शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

आगरा/१९७६-७७ ( भाग ३ )

लेखा  विभाग में कार्य करना और ईमानदार होना परस्पर  विरोधाभासी है और ऐसे ही आग और बर्फ के खेल में मैं उलझा रहा .स्वभाविक था मैं उन तमाम लोगों की नजरों में खटकता था जो बेईमानी के बादशाह थे.जो अकडू खाँ थे उनको मैं कुछ नहीं समझता था,जो संतुलित थे अपना कार्य धैर्यपूर्वक कराने में सफल हो जाते थे.इनमें एक थे -पी.वी.मेनन सा :जिन्हें वाई.एस.रामास्वामी सा :एम्.ई.एस. से रिजायीन कराकर ठेकेदार के रूप में लाये थे.मेनन सा :का कहना था-जो चाय पर खुश उसे चाय पिला देते हैं ,जो दालमोंठ मांगें उसे ला देते हैं,विजय माथुर कुछ लेते नहीं ,इन्तजार कराते हैं तो इन्तजार कर लेते हैं हम हर तरह खुश रहते हैं.दरअसल मेनन सा :खुशमिजाज ही थे.पैसे वाले होकर भी घमंड उन्हें छू तक नहीं गया था इसीलिये हमेशा सफल रहे.इसके विपरीत कुछ लल्लू -पंजू ठेकदार खुद को खुदा समझते थे उनका कार्य हमेशा लटकता था क्योंकि दत्त सा :मेरे कार्य के आगे मुझे झुकाने की कोई कोशिश नहीं करते थे जबकि प्रोजेक्ट मैनेजर पी.एल.माथुर सा :के पीछे परेशान करने का कोई मौक़ा नहीं चूकते थे.P .M .सा :कभी -कभी किसी विशेष व्यक्ति का पेमेंट जल्दी करने हेतु दत्त सा :को न कह कर सीधे मुझे ही कहते थे और इस प्रकार उनका कार्य सुगम हो जाता था.दत्त सा :के नीचे श्री अमर नाथ अरोड़ा सुपरिंटेंनडेंट अकाउंट्स बन कर आये थे.वह मेहरा सा :के निकटतम रिश्तेदार थे और उन्हें मैनेजर माथुर सा :का समर्थन हासिल था.स्टाफ में मेरे अलावा सभी उन्हें उखाड़ने के चक्कर में रहते थे.अरोड़ा सा :मुझ पर आँख मूँद कर विश्वास करते थे.अरोड़ा सा :बाम्बे पावर गैस कं.से आये थे और आई.टी.सी.के रंग-ढंग में रम नहीं पा रहे थे. मेरे ठोस समर्थन के कारण दत्त सा :के उन्हें नाकारा साबित करने  के   हर हथकण्डे नाकाम हो रहे थे. एक बार तो दत्त सा: ने मेहरा सा :को फैक्स कर दिया -'Mr arora is not acting according to my instructions '.मेहरा सा ने अरोरा सा :को धैयपूर्वक डटे रहने को कहा और दत्त सा :के विकल्प के रूप में श्री विनीत सक्सेना जो उस समय डिविजन में मेहरा सा :के असिस्टेंट थे और जिनके श्वसुर सा :कलकत्ता में रेलवे के बड़े अधिकारी थे को हनीमून से लौटते ही भेजने का आश्वासन दिया. परन्तु 'प्रभु जाको दारुण दुःख देहीं ताकि बुद्धि पहले ही हर लेहीं'.दत्त सा :ने जो आख़िरी दांव चला वह निशाने पर लग गया और अरोरा सा :मुझ से ही टकरा गए वह भी नाहक में.मैंने उनके समर्थन से अपना हाँथ खींच लिया और मौके का भर-पूर लाभ उठाते हुए दत्त सा :ने अपने आफिस का कमरा बन्द करके अरोरा सा :से स्तीफा लिखवा लिया और मेहरा सा :को फैक्स कर दिया.उनका स्तीफा स्वीकार कर लिया गया.सक्सेना सा :अभी हनीमून से आ नहीं पाए थे अतः मेहरा सा :ने दत्त सा :को वापिस सिगरेट डिवीजन में कलकत्ता भिजवा कर होटल मुग़ल में' सिस्टम्स एंड आडिट मैनेजर 'मि.रघुनाथन को भेज दिया.ऐसा इसलिए सम्भव हो सका क्योंकि शांतनु रे सा :कं.छोड़ गए थे और घोष सा :को कलकत्ता बुला कर होटल डिवीजन का डायरेक्टर इंचार्ज श्री  लक्ष्मण   को बना दिया गया था. 
