शनिवार, 25 जून 2011

बउआ -पुण्य तिथि पर एक स्मरण


बाबूजी के निधन का बउआ को गहरा दिमागी सदमा लगा और जब हम लोग १४ जून १९९५ को अजय के फरीदाबाद से आने पर घाट ले गए थे तभी से वह अचेतन हो गईं और तमाम इलाज करने-नर्सिंग होम में भर्ती कराने के बावजूद २५ जून १९९५ को उनका भी निधन हो गया.२६ जून की दोपहर अजय के आने के बाद उन्हें घाट ले जाया गया.यशवन्त तो बाबूजी के समय भी घाट गया था परन्तु पांच वर्षीय  अजय की पुत्री-अनुमिता भी अड़ गई और वह भी घाट गई.हम २५ ता.को हवन में विशेष सात आहुतियाँ ही देते हैं और ढोंग-रहित सरल तरीके से स्मरण कर लेते हैं.

नानाजी की जीवित तीन संतानों में हमारी बउआ बीच की थीं.उनसे बड़ी मौसी थीं और छोटे थे मामाजी.मामाजी की पढाई की वजह से नानाजी बरेली से लखनऊ ट्रांसफर करवाकर आये थे और ठाकुर गंज में अपने एक बहनोई के मकान में किराए पर रहते थे.लखनऊ आने के बाद नानी जी का निधन हो गया था और कुछ दिन बउआ शाहजहांपुर में अपने बाबाजी और चाचा-चाचियों के साथ रहीं.सम्भवतः रामेश्वर ताऊ जी और उनकी माता (हमारी भुआ दादी) ने ही नाना जी को बाबा जी से संपर्क कराया था और इस प्रकार उनका विवाह बाबू जी से हुआ था. 

'नाम बड़े और दर्शन थोड़े' या ' ऊंची दूकान-फींका पकवान' लगा था बउआ को मथुरा नगर (दरियाबाद) का माहौल.बड़ी ताईजी जो उस समय हाई स्कूल पास और टेनिस खेलने वाली बड़ी माडर्न मानी जाती थीं,बेहद दकियानूसी ढंग से घर-संचालन करती थी जो भण्डार घर में ताला डाल कर बउआ को दोनों वक्त नपा-तुला राशन ही देती थीं ,जिस कारण बउआ को अक्सर भूके पेट या कम खाए ही गुजारा करना पड़ता था.इन सब बातों का असर उनके मस्तिष्क और शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ा जिस कारण हम लोगों को उनके साथ बाद में अंगीठी जलाने,आटा माड़ने,कपडे धोने आदि में मदद करनी पड़ती थी. 

बउआ की आदत चुप रहने और बेहद कम बोलने की थी इसलिए सब सहती रहती थीं.बेहद काम करने की आदत थी और जब नहीं कर पाती थीं तो उन्हें पीड़ा होती थी.अंगरेजी दवाएं उन्हें रिएक्ट कर जाती थीं .वह या तो नाना जी की होम्योपैथी दवा लेती थीं या फिर आयुर्वेदिक.डाबर,ऊंझा,वैद्यनाथ आदि के पंचांग से दवाएं ढूंढ कर १९७० से मैं बाबूजी को बताने लगा था जिन्हें वह ले आते थे और बउआ को फायदा हो जाता था.उन्हीं के कारण मैंने १९८०-८१ में आयुर्वेदरत्न का कोर्स किया.१९८२ में वैद्द्य के रूप में रजिस्टर्ड कराने के बावजूद धन-लाभ अर्जित नहीं किया.

बाबूजी की ही तरह बउआ को भी झूठ बोलना -सुनना पसंद नहीं था.उन दोनों को छली-छद्मी लोग अच्छे नहीं लगते थे.अतः उनका परिचय का दायरा कम था.लखनऊ में तो मामाजी और भुआ के यहाँ बाबू जी के साथ अक्सर जाती थीं,कभी-कभी निवाज गंज बाबू जी की भुआ के यहाँ भी जाती थीं.ताई जी (स्व.कुसुमलता माथुर,पत्नी स्व.रामेश्वर दयाल माथुर) का व्यवहार बउआ को पसंद था.मेरे जन्म के बाद बीमारी में मुझे अस्पताल दिखाने ताई जी ले जाती थीं और बउआ की परेशानी बच जाती थी.आज भी निवाज गंज वाले ताऊ जी के सभी बच्चों का व्यवहार अपने माता-पिता की भाँती ही काफी अच्छा है और हमारा भी उनके यहाँ ही जाना-आना होता है.

