मंगलवार, 9 अगस्त 2011

आगरा/१९८२-८३(भाग ३) / १९८४-८५ (भाग १)

आगरा लौटने पर भी शालिनी का मन अस्त-व्यस्त रहा उन्हें अपने दिवंगत पुत्र की याद सताती थी जो मात्र १२ घंटे ही जीवित रहा था.हमारी बउआ को बाँके बिहारी,मंदिर -वृन्दावन पर आस्था थी वहीं के दर्शन करके लौटते में बाबूजी का ट्रांसफर बरेली से सिलीगुड़ी होने का समाचार मिला था.शालिनी की माताश्री ने वृन्दावन दर्शन करने का सुझाव दिया तो बउआ ने उसका पालन करा दिया.वृन्दावन में इस बार हम लोग बउआ की माईं जी से भी मिलने गए जो घर पर मिल गयीं क्योंकि तब टी.बी.हास्पिटल से रिटायर हो चुकी थीं,इससे पूर्व बउआ कई बार गयीं वह नहीं मिली थीं.पुराने लोग तो पुरानी हमदर्दी से ही मिलते थे. 

चूंकि पिछली बार टूंडला पीहर भेजने पर शालिनी को बेटा खोना पड़ा था इस बार मैंने नहीं भेजने दिया तो बउआ ने कहा की उनसे काम नहीं होता है लिहाजा मुझे छुट्टी लेकर मदद करना होगा.२२ नवंबर को यशवन्त के जन्म के बाद एक हफ्ता केजुअल +सी.आफ तथा एक माह एनुअल लीव पर रह कर मदद की.

१९८४-८५ (भाग १)

जनवरी १९८४ में मैंने ड्यूटी ज्वाइन कर ली.यूं.ऍफ़.सी.पन्छू साहब के घर एक किलो गुड की गजक मिठाई की जगह दी जो उन्हें बहुत पसंद आई.स्टाफ के लोगों को रेवड़ियाँ बांटीं थीं उसमे से भी पन्छू साहब मांग कर घर ले गए थे.

१९८१-८२ की इन्वेंटरी रिपोर्ट बनाने में तीन लोग थे और फाईनल  ए.यूं.ऍफ़.सी ने की थी.१९८२-८३ की रिपोर्ट भी तीन लोगों ने बनायी थी और फाईनल ए.ओ.ने की थी.१९८३-८४ की रिपोर्ट भी तीन लोगों ने बनायी थी और दो लोग मेरे आधीन होने के कारण मैंने फाईनल की थी.मुझ से पहले मेनेजर और अफसर ने क्या फाईनल घपला किया मेरी जानकारी में नहीं था.मैंने वास्तविक और भौतिक-सत्यापन के आधार पर रिपोर्ट तैयार की थी जिसे देखते ही पछू साहब उछल पड़े क्या तुमसे पहले अफसर गलत थे?उन्होंने एडी-चोटी का दम लगा लिया कि,डिपार्टमेंटल  मेनेजर बुक वेल्यू को वेरीफाई कर दें ,लेकिन कोई क्यों गलत रिपोर्ट  पर दस्तखत  करता?यहाँ तक कि शेफ जो तमिल ही थे उन्होंने भी पन्छू साहब की दलील नहीं स्वीकारी.

मेरी रिपोर्ट से साफ़ था पूर्व में अधिकारियों ने पौने छः लाख का घपला किया था या तो माल आया ही नहीं और भुगतान हुआ या माल चोरी गया.श्रेय मुझे न देकर कं.के इन्टरनल आडीटर की रिपोर्ट में डलवा कर उतनी रकम को राईट आफ करवाया गया.चोरी पकड़ने का रिवार्ड मिलने की बजाय मुझे उत्पीद्नात्मक कारवाईयों का सामना करना पड़ा.

अक्षय तृतीया पर बउआ ने यशवन्त को बांके बिहारी मंदिर दर्शन कराने का फैसला किया उसका घर का नाम भी उन्होंने बांके ही रख दिया था.बाबूजी ने मंदिर में रु.१०/-पंडित को देकर यशवन्त को मूर्ती के निकट तक भिजवा दिया था.लेकिन वहां से लौटने के बाद ड्यूटी जाने पर मुझे सस्पेंशन लेटर थमा दिया गया.

इन्हीं सब घटनाओं का प्रभाव था कि माता-पिता के निधन के बाद मैंने आर्य समाज ज्वाइन कर लिया था.हालांकि शालिनी के निधन के बाद बाबूजी ने ही सर्व-प्रथम आर्य समाज से हवन कराया था क्योंकि अजय के पास समयाभाव था.

सस्पेंशन के बाद......

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6 टिप्‍पणियां:

  1. कितनी सूक्षमता से आप एक एक घटना का विवरण लिख रहे हैं। कैसे याद रख पाए इतना डिटेल ...!

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  2. हमारे द्वारा लिये गए निर्णयों के पीछे किसी घटना विशेष का हाथ होता है....
    बहुत अच्छा लिख रहे हैं...

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  3. गुरूजी प्रणाम , यह भी एक संघर्ष भरी कथा ! कुछ तो निष्कर्ष निकालिए इन घटनाओं से !

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  4. संघर्ष ही जीवन है..यही सोच मनुष्य को आगे बढ़ाती है....आभार सहित..

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  5. बहुत सुन्दर सारगर्भित
    रक्षाबंधन एवं स्वाधीनता दिवस के पावन पर्वों की हार्दिक मंगल कामनाएं.

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  6. संघर्ष...संघर्ष ...संघर्ष ...यही जीवन है.

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