बुधवार, 22 सितंबर 2010

सिलीगुड़ी में सवा तीन साल------ विजय राजबली माथुर

हांलांकि बाबू जी तो १९६२ से १९६८ तक सिलीगुड़ी में पोस्टेड रहे लेकिन हम लोग ६४ से ६७ तक ही वहां रहे.चक्रवर्ती साःके आश्रमपाड़ा स्थित जिस मकान में हम लोग उतरे थे उसका एक कमरा पक्का व् दूसरा बांस की चटाई की दीवारों का था.छत टीन की थी.बारिश अधिक होने के कारण दोनों और ढलवा टीन की छतें होती थीं.जलवायु के प्रकोप से माँ को एक्जीमा हो गया तो बाबू जी के ऑफिस के एक S D O साः की पत्नी ने हम दोनों भाइयों से कहा की कूएँ से पानी भर के बहन को भी दो सब अपने -अपने कपडे अपने आप धोओ,सब्जी काट के रखो,आटा माड़ लो,जिससे ड्यूटी से आने पर बाबू जी पर अधिक भार न पड़े.इस प्रकार हम लोगों को आत्मनिर्भर रहने की आदत पड़ गयी.वर्षा ऋतू की छुट्टी के बाद जब स्कूल खुला तब दाखिले हुए.दिसंबर में वार्षिक परीक्षा के बाद ६५ में नवीं में आगये.गणित में कमजोर होने के कारण हेड मास्टर कैलाश नाथ ओझा साः ने मुझे साइंस नहीं दी.छुट्टी से लौटने पर साइंस टीचर जुगल किशोर मिश्रा जी ने मुझ से कोमर्स छोड़ कर साइंस लेने को कहा परन्तु मैंने संकाय नहीं बदला.स्कूल के सभी टीचर बहुत अच्छे थे,अच्छा पढ़ाते भी थे.
स्कूल के बारे में- हमारे स्कूल का नाम कृष्ण  माया मेमोरियल हाई स्कूल  था.उस में सुबह की पाली में प्राइमरी section चलता था.वस्तुतः वह पहले प्राइमरी स्कूल ही था.हेड मास्टर ओझा साः व वरिष्ठ टीचर पहले सिलीगुड़ी हाई स्कूल में पढ़ाते थे उनका वहां के हेड मास्टर व मेनेजर से विवाद हो गया था.इन लोगों ने हिंदी भाषी छात्रों को लेकर वह स्कूल छोड़ दिया और नेपाली भाषा के इस प्राइमरी स्कूल के सेक्रेट्री डाक्टर इंद्र बहादुर थापा की अनुमति से इसे हाई स्कूल बना दिया.डाक्टर ओझा साः आरा (बिहार) के थे वहां के कुछ छात्रों को यहाँ लाकर अध्यापक बना दिया जो खुद आगे पढ़ते हुए हम लोगों को बढ़िया सरल तरीके से पढ़ाते थे.इनमे से एक मिश्रा जी Pol .sc .के तथा नेपाली मूल के भीम सेन जी अंग्रेजी के प्रो.हो कर गोहाटी यूनिवर्सिटी चले गए.सभी छात्रों को दुःख हुआ लेकिन उनका भविष्य उज्जवल हुआ इसकी खुशी भी मनाई.सेकिंड हेड मास्टर वैद्यनाथ शास्त्री जी भी ३ माह भोपाल यूनिवर्सिटी में deputation पर पढ़ा कर लौट आये.स्कूल का मुख्य फंक्शन वसंत पंचमी पर सरस्वती पूजा के रूप में होता था.हम लोगों के सामने ही हेड मास्टर साः को P.hd .करने पर doctrate भी मिल गयी थी उन्हें सम्मानित किया गया.
डाक्टर के.एन.ओझा--हमारे हेड मास्टर साः भी द्वितीय विश्व युद्ध में सेना में रहे थे-वारेंट औफिसर के रूप में.उन्होंने बताया था उनके बैच में २० लोग भर्ती हुए थे १९ मारे गए.वह आगरा में C O D में तैनात रहे इसीलिए बच गए थे.निराला की ''वर दे वीणा वादिनी वर दे'' कड़क आवाज़ में सस्वर पाठ उनके ओज को दर्शाता था.पहले दिन कोई छात्र उनकी कसौटी पर खरा नहीं उतरा.दुसरे दिन मेरे साथ एक अन्य को उन्होंने पास किया.तीसरे दिन 3 को.६० छात्रों के बीच सिर्फ हम ५ छात्र ही निराला की कविता के लिए उपयुक्त पाए गये.डाक्टर ओझा ने कई पुस्तकें भी लिखीं थी;जब हम लोगों के स्कूल में लाइब्रेरी का प्रबंध हो गया तो उन्होंने कुछ पुस्तकें भेंट कर दीं.
भारत पाक संघर्ष--जी हाँ १९६५ की लड़ाई को यही नाम दिया गया था.टैंक के एक गोले की कीमत उस समय ८० हज़ार सुनी थी.पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना साः की बहन फातिमा जिन्ना को जनरल अय्यूब खान ने चुनाव में हेरा फेरी करके हरा भी दिया और उनकी हत्या भी करा दी परन्तु जनता का आक्रोश न झेल पाने पर भारत पर हमला कर के अय्यूब साः हमारे नए प्रधान मंत्री शास्त्री जी को कमजोर आंकते थे.यह पहला मौका था जब शास्त्री जी की हुक्म अदायगी में भारतीय फ़ौज ने पाकिस्तान में घुस कर हमला किया था.हमारी लड़ाई रक्षात्मक नहीं आक्रामक थी.पाकिस्तानी फौजें अस्पतालों और मस्जिदों पर भी गोले बरसा रही थीं जो अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन था.लाहौर की और भारतीय फौजों के क़दमों को रोकने के लिए पाकिस्तानी विदेशमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो सिक्योरिटी काउन्सिल में हल्ला मचाने लगे.हवाई हमलों के सायरन पर कक्षाओं से बाहर निकल कर मैदान में सीना धरती से उठा कर उलटे लेटने की हिदायत थी.एक दिन एक period खाली था,तब तक की जानकारी को लेखनीबद्ध कर के (कक्षा ९ में बैठे बैठे ही) रख लिया था जिसे एक साथी छात्र ने बाद में शिक्षक महोदय को भी दिखाया था.यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ:--
