रविवार, 17 जुलाई 2011

आगरा/१९८०-८१ (कारगिल अवशिष्ट भाग)


उस क्षेत्र की लद्दाखी भाषा में कारगिल का अभिप्राय सेब (एपिल) से है.वहां बहुतायत में सेब के बाग़ हैं.खुमानी भी वहां प्रचुरता से पाई जाती है.उस समय तक वहां के लोग किसी भी व्यक्ति के तोड़ कर फल खाने पर आपत्ति नहीं करते थे.यदि कोई चुरा कर ले जाने लगता तभी पकड़ते थे और उसका दंड लगाते थे.वहाँ तब तक बहुत ईमानदारी और सरलता थी ,यदि बिना ताला लगाए सामान  छोड़ कर चले जाएँ तो कोई भी चोरी नहीं करता था. सुनते तो यह भी थे किसी का गहना भी रास्ते में गिर जाए तो वह भी सुरक्षित मिल जाता है.हाँ चोरी दो चीजों की होती थी-एक जलाने वाली लकड़ी और दुसरे पीने वाला पानी .इन दो आवश्यक साधनों का वहाँ बेहद अभाव था. खैर हमारा होटल हाई लैंड्स तो 'सरू'नदी के तट पर बारू नामक स्थान पर था.पिछली पहाड़ी से काट कर लाई गयी नहर से होटल की टंकी में पानी भरा जाता था जिससे कमरों में ,किचेन में पहुंचाया जाता था. पीने हेतु पानी को फ़िल्टर करना पड़ता था क्योंकि बालू बहुत आती थी.'सरू' संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ है-शीतल ,यह शब्द उस क्षेत्र में हमारी प्राचीन संस्कृति का अद्भुत प्रमाण है.वैसे लद्दाख के बौध -क्षेत्र से काट कर बना  मुस्लिम बहुल जिला है कारगिल.वहाँ शिया लोगों का बहुमत है जो सुन्नियों को अछूत मानते थे और उनके साथ बैठ कर खाते पीते नहीं थे बल्कि सभी  गैर शियाओं के साथ यही नियम था.पुस्तकों में पढ़ा हुआ तिब्बती 'याक'बैल भी वहाँ प्रत्यक्ष देखा.मूल रूप से वहाँ तिब्बत्ति प्रभाव था और श्री नगर से बहुत भिन्न स्वभाव के लोग वहाँ थे.

सम्पूर्ण विकास और भौतिक प्रगति का  श्रेय वहाँ तैनात सेना को है.मनोरंजन हेतु सिनेमा भी तब तक सेना का ही था.सेना की जीप ही नागरिकों को सिनेमा बदलने की सूचना देती थी.सेना के क्वार्टर मास्टर हवलदार साहब से टोनी चावला जी ने मेल-जोल स्थापित कर लिया था.उनके जरिये मिट्टी का अतिरिक्त तेल उपलब्ध कर लेते थे जो होटल का मुख्य ईंधन था.डाक घर नजदीक था और टहलते हुए जाकर वहाँ से होटल के  तथा व्यक्तिगत लेटर्स  ले आते थे.बाजार दूर था किन्तु चावला जी सभी को पैदल कभी-कभी ले जा कर सब्जी ,ब्रेड आदि खरीदारी करने ले जाते थे.कभी-कभी जीप दे देते थे. हालांकि चावला जी के हार्ट में एक होल था.फिर भी कंजूसी के कारन पैदल ही चलते थे.यह बात उन्होंने तब बतायी थी जब एक बार उनको भयंकर -तीव्र दर्द हुआ ,समय रात  दस बजे का था.होटल मालिक गुलाम रसूल जान साहब के बड़े बेटे बशीर अहमद जान साहब वहाँ मौजूद थे जो सरकारी अधिकारियों डाक्टरों आदि से व्यक्तिगत रूप से परिचित थे.वह जीप में मुझे साथ लेकर सरकारी अस्पताल के डाक्टर के घर गए और उन्हें जगा कर साथ ले आये.डाक्टर साहब ने जरूरी दवाएं अपने पास से दे दीं और दिन में लेने के लिए पर्चे पर लिख दीं.डाक्टर साहब लौटते में यह कह कर जीप ड्राइवर के साथ अकेले ही चले गए कि, आप लोग इनका ध्यान रखें.चावला जी की श्रीमती जी दो -एक दिन में आने वाली थीं अतः उन्होंने मुझे यह हिदायत देते हुए हार्ट में होल होने की बात बताई कि,उनकी श्रीमती जी को यह न पता चलने पाए परन्तु हालत ज्यादा बिगड़ने पर डा.को चुप-चाप मैं बता दूं.

