मंगलवार, 5 जून 2012

आगरा/1994 -95 /भाग-21

..... जारी .....


ई ओ साहब मय अपने परिवार और भाइयों के 12 नवंबर की रात मस्ती से दयाल लाज मे रुके। 13 तारीख को सुबह 10 बजे तक हमारे घर पहुंचे दिन का खाना खाने के बाद देर से 'किला' व 'ताज महल'घूमने निकले। किला घूमते-घूमते उनकी बड़ी बेटी थक गई और पूनम ने उसे गोद ले लिया तो मैंने छोटी को गोद ले लिया परंतु वह मुझ अजनबी की गोद से तुरंत उतर गई। बड़ी को उसके सगे चाचा ने जोरदार  डांट पिलाई जिस पर वह रो पड़ी। अधूरा किला घूम कर ताजमहल पहुंचे समय अधिक होने के कारण रु 20/- वाले टिकट मिलने बंद थे और प्रति टिकट रु 100/- वाला उपलब्ध था अतः ई ओ साहब बेरंग लौट लिए आखिर रु 900/- टिकट पर खर्च कैसे करते?मै इस हैसियत मे था ही नहीं कि इतना खर्च कर देता । वहाँ से बालाघाटी इंजीनियर साहब ने सबको टेम्पो टैक्सी के माध्यम से घर भेज दिया (चाबियाँ मैंने पूनम के सुपुर्द कर दी) और वह खुद मेरे मोपेड़ पर बैठ कर फोर्ट रेलवे स्टेशन पहुंचे। बड़े भाई-भाभी,चचेरे भाई और भतीजियों के टिकट 14 तारीख सुबह 06 बजे की  'जोधपुर -हावड़ा'से ले लिए ,सभी टिकेट वेटिंग मे थे। खुद और दो-चार दिन रुकने का कार्यक्रम रखे थे।

अगले दिन सुबह ई ओ साहब ने बुखार होने की शिकायत की और अपने छोटे भाई साहब को टिकट केनसिल कराने का निवेदन किया। फिर उन्हें मोपेड़ पर बैठा कर तड़के पाँच बजे फोर्ट स्टेशन ले गया वहाँ टिकट कनफर्म  मिले इत्तिफ़ाक से गाड़ी एक-डेढ़ घंटा लेट थी। भागमभाग घर पहुंचे ई ओ साहब की सोती बेटियों को जबर्दस्ती जगा कर  इंजीनियर साहब ने अपनी भाबी द्वारा तैयार कराया। जाना केनसिल होने के कारण पूनम ने तब तक कोई नाश्ते का प्रबंध नहीं किया था। घर मे रखे 'रस्क' के पेकेट  बटोर कर मैंने साथ के लिए दे दिये। हड़बड़ी मे चाय हुई। फिर सब लोग उन्हे पहुंचाने फोर्ट स्टेशन पहुंचे। उसी रात पटना पहुँच कर भी अगले दिन से ई ओ साहब लगभग एक माह ड्यूटी नहीं गए घर पर आराम फरमाते रहे जैसा कि उनके छोटे भाई ने प्रचारित किया। पूछने पर पूनम ने हमेशा चुप्पी साधे  रखी है।

इंजीनियर साहब को मै कामरेड किशन बाबू श्रीवास्तव एवं अशोक तथा गुरुदेवशरण के घर मिलाने ले गया था । धीरे-धीरे इन सभी ने कट-आफ कर लिया पता नहीं इंजीनियर साहब कौन सा जादू चला गए थे। दो दिन बाद इंजीनियर साहब रात की 'जोधपुर-हावड़ा' से जोधपुर एक हीरे की खान मे इंटरवियु देने रवाना हुये फिर उन्हें मोपेड़ से छोडने फोर्ट स्टेशन गया। गाड़ी काफी लेट थी लौटने मे बहुत देर हुई,पूनम घर पर परेशान रहीं उन्हे अभी पहुंचे हुये एक सप्ताह ही  तो हुआ था।

09 दिसंबर राजा की मंडी.....