''लाल बहादूर शास्त्री'' -
खाने को था नहीं पैसा
केवल धोती,कुरता और कंघा ,सीसा
खदरी पोशाक और दो पैसा की चश्मा ले ली
ग्राम में तार आया,कार्य संभालो चलो देहली
जब खिलवाड़ भारत के साथ,पाकिस्तान ने किया
तो सिंह का बहादुर लाल भी चुप न रह कदम उठाया-
खदेड़ काश्मीर से शत्रु को फीरोजपुर से धकेल दिया
अड्डा हवाई सर्गोदा का तोड़,लाहोर भी ले लिया
अब स्यालकोट क्या?करांची,पिंडी को कदम बढ़ाया-
खिचड - पिचड अय्यूब ने महज़ बहाना दिखाया
''युद्ध बंद करो'' बस जल्दी करो यु-थांद चिल्लाया
चुप न रह भुट्टो भी सिक्योरिटी कौंसिल में गाली बक आया
उस में भी दया का भाव भरा हुआ था
आखिर भारत का ही तो वासी था
पाकिस्तानी के दांत खट्टे कर दिए थे
चीनी अजगर के भी कान खड़े कर दिए थे
ऐसा ही दयाशील भारतीय था जी
नाम भी तो सुनो लाल बहादुर शास्त्री जी
आज जब भी सोचता हूँ तो यह किसी भी प्रकार से कविता नज़र नहीं आती है पर तब युद्ध के माहोल में किसी भी शिक्षक ने इस में कोई गलती नहीं बताई.
जब जनरल चौधरी बाल बाल बचे-बरसात का मौसम तो था ही आसमान में काला,नीला,पीला धुंआ छाया हुआ था.गर्जन-तर्जन हो रहा था.हमारे मकान मालिक संतोष घोष साः (जिनकी हमारे स्कूल के पास चौरंगी स्वीट हाउस नामक दूकान थी)की पत्नी माँ को समझाने लगीं कि शिव खुश हो कर गरज रहे हैं.आश्रम पाड़ा में ही यह दूसरा मकान था.उस वक़्त बाबू जी बाग़डोगरा एअरपोर्ट पर A G E कार्यालय में तैनात थे.उन्होंने काफी रात में लौटने पर सारा वृत्तांत बताया कि कैसे ५ घंटे ग्राउंड में सीना उठाये उलटे लेटे लेटे गुज़ारा और हुआ क्या था?
दोपहर में जब हल्ला मचा था तब मैं और अजय राशन की दूकान पर थे,शोभा बाबू जी के एक S D O साः के घर थी,घर पर माँ अकेली थीं.जब हम लोग राशन ले कर लौटे तब शोभा को बुला कर लाये.पानी बरस नहीं रहा था,आसमान काला था,लगातार धमाके हो रहे थे.बाबू जी एयर फ़ोर्स के अड्डे पर थे इसलिए माँ को दहशत थी,मकान मालकिन उन्हें ढांढस बंधा रही थीं.माँ तक उन लोगों ने पाकिस्तानी हमले की सूचना नहीं पहुँचने दी थी.
बाबू जी ने बताया कि चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ जनरल जतिंद्र नाथ चौधरी बौर्डर का मुआयना करने दिल्ली से चले थे जिसकी सूचना जनरल अय्यूब तक लीक हो गयी थी.अय्यूब के निर्देश पर पूर्वी पाकिस्तान से I A F लिखे कई ज़हाज़ उन्हें निशाना बनाने के लिए उड़े.इधर बागडोगरा से बम वर्षक पूर्वी पाकिस्तान जाने के लिए तैयार खड़े थे. जनरल चौधरी के आने के समय यह घटना हुई.उधर जनरल चौधरी को हांसीमारा एअरपोर्ट पहुंचा दिया गया क्योंकि हमारी फौजों को पता चल गया था कि पाक को खबर लीक हो गयी है.बागडोगरा एअरपोर्ट का इंचार्ज I A F लिखे पाकिस्तानी ज़हाज़ों पर फायर का ऑर्डर नहीं कर रहा था और वे हमारे बम लदे ज़हाज़ों पर गोले दाग रहे थे लिहाज़ा सारे बम जो पाकिस्तान पर गिरने थे बागडोगरा एअरपोर्ट पर ही फट गये और आसमान में काला तथा रंग बिरंगा धुआं उन्हीं का था.डिप्टी इंचार्ज एक सरदार जी ने अवहेलना करके I A F लिखे पाक ज़हाज़ों पर फायर एंटी एयरक्राफ्ट गनों से करने का ऑर्डर दिया तब दो पाक ज़हाज़ बमों समेत नष्ट हो गये दो भागने में सफल रहे.जनरल चौधरी को सीधे दिल्ली लौटा दिया गया और उनकी ज़िन्दगी जो तब पूरे देश के लिए बहुत मूल्यवान हो रही थी बचा ली गयी.
मेले और प्रदर्शनी-युद्ध के बाद दुर्गा पूजा के पंडालों में अब्दुल हमीद आदि शहीदों की मूर्तियाँ भी सजाई गयीं टूटे पाकिस्तानी पैटन टैंकों की भी भी झलकियाँ दिखाई गयीं.काली पूजा के समय भी युद्ध की याद ताज़ा की गयी.
अगली किश्त में जारी.....
Typist-Yashwant Mathur
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फेसबुक पर प्राप्त टिप्पणियाँ :
AAI द्वारा बागडोगरा एयरपोर्ट को पूर्णिया भेजने का निर्णय ---
30 जूलाई 2015 :


