सोमवार, 26 सितंबर 2011

आगरा/1986-87(भाग-5)-चंडीगढ़ जाना

यों तो मुझे घूमने का कोई शौक नहीं है परंतु दुख-तकलीफ मे मदद करने के स्वभाव तथा सीधी रिश्तेदारी के कारण चंडीगढ़ जाना पड़ा तो गए। शालिनी के बड़े भाई के एम माथुर उर्फ 'कुक्कू' सेंट्रल वेयर हाउजिंग कार्पोरेशन ,चंडीगढ़ मे पोस्टेड थे। उनके पिताजी रिटायरमेंट के बाद भी टूंडला ही मे निजी मकान मे रहते थे और छोटे (परंतु शालिनी से बड़े)भाई राजा -की-मंडी ,आगरा मे रेलवे इन्क्वायरी मे क्लर्क थे,लेकिन टूंडला से ही रोज आना-जाना करते थे। जैसा कि शालिनी की माता ने तब बताया था कि एक दिन अचानक उनके पिता घर मे पहने कपड़ों मे ही और दो-चार कपड़े झोले मे लेकर चंडीगढ़ के लिए रवाना हो गए ,उनके कहे मुताबिक पोती का हवाला देकर रोकना चाहा तब भी न रुके। चंडीगढ़ जाकर उन्हें पैरालिसिस का अटैक हो गया। टूंडला से सब चंडीगढ़ पहुँच गए। शरद की पत्नी संगीता का अपनी जेठानी मधू (जो कुक्कू की पत्नी और कमलेश बाबू की भतीजी हैं) पर आरोप है कि उन्होने गरम-गरम दूध अपने श्वसुर साहब के गले मे डाल दिया जिससे उनके गले मे घाव हो गए। उन्हें पी जी आई मे दाखिल करा दिया गया। इस घटना से 06 माह पूर्व उन्होने अपना हाथ दिखा कर टूंडला मे मुझसे पूछा था कि और कितने वर्ष जीवित रहूँगा। हाथ के मुताबिक साढ़े बासठ वर्ष मैंने उन्हें बताया तो तपाक  से बोले कि अब सिर्फ 06 माह और। मुझे उनकी वास्तविक उम्र का अंदाज न था वरना टाल जाता और कुछ न बताता। गणना के अनुसार वह समय आ गया था। अतः जब शरद मोहन का टेलीग्राम आया-"फादर सीरिअस" और बाबूजी ने कहीं से मुझे दुकान पर फोन करके उस बाबत बताया तो तत्काल मैंने सेठ जी से अनिश्चित काल के लिए चंडीगढ़ जाने की बात काही। मेरा कार्य उनकी निगाह मे था और उन्होने स्वीकृति दे दी।

शालिनी तत्काल उसी रात चलने को राजी न थीं। मैंने प्रश्न-कुंडली से भी वास्तविकता ज्ञात कर ली थी और अपनी माता को बता दी थी कि अब आना तुरंत नहीं होगा। शालिनी को वास्तविकता न बता कर तुरंत चलने का फैसला दे दिया। यशवन्त अभी चार वर्ष का भी न था ,रात के सफर मे दिक्कत थी और परिस्थितियाँ जल्दी करने की थीं। पहली उपलब्ध गाड़ी से दिल्ली फिर पुरानी दिल्ली पहुंचे और रात प्लेटफार्म पर गुजार के सुबह 'हिमाल्या एक्स्प्रेस' से चंडीगढ़ के लिए रवाना हुये। दोपहर  तक चंडीगढ़ पहुंचे और स्टेशन से पी जी आई भी पहुँच गए किन्तु टेलीग्राम मे वार्ड आदि का उल्लेख न होने से और तब मोबाइल न होने से दिक्कत थी कि अब कैसे पता करें ?एक तीन शेड मे सामान और शालिनी तथा यशवन्त को रुकने को कह कर पता निकालने हेतु दफ्तर-दफ्तर चक्कर काटने लगे इत्तिफ़ाक से शालिनी के बड़े ताऊ जी के बड़े बेटे दीख गए उनके साथ पहुंचे उस बिस्तर पर जहां उन्हें आक्सीजन दी जा रही थी। पूछने पर उन्होने इशारे से जवाब दिया कि अब ठीक नहीं होंगे। शायद उन्हें साढ़े बासठ वर्ष तक कुल आयु होने की बात ध्यान होगी। तब से अब मैंने किसी को भी हाथ अथवा जन्म पत्री देख कर कुल आयु /उम्र बताना बंद कर दिया है।

उस वक्त अस्पताल मे कुक्कू उनके ताऊ जी,चचेरे भाई ,उनकी पत्नी मधु मौजूद थे। शरद शायद अपने दफ्तर के लिए मेसेज देने गए थे। उस सराय मे जहां वे लोग ठहरे थे हम लोगों को पहुंचवा दिया गया । वहाँ कुक्कू और शरद के बच्चे ,शरद की पत्नी संगीता और शालिनी की माता जी,ताई जी,चचेरी भाभी,छोटी बहन सीमा और उनके बच्चे   थे । बाद मे शरद की वह मौसेरी बहन मिक्की अपने टी एक्स आर पति के साथ आ गईं जिन्हें शरद 1982 मे टूंडला मे गोद मे उठा कर नाचते थे और वह मौसी-मौसी करती तथा उनकी मौसी हँसती रहती थीं। वे लोग राक गार्डेन घूमने जा रहे थे शालिनी की माता जी ने हम लोगों से भी घूमने को कहा परंतु मैं तो घूमने नहीं गया था अतः घूमने नहीं गया। बल्कि मुझे तो हैरानी हुयी कि कैसे लोग बीमार को देखने की आड़ मे घूमने का प्लान बना लेते हैं।

