शनिवार, 13 जून 2015

बाबूजी की पुण्यतिथि पर एक स्मरण --- विजय राजबली माथुर

(ताज राजबली माथुर : जन्म 24 -10-1919 मृत्यु 13-06-1995 )
 बाबूजी को पुण्य तिथि पर श्रद्धांजली :

यद्यपि बाबूजी को यह संसार छोड़े हुये बीस वर्ष व्यतीत हो चुके हैं परंतु उनकी बताई हुई बातें दिमाग में अभी भी ताज़ा हैं और उन पर ही चलने का भरसक प्रयास भी रहता है। यही कारण है कि उनकी भांति ही ईमानदारी की सजा भी भुगतता रहता हूँ। एक बार मैंने बाबूजी से सवाल किया था कि उन्होने बचपन से ही ईमानदारी पर चलना क्यों सिखाया था जबकि वह खुद अंजाम भुगतते रहे थे? बाबूजी ने सीधा जवाब दे दिया था कि हमने तो तीनों को ईमानदारी सिखाई थी जब तुम्हारे बहन-भाई अलग रास्ते पर चल रहे हैं तो तुम भी चल सकते हो हम अब कोई पाबंदी तो नहीं लगाए हुये हैं। 

बाबूजी ने तो सरलता से कह दिया लेकिन मेरे लिए वैसा करना संभव नहीं था। बाबूजी तो रक्षा विभाग की सरकारी सेवा में प्रोन्नति से वंचित रह कर  नौकरी चला ले गए किन्तु मुझे निजी क्षेत्र की नौकरी में प्रोन्नति प्राप्त करने के बावजूद चला पाना मुश्किल रहा। तीन साल फिर दस साल बाद स्थान व जाब बदलने पड़े और फिर पंद्रह साल स्वतंत्र रूप से जाब किया और अब पंद्रह साल से कोई जाब न करके स्वतंत्र रूप से ज्योतिषीय सलाहकार के रूप में सक्रिय हूँ। बात इसमें भी वही है कि ईमानदारी की कद्र कोई नहीं करता परिणाम अर्थाभाव का सामना व लोगों की  हिकारत भरी नज़र  का सामना । मेंरी प्रवृत्ति बाबूजी से इस माने में भिन्न हो जाती है कि वह धन के आभाव में लोगों से मिलने-जुलने से इसलिए कतराते थे कि उनकी बराबरी नहीं कर सकेंगे; जबकि मैं सम्पन्न व विपन्न सभी लोगों से  मिल लेता हूँ यदि वे मुझे मान-सम्मान देते हैं । 
कालीचरण हाईस्कूल, लखनऊ में बाबूजी के सहपाठी व रूममेट रहे कामरेड भीखा लाल जी से भी मैंने बेहिचक भेंट 'बेगम हज़रत महल पार्क ', लखनऊ  में की थी जबकि बाबूजी उनके संदेश भेज कर बुलवाने के बावजूद  उनसे सिर्फ इसलिए नहीं मिले कि पहले वह PCS अधिकारी- तहसीलदार हो गए थे फिर भाकपा के प्रदेश सचिव तक रहे थे। (इसी प्रकार अपने खेल के मैदान के साथी रहे अमृतलाल नागर जी व रामपाल सिंह जी से भी उनके बड़े आदमी होने के कारण बाबूजी ने संपर्क जारी नहीं रखा था । )

आगरा के एक वरिष्ठ कामरेड डॉ एम सी शर्मा जी से मैंने कामरेड भीखा लाल जी से मिलवाने को कहा था उस वक्त वह तत्कालीन प्रदेश सचिव सरजू पांडे जी व आगरा के जिलामंत्री रमेश मिश्रा जी व अन्य  से वार्ता कर रहे थे किन्तु मेरे द्वारा बाबूजी के नाम का पहला अक्षर 'ताज' निकलते ही कामरेड भीखा लाल जी ने मेरे कंधे पर आशीर्वाद स्वरूप हाथ रखते हुये मुझसे कहा कि वह तुम्हारे पिता हैं तुम उनके बारे में क्या बताओगे? मैं तुमको उनके बारे में बताता हूँ। भीखा लाल जी ने बाकायदा वर्ष सन बताते हुये कि कब किस क्लास में व हास्टल के किस रूम में वे दोनों साथ-साथ रहे हैं सविस्तार सारी बातों का वर्णन इस प्रकार किया जैसे वह बीते कल की बात कह रहे हों । उनका कहना था कि मेरे बाबूजी के मिलेटरी में जाने के बाद दोनों का संपर्क टूट गया था और फिर वापिस आने के बाद उनके काफी बुलाने के बाद भी वह उनसे नहीं मिले। लेकिन भीखालाल जी ने इस बात पर खुशी भी  ज़ाहिर की थी कि बाबूजी खुद भले न मिल सके लेकिन उनकी याद लगातार थी जो मुझे मिलने को कह दिया। उन्होने मुझे आदेश दिया था कि अगली बार जब लखनऊ आऊँगा तो अपने बाबूजी को उनसे मिलवाने लाऊँगा। मैंने बाबूजी से जब सब बातें बताईं तो उनको अचंभा भी हुआ कि भीखा लाल जी इतने ऊंचे ओहदों पर रहने के बावजूद मुझसे बड़ी आत्मीयता से सार्वजनिक रूप से मिले और उन्होने वायदा भी किया था कि भीखा लाल जी से मिलने चलेंगे। किन्तु ऐसा इसलिए न हो सका क्योंकि भीखालाल जी यह संसार छोड़ गए। 1995 में आज ही के दिन बाबूजी भी यह संसार छोड़ गए। लेकिन छोड़ गए हमारे लिए ईमानदारी व कर्तव्यनिष्ठा की भावना जो मेरे लिए बड़ी पूंजी हैं। 
फेसबुक पर प्रकाशित स्टेटस का लिंक
मैंने परंपरागत रूप से पूर्वजों की पुण्यतिथि को मनाने  जिसमें अधिकांश लोग पंडितों के नाम पर ब्राह्मणों को भोजन कराते व दक्षिणा भेंट करते हैं 
की बजाए 'हवन-यज्ञ' पद्धति को अपनाया है। किसी पूर्वज के नाम पर किसी व्यक्ति को कराया गया भोजन केवल और केवल फ़्लश तक ही पहुँच पाता है । जबकि 'पदार्थ-विज्ञान'(मेटेरियल साईन्स ) के अनुसार  हवन में डाले गए पदार्थ अग्नि द्वारा 'अणुओं'(ATOMS ) में विभक्त कर दिये जाते हैं और वायु द्वारा बोले गए मंत्रों की शक्ति -प्रेरणा से वांच्छित लक्ष्य तक पहुंचा दिये जाते हैं। आत्मा चूंकि अमर है वह चाहे 'मोक्ष' में हो अन्यथा अन्य किसी प्राणी के शरीर में प्राण-वायु द्वारा प्रेषित इन अणुओं को ग्राह्य करने में सक्षम है। इसलिए हम अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति  के निमित्त विशेष सात मंत्रों से हवन में आहुतियाँ ही देते हैं बजाए किसी पाखंड,आडंबर या ढोंग का ढ़ोल बजाने के। 
हम सर्व-प्रचलित 'कनागत' को भी न मना कर केवल पुण्यतिथि के अवसर पर ही इस विशेष हवन को सम्पन्न करते हैं। आर्यसमाज से हमने यह सीखा और समझा है कि, 'श्राद्ध'और 'तर्पण' मृत आत्मा के निमित्त किसी ब्राह्मण को भोज कराना नहीं है।बल्कि 'श्राद्ध'और 'तर्पण' का अर्थ है कि जीवित माता-पिता, सास-श्वसुर और गुरु की  'श्रद्धापूर्वक' इस प्रकार सेवा की जाये कि उनकी आत्मा 'तृप्त'हो जाये। अपनी क्षमता और दक्षतानुसार उनके जीवन -काल में उनको जितनी संतुष्टि पहुंचा सका अथवा नहीं अब उनके नाम पर कोई धोखा-धड़ी नहीं करता हूँ जिस प्रकार वे तमाम लोग भी करते हैं जो खुद को नास्तिक-एथीस्ट घोषित करते हैं। 



