शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

आगरा/1986-87(भाग-6)

मेरे सामने नाभा मे जिक्र था कि वे लोग आर्य समाज से हवन जल्दी कराएंगे क्योंकि दोनों लोग को ड्यूटियाँ ज्वाइन करनी है। उस अनुसार हमारे बाबूजी उनके टूंडला निवास पर शोक प्रकट करने हेतु गए परंतु वहाँ कोई नहीं लौटा था ,पता चला कि 13 वी करके लौटेंगे। पोंगा-पंडितवाद लोगों के दिमाग मे बुरी तरह घुसा हुआ है और समाज को खोखला कर रहा है। पढे-लिखे लोग भी समझने को तैयार नहीं होते यही देश और समाज के पतन का कारण है।

जब वे लोग टूंडला लौटे तो उन्हीं के साथ  शालिनी भी यशवन्त को लेकर वहाँ पहुँच गईं। कुछ दिन माँ के साथ और रहने की इच्छा व्यक्त की थी अतः वहाँ रहने दिया। दिसंबर के आखिर तक मथुरा मे नरेंद्र चाचा (बाबूजी के चचेरे भाई जो वहाँ डेंटल सर्जन हैं) के यहाँ रह कर और वृन्दावन घूमते हुये भुआ -फूफा जी हमारे घर आए। उन लोगों की इच्छा शालिनी और यशवन्त से मिलने की थी। बउआ वैसे तो इन लोगों को मकर संक्रांति पर बुलाने का इरादा रखती थीं। परंतु भुआ का लिहाज करते हुये मै टूंडला जाकर बुला लाया। भुआ ने आते ही शालिनी को वृन्दावन का प्रशाद दे दिया और उनके पिता के निधन की बाबत कोई शोक नहीं व्यक्त किया जो शालिनी को तीखा चुभा। उन्होने प्रशाद छिपा कर रख दिया और खाया नहीं। भुआ से तो नहीं परंतु मुझ से कहा क्या भुआ जी ने उनके मरने के लिए प्रशाद बोला था? मैंने यह बात बउआ-बाबूजी तक पहुंचा दी किन्तु भुआ से किसी ने कुछ नहीं कहा।

भुआ की हद तो तब हुयी जब उन्होने हमारे सामने ही हमारे माता-पिता को भड़काते हुये कहा कि यह मकान विजय का कैसे हुआ?जब उन्हें उन लोगों ने बताया कि उसने (मैंने) अपने बचत के पैसों से सिक्यूरिटी जमा करके लिया और अब भी अपने ही पैसों से किश्तें जमा कर रहा है तो भुआ की गणित सामने आई कि तुमने (मेरे बाबूजी ने)पढ़ाई मे पैसा खर्च किया था अतः यह मकान तुम्हारा हुआ और इसमे तीनों बच्चो का हिस्सा लगाना चाहिए था;विजय को अपने नाम करने दे कर गलती की। बाबूजी ने बड़ी बहन की बातें चुप-चाप सुन ली और उन पर कान नहीं धरा। बाबूजी ने बहन से तो नहीं कहा परंतु हकीकत तो थी ही कि मैंने तो बी ए तक पढ़ कर छोड़ दिया,अजय ने 3 वर्षीय डिप्लोमा कोर्स को 6 साल मे पूर्ण किया उस पर भी तो खर्च हुआ था और 12 वी तक शोभा पर भी तब केवल विजय पर पढ़ाई का खर्च करने से उसके पैसे पर दूसरे बहन भाई का अधिकार कैसे हो सकता है?भुआ की भूमिका फूट डलावा, आग-लगावा की थी। भुआ ने अपने से बड़े  एक दूसरे भाई के खिलाफ दरियाबाद मे पैतृक संपत्ति का मुकदमा लंबे समय तक लड़ा और फूफा जी की तमाम तंख्वाह तबाह करा दी। पोस्टमैन को खरीद कर उनके सम्मन गायब करा कर एक्स पार्टी केस जीत लिया और लाखेश भाई साहब के डी आई जी दोस्त के मार्फत खेतों  पर कब्जा कर लिया।