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सोमवार, 20 सितंबर 2010

शाहजहाँपुर में---(प्रथम चरण)

 बाबु जी का तबादला तो सिलीगुड़ी हुआ और हम लोगों को नाना जी के पास शाहजहांपुर रहना था अतः NOVEMBER के माह में किस  स्कूल में दाखिला मिलता?इसलिए नाना जी तलउआ स्थित विश्वनाथ जू.हा.स्कूल के प्रबंधक से मिले जिनकी माँ कभी हमारे नाना जी के बचपन में उन के घर खाना बनाया करती थीं.उन लोगों ने अभावों में शिक्षा प्राप्त की थी अतः उन के बड़े भाई ने सरकारी अधिकारी बनते ही शाहजहांपुर में उस स्कूल की स्थापना की थी और नाम शिव उपासक होने के कारण ही ऐसा रखा था.उनकी हिदायत थी की उनके विद्यालय से किसी को लौटाया न जाए.विद्यालय के प्रधानाचार्य शर्मा जी जो पहले सरदार पटेल इंटर कोलेज के प्रिंसिपल थे मात्र आनरेरियम पर स्कूल देखते थे उनकी पूर्व छवि बहुत दबंग की थी परन्तु बहुत अच्छा पढ़ते थे.उनकी शक्ल देखते ही शोरगुल बंद हो जाता था.मेरी ही तरह कक्षा ६ में निर्मल कुमार श्रीवास्तव भी देर से एडमिट हुआ था उस के पिता जी का दरोगा के रूप में  तबादला लखनऊ से शाहजहांपुर हुआ था वह क्लास में स्वच्छंद घूमता था,पढने में दिलचस्पी नहीं रखता था.एक दिन सेकिंड हेड मास्टर साः (अचल बिहारी बाजपेयी जी)ने उसे आड़े हाथ लेते हुए कहा-निर्मल यह अमीनाबाद बाज़ार नहीं है अगर तुम पढना नहीं चाहते तो तुम्हारे पिता जी को बुला कर तुम्हारा नाम कटवा लेने को कहेंगे.उस के बाद से वह ठीक हो गया,पिता से शिकायत के नाम पर सहम गया था.आज तो पुलिस में सिपाही की बच्चे भी पूरे रौब -दाब में रहते हैं.
मैं अन्ताक्षरी वगैरह में भाग लेता था इस लिए बाजपेयी जी ने जिला वाद-विवाद प्रतियोगिता में पक्ष में बोलने के लिए मेरा भी चयन किया था.मुझे व विपक्ष में बोलने वाले साथी को लेकर वह गवर्नमेंट हा.स्कूल.रिक्शा से ले गए थे.दोनों ही प्रतियोगिता में स्थान नहीं बना पाए,किन्तु उन्होंने मुझे आश्वासन दिया था कि,कोई बात नहीं अगले साल फिर मौका देंगे और वाकई अगले साल फिर उन्होंने मेरा नाम पक्ष में बोलने के लिए रखा,विषय-वस्तु उन्होंने ही उपलब्ध करायी थी.साड़े चार मिनट में मैं बोल कर जब अपने स्थान की ओर आ रहा था तो उन्होंने धीरे से कहा ''शाबाश बैठ जाइये''.इस बार जिला स्तर पर मुझे प्रथम स्थान मिला था.स्कूल का वार्षिक समरोह शिवरात्रि पर होता था,उस अवसर पर मुझे जय शंकर प्रसाद की ''कामायनी''तथा शील्ड मिली.शील्ड तो एक माह बाद स्कूल में जमा हो गयी-कामायनी को ले कर माँ से उन के चचेरे भाई  नारायण शंकर माथुर साहब ने कहा की ७ वीं कक्षा में विजय को B A स्तर की किताब मिल गयी वह क्या समझेगा?(आगे सिलीगुड़ी में प्राचार्य ओझा जी ने एक बार बताया कि कामायनी के एक छंद को लेकर प्रतिष्ठित कवियों में विवाद छिड़ गया कि इसका यह अर्थ है -वह अर्थ है-फैसले के लिए जब वे कवि जय शंकर प्रसाद के पास पहुंचे तो उन्होंने उत्तर दिया -उस समय क्या सोच कर लिखा था मुझे याद नहीं है आप लोग अपने अपने हिसाब से मतलब निकाल लें)तो छायावादी रहस्यवादी काव्य का अर्थ समझना तो B A में भी संभव नहीं था.बहरहाल मामा जी कामायनी पुस्तक पढ़ने को ले गए फिर पूरा पढ़ कर लौटा दिए 
छोटा भाई खेल-कूद में भाग लेता था उसे किसी खेल का तृतीय पुरस्कार मिला था;मेरी रुचि खेलों में नहीं थी.इंटरवल में लड़के कबड्डी आदि खेलते थे मैं मूक दर्शक ही रहता था.एक कथा वाचक का पुत्र मेरी ही ७ वीं कक्षा में था काफी बलशाली था सब खेलों में आगे था.सुना था कि रोज़ भगवा झंडे के सामने कसरत करता था.उसी की टीम रोज़ ही जीत ती थी.मैं उसका एकाधिकार  तोडना चाहता था और दस पंद्रह दिन उसके खेल और दांव पेंच पर कड़ी नज़र रखने के बाद एक दिन उसकी विपक्षी टीम में शामिल हो गया.कबड्डी -कबड्डी बोल कर खेलते थे.हमारी टीम के जब सभी लोग आउट हो गए अकेला मैं ही बचा तो वह पंडित जी का बेटा बड़ी शान से आया,मैंने पाले के आखिरी छोर तक पीछे हटते हुए उसे आने को बाध्य किया और तब पकड़ लिया,हांलांकि उसने ज़मीन पर गिरा भी दिया और लेटे लेटे  ही खींचता व बोलता रहा पर मेरी पकड़ छुड़ा कर भाग न सका और आखिर हार ही गया हांलांकि उसके आउट होने पर भी टीम उसी की जीती लेकिन बात प्रधानाचार्य शर्मा जी तक भी पहुँच गयी की आज ताकतवर पंडित जी कबड्डी में परास्त हो गए.शर्मा जी हमें इतिहास पढ़ाते थे उस लड़के से पूछा कि आज कमजोर कैसे पड़ गए -जवाब में वो सिर्फ हंस दिया,मेरी उससे कोई लड़ाई नहीं थी वह पीछे बैठता था और मैं आगे.शर्मा जी इतिहास की पुस्तक का वाचन मेरे अलावा एक और लड़के से ही करवाते थे और बीच बीच में वाक्यों को पेंसिल से UNDER लाइन कराते  थे.पूरे पाठ के बाद कहते थे इस para से उस para  तक प्रश्न (१) का जवाब इसी प्रकार सारे प्रश्नों का हल चुटकियों में कर देते थे-इतिहास पर गज़ब की पकड़ थी उनकी.
