रविवार, 13 मार्च 2011

क्रांति नगर मेरठ में सात वर्ष (१६)

सुरेन्द्र गुप्ता जी को जब यह पता लगा कि रविवार की छुट्टी में मैं घटाघर तक पैदल ही चला जाता हूँ तो वह शनिवार की शाम अपनी साईकिल मेरे कमरे पर छोड़ जाने लगे.वह मोदी नगर से सोमवार की सुबह लौटते थे.१४ दिसंबर १९७४ के रविवार को जी उचाट होने के कारण मैं उनकी साईकिल होते हुए भी कहीं नहीं गया.खाना खा कर झपकी लग गई जबकि आम तौर पर मैं दिन में लेटता ही नहीं हूँ.तीन-चार बजे के लगभग मुझे स्वप्न में लगा की अजय का ट्रक से एक्सीडेंट हो गया है. उन दिनों फोन की इस तरह सुविधा तो थी नहीं.ध्यान हटाने के लिये मजबूरी में साईकिल लेकर निकल पड़ा.बाद में एक हफ्ते बाद शोभा का लिखा पोस्ट-कार्ड मिला जिसमें उस दिन सुबह अजय को एक्सीडेंट से चोट लगने की बात लिखी  थी.इसका मतलब यह हुआ कि जो स्वप्न शाम को मैंने देखा वह घटना पहले ही सुबह घटित हो चुकी थी.मैंने छुट्टी सेंक्शन करा कर आगरा जाने का निर्णय लिया .छुट्टी भी मिल गई लेकिन सुरीली मौसी ने कहा मामूली चोट होगी अब अजय ठीक होगा और अपने घर अपनी गैर हाजिरी में रुकने की ड्यूटी लगा दी.दरअसल उनका मकान  मालिक से टकराव चल रहा था और वह उनकी गैर हाजिरी में उनके घर चोरी करवा देता था.एक बार एक माथुर सा:एस.एस.पी.थे उनके पास शिकायत लेकर मिलने से भी उनका चोरी गया माल नहीं मिल सका था.इस प्रकार मैं आगरा न जा सका गलती यह भी हुई कि उससे अगले दिन चला जाता  क्योंकि मौसी का शिक्षक प्रदर्शन स्थगित हो गया था और उनका लखनऊ ट्रिप कैंसिल हो गया वह बच्चा पार्क से वापिस लौट आयीं और मैं वापिस अपने कमरे पर लौट गया था.परन्तु मौसी के समझाने पर छुट्टी कैंसिल करा दी थी.पत्र द्वारा अजय का हाल पूछा तो फिर शोभा का ही जवाब आया कि अजय अभी अस्पताल में ही है जबकि पिछले पत्र में अस्पताल का जिक्र नहीं किया था.

इस बार छुट्टी मिलने में दिक्कत हुई क्योंकि गौड़ सा :के ऊपर एक टैक्जेशन आफीसर लच्छू सिंह जैन आ गए थे.वह कुटिल व्यक्ति थे और हंस कुमार जैन सा :के इशारे पर चलते थे.जब मैंने हर हाल में जाने का निश्चय बता दिया तो गौड़ सा :ने ही हस्तक्षेप करके छुट्टी मंजूर करवा दी .सिर्फ सात दिन की छुट्टी इस बार मिली.मेरठ से बस ६ घंटे में आगरा पहुंचा देती थी और बिजलीघर बस स्टैंड से छीपी टोला में घर पैदल के रास्ते पर था.शाम तक पहुँच गया.तब जाकर पता चला कि अजय का वह एक्सीडेंट कितना भयंकर था.डाक्टरों ने तीन दिन खतरनाक बताये थे.अजय के माथे ,कलाई ,पैर आदि की कई हड्डियें टूट गयीं थीं माथे में प्लेट डालनी थी.सरोजनी नायडू मेडिकल कालेज के आर्थोपेडिक वार्ड में अजय भरती रहे और बाबूजी उनकी तीमारदारी में रहे.शोभा जिनकी तभी-तभी एंगेजमेंट हुई थी मेडिकल कालेज बाबूजी के लिये खाना और अजय के लिये हिदायत वाला लेकर जाती थी.अजय के सहपाठी अनिल माथुर की माता जी अनिल के छोटे भाईयों को शोभा के साथ भेज देतीं थीं.सुरीली मौसी के कहने पर मेरे मेरठ में ही  रुकने से यहाँ बहुत परेशानी हुई.यदि बउआ अस्पताल जातीं तो शोभा को घर पर अकेला रहना पड़ता था.मेरे पहुँचने के बाद शोभा की भाग-दौड़ रुकी.