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मंगलवार, 9 जून 2015

विकल्प का सिनेमा 'कागज की चिन्दियाँ ' : प्रो.सतीश चित्रवंशी का सराहनीय प्रयास --- विजय राजबली माथुर



http://www.jansandeshtimes.in/index.php?spgmGal=Uttar_Pradesh/Lucknow/Lucknow/09-06-2015&spgmPic=4
इलाहाबाद निवासी और राजर्षि पुरुषोतम दास टंडन विश्वविद्यालय के मास कम्यूनिकेशन विभाग के निदेशक पद से अवकाश प्राप्त प्रोफेसर सतीश चित्रवंशी जी  के अथक प्रयासों से फीचर फिल्म  'कागज की चिन्दियाँ ' पूर्ण हो चुकी है तथा शीघ्र ही सार्वजनिक प्रदर्शन  के लिए उपलब्ध होगी। इस सिलसिले में लखनऊ पधारने पर दैनिक 'जन संदेश टाईम्स' ने उनका एक विस्तृत साक्षात्कार कामरेड कौशल किशोर जी के सौजन्य से कल लिया था जिसे  आज दिनांक 09 जून 2015 को अपने सांस्कृतिक पृष्ठ पर छापा है। मुझे भी इस साक्षात्कार का साक्षी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।यों तो प्रोफेसर साहब द्वारा दिये गए साक्षात्कार के जो अंश प्रकाशित हुये हैं उनसे सबको ही इस फिल्म के उद्देश्य के बारे में भान हो ही जाता है कि प्रस्तुत फिल्म 'नारी की अस्मिता' पर प्रकाश डालती है। प्रदेश की समाजवादी सरकार के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जी लखनऊ को फिल्म निर्माण के क्षेत्र में विकसित करना चाहते हैं। यह एक सकारात्मक पहल है किन्तु प्रश्न यह है कि क्या मुंबई के स्थापित फ़िल्मकारों को ही प्रोत्साहित किया जाएगा या सरकार प्रदेश में 'विकल्प का सिनेमा' को भी सहयोग,समर्थन  व प्रोत्साहन प्रदान करेगी? यदि प्रो .सतीश चित्रवंशी सरीखे विद्वजनों को सरकार सहायता उपलब्ध कराती है तो उत्तर-प्रदेश से सार्थक फिल्म निर्माण संभव हो सकेगा।

 मैंने अपने इसी ब्लाग में कुछ देखी गई फिल्मों पर निर्माता-निर्देशक द्वारा फिल्म प्रस्तुत करने के उद्देश्य चिन्हित करते हुये प्रकाश डाला है और 'कागज की चिन्दियाँ ' को देखने के बाद अपने दृष्टिकोण से उसकी समीक्षा प्रस्तुत कर सकूँगा।सार्वजनिक हित से संबन्धित मेरे ब्लाग्स में ये भी प्रमुख स्थान रखते हैं :

सुर - संगीत 

http://sur-sangeet-pv.blogspot.in/ 

 सर्वे भवन्तु सुखिनःसर्वे सन्तु निरामयः 

http://vijaimathur05.blogspot.in/ 

(1) शनिवार, 4 जनवरी 2014

उमरावजान का आधुनिक सुल्तान कौन?रेखा राजनीति में कैसे??

आज 'आप'/केजरीवाल उसी भूमिका में हैं जिसमें उस वक्त के सुल्तान और नवाब थे। जनता के उत्पीड़न और शोषण से संग्रहीत धन को कारपोरेट घराने इन नए सुल्तानों पर लुटा रहे हैं और ये नए सुल्तान मनमोहनी अदाओं से आज की उमराव जान अर्थात बेगुनाह जनता को दिवा-स्वप्न या ख़्वामख़्वाह के झूठे सब्जबाग दिखा रहे हैं ,जैसे इस सुल्तान ने उमरावजान को दिखाये थे।

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(2)रविवार, 11 मई 2014

  टी वी चेनल्स,सोशल मीडिया,कारपोरेट प्रिंट मीडिया एक स्वर से 'सांप्रदायिक तानाशाही' का स्वागत करते प्रतीत हो रहे हैं। उस पार्टी द्वारा 10 हज़ार करोड़ रुपए  विज्ञापनों पर खर्च किए जा चुकने का अनुमान है।

क्या संदेश है नई उम्र की नई फसल का ? 
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(3 )बुधवार, 9 जुलाई 2014


'चोरनी' में नीतू सिंह जी द्वारा क्या संदेश दिया गया है?

इस फिल्म के माध्यम से बताया गया है कि किस प्रकार अमीर लोग अप संस्कृति का शिकार होकर समाज को विकृत करते रहते हैं। आज 1982 के बत्तीस वर्षों बाद तो समाज का और भी पतन हो चुका है अतः आज भी इस फिल्म की शिक्षा प्रासंगिक है। 

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(4)शुक्रवार, 18 जुलाई 2014


कितने संदेश हैं कटी पतंग में ?

'वात्सल्य प्रेम' कभी भी निष्प्रभावी नहीं हो सकता। निश्छल प्रेम को अबोध बच्चा भी महसूस कर लेता है। माधवी ने पूनम के पुत्र को जो मातृत्व प्रदान किया था वह निस्वार्थ व निश्छल था और इसी का यह परिणाम था कि  पूनम के अबोध-नादान  पुत्र ने खेल-खेल में जहर की शीशी उठा कर रहस्य से पर्दा उठवा दिया और माधवी निर्दोष सिद्ध हो सकी। अतः प्रकृति-परमात्मा का अनुपम उपहार बच्चों से सदैव प्रेम-व्यवहार रखना चाहिए।

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(5 )गुरुवार, 24 जुलाई 2014


पाखंड का 'पर्दाफाश' करती :चित्रलेखा

धर्म के ये ठेकेदार जनता को त्याग,पुण्य-दान के भ्रमजाल में फंसा कर खुद मौज कर रहे हैं। गरीब किसान,मजदूर कहीं अपने हक -हुकूक की मांग न कर बैठें इसलिए 'भाग्य और भगवान्'के झूठे जाल में फंसा कर उनका शोषण कर रहे हैं तथा साम्राज्यवादी साजिश के तहत पूंजीपतियों के ये हितैषी उन गलत बातों का महिमा मंडन कर रहे हैं।  

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(6 )सोमवार, 4 अगस्त 2014


समाज में विषमता व कृषक उत्पीड़न को उजागर करती है 'दुश्मन' 

फ़िल्मकार का दृष्टिकोण 'दंडात्मक' के बजाए 'सुधारात्मक' न्याय व्यवस्था के प्रति लोगों को जागरूक करना था । परंतु लोग बाग तो महज मनोरंजन के दृष्टिकोण से ही  फिल्में देखते हैं किसी ओर से भी ऐसी पहल की मांग नहीं उठाई गई आज 43 वर्षों बाद भी लोग 'फांसी-फांसी' के नारों के साथ प्रदर्शन करते हैं और 'मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की ' की तर्ज़ पर नित नए-नए अपराधों की बाढ़ आती जाती है।  

