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रविवार, 23 अप्रैल 2017

यादों के तहखाने से ( भाग - 2 ) ------ विजय राजबली माथुर

****** " मुझे खेलों में भाग लेने का शौक नहीं था। लेकिन मुझे अपनी कक्षा के एक पहलवान टाईप सहपाठी जिसके पिताश्री पुजारी / कथावाचक थे का हमेशा कबड्डी में आउट न होना अखरता था। सुना था कि, वह रोजाना भगवा झंडे के साथ लगने  वाली शाखा में भाग लिया करता था। उसको सबक सिखाने के लिहाज से एक रोज़ मैंने उसकी विरोधी टीम में कबड्डी खेलने की इच्छा व्यक्त कर दी , ...........................उनको इस बात की खुशी थी कि, पढ़ाई में अनाड़ी छात्र ( जिसे अक्सर बेंच पर पूरे क्लास वह दंड स्वरूप खड़ा करते थे ) को खेल में भी चाहे एक ही बार सही उस छात्र ने परास्त कर दिया जिसे वह सराहते थे और जिससे अक्सर पाठ का वाचन करवाते थे। 
चूंकि पढ़ाई में फिसड्डी होने के कारण वह हम लोगों से मदद लेता था इसलिए अपनी हार पर भी प्रतिशोध उसने नहीं माना था। " ******

पचपन वर्ष पीछे 1962 में लौटते हैं तो ध्यान आता है कि, चीन के हमले के बाद जब बाबूजी का ट्रांसफर बरेली से सिलीगुड़ी हो गया था तब भी बीच सत्र में हम लोगों को दाखिले की समस्या का सामना करना पड़ा था वजह यह थी कि, बाबू जी का ट्रांसफर जहां हुआ वहाँ हम लोग नहीं गए थे । तब भी हम लोग शाहजहाँपुर नाना जी के पास रहने गए थे क्योंकि सिलीगुड़ी शुरू में नान - फैमिली स्टेशन घोषित हुआ था। बहन का दाखिला तो नाना जी ने अपने एक परिचित तिनकू  लाल वर्मा जी के प्रबंध वाले आर्य कन्या पाठशाला में सहजता से करवा दिया था। अंततः अपने एक और पूर्व परिचित के तल्लउआ, बहादुरगंज स्थित  विश्वनाथ जूनियर हाई स्कूल  में भाई व मुझे भी प्रवेश दिलवा दिया। 