मकान मालिक मोती   लाल कर्दम सा :बहुत भले व्यक्ति थे.वह कलक्टर के पेशकार थे.उन्होंने ही राशन कार्ड आदि सुगमता से बनवा दिया था.जब अजय के एकसीडेंटकी खबर लेकर स्टुडेंट्स पहुंचे थे उन्होंने अपने पास से रु.अपनी जेब में रख लिये थे और बाबूजी को गंभीरता के बारे में कुछ नहीं बताया था.बाबूजी तो उनके साथ खाली हाथ ही चले गए थे.कर्दम सा : ने मकान का किराया और अपने खर्च किये रु.तब तक नहीं लिये जब तक अजय घर नहीं पहुँच गया.श्रीमती कर्दम ने मेरी माता जी को पूर्ण विश्वास के साथ कह दिया था कि डा.भले ही तुरंत खतरे की बात कर रहे हैं परन्तु अजय को कुछ नहीं होगा उनके मकान की यह खासियत है किसी की जान को कोई खतरा नहीं होता है.


चूंकी अजय किंग जार्ज मेडिकल कालेज,लखनऊ से डेंटल हाईजीन का कोर्स किये हुए थे बहुत सी दवाओं की जानकारी थी और डा.को गलत दवा देने पर झाड देते थे बाद में सीनियर डा.आकर अजय की बात का समर्थन और जूनियर डा.को फटकार लगाते थे.कुछ दिन बाद सभी जूनियर डा.अजय को दिखा और पूंछ कर दवाएं देने लगे.नाक की हड्डियों का आपरेशन डा.मुरारी लाल ने किया जो ई.एन.टी.के सीनियर सर्जन थे और बहुत लालची थे.उनकी आदत मरीज को एनस्थीसिया लगने के बाद तीमार दारों को ब्लैकमेल करके पैसा ऐंठने की थी परन्तु अजय के मामले में चुप रहे.बल्की एक बार बाद में दुबारा अजय ने नाक का आपरेशन करवाया तो उन्हीने ठीक से तथा बिना अतिरिक्त धन लिये ही किया था.

कोई सवा या डेढ़ माह बाद अजय को अस्पताल से छुट्टी मिली तब तक मैं ड्यूटी पर मेरठ नहीं लौटा और पोस्ट-कार्ड के जरिये छुट्टी बढाने की रिकुएस्ट भेज दी थी.अजय के घर आने के बाद भी भाग दौड़ तो थी ही एक लम्बे अरसे बाद बाबूजी को भी ड्यूटी ज्वाईन करना था अतः मेरी जरूरत यहाँ थी.लेकिन लच्छू सिंह जैन ने इस अर्जी को रद्द करके 'अब्सेंट विदाउट परमीशन ' के बेस पर मेरे टर्मिनेशन की बात उठायी तब फिर गौड़ सा :ने हस्तक्षेप करके कं.की तरफ से टेलीग्राम भेज कर कहा-"Leave  not granted join immediately ."--N .K .Gaud  .मैं नौकरी छोड़ने को तैयार था परन्तु बउआ ने कहा जब उस समय हो गया तो इस समय भीहो जायेगा नौकरी मत छोडो .लिहाजा मुझे मेरठ लौटना पड़ा.लच्छू सिंह जी ने अजय के एक्सीडेंट और उसकी गंभीरता सुन कर भी पहले खुड-पेंच खड़ी की लेकिन गौड़ सा :मेरे साथ थे उन्होंने पूरी छुट्टी मंजूर करा दी.


जब किसी से पता चला होगा कि मैं आगरा से लौट आया हूँ तो सुरीली मौसी रात साढ़े आठ बजे एक दिन मेरे कमरे पर पहुँचीं.ड्यूटी के बाद यूनियन के लोगों तथा दीपक माथुर और उनके पिताजी (जिनके नाम वह राशन की दुकान सौरभ जी ने अपनी सरकारी नौकरी के बाद करा दी थी क्योंकि तब वह अवकाश प्राप्त कर चुके थे) से बातें करते और होटल से खाना खा कर ही मैं कमरे पर पहुँचता था.अजय का हाल सुन कर उन्हें भी अफ़सोस हुआ कि उन्होंने नाहक ही मुझे रोक दिया था.मुझे तो उन पर आक्रोश था परन्तु ऐसा जाहिर नहीं किया और उनके बहुत कहने बाद भी उनके घर बहुत दिनों तक नहीं ही गया.

