सोमवार, 13 जून 2011

पुण्य तिथि पर बाबूजी का एक स्मरण

(स्वर्गीय ताज राज बली माथुर )
हमारे बाबूजी का निधन १३.०६.१९९५ की रात्रि को हुआ था.हम अंगरेजी कैलेण्डर के हिसाब से इस दिन हवन करके उसमें वे विशेष सात आहुतियाँ देते हैं जिन्हें प्रति दीपावली पर स्वामी दयानंद सरस्वती हेतु देने का प्राविधान बताया गया है.इसके अतिरिक्त हम कनागत आदि का कोई ढोंग कभी नहीं करते हैं.न ही किसी प्राणी को उनके निमित्त कुछ खिलाते हैं.जैसाकि गीता में योगीराज श्रीकृष्ण ने भी स्वीकार किया है और वेदोक्त सत्य भी है -आत्मा सदैव अजर,अमर होती है.हमारे अपने बाबूजी से सम्बन्ध के समय जो आत्मा उनके शरीर में थी ,वह आज जहां भी हो उसकी शांति के निमित्त ही हम ये सात आहुतियाँ देते हैं.वायु द्वारा जो सर्वत्र व्याप्त है इन आहुतियों द्वारा दिए पदार्थ परमाणुओं में परिवर्तित होकर पहुँच जाते होंगे.दुसरे लोगों के तरीके से किसी को खिलाने-पिलाने से कुछ भी उनकी आत्मा तक कतई नहीं पहुँच सकता था.  

बाबूजी ,बाबाजी की चार संतानों में सबसे छोटे थे.जब बाबूजी चार वर्ष के थे दादी जी (उनकी माता)का निधन हो गया था.बाबाजी ने फिर विवाह नहीं किया था.कुछ समय बाद सबसे बड़े ताउजी का विवाह कर दिया था.जब बाबाजी ने रायपुर (दरियाबाद-बाराबंकी)में कोठी बनवाई तो बाबूजी को साईकिल के कैरियर पर बैठा कर ले जाते थे.बाबूजी की पढाई लखनऊ के काली चरण हाईस्कूल में हुयी. कुछ समय निवाज् गंज में वह अपनी भुआ के पास भी रहे और कुछ समय स्कूल के बोर्डिंग में भी जहां उनके सहपाठी का. भीका लाल जी भी उनके कमरे के साथी भी थे.जैसा बाबूजी बताया करते थे-टेनिस के खेल में स्व.अमृत लाल नागर जी ओल्ड ब्वायज असोसियेशन की तरफ से खेलते थे और बाबूजी उस समय की स्कूल टीम की तरफ से.स्व.ठाकुर राम पाल सिंह जी भी बाबूजी के खेल के साथी थे.बाद में जहाँ बाकी लोग अपने-अपने क्षेत्र के नामी लोगों में शुमार हुए ,हमारे बाबूजी १९३९ -४५ के द्वितीय  विश्व-युद्ध में भारतीय फ़ौज की तरफ से शामिल हुए.

अमृत लाल नागर जी हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हुए तो ठा.रामपाल सिंह जी नवभारत टाइम्स ,भोपाल के सम्पादक.भीका लाल जी पहले पी.सी एस. की मार्फ़त तहसीलदार हुए ,लेकिन स्तीफा देके भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए और प्रदेश सचिव भी रहे.बाबूजी को लगता था  जब ये सब बड़े लोग बन गए हैं तो उन्हें पहचानेंगे या नहीं ,इसलिए फिर उन सब से संपर्क नहीं किया.एक आन्दोलन में आगरा से मैं लखनऊ आया था तो का.भीका लाल जी से मिला था,उन्होंने बाबूजी का नाम सुनते ही कहा अब उनके बारे में हम बताएँगे तुम सुनो-उन्होंने वर्ष का उल्लेख करते हुए बताया कब तक दोनों साथ-साथ पढ़े और एक ही कमरे में भी रहे.उन्होंने कहा कि,वर्ल्ड वार में जाने तक की खबर उन्हें है उसके बाद बुलाने पर भी वह नहीं आये,खैर तुम्हें भेज दिया इसकी बड़ी खुशी है.बाद में बाबूजी ने बताया था कि जब का.भीका लाल जी विधायक थे तब भी उन्होंने बाबूजी को बुलवाया था परन्तु वह संकोच में नहीं मिले थे.