स्कूल के बाहर खाली पड़ी ज़मीन में स्कूल के बच्चे इंटरवेल में कबड्डी वगैरह खेलते थे। मुझे खेलों में भाग लेने का शौक नहीं था। लेकिन मुझे अपनी कक्षा के एक पहलवान टाईप सहपाठी जिसके पिताश्री पुजारी / कथावाचक थे का हमेशा कबड्डी में आउट न होना अखरता था। सुना था कि, वह रोजाना भगवा झंडे के साथ लगने  वाली शाखा में भाग लिया करता था। उसको सबक सिखाने के लिहाज से एक रोज़ मैंने उसकी विरोधी टीम में कबड्डी खेलने की इच्छा व्यक्त कर दी , मैं रोज़ उसकी गतिविधियों को बारीकी से देखता रहा था। उसके विरोध की टीम का नेतृत्व हर नारायण नामक छात्र ही करता था जिसने मुझे सहर्ष शामिल कर लिया। हमारी टीम में हर नारायण समेत जब सभी छात्र आउट हो गए और मैं अकेला ही बचा तब वह पंडित पुत्र पहलवान छात्र आया मैं पीछे हटते  हुये  उसे पाले के अंतिम छोर तक ले आया और वहाँ कस कर उसका हाथ पकड़ लिया पूरी ताकत लगा कर भी वह छुड़ा न पाया , मुझे गिराया तो खुद भी गिर पड़ा और खींचता रहा किन्तु पाले तक न पहुँच पाया और उसे भी पहली बार आउट होना ही पड़ गया। यह खबर तुरंत प्राचार्य शर्मा जी तक पहुँच गई जो हम लोगों को हिस्ट्री (इतिहास ) पढ़ाते थे , वह सरदार पटेल हिन्दू इंटर कालेज के प्रिंसिपल पद से रिटायर्ड़ थे और निशुल्क पढ़ाते थे किन्तु आने - जाने का रिक्शा भाड़ा प्रबन्धक उनको दे देते थे। उनको इस बात की खुशी थी कि, पढ़ाई में अनाड़ी छात्र ( जिसे अक्सर बेंच पर पूरे क्लास वह दंड स्वरूप खड़ा करते थे ) को खेल में भी चाहे एक ही बार सही उस छात्र ने परास्त कर दिया जिसे वह सराहते थे और जिससे अक्सर पाठ का वाचन करवाते थे। 
चूंकि पढ़ाई में फिसड्डी होने के कारण वह हम लोगों से मदद लेता था इसलिए अपनी हार पर भी प्रतिशोध उसने नहीं माना था। एक बार नाना जी के साथ उनके किसी परिचित के यहाँ कथा में गए थे वहाँ भी वह अपने कथावाचक पिता जी के साथ उनके सहायक के रूप में आया था और बाद में उनको बताया था कि, हिस्ट्री में यह हमारी बहुत मदद करते हैं वैसे तो खेलते नहीं हैं लेकिन एक बार खेल कर मुझे हरा दिया था। उसके पिता जी ने हिस्ट्री में उसकी मदद कर देने के लिए शाबाशी ही दी थी। 
1963 में सिलीगुड़ी के फैमिली स्टेशन घोषित हो जाने पर माँ और बहन बाबू जी के पास चले गए थे। भाई और मैं नाना जी के पास ही रहे थे। जब नाना जी बाज़ार जाते थे हम भाई लकड़ी चीड़ कर रख देते थे और कुएं से पानी भी भर कर रख लेते थे। हालांकि नाना जी एतराज़ करते थे कि, तुम लोग पानी भरने और लकड़ी चीड़ने का काम क्यों करते हो ? इसलिए रोकने के लिए कभी कभी वह हम दोनों को भी बाज़ार अपने साथ ले जाते थे। 
वैसे तो नाना जी को गाना वगैरह पसंद नहीं था लेकिन अजय को वह अधिक चाहते थे इसलिए उसके गुनगुनाने पर एतराज़ नहीं करते थे। अजय को 'जो वादा किया वह निभाना पड़ेगा ' बेहद पसंद था उसी को अक्सर गुनगुनाते थे :

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मंगलवार, 4 अगस्त 2015

उदारता और संघर्ष --- विजय राजबली माथुर

 **कल तीन अगस्त को यह ब्लाग प्रारम्भ किए हुये पाँच वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। पचास वर्ष पूर्व जब सिलीगुड़ी में नौवीं कक्षा में पढ़ रहा था तब  कोर्स के  एक निबंध का यह वाक्यांश आज भी याद है -" उदारता एक मानवीय गुण है सभी को उदार होना चाहिए किन्तु उसके साथ-साथ पात्र की अनुकूलता भी होनी चाहिए। "

याद होने के बावजूद कभी-कभी अयोग्य और प्रतिकूल पात्र को न पहचान पाने के कारण भारी नुकसान भी उठाना पड़ता है। हाल के ऐसे ही कुछ  सच्चे घटनाक्रम का उल्लेख यहाँ कर रहा हूँ। :
https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/919462651449045

जिनकी चर्चा है वह महानुभाव फेसबुक पर रिक्वेस्ट भेज कर फ्रेंड बन गए थे। मित्रता दिवस पर उनकी एक टिप्पणी सुदामा व कृष्ण के विपरीत प्राप्त हुई। न केवल उनकी टिप्पणी को हटाना पड़ा बल्कि उनको भी फ्रेंड लिस्ट से ब्लाक कर दिया। ऐसे लोग शरारतन ही फ्रेंड बनते होंगे। 

 https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/919466114782032
यह एक 'नास्तिक' संप्रदाय के बड़े नेता के विचार हैं जो सुनने की उनसे अपेक्षा नहीं थी। 'कथनी-करनी में अंतर' के इस जमाने में उनको पहचानने में भी चूक हुई जो गैर-जिम्मेदाराना सीख सुनने को मिली।
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 https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/919467598115217