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(7 )शुक्रवार, 22 अगस्त 2014


इन्सानी भाई चारे का संदेश है 'काबुलीवाला'

 मिनी और उनके पिता श्री द्वारा खान साहब के प्रति जो उदारता व सदाशयता ' काबुलीवाला ' कहानी में गुरुवर रवीन्द्र नाथ ठाकुर साहब ने दिखाई थी उसे इस फिल्म में निर्माता बिमल राय व निर्देशक हेमेन गुप्ता ने ज्यों का त्यों कायम रखा है। 53 वर्ष पूर्व प्रदर्शित यह फिल्म आज भी ज्यों का त्यों समाज व राष्ट्र के समक्ष सांप्रदायिकता के विरुद्ध संघर्ष में सहायक है। 16 वीं लोकसभा चुनावों के पूर्व व पश्चात जिस प्रकार सांप्रदायिकता को उभार कर व्यापार जगत ने सामाजिक सौहार्द को नष्ट  करके मानवता का हनन किया है उसको काबू करने में  'काबुलीवाला ' बहुत हद तक सफल साबित हो सकती है।

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(8 )सोमवार, 1 सितंबर 2014


उसने कहा था का संदेश क्या था?

 गुलेरी जी ने लहना सिंह के बचपन के प्रेम को आधार बना कर इस कहानी के माध्यम से युद्ध की विभीषिका,छल-छद्यम,व्यापार मुनाफा,काला बाजारी सभी बातों को जनता के समक्ष रखा है सिर्फ प्रेम-गाथा को नहीं । सैनिकों की मनोदशा,उनके कष्टों तथा अदम्य साहस का वर्णन भी इस कहानी तथा फिल्म दोनों में है। 

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(9 )गुरुवार, 18 दिसंबर 2014


दो कलियाँ आज भी प्रेरक फिल्म

वीभत्स आतंकवाद (पेशावर कांड ) के शिकार सवा सौ से अधिक बच्चों के मार्मिक दुखांत ने हमें 1968 में रिलीज़ हुई 'दो कलियाँ' देखने को प्रेरित कर दिया। जिसमें बाल-कलाकार के रूप में नीतू सिंह की मुख्य भूमिका है। निर्देशक द्वय आर कृष्णन व एस पंजू ने इस फिल्म के माध्यम से मनोरंजन करते हुये जो संदेश दिया है वह वास्तव में नितांत गंभीर है। इसके माध्यम से समाज की तमाम विकृतियों, विभ्रम, स्वार्थ-लिप्सा, अनैतिक कार्यों के दृष्टांत प्रस्तुत करते हुये यह भी दिखाया गया है कि इसी पथ -भ्रष्ट समाज में कुछ लोग  अपने साहस व लगन के द्वारा उन पर विजय हासिल करने में भी समर्थ हैं। हालांकि फिल्म के उपसंहार में बालाजी पर आस्था व विश्वास के दृश्यों द्वारा समाज में व्याप्त अंध-विश्वास व ढोंग को महिमामंडित कर दिया गया है जिससे जनता में कर्तव्य पथ से परे परा -  शक्ति  पर भरोसा रखने की प्रवृत्ति को बेजा बढ़ावा मिलता है। यदि फिल्म के अंतिम पाखंडी दृश्यों की उपेक्षा कर दी जाये तो बाकी फिल्म प्रेरक प्रतीत होती है जिसने दो छोटी-छोटी बच्चियों के साहस,बुद्धि-कौशल व दृढ़ निश्चय को दर्शाया है। इन दोनों जुड़वां बहनों ने न केवल अपनी माँ के प्रति उत्पन्न अपने पिता की गलत फहमी को दूर किया वरन अपनी घमंडना  नानी को एड़ियों के बल खड़ा होने पर मजबूर कर दिया। 

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(10 )रविवार, 1 फ़रवरी 2015


खेल कारपोरेट ट्रेड यूनियनिज़्म का :'नमक हराम' से 'चक्रव्यूह' तक

 हालांकि फिल्म निर्माता तो मनोरंजन और मुनाफे को ध्यान में रख कर आजकल फिल्में बनाते हैं। किन्तु आज़ादी से पहले और बाद में भी कुछ फिल्मों द्वारा समाज और राजनीति को नई दिशाएँ बताने का कार्य किया गया है। हाल की चक्रव्यूह और 40 वर्ष पुरानी नमक हराम फिल्में मालिक द्वारा मजदूर और किसानों के शोषण पर प्रकाश डालती तथा अपना समाधान प्रस्तुत करती हैं।

'नमक हराम' में बताया गया है कि विक्की और  सोनू दो अलग-अलग समाज वर्गों से आने के बावजूद एक अच्छे मित्र है।षड्यंत्र पूर्वक मजदूर नेता की हत्या कराये जाने से क्षुब्ध अमीर अपने धनाढ्य पिता से बदला लेने हेतु खुद हत्या का इल्ज़ाम लेकर जेल चला जाता है लेकिन पिता के गलत कार्यों में सहयोग नहीं करता है। 

'चक्रव्यूह' द्वारा कारपोरेट कंपनियों की लूट को सामने लाया गया है। इसी लूट के कारण आदिवासी किसानों के मध्य नक्सलवादी आंदोलन की लोकप्रियता पर भी प्रकाश डाला गया है और इस आंदोलन की आड़ में स्वार्थी तत्वों द्वारा आंदोलन से विश्वासघात का भी चित्रांकन किया गया है। 

'मजदूर' द्वारा भी मालिक-मजदूर के सम्बन्धों पर व्यापक प्रकाश डालते हुये पूंजीपति वर्ग की शोषण प्रवृति को उजागर किया गया है।  मजदूरों की संगठित एकता के बल पर समानान्तर रोजगार की उपलब्धि बताना भी इस फिल्म का लक्ष्य रहा है। IPTA और भाकपा में लोकप्रिय गीत की प्रस्तुति इस फिल्म में चार चाँद लगा देती है।

http://vidrohiswar.blogspot.in/2015/02/blog-post.html 

(11 )सोमवार, 30 मार्च 2015


स्थापित मान्यताओं पर आधारित 'राम राज्य' एक उत्तम कलात्मक फिल्म 


इस फिल्म में यद्यपि लोक प्रचलित मान्यतों के आधार पर ही प्रदर्शन है किन्तु मैंने अपने कई लेखों के माध्यम से राम-वनवास तथा सीता-वनवास के राजनीतिक,कूटनीतिक कारणों का उल्लेख किया है  

http://vidrohiswar.blogspot.in/2015/03/blog-post_52.html 

(12 )शनिवार, 21 दिसंबर 2013


ब्रह्मचारी 'त्याग'व 'परोपकार' की शिक्षाप्रद मनोरंजक कथा -

जहां एक ओर शीतल की माँ व मामा का चरित्र निकृष्ट रहा जो अपनी बेटी व भांजी का ही अहित करने पर तुले थे। वहीं ब्रह्मचारी व रवि की माँ का चरित्र एक आदर्श दृष्टांत उपस्थित करता है।  

http://vidrohiswar.blogspot.in/2013/12/blog-post.html 

 

***                                            ***                                  ***

स्मिता पाटिल जी द्वारा अमिताभ बच्चन जी को जो ज्योतिषीय परामर्श दिया था उस पर भी मैंने अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है :