खैर  उनकी श्रीमती जी जब आ गईं तब उसके बाद मेरे वहां रहने तक उन्हें कोई दूसरा अटैक नहीं पड़ा.चूंकि मैं अकौन्ट्स सुपरवाइजर था और मेरे पास रात्री में ग्रुप्स आने पर कोई काम नहीं था अतः जब कभी एक्स्ट्रा ग्रुप आ गया तो बाजार से सब्जी,ब्रेड लेने मुझे ही भेजा जाता था,दुसरे सभी लोग व्यस्त रहते थे.चावला जी कंजूसी के तहत एक्स्ट्रा स्टाक नहीं रखते थे.कभी -कभी जीप न देकर पैदल भेजते थे.एक बार लौटते समय तेज तूफानी हवाएं चलने लगीं ,संभावना बारिश आने की भी थी,मैंने एक जीप आता देख कर उसे टैक्सी समझते हुए रुकने का इशारा किया वह रुक गयी और मैं बारू जाना है कह कर बैठ गया.उतरने पर उस समय के रेट के मुताबिक़ रु.२/-का नोट ड्राइवर को देने लगा परन्तु उसने हाथ जोड़ कर मना कर दिया-साहब यह सरकारी गाडी है.जीप आगे बढ़ने पर मैंने देखा उस पर डायरेक्टर फिशरीज लिखा था अर्थात मेरे साथ दूसरी सवारी नहीं वह अधिकारी थे.एक हमारे मेनेजर और दुसरे वह लद्धाखी सरकारी  अधिकारी दोनों के व्यवहार बड़े आश्चर्यजनक रहे.जीप तेजी से चले जाने के कारण मैं तो धन्यवाद भी न दे सका था.

प्रातः काल मैं जल्दी उठ जाता था और आस-पास टहलने निकल जाता था.एक बार टी.बी.अस्पताल की तरफ चला गया तो बाहरी आदमी देख कर सी.एम्.ओ.साहब ने बुलाया और अपना परिचय देकर मुझ से परिचय माँगा.मेरे यह बताने पर कि,होटल मुग़ल,आगरा में अकौन्ट्स सुपरवाईजर हूँ और यहाँ टेम्पोरेरी ट्रांसफर पर होटल हाई लंड्स में आया हुआ हूँ. उन्होंने यदा-कदा आते रह कर मिलने को कहा.विशिष्ट प्रश्न जो उन्होंने पूंछा वह यह था कि क्या आप लखनऊ के हैं?मैंने प्रति-प्रश्न किया आपने कैसे पहचाना ?वैसे मेरा जन्म और प्रारम्भिक शिक्षा लखनऊ की ही है.डा.साहब का जवाब था आपकी जबान में उर्दू की जो श्रीन्गी है वह लखनऊ में ही पायी जाती है दूसरी जगहों पर नहीं.हालांकि उस समय हमें लखनऊ छोड़े हुए १९ वर्ष व्यतीत हो चुके थे और मैं उर्दू पढ़ा भी नहीं था.घर में बोली जाने वाली बोली से ही डा. साहब ने पहचाना था जो खुद श्रीनगर के सुन्नी थे.

आज जब मैं लखनऊ की एक बाहरी कालोनी में आकर पुनः बसा हूँ तो यहाँ पहले से रह रहे लोग जो राय बरेली,सुल्तानपुर,गोरखपुर,देवरिया,सीतापुर,लखीमपुर से  आकर बसे हैं मुझे गैर लखनवी का फतवा दे रहे हैं क्योंकि वे कुछ और बोलते हैं और मैं वही पुरानी वाली बोली जो कारगिल में भी बोलता था,और वहां इसी के आधार पर आगरा से जाने के बाद भी लखनऊ का जाना जाता था.

कारगिल में मैं कुल ढाई माह ही रहा और विदाउट परमीशन वापिस आगरा लौट गया ,क्यों ?यह बात पहले लिख चुके हैं.अगली बार आगरा लौट कर......

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2 टिप्‍पणियां:

  1. आप लखनऊ में रहें या कहीं और, सारा भारत एक है, पर न जाने क्यों, लखनऊ में लोगों में ये बात आजकल देखने को मिल रही है कि वे अपने आपको औरों से अलग व बेहतर मानते हैं, शायद मायावती के दूषित पैसे का असर है,
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  2. कारगिल का अर्थ सेब होता है, यह पहली बार पता चला.
    आपके संस्मरण से कई नई बातों को जानने का अवसर मिल रहा है.

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