https://www.facebook.com/photo.php?fbid=918461774882466&set=pcb.918462944882349&type=1&theater
ब्राह्मण वाद के कुचक्र में फंसे एक गैर ब्राह्मण विद्वान की यह दुखद गाथा है। इस चित्र में जिस अपने ब्राह्मण मित्र को पुरुसकृत होते देख कर वह अतीव प्रसन्न हैं वही इनकी एक साक्षात्कार की खबर पढ़ कर सन्न रह गया तथा उसने इनकी ही एक ब्राह्मण शिष्या को मोहरा बना कर उससे कहलवाया कि इनको सहयोग न दिया जाये जिस संबंध में इनको उचित समय से सूचित भी कर दिया था। इनको वांछित विद्वानों से परिचित भी करवा दिया था। किन्तु एक और ब्राह्मण ने उन विद्वानों में से एक के विरुद्ध अनर्गल आलाप किया व 20 जून 2015 को मुद्रा राक्षस जी की जयंती के कार्यक्रम में एक और बूढ़े ब्राह्मण ने कुटिल मुस्कान फेंकी तब तत्काल इनको आगाह कर दिया था। फिर भी अपने चचेरे भाई व इन चारों ब्राह्मणों के जाल-जंजाल में यह इस बुरी तरह फंस गए हैं कि उससे निकलना अब इनके लिए मुमकिन नहीं रह गया है तभी तो अनावश्यक आरोपों का तोहफा भेंट कर गए। जवाब देना बेहद ज़रूरी था जो समुचित प्रकार से दे दिया गया है। इनके साथ उदारता बरतना व इनको सहयोग करना मुझे काफी नुकसानदायक रहा लेकिन वह तो भुगतना ही था जब 'पात्र की अनुकूलता' पर पहले ही ध्यान नहीं दिया था तो। निम्न चित्रों से इनके परिवर्तित चरित्र का स्पष्ट परिलक्षण हो जाएगा कि ब्राह्मण वाद के कुचक्र में फँसने से पहले यह ठीक चल रहे थे और जाल में फँसने के बाद कैसे बिदक गए थे।

* " उदारता एक मानवीय गुण है सभी को उदार होना चाहिए किन्तु उसके साथ-साथ पात्र की अनुकूलता भी होनी चाहिए। "
इसके साथ-साथ मैंने अपने लिए इन सिद्धांतों को भी बनाया हुआ है जिन पर ही चलता हूँ :
**'Quick & Fast Decision but Slow & Steady Action'
***'Decided at Once decided for Ever &Ever' 
अपने ही बनाए सिद्धांतों पर तो अमल कर ले जाता हूँ 50 वर्ष  पूर्व पढे सिद्धान्त पर अमल करने में चूक गलत पहचान करने के कारण हो जाती है। बचपन से ही स्वभाव सब की मदद करने का रहा है जबकि तमाम लोग मदद लेकर लात मारते रहे हैं उनके खुद के अनुसार उनको मदद करना मेरी अपनी ही गलती थी। और सज़ा उसी को मिलेगी जो गलती करेगा। प्रतीत होता है कि अब शेष बची ज़िंदगी में दूसरों को मदद करने की बात को 'दिल' व 'दिमाग' से निकाल देने का समय आ गया है।

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बुधवार, 29 सितंबर 2010

सिलीगुडी में सवा तीन साल--(अंतिम भाग): विजय राजबली माथुर

(पिछली पोस्ट से आगे...)

वस्तुतः ईस्टर्न कमांड अलग बन जाने के बाद हालात ये थे कि रिटायरमेंट तक इधर से गए सभी लोगों को वहीँ रहना था.वह तो डिफेन्स यूनियनों के नेता और कम्युनिस्ट समर्थित सांसद सुरेन्द्र मोहन बनर्जी के संसद के भीतर व बाहर किये गए प्रयासों का फल था कि सेंट्रल कमांड से गए लोगों को वापिस आने का मौका मिल रहा था. कब कहाँ का ट्रांसफर ऑर्डर मिल जाए यह तय नहीं था.अतः सितम्बर में हम लोग फिर एक बार नाना जी के पास शाहजहांपुर पढने के लिए गए.लेकिन इन सवा तीन वर्षों में सिलीगुड़ी में जिन लोगों के साथ रहे उनका भी ज़िक्र करना यहाँ ज़रूरी है.जिस मकान में पहले पहल उतरे थे वह बाबू जी के S D O राजकुमार अग्रवाल साः के घर के सामने था उन्हीं ने दिलवाया था जो उनके मकान मालिक चक्रवर्ती साः के छोटे भाई का था जो रेलवे में ड्राइवर थे.सब लोग व्यवहार में बहुत अच्छे थे.एक और S D O गोयल साः के घर से भी आना जाना था.दर असल सिलीगुड़ी में सभी गैर बंगाली अधिकारी और मातहत सभी मिलजुल कर चलते थे.सब एक दुसरे से घरेलू सम्बन्ध रखते थे.बंगाली पडौसी भी सभी अच्छे थे.दुसरे मकान में भी हम लीगों के अलावा बाकी सभी किरायेदार बंगाली थे-सब अच्छे थे.वहां बरसात में कुँए का जल स्तर इतना ऊपर आ जाता था कि मन पर थोडा झुकने पर बाल्टी सीधे डुबो कर पानी भर लेते थे.अख़बारों के मुताबिक़ अब वहां भी जल स्तर गिर गया है.