हमारे घर से भुआ -फूफा जी कानपुर तूफान एक्स्प्रेस से लौटे पहुँचते-पहुँचते वहाँ अंधेरा हो गया था। गाड़ी मे भीड़ अधिक थी ,कुली आ नहीं पाया और वे दोनों उतर गए एवं उनका सामान आगे गाड़ी मे चला गया। दिल्ली तक लिखा-पढ़ी कर लिए कुछ भी वापिस न मिला। शालिनी को बेहद प्रसन्ता हुयी क्योंकि पिता के निधन के बाद आने पर उन्हे भुआ ने परशाद भेंट किया था और मकान को विवादित बनाने की कुचेष्टा की थी। भुआ को अपनी काली करतूतों की सजा परमात्मा से मिल गई थी किन्तु आदत नहीं बदली। पहले कभी बाबा जी के साथ रामेश्वरम गईं थीं ,फूफा जी नहीं गए थे। लौटते मे रात्री मे मैदान मे मूत्र विसर्जन हेतु गईं और खुले पड़े डी सी बिजली के तारों से छू गईं -करेंट ने उन्हें दूर फेंक दिया था और उनके दायें हाथ की हड्डी कोहनी से कलाई तक टूट गई थी। बकरे की हड्डी डलवाने के बावजूद वह हाथ निष्क्रिय रहा। फूफाजी और उनके बच्चे खाना बनाने तक का काम करते थे। खुद भुआ नहाने-धोने तक मोहताज थीं किन्तु हेंकड़ी आसमान पर थी।

हमारी छोटी बहन जी अपनी भुआ से हेंकड़ी मे टक्कर लेती हैं और लाखेश भाई साहब से उनके मधुर संबंध हैं नेल्लोर मे बैठ कर भी जबकि सवा कि मी दूर हमसे रह कर भी संबंध लाखेश भाई साहब ने  नहीं रखना पसंद किया। जैसे भुआ ठोकर खाकर भी नहीं सुधरती थीं वैसे ही डा शोभा भी सुधर नहीं सकतीं आखिर वह हिन्दी और संस्कृत मे एम ए ,संस्कृत मे पी एच डी ,बी एड जो सुसराल जाकर हो गई हैं। भुआ के तो नौ सगे भतीजे थे इसलिए जिन के खिलाफ थी उनमे मेरा नाम प्रमुख था क्योंकि मैंने छब्बीस वर्ष की उम्र मे अपना मकान हासिल कर लिया और फूफाजी रिटायरमेंट तक न बना सके। डा शोभा का तो संभवतः  एक ही भतीजा यशवन्त और शायद एक ही भतीजी अनुमिता (अजय की पुत्री) है परंतु वह उनके खिलाफ हैं। फूफा जी (नृत्य बिहारी लाल) की भांति ही बहनोयी साहब (कमलेश बिहारी) भी सुसराल की संपत्ति पर निगाह रखते हैं। 1975 मे शादी के बाद 1976 मे उन्होने (जैसा तब शोभा ने बउआ को बताया और उन्होने मुझे) शोभा से कहा था कि बाबूजी दरियाबाद मे अपना हिस्सा मांग लें ,शोभा के यह पूछने पर कि वे दोनों (मै और अजय) तो देखने जाएँगे नहीं तो कौन देखेगा?उन्होने बी एच ई एल  ,हरद्वार की अपनी मेषीनिस्ट की पोस्ट छोड़ कर हमारे बाबूजी के बिहाफ पर देखने की बात कही थी। परंतु बाबू जी ने उनकी बात पर गौर नहीं किया। मैं भी उनकी इस बात से सहमत नहीं था। अतः उन्होने मेरे विरुद्ध मन मे गांठ बांध ली और जब मौका पड़ा मुझे नीचा दिखाने और नुकसान पहुंचाने का कृत करते रहे जिसे मै तब तक न समझ सका जब तक उन्हीं की छोटी बिटिया ने यह खुलासा नहीं कर दिया कि,शालिनी के बड़े भाई कुक्कू की पत्नी मधु उनकी भतीजी हैं और कुक्कू उनके बहौत अच्छे दोस्त रहे हैं। जब इस बात का जिक्र अभी उनके अपनी भतीजी की शादी मे आने के अवसर   पर मेरे घर आने पर किया तो खीसे निपोरते रह गए । अब प्रतीत होता है कि कुक्कू को हमारे ज्योतिषीय सलाहकार का पता बता कर उन्हें खरीद कर हम लोगों को गुमराह करने का सुझाव कमलेश बाबू का ही रहा होगा। उन पंडित जी ने 14 गुण को 28 बता कर जन्म पत्री मिला दी थी और जब भेद खुलने पर मैंने उनसे सवाल उठाया तो उन्होने मेरे बाबूजी की इच्छा बता दिया जबकि बाबूजी कोई भी जन्म पत्री मिलवाने कभी नहीं गए मुझे ही भेजते थे। मुझसे फरेब मेरे अपने रिशतेदारों के सुझाव पर उन्होने किया था।