बाजपेयी जी संस्कृत पढ़ाते थे और मैं उस में कमजोर था.पहले बिना बताये टेस्ट होते थे एक दिन अचानक हुए टेस्ट में मुझे शून्य मिला.नाना जी के साथ बाज़ार हम दोनों भाई जाते रहते थे.नाना जी जो भी अध्यापक बाज़ार में दीख जाते उन से हम लोगों का ब्यौरा मांगते थे.एक दिन बाजपेयी जी ने शून्य की बात कह कर संस्कृत पर जोर देने को कहा तो नाना जी ने उन से कहा इस के पिता तो बंगाल में हैं वैसे भी हम लोग उर्दू पढ़े हैं संस्कृत आप ही देख लीजिये.  तब से बाजपेयी जी को मुद्दा मिल गया तुम्हारे नाना जी ने अधिकार दे दिया है जब तक संस्कृत का पाठ ठीक न दिखादुं वह अपने साथ मुझे दूसरे कक्षाओं में ले जाने लगे और मेरी कक्षा के दूसरे विषय छूट जाते थे-लिहाज़ा खुद ही संस्कृत पर ध्यान बढ़ा दिया.आज श्लोक आदि संस्कृत  पढ़ बोलकर हवन आदि कराने  में दिक्कत नहीं होती उस के लिए बाजपेयी जी की सख्ती के लिए आभारी हूँ.
नाना जी का घर (भारद्वाज कोलोनी में स्टेशन और टाउन हाल के मध्य)रेलवे लाइन के किनारे था.तमाम रेलों का आवागमन देखते  और स्टेशन  भी घूमने जाते थे तब यों ही टहलने पर पाबंदी नहीं थी.लाइन उस पार झाड़ियों में किसी पेड़ के पत्ते जला कर उस की भस्म शहद में मिलाकर देने से खांसी में लाभ होता था.हमारी एक मौसी (माँ की चचेरी बहन )जो मुझ से बहुत छोटी थीं उन्हें वह दवा दी जाती थी.पत्ते पडोसी के चपरासी को पहचान थे वही लाता था.एक दिन वह चपरासी कहीं बाहर गया था और नानी जी परेशान थीं,मैंने माँ से कहा की मैं वो पत्ते ला सकता हूँ और ला कर दे दिए-नानी जी ने पहचान कर कहा की ठीक हैं पर तुम झाड़ियों के बीच से चुन कर कैसे लाये मैं उस चपरासी के आने जाने झाड़ी में घुसने और पत्ते चुनने पर कड़ी निगाह रखता था उस का लाभ हो गया.माँ की चाची का घर पास ही था.
नाना जी के घर में कूआं था.हम लोग जब नाना जी घर पर नहीं होते थे कूएँ से पानी भर कर रख देते थे और चूल्हे के लिए लकड़ी भी चीर देते थे.नाना जी माँ से कहते थे बच्चों से क्यों काम लेती हो कोई कूएँ में गिर गया तो?कूएँ के पास कटहल का ९० साल पुराना पेड़ था.फल नहीं लगता था और नाना जी पेड़ काटने के खिलाफ थे.माँ और हम लोग पेड़ के नीचे कपडे धोते थे साबुन का भी पानी जाता था उसमे फिर से कटहल लगने लगे सभी को आश्चर्य हुआ!
चीन से लड़ाई तो बहुत जल्दी निबट गयी थी.सिलीगुड़ी फॅमिली स्टेशन डिक्लेयर हो गया.दोनों भाई नाना जी के पास रह गए और माँ छोटी बहन को लेकर सिलीगुड़ी चलीं गयीं.नाना जी का सख्त हुक्म था जब तक माँ वापिस न आये तुम लोग न कूएँ से पानी भरोगे न लकड़ी चीरोगे.बाज़ार नाना जी के साथ अक्सर एक ही भाई जाता था और दूसरा कूएँ से पानी भरकर लकड़ी चीर देता था.फिर नाना जी दोनों को जबरदस्ती एक साथ ले जाने लगे.वह मरीजों को मुफ्त दवा देते थे और जब ज्यादा मरीज़ हुए तभी हम लोग दांव लगा कर पानी कूएँ से भर डालते थे और थोड़ी थोड़ी लकड़ी चीर देते थे.नाना जी कहते थे तुम्हारे माँ बाप ने पढने के लिए छोड़ा है काम करने के लिए नहीं-हमें लगता था बुढापे में नाना जी पर हम लोगों का काम बढ़ गया है मदद करनी चाहिए सो उनकी बात न मान कर भी मदद करते थे.
बाबू जी शायद माँ और बहन को पहुंचाने के लिए सिलीगुड़ी से आये हुए थे-माँ के चचेरे भाई एन  एस मामजी  लगभग रूआंसे हो कर बोले-जीजा जी प्रेसिडेंट कैनेडी शॉट डेड.बाबु जी भी थोड़ा उदास हो गए.चीन के हमले के समय कैनेडी ने मदद का प्रस्ताव रखा था जिसे नेहरु जी ने ठुकरा दिया था.कैनेडी के प्रति देश में सहानुभूति थी.
गर्मियों की छुट्टी के बाद बाबु जी हम सब को सिलीगुड़ी ले जाने हेतु आने वाले थे बाबा जी ने गाँव बुलाया था. वहां  से २७ मई १९६४ को लखनऊ भुआ के पास जाना  था जब तक चारबाग़ पहुंचे नेहरु जी के निधन की सूचना फ़ैल गयी थी बाज़ार आदि बंद होने लगे थे.स्टेशन पर बड़े फुफेरे भाई आये थे. 
जिस दिन हम लोगों को सिलीगुड़ी ट्रेन से जाना था उसी दिन नेहरु जी का अंतिम संस्कार होना था.बड़ी मुश्किल से स्टेशन तक के लिए तांगा का प्रबंध हो पाया था.भुआ आदि स्टेशन पहुंचाने नहीं जा पाए.नाना जी जो कभी किसी की मोटर साईकिल पर नहीं बैठे और कोई वाहन न होने के कारण मामा जी के साथ विक्की पर बैठ कर स्टेशन पहुंचाने आये थे.तब मामा जी सेकिंड हैण्ड विक्की का प्रबंध कर पाए थे.आज के प्रो.स्वंय को I A S के समकक्ष समझते हैं.
ट्रेन छोटी लाइन की थी-अवध-तिरहउत मेल.तब प्रत्येक डिब्बे का कोच कंडक्टर रात को डिब्बे में ताला बंद कर लेता था और स्टेशन पर ही खोलता था.आज की तरह एक ही कंडक्टर कई कोच नहीं देखता था.तीसरे दिन ट्रेन ने सिलीगुड़ी पहुंचा दिया था.शाहजहांपुर मेरठ जाने से पहले फिर एक वर्ष पढ़े थे वह सब द्वितीय चरण में.उससे पहले बंगाल की बातें आएँगी. 
Typist -यशवन्त माथुर

