सोमवार, 13 दिसंबर 2010

क्रांति नगर मेरठ में सात वर्ष (३ )

मारी कक्षा में रमेश गौतम नामक एक छात्र (जिनके पिताजी सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल थे )ने इतिहास की कक्षा में एक कमज़ोर खिड़की की लोहे की सलाख हाथ से मोड़ कर तोड़ दी थी. चीफ प्रोक्टर तेज पाल शर्मा जी जब पढ़ने आये तो पूंछा कि ,खिडकी किसने तोडी ?कोई छात्र मुंह खोलने को तैयार नहीं था ,तब खुद रमेश गौतम ने खड़े होकर कहा कि,सर आप टूटी खिड़की की मरम्मत नहीं करा रहे थे,इसलिए पूरी ही तोड़ दी.उसकी बात का शर्माजी पर पता नहीं क्या असर हुआ कि,उन्होंने उस वर्ष का चीफ प्रीफेक्ट उसे ही बना दिया तथा विगत वर्षों से चीफ प्रीफेक्ट चले आ रहे सरदार मनमोहन सिंह को एडीशनल चीफ प्रीफेक्ट बना दिया.सरदारजी मस्तमौला थे उसमें भी खुश हो गये,जब कुछ साथियों ने कुरेदा कि,भई तुमने प्रोटेस्ट क्यों नहीं किया था,एडीशनल क़े रूप में क्यों पद स्वीकार किया तो सरदार मनमोहन सिंह ने तपाक से उत्तर दिया कि,वह फ़ौजी अफसर का बिगडैल बेटा है अगर उसे चीफ प्रीफेक्ट न बनाया जाता तो वह लगातार अनुशासन तोड़ता जाता और उसे कन्ट्रोल करना  आसान नहीं होता ,इसलिए अच्छा ही हुआ कि बला टली.बाद में यही रमेश गौतम ,मेरठ कालेज में भी प्रीफेक्ट बना लिया गया था जहाँ पूर्व परिचय क़े आधार पर कार्यालय से वह मेरे कार्य अविलम्ब करवा देता था.

                                     नाम का स्पष्टीकरण

७ वीं कक्षा में वाद -विवाद प्रतियोगिता में प्राप्त कामायनी में भी तथा पी .एस .डी.क़े सर्टिफिकेट में भी मेरा नाम विजय  कुमार माथुर लिखा है क्योंकि,बाबू जी ने अपने बड़े भाईयों क़े व्यवहार से क्षुब्ध होकर दरियाबाद की पुश्तैनी जायदाद में अपना हिस्सा ठुकरा दिया था और हम दोनों भाईयों क़े नाम से खानदान का परिचयात्मक विशेषण "राज बली" हटा दिया था.अपना नाम तो सर्टिफिकेट ,सर्विस आदि सब जगह बदलना (जबकि ७ वर्ष फ़ौज में भी वही नाम लिखा था ) संभव नहीं था.अतः मेरा नाम जो वास्तव में "विजय राज बली माथुर "है -स्कूल रिकार्ड क़े हिसाब से विजय कुमार माथुर हो गया.परन्तु जब से मेरे लेख पत्र -पत्रिकाओं में छपे मैंने "विजय राज बली माथुर "नाम ही दिया.व्यवहार में स्कूली नाम को छोटा करके विजय माथुर ही चलाया क्योंकि,एफीडेविट देकर वास्तविक नाम चलने का अर्थ होता -पिताजी की कार्रवाई  को रद्द करना.अतः स्कूल -कालेज क़े रिकार्ड में नाम विजय कुमार माथुर रहने दिया.परन्तु लेखन आदि में जहाँ भी मेरा वास्तविक नाम "विजय राज बली माथुर "देखते हैं तो पिताजी क़े भतीजों आदि को बेहद बुरा लगता है मानों कि,खानदान का परिचय देकर मैं कोई गुनाह कर रहा हूँ? यदि कभी दुर्भाग्य से मैं कोई अहमियत हासिल कर सका मेरी कलम में कुछ ताकत दिखाई दी  तो मैं समझता हूँ कि,वे लोग ही सबसे पहले मुझे अपना सगा भई बताने में पल भर की भी देर नहीं करेंगे.जिन लोगों ने या उनके माता -पिता ने मेरे माता -पिता को परेशां किया ,प्रताड़ित किया और तरक्की क़े सारे रास्ते बन्द कर दिए उनसे समझौता करना मेरा स्वभाव नहीं है.
                         
