शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

बहुत मुश्किल है कुछ यादों का भुलाया जाना (भाग-1 ) ---विजय राजबली माथुर

आर्यसमाज -कमलानगर,आगरा में यशपाल आर्य जी ने एक प्रवचन देते हुये एक ब्रिटिश जज साहब का वृतांत सुनाया था जिसके अनुसार वह जज साहब शार्ट -कट के लिए घर से अदालत जाते वक्त 'रेड लाईट एरिया' का रास्ता अपना लेते थे। यद्यपि वह संयमित प्राणी थे किन्तु उनके अवचेतन मस्तिष्क पर वहाँ चल रही गालियां अंकित हो गई थीं। जब वृद्धावस्था में वह गंभीर रुग्ण हुये और अनकांशस  रहने लगे तब कभी-कभी उनके मुख से वे भद्दी गलियाँ निकल जाती थीं जो उन्होने कभी रास्ते में सुनी थीं। डाक्टरों ने जब इसकी खोज की तब पता चला कि जज साहब अदालत जाने के लिए जिस रास्ते का उपयोग करते थे ये गालियां उसी का दुष्परिणाम हैं। यह तो अवचेतन मस्तिष्क की बात थी। किन्तु चेतन अवस्था में कुछ घटना-क्रम इस प्रकार असर डालते हैं कि चाह कर भी उनको भुलाना संभव नहीं होता क्योंकि फिर-फिर उसी प्रकार की घटनाओं का जब-जब दोहराव होता है तब-तब उन पुरानी घटनाओं की यादें तरो-ताजा हो जाती हैं। 

कामरेड रमेश मिश्रा :
होटल मुगल शेरटन,आगरा से 'सुपर वाईजर  अकाउंट्स' की पोस्ट से बर्खास्तगी को कानूनी चुनौती देने के दौरान कामरेड अब्दुल हफीज साहब से संपर्क हुआ था जो त्याग की सच्ची मूर्ती थे और उनको संत कामरेड की संज्ञा प्राप्त थी। उनको लोग प्यार से 'चचे' भी पुकारते थे और वह आगरा में भाकपा के पर्यायवाची थे। कम्युनिस्ट पार्टी से अभिप्राय आम जनता में चचे की पार्टी से था। यह ठीक उसी प्रकार था जैसे कि लखनऊ में कम्युनिस्ट पार्टी से अभिप्राय यहाँ के आम नागरिक कामरेड अतुल अंजान की पार्टी से लेते हैं। हफीज साहब ने पार्टी के आडिटर कामरेड हरीश आहूजा एडवोकेट के पास मुझे भेज दिया जिन्होने मेरा केस तैयार कराया। कामरेड आहूजा ने मुझे भाकपा में शामिल कर लिया। वह प्रत्येक ब्रहस्पतिवार को 'मजदूर भवन' पर एक स्कूल चलाते थे जिसमें बतौर पार्टी शिक्षक कामरेड डॉ रामगोपाल सिंह चौहान,कामरेड डॉ महेश चंद्र शर्मा और पार्टी के जिलामंत्री कामरेड रमेश मिश्रा आया करते थे।

एक दिन मैं किसी और कार्य से मजदूर भवन की तरफ से निकल रहा था तो आहूजा साहब ने इशारा करके मुझे पास बुलाया और कहा कि आपको डॉ चौहान और डॉ शर्मा पार्टी आफिस में याद करते हैं और आप कल ही उनसे संपर्क करें और वहीं जाया करें यहाँ आने की आवश्यकता नहीं है। कामरेड डॉ चौहान साहब ने मुझे पार्टी कार्यालय में कार्य करने को कहा और मैं उनके तथा डॉ शर्मा जी के निर्देशन में  उनको सहयोग करने लगा। जिलमंत्री कामरेड रमेश मिश्रा जी ने मुझे अपने घर से कुछ पार्टी साहित्य भी पढ़ने को दिया और कई सभाओं में मुझे मेरे घर से लेकर अपने साथ गए और वापिस भी घर पहुंचा देते थे। डॉ चौहान के बीमार पड़ने पर उनके सुझाव पर मुझे ज़बरदस्ती ज़िला कोषाध्यक्ष के पद पर नियुक्त करा दिया। उनका पूर्ण विश्वास मुझे हासिल रहा। प्राइमरी शिक्षक संघ के एक नेता कामरेड रमेश कटारा जो कुछ 'तांत्रिक' प्रक्रियाओं के भी विशेज्ञ थे एक के बाद एक मिश्रा जी के विश्वस्तों को उनसे दूर कराते जा रहे थे। कटारा साहब ने मिश्रा जी का मस्तिष्क जाम कर दिया था और उनका विवेक समाप्त कर दिया था उनके बड़े पुत्र को पढ़ाई से विरक्त कर दिया था। उनकी निगाह मिश्रा जी का कारोबार हड़पने पर लगी थी जिसके लिए उनको उनसे सहयोग करने वालों से दूर करना ज़रूरी था। मिश्रा जी के माध्यम से कटारा साहब प्रदेश कंट्रोल कमीशन में शामिल हो गए थे। उनकी फितरत के कारण मुझे भी 1994 में भाकपा से अलग होना पड़ा था। 