''नक्सल बाड़ी आन्दोलन''--चुनावों के बाद १४ पार्टियों के मोर्चे की सरकार अजोय मुखर्जी के नेतृत्व में बनी थी.उप मुख्यमंत्री व गृह मंत्री ज्योती बसु बने थे.खाद्य मंत्री प्रफुल्ल चन्द्र घोष थे.सिलीगुड़ी से डाक्टर मैत्रेयी बसु सांसद चुनी गयी थीं जो हुमायूँ कबीर के बांगला कांग्रेस की थीं.यह वही कबीर साः थे जिनकी पुत्री लैला कबीर जॉर्ज फर्नांडीज़ की पत्नी बनीं.नई सरकार में C P M सबसे बड़ी पार्टी थी और इसके  कुछ कार्यकर्ताओं ने सिलीगुड़ी से ८ या १० कि.मी.दूर स्थित नक्सलबाड़ी में आदिवासियों को आगे कर के बड़े किसानों की जमीनों पर कब्ज़ा कर लिया था.पुलिस का रूख आन्दोलनकारियों के प्रति नरम था आखिर गृह मंत्री की पार्टी के तो कार्यकर्ता थे.हमारे मकान मालिक के साढू सपरिवार अपनी भैंस,भैंसे लेकर उनकी शरण में आये उनके कमला (संतरा)बगान और खेत सब छिन गए थे.न्यू मार्केट में मारवाड़ियों की दुकानें जला दी गयीं थीं. बड़ी अफरा तफरी मच गयी थी.स्कूल,कॉलेज बंद हो गए.हम लोग तो वैसे ही नहीं जा रहे थे.कुछ दिनों बाद C P M ने संसदीय प्रणाली में विश्वास जताया और अपने कार्यकर्ताओं से अवैध कब्ज़े छोड़ने को कहा तिस पर उन लोगों ने अलग पार्टी का गठन कर लिया जिन में,चारु मजूमदार,कानू सान्याल और M T नागी रेड्डी प्रमुख थे.नक्सलबाड़ी से फांसीद्वार थाना आदि होते हुए असाम के नल बाड़ी तक यह आन्दोलन बढ़ गया (अब तो पूरे देश में फ़ैल गया है).

सरकार की सख्ती से भू स्वामियों को ज़मीनें वापिस मिलीं और मारवाड़ियों ने नुक्सान से ज्यादा पैसा इंश्योरेंस कम्पनियों से वसूल लिया.नुक्सान गरीब बंगाली मजदूरों का हुआ,मारवाड़ियों ने उन्हें निकाल कर दूसरे कर्मचारी रख लिए.एक आदर्श मांग को गलत तरीके से उठाने और पाने के प्रयास में यह आन्दोलन आज भटकाव में उलझा है और सरकारी दमन का शिकार हो रहा है.नतीजा गरीब भूमिहीन आदिवासियों मजदूरों को भुगतना पड़ रहा है.सिलीगुड़ी में बांगला भाषा में तब कुछ ऐसे पोस्टर भी चिपके थे जिन पर लिखा था--''चीन के चेयरमैन माओ हमारे चेयरमैन''.इस आधार पर इस आन्दोलन को चीन प्रेरित मान कर भी कुचला गया.

