गुरुवार, 11 जुलाई 2013

गारबेज के खिलाड़ी-फंसा दिया कबाड़ी ---विजय राजबली माथुर

अक्सर लोग सरकारी विभागों व कर्मचारियों के भ्रष्टाचार की शिकायतें करते हुये मिलते हैं। लोगों की अवधारणा है कि निजी क्षेत्र जनता को अधिक राहत देता है। मैंने प्राईवेट लिमिटेड,पब्लिक लिमिटेड,प्रोपराईटरशिप/पार्टनरशिप सभी प्रकार की फर्मों में कार्य किया है वह भी लेखा-विभाग में। मेरा व्यक्तिगत अनुभव यह है कि सरकारी क्षेत्रों से अधिक भ्रष्टाचार इन निजी क्षेत्रों में है और इसमें ईमानदार कर्मचारियों के लिए गुंजाइश बिलकुल भी नहीं है। सरकारी क्षेत्र के कर्मचारियों को तो ट्रिब्यूनल आदि से न्याय मिल भी जाता है किन्तु निजी क्षेत्र के कर्मचारी को तो 'श्रम अदालतों/न्यायाधिकरणों से भी न्याय नहीं मिल पाता है। मैं खुद भुक्त भोगी हूँ।

सितंबर 197 से जनवरी 1985 तक मैं होटल मुगल,आगरा में कार्यरत रहा। मैं सुपरवाईजर एकाउंट्स के पद तक ही पहुँच पाया । संस्थान में 'इंटरनल आडिट' के दौरान पौने छह लाख का घोटाला मैंने पकड़ा था और उम्मीद कर रहा था कि मुझे तरक्की मिलेगी लेकिन घोटालेबाज पूर्व अधिकारियों पर पर्दा डालने हेतु तत्कालीन अधिकारियों ने मुझे छ्टनी के अंतर्गत हटा दिया। श्रम न्यायालय के पीठासीन अधिकारी ने भी 'Petitionar is no more interested' लिख कर संस्थान के पक्ष में निर्णय घोषित कर दिया।

लेकिन मैं इस संबंध में यहाँ अभी जानकारी न देकर उस तथ्य पर प्रकाश डालना चाहता हूँ जहां,जिस ओर आसानी से किसी का ध्यान भी न जा सकता है।

होटलों में तमाम झूठन बचती है जिसे गारबेज में फेंक दिया जाता है। इस गारबेज को रामचन्द्र नामक एक कबाड़ी कुछ भुगतान करके खरीद ले जाता था। कहा जाता था कि वह इस गारबेज को सूअर पालकों को बेच देता था। सूअर पालक सूअरों की चर्बी निकाल कर 'देशी घी विक्रेताओं' को बेच देते थे जो घी में वजन बढ़ाने के लिए उसका इस्तेमाल करते थे। इस प्रकार कौड़ियों के भाव खरीदा गारबेज  ऊंची कीमत पर बेच-बेच कर  कबाड़ी साहब मालदार बन गए थे और उन्होने और भी कबाड़ खरीदना शुरू कर दिया था।

इंजीनियरिंग व हाउस कीपिंग विभाग के कर्मचारी रद्दी सामान के बीच में छिपा कर कुछ अच्छा सामान भी कबाड़ में फेंक देते थे और फिर कबाड़ी से उसी भाव में लेकर जिसमें उन्होने खरीदा था बाज़ार में ऊंचे दामों पर बेच कर ऊपरी आमदनी से अपना स्टेंडर्ड ऊंचा रखते थे। ज़ाहिर सी बात है कि जिन कर्मचारियों पर सामान रद्द करने की ज़िम्मेदारी थी वे अपने-अपने अधिकारियों के प्रिय थे। सीधी सी बात है जब सामान की कमी होगी तो उसकी पुनः आपूर्ती भी होगी। क्रय(पर्चेज)विभाग में उस समय 8 प्रतिशत कमीशन लेने का प्रचलन था जैसा कि बाहर के लोगों से ज्ञात हुआ था। चूंकि मैं कमीशन नहीं लेता था अतः बीच में रोड़ा था इसी कारण मुझे फाइनेंस से हटा कर फिक्सड एसेट्स एवं इंटरनल आडिट का कार्य सौंपा गया था।

इंजीनियरिंग व हाउस कीपिंग विभागों के कर्मचारी तो दूसरे सामानों के साथ अच्छा सामान बाहर कबाड़ी के माध्यम से निकलवा लेते थे तो फिर किचन स्टीवर्डिंग विभाग के कर्मचारी जिन पर झूठे बर्तन साफ करने का दायित्व था क्यों पीछे रहते?चांदी (सिल्वर)के छोटे-छोटे आइटम जैसे चम्मच आदि बड़ी आसानी से गरबेज में फेंक कर बाहर कर दी जाती थीं। लेकिन कबाड़ी साहब ऐसे सामान को साफ करके निकाल कर ही गरबेज पिग फार्म्स तक ले जाते थे अतः वह इसकी अधिक कीमत उन कर्मचारियों से वसूलते थे परंतु फिर भी उनको लाभ ही मिल जाता था।

एक बार किसी ऐसे कर्मचारी का कबाड़ी साहब से लेन -देन पर विवाद हो गया होगा तब उसने अपने अधिकारी से शिकायत कर दी। नतीजतन तौल कर भुगतान करने के बाद जब गारबेज सिक्योरिटी गेट पर पहुंचा तो वहाँ उसे पलटवा कर चेकिंग की गई जिसमें चांदी की तमाम छोटी-छोटी चम्मचें,तथा दूसरे आइटम्स पकड़े गए। कबाड़ी साहब का कंटरेक्ट रद्द कर दिया गया। लेकिन संबन्धित कर्मचारियों की पहचान नहीं की गई और वे बच गए उनका दूसरे नए कबाड़ी से ताल-मेल हो गया होगा।

अभी हाल ही में बिजली की निजी क्षेत्र की कंपनी 'टोरंट' के भ्रष्टाचार के विरुद्ध लंबा आंदोलन चलाया है। लेकिन दो वर्ष पूर्व इन निजी क्षेत्रों/कारपोरेट घरानों/IAS आफ़ीसर्स की पत्नियों केNGO's ने सरकारी क्षेत्र के कर्मचारियों के भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन चलाया था लेकिन निजी क्षेत्रों के भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनता में आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं है क्योंकि वह क्रूर और हिंसक भी है। इस लिहाज से 'टोरंट'के विरुद्ध आवाज़ उठाने के लिए आगरा की जनता साधूवाद की पात्र है।

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1 टिप्पणी:

  1. फेसबुक ग्रुप -sociologists-for-social path: में प्राप्त टिप्पणी ---
    Anita Rathi: good report
    11 hours ago · Like

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