ज्योतिष का मखौल उड़ाना जितना आसान है उसकी अवहेलना करने पर हानि से बचना नहीं। काश स्मिता जी पूर्ण आयु प्राप्त करतीं तो समाज उनके ज्योतिषीय ज्ञान से लाभ उठा सकता था। परंतु दुनिया का यह दुखद दस्तूर है कि किसी के जीवित रहते उसको उसका वाजिब हक व सम्मान नहीं दिया जाता है। जिन साहब ने मृतयोपरांत स्मिता  पाटिल जी के ज्योतिषीय ज्ञान को रेखांकित किया वह साधूवाद के पात्र हैं।

http://vidrohiswar.blogspot.in/2014/08/blog-post_25.html

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फेसबुक पर प्रतिक्रिया :

 

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रविवार, 24 मई 2015

एक श्रंधाजली : प्रेरणादाता को --- विजय राजबली माथुर


Thursday, May 24, 2012

प्रेरणादाता को आत्मीय श्रंधाजली ---

http://krantiswar.blogspot.in/2012/05/blog-post_24.html 


24 मई पुण्य तिथि पर एक स्मरण -बी पी सहाय साहब


स्व.बिलासपति सहाय एवं स्व.मांडवी देवी

 स्व. बिलासपति सहाय साहब( पूनम के पिताजी ) को यह संसार छोड़े अब 12 वर्ष हो गए हैं और 12 वर्षों का एक युग माना जाता है। मुझे ज्योतिष को व्यवसाय के रूप मे अपनाने का परामर्श उन्होने ही दिया था और उनकी मृत्यु के लगभग 07 माह बाद उनके मत के क्षेत्र दयाल बाग(आगरा) मे मैंने उन्ही की पुत्री के नाम पर अपना ज्योतिष कार्यालय खोला भी था जिसे बाद मे वहाँ घर पर स्थानांतरित कर दिया था। अब यहाँ लखनऊ मे पूनम की राय पर ही कार्यालय का नाम बदल दिया गया है। सहाय साहब के बारे मे ज्योतिषयात्मक विश्लेषण आगरा के अखबार मे छ्पा था जिसकी स्कैन कापी ऊपर के चित्र मे देख सकते हैं।

बी पी सहाय साहब सरकारी सेवा से अवकाश ग्रहण करने के उपरांत मृत्यु पर्यंत 'पटना हाई स्कूल ओल्ड ब्वायज एसोसिएशन'मे सक्रिय रहे। उनके सभी सहपाठी उच्च पदो पर रहे जिनमे बिहार के पूर्व मुख्य सचिव के के श्रीवास्तव साहब का नाम प्रमुख है। 11 अगस्त 1942 के छात्र आंदोलन मे शहीद हुये एक क्रांतिकारी के भाई भी उनके सहपाठी थे। पटना सचिवालय के पास जो सप्तमूर्ती हैं उनमे से एक मूर्ति उनके सहपाठी के अग्रज की भी है। सरकारी सेवा के सम्पूर्ण काल मे उन्होने पूरी ईमानदारी से कार्य किया और न खुद कभी रिश्वत ली न अधीन्स्थों को लेने दी जबकि सिंचाई विभाग मे सर्किल आफिसर थे । नतीजतन उनके अनेक शत्रु रहे और आर्थिक स्थिति सदैव डांवा-डॉल रही। यही कारण है कि जन्म से अपने पिताजी  की ईमानदारी देखने के कारण पूनम को मेरे ईमानदारी पर चलने और परेशानी उठाने पर कोई एतराज़ नहीं है। यही वजह थी कि उन्होने मेरे बाबूजी द्वारा भेजे एक पोस्ट कार्ड को वरीयता दी और पूनम का विवाह मुझ से कर दिया।


जैसा कि अक्सर होता है और मेरे साथ पूरे तौर पर चरितार्थ है कि ईमानदार व्यक्ति को अपने घर-परिवार से भी सहयोग नहीं मिलता है बल्कि खींच-तान का सामना करना पड़ता है। मेरे बाबूजी भी इसी परिस्थिति से अपनी ईमानदारी की वजह से गुजरे और पूनम के बाबू जी भी इसी राह के राही रहे जिनको  पूनम के विवाह के समय उनके भाइयों ने ही **++**उन्हें गुमराह करने का प्रयास किया  किन्तु अंततः वह भटके नहीं। यदि मैंने उनके परामर्श को न माना होता तो आज भी मुनीमगिरी ही कर रहा होता। वह आजीविका का कार्य विरोधाभासी था क्योंकि मै मजदूर आंदोलन मे सक्रिय था और व्यापारी वर्ग मजदूरों का शोषक होता है।उन्होने मेरी मानसिकता और क्षमता का पूर्वाङ्क्लन करते हुये मुझसे ज्योतिष को शौक के स्थान पर व्यवसाय के रूप मे अपनाने को कहा। वह मेरे कम्युनिस्ट आंदोलन मे शामिल रहने को बुरा नहीं समझते थे क्योंकि उनके छोटे बहनोई स्व.शशीभूषण प्रसाद जी मधुबनी के उसी डिग्री कालेज मे एकोनामिक्स पढ़ाते थे जिसमे पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री कामरेड चतुरानन मिश्रा जी भी एकोनामिक्स पढ़ाते थे। कामरेड चतुरानन मिश्र फूफाजी साहब के घर भी आते रहते थे और इनकी बातों का ज़िक्र वह बाबूजी साहब से करते रहते थे।


 समाज मे ज्योतिषी के रूप मे एक पहचान सम्मानजनक तो है ही इसमे भी छल-छढ्म से दूर रहने के कारण मुझे संतोष रहता है कि मैंने किसी का कुछ भला तो किया । हालांकि कुछ लोग ईमानदारी और सच्चाई पर चलने के कारण मुझे बेवकूफ और कमजोर सिद्ध करने का प्रयास करते रहते हैं। पूना मे प्रवास कर रहे और पटना से संबन्धित एक ब्लागर का कृत्य ऐसा ही रहा। व्यक्तिगत रूप से ज्योतिषयात्मक राय लेने के बाद उक्त ब्लागर ने मेरे विश्लेषण को गलत सिद्ध कराने का असफल प्रयास भी किया जिस कारण मुझे श्रीमती शबाना आज़मी,सुश्री रेखा और X-Y संबन्धित  ज्योतिषयात्मक विश्लेषण देने पड़े। एक सप्ताह के भीतर सुश्री रेखा के राज्यसभा मे मनोनीत हो जाने पर जहां मेरे विश्लेषण की सटीकता सिद्ध होती थी उक्त ब्लागर ने एक अन्य ब्लाग पर उसकी खिल्ली उड़ाई। वस्तुतः पटना से संबन्धित उक्त ब्लागर ने मेरे ज्योतिषीय ज्ञान की खिल्ली नहीं उड़ाई है बल्कि पटना के होनहार भविष्यदृष्टा स्व .बिलासपति सहाय साहब की खिल्ली उड़ाई है क्योंकि ज्योतिष को व्यवसाय बनाने का सुझाव उन्होने ही मुझे दिया था।


यद्यपि उन्होने कभी किसी को कुछ बताया नहीं किन्तु उनकी गणना काफी सटीक थी। 23 मई 2000 को उन्हें देखने आए अपनी बड़ी पुत्र वधू के पिताजी डॉ नरेंद्र कुमार सिन्हा (जो सरकारी सेवा से अवकाश ग्रहण करने के बाद निशुल्क होम्योपैथी इलाज करते थे)से उन्होने कहा था-"my death is sure tomorrow"। यह बात उन्होने मुझसे 25 मई को घाट पर बताई थी  ( जो उस वक्त अपने दूसरे दामाद मुकेश सिन्हा साहब के साथ थे)किन्तु उनके परिवार के किसी सदस्य को यहाँ तक कि अपनी पुत्री को भी पूर्व सूचित नहीं किया था। डॉ एन के सिन्हा साहब मुझे आर्यसमाजी भाई कहते थे सिर्फ इसलिए ही मुझसे कहा था। । यदि बाबूजी साहब ने मुझे अकौण्ट्स छोड़ कर 'ज्योतिष' का कार्य करने को कहा तो  कुछ सोच-समझ कर ही कहा होगा क्योंकि शौकिया तो मै लोगों को ज्योतिषीय परामर्श एक काफी लंबे समय से देता आ रहा ही था।

