शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

क्रांति नगर मेरठ में सात वर्ष (१२)

मैंने हाईस्कूल पास करते ही कामर्स छोड़ दी थी,लेकिन यहाँ एम्.डी.सा :ने कहा हमारे पास एकाउंट्स में ही जगह है वहीं काम करो.वजह यह थी कि(ये सब बातें बाद में पता चलीं),लेखाकार श्री वी.पी.अग्रवाल एक को छोड़ कर सारे स्टाफ को अपने साथ मोदी रबर में ले गए थे.एक श्री हंस कुमार जैन नहीं गए थे क्योंकि यह जैनियों की फर्म थी.हंस कुमार जी मैनजर श्री लेख राज प्रूथी (जो पी.एन.बी.के अवकाश प्राप्त मैनजर थे)को प्राईवेट काम की जानकारी न होने के कारण परेशान करते थे,मुझे भी बौड़म सिद्ध करने के खेल में लग गए.लेजर मुझे टोटल करने को दिया -पेन्सिल से.मेरे टोटल कर देने के बाद वह रबर से अंकों में फेर-बदल करके मैनेजर सा :को दिखा कर कहते जो आदमी सही जोड़-घटाव नहीं कर सकता वह यहाँ क्या काम करेगा.दो-तीन दिन के बाद प्रूथी सा :ने मुझे खाली बैठे रहने को कहा,वह दिन तो वैसे ही गुजरा और शाम को बाबूजी से सब बातें बताईं.बाबूजी ने सलाह दी कि,मैनेजर सा:से पुरानी फाईलें पढने की इजाजत  ले कर पढो और समझो.प्रूथी सा:ने सहर्ष परमीशन दे दी.तीन दिनों के अध्ययन से वाउचर बनाना आ गया और उनसे आग्रह किया मुझे भी वाउचर बनाने दें.ट्रायल के लिए दो-दो,तीन-तीन वाउचर मुझे देते रहे ठीक पाते  जाने पर सं.बढ़ाते रहे.एक हफ्ते बाद हंस कुमार जी ने प्रूथी सा :को कहा आपके और माथुर के बीच में मैं हूँ मेरे जरिये चेक करा कर वाउचर पास करिए.  उन्होंने स्वीकार कर लिया.धीरे-धीरे हंस कुमार जी मुझ पर वाउचरों का बोझ बढ़ाते गए,अंततः वह चेकर बन  गए और मैं प्रिपेयर .बाबूजी ने कहा गधे की तरह काम अपने ऊपर लाद लो परफेक्ट हो जाओगे.मैंने वही किया.अब तो जो हंस कुमार जी मुझे उखाड़ने जा रहे थे वही मुझे अपना प्रिय बताने लगे ,मैं आज्ञाकारी सहायक जो था.लेकिन उनके तथा मैनेजर सा :के झगडे में मैं मैनेजर सा:के साथ रहता था.हंस जी को काम करने की आदत छूट गयी थी मुझ पर निर्भर थे लिहाजा झुक जाते थे.इस प्रकार प्रूथी सा :का वजन भी बढ़ता गया उन्हें एम्.डी.सा :का वरद-हस्त था (दोनों टेनिस क्लब के साथी थे)वही उन्हें अपनी गाडी में बैठा कर चार्ज दिलाने लाये थे.मुझ पर अत्यधिक काम का बोझ देख कर प्रूथी सा :ने दो और लोग भर्ती करा लिए,एक एम्.डी .सा :और एक चेयरमैन सा :के परिचित के पुत्र थे.हंस कुमारजी ने मैनेजर सा :को परेशान करने का नया रास्ता निकाला कि,जेनरल मैनेजर और डायरेक्टर मुल्तान सिंह जैन सा : से उन्हें अपमानित कराने लगे.टाईम-कीपर सुरजीत सिंह पाबला के पिताजी जो जसवंत शुगर मिल में बौइलर इंचार्ज थे के माध्यम से प्रूथी सा :ने वहां सी.ई.ओ.के रूप में ज्वाईन कर लिया;उन्होंने मुझे भी अपने साथ ले जाने का प्रयास किया परन्तु मैं जा न सका क्योंकि वह फैक्टरी काफी दूर थी और यहाँ तो बस रेलवे लाईन पार की आ गए.
महेश नानाजी प्रमोशन पर डिप्टी चीफ इन्स्पेक्टर आफ फैक्टरीज होकर कानपूर चले गए थे.उनके मित्र यहाँ के फैक्टरी मैनेजर श्री महेंद्र पाल सिंह जैन तथा पर्सोनल आफीसर डा.मिश्री लाल झा भी स्तीफा देकर जा चुके थे.उन दोनों साथियों की सपोर्ट थी और मैं जैक-विहीन था.हंस कुमार जी ने जो अब लेखाकार बन चुके थे चाल फेंकी और नए फैक्टरी मैनेजर के मार्फ़त तीनों से स्तीफा देकर फ्रेश ज्वाईन कराने को कहा.बाकी दोनों ने वैसा ही किया ,मैंने इनकार कर दिया.ऍफ़.एम्.ने मुझे शो काज नोटिस मनगढ़ंत आरोप लगा कर दे दिया. मैंने डा. झा से संपर्क किया उन्हें यहाँ के मैनेजमेंट से खार तो थी ही,जबरदस्त जवाब लिखवा दिया और एम्.पी. जैन सा :से राय लेने को कहा ,उन्होंने भी झा सा :द्वारा लिखवाया जवाब ओ.के.कर दिया.मैंने हस्त-लिपि में वह ऍफ़.एम्.सा :को दे दिया.