बुधवार, 27 जुलाई 2011

आगरा /१९८२-८३(भाग १)

बउआ ने परंपरागत नाव उतरने की रस्म  के वास्ते शालिनी को पीहर से बुलवाने हेतु बाबूजी से पत्र भिजवा दिया जिसे जे.एस.एल.साहब ने मंजूर कर लिया.दरअसल हमारे खानदान में परंपरा है कि,बेटों को प्रत्येक १४ जनवरी (मकर संक्रांति पर)नाव चढ़ने की रस्म कराई जाती है,कभी वास्तविक नाव का प्रयोग होता रहा होगा परन्तु बाबूजी तो हम दोनों भाइयों को खोये की बर्फी को नाव मान कर उसके साथ रस्म पूरी करा देते थे.जब शादी हो जाए तो पुत्र और पुत्र वधु को एक साथ बैठा कर नाव उतरने की रस्म करा दी जाती है,अर्थात अब इसके बाद से नाव चढ़ने की रस्म ख़त्म.

संक्रांति पर बड़ों को बया देने की प्रथा है जिसमें कुछ सामर्थ्यानुसार धन वगैरह भी दिया जाता है.शालिनी ने मुझ से बउआ को रु.५१/-देने हेतु लिए परन्तु दिए उन्हें रु.३१/-ही .मैंने यह बात बउआ को नहीं बतायी लेकिन समझते देर न लगी कि जिसके पिता रेलवे में छोटी इलाईची के घपले में फंसे उसके घर के सभी लोग घपलेबाज ही होंगे.

इस बार गर्मियों में फिर मुझे कारगिल जाने वाली टीम में शामिल कर दिया गया-एन.एस.चावला और हेमंत कुमार जी गत वर्ष खाई मात का बदलना लेने पर उतारू थे.लिहाजा शालिनी को उनकी इच्छानुसार टूंडला भेज दिया गया.

इस बार फ्रंट आफिस सुपरवाईजर श्री इन्दर राज चंढोक को कारगिल मेनेजर बना कर भेजा गया.इंजीनियरिंग से दुसरे शख्स को भेजा गया ,पुराने गए लोगों में केवल मुझे ही रिपीट किया गया था.हेमंत कुमार जी के आफिस में बैठ कर चंढोक साहब ने मुझे आश्वासन दिया था इस बार स्टाफ को भोजन तुम्हारे अनुसार दिया जाएगा.लेकिन यह कोरा आश्वासन ही था.

कारगिल-1982 मे एक बार फिर 

एक रोज घुमते समय पिछली बार जिस ट्रक में जोजीला पर फंसे थे उसके ड्राइवर साहब मिल गए और देखते ही बोले-"अरे तुम फिर आ गया" उन्हें क्या बताते ,इधर-उधर बात घुमा दी.

चंढोक साहब तो टोनी चावला जी के भी पर-बाबा निकले.दो दिन बाद ही उनकी पत्नी मय दोनों बेटों और चंढोक साहब की बहन को लेकर वहां आ गयीं.चंढोक साहब ने भी आर्मी के मेजर साहब से मेल कर लिया उनके कोई रिश्तेदार लेफ्टिनेंट जेनरल थे उनके हवाले से.

एक रोज चंढोक साहब के बड़े बेटे गौरव को काफी तेज बुखार था और मेरी चंढोक साहब से बोलचाल उनके व्यवहार के कारण बंद थी.उन नन्द -भौजाई में भी खट-पट होने के कारण चंढोक साहब अपनी श्रीमती जी से खफा थे.अतः अपने बेटे की भी परवाह नहीं किये.जब बेहद परेशानी बढ़ गई तो मिसेज चंढोक ने मुझ से कहा कि चूंकि मैं पहले भी आ चूका हूँ और डा. आदि से परिचय हो सकता है उनकी मदद करूँ.जीप साथ भेजने को उन्होंने अपने अधिकार से कहा.जिन सरकारी डा. साहब को बशीर साहब टोनी चावला जी के लिए पिछले वर्ष लाये थे ,मैं उनके घर गया और उनसे चलने का निवेदन किया.

डा. साहब आये और वांछित दवाएं दीं ,कुछ परहेज बताया और फीस भी नहीं ली.तब तो बशीर साहब लाये थे इस लिए फीस नहीं ली इस बार मेरे बुलाने पर भी फीस नहीं ली.सरकारी डा. होकर घर आ जाना और फीस नहीं लेना शेख मोहम्मद अब्दुल्ला साहब के शासन में जे.एंड के.में ही संभव था यहाँ यूं.पी.में तो ऐसा होता नहीं है.