यह ब्लाग मेरे जीवन के संघर्षों की कहानी सार्वजनिक करने हेतु मैंने शुरू किया है परंतु एक  काबिल ब्लागर् का  मत है कि निजी बातों को सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए। जबकि वही ब्लागर महोदय अपने परिवार तथा मित्रों से संबन्धित जांनकारी सचित्र अपने ब्लाग पर देते रहते हैं। 'पर उपदेश कुशल बहुतेरे' हमारे देश की पुरानी रीति है पैसे वालों  के लिए सब छूट किन्तु कोई निर्धन उनकी बराबरी मे कैसे आ सकता है? मैंने ब्लाग लेखन को 'स्वांतः सुखाय,सर्वजन हिताय 'घोषित किया है उसका भी उन्होने अपने ब्लाग पर उपहास किया है। प्रत्येक का लेखन उसके अपने हिसाब से होता है और उससे औरों का सहमत होना आवश्यक नहीं होता है। परंतु किसी एक को दूसरे को हिदायत देने का अधिकार भी नहीं बंनता है। किन्तु मेरे ब्लाग्स पर कुछ धनवान ब्लागर्स हिदायत यदा-कदा देते रहते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि हमारी ही छोटी भांजी  ने फेक आई डी से जो कुचक्र रचा है यह भी उसी का एक हिस्सा होगा।


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2 टिप्‍पणियां:

  1. यह तो एक नायाब संस्मरण बनता जा रहा है। शायद आत्मकथा में तबदील हो जाए।

    कृपया ज़ारी रखें। इन आलेखों का सहज प्रवाह और बीते घटनाक्रम से मिलते संदेश प्रेरक और विचारणीय होते हैं।

    कई लोगों ने बहुत सी निजी बातें सार्वजनिक कीं ... मैं दो का ही केवल नाम लेना चाहूंगा ... हरिवंशराय बच्चन और महात्मा गांधी।
    दोनों की आत्मकथा कालजयी कृतियां हैं।

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  2. मनोज जी,
    आपने ठीक पहचाना यह आत्मकथा ही है इसीलिए इसका शीर्षक 'विद्रोही स्व स्वर मे' रखा है। परंतु महात्मा गांधी और डॉ हरिवंश राय बच्चन दोनों ही अपने अपने क्षेत्र की महान विभूतियाँ हैं। स्वामी विवेकानंद ने कहा था प्रारम्भ मे जिस वस्तु,पदार्थ,व्यक्ति का जितना तीव्र विरोध होता है कालांतर मे वो उतना ही लोकप्रिय होता है-शायद ऐसी ही सोच आपके कथन का कारण हो।
    मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ की मैं तो संघर्ष का एक छोटा सिपाही हूँ और उसी रूप मे अपना योगदान दे रहा हूँ।

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