 1984 मे होटल मुगल शेरटन मे अकौण्ट्स सुपरवाइज़र के रूप मे कार्य करते हुये एक डच नर्स को हाथ देख कर जो कुछ बताया था वह उसकी पूर्ण संतुष्टि का रहा था । न तो ठीक से इंगलिश बोलना  उस डच नर्स को आता था और न मुझे किन्तु वार्ता समझ आ गई थी। होटल के ज्योतिषी महोदय ने उस लेडी को इसलिए हाथ देखने से मना कर दिया था कि उनका उस दिन का कोटा पूरा हो चुका था और उस लेडी की वापिसी फ्लाईट उसी दिन की थी तथा उसे भारत मे ही हाथ दिखाना और हाल जानना था। अतः फ्लोर स्टाफ ने मुझसे उस लेडी के रूम मे हाथ देखने का आग्रह किया था। ज्योतिषी साहब की फीस का 50 प्रतिशत उस लेडी ने रु 100/- मुझे परामर्श शुल्क के रूप मे दिया था। नियमानुसार मै वहाँ ज्योतिषीय परामर्श नहीं दे सकता था अपने सर्विस रूल के मुताबिक भी और उन ज्योतिषी साहब से होटल के काण्टरेक्ट के मुताबिक भी। ज्योतिषी साहब से मेरे संबंध मधुर थे अतः मैंने वह रु 100/- जाकर उनको देना चाहा तो उन्होने मुझसे खुद ही रखने को कह दिया। उन्होने मेरे द्वारा ज्योतिषीय परामर्श देने पर भी एतराज़ नहीं किया  था।


धन-पिपासु लोगों से किसी सच्ची बात को स्वीकारने की उम्मीद मैंने कभी नहीं की इसलिए मुझे इस प्रकार की बेजा हरकतों से कभी कोई फर्क भी नहीं पड़ता है जैसी कि पूना प्रवास कर रहे पटना के ब्लागर ने की । मुझे नहीं लगता कि कभी मेरे किसी कार्य से स्व .बिलासपति सहाय जी का मुझे ज्योतिष अपनाने का सुझाव देने का आंकलन गलत सिद्ध होगा। आज हमारे अपने कम्युनिस्ट नेतागण भी मुझसे ज्योतिषीय परामर्श ले रहे हैं तो यह एक उपलब्धि ही है। इसका पूरा का पूरा श्रेय बाबूजी साहब (स्व .बिलासपति सहाय जी) को है। 
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तीन वर्ष पूर्व यह स्मरण लिखने के बाद इस संदर्भ में आज उनकी 16 वीं पुण्यतिथि पर कुछ विवरण और जोड़ने की आवश्यकता प्रतीत हो रही है :
उनके जो भाई उनको तो गुमराह करने में सफल न हो सके वे उन लोगों के बाद उनके पुत्र व पुत्र-वधू (डॉ एन के सिन्हा साहब की पुत्री )को गुमराह  करके उनका आर्थिक,शारीरिक,मानसिक क्षति पहुंचाने के लक्ष्य में सफल रहे हैं और मेरे द्वारा आगाह किए जाने के बावजूद उनको अपनी घेराबंदी में उलझाए रहे हैं। डॉ एन के सिन्हा साहब की एक भतीजी  बी पी सहाय साहब के निधन के बाद जब शोक प्रकट करने आईं थीं तो उनका  बाकायदा परिचय मुझसे करवाया गया था जिस आधार पर उनसे निवेदन किया था कि वह अपनी बहन-बहनोई,भाँजियों के हित में उनको समझा कर अपनी चाचियों के बुने जाल से निकालने में मदद करें। किन्तु वह शायद उन षड्यंत्रकारियों से मिल चुकीं थीं जो उन्होने यह जवाब दिया :
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निश्चय ही इस प्रकार अपनी धनाढ्यता के अहंकार का ही प्रदर्शन किया गया है और अपनी क्रूरता व अमानवीयता का भी तथा जिससे बी पी सहाय साहब एवं डॉ एन के सिन्हा साहब की आत्माओं को भी ठेस पहुंची होगी ।  

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बुधवार, 20 मई 2015

अरुण कुमार भल्ला : कुछ भूली बिसरी यादें (भाग-3 ) --- विजय राजबली माथुर

मई 1972 में जब प्रथम जाब मिला तो एकाउंट्स विभाग में जबकि सिलीगुड़ी में  हाईस्कूल में मजबूरीवश कामर्स पढ़ कर आगे आर्ट्स के विषय ले चुका था। सरु स्मेल्टिंग, मेरठ के चेयरमैन सुल्तान सिंह जैन साहब ने पर्सोनेल आफ़ीसर डॉ मिश्री लाल झा साहब से मुझे जाब पर लेने को कह दिया था जो मुझे मेनेजिंग डाइरेक्टर धन पाल सिंह जैन, इंजीनियर साहब के पास ले गए। एम डी साहब ने कह दिया हमारे पास एकाउंट्स में ही जगह है कर सकते हो तो ज्वाइन कर लो। चूंकि नौकरी करना था हामी भर ली थी । एम डी साहब के टेनिस के मित्र व पंजाब नेशनल बैंक के रिटायर्ड ब्रांच मेनेजर वहाँ मेनेजर एकाउंट्स थे जो कमर्शियल एकाउंट्स से अनभिज्ञ थे तथा एकमात्र एकाउंट्स क्लर्क हंस कुमार जैन साहब कुछ भी बताने को तैयार न थे। मैंने पुरानी फाइलों का अध्यन दो-तीन रोज़ करने के बाद मेनेजर लेखराज प्रूथी साहब से वाउचर  मुझसे भी बनवाने का अनुरोध किया जिसे स्वीकार कर कुछ वाउचर बनाने को उन्होने मुझे भी दिये और ठीक पाने पर संख्या बढ़ाते गए। हंस जी ने मेरे बने वाउचर देखे तो मेनेजर साहब से बोले कि वह केवल वाउचर पास करने के लिए मेनेजर हैं चेकिंग हंस जी करेंगे जिसे मेनेजर साहब ने स्वीकार कर लिया। जो हंस जी मुझे काम सिखाने को तैयार न थे उन्होने सारा काम मुझ पर लाद दिया और  खुद चेकिंग सुपरवाइज़र बन बैठे। काम मुझ पर ज़्यादा होने के कारण अन्य लोग आए किन्तु कामर्स बैक ग्राउन्ड होने से उनका वेतन मुझसे ज़्यादा था और ज़िम्मेदारी कम। 