''दार्जिलिंग की सैर'' --मुझे तो घूमने का कोई शौक तब भी नहीं था,परन्तु अजय दार्जिलिंग घूमना चाहता था अतः १९६६ की शरद पूर्णिमा (लक्ष्मी पूजा) के दिन हम लोगों को बाबू जी दार्जिलिंग घुमाने  ले गए.हम लोग जब नैरोगेज की गाड़ी में सिलीगुड़ी जंक्शन से बैठे तो तीन-तीन डिब्बों के बाद कुल तीन इंजन लगे थे.शुरू में पूरी एक गाड़ी थी.पहाड़ियों पर जब गाड़ी घूमती थी तो तीनों इंजन खिडकी से दीख जाते थे.किसी स्टेशन पर तीनों इंजन तीन तीन डिब्बों की तीन गाड़ियों में बंट गए जो बहुत कम फासले पर चल रही थीं और दीख रही थीं.एक स्टेशन पर मूलियाँ भी बाबू जी ने लीं-पहाडी मूलियाँ बेहद मीठी थीं.एक स्टेशन पर अजय को शौच के लिए बाबू जी ले कर उतरे  उतने में हम लोगों की गाड़ी चल दी और वे छूट गए.साथ के लोगों ने कहा कि वह पिछली गाड़ी पकड़ लेंगे चिंता की बात नहीं है.अगले स्टेशन पर वे दोनों पिछली गाड़ी से उतर के हम लोगों के साथ आ गए.हम लोग ''घूम'' स्टेशन पर उतर गए.(दार्जिलिंग अगला स्टेशन था)वहां बाबु जी ने ठहरने का प्रबंध कराया था,साथ में राशन वगैरह ले गए थे.लेकिन बाबू जी के एक S D O श्रीवास्तव साः अपने घर ले गए तो माँ ने सारा राशन उन्हीं के घर दे दिया.घूम से अगले दो दिन दार्जिलिंग शहर घूमने गए.ऊपर की सड़क से नीचे का बाज़ार रात में जगमग दीवाली सा चमकता दीखता था.कंचनजंघा देखने नहीं गए.मुझे सर्दी माफिक नहीं आती मेरे हाथ-पाँव सूज गए थे.लौटते में अलग अलग तीन गाड़ियाँ चलीं थीं जो रास्ते में फिर एक गाड़ी में बदल गयीं.वैसे हिलकार्ट रोड से भी पहाड़ियों का अवलोकन सिलीगुड़ी में हो जाता था.दार्जिलिंग की बात दूसरी थी अजय और शोभा को घूमने की प्रसन्नता थी.
सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग जाने वाली 'हिल कार्ट रोड' के साथ-साथ नेरोगेज की रेलवे लाईन

शाहजहांपुर वापसी-जब अगस्त  १९६७ तक बाबू जी को ट्रांसफर ऑर्डर नहीं मिला तो बाबू जी ने नाना जी से पत्र लिख कर हम लोगों को एक वर्ष वहां फिर पढ़ाने हेतु भेजने को कहा तथा उनकी सहमती के बाद सितम्बर में A T मेल से RESERVATION कराकर बैठा दिया.माँ को पहली बार हम तीनों भाई-बहनों को लेकर अकेले सफ़र करना था वह भी एक दम इतनी लम्बी दूरी का परन्तु उन्होंने कहीं भी साहस नहीं छोड़ा.गाड़ी लखनऊ चारबाग की छोटी लाइन पर पहुंची और बड़ी लाइन की गाड़ी से शाहजहांपुर जाना था.छोटी लाइन के कुली काली पोशाक पहनते थे और बड़ी लाइन के कुली लाल पोशाक.एक दूसरे के स्टेशनों में नहीं जाते थे.परन्तु छोटी लाइन का एक कुली भला निकल आया उसने छोटी लाइन से ले जा कर बड़ी लाइन से शाहजहांपुर को छूटने वाली पैसेंजर गाड़ी में सामान कई फेरों में ले जा कर पहुंचा दिया.शायद कुछ ज्यादा रु.लिए होंगे.वह कुली मुझे और अजय को सामान के साथ लाकर इंजन के ठीक पीछे वाले डिब्बे में बैठा गया.सामान ज्यादा था क्योंकि बाद में बाबू जी को अकेले आना था कितना सामान ला पते?कुली बीच में अकेला ही सामान ढो कर लाया और हम भाइयों के पास रख गया.तीसरी या चौथी बार के फेरे में माँ और शोभा भी आये;गाड़ी सीटी देने लगी थी,गार्ड ने हरी झंडी दिखा दी थी-कुली ने दौड़ लगा कर पटरियां फांद कर इंजन के सामने से सामान ला दिया और भाप इंजन के ड्राइवर को रुकने का इशारा किया जब माँ और शोभा डिब्बे में चढ़ गए तब कुली ने मेहनताना लिया और धीमी चलती गाड़ी से उतर गया.आज का ज़माना होता तो लम्बी गाड़ी में इंजन का हार्न और गार्ड की सीटी की आवाज़ भी सुनाई नहीं देती और विद्युत् गति में गाड़ी दौड़ जाती.उस समय तक भलमनसाहत थी-वह अज्ञात कुली हम लोगों के लिए देवदूत सामान था उसे लाखों नमन.