बहरहाल एक दो दिन में गौरव बिलकुल ठीक हो गया.ठण्ड और गैर वाजिब भोजन के कारण मेरा जबड़ा जकड गया था और सरकारी अस्पताल में डा.साहब को दिखाया उन्होंने एक्सरे (जो वहां तो फ्री हो गया था)देख कर एक्सरसाईज करने को कहा था और दवाएं बाहर से लिख दी थीं.उन दवाओं से लाभ न होने के कारण उन्होंने आपरेशन करने को कहा तो चंढोक साहब भी चौंक गए और बोले आपरेशन तुम आगरा जाकर अपने घर वालों के बीच कराओ,उनकी श्रीमती जी ने उनसे मुझे आगरा लौटने की लिखित परमीशन भी दिलवा दी और इस प्रकार इस बार एक ही माह के भीतर आगरा लौटना हो गया.

इस बार चंढोक साहब सपरिवार मुझे रात्रि विश्राम-स्थल तक छोड़ने आये थे.अगले दिन सुबह तडके पांच बजे एक ट्रक से निकले जिससे बात चंढोक साहब ने ही तय करा दी थी.श्री नगर शाम तक पहुंचे ,बीच में एक स्थान पर तेज गर्मी के कारण नहर पर ट्रक रुका और ड्राइवर समेत सभी लोग नहाए उसी ट्रक में पी.डब्ल्यू.डी.के एक जे.ई.साहब भी जा रहे थे जिन्होंने मुझ पर जबरदस्ती पानी डाल कर भिगो दिया अतः मुझे भी नहाना ही हुआ.

यह जे.ई.साहब खूब खाऊ आदमी थे अपनी दास्तानें सुनाते आ रहे थे कि ,कब कैसे ठेकेदार को कहाँ फंसा कर उससे कितने रु.या फ्रिज कब हडपा.उन्होंने मुझसे कहा शिकारा -विकार में मत रुको मैं मुफ्त में रुकवा दूंगा और श्रीनगर में डल-झील के पास एक मंदिर में ले जाकर सामान रखवा दिया.वह अलग पीने-खाने चले गए और मैं अलग अपना भोजन करके लौटा.

पिछली बार मैं बिस्तर भी ले गया था जो कारगिल में बंधा रहा था -होटल ने ही प्रोवाईड किया था अतः इस बार ले नहीं गया था.जे.ई.साहब के चक्कर में मंदिर में भीषण ठण्ड में रात गुजारनी पडी.अगली सुबह का रोडवेज बस का टिकट ले लिया था जब मैं चलने लगा तो जे.ई.साहब ने मुझ से रु.५/-पंडित जी को देने हेतु मांग लिए-यही उनका मुफ्त ठौर था .

श्रीनगर से बस ने जम्मू रात में पहुंचा दिया जहां बस स्टैंड की छत पर खुले में रात गुजारी और सुबह होते ही बस पकड़ कर दिल्ली चला,टिकट रात ही में ले लिया था.शाम ५ बजे तक दिल्ली पहुंचे और दूसरी बस पकड़ कर आगरा रात ११-१२ बजे तक घर .इतनी जल्दी और अचानक रात में पहुँचने पर बउआ -बाबूजी एकबारगी घबडा गए.सब बातें समझा दीं.

1981 और 1982 मे जाना-आना मिला कर 4 ट्रिप हुये लेकिन मैं एक बार भी जम्मू नहीं रुक कर सीधा आगरा पहुंचा . जबकि लोग-बाग खास-तौर से छुट्टी एवं पैसे का बंदोबस्त करके 'वैष्णो देवी'जाते हैं ,मैं मुफ्त मे आते-जाते भी मंदिर नहीं गया .कारण था ढोंग और पाखंड पर अविश्वास .यदि कोई अपने देश का भाग समझ कर पर्यटन हेतु जाता है और प्रशाद आदि के फेर मे नहीं पड़ता है तब तो ठीक है.मंदिरवाद केवल प्रदूषण बढ़ाता है और मस्तिष्क को विकृत करता है.अपने मस्तिष्क को पोंगापंथी सड़ांध  से बचाने हेतु 'वैष्णो देवी' मंदिर नहीं गया ,हालांकि आर्य समाज के संपर्क मे तो 16 वर्ष बाद ही आ पाया.

अभी कुछ बातें और कारगिल की फिर ड्यूटी पर न लिए जाने का तमाशा अगली बार......

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2 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतर पोस्ट, सुन्दर पोस्ट

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  2. रूजी प्रणाम अति व्यस्त हूँ , ब्लॉग जगत से दुरी बढ़ गयी है ! कारन ट्रेड उनियां और कार्यक्रम ! बिशेष यह अंक भी सुन्दर रही ! खट्टे - मीठे अनुभव !

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