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शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

बरेली के दौरान ---विजय राजबली माथुर

बरेली कैंट में गोला बाज़ार में हम लोग रहते थे और रुक्स प्राइमरी स्कूल से पांचवी पास कर रुक्स हायर सेकण्ड्री स्कूल से छठवीं में पढ़ रहा था तो अजय प्राइमरी स्कूल में ही था.एक बार अफवाह फैली की प्राइमरी स्कूल के हैडमास्टर ने किसी लड़के को मुर्गा बना कर उसकी पीठ पर १०-१२ ईंटें रखकर स्कूल के गेट के बाहर धूप में सजा दी जिस कारण उसके नाक-मुहं से खून बहने लगा.हायर सेकण्ड्री स्कूल के वह बच्चे जिनके छोटे भाई प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे अपनी-अपनी क्लास छोड़ कर वहां दौड़ पड़े उनमे मैं भी शामिल हो गया.प्रा.स्कूल के सेकंड हेड मास्टर रमजान अहमद साःने अपने हेड मास्टर इशरत अली साः की जम कर पिटाई की और पुलिस के हवाले कर दिया तथा स्कूल में छुट्टी करा दी.घर पर अजय को सुरक्षित देख कर फिर से अपनी क्लास में साथियों के साथ पहुच गए.रमजान अहमद साः को छावनी बोर्ड ने तरक्की दे कर अन्य स्कूल में हेड मास्टर बना दिया और इशरत अली साः को पद से गिरा कर अन्य स्कूल में सेकंड हेड मास्टर बना दिया.इस स्कूल में अवस्थी जी को हेड मास्टर बना दिया.हमारे उस स्कूल में रहने के दौरान भी रमजान अहमद साः बहुत अच्छा पढ़ाते थे,बच्चों के प्रति उनका व्यवहार बहुत अच्छा था,इसलिए उनकी तरक्की की बात से ख़ुशी हुई थी.

हमारे हायर सेकण्ड्री स्कूल में सालाना प्रोग्राम के के समय लड़कियों द्वारा एक नाटक प्रस्तुत किया गया था जिसमे दो भूमिकाएं याद हैं-(१) अमर सिंह तो मर गया (२)लक्ष्मी हो कर करें मजूरी.

बरेली में पुराने टायर से बनी चप्पलों का रिवाज़ तब था.बाबू जी ने वे चप्पलें सफ़र के लिए लीं थीं.मामाजी का पथरी का लखनऊ में ऑपरेशन हुआ था.बउआ तो शोभा को लेकर मामा जी के घर न्यू हैदराबाद रहीं थीं.बाबू  जी अजय व् मुझे लेकर भुआ के घर सप्रू मार्ग रुके थे.लौटते में लाखेश भाई साः.ने बाबू  जी से वे पुरानी चप्पलें ले लीं थीं.ट्रेन में रात किसी ने बाबू  जी के नए जूते भी चुरा लिए तो बरेली कैंट से गोला बाज़ार तक बाबू  जी को बिना जूता,चप्पल पहने ही आना पड़ा .

पास के गाँव चन्हेटी में साप्ताहिक पैंठ लगती थी जिसमे दोनों भाई बाबू  जी के साथ सब्जी लेने जाते थे.एक बार जब बाबू जी दरियाबाद से होकर लौटे थे तो दोनों भाई सुबह छै बजे चन्हेटी हाल्ट पर उन्हें लेने भी गए थे.जिस दिन हमारे स्कूल का वार्षिकोत्सव था हम लोगों को ट्रेन से मथुरा जाना था.
बउआ की इच्छा बाँके बिहारी मंदिर वृन्दावन जाने की थी और उन्होंने अपने मिले-मिलाए रु.बाबूजी को टिकट वास्ते दिए थे.३-४ दिन वृन्दावन और मथुरा रह कर मंदिर घूम कर जब लौट कर कैंट स्टेशन से घर आरहे थे;रिक्शा पर ही बाबूजी के किसी साथी ने सूचना दी कि उनका तबादला सिलीगुड़ी हो गया है.१९६२ में चीनी आक्रमण के दौरान सिलीगुड़ी नॉन फैमिली स्टेशन था अतः हम लोगों को शाहजहांपुर में नानाजी के घर रहना पड़ा.एक ही क्लास को दो शहरों में पढना पड़ा.डेढ़ वर्ष में ही बरेली छूट गया था.

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गुरुवार, 9 सितंबर 2010

लखनऊ की कुछ और झीनी यादें --- विजय राजबली माथुर

(यों तो १९७३ में मेरठ से ही मैं साप्ताहिक अख़बारों में लिख रहा था,लखनऊ आकर ब्लॉग के माध्यम से लखनऊ से सम्बंधित से कुछ और लोगों से संपर्क हुआ तो लखनऊ में बचपन की कुछ और यादों को लिखने का पक्का विचार बना अन्यथा बरेली के सम्बन्ध में अधूरे लेखन को पूरा करना था.मेरी पत्नी पूनम कई दिनों से इसे आगे बढाने को कह रहीं थीं,लेखन में उनका पूरा सहयोग और प्रेरणा रहती है.उनके पिता जी पटना के श्रीवास्तव परिवार के स्व.विलास पति सहाय साः की सलाह पर मैंने ज्योतिष को प्रोफेशन बनाया था जिनके हमारे आगरा निवास पर हवन करते हुए फोटो 'क्रन्तिस्वर' पर चस्पा है,चूंकि वह गणित के माहिर थे अतः उन्होंने ज्योतिष के महत्त्व को ठीक से समझ लिया था.)
बात शायद ५९ या ६० की रही होगी;अजय और मैं बाबू  जी के साथ  साईकिल से ६-सप्रू मार्ग भुआ के घर से लौट रहे थे.बर्लिंगटन होटल के पास पहुंचे ही थे की पता चला नेहरु जी आ रहे हैं.बाबू  जी ने प्रधान मंत्री को दिखाने के विचार से रुकने का निर्णय लिया जबकि घर के पास पहुच चुके थे.नेहरु जी खुली जीप में खड़े होकर जनता का अभिवादन करते और स्वीकार करते हुए ख़ुशी ख़ुशी अमौसी एअरपोर्ट से आ रहे थे.आज जब विधायकों,सांसदों तो क्या पार्षदों को भी शैडो के साए में चलते देखता हूँ तो लगता है कि नेहरु जी निडर हो कर जनता के बीच कैसे चलते थे? जनता उन्हें क्यों चाहती थी? हुसैनगंज चौराहे पर मेवा का स्वागत फाटक बनवाने वाले चौरसिया जी का भतीजा मेरे क्लास में पढता था.नेहरु जी की सवारी जा चुकी थी और जनता आराम से मेवा तोड़ कर ले जा रही थी कहीं कोई पुलिस का सिपाही नहीं था और फ़ोर्स भी तुरंत हट चूका था.यह था उस समय के शासक और जनता का रिश्ता.आज क्या वैसा संभव है?हुसैनगंज चौराहे पर ही मुहर्रम का जुलूस या गुड़ियों का मेला दिखाने भी बाबु जी ले जाते थे.इक्का-दुक्का सिपाही ही होते होंगे आज सा भारी पुलिस फ़ोर्स तब नज़र नहीं आता था.
विधान सभा पर २६ जनवरी को गवर्नर विश्वनाथ दास द्वारा ध्वजारोहण भी बाबू  जी ने साईकिल के कैरियर और गद्दी पर दोनों भाइयों को खड़ा करके आसानी से दिखा दिया था क्या आज वैसा संभव है? आज तो साईकिल देखते ही पुलिस टूट पड़ेगी.उस समय तो एक निजी विवाह समारोह में भी विधान सभा के लॉन में एक चाय पार्टी में बाबा जी के साथ शामिल होने का मौका मिला था.वह समारोह संभवतः राय उमानाथ बली के घर का था.आज तो उस छेत्र में दो लोग दो पल ठहर भी जाएँ तो तहलका मच जायेगा.यह है हमारे लोकतंत्र की मजबूती !
न्यू हैदराबाद से पहले तो मामा जी खन्ना विला में रहते थे जिसे स्व.वीरेन्द्र वर्मा ने किराए पर ले रखा था और मामा जी वर्मा जी के किरायेदार थे.वर्मा जी तब संसदीय सचिव थे और उनके पास रिक्शा में बैठ कर दो मंत्री चौ.चरण सिंह और चन्द्र भानु गुप्ता अक्सर आते रहते थे.तब यह सादगी थी और आज के मंत्री.......? बाद में मामा जी वहां से शिफ्ट हो गए जिसमे पहले सेन्ट्रल एकसाइज़ इंस्पेक्टर उनके साले श्री वेद प्रकाश माथुर रहते थे. 
घर के पीछे इसी पार्क के सामने मुझे लिए उनका (मामा जी का) फोटो :