27 सितंबर को दिन मे पूनम के पिताजी से ई ओ साहब के सामने व उसी दिन शाम को उनकी माताजी से उनके ही सामने स्पष्ट कर दिया था कि शालिनी के घर के लोगों से हमारे अब कोई संबंध नहीं हैं। फिर भी उन लोगों ने पूनम को कौन सा पाठ पढ़ाया था कि वह लगातार राजा-की-मंडी चलने की ज़िद कर रही थीं। मैंने यहाँ तक कहा कि बउआ ने मना किया था कि वहाँ बिना बुलाये पूनम को न ले जाना (क्योंकि वे ही लोग पूनम का फोटो पसंद करके मुझ पर दबाव बनाए थे उनसे विवाह करने हेतु)। पूनम ने यह कह दिया कि," अपनी मरी माँ की बात भी मानना है और हमारी ज़िंदा माँ की बात भी नही मान रहे हैं। " इस बात पर मैंने कह दिया कि ठीक है मौका मिलने पर ले चलेंगे। यशवन्त को उसके बाबा जी-दादी जी वृन्दावन-बाँके बिहारी मंदिर दर्शन करवाने लगभग हर वर्ष भिजवाते थे,1994 मे भी भिजवा दिया था। इस बार अभी तक नही गया था लिहाजा यह तय हुआ कि 09 दिसंबर को ट्रेन से चलते हैं और ट्रेन से ही लौटते हैं तब लौटते मे राजा-की मंडी भी ले चलेंगे। वैसा ही किया। बाहर के बरामदे को कवर्ड कर बनाए कमरे मे संगीता ने बैठा दिया और शालिनी की माँ काफी विलंब से आई। पूनम ने उनसे कहा -"मेरी माँ तो 800 किलोमीटर दूर हैं यहाँ आप ही मेरी स्थानीय माँ हैं। " वह औरत मौन ही रही । बाज़ार से चाय वाले के यहाँ से मगा कर बिस्कुट दिये और संगीता ने जो चाय बनाई खुद पूनम ही पूरी न पी सकीं उनका ही कहना है कि गुड़ की थी। बड़ा शौक था अपनी ज़िंदा माँ की बात मान कर और मुझ पर अविश्वास कर वहाँ जाने का वह पूरा हो गया ।


मेरी गैरहाजिरी मे गुरुदेवशरण पूनम को हम सब का भोजन उनके घर  करने का निमंत्रण दे गए  थे। मै इच्छुक नहीं था परंतु फिर वह खुद ही बुलाने भी आ गए तो जाना ही पड़ा । गुरुदेवशरण के घर का खाना खा कर लौटते मे पूनम ने मंकामेश्वर मंदिर जाने की इच्छा व्यक्त की जिसकी खूब तारीफ गुरुदेव जी ने की थी। मै इच्छुक नहीं था परंतु आग्रह टाला नहीं। रास्ते मे स्पीड ब्रेकर पर पूनम मोपेड़ से गिर गई और कंधे-कमर मे अंदरूनी चोटे आई। एक तो राजा-की मंडी जाकर शालिनी की माँ को अपनी माँ कहना फिर उनके एजेंट गुरुदेवशरण का भोज स्वीकार करना खुद पूनम को ही काफी भारी पड़ा।

ई ओ साहब अपने पिताजी की एक चिट्ठी अपने साथ लाये थे जिसमे उन्होने मुझसे पूनम और यशवन्त को लेकर बड़े दिन पर उनके पास पटना आने को कहा था। मुझे काफी हैरानी है कि जब कुछ ही दिन मे पटना जाना ही था और वहाँ सब आमने-सामने होते तब राजा-की मंडी जाने या न जाने का फैसला हो सकता था फिर क्यों उन्होने या उनकी माताजी ने उनसे मुझ पर दबाव बनवाया जिसका परिणाम खुद पूनम के लिए ही घातक हुआ। 24 दिसंबर को चल कर 25 को हम लोग पटना पहुंचे 'मगध एक्स्प्रेस' फिर लेट पहुंची पूनम के पिताजी तैयार खड़े थे हम लोगों के घर पहुँचते ही वह अपने ओल्ड ब्वायज एसोसिएशन के गेट-टुगेदर मे भाग लेने रवाना हो गए। उन्होने चूंकि पत्र मे यह नहीं लिखा था कि वह कितने दिन के लिए बुला रहे हैं या कि पूनम को कुछ दिनो के लिए रोकना  था लिहाजा मैंने सबके लौटने का टिकट पहली जनवरी का बुक कराने को कह दिया था।


जितने दिन वहाँ रहे ई ओ साहब की परम प्रिया  चाची आरा वाली के दोनों पुत्र हमारे साथ छाया की भांति लगे रहते थे ,उस समय यह धोखा हुआ   कि वे मिलनसार हैं परंतु बाद मे ज्ञात हुआ कि टोही लोग थे और किसी न किसी खौफनाक मकसद से घेरे रहते थे। 

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