कई आंदोलनों में मिश्रा जी कलेक्टरेट पर मिलते थे और घरेलू हाल-चाल पूछते रहते थे। एक बार दयालबाग में इत्तिफ़ाकीया वह मिल गए तो बोले आजकल दिखाई नहीं पड़ते क्या बात है? मैंने जब कहा कि अब मैं किसी भी राजनीतिक दल में नहीं हूँ और निष्क्रिय हूँ। तब कामरेड मिश्रा जी ने कहा कि यह नहीं हो सकता कि एक राजनीतिक व्यक्ति निष्क्रिय बैठा रहे आप को वापिस अपनी मूल पार्टी में लौटना होगा मैं आपके घर आऊँगा। और वाकई मिश्रा जी मुझे मेरे घर से अपने साथ लेकर पार्टी कार्यक्रमों में शामिल करने लगे जबकि औपचारिक रूप से मैं पुनः सदस्य भी नहीं बना था।2006 में  आगरा कमिश्नरी पर संसद-सदस्य  राज बब्बर के साथ डॉ गिरीश (जो अब प्रदेश सचिव हैं) एक प्रदर्शन में शामिल हुये थे। मिश्र जी मुझे लेकर गए थे और पार्टी के नए कार्यालय पर चलने को कहा था जहां डॉ गिरीश जी एक ट्रेक्टर ट्राली पर बैठ कर गए थे मैं भी उसी में था। पार्टी कार्यालय पर डॉ गिरीश जी की उपस्थिती में कामरेड मिश्रा जी ने मुझे पुनः सदस्यता प्रदान करने की औपचारिकता पूर्ण की थी। 2008 के सम्मेलन में मिश्रा जी ने मुझे भी सह-सचिव के रूप में अपने साथ नियुक्त किया था। किन्तु कुछ घरेलू कारणों से मुझे 2009 में  आगरा छोड़ कर लखनऊ सेटिल होना पड़ा और अब लखनऊ की पार्टी ज़िला काउंसिल में सक्रिय हूँ।

आज चार वर्ष बाद अचानक कामरेड रमेश मिश्रा जी की याद आने का प्रबल कारण यह है कि जिस रमेश कटारा को मिश्रा जी ने प्रदेश कंट्रोल कमीशन में शामिल कराया था और जिसके कारण मुझसे उनकी दूरी बनी थी उसको खुद मिश्रा जी ने ही पार्टी से निष्कासित करा दिया था और उसी के बाद मुझसे संपर्क किया था। आज उस रमेश कटारा का नया अवतार प्रदीप तिवारी के रूप में मुझे नज़र आ रहा है जिसने 12 जूलाई को डॉ गिरीश जी की जीप के साथ एक हादसा करने में सफलता प्राप्त की थी।13 जूलाई को उसी शख्स ने मीटिंग के दौरान मेरे कुर्सी पर,पैरों पर अपने पैरों से  और मेरे पेट  पर अपनी उंगली से प्रहार किए थे। उसी की कारगुजारी के कारण मुझे 18 वर्ष बाद बाहर के डाक्टर का आसरा लेकर पुत्र का इलाज करना पड़ा। तब से अब तक परिवार के सभी सदस्यों के इलाज पर लगभग रु 2000/-फिजूल खर्च हो चुके है। इस नए रमेश कटारा ने अपने मित्र एक दूसरे दल के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष के माध्यम से मुझे पार्टी से अलग करवाने का विफल प्रयास किया था और अब सत्तारूढ़ पार्टी के कुछ लोगों को मेरी छवी खराब करने के अभियान में लगाया है। काश आज कामरेड रमेश मिश्रा जी प्रदेश में पदाधिकारी बने होते तो इस नए रमेश कटारा  को उसका सही रास्ता दिखा देते। 




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2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह पोस्ट आज के (०६ सितम्बर , २०१३) ब्लॉग बुलेटिन - यादें पर प्रस्तुत की जा रही है | बधाई

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  2. चेतन अवस्था में कुछ घटना-क्रम इस प्रकार असर डालते हैं कि चाह कर भी उनको भुलाना संभव नहीं होता क्योंकि फिर-फिर उसी प्रकार की घटनाओं का जब-जब दोहराव होता है तब-तब उन पुरानी घटनाओं की यादें तरो-ताजा हो जाती हैं।
    सहमत हूँ

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