मेनेजर प्रूथी साहब जसवंत शुगर मिल में चीफ एक्ज़ीक्यूटिव आफ़ीसर बन कर चले गए उनके स्थान पर नन्द किशोर गौड़ साहब सीनियर एकाउंटैंट के रूप में आए और हंस जी भी एकाउंटैंट हो गए। इन सब के ऊपर एक चार्टर्ड एकाउंटैंट अरुण कुमार भल्ला साहब को चीफ एकाउंटैंट के रूप में रखा गया। भल्ला साहब BSc के बाद CA किए थे फिर भी अफ़सरी की हेकड़ी उनमें नहीं थी। सबसे ही किन्तु मुझसे अधिक ही मित्रवत व्यवहार करते थे। मेरा प्रमोशन और वेतन वृद्धि उनके सिफ़ारिश के आधार पर ही हुये। उनका स्पष्ट कहना था सिर्फ सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक दफ्तर का समय है और तभी तक अफ़सरी-मातहती है जबकि शाम 5 बजे से अगली सुबह 9 बजे तक हम सब दोस्त हैं। अधिक से अधिक भाई साहब सम्बोधन उन्होने स्वीकार किया। उन्होने मुझसे जूनियर्स के काम की चेकिंग भी मुझे सौंप दी थी। 

भल्ला साहब नियमों के बड़े पक्के थे और ज़रा सी भी ढील बर्दाश्त नहीं करते थे। एक बार एम डी साहब कुछ जानकारी लेने एकाउंट्स विभाग में आए थे और भल्ला साहब की कुर्सी पर बैठ गए थे। उनके जाने के बाद से भल्ला साहब ने कुर्सी छोड़ दी व मेज़ के दूसरे छोर पर स्टूल डाल कर बैठने लगे । उसी रोज़ उन्होने स्तीफ़े का नोटिस दे दिया था। एम डी, चेयरमैन किसी का अनुरोध उन्होने स्वीकार नहीं किया तथा स्तीफ़ा वापिस नहीं लिया। दिल्ली के कनाट प्लेस स्थित एक जापानी फर्म में वह डिप्टी जेनरल मेनेजर (फाइनेंस ) के ओहदे पर चले गए। मेरठ से जब-जब हम कुछ लोग उनसे मिलने गए उन्होने कभी भी अपने आफिस में नहीं बुलाया क्योंकि वहाँ हम लोगों को सामने बैठाना पड़ता। इसलिए गेस्ट रूम के सोफ़े पर खुद ही हम लोगों के बराबर आकर बैठते थे। बड़ी आत्मीयता से निजी व काम की बातें करते थे। एकाउंट्स में जटिल से जटिल समस्याओं का यदि मैं सफलता पूर्वक मुक़ाबला कर सका तो उसका श्रेय भल्ला साहब को ही दे सकता हूँ उनके कार्य-व्यवहार ने मुझमें 'दृढ़ता' व 'आत्मविश्वास' का संचार किया था जिस पर एकाउंट्स कार्य 2000 ई . तक करते हुये मैं अडिग रूप से डटा रहा।  

2000 ई . से एकाउंट्स के स्थान पर 'ज्योतिष' को अपनाने के बावजूद सिद्धांतों व नीतियों से समझौता न करने की आदत CA अरुण कुमार भल्ला साहब से ही प्रेरित है। ऐसे कर्तव्यनिष्ठ व व्यावहारिक अफसर दूसरा कोई मुझे देखने को भी न मिला । नीति-न्याय का पालन करने वाला कोई नेता अपनी CPI में भी मुझे नज़र नहीं आया जिस प्रकार के अधिकारी-मित्र भल्ला साहब के साथ कार्य करने का अवसर मेरठ में मिला था।

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रविवार, 10 मई 2015

एहसान नहीं मानते वे : जिनके पास न शर्म न हया है --- विजय राजबली माथुर



"हमारे वरिष्ठ कम्युनिस्ट नेताओं ने भी खुद को एथीस्ट कहते हुये भी मुझसे ज्योतिषीय परामर्श लिए हैं लेकिन तुर्रा यह कि वे भी मेरी सिर्फ आलोचना ही नहीं करते हैं बल्कि मुझे नुकसान पहुंचाने का हर संभव प्रयत्न करते रहते हैं। यही हाल सभी रिशतेदारों का है चाहे वे माता-पिता की पुत्री व अलीगढ़ के मूल निवासी दामाद हों तथा उनके उकसाये हुये सीतापुर के मूल निवासी कुक्कू एवं शरद मोहन । इसी कड़ी में आरा व देवघर निवासी वे लोग भी जुड़ गए हैं जिनके परिवारी लोगों की जन्मपत्रियों के विश्लेषण किए हैं। ये सब लोग न तो इतनी शर्म रखते हैं कि अपना काम जिससे करवाया है कम से कम उसका एहसान न भी मानें तो उसका नुकसान तो न करें। बल्कि वे लोग मेरे पुत्र व पत्नी को भी नुकसान पहुंचाने की कोशिशों में लगे रहते हैं। परंतु जैसा कि नवंबर 2013 में SGPGI,लखनऊ में देवघर वाले महाशय ने रोग शैय्या से कहा था कि आप खुद तो अपना बचाव अपने ज्योतिषीय ज्ञान से कर ही लेंगे!*** वस्तुतः उनका कथन सत्य ही है। किन्तु वह व उनकी पत्नी खुद ही अपने भतीजे व भतीजी के विरुद्ध अपनी एक भाभी से मिल कर ऐसे अभियान में शामिल रहे हैं । उनकी एक भतीजी जो मेरी श्रीमती जी हैं से उनकी पत्नि ने तब कहा भी था कि वे अपने भाई-भाभी व भतीजियों का ख्याल न करें अर्थात उनका अहित होने दें। तिस पर भी खूबी यह रही कि आगाह किए जाने के बावजूद श्रीमतीजी के भाई-भाभी अपनी उन चाचियों के अनुगामी बने रह कर हाल ही में अपना शारीरिक,मानसिक,आर्थिक ज़बरदस्त नुकसान करा चुके हैं लेकिन उनसे सावधान रहने को तैयार नहीं हैं।जहां तक हमारा प्रश्न है हम एक हद से ज़्यादा नुकसान झेलने की स्थिति में नहीं होते हैं और अपने को ऐसे लोगों से अलग-थलग कर लेते हैं चाहे वे किसी भी क्षेत्र के हों। मेरी श्रीमती जी तथा पुत्र को भी 'ज्योतिष' का प्रारम्भिक ज्ञान तो है ही बाकी पुस्तकाध्यन से विकसित कर सकते हैं। हमें अपने बारे में अच्छा सोचने व अच्छा करने का नैतिक हक है चाहे जो कोई जो सोचे व करे।"
http://vidrohiswar.blogspot.in/2015/03/blog-post_29.html

***:गंभीर षड्यंत्र :
 उनकी श्रीमतीजी ने उनके समक्ष ही पूनम से यह कहा कि वह अपनी भतीजियों का ख्याल न करें लेकिन मुझसे कहा कि मैं उनके पुत्रों-मनोज व मधुकर का गार्जियन बन जाऊँ जो बाद में मेरे पुत्र यशवंत के गार्जियन बन जाएँगे।
  उनके इस कथन का अभिप्राय यह रहा होगा कि मैं खुद ज्योतिष का जानकार होने के नाते अपना बचाव तो हर हाल में कर ही लूँगा लेकिन किसी भी सूरत में उनके भतीजे ( जो मेरी पत्नी के बड़े भाई हैं ) का कोई सहयोग  न करूँ जिससे कि उनके द्वारा किए गए षडयंत्रों से वे लोग अनभिज्ञ रह कर अपना बचाव न कर सकें। इसी वजह से उनकी बीमारी को गंभीरता तक पहुंचा देने के बाद उनकी पत्नी ने उनकी भतीज बहू से पूनम के पटना जाने पर पाबंदी लगवा दी थी और हमने टिकट केन्सिल करवा दिये थे। लेकिन टेलीफोन पर प्राप्त हाल के अनुसार मैं पिछले माह पूनम को उनके भाई जान से उनके विरोध के बावजूद  मिलवा ही लाया।  हालांकि उनको मेरा वहाँ  जाना नागवार लगा।मैंने जो दवाएं व उपाए बताए थे उनका प्रयोग उनके द्वारा नहीं किया गया और वे अभी भी अपनी आरा व देवघर वाली चाचियों के दुष्चक्र में फंसे हुये हैं और इसी वजह से मेरा जाना उनको नागवार गुज़रा है।