(समाप्त)

Typist -यशवन्त

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बुधवार, 22 सितंबर 2010

सिलीगुड़ी में सवा तीन साल------ विजय राजबली माथुर

हांलांकि बाबू जी तो १९६२ से १९६८ तक सिलीगुड़ी में पोस्टेड रहे लेकिन हम लोग ६४ से ६७ तक ही वहां रहे.चक्रवर्ती साःके आश्रमपाड़ा स्थित जिस मकान में हम लोग उतरे थे उसका एक कमरा पक्का व् दूसरा बांस की चटाई की दीवारों का था.छत टीन की थी.बारिश अधिक होने के कारण दोनों और ढलवा टीन की छतें होती थीं.जलवायु के प्रकोप से माँ को एक्जीमा हो गया तो बाबू जी के ऑफिस के एक S D O साः की पत्नी ने हम दोनों भाइयों से कहा की कूएँ से पानी भर के बहन को भी दो सब अपने -अपने कपडे अपने आप धोओ,सब्जी काट के रखो,आटा माड़ लो,जिससे ड्यूटी से आने पर बाबू जी पर अधिक भार न पड़े.इस प्रकार हम लोगों को आत्मनिर्भर रहने की आदत पड़ गयी.वर्षा ऋतू की छुट्टी के बाद जब स्कूल खुला तब दाखिले हुए.दिसंबर में वार्षिक परीक्षा के बाद ६५ में नवीं में आगये.गणित में कमजोर होने के कारण हेड मास्टर कैलाश नाथ ओझा साः ने मुझे साइंस नहीं दी.छुट्टी से लौटने पर साइंस टीचर जुगल किशोर मिश्रा जी ने मुझ से कोमर्स छोड़ कर साइंस लेने को कहा परन्तु मैंने संकाय नहीं बदला.स्कूल के सभी टीचर बहुत अच्छे थे,अच्छा पढ़ाते भी थे.
स्कूल के बारे में- हमारे स्कूल का नाम कृष्ण  माया मेमोरियल हाई स्कूल  था.उस में सुबह की पाली में प्राइमरी section चलता था.वस्तुतः वह पहले प्राइमरी स्कूल ही था.हेड मास्टर ओझा साः व वरिष्ठ टीचर पहले सिलीगुड़ी हाई स्कूल में पढ़ाते थे उनका वहां के हेड मास्टर व मेनेजर से विवाद हो गया था.इन लोगों ने हिंदी भाषी छात्रों को लेकर वह स्कूल छोड़ दिया और नेपाली भाषा के इस प्राइमरी स्कूल के सेक्रेट्री डाक्टर इंद्र बहादुर थापा की अनुमति से इसे हाई स्कूल बना दिया.डाक्टर ओझा साः आरा (बिहार) के थे वहां के कुछ छात्रों को यहाँ लाकर अध्यापक बना दिया जो खुद आगे पढ़ते हुए हम लोगों को बढ़िया सरल तरीके से पढ़ाते थे.इनमे से एक मिश्रा जी Pol .sc .के तथा नेपाली मूल के भीम सेन जी अंग्रेजी के प्रो.हो कर गोहाटी यूनिवर्सिटी चले गए.सभी छात्रों को दुःख हुआ लेकिन उनका भविष्य उज्जवल हुआ इसकी खुशी भी मनाई.सेकिंड हेड मास्टर वैद्यनाथ शास्त्री जी भी ३ माह भोपाल यूनिवर्सिटी में deputation पर पढ़ा कर लौट आये.स्कूल का मुख्य फंक्शन वसंत पंचमी पर सरस्वती पूजा के रूप में होता था.हम लोगों के सामने ही हेड मास्टर साः को P.hd .करने पर doctrate भी मिल गयी थी उन्हें सम्मानित किया गया.