वेद मामाजी की मोटर साईकिल पर मुझे बैठाये सरोज मौसी (माईंजी की बहन व डॉ राजेन्द्र बहादुर श्रीवास्तव साहब की पत्नि ) उनके घर के आगे पुलिस लाईन की तरफ वाली सड़क पर। 

इसी पार्क में बचपन में खेलने का अवसर मिला है.१९६० की बाढ़ में मामा जी का घर तीन तरफ से पानी से घिर गया था.कई दिन वे लोग वहीँ घिरे रहे और पानी उतरने पर ही निकल सके वहां नाव तक चली थी.हमारा घर हुसैनगंज में नाले से सटा था लेकिन हमलोग बाढ़ से बचे हुए थे बल्कि भुआ का पूरा परिवार हमारे ही घर में आकर रहा था.बाढ़ उतरने के बाद ही नाना जी ने आकर कुशलता की सूचना दी थी बल्कि जिस दिन बाढ़ आने वाली थी वह आकर बउआ को बता गए थे की बाढ़ आ रही है कई दिन बाद मिल पाएंगे.तब उनके सामने वाले पार्क में वोट भी पड़ते थे.क्या आज खुले में मतदान स्थल बन सकता है?बातें तो बहुत सी धुंधली यादों में हैं.लखनऊ वापिस आने पर लखनऊ से सम्बंधित पुराने लोगों से ये ब्लॉग परिचित कराता जा रहा है यही बहुत है.


नोट-रोमन से देवनागरी में टाइप होने के कारन इस ब्लॉग में वर्तनी की त्रुटियाँ होना संभव है.पाठक यथा स्थान कृपया सुधार कर लें.


Typist -यशवंत (जो मेरा मन कहे......)

