शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

आगरा/1992 -93 (भाग-4)-लखनऊ यात्रा

ऋषिराज की शादी 1992 मे दशहरा के रोज होना था । एक खानदानी परंपरा के अनुसार शादी के समय माँ को  लड़का या लड़की जिस की शादी हो उसके पीछे बैठना होता है। ताईजी का निधन होने के कारण चाची या बड़ी भाभी को बैठना था। चूंकि छोटी ताईजी का भी निधन हो चुका था और उन लोगों से इन लोगों के संबंध भी मधुर नहीं थे अतः अतः भाभी जी (सुरेश भाई साहब की पत्नी)से भी नहीं कहा और हमारी माँ कहीं आने-जाने की शारीरिक स्थिति मे नहीं थी ,इसलिए शालिनी को वह रस्म अदा करने हेतु अनुमति देने का अनरोध -पत्र महेंद्र जीजाजी ने बाबू जी के पास भेजा। जब बाबूजी ने अनुमति दे दी तब महेंद्र जीजाजी ने रु 11/- का money order भेज कर शालिनी के भाई को देने का अनुरोध किया । इसे 'भात का न्यौता 'कहा जाता है जिसका अर्थ है कि,पीहर से पीछे बैठने वाले के परिवार के लिए और उस लड़के( जिसकी शादी है )के लिए कपड़े आदि भेजे जाएँ। यह बात हम लोगों को अच्छी नहीं लगी और बाद मे माधुरी जीजी ने भी कहा कि,महेंद्र ने अपनी माँ के निर्देश पर वह पत्र चाचा को भेज दिया उन्हे खबर नहीं थी वरना वह उन लोगों(शरद मोहन) पर दबाव न डालने देतीं। बहरहाल शालिनी की माँ ने शालिनी,यशवन्त,मेरे तथा ऋषिराज के लिए वस्त्र भिजवाए। इसके बदले मे माधुरी जीजी ने शालिनी की भाभी संगीता के लिए साड़ी भिजवा दी थी (हालांकि रिवाज तो यह है कि यदि किसी विवाहिता को वस्त्र दिये जाते हैं तो साथ मे उसके पति के लिए भी शुगन का कुछ देना होता है जिसका पालन नहीं किया गया था)।

हम लोग आगरा से इस हिसाब से चले थे कि,रवीन्द्र पल्ली जाकार माइंजी से भी मिलेंगे। राजाजीपुरम से उनके यहाँ गए तो घर पर माइंजी और अंगद (शेष का पुत्र )ही मिले थे। शेष और उनकी पत्नी दिल्ली गए हुये थे। उनके घर काफी देर रहे थे,इस बार माइंजी का व्यवहार काफी अच्छा रहा था। उन्होने शेष की 'आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस'की एक डिक्शनरी यशवन्त को भेंट की थी-

यह यादगार डिक्शनरी यशवन्त ने सम्हाल कर रखी हुई है जिससे वह काफी लाभान्वित भी हुआ है। खाने के वक्त तो माईंजी को शालिनी ने उनके साथ मदद की थी किन्तु शाम को जब हम लोग वापिस लौट रहे थे,माईंजी चाय बना रही थी शालिनी ने सोचा उन्हे कष्ट देने की बजाए खुद ही फ्रिज से पानी निकाल कर पी लें। पीने का पानी भभौने,जग आदि मे था, कोई बोतल न थी। माईंजी ने हँसते हुये पूछा कि पानी पीना है तो हमसे क्यों नहीं कहा?जिसका घर होता है उसे ही पता होता है कौन चीज कहाँ है? हम लोगों के घर की यह परंपरा न थी कि किसी के घर जाकर चीजें टटोल-खकोल की जाएँ-यह तो शालिनी के पीहर के संस्कार थे जो वह फ्रिज तलाश रही थीं। मैंने कहा भी था कि माईंजी से पूछ लो। माईंजी ने ग्लास मे पानी दे दिया। यह भी बताया कि लोग-बाग बोतल को मुंह से पीकर रख देते हैं इसलिए वह बोतल रखती ही नहीं हैं क्योंकि झूठा करने से इन्फेक्शन का भय रहता है। उनकी यह बात हमारे बाबूजी और बउआ के विचारों से मेल खाती है।

झांसी से कमलेश बाबू अपनी छोटी बेटी मुक्ता को लेकर आए थे। वह भी माईंजी से मिलना चाहते थे। बीच मे एक ही दिन निकला था अतः पुनः शालिनी नहीं गई। मै,यशवन्त,मुक्ता और कमलेश बाबू ही गए। जब पहुंचे तो वे लोग भोजन कर रहे थे। शेष की पत्नी ने उठ कर फिर से तहारी ही जो वे लोग खा रहे थे और बनाई। कमलेश बाबू ज्यादा नहीं रुके । खाकर चाय पीकर वापिस हो लिए। चूंकि वह माईंजी के लिए भांजा दामाद थे अतः उन्हें व मुक्ता को कुछ रुपए भी माईंजी ने दिये।मुक्ता ने नरेश से किन्ही केसेटो की फरमाईश की होगी सो उन्होने उसे लाकर भेंट कर दिये थे। उन लोगों से ये लोग खुले होंगे जो उनसे फरमाईश की ;मुझसे तो किसी ने कभी कोई फरमाईश नहीं की थी।