डाक्टर के.एन.ओझा--हमारे हेड मास्टर साः भी द्वितीय विश्व युद्ध में सेना में रहे थे-वारेंट औफिसर के रूप में.उन्होंने बताया था उनके बैच में २० लोग भर्ती हुए थे १९ मारे गए.वह आगरा में C O D में तैनात रहे इसीलिए बच गए थे.निराला की ''वर दे वीणा वादिनी वर दे'' कड़क आवाज़ में सस्वर पाठ उनके ओज को दर्शाता था.पहले दिन कोई छात्र उनकी कसौटी पर खरा नहीं उतरा.दुसरे दिन मेरे साथ एक अन्य को उन्होंने पास किया.तीसरे दिन 3 को.६० छात्रों के बीच सिर्फ हम ५ छात्र ही निराला की कविता के लिए उपयुक्त पाए गये.डाक्टर ओझा ने कई पुस्तकें भी लिखीं थी;जब हम लोगों के स्कूल में लाइब्रेरी का प्रबंध हो गया तो उन्होंने कुछ पुस्तकें भेंट कर दीं.
भारत पाक संघर्ष--जी हाँ १९६५ की लड़ाई को यही नाम दिया गया था.टैंक के एक गोले की कीमत उस समय ८० हज़ार सुनी थी.पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना साः की बहन फातिमा जिन्ना को जनरल अय्यूब खान ने चुनाव में हेरा फेरी करके हरा भी दिया और उनकी हत्या भी करा दी परन्तु जनता का आक्रोश न झेल पाने पर भारत पर हमला कर के अय्यूब साः हमारे नए प्रधान मंत्री शास्त्री जी को कमजोर आंकते थे.यह पहला मौका था जब शास्त्री जी की हुक्म अदायगी में भारतीय फ़ौज ने पाकिस्तान में घुस कर हमला किया था.हमारी लड़ाई रक्षात्मक नहीं आक्रामक थी.पाकिस्तानी फौजें अस्पतालों और मस्जिदों पर भी गोले बरसा रही थीं जो अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन था.लाहौर की और भारतीय फौजों के क़दमों को रोकने के लिए पाकिस्तानी विदेशमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो सिक्योरिटी काउन्सिल में हल्ला मचाने लगे.हवाई हमलों के सायरन पर कक्षाओं से बाहर निकल कर मैदान में सीना धरती से उठा कर उलटे लेटने की हिदायत थी.एक दिन एक period खाली था,तब तक की जानकारी को लेखनीबद्ध कर के (कक्षा ९ में बैठे बैठे ही) रख लिया था जिसे एक साथी छात्र ने बाद में शिक्षक महोदय को भी दिखाया था.यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ:--
''लाल बहादूर शास्त्री'' -
खाने को था नहीं पैसा
केवल धोती,कुरता और कंघा ,सीसा
खदरी पोशाक और दो पैसा की चश्मा ले ली
ग्राम में तार आया,कार्य संभालो चलो देहली
जब खिलवाड़ भारत के साथ,पाकिस्तान ने किया
तो सिंह का बहादुर लाल भी चुप न रह कदम उठाया-
खदेड़ काश्मीर से शत्रु को फीरोजपुर से धकेल दिया
अड्डा हवाई सर्गोदा का तोड़,लाहोर भी ले लिया
अब स्यालकोट क्या?करांची,पिंडी को कदम बढ़ाया-
खिचड - पिचड अय्यूब ने महज़ बहाना दिखाया
''युद्ध बंद करो'' बस जल्दी करो यु-थांद चिल्लाया
चुप न रह भुट्टो भी सिक्योरिटी कौंसिल में गाली बक आया
उस में भी दया का भाव भरा हुआ था
आखिर भारत का ही तो वासी था
पाकिस्तानी के दांत खट्टे कर दिए थे
चीनी अजगर के भी कान खड़े कर दिए थे
ऐसा ही दयाशील भारतीय था जी
नाम भी तो सुनो लाल बहादुर शास्त्री जी
आज जब भी सोचता हूँ तो यह किसी भी प्रकार से कविता नज़र नहीं आती है पर तब युद्ध के माहोल में किसी भी शिक्षक ने इस में कोई गलती नहीं बताई.