वास्तु दोष :
काफी समय पूर्व ईशान क्षेत्र से उनके मकान मालिक की भारी-भरकम आलमारी को मैंने इसलिए हटवा दिया था कि वह पुरुष- वर्ग के लिए हानिकारक है किन्तु अपनी चाचियों के कहने पर उन्होने उसे पूर्ववत कर लिया जिसका रोग बढ़ाने में महत्वपूर्ण हाथ रहा। इतना ही नहीं ईशान क्षेत्र को और खराब करने हेतु उनसे जूते-चप्पलों का रैक भी रखवा दिया गया। उनके सबसे छोटे चाचा जो उनसे मात्र सात साल ही बड़े होंगे के आदेश पर 'गया' दान-पुण्य भी कर आए जबकि मैंने लिखित में उनको मंदिरों व पुजारियों को दान देना उनके लिए हानिकारक बताया था। किसी भी गृहस्थ द्वारा घर में मूर्ती या चित्र रख कर मंदिर बनाना घोर वास्तु-दोष है किन्तु अपनी चाचियों की सलाह पर वह घर में अब मंदिर भी सजा कर रखे हुये हैं। 

1996 में मैंने उनके माता-पिता तथा पत्नी की उपस्थिती में उनसे कहा था कि वह अपनी पुत्रियों  का ख्याल करें व उनकी उपेक्षा करने वाले अपने चाचा-चाची व भुआओं का नहीं। उनका जवाब था कि वह अपनी पुत्रियों का  नहीं बल्कि अपने चाचा-चाची व भुआओं का  ही ख्याल करेंगे और आज भी वही कर रहे हैं। हालांकि उनकी आरा व देवघर वाली चाचियों ने अपने लोगों की जन्म-पत्रियों का विश्लेषण मुझसे लेकर पहले लाभ उठाया है किन्तु पूनम के भाई को मेरे विरुद्ध भड़का कर लाभ उठाने से वंचित कर दिया है। रिश्ते में उनके  बड़े वे लोग निहायत ही बेशर्म व एहसान फरामोश हैं और अपनी भतीज बहू की एक बहन को धूर्ततापूर्ण हरकतों से विधवा बनवाने के बाद अब अपनी भतीजी व  मेरे विरुद्ध घृणित अभियान चलाए हुये हैं जिसमें विफल रहने पर अपने भतीजे पर निशाना साधा जा रहा है और फिर भी वे उनको ही पूज रहे हैं । यह ठीक है कि मैं अपना बचाव करने में सक्षम हूँ किन्तु पूनम के भाई जान के परिवार का बचाव न हो पाने से पूनम को जो मानसिक क्षति होती है अंततः उसका प्रभाव तो हमारे परिवार पर भी पड़ता ही है और यही लक्ष्य उनकी धूर्त चाचियों का है जिसमें फिलहाल तो वे पूर्णरूपेण सफल हैं ही। लेकिन :

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शुक्रवार, 8 मई 2015

डॉ डी मिश्रा (होम्योपैथ ) :कुछ भूली बिसरी यादें (भाग-2 ) --- विजय राजबली माथुर

डॉ डी मिश्रा (होम्योपैथ ) :
https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/875505135844797

डॉ डी मिश्रा होटल क्लार्क शीराज, आगरा के पूर्व जेनरल मेनेजर के पुत्र तथा खुद पूर्व पाइलट आफ़ीसर थे। फ्लाईट लेकर लंदन जाते रहते थे अतः वहाँ की होम्योपैथी एकेडमी से डिग्री हासिल कर ली थी। पिता के 'लकवा' लग्ने परउनकी सेवा करने के लिए स्तीफ़ा देकर मेडिकल प्रेक्टिस करने लगे थे। उनसे मुलाक़ात इस वजह से हुई कि उनके कंपाउंडर के पिता की मृत्यु बंगलौर में हो गई थी जिसमें उनको जाना था लेकिन डॉ साहब ने उनसे शर्त रखी थी कि वह अपना रिपलेसमेंट देकर जाएँ तो चाहे जितने दिन भी बाद आयें वरना वह रिलीव नहीं करेंगे और बगैर रिपलेसमेंट देकर जाने पर वह जाब से हटा देंगे। वह कंपाउंडर हमारे एक परिचित डॉ के सहपाठी थे इसलिए मुझे जानते थे और यह भी कि होटल मुगल, आगरा में सुपरवाईजर अकाउंट्स के पद से सस्पेंड हो चुकने के कारण मेरे पास वक्त भी था। उन सज्जन ने अपनी मजबूरी में मदद करने का निवेदन किया और यह भी कि मैं डॉ मिश्रा को यह न बताऊँ कि मैं खुद 'आयुर्वेद रत्न', आर एम पी हूँ ।
दूसरों को मदद करने की आदत के कारण मैंने उनको रिलीव करा दिया। होम्योपैथी में दिलचस्पी व जानकारी मुझको बहुत पहले से थी अतः मैंने डॉ साहब को कोई दिक्कत न होने दी।हिसाब भी उनको इस प्रकार सौंपता था कि समझने में उनको दिक्कत न हो उसको तो उन्होने मेरी अकाउंट्स की जानकारी के संदर्भ में देखा किन्तु दवाएं मरीजों को देने व प्रयोग की विधि मरीजों को समझाने की मेरी विधि से वह खासे चकित थे। एक दिन डॉ साहब ने कंपाउंडर का नाम लेकर कहा कि उसको इतना समझाने व इतने दिन काम करने के बाद भी वह मरीजों को इस ढंग से नहीं समझा पाता है आपने अकाउंट्स में होते हुये भी क्या कमाल कर दिया है! मैंने डॉ साहब को बताया कि मेरे नानाजी डॉ राधे मोहन लाल माथुर साहब निशुल्क होम्योपैथी इलाज करते थे उनके साथ काफी रहने के कारण बचपन से समझता रहा हूँ। डॉ साहब को मुझसे आत्मीयता हो गई और समय मिलने पर यों ही बातें करते रहते थे।
डॉ साहब ने दैनिक दवाओं की तीन श्रेणियाँ बना रखी थीं : ए बी सी । ए-धनवानों की दर, बी- मध्यम वर्ग की दर और सी- निर्धनों के लिए दर। एक ही दवा की कीमत व्यक्ति की हैसियत के अनुसार अलग-अलग लेते थे एवं एक सफाई कर्मचारी की बारह वर्षीय पुत्री जिसके दिल में छेद था का इलाज वह निशुल्क कर रहे थे। अर्थात वह ही सच्चे कम्युनिस्ट थे जिसके अनुसार प्रत्येक से उसकी क्षमतानुसार व प्रत्येक को उसकी आवश्यकतानुसार देना होता है। (जबकि एक शीर्षस्थ कम्युनिस्ट मिश्रा जी की नीति है कि दलितों व पिछड़ों से काम तो लो पर उनको कोई पद न दो )।
आगरा यूनिवर्सिटी के निसंतान हेड क्लर्क जी पी माथुर साहब की पत्नी से वह 10 गुना अधिक चार्ज लेते थे क्योंकि वह जानते थे कि उनको सस्ती दवा देने पर वह डॉ साहब को मूर्ख समझेंगी । डॉ मिश्रा जी ने मुझसे पूछा था कि क्या मैं उनको जानता हूँ ? मैंने स्पष्ट कह दिया था कि हाँ जानता तो हूँ परंतु उनका रहस्य नहीं बताऊंगा। डॉ साहब की क्लब के साथी और उनके मित्र श्याम मेहरा साहब जिनका होटल मुगल में प्रिंटिंग कार्य चलता था और जिनको तमाम चेक मेरे द्वारा बनाए गए भुगतान हुये थे और वह दवा के भुगतान की हैसियत में थे किन्तु उनकी पत्नी का इलाज निशुल्क करते थे। एक रोज़ श्याम मेहरा साहब ने अपने सिर में चक्कर होने की बात कही तो डॉ साहब ने मुझसे बोला कि माथुर साहब श्याम बाबू को बी जी की एक डोज़ दे दीजिये। मैंने सादी गोलियों(BLANK GLOUBLES) को पुड़िया बना कर दे दिया। थोड़ी देर बाद डॉ साहब ने मेहरा साहब से पूछा कि श्याम बाबू कुछ आराम मिला वह बोले चक्कर कुछ कम तो हो गए हैं तब डॉ साहब ने उनको कुछ देर और रुके रहने को कहा कि बिलकुल आराम मिलने पर ही कार ड्राईव करें। पाँच मिनट बाद नार्मल होने की बात कह कर वह चले गए।
मैंने डॉ मिश्रा जी से पूछा कि आपने BG- सादी गोलियेँ दिलवाईं तो भी मेहरा साहब को फायदा हो गया? डॉ साहब का जवाब था कि श्याम बाबू को हुआ ही कुछ नहीं था वह तो अपनी मिसेज को जतलाना चाहते थे कि वही नहीं बीमार हैं खुद श्याम बाबू भी बीमारी के बावजूद इतनी मेहनत करते रहते हैं तो उनको सादी गोली नहीं देते तो दवा क्या देते?
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एक बार जान-पहचान हो जाने पर डॉ मिश्रा जी ने यदा-कदा मिलते रहने को कहा था और मैं उनसे मिलता भी रहता था। जीवनी मंडी , आगरा से जब उन्होने अपना क्लीनिक घटिया रोड पर स्थानांतरित कर लिया था तो मेरे बाज़ार जाते समय उन्होने आवाज़ देकर बुलाया और कहा कि " माथुर साहब दिस इज़ यौर क्लीनिक ,यू आर आलवेज मोस्ट वेलकम " । उनको मैंने बाद में बता भी दिया था कि मैंने 'आयुर्वेद रत्न' किया है तथा मेरा RMP रेजिस्ट्रेशन भी है। इसलिए उनको और भी दिलचस्पी हो गई थी। 
जब कम्युनिस्ट कर्ता-धर्ता मिश्रा जी का संकीर्ण दृष्टिकोण  देखता हूँ  तब डॉ डी मिश्रा जी की याद तीव्रतर हो जाती है। 

