शुक्रवार, 14 जून 2013

तो फिर वे क्यों ऐसा करते हैं? ---विजय राजबली माथुर

यों तो मुझे अतीत में विचरण करते रहने की आदत नहीं है और सिर्फ  इसलिए पीछे देखता हूँ कि कब-कब और कहाँ -कहाँ,कैसे-कैसे ठोकर लगी जिससे भविष्य में उससे बचा जा सके।लेकिन जब आज 18 वर्ष पीछे की घटना का वर्णन कर रहा हूँ तो किसी ठोकर लगने की बात नहीं है और न ही कोई भावुकता की बात है। सिर्फ यह बतलाना चाहता हूँ कि किस प्रकार निकटतम एवं घनिश्ठ्तम लोग भी मौके का किस प्रकार फायदा उठाते हैं। 

जैसा कि पिछले पोस्ट से स्पष्ट होता है कि 18 वर्ष पूर्व हमारे बाबूजी ने यह संसार छोड़ा था। यों बुखार आदि होता रहता है दो-तीन दिन से बाबूजी को बुखार था और दवा ले रहे थे बउआ की तबीयत भी ठीक नहीं थी मैंने डॉ के पास चलने को कहा तो बाबूजी ने कहा कि कल दिन में चलेंगे। लेकिन 13 जून 1995 की रात को 1-30 पर उनका प्राणान्त हो गया जबकि रात को 9 बजे तक उन्होने खुद ही हैंड पंप चलाकर पानी स्तेमाल किया था।  उस दिन उन्होने कह कर मुझसे करेले की सब्जी बनवाई थी किन्तु चखा भर था अगले दिन खाने को कह दिया था। 16 जून 1994 को शालिनी के देहांत के बाद से पहले माँ और बाबूजी ही खाना बनाते थे परंतु फिर मैंने सुबह ही दोनों वक्त की सब्जी बना कर रखना व  सुबह की रोटी सेंकना शुरू कर दिया था। शाम को बाबूजी यशवन्त को भूख लगने की बात कह कर मेरे घर पहुँचने तक पराँठे सेंक लेते थे। इधर दो दिन से मैं बाज़ार  ड्यूटी पर नहीं गया था। सुबह  पाँच बजे अर्जुन नगर रानी मौसी/अशोक,नवीन  आदि के घर मोपेड़ से सूचना देने जा रहा था यशवन्त भी साथ चलने की ज़िद्द करने लगा। माँ ने कह दिया लेते जाओ हम अकेले रह लेंगे लेकिन उन्होने अपनी अंगूठी व चूड़ियाँ उतार कर मुझे देते हुये कहा कि सोने की जेब में रख लो और वह अकेले ही बाबूजी के पार्थिव शरीर के पास बैठी रहीं।

अर्जुन नगर से लौटते में बिजली न आने की समस्या पर लोगों के जाम का सामना करना पड़ा। यह कहने पर भी कि घर में माँ अकेली पिता जी के पार्थिव शरीर के साथ हैं हमें जाने दिया जाये जामकर्ताओं ने यह कह कर इंकार किया कि सब ऐसे ही बहाना करते हैं। बड़ी मुश्किल से हम जाम से निकल सके और यही कारण है कि व्यक्तिगत रूप से मैं सड़क जाम करने के विरुद्ध रहता हूँ। वहाँ से आकर डॉ शोभा व अजय को 'तार'(TELEGRAM) जो अब( 15 जूलाई से बंद होने जा रहे हैं ) करने गए फिर यशवन्त साथ गया और माँ फिर अकेली रहीं। झांसी से शोभा/कमलेश बाबू तो 5  -30 तक पहुँच गए किन्तु अजय नहीं पहुंचे । उस दिन शोभा को सपरिवार फरीदाबाद घूमने पहुँचना था और अजय उन लोगों के इंतज़ार में रुके रहे थे। रात्रि 7 -30 पर वह पहुंचे तब बाबूजी को घाट ले जाया जा सका। वहाँ से लौटते-लौटते 9 बज चुका था। नहाने-धोने के बाद मैं गहरा कर सो गया था। 