रघुनाथन सा :बहुत जोर से चिल्ला कर बोलते थे और हर किसी को झाड़ने में अपना बड़प्पन समझते थे. किसी के भड़कावे से मुझ से भी गरम हो कर बोले तब मैंने उन्हे उनके द्वारा सिस्टम तोड़ कर आदेश देने के दृष्टांत उन्ही की तरह गरम होकर गिना दिए.उनका पारा फटा -फट डाउन हो गया और बात तेजी से फ़ैल गई.उन्होंने स्टाफ की मीटिंग बुला कर सबके सामने मेरी प्रशंसा करते हुए कहा कि विजय माथुर सही है मैंने सिर्फ उसे चेक करने के लिए गलत कहा था और वह गलत न होने के कारण मुझ से भिड़ गया सब को इतनी हिम्मत रखनी चाहिए कि अफसर के गलत आदेश को ठुकरा दें.
बहरहाल विनीत सक्सेना सा :के लौटने पर उन्हें रघुनाथन सा :के अन्डर A .  U . F .C .की रैंक मिली और जल्दी ही रघुनाथन सा :को होटल डिवीजन के लिए अनफिट किये जाने के बाद वह यूनिट फायनेंशियल कंट्रोलर बन गये.उनके राजनीतिक विचारों से भिन्न अपने विचारों का उल्लेख पूर्व में कर चुका हूँ.कार्य के सम्बन्ध में उनका और मेरा गहरा ताल-मेल था.इसी लिये मैंने विभाग में नयी भर्तियों के वक्त ठेकेदार के यहाँ कार्यरत श्री विनोद श्रीवास्तव को रखने की सिफारिश की ;सबके सामने तो उन्होंने यह कह कर मेरा मखौल उड़ा दिया कि लगता है तुम यूं.पी .के कायस्थ हो तभी कायस्थ का समर्थन कर रहे हो ,परन्तु इशारे से कहा उसे तुरंत बुला लो .फटाफट इन्टरवियू लेकर पर्सोनल विभाग रेफर कर दिया और शर्त लगा दी आज ही ज्वाईन करोगे तो अप्वाइनमेंट वैलिड होगा वरना कैंसिल.विनोद को ठेकेदार ने भी फटाफट रिलीव कर दिया क्योंकि उनका कार्य सिमट रहा था तब तक के लिये विनोद को ही रिलीवर लाने को उन्होंने कह दिया.
सक्सेना सा : के अधीन श्री सुब्रमनियम चन्द्रसेखर अईय्यर आ गये जो उस वक्त के होटल डिवीजन के इंचार्ज डायेरेक्टर लक्ष्मण सा :के कुछ रिश्तेदार थे.वह पहले फोटोग्राफर भी दिल्ली में रहे थे और चार्टर्ड अकाउनटेंट थे.चंडीगढ़ में जन्म होने के कारण तमिल होते हुए भी फर्राटे की हिन्दी शेखर सा :बोलते थे.सक्सेना सा :के कं. छोड़ने पर वह यूं.ऍफ़.सी. हो गये उनसे भी मेरे सम्बन्ध सौहार्द पूर्ण रहे,वस्तुतः चालाक अफसर जान-बूझ कर मेरा समर्थन करते थे जिससे उनकी छवी भी ईमानदार की बनी रहे.