वह उठ कर मेरे पास आये और बाहर बुलाकर ले गए तथा कहा कि,तुम भी कायस्थ -मैं भी मुझ से क्यों लड़ते हो?मैंने जवाब दिया सा :यही बात तो शो काज देते वक्त भी थी,फिर आपने क्यों दिया?बोले अच्छा अब सब कागज़ फाड़ देते हैं.मैंने अपना रिकार्ड देने से इनकार करते हुए कहा आप अपने आफिस के कागज़ फाड़ दें मैं अपने पास रखूँगा लेकिन इस्तेमाल नहीं करूंगा.श्री ब्रिजेन्द्र कुमार अखोरी ने न केवल मेरी बात मान ली बल्कि भविष्य में पूर्ण सहयोग का आश्वासन भी दिया.उधर यूनियन नेताओं को लगा जो अकेला डटा रहा उसे अपने साथ लाया जाए उन्होंने मुझे दो माह पहले की सदस्यता देकर कार्यकारिणी में शामिल कर लिया.इस प्रकार ट्रेड यूनियन गतिविधियों में भाग लेकर दूसरों की भलाई करने का मौका भी मिल गया.
श्री अखोरी कानपुर के थे वह आई.एस.आई.के किसी बड़े अधिकारी की सिफारिश से आये थे. यूनियन  के साथ समझौते में उन्होंने श्रमिकों को लाभदायक स्थिति में आने दिया था. मैनेजमेंट की आँख की किरकिरी बन गए थे.फरीदाबाद में नेशनल बंगाल टेक्सटाईल्स में सीनिअर पर्सोनेल आफिसर बन कर चले गए. उनके लिए फेयरवेल एड्रेस यूनियन प्रेसिडेंट ने मुझ से लिखवाया था. उन्हें यह भी पता चल गया था.उन्होंने मुझे व्यक्तिगत रूप से बुला कर अपने साथ वहां चलने का आफर दिया.वेतन रु.६०० प्रतिमाह देने का आश्वासन था. अपनी भांजी से शादी करवाना भी चाहते थे. बिना घर में पूंछे तत्काल उनके प्रस्ताव रद्द कर दिए थे.
हंस कुमार जैन के ऊपर सीनियर लेखाकार श्री नन्द किशोर गौड़ आ गए थे.उन्होंने हम तीनों स्टाफ साथियों को सपोर्ट किया,उनके प्रयास से मेरा वेतन और ग्रेड बढ़ गया.कुछ समय बाद उनके भी ऊपर एक लेखाधिकारी श्री अरुण कुमार भल्ला आ गए ये दोनों अफसर स्टाफ के साथ तालमेल करके चलते थे.अब हंस कुमार जैन की तूती बोलना बंद हो गयी थी. वह भी हम लोगों से तालमेल बिठाने लगे थे.भल्ला जी बड़े स्वाभिमानी थे. हम लोगों से कहते थे,नौकरी करनी है लेकिन दब के नहीं करनी है.वह डा.झा की इस उक्ति से सहमत थे कि बनिया,नीम्बू और गन्ना दबाने से ही रस देते हैं.एक बार एम्.डी.सा :उनकी सीट पर बैठ गए उन्होंने रिजायीन कर दिया और नोटिस पीरियड (तीन माह) अलग स्टूल पर बैठ कर काम किया.उन्होंने सुमीतो मो कोशी जापान (या नाम कुछ और हो सकता है) में डिप्टी जेनरल मेनेजर फायीनान्स के रूप में दिल्ली में ज्वाईन कर लिया.जब हम कुछ लोग उनसे वहां मिले तो उन्होंने रिसेप्शन पर हमारे साथ सोफे पर बैठ कर बातें कीं और वहीं खुद भी हम लोगों के साथ साफ्ट ड्रिंक लिया,क्योंकि यदि वह आफिस में बैठे रहते तो अपनी सीट पर होते और हम सामने अतिथि के रूप में.वह मेरठ में थे तब भी कहते थे-सुबह नौ से पहले और शाम पांच के बाद हम सब मित्र हैं कोई छोटा- बड़ा नहीं है.हम लोग उनका सम्मान करते थे तो उन्होंने बीच का रास्ता यह निकाला कि उम्र में बड़े होने के कारण उन्हें भाई सा :संबोधन दे सकते हैं.बहुत काम सीखा भल्ला जी एवं गौड़ सा :से .डा. झा तथा गौड़ सा :मेरे माता-पिता का भी सम्मान करते थे उनसे घरेलू आना-जाना भी था.ये बातें अगली बार......

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4 टिप्‍पणियां:

  1. mathur sahab...karmath byakti hamesh hi ijjat pate hai.....pita ka aagyakarita ne aap ko hamesh hi safalata dilayi....bahut bahut badhayi...

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  2. बड़े अपने अनुभव से बोलते हैं. आज जब खुद बड़ों की जगह पर हूं, तो ये बात समझ में आई है.

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  3. इसी बहाने आपकी आत्‍मकथा भी लि‍खी जा रही है, जारी रखि‍ये।

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति| धन्यवाद|

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