शायद बाबूजी को घाट ले जाने के बाद माँ अनकांशस हो गईं थीं। अजय और शोभा उन पर कुछ खाने का दबाव बनाते-बनाते जब थक गए और उनका जवाब नहीं मिला तो शोभा मुझे जगा कर और यह कह कर ले गईं कि अब तुम्ही माँ को खिलाओ हम लोगों से नहीं मान रही हैं। जब वह अचेत थीं तो मेरे कहने से भी कोई फर्क नहीं पड़ना था किन्तु छोटे भाई-बहन की त्यौरिया चढ़ी हुई थीं। मैंने कहा कि आज छोड़ दो कल देखेंगे और मैं फिर सो गया। 14 जून से जो माँ अचेत हुईं तो 25 जून को प्राणान्त तक अचेत ही रहीं एलोपैथी इलाज का धेला भर भी असर नहीं हुआ। 5 दिन नर्सिंग होम में भी रहीं ,डॉ अशोक गर्ग (जिनके पास अजय इलाज के लिए ले गए थे उनका संबंध RSSसे था मैं उनसे इलाज कराने का पक्षधर नहीं था )का कहना था कि पेट पंकचर करके नलियाँ डाल देंगे उनसे लिक्विड दिया जा सकेगा किन्तु पेट पंकचर करते में यदि मृत्यु हो जाये तो उनकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। अतः मैंने इस आपरेशन को नहीं होने दिया।

बाबूजी की डेथ और माँ की बीमारी के दौरान पूनम के पिताजी का जवाबी पत्र बाबूजी के नाम आया था। उस वक्त अजय और कमलेश बाबू नर्सिंग होम में थे मैं भी किसी काम से कहीं गया हुआ था। जब लौटा तो पता चला कि शोभा और अजय की पत्नी के मध्य यह विवाद छिड़ गया था कि पत्र अजय खोल कर जवाब देंगे कि कमलेश बाबू। मैंने सीधे-सपाट दोनों से कहा कि  मुझसे छोटे होने के कारण न अजय और न ही कमलेश बाबू को कोई हक है कि वे लिफाफा खोलें और जवाब दें। माँ इस स्थिति में नहीं हैं अतः मैं खुद ही देखूंगा और जवाब जो देना होगा उसे इस वक्त टाल दूँगा सिर्फ बाबूजी के न रहने व माँ की बीमारी की सूचना भेज दूँगा। और वही मैंने किया। हालांकि शोभा/कमलेश बाबू व अजय और उनकी पत्नी चुप तो हो गए किन्तु भविष्य में कोई चाल चलने की सोच कर ही। 

अगले ही दिन शोभा/कमलेश बाबू झांसी चले गए ,उनकी बेटियाँ भी वहाँ अकेली थीं। 23 जून को मेरे बहुत मना करने के बावजूद  अजय भी अपनी पत्नी व बेटी के साथ फरीदाबाद लौट गए। 25 की रात 7-45 पर माँ का भी प्राणान्त होने के समय फिर यशवन्त ही मेरे साथ मौजूद रहा। हालांकि आज बाबूजी की अंतिम विदाई के 18 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं परंतु लगता है कि अभी कल की ही घटना है। माँ के तुरंत बाद ही अजय ने तो सम्पर्क तोड़ लिया था ,मई 2011 में शोभा/कमलेश बाबू के लखनऊ आगमन के बाद से मैंने उन लोगों से सम्पर्क तोड़ लिया है। क्योंकि यह खुलासा हो चुका था कि पूना वासी छोटी भांजी ने पूनम की श्रीवास्तव बिरादरी के ब्लागर्स चुन कर उनको मेरे व यशवन्त के विरुद्ध अपने पिता श्री के माध्यम से उकसाया था। इसका प्रभाव हमारी हमारी पार्टी के कुछ विशिष्ट पदाधिकारियों पर भी है जो उन ब्लागर्स से संबन्धित हैं।

यह सब सार्वजनिक करने का उद्देश्य छोटे बहन-भाई को कोसना नहीं है बल्कि यह  सोच कर हैरानी होती है कि आखिर मुझे,पूनम को या यशवन्त को नुकसान पहुंचाने पर बहन-भाई को तो कुछ लाभ होगा नही;सिर्फ ऐरे-गैरे नत्थू -खैरे ही लाभ उठा सकेंगे  तो फिर वे क्यों ऐसा करते हैं?

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1 टिप्पणी:

  1. फेसबुक ग्रुप-हाउस आफ कामन्स में प्राप्त टिप्पणी:
    भूपट शूट: दोस्त बहुत गहरी भावनाओं से जुड़े हुवे सवाल हैं,.

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