बाबूजी के फुफेरे भाई साहब स्व.रामेश्वर दयाल माथुर जी के पुत्र कंचन ने (१० अप्रैल २०११ को मेरे घर आने पर) बताया कि ताउजीऔर बाबूजी  दोस्त भी थे तथा उनके निवाज गंज के और साथी थे-स्व.हरनाम सक्सेना जो दरोगा बने,स्व.देवकी प्रसाद सक्सेना,स्व.देवी शरण सक्सेना,स्व.देवी शंकर सक्सेना.इनमें से दरोगा जी को १९६४ में रायपुर में बाबाजी से मिलने आने पर व्यक्तिगत रूप से देखा था बाकी की जानकारी पहली बार प्राप्त हुई.

युद्ध -समाप्ति पर बाबूजी खेती देखना चाहते थे.परन्तु बाबाजी बड़े ताऊ जी -ताई जी के कहने में चलने के कारण उनकी मदद नहीं कर सके ,हालांकि युद्ध के दौरान पूरे सात वर्षों का बाबूजी का वेतन बाबा जी ने ताऊ जी और उनके बच्चों पर ही खर्च किया .बड़े ताऊ जी अपने बड़े बेटे की शिकायत पर अपनी नौकरी गवां चुके थे.जब ताऊ जी एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट में इन्स्पेक्टर थे घर पर उनके अधिकारी के आने पर उनके बेटे ने मेज के नीचे छिप कर कह दिया उनके पापा रिश्वत लेते हैं.इसी बात पर उनकी नौकरी चली गयी और उनको अपने बड़े बेटे से घोर नफरत हो गयी.यही कारण था उनके निधन पर  मेरे  आगरा  से  आकर  लौटने  तक   वह नहीं पहुंचे थे. ताऊ जी की मृत्यु घर के कुँए में गिर जाने से ब्रेन हैमरेज द्वारा हुयी थी और उनके छह माह बाद ताई जी की मृत्यु कैंसर से हुयी थी.उनके बाकी बेटे मथुरा नगर की जमीन-जायदाद देखते हैं.उनके बेटों में सबसे छोटे वकालत किये हैं और लखनऊ में अपने मामा के मकान के वारिस बन कर रह रहे हैं और मेरे बाबूजी को बाबाजी की जायदाद का बंटवारा न होने के लिए दोषी ठहराते हैंजबकि उनकी सभी बहनों की शादी खेत बेच-बेच कर हुईं हैं.उनसे बड़े मेरे लखनऊ वापिस आने पर अनमने हो गए थे.

छोटे ताऊ जी -ताई जी भी बेहद तिकडमी थे.आठवी कक्षा पास होते हुए भी वह समकक्ष  परीक्षाएं पास करके रेडियो इंजीनियर के पद से रिटायर हुए.बाबाजी को अपनी  गिरफ्त में लेकर रायपुर की जमीन-जायदाद उन्होंने अपने बेटों के नाम गिफ्ट करा ली.अपनी भुआ की जमीन भी उन्होंने हड़प ली.छोटी ताई जीमृत्यु पर्यंत लगातार  २७ वर्ष पागल रहीं.वह खुद रामेश्वरम से लौटते में ट्रेन में नहीं रहे और उनके दुसरे न. के बेटे ने चंदे के रुपयों से उनका डाह -संस्कार रास्ते में ही किया.उनके सबसे बड़े बेटे और सबसे छोटे अब नहीं हैं.दुसरे न. वाले के चार बेटे हैं.सूना है आज कल वह भी बीमार चल रहे हैं.हमारे लखनऊ आने के बाद से संपर्क में नहीं हैं,अपने बड़े बेटे की शादी तक में नहीं बुलाया था.रामेश्वर ताऊ जी के बड़े बेटे कमल दादा के अंतिम संस्कार के समय घाट जाते वक्त उनके बड़े बेटे ने मुझसे कहा था -"आज कल किसी को दुसरे के बारे में सोचने की फुर्सत नहीं है",तो यह कारण था उसके विवाह में न बुलाने का.