खाना-नाश्ता सब केंटीन मे होता था। वे लोग मेरे आर्थिक स्थिति के मद्दे नजर खर्च नहीं करने देते थे। मेरे लिए बार-बार आना- जाना संभव नहीं था अतः रुका रहा।एक दिन सुबह के खाने के कूपन पहले ही मैंने खरीद कर रख लिए थे और लच के समय भुगतान कर दिया था।  जबकि उनकी बड़ी बेटी रागिनी अपने पति अनिल के साथ और छोटी बेटी सीमा के  पति योगेन्द्र  देख कर क्रमशः गाजियाबाद और झांसी लौट चुके थे। हमें सूचना तब दी गई थी जब डाक्टरों ने जवाब दे दिया था। 12 नवंबर 1987 की साँय शालिनी के पिताजी का निधन हो गया उस वक्त वहाँ पर शालिनी के ताऊ जी ,उनके बेटे,दोनों भाभिये और मै ही मौजूद थे। नरेंद्र मोहन जी ने मुझ से कुक्कू और शरद की पत्नियों को सराय पर छोड़ आने ,सबसे अपना-अपना सामान बांधने का संदेश देकर लौट आने को कहा तब तक अस्पताल मे ही खोज कर कुक्कू और शरद को उन्होने बुलवा लिया।

चूंकि कुक्कू तब नाभा मे पोस्टेड थे अतः रात्रि मे ही मारुति वैगन और टैक्सी कार के जरिये सब लोग नाभा को चले। तब खालिस्तानी आतंकवाद चरम पर था अतः जगह-जगह रोका गया और साथ मे पार्थिव शरीर देख कर जाने दिया गया क्योंकि पी जी आई अस्पताल का डेथ सर्टिफिकेट उन्हें दिखाया जाता रहा था। रास्ते मे किसी सनकी को चाय पीने की तलब लगी और उन लोगों ने एक क्रासिंग पर चाय पी किन्तु मैंने चाय पीने से इंकार कर दिया। मुझे ऐसी हरकतें देख कर विस्मय था कि कैसे मौज-मस्ती करते हुये पार्थिव शरीर को ले जाते हैं।

गहरी रात मे कर्तार पूरा,जत्था के गुरुद्वारा के निकट, नाभा(जिला -पटियाला) पहुंचे जहां कुक्कू की सूचना पर उनके मकान मालिक ने उनका बाहर का कमरा सामान हटा कर खाली कर दिया था और उसी मे शालिनी के पिताजी का पार्थिव शरीर रखा गया और हम लोग भी उसी मे रुके जबकि महिलाएं बगल वाले कमरे मे। रात मे शालिनी के ताऊ जी भजन गाते रहे ,छोटे भाई के निधन पर गम मिटाने का उनका यही तरीका था।

दिन मे नौ-दस बजे तक रागिनी और अनिल गाजियाबाद से पहुँच गए और शायद योगेन्द्र झांसी से देर शाम तक पहुँच पाये थे। अनिल ने अर्थी को कंधा भी दिया जिस पर किसी ने देख कर उन्हें हटाया कि दामाद कंधा नहीं देते हैं। मैंने ख़्वामख़्वाह का स्टंट किया ही नहीं। किसी पार्क मे अंतिम संस्कार किया गया।

शाम को शरद की पत्नी बेहोश हो गईं ,उनकी छोटी बेटी होने वाली थी। लोगों को ताज्जुब हुआ कि पुत्र-वधू को श्वसुर का इतना धक्का लगा परंतु शालिनी की माता का कहना था उन्हें काफी दिनों से कब्ज था गैस दिमाग पर चढ़  गई होगी और जिस नर्सिंग होम मे उन्हें एडमिट किया गया वहाँ के चिकित्सकों का भी यही विचार था।

अगले दिन सुबह नाभा से पहली गाड़ी पकड़ कर मै आगरा के लिए चला ,यशवन्त और शालिनी नाभा मे ही रुक गए थे। मेरा टिकट आगरा कैंट तक का था वह गाड़ी टूंडला निकल जाती उसे दिल्ली मे छोड़ कर दूसरी गाड़ी से मुझे राजा-की-मंडी पर उतरना था। अंबाला कैंट गुजर जाने के बाद एक टी टी साहब आए और मुझे पेनल्टी चार्ज लगाने की बात करने लगे,मैंने पूंछा किस खुशी मे?वह बोले आप की जर्नी खत्म हो गई और आप आगे निकाल आए हैं मैंने कहा जनाब मेरा टिकट आगरा कैंट तक है और मुझे इस ट्रेन को दिल्ली मे छोडना है ,पेनल्टी किस बात की?अपनी गलती पर मुस्करा कर शरद मोहन के वह विभागीय साथी आगे बढ़ गए।

दिल्ली मे ट्रेन बदल कर मै आगरा 14 नवंबर को पहुँच गया उस दिन विश्राम करके अगले दिन से अपनी ड्यूटी ज्वाइन कर ली। इस प्रकार चंडीगढ़ की यात्रा का समापन नाभा होते हुये हुआ।


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3 टिप्‍पणियां:

  1. टी टी बेचारा आगरा को अम्बाला पढ गया। फ़िर तो वो खीज कर चुपचाप खिसक गया होगा।

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  2. आपने इस संस्मरण के द्वारा इंसानी रिश्तों, जज़्बातों के कई आयाम उद्घाटित किए हैं। ज्योतिष वाला प्रसंग रोचक था।

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  3. अपनी जिंदगी के अनुभव साँझा करने में किसी को क्या तकलीफ है| धन्यवाद|

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