जेनरल मैनेजर पेंटल सा :जो होटल ओबेराय में युनियन दो-फांक करा चुके थे,होटल मुग़ल में एक युनियन बनवाना चाहते थे.कारण मेनेजमेंट द्वारा प्रस्तावित होटल के बाई लाज/स्टैंडिंग आर्डर्स  का डी.एल.सी.में पेंडिंग होना था.स्टाफ वेलफेयर कमेटी का गठन किया गया.अकाउंट्स विभाग से सुदीप्तो मित्रा ने मेरा नाम प्रपोज करके तीन हस्ताक्षर करा लिये थे लेकिन मैंने हस्तक्षेप करके मित्रा सा :को प्रपोज करके बाकी सभी से हस्ताक्षर करा दिए.मित्रा की दलील थी ये सारे वोट माथुर के कहने पर पड़े हैं बहुमत उसी का है अतः वही रिप्रेंज्टेतिव होना चाहिए ,मेरा तर्क था बहुमत ने मित्रा के पक्ष में वोट दिया है.शेखर सा :ने मुझसे कहा सारे लोग तुम्हारे साथ हैं तुम्ही रहो परन्तु मेरे मित्रा को रखने के आग्रह को मान लिया.वाया स्टाफ वेलफेयर कमेटी 'होटल मुग़ल कर्मचारी संघ'नामक युनियन का गठन किया गया जिसके महासचिव सुदीप्तो मित्रा थे और अध्ययक्ष थे श्री चन्द्र प्रकाश भल्ला जो टेलीफोन सुपरवाईजर थे और पेंटल सा :के साथ ओबेराय होटल में काम कर चुके थे.मैंने युनियन की सदस्यता नहीं ली थी.मेरठ के अपने कटु अनुभव के कारण इस सब से दूर रहना चाहता था.परन्तु जो हम नहीं चाहते वही अक्सर हो जाता है.मित्रा को बैंक आफ बरोदा में प्रोबेशनरी आफीसर की पोस्ट मिल गई और रिजायीन कर गये.उनसे पहले विनोद श्रीवास्तव भी कैनरा बैंक में क्लर्क बन कर जा चुके थे.समस्त स्टाफ के भारी दबाव में बिना साधारण सदस्य बने ही मुझे सीधे युनियन का महासचिव पद स्वीकार करना पडा. औपचारिकताएं बाद में पूरी की गयीं.सम्पूर्ण वर्किंग कमेटी ने यह मान लिया था कि मैं अपने हिसाब से चलूँगा और किसी भी दबाव को स्वीकार नहीं करूंगा. 
शेखर सा :के अजीज भी थे पर्सोनल मैनेजर श्री हरी मोहन झा जो  बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री जगन्नाथ मिश्र के भतीज दामाद थे.वह टाटा कं. में रहते हुए दबंग युनियन सेक्रेटरी को धक्का देकर खदेड़ने और सारा सामन जमशेदपुर में छोड़ कर दूसरी जगह प्रोमोशन पाने से प्रफुल्लित थे. उनका कहना था वह रिंग मास्टर हैं और युनियन वही गवर्न करेंगें.उन्होंने अपने राजनीतिक दबदबे से समस्त मैनेजरों को लामबंद कर रखा था और जी.एम्.पेंटल सा :को परेशान कर रखा था.लेखा विभाग में काम पर पकड़ की वजह से शेखर सा :मेरे पक्षधर भी थे और अपने मेनेजमेंट की गुटबाजी में झा सा : के पैरोकार भी थे.लिहाजा झा सा :के चंगुल में मेरे न आने पर भी झा सा :ने मुझसे कोई टकराव मोल नहीं लिया.युनियन की गतिविधियाँ तथा जनता सरकार के बन जाने पर झा सा :के मनोबल में गिरावट आने एवं मकान लेने की प्रक्रिया के सम्बन्ध में अगली बार.......

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3 टिप्‍पणियां:

  1. गुरूजी प्रणाम...ऐसा लगता है की अच्छे लोगो को बुरे लोग ..अपने काम के लिए ज्यादा इस्तेमाल करने से नहीं चुकते ! बहुत सुन्दर !

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  2. बहुत सुन्दर और रोचक प्रस्तुति| धन्यवाद|

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