बाबूजी के ममेरे भाई स्व.दुलारे लाल माथुर ,पी.सी.एस.(बाद में आई.ए.एस.हुए) के दुसरे विवाह के एक कार्यक्रम में बउआ नहीं गईं थीं तो ताई जी (दुलारे ताऊ जी की पहली पत्नी )ने अगले दिन बउआ को  भी आने की बाबत मुझ से कहलाया था और बउआ ,उनकी इच्छानुसार गईं भीं.वह बड़ों का पूरा सम्मान करती थीं और यही शिक्षा भी हम सब को दी थी.मेरी पूरी कोशिश उस पर अमल करने की रहती है.हालांकि इस बात पर मेरी खिल्ली भी खूब उडती है.१९७३ में एक इन्टरवियू देने मैं लखनऊ आया था हालांकि सरू स्मेल्टिंग ,मेरठ में सर्विस भी कर रहा था.मामाजी के घर ठहरा था,माईं जी ने मुझ से कहा था-विजय अब तुम नौकरी कर रहे हो जीजी को आदत बदलने का दबाव डालो न मानें तो उनसे अलग हो जाओ.मैंने माईं जी का पूर्ण सम्मान करते हुए विनम्रता पूर्वक जवाब दिया-मैं बउआ पर कोई दबाव नहीं डालूँगा और न ही उनसे अलग होउंगा.माईं जी को अच्छा नहीं लगा पर फिर चुप हो गईं.हमारे छोटे भाई-बहन जरूर माईं जी से प्रभावित हैं और इसी कारण मेरे आलोचक हैं तथा बहन-बहनोई तो बाबूजी के एक भतीजी और  भतीजों के समर्थक हैं;मेरी बदनामी माँ और नाना का अनुयायी के रूप में भी है.

हमारे नाना जी,बाबूजी और बउआ सभी ने तमाम परेशानियां उठा कर भी मेहनत और ईमानदारी को कभी नहीं छोड़ा और मैं भी वैसा ही करके संतुष्ट हूँ.बेईमानी का धन कमाने वाले सभी रिश्तेदारों का नजारा भी सामने है.दुनिया से कदमताल करके चलने के नाम पर मैं सत्य और ईमान को नहीं छोड़ सकता.हालांकि हमारे बाबा जी भी खुद तो ईमानदारी  पर ही चले जिस कारण उन पर फायर भी किये गए.वह सेनेटरी इन्स्पेक्टर थे और सदा-गला मांस,मिठाइयाँ ,फल आदि बे झिझक फिंकवा देते थे,रिश्वत लेते नही थे अतः उन पर गोलिया चलाई जाती थीं.परन्तु बाद में बड़े तथा छोटे ताऊजियों ने उनको अपने चंगुल में कर लिया था. उनकी इस कमजोरी को  ग्रहण नहीं किया जा सकता. 

बाबूजी का प्राणांत मेरे हाथ के सहारे पर हुआ था. तब तो बउआ सामने ही थीं.२५ जून १९९५ की रात्रि ०८ बजे जब बउआ का प्राणांत हुआ मैं और यशवन्त ही सामने उपस्थित थे.खाना बना रखा था परन्तु खाया किसी ने नहीं था.अगले दिन तीसरे पहर घाट से लौट कर ही यशवन्त ने भी भोजन लिया.यद्यपि १२ दिनों के अन्तराल में ही बाबूजी  और बउआ दोनों यह दुनिया छोड़ गए परन्तु उनकी दी हुयी शिक्षा,त्याग और श्रम करने की प्रेरणा सदैव मेरा संबल रहेंगे.


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11 टिप्‍पणियां:

  1. संस्कार और सीख हमेशा जीवित रहती है.....
    श्रद्धांजलि....

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  2. Baua lives in our memories .Bauaaz are institutions that reminds us of our commitments to honesty and truth .I share with you sir in all your moments of sorrow joy and commitments .Thanks for showing Baua .

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  3. आप का ब्लॉग में अपनी राय देने के लिए धन्यबाद कृपया नई पोस्ट से अपडेट रहे और हमारा मार्गदर्शन करते रहे chhotawriters.blogspot.com

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  4. चरणों में पुष्प ....श्रधांजलि

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  5. उनके व्दारा दी गई शिक्षा सदैव आपका संबल रहे । उनको विनम्र श्रध्दांजलि

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  6. संस्कार और अच्छी शिक्षा हमे जीवन में हिम्मत और हौसला देती है...
    विनम्र श्र्धाण्जलि.....
    कृपया मेरे ब्लांग मेंआप का स्वागत है.. धन्यवाद...

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