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शनिवार, 14 अगस्त 2010

लखनऊ वापसी क्यों ? --- विजय राजबली माथुर

१९७८ में आगरा में मकान ले कर बस चुकने के बाद क्या केवल पुत्र के आग्रह पर ही वापिस आया अथवा लखनऊ से लगाव पहले से ही था यह बताना भी बेहद जरूरी है.आगरा में १९८६ में राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय भाग लेना शुरू किया और शहर छोड़ने तक २३ वर्षों में सिर्फ एक बार ही दिल्ली प्रदर्शन में गया जबकि लखनऊ प्रदर्शन के हर अवसर का उपयोग लखनऊ आने में किया.एक तो लखनऊ खुद का जन्म स्थान था दूसरे बाबूजी का बचपन और शिक्षा-दीक्षा लखनऊ में होने के कारण लखनऊ का ज़िक्र होता ही रहता  था.डाली गंज में बाबू  जी ने फूफा जी के प्लाट के बगल में मकान बनवाने के लिए ज़मीन भी खरीदी थी लेकिन दोनों ही मकान न बना सकेऔर ज़मीन बेचनी पड़ी.
बाबूजी कालीचरण हाईस्कूल  में पढ़ते थे,खेल कूद में सक्रिय थे.टेनिस में सीनियर ब्वायज एसोसियेशन  के पंडित अमृत लाल नागर जी  के साथ भी बाबूजी खेले हैं और पत्रकार राम पाल सिंह जी  भी बाबूजी के खेल के साथी थे.का.भीखा  लाल जी  तो बाबू  जी के रूममेट  और सहपाठी थे  जो जब तहसीलदार बने   तो बाबूजी का उनसे संपर्क टूट गया.एक प्रदर्शन के दौरान का.भीखा  लाल  जी से मैने भेंट की तो उन्होंने शिकायत भी की कि वह उनसे क्यों नहीं मिलते लेकिन उन्होंने संतोष भी जताया था कि वह खुद न मिले लेकिन अपने बेटे को तो भेज दिया.पुराने लोगों में बेहद आत्मीयता थी.१९३९ में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान बाबू जी तो फ़ौज में चले गए थे; भीखा  लाल जी तहसीलदार बन गए थे फिर नौकरी छोड़ कर राजनीती में आगये थे और उत्तर प्रदेश भारतीय कम्मुनिस्ट पार्टी के सचिव भी बने.युद्ध समाप्त होने के बाद बाबू जी खेती देखने के विचार से दरियाबाद आ गये थे.लेकिन वहां भाइयों का अनमना व्यवहार देख कर खिन्न हो गए.सात साल लड़ाई के दौरान पूरा वेतन बाबूजी ने बाबा जी को भेजा उसका भी कोई रिटर्न  नहीं मिला.लड़ाई के दौरान बाबूजी की यूनिट  के कंपनी कमांडर ने लखनऊ में लेफ्टिनेंट कर्नल  हो कर C .W. E. बनने पर बाबू  जी से फिर से नौकरी करने को कहा जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया.इस प्रकार हम लोगों को लखनऊ में जन्म से ही रहने का अवसर मिला.जिन लोगों का ,जिन लोगों कि संतानों का बउआ – बाबूजी के प्रति बर्ताव ठीक नहीं रहा उनका कोई जिक्र अपने संस्मरणों में नहीं कर रहा हूँ. जो लोग मेरे माता-पिता के साथ ठीक-ठाक रहे सिर्फ मुझे ही ठुकराया है उनका उल्लेख जरूर किया जा रहा है५ या ६ वर्ष का रहा होऊंगा तब बड़े मंगल पर अलीगंज मंदिर में मैं  भीड़ में छूट गया था.बउआ महिला विंग से गयीं.नाना जी ने अजय को गोदी ले लिया और बाबूजी शोभा को गोदी में लिए थे मैने बाबूजी का कुर्ता  पकड़ रखा था.पीछे से भीड़ का धक्का लगने पर मेरे हाथ से बाबूजी का कुर्ता छूट गया और मैं कुचल कर ख़तम ही हो जाता अगर एक घनी दाढ़ी वाले साधू मुझे गोद में न उठा लेते तो.वे ही मुझे लेकर बाहर आये और सब को खोजने के बाद एक एकांत कोने में मुझे रेलिंग पर बैठा कर खड़े रहे उधर नाना जी और बाबू जी भी अजय और शोभा को बउआ के सुपुर्द कर मुझे ढूंढते हुए पहुंचे और खोते-खोते मैं बच गया.इसी प्रकार जब मामा जी लखनऊ university की ओर से रिसर्च के लिए आस्ट्रेलिया जाने हेतु बम्बई की गाडी से जा रहे थे तो अजय को चारबाग प्लेटफार्म  से कोई बच्चा चोर ले भागा.तुरंत mike से anauncement कराया गया तो घबरा कर उस आदमी ने अजय को ओवर ब्रिज पर छोड़ दिया जिसे मामा जी के छोटे साले ने देखा और गोद में ले आये तभी मामा जी बम्बई के लिए रवाना हुए वर्ना यात्रा रद्द कर रहे थे.मामा जी की बेटी की शादी में शोभा की बड़ी बेटी भी बादशाह बाग़ की कोठियों में खो गयी थी.सब लोग उसे खोज रहे थे और एक धोबी पुत्र रत्ना को साइकिल पर लिए घर-घर पूछ रहा था.मुझे देखते ही रत्ना रोते हुए मेरे पास आगई.लखनऊ में मैं ,भाई और भांजी खोते-खोते बचे.लखनऊ खोने की नहीं पाने और मिलने की धरती रही है.बाबु जी नहीं बना सके लखनऊ में मकान तो आगरा से हट कर मैं बस गया जो बाबू जी का सपना था मैंने पूरा कर दिया।
Typist-Yashwant
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फेसबुक पर प्राप्त कमेन्ट :19 मई 2015 ---

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शनिवार, 7 अगस्त 2010

लखनऊ में बीता बचपन --- विजय राजबली माथुर

मामा जी के साथ 


न्यू हैदराबाद के एक स्कूल में भी कुछ समय गया और हुसैन गंज कि राष्ट्रीय पाठशाला में भी पढ़ा तथा बहुत कम समय दुगांवा में रहने का कुछ भी याद नहीं है.हुसैन गंज में नाले के पास बनी फखरुद्दीन मंजिल के एक हिस्से में जब आकर रहे तभी पहले बाबु जी का विचार बंगाली ब्वायज  स्कूल में भेजने का था लेकिन फिर डी पी निगम गर्ल्स  जू हा.स्कूल में दाखिला करा दिया जहाँ दूसरी से चौथी क्लास तक पढ़ा.शिक्षा का माहौल अच्छा था,सिलाई और संगीत की भी शिक्षा दी गयी.संगीत की क्लास में लड़कों को गेंद और लड़कियों को रस्सी कूदने का खेल भी कराया जाता था.चौथी क्लास में कुछ समय तक वृद्ध  बंगाली पुरुष गणित  पढाने आये जो गलत करने वाले लड़के और लड़कियों दोनों को बुरी तरह स्केल से पीटते थे उन्हें बहुत जल्दी हटा दिया गया.प्रभात कमल श्रीवास्तव नामक एक साथी से बहुत प्रगाढ़ता हो गयी थी उसके पिता जी शायद डॉक्टर थे इसलिए वह कभी कभी विजय मेडिकल हाल और बगल के खद्दर भण्डार में हमें भी साथ ले जाता था.सिर्फ उसीके साथ ही बऊआ मुझे और छोटे भाई अजय को भेजती थीं.वह अक्सर सरकारी दफ्तर में लगी जंगल जलेबी तोड़ेने के लिए खड़ी जीपों पर भी चढ़ जाता था।

आज सड़कें चौड़ी हो गयी हैं लेकिन बड़े डिवाइडर भी लग गए हैं तब हम लोग स्कूल जाते आराम से सड़क पार कर लेते थे तब ये डिवाइडर नहीं थे शायद उनकी जरूरत भी नहीं थी लोग नियमों का पालन करते होंगे.बर्लिंग्टन होटल में ही पोस्ट ऑफिस था दोनों भाई जाकर पोस्ट कार्ड  वगैरह बड़े आराम से ले आते थे और सड़क के उस पार हलवाई से किसी मेहमान के आने पर समोसा वगैरह भी ले आते थे.तब समोसे का रेट एक आना था.आज जितने  रु.में एक समोसा मिलता है तब ४८ मिल जाते.सदर में राम लीला देखने या अमीनाबाद पैदल ही जाते थे कहीं सड़कों पर परेशानी नहीं होती थी.सबसे छोटे होने के कारण बहन शोभा को तो बऊया बाबूजी गोदी में ले लेते थे,हम दोनों भाईयों को पैदल सड़क पर चलने या पार करने में कोई परेशानी नहीं हुई।