प्रत्यक्ष-दर्शियों ने उस दुर्घटना का जो हाल बताया था उसके अनुसार अजय तो बेवजह दूसरों के एक्सीडेंट का शिकार हो गया.अजय को अपने कालेज स्पोर्ट्स हेतु दयाल बाग़ जाना था वह अपनी दिशा में चल रहा था.उस दिन सेन्ट्रल एक्साईज इन्स्पेक्टर की परीक्षा थी और दो उम्मीदवार जो समय से लेट हो चुके थे सदर की तरफ तेज मोटर साईकिल चला कर भाग रहे थे उनके आगे N . C . C .का ट्रक चल रहा था.रंगरूट धीरे-धीरे चलते हैं और उन लड़कों ने उस ट्रक को ओवर टेक करना चाहा तो उनकी मोटर साईकिल का हैन्डिल ट्रक के पीछे लटक रही चेन से टकरा गया.बैलेंस बिगड़ कर वे अपने वाहन समेत उछल कर  सड़क के दूसरी तरफ अजय तथा एक और साईकिल सवार के ऊपर जा गिरे जिस कारण अजय दुर्घटनाग्रस्त हुए.चूंकि यह स्थान आगरा कालेज और सामने हास्टल के पास था अतः पल भर में छात्रों ने एकत्रित होकर सभी घायलों को मेडिकल कालेज में एडमिट करा दिया जिसके लिए मोटर वालों को बाध्य किया कि वे सब को ले चलें.यदि कालेज क्षेत्र न होता और छात्र एकजुट न होते तो अजय को बचाना डा.लोगों के मुताबिक़ मुश्किल था.सबसे ज्यादा चोटें उसी को लगीं थी. किसी छात्र ने साईकिल भी कहीं सुरक्षित रख दी थी.वे छात्र मेडिकल कालेज भी इन लोगों से मिलने कुछ दिन तक गए उन्हीं में से एक ने बाबूजी को वह साईकिल लेने में मदद की.

बहुत बाद में आगरा में एक परिचित ज्योतिषी (उस समय तक मैं पूर्ण ज्ञान नहीं प्राप्त कर सका था) ने जो पुरातत्व विभाग में क्लर्क थे उस दुर्घटना के समय के आधार पर बताया था कि तब अजय के नौ के नौ ग्रह मारक स्थानों में थे. चंद्रमा लगभग ढाई दिन में राशि परिवर्तित कर लेता है वह जैसे ही ठीक हुआ स्वास्थ्य ठीक होता चला .डा.गण ने जो तीन दिन खतरे के बताये थे उनके आधार पर इस कथन की पुष्टि होती थी.इस विश्लेषण ने भी मुझे ज्योतिष की और अधिक जानकारी हासिल करने को प्रेरित किया.जैसे-जैसे ग्रह ठीक होते गए अजय भी ठीक होते गए.इस दुर्घटना से अजय का एक साल पढ़ाई का बर्बाद हो गया वह इम्तिहान न दे सका.

मेरठ में अब और रुकने का मन नहीं रह गया था नौकरी में भी जो गड़बड़ शुरू हुयी थी बढ़ती चली लेकिन उन बातों के जिक्र का कोई लाभ नहीं .हाँ कुछ व्यक्तिगत एवं  राजनीतिक बातें जरूर करना चाहूँगा अगली बार.....
 
 

























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2 टिप्‍पणियां:

  1. गुरूजी ..कईयों के गलती दूसरो को भुगतने पड़ जाते है ! दुर्घटना चौकाने वाली है ! किन्तु होनी को कौन टाल सकता है ! धन्यवाद

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  2. जीवन में ऐसे अनेक उतार-चढ़ाव आते हैं...पता नहीं क्यों लोग एक-दूसरे के रास्ते में कांटे बिछाते रहते हैं....आपके संस्मरण मर्मस्पर्शी हैं...

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