  कंकर -खेडा निवास क़े दौरान

मेरठ कैंट में उस समय कंकर खेडा स्वतन्त्र टाउन एरिया  कमेटी क़े आधीन था जो कि, मेरठ कैंट स्टेशन क़े पीछे सरधना रोड पर स्थित है.डिस्टिलरी की तरफ से या सरू स्मेल्टिंग की तरफ से जाने पर रेलवे फाटक क्रास करने पड़ते थे.इसलिए कभी -कभी रेलवे क़े स्टेप ब्रिज (जिस पर दोनों ओर साईकिलों को चढाने -उतारने क़े लिए स्लोप दिया हुआ था )से यार्ड और स्टेशन पार करके कालेज जाते थे.हम लोगों क़े उस मकान में पहुँचने क़े कुछ दिनों बाद हमारी मौसी वहां आईं थीं अपने बड़े बेटे लाल भाई सा :


(मौसी क़े साथ लाल भाई साहब और गोदी में मिथ्थे जीजी ) 
(श्री आनंद बिहारी लाल माथुर जो चित्र में चीनी -रोटी खा रहे हैं और अब डाक -तार विभाग में आडिटर क़े पद से रिटायर्ड हो कर दिल्ली में ज्योतिष की प्रैक्टिस कर रहे हैं ) क़े साथ.हमारी मौसी स्व.भगवती देवी माथुर और मौसा जी स्व.राम बिहारी लाल माथुर बेहद मिलनसार और सज्जन थे,जब कि उनके दूसरे भी जीवित पुत्र रमेश तथा जीवित पुत्री मिथ्थे जीजी (भोपाल में बस गईं श्रीमती मिथलेश माथुर पत्नी श्री सतवन्त किशोर माथुर -रिटायर्ड सीनियर ट्रैफिक आफिसर ,इन्डियन एयर लाईन्स जो गुडगाँव क़े मूल -निवासी हैं ) बेहद विपरीत स्वभाव क़े हैं.
मौसी दो -तीन दिन रह कर चली गईं थीं.१९५९ या ६० में तब   हम लोग बचपन में लखनऊ से मौसी क़े घर दिल्ली में दो -तीन हफ्ते रहे थे.  मौसाजी को लांसर रोड पर सरकारी क्वार्टर मिला हुआ था.उनके साथ रिजर्व बैंक में अधिकारी उनके छोटे भाई भी रहते थे.वह मौसाजी व उनके बच्चों की मदद करते थे परन्तु जब मौसेरे भाई -बहन बड़े हुए तो अपने चाचा -चाची का साथ रहना उन्हें पसन्द नहीं आया अतः मौसाजी क़े भाई अलग अपने बैंक क़े बंगले में चले गये और फिर उसके बाद अपना मकान बना लिया.जब हम लोग दिल्ली गये थे मौसाजी क़े भाई -भौजाई भी हम लोगों क़े साथ वैसा ही व्यवहार करते थे जैसा कि मासी -मौसा जी का था.हम लोग उन्हें भी मौसी -मौसाजी ही कहते थे.
मकान मालिक सरदार जी (मोगिया सा :)और उनकी पत्नी भी अच्छे व्यवहार क़े धनी थे.सरदारजी ने अपनी सगी छोटी साली को जनमते ही दत्तक पुत्री बना लिया था.बाद में उनका स्वंय का भी पुत्र हो गया था और असल में वे मौसी -भान्जा ,भाई -बहन क़े रूप में रहते थे.
कुछ माह बाद बाबूजी को रूडकी रोड पर सरकारी क्वार्टर मिल गया था और हम लोग वहां चले गये थे.उसकी
चर्चा अगली पोस्ट में  --------------- 
  

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2 टिप्‍पणियां:

  1. अपना नाम ही तो अपनी पहचान है,
    अच्छा लेख
    बहुत - बहुत शुभकामना

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  2. आदमी की पहिचान नाम से ही होती है| पुरानी यादों के लिए आभार|

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