१९६० में जब जी.पी.ओ.तक बढ़ का पानी आ गया था तब हमारी भुआ,फूफाजी सपरिवार अपने सप्रू मार्ग के मकानमें ताला लगा कर आ गए और बाढ़ उतरने के बाद ही वापिस गए थे.उन दिनों हर इतवार को बाबू  जी मेरे लिए ५ पैसा कीमत का ''स्वतंत्र भारत'' ले देते थे.हमारे फुफेरे भाईयों को यह अच्छा नहीं लगता था.उनमें से छोटे वाले हमारी ही कोलोनी में सिर्फ १ कि.मी.कि दूरी पर रहते हैं लेकिन जो फासला एक अमीर एक गरीब के साथ रखता है वही वह भी रख रहे हैं-अब भूल चुके हैं कि कभी हमारे घर पर बाढ़ पीड़ित बन कर भी रहे थे।

मामा जी की गोद में

न्यू हैदराबाद में हमारे मामाजी डाक्टर कृपा शंकर माथुर भी रहते थे उनके घर,भुआ के घर और बाबू  जी के मामाजी के घर ठाकुरगंज भी हम लोग जाते थे.बाबु जी के ममेरे भाइयों में एक श्री गंगा प्रसाद जलेसरी नामी वकील और एक श्री दुलारे लाल माथुर I.A.S.का व्यवहार बाबू  जी के साथ मधुर रहा.हमारे ममेरे भाई भी यहीं शहर में हैं लेकिन रिश्ते निबाहने में वही दिक्कत है जो दौलतमंद महसूस करते हैं.निवाज गंज में बाबू  जी के फुफेरे भाई स्व.रामेश्वर दयाल माथुर रहते थे उनका भी मधुर व्यवहार बाबू  जी के साथ था.ताई जी (बाबु जी की फुफेरी भाभी) ने तो मेरे छुटपन में मेरे बीमार पड़ने पर अस्पताल की काफी दौड़-धूप की और बऊआ को ज़रा भी तकलीफ नहीं होने दी.१९६१ में बाबू  जी का तबादला बरेली हो गया तो  लखनऊ शहर छूट गया.

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मंगलवार, 3 अगस्त 2010

लखनऊ तब और अब ------ विजय राजबली माथुर

जन्म से १९६१ तक लखनऊ में रहने के बाद गत वर्ष अक्टूबर,२००९ में पुनः लखनऊ वापसी हुई.तब से अब तक के लखनऊ में न केवल क्षेत्रफल की  दृष्टि से बल्कि लोगों के तौर तरीकों और आपसी व्यव्हार में भी बेहद तब्दीली हो चुकी है.१९८१ में जब करगिल में नौकरी के सिलसिले में था तो टी बी अस्पताल के सीऍमओ साः ने बोली के आधार पर कहा था कि क्या आप लखनऊ के हैं.९ वर्ष कि उम्र में शहर छोड़ने के बीस सालों बाद भी बोली के आधार पर मुझे लखनऊ से जोड़ा गया था.लेकिन ४९ साल बाद वापिस लखनऊ लौटने पर यहाँ के लोगों ने मुझे बाहरी माना है.तब हुसैन गंज में रहता था,मुरली नगर के डी पी निगम गिर्ल्स जू.हाई स्कूल  में पढता था और अब कचहरी से लगभग १० कि मी दूर नई कोलोनी में रहता हूँ.लखनऊ की नई कोलोनियों में लगभग ८०% लोग बाहर  से आकर बसे हैं और लखनवी तहजीब से कोसों दूर हैं वे ही मुझे बाहरी मानते हैं.अपने नजदीकी रिश्तेदार भी मेरे लखनऊ  वापिस आ जाने से असहज महसूस कर रहे हैं.हकीकत यह है कि अपना ३१ वर्ष पुराना जमा-जमाया मकान बेच कर उसके आधे से भी छोटा मकान लेकर नयी कोलोनी में रहना उनको भारी अखर गया है जब कि अपना पहला मकान भूखे रहकर या,चना-परमल पर भी गुज़ारा करके १५ सालों में  किश्तें चुका  कर बना पाया था और उसी को बेच कर बहुत छोटा सा महंगा मकान मिल पाया है. कहीं से भी किसी से भी एक चुटकी धूळ या एक भी गिट्टी खैरात में लेकर या उधार में ले कर गुजारा  नहीं किया,यही उन दौलत वालों को खटकता है.लोगों को ईमानदारी और मेहनत से गुज़र-बसर करना सुहाता नहीं है और वे पेशे पर हमला करते हैं.जो ज्योतिषी बेईमानी,ढोंग और पाखण्ड पर चलते हैं उन्हें भी मेरा मानदारी और वैज्ञानिक आधार पर  चलना नहीं सुहाता है.यह सब लखनवी कल्चर के खिलाफ है लेकिन लखनऊ उन्हीं का है

photo by mr.kartik mathur

लखनऊ से बरेली वहां से शाहजहाँपुर जहाँ से सिलिगुरी फिर शाहजहाँपुर और मेरठ रहकर आगरा पहुंचे और अपना मकान बना कर बस गए.मेरठ कॉलेज में पढाई के दौरान छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष( सत्यपाल मलिक साहब )  से  शायर फ़िराक गोरखपुरी का यह कथन सुनकर आगरा बसने का फैसला किया था की,यू .पी.में जितने आन्दोलन मेरठ -कानपुर डायगोनल  से शुरू हुए विफल रहे जबकि बलिया-आगरा डायगोनल  से शुरू आन्दोलन पूरे यू.पी. में छा कर देश में भी सफल रहे.आगरा के अब के लोगों में वह राजनीतिक  समझ नहीं देखी  उनकी बेरुखी और पुत्र के आग्रह के कार पुनः लखनऊ आने का फैसला किया, अभी तो पूरी तरह सेटल भी नहीं हो सके हैं –देखते हैं की क्या यहाँ रह कर देश के लिए कोई राजनीतिक योग दान दे सकता हूँ या नहीं. " जननी जन्मभूमिश च स्वर्गादपि गरीयसी” कहा तो जाता है लेकिन मेरी जन्म  भूमि लखनऊ और यहाँ के लोग मुझे देश- समाज के हित में कुछ करने देने में कितना सहयोग करते हैं – यही देखना – समझना बाकी है.उम्मीद छोड़ी नहीं है.

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 १३ अप्रैल २०११ को 'हिन्दुस्तान' लखनऊ में छपा आदरणीय के. पी. सक्सेना साहब और १७ अप्रैल २०११ को सैय्यद हैदर अब्बास रजा साहब  के कथन से भी लखनऊ वासियों के चरित्र में बदलाव की पुष्टि होती है -







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