कमलेश बाबू की महेंद्र जीजाजी से काफी घुटन्त थी। रात मे सबसे ऊपरी छत पर ड्रिंक का कार्यक्रम था। मै शामिल नहीं हुआ तो कमलेश बाबू (जिन्होंने अजय की शादी मे 1988 मे ट्रेन मे शरद मोहन की मौजूदगी मे ढक्कन से मेरे मुंह मे शराब उंडेल दी थी और बाद मे चार की मेवा के साथ शराब की बोतल भी उनकी सुसराल मे भेज दी थी)बोले हम अजय की शादी मे (डॉ शोभा और कमलेश बाबू अजय और उनकी पत्नी का भी  नाम ही पुकारते हैं -भाई साहब या भाभी जी नहीं)खुद आपको ट्रेन मे पिला चुके हैं ,बच नहीं सकते। महेंद्र जीजाजी,कमलेश बाबू गठबंधन ने जबरिया मुझे भी ग्लास भर कर दिया मैंने उसे पानी की तरह पी कर उलट कर नीचे रख दिया उन लोगों की तरह चुसकियाँ लेकर नहीं। अगले दिन शाम को खाने से पूर्व भी ड्रिंक कार्यक्रम था और महेंद्र जीजाजी- कमलेश बाबू गठबंधन ने फिर उसी तरह दबाव बना कर मुझे ग्लास पकड़ाया तो वैसे ही पानी की तरह जल्दी से निगल कर मैंने ग्लास खाली कर दिया। उस वक्त तक न तो कमलेश बाबू शक के घेरे मे आ पाये थे न ही महेंद्र जीजाजी, और न ही रंग मे भंग करना मेरा स्वभाव था अतः उन लोगों का खेल चल गया।

राजाजीपुरम मे ही किसी पार्क मे ऋषिराज की बारात गई थी ,महेंद्र जीजाजी ने लड़की वालों के लिए  वहीं व्यवस्था करा दी थी। ऋषिराज की पत्नी के ताऊजी शालिनी के टेलर मास्टर वही फूफाजी थे जो हमारे फूफाजी के दोस्त थे।खाने का तीन प्रकार का बंदोबस्त था। नवरात्र के व्रतधारियों के लिए फलाहार,शाकाहार और मांसाहार। हम तो शाकाहारियों मे थे।

जिस दिन हम लोग माईंजी के घर गए थे ,लौटते मे अमीनाबाद होते हुये आए थे। कारण यह था कि पार्ट-टाईम वाले (रेकसन फुटवियर)सेठ जी ने अपने एक कस्टमर के यहाँ रिमाईंड करते आने को कहा था। मैंने उनका संदेश दे दिया था । उस दुकान के मालिक एक वृद्ध मुस्लिम सेठ जी थे जो आगरा अक्सर ब्रहस्पतिवार के दिन आते थे जिस दिन अमीनाबाद मे साप्ताहिक अवकाश रहता है। उन्होने 10 दिन मे आगरा आ कर उनका भुगतान करने का आश्वासन दिया और शिष्टाचार वश हम लोगों -शालिनी और यशवन्त समेत मुझे कोल्ड ड्रिंक पिलवाया।

मैंने बाजार से यशवन्त के लिए कुछ वस्त्र ले लिए ,शालिनी ने भी चिकन  का एक सलवार-सूट अपने लिए लिया था। उनकी इच्छा अपनी संगीता भाभी के लिए भी एक सलवार-सूट लेने की थी सो उन्होने उनकी पसंद के मुताबिक झीने गुलाबी  वस्त्र का लिया। उनकी बेटियों के लिए भी कुछ कपड़े लिए थे। अतः परंपरा निर्वाह हेतु मैंने संगीता के पति हेतु एक रूमाल भी रखवा दिया था। हम लोग चारबाग से गंगा-जमुना एक्स्प्रेस से चले थे और आगरा सिटी पर उतरे थे। उन लोगों के क्वार्टर पर ही पहले गए। शालिनी ने अपने लाये और माधुरी जीजी द्वारा भेजे वस्त्र  और पकवान वहाँ निकाल कर दे दिये। रास्ते मे यशवन्त को ओढ़ाने हेतु एक वह बढ़िया कंबल ले गए थे जो मुझे होटल मुगल से एक वर्ष दीपावली गिफ्ट मे मिला था। वह किस प्रकार सिटी क्वार्टर पर छूट  गया या उन लोगों ने छिपा कर रख लिया फिर उसका कोई अता-पता न चला।

दिन होने पर हम लोग अपने घर कमलानगर आ गए। उतनी ही देर मे वहाँ दो बार हम लोगों को चाय पिला दी गई थी। ...........


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2 टिप्‍पणियां:

  1. गुरूजी प्रणाम ! आप के प्रतेक लेख गजब के है ! कभी - कभी मुझे आश्चर्य होता है की इतनी गहन sentence को आप remember कैसे रखते है या जीवनी की डायरी लिख रखे है ! बेहद सुन्दर

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  2. गोरखनाथ जी नमस्ते,

    यह तो ब्लाग शुरू करने के बाद व्यक्तिगत अनुभवों को लिखने का विचार आया जिसे याददाश्त के मुताबिक लिखता चल रहा हूँ। मैंने पूर्व मे कोई डायरी नहीं लिखी थी। लिख भी सिर्फ इसलिए रहा हूँ कि,यदि किसी को मेरे द्वारा खाई ठोकरों से बचने का अपने लिए मार्ग मिल सके तो वह बच सके।

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