गुरुवार, 3 जनवरी 2013

डॉ दराल साः को खुला पत्र ---विजय राजबली माथुर

विगत वर्षों की भांति इस बार मैंने अन्य ब्लाग्स व ब्लागर्स के संबंध मे अपना अवलोकन नहीं दिया था और देना भी नहीं चाहता था परंतु डॉ टी एस दराल सा :  ने अपने अवलोकन के एक खंड की अंतिम पंक्तियों मे मेरा उल्लेख किया है जिसका उत्तर मैंने अपनी टिप्पणी के रूप मे उस लेख पर इस प्रकार दिया था---

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हम से है ज़माना : दिनांक 28-12-2012

अत्यंत गुणवान और क्रातिकारी विचार रखने वाले श्री विजय माथुर जी के विचारों को लोग कम ही समझ पाते हैं. इसलिए वे अब ब्लॉग पर कम और फेसबुक पर ज्यादा नज़र आते हैं.     
विजय राज बली माथुरJanuary 01, 2013 6:47 PM
धन्यवाद डॉ साहब। वैसे मैं ब्लाग्स ('क्रांति स्वर','विद्रोही स्व-स्वर मे','कलम और कुदाल','जनहित मे'लगातार सक्रिय हूँ और श्रीमती जी के ब्लाग 'पूनम वाणी' की टाईपिंग भी खुद ही करता हूँ। शायद विवादों से बचने के कारण ब्लाग्स पर टिप्पणियाँ देने से संकोच करता हूँ इसीलिए आपने ऐसा निष्कर्ष निकाला होगा।
सुंदर है,वाह-वाह,खूब बढ़िया जैसे लच्छेदार शब्द मेरे पास नहीं हैं और लोगों को इनकी ही ख़्वाहिश रहती है अतः टिप्पणी देने से बचने लगा हूँ। 

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इसी खंड की पाँचवी पंक्ति मे डॉ साहब ने उल्लेख किया है-"रश्मि प्रभा जी की प्रभावशाली रचनाएँ अभी भी मन मोह रही हैं "
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मैंने ब्लाग लेखन के प्रारम्भ मे ही घोषणा की हुई है कि।मेरा लेखन-'स्वांतः सुखाय,सर्वजन हिताय' है। मैंने टिप्पणी बाक्स के ऊपर ही यह भी घोषणा की थी कि 'यह ब्लाग टिप्पणियों का मोहताज नहीं है'। अतः डॉ साहब का यह आरोप कि-"श्री विजय माथुर जी के विचारों को लोग कम ही समझ पाते हैं. इसलिए वे अब ब्लॉग पर कम और फेसबुक पर ज्यादा नज़र आते हैं. "-  मेरी समझ से बाहर है। मैंने अपने एक लेख मे खुद ही स्पष्ट लिखा था कि मैं जानता हूँ कि हमारे समकालीन लोगों को मेरे विचार अच्छे नहीं लगेंगे किन्तु मैं आने वाली पीढ़ियों के हितार्थ अपना लेखन करता हूँ और करता रहूँगा। मैं टिप्पणियों को लेन-देन  की धारणा से नहीं देखता हूँ यदि किसी के विचार अच्छे हैं तो निसंकोच अपनी समझ के अनुसार उसका उल्लेख करता हूँ अन्यथा अपना दृष्टिकोण भी बता देता हूँ किन्तु लेखक को संतुष्ट करने हेतु ख्वाम खाह की झूठी तारीफ़ों के पुल नहीं बांधता हूँ जैसा कि ब्लाग जगत का प्रचलन है। ब्लाग जगत मे कुछ लेखक खुद को खुदा और दूसरों को तुच्छ समझते हैं यही सबसे बड़ा कारण है कि मैंने टिप्पणियाँ देना बंद कर दिया है जिससे डॉ साहब ने यह निष्कर्ष निकाल लिया कि मैंने ब्लाग अध्ययन कम कर दिया है । बात जहां तक फेसबुक की है मैं उसे ब्लाग के 'पूरक'के रूप मे लेता हूँ। फेसबुक ग्रुप्स के माध्यम से काफी ज़्यादा लोगों तक ब्लाग मे व्यक्त विचारों का प्रसारण सुगमता से हो जाता है जबकि केवल ब्लाग जगत के आसरे रहने पर बात कुछ ही लोगों तक पहुँच पाती थी और फिर ब्लागर्स अपने थोथे  अहम व पूर्वाग्रहों  के कारण उसे ठुकरा देते थे। ब्लाग्स के संबंध मे अपनी पुस्तक'मीडिया समग्र' मे प्रो .डॉ जगदीश्वर चतुर्वेदी जी ने लिखा है-
"दसवां खण्ड- ब्लॉग संस्कृतिःतमाशबीनों की दुनिया"
वस्तुतः अधिकांश ब्लाग-लेखक तमाशबीन के तौर पर ही लिखते और एक-दूसरे की झूठी पीठ थपथपाते रहते हैं। मैं इस भेड़-चाल से बहुत दूर हूँ इसीलिए ब्लाग से दूर नज़र आता हूँ। फिर फेसबुक मे यह भी सुविधा है कि जिनसे हमे असुविधा है उनको हम अंफ्रेंड/ब्लाक करके छुटकारा पा सकते हैं किन्तु ब्लाग्स मे ऐसा करना शायद संभव नहीं है। 