बाबू जी ने खेती कर पाने में विफल रहने पर पुनः नौकरी तलाशना शुरू कर दिया.उसी सिलसिले में इलाहाबाद जाकर लौट रहे थे.उनकी कं.के पुराने यूनिट कमांडर जो तब लेफ्टिनेंट कर्नल बन चुके थे और लखनऊ में सी.डब्ल्यू.ई.की पोस्ट पर एम्.ई.एस.में थे उन्हें इलाहाबाद स्टेशन पर मिल गए.यह मालूम होकर बाबूजी नौकरी की तलाश में थे उन्हें अपने दफ्तर में बुलाया.बाद में बाबूजी जब उनसे मिले तो उन्होंने स्लिप देकर एम्प्लोयमेंट  एक्सचेंज भेजा जहाँ तत्काल बाबूजी का नाम रजिस्टर्ड करके फारवर्ड कर दिया गया और सी.डब्ल्यू ई. साहब ने अपने दफ्तर में उन्हें ज्वाइन करा दिया. घरके लोगों ने ठुकराया तो बाहर के साहब ने रोजगार दिलाया.सात साल लखनऊ,डेढ़ साल बरेली,पांच साल सिलीगुड़ी,सात साल मेरठ,चार साल आगरा में कुल  चौबीस साल छः माह  दुबारा नौकरी करके ३० सितम्बर १९७८ को बाबू जी रिटायर हुए.तब से मृत्यु पर्यंत (१३ जून १९९५)तक मेरे पास बी-५६० ,कमला नगर ,आगरा में रहे.बीच-बीच में अजय की बेटी होने के समय तथा एक बार और बउआ  के साथ फरीदाबाद कुछ माह रहे.

बाबूजी के दोनों धनाढ्य भाईयों की घरेलू स्थिति से बाबूजी की खुद की आर्थिक विपिन्नता के बाद मेरी भी विकट आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद उनकी घरेलू स्थिति अच्छी रही है.कारण सिर्फ यह है -वह सदा ईमानदारी पर चले इसलिए सफल रहे.तमाम परेशानियों के बावजूद और भारी दबाव झेलने पर भी आज अभी तक मैं भी ईमानदारी छोड़ नहीं सका हूँ और इसी लिए मैं भी हारते-हारते अंततः जीत ही जाता हूँ.आज जो भी मान-सम्मान और प्रशंसा समाज तथा ब्लॉग जगत में  मैं प्राप्त कर सका हूँ उसका कारण बाबूजी और बउआ का आतंरिक आशीर्वाद मेरे साथ होना है.जब तक वे जीवित रहे अपनी दक्षता एवं क्षमता के अनुसार मैंने उन्हें प्रसन्न रखने का अपनी और से प्रयास किया.आज जब वे भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं मैं आडम्बर या दिखावा उनके नाम पर कुछ नहीं करता हूँ,सिवाए  हवन  उनके निमित्त करने के,जो वैज्ञानिक आधार पर उनकी आत्माओं तक मेरा निवेदन पहुंचा सकता है.

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8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही अच्छा पोस्ट है जी !मेरे ब्लॉग पर अपना सहयोग दे !
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  2. बाबूजी को नमन ...सुन्दर पोस्ट..

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  3. आडम्बर दिखावा करने की जरुरत भी नहीं है किसको दिखाना है। बाबूजी के सम्बंध में जानकारी मिली । अच्छी जिन्दगी व्यतीत कर गये और उस अनुसार आपको आचरण करने की ,ईमानदारी से जीवन यापन करने की शिक्षा दे गये । बाबूजी को नमन

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  4. गुरूजी प्रणाम ...देर से पोस्ट पर आने की वजह से ...आज ही सही ..आप के पिताजी को मेरी श्रधांजलि सुमन समर्पित है !

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  5. बाबु जी को नमन व हार्दिक श्रधांजलि|

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  6. We pay our tributes to shri Taj bali mathur sahab .Remebering our genetic inheritance is a refreshing buton for our present .Thanks for this post .Sorry for technical reasons could not comment in Hi .

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