्रभाव पड़ता है।यही बातहिंदुस्तान,लखनऊ,दिनांक 14 मार्च 2013,पृष्ठ 07 पर प्रकाशित इस समाचार के साथ भी सत्य
घटित हुई है। आयोजकों द्वारा जारी किए गए 'प्रेस नोट' को ही संक्षिप्त रूप मे सभी समाचार पत्रों द्वारा प्रकाशित कर दिया जाता है और वास्तविक घटनाक्रम की उपेक्षा कर दी जाती है। चूंकि मैं इस गोष्ठी मे आमंत्रित होने के कारण उपस्थित था अतः समस्त घटनाक्रम आँखों से देखा व कानों से सुना है और मैं समझता हूँ कि प्रबुद्ध जनों की गोष्ठी मे घटित एक घटना को सार्वजनिक करना मेरा नैतिक दायित्व भी है अतः उस कर्तव्य का पालन मात्र कर रहा हूँ। न किसी का समर्थन और न ही किसी का विरोध करना मेरा अभीष्ट है।




एक आमंत्रित विद्वान जो शायद भूगोल के शिक्षक हैं अपने सम्बोधन मे डॉ अंबेडकर को गांधी जी से श्रेष्ठ बोल गए थे। 'गांधी भवन' मे गांधी जी की प्रतिमा के समक्ष यह बात अन्य विद्वान वक्ताओं को बुरी लगी। किसी ने गांधी जी के प्रसंग को उठाना विषय से भटकना बताया तो कुछ भड़क गए और डॉ अंबेडकर की आलोचना करने लगे। कुल 24 या 25 विद्वानों की गोष्ठी मे इस प्रकार का विवाद हास्यास्पद ही कहा जा सकता है। उन शिक्षक महोदय ने प्रारम्भ मे ही कहा था कि विषय परिवर्तन लगे तो उनको बता दिया जाये। संचालक,अध्यक्ष और संयोजक द्वारा उस समय कुछ भी इंगित नहीं किया गया लेकिन बाद मे सभी बिफर गए।

 मेरे दृष्टिकोण मे गांधी भवन मे गांधी प्रतिमा के समक्ष गोष्ठी का स्थान चयन 'गांधी जी'को विषय से अलग नहीं होने देता।  जैसा की उन शिक्षक महोदय से कहा गया था  मैं समझता हूँ कि उनको अनावश्यक रूप से दबाव मे लेने का प्रयास था। दूसरे विद्वान और आयोजक एक ओर तो यह कह रहे थे कि गांधी जी सांप्रदायिकता के विरोधी थे और दूसरी ओर यह भी कह रहे थे कि डॉ राही मासूम रज़ा के अनुसार 'धर्म' को 'राजनीति'से अलग किया जाना चाहिए। वह शिक्षक महोदय भारी चूक कर गए जो उन्होने यह नहीं कहा कि ये दोनों बातें परस्पर विरोधी हैं। गांधी जी तो  'धर्म' के बिना 'राजनीति' की कल्पना भी नहीं करते थे। गांधी जी का धर्म पाखंड नहीं था उनका ज़ोर 'सत्य और अहिंसा' पर था। उनका मानना था पहले सत्य और अहिंसा का पालन सुनिश्चित हो जाये तब बाद मे 'अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य' का पालन करना सुगम हो जाएगा। गांधी जी मजहब को धर्म नहीं मानते थे जैसा कि यहाँ आयोजक और दूसरे विद्वान मजहब के पर्यायवाची के रूप मे धर्म का प्रयोग अनधिकृत रूप से कर रहे थे। वस्तुतः समस्या ही आज यह है कि 'ढोंग-पाखंड-आडंबर' और मजहबों की विभिन्नता को धार्मिक विभिन्नता की संज्ञा  और मान्यता दी जा रही है और  अड़ियल ज़िद्द को अपनाया जा रहा है। यदि गांधी जी के बताए वास्तविक धर्म=सत्य,अहिंसा(मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य को अपनाया जाये तो समाज मे टकराव को ठहराव मिल ही नहीं सकता। 'धर्म निरपेक्षता' की बात कह कर इन धर्म तत्वों से दूर रहने का उपदेश दिया जाता है और यही सामाजिक टकराव का कारण है।
ढोंग-पाखंड पर आधारित विभिन्न मजहब समाज मे वैमनस्य उत्पन्न करते है और विभिन्न लोगों के आर्थिक हितों के संरक्षण हेतु विभिन्न गुट विभिन्न मजहबों के इर्द-गिर्द एकजुट होकर तनाव व टकराव का सृजन करते हैं। आर्थिक स्वार्थों को मजहबी 'आस्था व विश्वास' का जामा पहना कर पृष्ठपोषण किया जाता है।

जहां तक डॉ अंबेडकर की श्रेष्ठता का प्रश्न है निश्चित रूप से उनका पलड़ा गांधी जी से भारी है। 'कम्यूनल एवार्ड' के तहत अस्पृश्य जनों को प्रथक निर्वाचन का अधिकार मिल रहा था और यदि  डॉ अंबेडकर अपने समुदाय और वर्ग हित को ही सर्वोपरि वरीयता देते तो गांधी जी की परवाह न करते ;किन्तु उन्होने गांधी जी की अड़ियल ज़िद्द की पूर्ती की खातिर  अपने इतने बड़े वर्ग समुदाय के हितों को 'कुर्बान' कर दिया और गांधी से 'पूना पैकट' करके उनका अनशन तुड़वा दिया। ज़रा सोचिए कि यदि पूना पैक्ट न होता और अस्पृश्य जन प्रथक निर्वाचन के तहत अधिक संख्या मे चुन कर आते तो क्या गांधी जी के परम शिष्य पंडित नेहरू भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बन सकते थे?तब सम्भवतःडॉ अंबेडकर ही भारत के प्रथम प्रधानमंत्री होते और भारत की राजनीति आज कुछ और ही होती । अतः निश्चय ही डॉ अंबेडकर व्यक्तिगत रूप से गांधी जी  से श्रेष्ठ ठहरते हैं। यहाँ गांधीजी निश्चय ही ब्राह्मण वाद के पृष्ठ पोषक के रूप मे याद किए जाएँगे और उनका वह 'धर्म' जो आज बौना बना दिया गया है और उस पर पाखंड हावी है उसके भी वही हेतु सिद्ध होते हैं।

वस्तुतः धर्म निरपेक्षता के स्थान पर 'संप्रदाय निरपेक्षता' की बात पर बल दिया जाना चाहिए और वास्तविक धर्म जिसको शुरू मे गांधी जी ने भी सही माना था को अपनाया जाना चाहिए तभी समाज और राजनीति मे शुचिता की प्राप्ति हो सकती है।

 

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