गुरुवार, 18 अगस्त 2011

आगरा /1984-85 (भाग-2)

नवंबर 1983 मे यशवंत का जन्म हुआ और जनवरी 1984 मे शालिनी के रेलवे वाले भाई शरद मोहन का विवाह हुआ अतः हम लोगों के शामिल होने का सवाल ही नहीं था ,बउआ ने पहले ही उन लोगों से कह दिया था जाड़ों मे छोटे बच्चे को नहीं भेजेंगे यदि शामिल करना चाहें तो गर्मियों मे शादी करे। इसी प्रकार 1982 मे नवंबर मे यशवंत के बड़े भाई के होने और न रहने के तुरंत बाद उन लोगों ने दिसंबर मे शालिनी की छोटी बहन सीमा की शादी की  थी अतः उसमे भी वह शामिल न हो सकी थी। मुझे झांसी जाना पड़ा था। वहाँ बहनोयी साहब बड़ी भांजी को लेकर शामिल हुये थे उनकी सीधे रिश्तेदारी थी (कूकू की पत्नी मधु उनकी भतीजी जो हैं)।

अगले दिन मै बहन के घर गया था । बड़ी भांजी का हाथ पकड़ कर( और छोटी भांजी को गोद लेकर ) उसी से रास्ता पूंछ कर मिठाई की दुकान पर जाकर शुगन की मिठाई लेकर दे दी थी। इसी छोटी भांजी की देवरानी की भाभी है कूकू की वही बेटी जो दिसंबर 1983 मे  सीमा की शादी मे मेरे गोद मे आकार चुप हो जाती थी और और लोगों के पास रो रही थी।

मेरे सस्पेंशन पीरियड मे ही यूनियन के वार्षिक चुनाव हो रहे थे मुझ पर साथियों का दबाव था जब मेनेजमेंट ने वादा तोड़ा है तो तुम भी चुनाव लड़ कर सक्रिय हो जाओ। मैं केम्पस के भीतर तो प्रचार कर नहीं सकता था बाहर ही थोड़ी देर लोगों से मिल लेता था। वोटिंग 10 जनवरी को हुयी थी,मतगणना स्लो स्पीड से करने की मेनेजमेंट की हिदायत थी। साथियों का कहना था परिणाम की घोषणा के वक्त मौजूद रहो। अतः घर पर देर से आने की खबर करने गया  तो वहाँ शालिनी की माता और छोटी भाभी संगीता मौजूद थे जो यशवंत के जन्म के बाद वहाँ से आने वाले पहले लोग थे। मै तो सूचना देकर और चाय पीकर वापिस होटल मुगल जो हमारे घर से 9 K M की दूरी पर था के लिए चला तभी आगंतुक लोग भी वापिस टूंडला लौट गए।

रात 10 बजे परिणामों का खुलासा किया गया प्रेसीडेंट की टीम के 11 मे 10 तथा मेरे टीम के 11 मे 1 जो खुद मै था जीते थे। कुल पड़े मतो मे सेकेंड हाएस्ट वोट मुझे मिले थे। मेनेजमेंट समर्थकों का कहना था जैसे फरनाडीज़ को जेल मे रहते हुये सहानुभूति के वोट मिले थे उसी प्रकार मुझे सस्पेंशन के कारण इतने अधिक मत मिल गए। जबकि हकीकत यह थी कि अपने सेक्रेटरी जेनरल रहते मैंने निचले पोस्ट के लोगों को जो लाभ दिलाये थे उन्हे वे भूले नहीं थे और पुराने उपकार का प्रतिफल उन्होने वोट के रूप मे दिया था।

14 जनवरी 1985 को मकर संक्रांति  के दिन शरद मोहन और उनकी पत्नी संगीता अपनी शादी की वर्षगांठ 16 जनवरी का निमंत्रण लेकर आए और चूंकी यशवंत के जन्म के बाद वहाँ से पहली बार वह आए थे  तो उसके लिए खिलौने-कपड़े,मिठाई भी लाये थे। कड़ाके की सर्दी मे यशवंत और शालिनी तो नहीं गए मुझे ही औपचारिकता निबाहनी पड़ी।

चूंकि मै कार्यकारिणी का चुनाव जीत गया था और इस कार्यकारिणी के सेक्रेटरी और प्रेसीडेंट मेनेजमेंट का खिलौना थे अतः कोई बैठक तब तक नहीं बुलाई गई जब तक 19 फरवरी 1985 को मुझे टर्मिनेशन लेटर नहीं पोस्ट कर दिया गया। नौकरी खोने के बाद............. 

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3 टिप्‍पणियां:

  1. रेखा जी के ब्लॉग पर आपकी टिप्पणी पर आधारित एक पोस्ट मैंने लिखी है. आप इसे देखेंगे तो मुझे खुशी होगी.
    http://meghnet.blogspot.com/2011/08/blog-post_20.html

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  2. गुरूजी प्रणाम - दुःख में जब अपनो के साथ मिलते है , तो बहुत ही अनचाही खुसी महसूस होती है 1

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  3. शीर्षक ठीक कर लें ...शायद आगरा है यह !
    संस्मरणों को कलमबद्ध करके आपने अपनी यादों को अमर दिया है आपने !
    शुभकामनायें आपको !

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ढोंग-पाखंड को बढ़ावा देने वाली और अवैज्ञानिक तथा बेनामी टिप्पणियों के प्राप्त होने के कारण इस ब्लॉग पर मोडरेशन सक्षम कर दिया गया है.असुविधा के लिए खेद है.

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