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सोमवार, 13 अप्रैल 2015

कुछ भूली बिसरी यादें (भाग-1 ) --- विजय राजबली माथुर

(जब यह ब्लाग शुरू किया था तब इरादा यह था कि क्रमानुसार घटना क्रम का उल्लेख करता जाऊंगा। परंतु लिखते समय कुछ बातें ध्यान से छूट गईं जिनकी बाद में याद आई इसलिए अब यह प्रयास कर रहा हूँ कि उन छूटी हुई बातों को भी शामिल कर सकूँ ) 
शुक्रवार, 10 सितंबर 2010--- बरेली के दौरान:

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010


बरेली के दौरान


१९६२ में चीनी आक्रमण के दौरान सिलीगुड़ी नॉन फैमिली स्टेशन था अतः हम लोगों को शाहजहांपुर में नानाजी के घर रहना पड़ा.एक ही क्लास को दो शहरों में पढना पड़ा.डेढ़ वर्ष में ही बरेली छूट गया था.

http://vidrohiswar.blogspot.in/2010/09/blog-post_10.html

जब बाबूजी लखनऊ से बरेली ट्रांसफर होकर गए तो शुरुआत में अकेले ही गए थे और वहाँ जिन सज्जन की मदद से ठहरे व बाद में किराये पर मकान लेकर हम लोगों को ले गए वह बाला प्रसाद जी थे। वैसे तो बाबूजी के आफिस में और भी बहुत से लोग थे जो अच्छे थे किन्तु सिर्फ बाला प्रसाद जी का उल्लेख इसलिए कर रहा हूँ कि उनके एक दत्तक पुत्र की बारात में बाबूजी मुझे व छोटे भाई को भी ले गए थे। दरअसल वह पुत्र उनके पिताजी के एक कर्मचारी का था जिनकी मृत्यु के समय उस बालक की अवस्था मात्र 10 वर्ष थी और उसकी माँ का निधन पहले ही हो चुका था। मृत्यु से पूर्व उस बालक के पिता ने बाला प्रसाद जी को गहनों की एक पोटली सौंपते हुये उसका ख्याल रखने को कहा था। बाला प्रसाद जी ने उसे अपने पुत्रों के समान ही प्यार दिया,पढ़ाया-लिखाया और इंजीनियर बनवा दिया अपने खर्च पर और वह पोटली उसके विवाह के समय उसी को सौंप दी थी । चूंकि बाला प्रसाद जी वैश्य वर्ग के तेली समुदाय से संबन्धित थे और उस व्यक्ति को पुत्र घोषित करने के बावजूद उसकी शादी  उसी के कहार समुदाय की एक शिक्षिका से करवाई थी इसलिए आफिस के लोगों के कौतूहल पर उनको साथियों को यह रहस्य उजागर करना पड़ा था। 

शादी के समय बाला प्रसाद जी बरेली से ट्रांसफर हो चुके थे अतः बाहर से बारात लेकर आए थे। वह शिक्षिका हमारी छोटी बहन के स्कूल में पढ़ाती थीं और हमारे घर में बर्तन माँजने वाली मेहरी साहिबा की पुत्री थीं। माँ ने लड़की के लिए उसकी माँ को भेंट दी थी जबकि बाबूजी के साथ हम दोनों भाई उनके घर बाराती की हैसियत से भोजन करके आए थे। इस बात पर वह मेहरी साहिबा प्रसन्न हुईं थीं और जब उनकी पुत्री सुसराल से उनके घर आईं थीं तो माँ से मिलवाने हमारे घर लाईं थीं। वे दोनों ज़मीन पर ही बैठ रहीं थीं लेकिन माँ ने दोनों को चारपाई पर ही बैठाया था (हमारे घर पर जो दो कुरसियाँ थीं भी वे वैसी ही पैक थीं जैसी रेल से लखनऊ से आईं थीं)। वे लोग चारपाई पर बैठने में एतराज़ कर रहीं थीं किन्तु माँ ने ज़ोर देकर उनको चारपाई पर ही बैठवाया था। एक तो वह शिक्षिका बहन को पढ़ाती थीं दूसरे बाबूजी के साथी-मित्र की पुत्र-वधू अतः उनको ज़मीन पर नहीं बैठने दिया जा सकता था। 

अबसे 54 वर्ष पूर्व भी जबकि जाति-पांति और ऊंच-नीच काफी चलती थी हमारे माँ-बाबूजी उस दक़ियानूसी से दूर थे। इंसान और उसकी योग्यता की कद्र करना मैंने भी बचपन से ही अपने माँ- बाबूजी से ही सीखा है।

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