जब जनरल चौधरी बाल बाल बचे-बरसात का मौसम तो था ही आसमान में काला,नीला,पीला धुंआ छाया हुआ था.गर्जन-तर्जन हो रहा था.हमारे मकान मालिक संतोष घोष साः (जिनकी हमारे स्कूल के पास चौरंगी स्वीट हाउस नामक दूकान थी)की पत्नी माँ को समझाने लगीं कि शिव खुश हो कर गरज रहे हैं.आश्रम पाड़ा में ही यह दूसरा मकान था.उस वक़्त बाबू जी बाग़डोगरा एअरपोर्ट पर A G E कार्यालय में तैनात थे.उन्होंने काफी रात में लौटने पर सारा वृत्तांत बताया कि कैसे ५ घंटे ग्राउंड में सीना उठाये उलटे लेटे लेटे गुज़ारा और हुआ क्या था?
दोपहर में जब हल्ला मचा था तब मैं और अजय राशन की दूकान पर थे,शोभा बाबू जी के एक S D O साः के घर थी,घर पर माँ अकेली थीं.जब हम लोग राशन ले कर लौटे तब शोभा को बुला कर लाये.पानी बरस नहीं रहा था,आसमान काला था,लगातार धमाके हो रहे थे.बाबू जी एयर फ़ोर्स के अड्डे पर थे इसलिए माँ को दहशत थी,मकान मालकिन उन्हें ढांढस बंधा रही थीं.माँ तक उन लोगों ने पाकिस्तानी हमले की सूचना नहीं पहुँचने दी थी.
बाबू जी ने बताया कि चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ जनरल जतिंद्र नाथ चौधरी बौर्डर का मुआयना करने दिल्ली से चले थे जिसकी सूचना जनरल अय्यूब तक लीक हो गयी थी.अय्यूब के निर्देश पर पूर्वी पाकिस्तान से I A F लिखे कई ज़हाज़ उन्हें निशाना बनाने के लिए उड़े.इधर बागडोगरा से बम वर्षक पूर्वी पाकिस्तान जाने के लिए तैयार खड़े थे. जनरल चौधरी के आने के समय यह घटना हुई.उधर जनरल चौधरी को हांसीमारा एअरपोर्ट पहुंचा दिया गया क्योंकि हमारी फौजों को पता चल गया था कि पाक को खबर लीक हो गयी है.बागडोगरा एअरपोर्ट का इंचार्ज I A F लिखे पाकिस्तानी ज़हाज़ों पर फायर का ऑर्डर नहीं कर रहा था और वे हमारे बम लदे ज़हाज़ों पर गोले दाग रहे थे लिहाज़ा सारे बम जो पाकिस्तान पर गिरने थे बागडोगरा एअरपोर्ट पर ही फट गये और आसमान में काला तथा रंग बिरंगा धुआं उन्हीं का था.डिप्टी इंचार्ज एक सरदार जी ने अवहेलना करके I A F लिखे पाक ज़हाज़ों पर फायर एंटी एयरक्राफ्ट गनों से करने का ऑर्डर दिया तब दो पाक ज़हाज़ बमों समेत नष्ट हो गये दो भागने में सफल रहे.जनरल चौधरी को सीधे दिल्ली लौटा दिया गया और उनकी ज़िन्दगी जो तब पूरे देश के लिए बहुत मूल्यवान हो रही थी बचा ली गयी.
मेले और प्रदर्शनी-युद्ध के बाद दुर्गा पूजा के पंडालों में अब्दुल हमीद आदि शहीदों की मूर्तियाँ भी सजाई गयीं टूटे पाकिस्तानी पैटन टैंकों की भी भी झलकियाँ दिखाई गयीं.काली पूजा के समय भी युद्ध की याद ताज़ा की गयी.
अगली किश्त में जारी.....
Typist-Yashwant Mathur
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AAI द्वारा बागडोगरा एयरपोर्ट को पूर्णिया भेजने का निर्णय ---
30 जूलाई 2015 :


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