डॉ साहब ने जिन नामों का उल्लेख किया है उनमे से डॉ दिव्या श्रीवास्तव व पी सी गोदियाल  जी की इसलिए प्रशंसा कर सकता हूँ कि वे राजनीतिक रूप से मुझसे 180 डिग्री के फासले पर होते हुये भी अभद्र व अश्लील भाषा के प्रयोग से बचे रहे हैं। अतः एक-दूसरे के लेखन पर टिप्पणियाँ न करना ठीक भी है और संतुलित भी। 

जिन राज भाटिया साहब का डॉ साहब ने उल्लेख किया है उन्होने  'हज़ारे आंदोलन' के दौरान फेसबुक पर मुझे 'नान-सेंस'तथा इंजीनियर सतीश सक्सेना साहब ने 'वाहियात' कह कर संबोधित किया था अतः उन दोनों को ब्लाक करके उनके ब्लाग्स अनफालों कर दिये थे। बाद मे सक्सेना साहब ने ईमेल के जरिये अपने बेटे व बेटी की एंगेजमेंट तथा शादियों पर उनके लिए आशीर्वाद देने को कहा था तो उन बच्चों को ईमेल के मार्फत शुभकामना व आशीर्वाद प्रेषित कर दिया था। एक और हरफन मौला ब्लागर मृत्युंजय कुमार राय की उस लेख पर टिप्पणी मौजूद है उनके व उनके बेटे माधव के ब्लाग्स भी अनफालों व उन दोनों को भी ब्लाक इसलिए करना पड़ा क्योंकि राय साहब ने मुझे 'बंगाल की खाड़ी मे डुबो देने' का ऐलान किया था।

ब्लाग जगत के केवल ये ही नमूने नहीं हैं। डॉ साहब का कहना है-"रश्मि प्रभा जी की प्रभावशाली रचनाएँ अभी भी मन मोह रही हैं "

(रश्मि प्रभा...Apr 27, 2012 07:21 AM कब मैं हिट होउंगी ... और राज्य सभा की सदस्य बनूँगी - आईला

Replies
महेन्द्र श्रीवास्तवApr 27, 2012 11:00 AM
आप जल्दी राज्यसभा में पहुंचें, मेरी भी शुभकामना है)"
प्रस्तुत टिप्पणी के माध्यम  से  'रश्मि प्रभा जी  ने ' ब्लाग जगत मे अपने चमचा ब्लागर्स के जरिये मेरे विरुद्ध अनर्गल और अबाध अभियान चलाया था जो अभी भी गतिमान है वह भी तब जबकि रश्मि प्रभा जी ने चार जन्म पत्रियों  का निशुल्क विश्लेषण मुझसे प्राप्त किया है और उनकी शिष्या ने भी चार जन्म पत्रियों का निशुल्क ही विश्लेषण प्राप्त किया है। 'हवन','ज्योतिष' आदि को निशाना बना कर लेख व टिप्पणियाँ खुले आम लिखे गए हैं। दूसरे ब्लागर्स की पोस्ट तक इन लोगों ने डिलीट कराई हैं अपने चमचों के द्वारा मुझे सपरिवार नष्ट करने की धमकियाँ दिलवाई हैं और वह खुद तांत्रिक प्रक्रियाओं से मेरे विरुद्ध षड्यंत्र चला रही हैं । जिन रश्मि प्रभा जी ने अपने  प्रबल चमचा ब्लागर से ब्लागर सम्मेलन के संयोजक ब्लागर रवीन्द्र प्रभात जी की कड़ी निंदा करवाई थी उनही के अगले आयोजन की अब निर्णायक बन गई हैं । उनके सह-संयोजक डॉ ज़ाकिर अली रजनीश जी से ज्योतिष को 100 प्रतिशत झूठा सिद्ध करवाया है। 

 ऐसे ब्लागजगत के लोगों से यदि 'टिप्पणियात्मक संबंध' मैंने सीमित कर दिया है तो गलत क्या किया है?यदि डॉ साहब को लगता है कि मैं ब्लाग जगत को कम समय दे रहा हूँ तो उसका कारण मेरे द्वारा टिप्पणियाँ न लिखना ही है।

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2 टिप्‍पणियां:

  1. विजय जी आपका ब्लोग्स पोस्ट में झूठी पीठ न थपथपाने का निर्णय बिलकुल सही है कोई तो हो जो सत्य कहे आप अपनी ज्ञानयुक्त पोस्ट से हम सभी का मार्गदर्शन करते रहें बिलकुल सही बहुत सही बात कही है आपने .सार्थक अभिव्यक्ति मरम्मत करनी है कसकर दरिन्दे हर शैतान की #

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  2. माथुर साहब , मैं आपकी भावनाओं को समझता हूँ और उनकी कद्र करता हूँ। टिप्पणी देना न देना एक व्यक्तिगत निर्णय है। यदि अच्छा लगे तो अवश्य दीजिये , न लगे तो कोई ज़रूरी नहीं होता। हम भी यही करते हैं। ब्लॉगजगत में सभी तरह के लोग हैं . यह आवश्यक नहीं कि सभी से विचार मिलें। कभी कभी ग़लतफ़हमी होने से भी हम क्षुब्ध हो जाते हैं। ऐसे में यदि ग़लतफ़हमी दूर हो जाए तो भूलकर आगे बढ़ना चाहिए। लेख में सभी ब्लॉगर्स का जिन्हें हम फोलो करते हैं , चुट्किले अंदाज़ में ज़िक्र किया गया है बस। कृपया इसे गंभीरता से न लें। इसके बाद स्वयं हमें कई नए और अच्छे ब्लॉगर्स से परिचय का अवसर मिला। शुभकामनायें।

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